मानव भ्रूण में संयोजक कोशिकाएं पहचानी गई

प्रत्येक स्तनधारी, पक्षी और सरीसृप के भ्रूण की प्रारंभिक अवस्था में कोशिकाओं का एक ऐसा समूह होता है जिनमें कुछ खास क्षमता होती है। कोशिकाओं का यह समूह अन्य कोशिकाओं को संकेत देता है कि उन्हें कौन-सा अंग बनना है। ये ‘संयोजक’ कोशिकाएं कहलाती   हैं। जीव विज्ञानियों ने अब तक मेंढक, पक्षियों और चूहों के भ्रूण में इन संयोजक कोशिकाओं का पता कर लिया था किंतु नैतिकता सम्बंधी नियमों के चलते मानव भ्रूण में इन संयोजक कोशिकाओं को देख पाना संभव नहीं हुआ था। हाल ही में प्रयोगशाला में मानव स्टेम कोशिकाओं में इन संयोजकों को देखा गया है।

1920 की शुरुआत में जर्मन भ्रूण विज्ञानी हैंस स्पैमैन और उनके स्नातक छात्र हिल्डे मैंगोल्ड इस पर अध्ययन कर रहे थे कि कैसे कशेरुकी जानवरों के भ्रूण, कोशिकाओं की खोखली गेंद से हाथ-पैर-सिर बनने वाली संरचना में परिवर्तित हो जाते हैं। परिवर्तन के दौरान भ्रूण एक संकरी नाली नुमा लकीर बनाता है जिसे प्रारंभिक लकीर कहते हैं। स्पैमैन और मैंगोल्ड को सेलेमैंडर के भ्रूण में प्रारंभिक लकीर के एक छोर पर कोशिकाओं का एक खास समूह दिखा। उन्होंने इन्हें जब सैलेमेंडर की एक अन्य प्रजाति के भ्रूण पर आरोपित किया तो इन कोशिकाओं ने अपने आसपास की अन्य कोशिकाओं को मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी बनने के संकेत दिए। यह अध्ययन वैकासिक जीव विज्ञान में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके लिए स्पैमैन को 1935 में कार्यिकी का नोबेल पुरस्कार मिला था।

इसके बाद वैज्ञानिकों ने इसी तरह की संयोजक कोशिकाएं, जिन्हें ‘स्पैमैन संयोजक’ भी कहते हैं, मेंढक, पक्षियों और चूहों के भ्रूण में देखीं। लेकिन मानवों में इन्हें देखने के लिए भ्रूण को 14 दिन से ज़्यादा जीवित रखना होता है। यू.के. में नियमों के मुताबिक भ्रूण को 14 दिन तक ही रखा जा सकता है।

उक्त नियम से बचने के लिए न्यूयार्क स्थित रॉकफेलर विश्वविद्यालय के स्टेम कोशिका जीव विज्ञानी ब्रिवनलो की टीम ने प्रयोगशाला में मानव भ्रूण से ली गई स्टेम कोशिकाओं को कल्चर किया है। इस प्रयोग में शोधकर्ताओं ने कोशिकाओं का संपर्क भ्रूण विकास में महत्वपूर्ण दो प्रोटीन्स से कराया। इससे कुछ ऐसी कोशिकाएं विकसित हुर्इं जिनमें संयोजक कोशिका के आनुवंशिक लक्षण थे। इसके बाद उन्होंने इन संयोजक कोशिकाओं को चूज़े के भ्रूण पर आरोपित किया। ऐसा करने पर पाया गया कि चूज़े के अपने तंत्रिका तंत्र के साथ ही साथ तंत्रिका ऊतकों की एक और लकीर उभर रही थी। इसे शोधकर्ताओं ने नेचर पत्रिका में रिपोर्ट किया है। अध्ययन के वरिष्ठ लेखक ब्रिवनलो का कहना है कि यह काफी अश्चर्यजनक है कि दो अलग-अलग प्रजातियों की कोशिकाएं विकास सम्बंधी संकेतों या निर्देशों को साझा कर सकती है।

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के विकास जीव विज्ञानी क्लॉडियो स्टर्न ने इसे  ‘एक अच्छी तकनीकी पहल’ की संज्ञा दी है। मानव भ्रूण के बाहर संयोजक कोशिकाओं को बनाने में मिली सफलता यह समझने में मदद कर सकती है कि इनमें अन्य कोशिकाओं को संकेत देने की क्षमता कहां से आती है। इससे भ्रूण विकास के समय कोशिकाओं की संकेत प्रणाली को समझने में भी मदद मिल सकती है। शोधकर्ता प्रयोगशाला में तैयार की गई भ्रूण कोशिकाओं के उपयोग से प्रारंभिक विकास के चरणों को समझने की तैयारी कर रहे हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

फोटो क्रेडिट : Futura Science

 

इटली में तीन हज़ार वर्ष पूर्व वाइन उद्योग – एस. अनंतनारायण

हा जा रहा है कि वाइन बनाने की शुरुआत संगठित खेती से पहले हो गई थी। यह संभव भी लगता है क्योंकि कुछ किस्मों के फल भंडारण के दौरान सड़ जाते हैं या पिलपिला जाते हैं तो उनमें किण्वन की प्रक्रिया होने लगती है, जिसके परिणामस्वरूप वाइन बनती है। किंतु अनाजों से वाइन या बीयर बनाना अलग बात है। इसके लिए काफी मात्रा में अनाज चाहिए और एक पूरी प्रक्रिया चाहिए। फलों के सड़ने-गलने से संयोगवश वाइन बनती भी है तो इतनी-सी वाइन से एक पूरा उद्योग पनपना संभव नहीं है। वह तो तभी होगा जब उत्पादन काफी मात्रा में हो और इसे संग्रहित करके बाद में उपयोग के लिए रखा जा सके।

दक्षिण फ्लोरिडा और इटली स्थित विश्वविद्यालयों व संस्थानों के शोधकर्ताओं ने माइक्रोकेमिकल जर्नल में रिपोर्ट किया है कि साक्ष्यों से पता चला है कि पहली सहत्राब्दी ईसा पूर्व से ही इटली में शराब (वाइन) का उत्पादन और संग्रहण होता रहा है। सिसली के दक्षिण-पश्चिमी तट पर चूने के पहाड़ मॉन्टे क्रोनियो की खुदाई में सिरेमिक (चीनी मिट्टी) पात्रों के हिस्से मिले हैं। इन पात्रों पर जैविक पदार्थ के अवशेष मिले हैं। शोधकर्ताओं ने पुरातात्विक अन्वेषण में प्रयोगशाला विधियों के उपयोग का एक नया दृष्टिकोण दिया है जिससे प्राचीन सभ्यताओं की पाक कला और आहार सम्बंधी व्यवहार को समझने में मदद मिल सकती है ।

निश्चित तौर पर प्राचीन काल में शराब उत्पादन के और भी प्रमाण मिलते हैं। मसलन फ्रांस स्थित रॉकप्रट्यूस में 6ठी शताब्दी ईसा पूर्व बीयर बनाई जाती थी। इससे भी कई वर्ष पूर्व, लगभग 3000 ईसा पूर्व, चीन के शान्क्सी ज़िले में बीयर उत्पादन के साक्ष्य मिले हैं। 2011 में ह्यूमन बायोलॉजी नामक जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार सीएनआरएस, मॉन्टपेलियर के वैज्ञानिकों को सेल्टिक मठ के पुरातात्विक स्थल की खुदाई में बीयर बनाने में प्रयुक्त कच्चा माल और उपकरण मिले हैं। एक निवास स्थान के फर्श से अधजले जौं के दाने मिले हैं जिससे पता चलता है कि ये बीयर बनाते हुए दानों को सुखाने की प्रक्रिया में भट्टी में अधजले छूट गए होंगे।

उसी जगह पर ऐसे बर्तन मिले हैं जिनमें जौं को अंकुरित करने से पहले भिगोया जाता होगा। साथ ही भट्टी के अवशेष मिले हैं जो अंकुरित जौं सुखाने के काम आती होगी। वहां चक्की के पाट, भट्टी और संग्रहण के पात्रों की मौजूदगी से लगता है कि यहां बीयर बनाई जाती थी जो उनकी परंपरा का हिस्सा होगी। साथ ही साथ, अन्य समुदाय के लोगों के साथ व्यापार की वस्तु और संचार का ज़रिया होगी।

चीन में येलो रिवर घाटी में मिले अवशेष और भी प्राचीन हैं। माना जाता है कि चीनी सभ्यता की शुरुआत येलो रिवर के किनारे ही हुई थी। इस घाटी में कई पुरातात्विक खोजें हुई हैं। 2013 में पीएनएएस में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक दो गड्ढों से कुछ कलाकृतियां मिली हैं, जिनकी कार्बन डेटिंग से पता चला है कि ये 3400 से 2900 ईसा पूर्व की हैं। कलाकृतियों में चौड़े मुंह वाली कीप सही-सलामत मिली है। इसके अलावा चौड़े मुंह वाले घड़े, सकरे मुंह वाले लंबे घड़े (एम्फोरा) और चूल्हे के हिस्से मिले हैं। इन्हें देख कर लगता है कि ये विशेष रूप से मदिरा बनाने, छानने और उसके भंडारण के लिए और गर्म करने एवं तापमान नियंत्रण के लिए उपयोग किए जाते होंगे।

इन बर्तनों पर जो अवशेष मिले हैं वे मंड के कण हैं, जो अनाजों के कारण पड़े होंगे। साथ ही फाइटोलिथ जैसे खनिजों के कण भी इन बर्तनों पर मिले हैं जो आम तौर पर विघटित पौधों के अवशषों में पाए जाते हैं। मंड की जांच से पता चला है कि यह मोटे अनाज, कुछ किस्म के गेहूं, जौं या यैम जैसे कुछ कंदों से आया होगा। ये इस क्षेत्र में पाए भी जाते हैं। प्राप्त मंड के अवशेष एक तो शक्तिशाली, टिकाऊ और खुशबूदार बीयर बनाने की विधि का संकेत देते हैं वहीं मंड के कणों में क्षति के प्रमाण भी मिले हैं। इस तरह की क्षति अनाज को अंकुरित करने, भिगोने, सुखाने की प्रक्रिया में हुई होगी। अंकुरित अनाज को गर्म हवा से सुखाने (माल्टिंग) के दौरान एंज़ाइम मंड को शर्करा में तोड़ते हैं जिसके कारण मंडयुक्त अनाज में छेद हो जाते हैं। फिर जब कचूमर बनाने के लिए अनाज के दानों को गर्म पानी में डालते हैं तो वे फूलते हैं और उनका आकार बिगड़ जाता है।

पीएनएएस पेपर के मुताबिक “इस प्रकार, पुरातात्विक खोज में मिले विकृत आकार के मंडयुक्त अनाज को देखकर कहा जा सकता है कि ये अनाज मदिरा बनाने की प्रक्रिया के अवशेष हैं।” अवशेष के रासायनिक विश्लेषण में कैल्शियम ऑक्ज़लेट के अवशेष भी दिखे। कैल्शियम ऑक्ज़लेट बीयर बनाने के पात्र में बीयरस्टोन के रूप में नीचे बैठ जाता है। यह बीयर बनाने की प्रक्रिया का द्योतक है। अवशेषों में कैल्शियम ऑक्ज़लेट की उपस्थिति से इस बात की पुष्टि होती है कि प्रागैतिहासिक पात्रों का उपयोग बीयर बनाने में किया जाता था।

इटली के सिसली के दो प्रागैतिहासिक स्थलों से प्राप्त बर्तनों पर कार्बनिक अवशेष पाए गए थे। खुदाई में मिले इन बर्तनों के अध्ययन के दौरान कार्बनिक अवशेषों की विस्तृत प्रयोगशाला जांच की गई। यह अध्ययन माइक्रोकेमिकल जर्नल में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन का उद्देश्य “कुछ विशेष आकार के सिरेमिक पात्रों के उपयोग को समझना और प्राचीन आहार सम्बंधी आदतों के बारे में कुछ अनुमान लगाना” था। अध्ययन में मध्य कांस्य युग (1550-1250 ईसा पूर्व) से प्रारंभिक लौह युग (1050-950 ईसा पूर्व) तक के अवशेष शामिल थे।

शोधकर्ताओं के समूह ने उपलब्ध पारंपरिक तरीकों और नवीनतम तरीकों का उपयोग करके पुरातात्विक सामग्री का विस्तृत विश्लेषण किया। उन्होंने नए सिरे से कार्बन डेटिंग, पशु कंकाल के अवशेषों के संरचनात्मक अध्ययन और सिरेमिक पात्रों और कार्बनिक अवशेषों के रासायनिक और अन्य विश्लेषण किए। बाद में अपना अध्ययन उन्होंने प्रारंभिक लौह युग के खाना पकाने के मर्तबान तक सीमित रखा। इसके लिए उन्होंने एनएमआर, इंफ्रारेड वर्णक्रम तथा स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप जैसी कई आधुनिक विधियों का उपयोग किया।

इन विधियों से प्राचीन लोगों के भोजन और आहार सम्बंधी आदतों के बारे में काफी जानकारी पता लगी है। लेकिन इस अध्ययन से एक जो महत्वपूर्ण चीज़ मिली वह है टारटरिक एसिड। मॉन्टे क्रोनियो की खुदाई में पाए गए पात्रों में से एक पात्र में टारटेरिक एसिड और इसके सोडियम लवण के निशान मिले हैं। टारटेरिक एसिड वाइन का एक महत्वपूर्ण घटक है और वाइन की रासायनिक स्थिरता सुनिश्चित करने में भूमिका निभाता है। टारटरिक एसिड ज़्यादातर फलों और पौधों में नहीं पाया जाता लेकिन अंगूर में विशेष रूप से पाया जाता है। निश्चित रूप इसी कारण से वाइन अक्सर अंगूर से ही बनाई जाती है।

मॉन्टे क्रोनियो के पात्रों पर अवशेष में टारटेरिक एसिड और इसके लवण की उपस्थिति इस बात का संकेत देते हैं कि लगभग 1000 ईसा पूर्व के सिरेमिक पात्र अंगूर से बनी वाइन के भंडारण के काम आते थे। इटली आज दुनिया का सबसे बड़ा वाइन निर्यातक है। लगता है, उन्होंने इसकी शुरुआत काफी पहले कर ली थी। (स्रोत फीचर्स)

नोट : यह लेख वेबसाइट पर 7 जून 2018 तक ही उपलब्ध रहेगा|

चिकित्सीय यंत्र हानिकारक हो सकते हैं

हाल में यूएसए में यह मुद्दा काफी ज़ोर से उठा है कि चिकित्सकीय उपकरणों (पेसमेकर, स्टेंट आदि) को लेकर मानक बहुत कमज़ोर हैं और इन्हें बगैर पर्याप्त प्रमाण के मंज़ूरी मिल जाती है।

अमेरिका के लगभग 30 लाख से 60 लाख लोग एट्रियल फिब्रिालेशन की दिक्कत से प्रभावित हैं। हमारे ह्रदय में चार प्रकोष्ठ होते हैं – दो आलिंद (एट्रिया) और दो निलय (वेंट्रिकल)। पूरे शरीर से खून आकर आलिंद में भर जाता है। तब आलिंद में संकुचन होता है और खून निलय में पहुंचता है। इसके बाद निलय में संकुचन होता है और खून को शरीर में भेजा जाता है। यह क्रिया काफी लयबद्ध ढंग से चलती है। मगर कभी-कभी आलिंद अनियमित ढंग से फड़कने लगता है। इसे एट्रियल फिब्रिालेशन कहते हैं। ऐसा होने पर ह्रदयाघात और मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है। पिछले दो दशकों से डॉक्टर इसका इलाज कैथेटर एब्लेशन से कर रहे हैं। इस तरीके में कैथेटर की मदद से ह्मदय के क्षतिग्रस्त ऊतकों को इस तरह उपचारित किया जाता है कि वहां घाव के निशान जैसा ऊतक (स्कार) बन जाए। इससे गड़बड़ विद्युत संकेतों को फैलने से रोका जा सकता है जो मांसपेशियों के फड़कने के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। इस उपचार में लगभग 20,000 डॉलर का खर्चा आता है। किंतु हाल ही में एक अध्ययन में पाया गया कि कैथेटर एब्लेशन अन्य सस्ते उपचारों से बेहतर नहीं हैं। किंतु कुछ लोगों का मत है कि अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि कैथेटर एब्लेशन से कुछ लोगों को तो फायदा हुआ है। लिहाज़ा, ज़्यादा गहन अध्ययन की ज़रुरत है।

इसी तरह, एक अध्ययन में पता चला था कि सीने में जीर्ण दर्द के मरीज़ों में दवाइयों की बजाय स्टेंट उपयोग करने से कोई अतिरिक्त लाभ नहीं मिलता।

दिल की खून पंप करने की क्षमता बढ़ाने के लिए इंपेला नामक यंत्र दिल में लगाया जाता है। इसे लगवाने में 25,000 डॉलर का खर्च आता है। इसे अब तक 50,000 से भी अधिक रोगियों में लगाया जा चुका है जबकि इसके परिणामों के बारे में कोई डाटा नहीं है।

कई लोग मांग कर रहे हैं कि दवाइयों के समान ऐसे चिकित्सा उपकरणों के लिए भी सख्त मापदंड होने चाहिए, किंतु यूएसए जल्द ही ऐसे चिकित्सा यंत्रों की मंज़ूरी और आसान कर सकता है। खाद्य व औषधि प्रशासन का मत है कि यंत्र को मंज़ूरी देने से पहले ज़्यादा छानबीन करने की बजाय बाज़ार में आने के बाद उसके परिणामों को देखा जाए। तर्क है कि इससे तकनीकी नवाचार को बढ़ावा मिलेगा और मरीज़ों को मदद। हालांकि, ऐसे ढीले-ढाले नियमों के चलते युरोप में वज़न घटाने के लिए पेट में लगाए जाने वाले गुब्बारे व स्तन प्रत्यारोपण जैसे उपचारों के दुष्परिणाम देखकर वहां नियमों में बदलाव किए गए।

एफ.डी.ए. ने ह्रदय के ब्लॉकेज से निजात पाने के लिए एक नए प्रकार के स्टेंट को अनुमति दी थी जो लगभग तीन साल में घुल जाता है। तर्क यह था कि मरीज़ धातु के यंत्र की बजाय घुलने वाले यंत्र लगवाना बेहतर समझेंगे। और हुआ भी वही, बाज़ार में इसकी मांग बढ़ गई। लेकिन दीर्घावधि अध्ययनों से पता चला कि कई स्टेंट रक्त के थक्के में तबदील हो रहे थे जिनसे दिल के दौरे का खतरा और बढ़ गया था।

चिकित्सीय यंत्रों की मंज़ूरी के लिए सख्त मानकों की ज़रूरत है। दवाओं की तुलना में यंत्रों के असर का अध्ययन करना मुश्किल है। कुछ रोगियों को एक झूठी गोली (प्लेसिबो) देना आसान है। पर स्टेंट या अन्य यंत्र के प्रत्यारोपण करने का नाटक करना मुश्किल है। किंतु वास्तविक लाभ का आकलन करने के लिए यह ज़रूरी है। (स्रोत फीचर्स)

नोट : यह लेख वेबसाइट पर 7 जून 2018 तक ही उपलब्ध रहेगा|

मशहूर दकियानूस वैज्ञानिक की प्रशंसा का खामियाजा

जेम्स वॉटसन मशहूर वैज्ञानिक हैं। 1950 के दशक में उन्होंने फ्रांसिस क्रिक के साथ मिलकर आनुवंशिक पदार्थ डीएनए की रचना का खुलासा किया था जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इसके बाद वे मानव जीनोम परियोजना के निदेशक भी रहे। हाल ही में उनकी 90वीं सालगिरह मनाई गई। इस आयोजन में एमआईटी के ब्रॉड इंस्टीट्यूट के एरिक लैंडर को उनका प्रशस्ति पत्र पढ़ने को कहा गया था।

यह आयोजन कोल्ड हार्बर स्प्रिंग लेबोरेटरी में जीनोम्स बैठक के दौरान किया गया था। विडंबना यह है कि वॉटसन इस लेबोरेटरी के निदेशक थे और 2007 में उन्हें इस्तीफा देने को कहा गया था। कारण था कि उन्होंने एक ब्रिटिश अखबार में यह बयान दिया था कि अश्वेत लोग बौद्धिक दृष्टि से गोरों से कमतर होते हैं।

यह बात आम तौर पर ज्ञात नहीं है कि वॉटसन के विचार कितने दकियानूसी हैं और वे किस अक्खड़ ढंग से अपने विचारों को व्यक्त करते रहे हैं। वास्तव में वॉटसन शुरू से ही विवादों में रहे हैं। 1962 में उन्हें फ्रांसिस क्रिक और मॉरिस विल्किन्स के साथ संयुक्त रूप से नोबेल मिला था। नोबेल की घोषणा होने से पहले रोज़लिंड फ्रेंकलिन का निधन हो चुका जिनका योगदान इस कार्य में बहुत महत्वपूर्ण रहा था। नोबेल पुरस्कार मरणोपरांत नहीं दिया जाता किंतु वॉटसन ने जिस ढंग से फ्रेंकलिन के योगदान को कम करके बताया था, उसकी काफी आलोचना हुई थी।

वॉटसन यह भी कह चुके हैं कि भूमध्य रेखा के आसपास तेज़ धूप के कारण यौन इच्छाएं बढ़ जाती हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि अफ्रीका के लोगों की बुद्धि वास्तव हमारे जैसी है ही नहीं। वॉटसन के नस्लवादी, लिंगवादी विचारों से विज्ञान जगत परिचित रहा है। इसलिए जब उनकी सालगिरह पर उनका गुणगान किया गया तो सोशल मीडिया उबल पड़ा। परिणाम यह हुआ कि एरिक लैंडर को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी। (स्रोत फीचर्स)

नोट : यह लेख वेबसाइट पर 7 जून 2018 तक ही उपलब्ध रहेगा|