क्या बच्चों को सोशल मीडिया की ‘लत’ लग रही है?

न दिनों अमेरिका की अदालत में एक ऐसा वैज्ञानिक सवाल सामने आया है, जिसका जवाब अभी तक स्पष्ट नहीं है। सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया (social media addiction debate) बच्चों और किशोरों के लिए ‘लत’ बन सकता है, और अगर उससे उन्हें मानसिक नुकसान होता है तो उसकी ज़िम्मेदारी किसकी होगी। कैलिफोर्निया में शुरू हुए इस ऐतिहासिक मुकदमे में एक युवती का कहना है कि बचपन में सोशल मीडिया का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल करने की वजह से उसे लंबे समय तक चिंता, अवसाद और अपने शरीर को लेकर हीन भावना जैसी समस्याएं झेलनी पड़ रही हैं।

इंटरनेट कानून के विशेषज्ञ एरिक गोल्डमैन के अनुसार, जूरी को दो बेहद मुश्किल सवालों पर फैसला करना होगा। पहला, क्या सोशल मीडिया की ‘लत’ एक वास्तविकता है? और दूसरा, क्या टेक-कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म से होने वाले मानसिक नुकसान (tech company liability case) के लिए कानूनी रूप से ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है? उनके मुताबिक, इन सवालों के जवाब आसान नहीं होंगे, क्योंकि इन्हें लेकर वैज्ञानिकों के बीच ज़ोरदार बहस होने वाली है।

यह बात अभी वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। नशे या जुए की ‘लत’ की तरह सोशल मीडिया की ‘लत’ को मानसिक रोगों की मानक पुस्तकों (mental disorder classification) में आधिकारिक रूप से बीमारी नहीं माना गया है। इसी वजह से शोधकर्ता इस विषय पर बहुत सावधानी से बात करते हैं। कुछ वैज्ञानिक सोशल मीडिया के लिए ‘लत’ शब्द इस्तेमाल करने में सहज हैं, लेकिन कई दूसरे वैज्ञानिक इससे असहमत हैं और कहते हैं कि इसके पक्ष में ठोस सबूत अभी पर्याप्त नहीं हैं (scientific debate)।

आम तौर पर लत का मतलब होता है किसी चीज़ को निरंतर करते रहना, उसे छोड़ने पर बेचैनी महसूस होना और साफ नुकसान दिखने के बावजूद उसका इस्तेमाल जारी रखना। कई किशोरों में सोशल मीडिया का इस्तेमाल इसी तरह आदत बन चुका है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह तय करना अभी मुश्किल है कि इसे एक मानसिक रोग कहा जाए या सिर्फ एक संगीन खराब आदत। इसी कारण ज़्यादातर वैज्ञानिक इसे ‘समस्यामूलक सोशल मीडिया उपयोग’ (problematic social media use) कहना ज़्यादा उचित मानते हैं।

एक और बड़ी मुश्किल यह समझना है कि सोशल मीडिया और मानसिक समस्याओं के बीच सम्बंध कार्य-कारण का है या सिर्फ साथ-साथ होने वाली (correlation vs causation) बात का। जिस समय सोशल मीडिया का इस्तेमाल बढ़ा है, उसी दौरान युवाओं में चिंता और अवसाद के मामले भी बढ़े हैं। लेकिन ज़्यादातर शोध यह पक्के तौर पर साबित नहीं कर पाए हैं कि इन मानसिक समस्याओं की सीधी वजह सोशल मीडिया ही है (psychological research findings)। संभव है कि कुछ किशोर पहले से ही मानसिक रूप से संवेदनशील हों और इसी कारण वे सोशल मीडिया का ज़्यादा सहारा लेने लगते हों।

सोशल मीडिया के असर को मापने का तरीका भी बहुत अहम है। कई अध्ययनों में केवल स्क्रीन टाइम देखा जाता है, लेकिन इससे पूरी सच्चाई सामने नहीं आती। बिना सोचे-समझे लगातार स्क्रॉल करना, शारीरिक चीज़ों पर ज़ोर देने वाली सामग्री देखना या ऑनलाइन परेशान किया जाना नुकसानदेह हो सकता है, जबकि दोस्तों से जुड़ना और रचनात्मक काम करना कभी-कभी फायदेमंद भी साबित हो सकता है।

2024 में विज्ञान और चिकित्सा से जुड़ी यूएस की एक राष्ट्रीय समिति (National Academies of Sciences, Engineering, and Medicine) के अनुसार अब तक हुए शोध यह साबित नहीं करते कि सोशल मीडिया से सभी किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को बड़े स्तर पर नुकसान हो रहा है। फिर भी कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ बच्चों और किशोरों पर इसका असर साफ तौर पर दिखाई देता है, खासकर तब जब सोशल मीडिया का इस्तेमाल बहुत ज़्यादा किया जाता है (digital wellbeing concern) ।

अब जब अदालतें इस अधूरी और अनिश्चित वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर ज़िम्मेदारी तय करने की कोशिश कर रही हैं, तो इस मामले का फैसला यह तय कर सकता है कि समाज आगे चलकर किशोरों की डिजिटल ज़िंदगी को कैसे समझे (social media regulation policy) और उस पर कैसे नियम बनाए। फिर भी इस मुद्दे पर विभिन्न वैज्ञानिकों के विचार और वाद-विवाद काफी महत्वपूर्ण होंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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व्यायाम और मस्तिष्क

क्सरसाइज़ (व्यायाम – exercise benefits) का नाम सुनते ही क्या ख्याल आता है? मज़बूत मसल्स, स्वस्थ दिल, स्वस्थ फेफड़े यानी तंदुरुस्त शरीर। और यदि कहा जाए कि शरीर की इस तंदुरुस्ती में मस्तिष्क (brain health) भी शामिल है तो?

जी हां, न्यूरॉन जर्नल (Neuron journal study) में प्रकाशित हालिया अध्ययन यही बात कहता है; व्यायाम से मस्तिष्क की वायरिंग मज़बूत होती है, जिससे कुछ न्यूरॉन्स फटाफट सक्रिय हो जाते हैं। इससे समझ आता है कि लगातार व्यायाम करने से व्यायाम में होने वाली आसानी और बेहतर क्षमता (यानी व्यायाम सहिष्णुता (exercise tolerance)) में मस्तिष्क सक्रिय रूप से शामिल होता है। फिलहाल यह निष्कर्ष चूहों पर हुए अध्ययन के आधार पर है, हो सकता है कि ऐसा मनुष्यों में भी होता हो लेकिन पहले इसे परखना होगा।

फिलेडेल्फिया में पेन्सिलवेनिया युनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट निकोलस बेटली और उनके साथी यह जानना चाहते थे कि जब लोग व्यायाम करते हैं तो मस्तिष्क में क्या होता है। असल में पूर्व अध्ययन में ऐसा पाया गया था कि स्टेरॉयडोजेनिक फैक्टर-1 (SF1) नामक प्रोटीन को कोड करने वाले जीन को ठप करने से चूहों में व्यायाम सहिष्णुता कम हो जाती है। इसलिए शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क के वेंट्रोमीडियल हाइपोथैलेमस (ventromedial hypothalamus) हिस्से के उन न्यूरॉन समूहों की निगरानी करना तय किया जो SF1 नामक प्रोटीन बनाते हैं। गौरतलब है कि वेंट्रोमीडियल हाइपोथैलेमस भूख और रक्त शर्करा को नियंत्रित करने के लिए ज़िम्मेदार होता है, और SF1 प्रोटीन चयापचय क्रिया को नियंत्रित (metabolic regulation) करने में भूमिका निभाता है।

शोधकर्ताओं ने चूहों को ट्रेडमिल पर दौड़ाया और उनमें SF1 न्यूरॉन्स की गतिविधि देखी। ये तो उन्होंने पाया ही कि ये न्यूरॉन्य व्यायाम करने से सक्रिय हो गए थे, लेकिन और भी दिलचस्प बात उन्हें यह पता चली कि SF1 न्यूरॉन्स का एक समूह व्यायाम खत्म होने के बाद ही सक्रिय होता है। कई व्यायाम सत्रों के बाद चूहों में सक्रिय होने वाले न्यूरॉन्स की संख्या और उनकी सक्रियता के परिमाण में भी बढ़ोतरी देखी गई।

जब शोधकर्ताओं ने तीन हफ्तों तक लगातार नियमित व्यायाम करने वाले चूहों की मस्तिष्क गतिविधि की तुलना उन चूहों की मस्तिष्क गतिविधि से की जिन्होंने व्यायाम करने में नागा किया था, तो उन्हें दोनों समूह के चूहों के SF1 न्यूरॉन्स के विद्युतीय गुणों में अंतर मिला। नियमित व्यायाम करने वाले चूहों में न्यूरॉन्स को सक्रिय करना आसान हो गया था। साथ ही न्यूरॉन्स के बीच कनेक्शन्स (सायनेप्स) की संख्या भी दुगनी हो गई थी। अनुमान तो लगाया जा सकता है कि शायद मनुष्यों में भी ऐसा कुछ होता होगा, लेकिन इसे परख कर देखना ज़रूरी है। आखिरकार यह तो देखा ही गया है कि मनुष्यों में भी व्यायाम शुरू करने के बाद कुछ दिन थोड़ा तकलीफदेह गुज़रते हैं, लेकिन दिन-ब-दिन आसानी होने लगती है (brain exercise link)। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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लंबी उम्र विरासत में मिलती है

क ताज़ा अध्ययन कहता है कि किसी व्यक्ति की दीर्घायु (longevity) में जीन्स (genes) की भूमिका हमारी अपेक्षा से अधिक है। साइंस (Science journal) में प्रकाशित शोध के अनुसार इंसान यदि लंबी उम्र पाए, तो उसका लगभग 55 प्रतिशत श्रेय आनुवंशिकी को दिया जा सकता है। यह पिछले अनुमानों (10-25 प्रतिशत) से कहीं ज़्यादा है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि जीन्स के योगदान को लेकर पिछले अनुमान कम थे क्योंकि उन अध्ययनों में बाहरी कारकों (जैसे संक्रामक रोग या दुर्घटनाओं) और अंदरूनी कारकों (जैसे समय के साथ डीएनए क्षति) से होने वाली मौतों को स्पष्ट रूप से अलग-अलग नहीं किया जा सका था।

इस्राइल के वाइज़मैन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के जैव-भौतिकविद बेन शेनहार और उनकी टीम ने सोचा कि इन अध्ययनों के डैटा (research data)  को फिर से देखा जाए। उन्होंने डेनमार्क और स्वीडन में हुए जुड़वां बच्चों के अध्ययनों (twin studies), और यूएस में सौ साल से ज़्यादा जीने वाले सहोदरों के अध्ययन के डैटा पर गौर किया।

गौरतलब है कि जुड़वां बच्चे दो तरह के होते हैं। आइडेंटिकल जुड़वां (identical twins)  तब पैदा होते हैं जब दोनों संतानें एक ही अंडाणु-शुक्राणु से निर्मित भ्रूण के दो भागों में बंटने से बनती हैं। फ्रेटरनल जुड़वां ऐसी दो संतानें होती हैं जो दो अलग-अलग भ्रूण से गर्भाशय में साथ-साथ विकसित होती हैं। आईडेंटिकल ट्विन्स (fraternal twins) के डीएनए शत-प्रतिशत एक समान होते हैं, जबकि फ्रेटरनल ट्विन्स और सहोदरों में लगभग 50 प्रतिशत डीएनए एक समान होता है।

शोधकर्ताओं ने आइडेंटिकल जुड़वां और फ्रेटरनल जुड़वां/ सहोदरों के जीवनकाल (lifespan) की तुलना करके दीर्घायु में आनुवंशिकता (genetic inheritance) या जीन्स की भूमिका को समझा। उपरोक्त अध्ययनों के आंकड़ों के विश्लेषण में पाया गया कि यदि बाहरी कारक मृत्यु का कारण न बनें तो जेनेटिक आधार से सम्बंधित व्यक्तियों के जीवनकाल में समानता होती है। बेहतर होती गई सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधा (public health) के कारण यह बात समय के साथ और भी स्पष्ट होती गई: 1800 के दशक के अंत में और 1900 के दशक की शुरुआत में, जब लोग संक्रमण के कारण कम उम्र में मर जाते थे, तो आयु के सम्बंध में जेनेटिक संकेत (genetic signals) लगभग नदारद थे। लेकिन बीसवीं सदी में दीर्घायु से आनुवंशिकता का सम्बंध अधिक स्पष्ट दिखा।

यह भी पाया गया कि मृत्यु के सभी आंतरिक कारण (internal causes of death) समान रूप से जेनेटिक नहीं होते हैं। डिमेंशिया और कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों (cardiovascular diseases) में वंशानुगत हस्तांतरण ज़्यादा दिखा, लेकिन कैंसर में कम। इससे लगता है कि ऐसा ज़्यादातर रैंडम उत्परिवर्तन या पर्यावरणीय कारणों से होता है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि दीर्घायु में शामिल जीन्स को पहचानना उम्र से सम्बंधित बीमारियों के इलाज (age-related disease treatment) खोजने में मददगार हो सकता है। साथ ही, शोधकर्ता यह भी ध्यान में रखने को कहते हैं कि दीर्घायु होना जीन्स के अलावा काफी हद तक जीवनशैली (lifestyle), खान-पान और परिस्थितियों आदि से तय होता है। हमें दीर्घायु जीन्स मिलें, यह तो हमारे हाथ में नहीं, लेकिन बेहतर जीवन शैली अपनाना कुछ हद तक मनुष्यों के हाथ में है। लंबा जीने से ज़रूरी है स्वस्थ जीना (healthy aging)। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बिन पीए नशा

राब पीए बिना नशे जैसे लक्षण दिखने लगें – लड़खड़ाना, अस्पष्ट बोलना, चक्कर आना, भ्रम, एकाग्रता में कमी, थकान, सिरदर्द, मतली, पेट फूलना, त्वचा का लाल होना, और बदमिज़ाजी –  तो समझ लीजिए वह व्यक्ति एक तकलीफ से पीड़ित है जिसे तकनीकी भाषा में ऑटो-ब्रुअरी सिंड्रोम (एबीएस – Auto Brewery Syndrome) कहते हैं। वैसे तो चिकित्सा साहित्य (medical literature) में ऐसे व्यक्तियों के उल्लेख बहुत कम मिलते हैं लेकिन कई चिकित्सकों का मानना है कि यह सिंड्रोम काफी आम है। तो बगैर एक घूंट भी हलक में उतारे यह नशा होता क्यों है?

इस समस्या पर अनुसंधान उन्नीसवीं सदी में ही शुरू हो गया था और आम मान्यता यह बनी थी कि इसकी वजह व्यक्ति के पेट में खमीर (फफूंद- yeast overgrowth) की अधिकता होती है। जैसा कि सभी जानते हैं हमारी आंतों में फफूंद, बैक्टीरिया के साथ-साथ कई सूक्ष्मजीव निवास करते हैं और प्राय: मददगार होते हैं। यदा-कदा ये हमें बीमार भी करते हैं। तो एबीएस का प्रमुख कारण खमीर (एक किस्म की फफूंद) को माना गया था और यह मत बना था कि जब ये खमीर अत्यधिक मात्रा में आंतों में पलते हैं तो व्यक्ति जो भी शर्करा या अन्य कार्बोहायड्रेट (carbohydrate fermentation) खाता है, उसका किण्वन करके ये अल्कोहल (एथेनॉल) पैदा करते हैं। और अल्कोहल से नशा हो जाता है।

अलबत्ता, हाल ही में नेचर माइक्रोबायोलॉजी जर्नल (Nature Microbiology) में प्रकाशित शोध पत्र ने एबीएस पर नई रोशनी डाली है। एबीएस पीड़ितों के बड़े समूह का अध्ययन करके शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि इस तकलीफ का कारण खमीर नहीं बल्कि आंतों में पलने वाले बैक्टीरिया का असंतुलन (gut bacteria imbalance) है। इससे पहले 2019 में बेजिंग स्थित कैपिटल इंस्टीट्यूट ऑफ पीडियाट्रिक्स (Capital Institute of Pediatrics) के जिंग युआन ने अपने सीमित अनुसंधान के आधार पर यह संभावना व्यक्त की थी। अब इसकी पुष्टि हुई है।

ताज़ा अध्ययन कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (University of California San Diego) (सैन डिएगो) के बर्न्ड स्क्नेबल के नेतृत्व में किया गया है। दरअसल यह गड़बड़ी आम तौर पर मान्य नहीं की जाती, यहां तक कि चिकित्सक भी व्यक्ति पर यकीन नहीं कर पाते कि उसने वास्तव में शराब नहीं पी है। अंतत: कई परीक्षण करके जब इसकी पुष्टि हो जाती है, तो इलाज पूर्व धारणा के आधार पर ही किया जाता है जिसमें फफूंद-रोधी दवाइयां (antifungal drugs) दी जाती हैं। साथ में कुछ एंटीबायोटिक्स देते हैं और व्यक्ति को कम कार्बोहायड्रेट वाली खुराक लेने को कहा जाता है जो अल्कोहल-उत्पादक सूक्ष्मजीवों को बढ़ावा देते हैं। लेकिन ऐसे व्यक्तियों में लक्षण बार-बार प्रकट होते रहते हैं।

2019 में किए गए अध्ययन में एबीएस के उभरने के लिए एक बैक्टीरिया क्लेबसिएला न्यूमोनिए (Klebsiella pneumoniae) को ज़िम्मेदार पाया गया था। अध्ययन में एबीएस की स्थिति में फैटी लीवर रोग (fatty liver disease) को भी सहायक बताया गया था।

युआन की टीम ने गंभीर एबीएस से पीड़ित कुछ व्यक्तियों से प्राप्त क्लेबसिएला का प्रत्यारोपण चूहों में किया था। उन्होंने कुछ अन्य व्यक्तियों को भी पहचाना जिनमें क्लेबसिएला के आधिक्य ने एबीएस लक्षणों में उभार उत्पन्न किया।

2019 के अध्ययन के बाद युआन की टीम को काफी लोगों ने संपर्क करके एबीएस जांच करवाने की इच्छा जताई। इसके बाद उन्होंने एबीएस मरीज़ों का अध्ययन शुरू किया। इसके लिए उन्होंने स्क्नेबल की मदद ली।

स्क्नेबल ने ऐसे 22 मरीज़ों की रिपोर्ट प्रस्तुत की है। इनके साथ उन्होंने परिवार के सदस्यों को शामिल किया था ताकि वे इस संभावना को निरस्त कर सकें कि यह दिक्कत एक जैसे भोजन या पर्यावरणीय कारणों से हो रही है।

अपेक्षा के अनुरूप, एबीएस मरीज़ों की विष्ठा के कल्चर में अल्कोहल (alcohol production in gut) बना जबकि परिवार के अन्य लोगों की विष्ठा के कल्चर में नहीं। स्क्नेबल का कहना है कि स्वस्थ लोगों की आंतों में भी थोड़ा अल्कोहल बनाता है लेकिन शरीर उसे आसानी से पचा डालता है। एबीएस मरीज़ों में ऐसे एंज़ाइम्स की सांद्रता भी अधिक थी जिससे पता चलता है कि लीवर को क्षति हुई है। एक मरीज़ में तो लीवर सिरोसिस (liver cirrhosis) की स्थिति भी पाई गई।

अपने परिजनों की तुलना में एबीएस मरीज़ों में क्लेबसिएला कहीं अधिक मात्रा में था। उनकी आंतों में एशरीशिया कोली (. कोली) नामक बैक्टीरिया भी अधिक संख्या में थे, जो अल्कोहल पैदा करते हैं। हालांकि, अब तक इसे रोग का प्रमुख कारण नहीं माना गया था। यह भी देखा गया कि लक्षणों में उछाल के दौरान मरीज़ों की आंतों में ई. कोली बैक्टीरिया की संख्या अधिक थी और इनकी संख्या लगभग लक्षणों की गंभीरता को झलकाती थी।

शोधकर्ताओं को एबीएस मरीज़ों तथा अन्य लोगों के बीच खमीर या अन्य फफूंद के स्तर में कोई खास अंतर नहीं मिला। स्क्नेबल के मुताबिक इसका कारण यह हो सकता है कि कुछ मरीज़ों को पहले ही फफूंद-रोधी उपचार मिल चुका था।

एक मरीज़ का सफल उपचार विष्ठा के सूक्ष्मजीव प्रत्यारोपण (फीकल माइक्रोबायोटा ट्रांसप्लांट, FMT) द्वारा किया गया। इसके लिए उसे एक स्वस्थ दानदाता की विष्ठा कैप्सूल (FMT capsule) में भरकर खिलाई गई थी। स्क्नेबल अब इस पर आगे काम कर रहे हैं और उनकी कोशिश है कि ज़्यादा लक्षित उपचार (targeted therapy) मिल सके।

अन्य शोधकर्ताओं का मत है कि फिलहाल यह मानना जल्दबाज़ी होगी कि हमें पूरा जवाब मिल गया है। आगे खोजबीन जारी रखने की ज़रूरत है। (स्रोत फीचर्स)

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क्या च्यूइंग गम चबाने से तनाव कम होता है?

ज़ुबैर सिद्दिकी

पिछले सौ साल से भी ज़्यादा समय से च्यूइंग गम (chewing gum) सिर्फ मुखवास के तौर पर नहीं, बल्कि मन को सुकून देने वाली चीज़ के रूप में बेचा जाता रहा है। दावा किया जाता था कि च्यूइंग गम तंत्रिकाओं को शांत करता है और मन को हल्का (stress relief) करता है। आज वही दावे आ रहे हैं – फर्क यह है कि अब लग रहा है कि इसमें थोड़ा हाथ शायद मनोविज्ञान और तंत्रिका विज्ञान (neuroscience) का भी है।

हालांकि, थोड़ी सतर्कता ज़रूरी भी है क्योंकि ऐसे वैज्ञानिक दावे तब आ रहे हैं जब कोविड-19 के बाद च्यूइंग गम की बिक्री तेज़ी से घटी है। कोविड-19 (covid-19 pandemic) महामारी के दौरान अमेरिका में च्यूइंग गम का इस्तेमाल काफी कम हो गया था। लोग कम बाहर निकलते, कम मिलते-जुलते और सांस की ताज़गी की चिंता में कमी भी थी। अब कंपनियां लोगों को लुभाने के लिए च्यूइंग गम को मानसिक सेहत से जोड़कर पेश कर रही हैं।

च्यूइंग गम एक अजीब लत है। इससे कोई पोषण नहीं मिलता और यह जल्द ही बेस्वाद हो जाती है; फिर भी लोग इसे लंबे समय तक चबाते रहते हैं। क्यों?

यह सवाल वैज्ञानिकों को लंबे समय से परेशान करता रहा है। शोध बताते हैं कि च्यूइंग गम चबाने से ध्यान (concentration) थोड़ा बेहतर होता है और कुछ हद तक तनाव कम (stress reduction) होता है, लेकिन इसका कारण अब तक पूरी तरह समझ में नहीं आया है। दिलचस्प बात यह है कि मनुष्य हज़ारों सालों से च्यूइंग गम जैसी चीज़ें चबा रहे हैं।

पुरातात्विक सबूत (archaeological evidence) बताते हैं कि मनुष्य करीब 8000 साल पहले भी चिपचिपी चीज़ें चबाया करते थे। स्कैंडिनेविया में पेड़ों की छाल से बनी प्राचीन गम (ancient chewing gum) मिली है, जिस पर दांतों के निशान मौजूद हैं। कुछ निशान छोटे बच्चों के भी थे। इससे लगता है कि पुराने समय में गोंद चबाना सिर्फ औज़ारों के लिए गोंद नरम करने तक सीमित नहीं था, बल्कि लोगों को इससे आनंद भी मिलता होगा।

अमेरिका में च्यूइंग गम

आधुनिक समय में च्यूइंग गम की शुरुआत अमेरिका में 1800 के दशक में हुई थी। अलबत्ता, च्यूइंग गम को लोकप्रिय बनाने का काम विलियम रिग्ले जूनियर (William Wrigley Jr.) ने किया। पहले साबुन और बेकिंग सोडा के साथ च्यूइंग गम मुफ्त दिए गए। लोकप्रियता बढ़ने पर 1890 के दशक में सिर्फ च्यूइंग गम का कारोबार शुरू कर दिया। 20वीं सदी की शुरुआत तक च्यूइंग गम हर जगह दिखने लगी। हालांकि इससे सभी खुश नहीं थे – सार्वजनिक जगहों पर च्यूइंग गम चबाने की आलोचना हुई और सड़कों पर थूके गए च्यूइंग गम से प्रशासन परेशान रहने लगे।

युद्ध में च्यूइंग गम

पहले विश्व युद्ध (World War I) के दौरान विलियम रिग्ले ने अमेरिकी सेना को सुझाव दिया कि च्यूइंग गम सैनिकों के लिए फायदेमंद हो सकता है। उनका कहना था कि इससे भूख कुछ हद तक दबाई जा सकती है, दांत साफ रहते हैं और तनाव कम होता है। सेना ने यह बात मान ली।

इसके बाद च्यूइंग गम सैनिकों के राशन (military ration) का हिस्सा बन गई। अमेरिकी सैनिकों के साथ च्यूइंग गम युरोप, एशिया और बाकी दुनिया में फैली। इसी दौरान अखबारों में यह बातें छपने लगीं कि च्यूइंग गम चबाने से चिंता कम होती है, नींद अच्छी आती है और उदासी दूर होती है। इन्हीं दावों से वैज्ञानिकों की इसमें रुचि बढ़नी शुरू हुई।

शुरुआती अध्ययन

1940 के दशक में अमेरिका के बार्नार्ड कॉलेज (Barnard College) में च्यूइंग गम पर किए गए शोध में पाया गया कि च्यूइंग गम चबाने वाले लोग थोड़ा कम तनाव महसूस करते थे और उनका काम करने का तरीका कुछ बेहतर लगता था। तब वैज्ञानिक यह नहीं समझ पाए कि ऐसा क्यों हो रहा है।

कई साल बाद कार्डिफ युनिवर्सिटी (Cardiff University) के मनोवैज्ञानिक एंड्र्यू स्मिथ (Andrew Smith) ने करीब 15 साल तक च्यूइंग गम चबाने के असर का अध्ययन किया। उनके कुछ शोध च्यूइंग गम बनाने वाली कंपनी के सहयोग से हुए थे, इसलिए नतीजों पर सवाल भी उठे। स्मिथ ने पाया कि च्यूइंग गम चबाने से याददाश्त में कोई खास सुधार नहीं होता – लोग कहानियां या शब्द दूसरों से बेहतर याद नहीं रख पाते। अलबत्ता, कुछ और असर ज़रूर देखने को मिले। कई शोधों में यह बात सामने आई कि च्यूइंग गम के दो असर साफ हैं। पहला, इससे सतर्कता और एकाग्रता थोड़ी देर तक बेहतर बनी रहती है। दूसरा, कुछ स्थितियों में तनाव कम महसूस होता है।

अध्ययनों के अनुसार च्यूइंग गम चबाने से सतर्कता (alertness) लगभग 10 प्रतिशत तक बढ़ सकती है, खासकर तब जब काम बहुत लंबा, उबाऊ या मशीनी हो। जैव-मनोवैज्ञानिक (biopsychology) क्रिस्टल हैस्केल-रैम्से के शोध में भी यही नतीजे मिले। उन्होंने पाया कि च्यूइंग गम चबाने से ध्यान लगाने में तब ज़्यादा मदद मिलती है, जब व्यक्ति पहले से थका हुआ या मानसिक रूप से बोझिल हो (mental benefit)। लेकिन अगर कोई पहले ही पूरी तरह सतर्क है, तो गम से ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता। तनाव कम होने के मामले में, इसके असर के प्रमाण अपेक्षाकृत ज़्यादा मज़बूत पाए गए।

प्रयोगशाला (laboratory studies) में किए गए अध्ययनों में पाया गया कि जब लोग सार्वजनिक भाषण देने या गणित के कठिन सवाल हल करने जैसे तनाव वाले काम के दौरान च्यूइंग गम चबाते हैं, तो उनकी घबराहट कुछ कम हो जाती है। अस्पतालों में हुए अध्ययनों में दिखा कि कुछ सर्जरी से पहले च्यूइंग गम चबाने वाली महिलाओं की चिंता कम थी।

हालांकि च्यूइंग गम कोई जादू नहीं है। बहुत ज़्यादा तनाव की स्थिति में – जैसे ऑपरेशन से ठीक पहले या बेहद कठिन हालात में – यह मददगार साबित नहीं होता। कुल मिलाकर, च्यूइंग गम मानसिक रूप से थोड़ा फायदा ज़रूर देता है। लेकिन इसके पीछे के कारण अब भी पूरी तरह समझ में नहीं आए हैं। अलबत्ता, कुछ संभावनाएं बताई गई हैं।

एक विचार यह है कि चबाने से चेहरे की मांसपेशियां सक्रिय होती हैं, जिससे मस्तिष्क तक खून का प्रवाह बढ़ जाता है। दूसरी धारणा यह है कि मांसपेशियों की हल्की गतिविधि एकाग्रता में मदद करती है, जिससे दिमाग अधिक सक्रिय रहता है।

तीसरा विचार है कि चबाना शरीर की तनाव-नियंत्रण प्रणाली को प्रभावित कर सकता है, जो कॉर्टिसोल नामक हार्मोन को नियंत्रित करती है। यह हार्मोन सतर्कता और तनाव दोनों से जुड़ा होता है। अध्ययनों में इसके नतीजे मिले-जुले रहे हैं – कभी कॉर्टिसोल (cortisol hormone) बढ़ा, जो ध्यान बढ़ने के संकेत है, तो कभी यह घटा, जो तनाव कम होने का संकेत है।

चबाना क्या नैसर्गिक आदत है?

कुछ वैज्ञानिकों ने यह सवाल उठाया है कि क्या चबाने की आदत (chewing behavior)  बहुत पुराने समय से हमारे भीतर मौजूद है। कई जानवर तनाव में कुछ न कुछ चबाते हैं – जैसे कुत्ते खिलौने कुतरते हैं और शाकाहारी जानवर लगातार जुगाली करते रहते हैं। इसलिए माना गया कि शायद चबाना एक स्वाभाविक तरीके से मन को शांत करने वाली क्रिया हो।

लेकिन वैज्ञानिक एडम वैन कैस्टरेन (Adam van Casteren) इससे अलग बात कहते हैं। उनके अनुसार इंसान अपने करीबी प्राइमेट (primates) रिश्तेदारों की तुलना में बहुत कम चबाता है। चिंपैंज़ी दिन में 4–5 घंटे और गोरिल्ला करीब 6 घंटे तक चबाते रहते हैं, जबकि इंसान औसतन सिर्फ 35 मिनट ही भोजन चबाता है। खाना पकाने और औज़ारों के विकास से इंसानों को ज़्यादा चबाने की ज़रूरत नहीं रही, और बची हुई ऊर्जा मस्तिष्क के विकास में लगी।

इसलिए च्यूइंग गम को किसी पुरानी जीवन-रक्षा आदत का हिस्सा नहीं माना जाता। वैन कैस्टरेन का मानना है कि इसकी वजह कहीं ज़्यादा सरल है – इंसानों को बार-बार होने वाली हल्की और दोहराई जाने वाली गतिविधियां पसंद आती हैं।

सोचते वक्त लोग अक्सर पैर हिलाते हैं, पेन क्लिक करते हैं, स्ट्रेस बॉल दबाते हैं या कागज़ पर कुछ बनाते रहते हैं। शोध बताते हैं कि ऐसी छोटी-छोटी दोहराई जाने वाली हरकतें लंबे काम के दौरान ध्यान बनाए रखने में मदद करती हैं।

कैलिफोर्निया युनिवर्सिटी (University of California) के शोध में पाया गया कि जब एकाग्रता के अभाव और अति सक्रियता (ADHD) से पीड़ित बच्चों को काम करते समय खुलकर हिलने-डुलने दिया गया तो उनका प्रदर्शन बेहतर रहा। च्यूइंग गम भी कुछ ऐसा ही काम करता है और दिमाग बेहतर तरीके से ध्यान लगा पाता है।

आज की तेज़ रफ्तार, स्क्रीन और तनाव से भरी दुनिया में च्यूइंग गम से मिलने वाली ज़रा-सी राहत शायद इसकी सबसे बड़ी ताकत है। वैज्ञानिक जब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि शरीर की हलचल मस्तिष्क (brain function) को कैसे प्रभावित करती है, तब च्यूइंग गम हमें याद दिलाता है कि मस्तिष्क अकेले काम नहीं करता। कई बार जबड़ा हिलाने जैसी क्रिया भी हमारे सोचने और महसूस करने के तरीके को बदल सकती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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सर्पदंश: इक्कीसवीं सदी का समाधान

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

जैसे-जैसे भारत ने तरक्की की, ‘संपेरों का देश’ वाली छवि धुंधली पड़ती गई है। आज हमारे पास सांपों को बचाने वाले लोग हैं। अलबत्ता, ग्रामीण इलाकों में हर साल सर्पदंश (snake bite cases) के कारण 58,000 लोग जान से हाथ धो बैठते हैं। ये मुख्यत: धान के खेतों में काम करने वाले मज़दूरों और सीमान्त व छोटे किसानों को प्रभावित करते हैं (India snakebite deaths)।

सांप के ज़हर (snake venom effects) आम तौर पर तीन तरह से नुकसान पहुंचाते हैं: रक्त विकार, मांसपेशीय लकवा और ऊतकों की मृत्यु। वाइपर के काटने पर सामान्यत: रक्त सम्बंधी दिक्कतें पैदा होती हैं जबकि कोबरा, करेत जैसे इलेपिड सांपों के ज़हर तंत्रिका सम्बंधी लकवे के कारण बनते हैं (neurotoxic venom)।

भारत के ‘चार बड़े’ सांपों (नाग, सामान्य करेत, रसल्स वाइपर और सॉ-स्केल्ड वाइपर) (Big Four snakes India) के विष के खिलाफ एक मानक एंटीवीनम (प्रति-विष) (anti-venom treatment) डिज़ाइन किया गया है। इस एंटीवीनम को बनाने के लिए इन सांपों के ज़हर की आवश्यकता होती है। भारत में सांपों के विष की आपूर्ति मुख्य रूप से धान के खेतों से और तमिलनाड़ु में झाड़-झंखाड़ वाली भूमि से आदिवासियों द्वारा पकड़े गए सांपों से होती है। ये आदिवासी इरुला स्नेक कैचर्स इंडस्ट्रियल कोऑपरेटिव सोसायटी (Irula snake catchers Tamil Nadu) के साथ जुड़े हैं।

इन चार प्रजातियों के विष के एक मिश्रण की गैर-जानलेवा खुराक घोड़ों में इंजेक्ट की जाती है। इसके बाद कई बार इंजेक्शन देकर इन प्राणियों की प्रतिरक्षा को काफी सक्रिय किया जाता है। घोड़ों को इसलिए चुना गया है कि ये बड़े प्राणी हैं और इन्हें संभालना आसान है। उनका प्रतिरक्षा तंत्र सक्रिय होकर इन विषों के खिलाफ बड़ी मात्रा में एंटीबॉडीज़ (antibody production) बनाता है। जब काफी एंटीबॉडीज़ बन जाती हैं, तब इन घोड़ों से खून लिया जाता है। एंटीबॉडी युक्त प्लाज़्मा को प्रोसेस करके उसमें से टॉक्सिन से जुड़ने वाले एंटीबॉडी खंड पृथक कर लिए जाते हैं, जिनका परीक्षण किया जाता है और फ्रीज़ड्राइ कर वायल्स में भरकर रखा जाता है (horse serum antivenom)।

यह विधि 1950 के दशक से चली आ रही है लेकिन इसकी कई सीमाएं हैं। भारत में 60 से ज़्यादा विषैले सांप (venomous snakes India) पाए जाते हैं। विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के सांपों में, यहां तक कि एक ही प्रजाति के सांपों में विषैले पदार्थों (टॉक्सिन्स) का संघटन अलग-अलग (regional venom variation) होता है। इस लिहाज़ से ‘चार बड़े’ सांपों के लिए बनाया एंटीवीनम पर्याप्त नहीं है। इसके चलते ऐसे उपचार विकसित करने पर ध्यान दिया गया, जो किसी क्षेत्र के लिए कारगर हों या सार्वभौमिक रूप से कारगर हों।

नेचर में प्रकाशित (Nature journal research) ताज़ा निष्कर्ष हमें सर्पदंश के विरुद्ध एक व्यापक परास वाले उपचार की ओर ले जाते हैं। अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्ताओं के साथ मिलकर डेनमार्क की एक प्रयोगशाला ने उप-सहारा अफ्रीका के सांपों (sub-Saharan snakes) पर शोध किया। इस इलाके में सर्पदंश के चलते साल में 10,000 अंग-विच्छेदन करना पड़ते हैं। शोधकर्ताओं ने इस इलाके की 18 प्रमुख सांप प्रजातियों (जिनमें कोबरा और मम्बा शामिल थे) (cobra, mamba venom) से विष एकत्रित किया और मिश्रण का इंजेक्शन अल्पाका और लामा को लगाया। दोनों ही ऊंट कुल के प्राणी हैं। ऊंट कुल का चयन इसलिए किया गया क्योंकि इनमें असाधारण एंटीबॉडी बनती हैं जो छोटी व स्थिर होती हैं। इन्हें नैनोबॉडी (nanobodies technology) कहते हैं। टॉक्सिन का इंजेक्शन देने पर ज़ोरदार प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया उभरती है और कारगर एंटीवीनम मिलता है। इस स्थिति में रक्त से बी-कोशिकाएं एकत्रित कर ली जाती है जो एंटीबॉडी उत्पन्न करती हैं। इसके बाद नैनोबॉडीज़ को कोड करने वाले डीएनए को जेनेटिक इंजीनियरिग की मदद से बैक्टीरिया-भक्षी वायरसों के जीनोम में जोड़ दिया जाता है। ये वायरस अपनी सतह पर नैनोबॉडीज़ प्रदर्शित करने लगते हैं। इनमें से उन नैनोबॉडीज़ के चुना जाता है जो सशक्त रूप से सांप के ज़हर के तत्वों से जुड़ें। इसका मतलब हुआ कि अब घोड़ों की बजाय बैक्टीरिया में एंटीवीनम का उत्पादन (recombinant antivenom) किया जा सकेगा। चूहों पर किए गए प्रयोगों में 18 में से 17 सांपों के विष के विरुद्ध एंटीवीनम क्रिया देखी गई।

भारतीय सांपों पर लौटते हैं। बीकानेर स्थित नेशनल रिसर्च सेंटर ऑन कैमल (National Research Centre on Camel) के शोधकर्ताओं ने दर्शाया है कि ऊंटों में तैयार किया गया एंटीवीनम इस इलाके में पाए जाने वाले सॉ-स्केल्ड वायपर के खिलाफ कारगर है (Saw-scaled viper treatment)। इस अनुसंधान को अन्य सर्प प्रजातियों तक विस्तार देना काफी मददगार होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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प्रतिरक्षा प्रणाली को कमज़ोर कर रहे टैटू

क हालिया वैज्ञानिक अध्ययन में पता चला है कि टैटू (tattoo) सिर्फ त्वचा पर डिज़ाइन बनाने तक सीमित नहीं रहते बल्कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (immune system) पर भी असर डाल सकते हैं। स्विट्ज़रलैंड के शोधकर्ताओं ने टैटू में इस्तेमाल होने वाले तीन आम रंगों (काला, लाल और हरा) की जांच के बाद टैटू सम्बंधी दीर्घकालिक सुरक्षा (long-term safety) को लेकर कई सवाल उठाए हैं।

अध्ययन में पाया गया कि टैटू की स्याही (tattoo ink) त्वचा में बनी रहने की बजाय शरीर के अंदर फैल जाती है। जब स्याही त्वचा की निचली परत (डर्मिस- dermis) में डाली जाती है, तो उसके बेहद छोटे-छोटे कण शरीर में भटकते-भटकते लसिका ग्रंथियों (lymph nodes) में जमा हो जाते हैं, ये ग्रंथियां प्रतिरक्षा प्रणाली की महत्वपूर्ण अंग होती हैं। ये कण कई सालों तक वहीं बने रह सकते हैं।

प्रतिरक्षा कोशिकाएं (जैसे मैक्रोफेज) इन कणों को तोड़ने की कोशिश में सफल नहीं होतीं और मरने लगती हैं। इस वजह से शरीर में हमेशा हल्की सूजन (chronic inflammation) बनी रहती है। यह निरंतर तनाव प्रतिरक्षा प्रणाली को कमज़ोर कर सकता है; खास तौर पर काली और लाल स्याही में यह प्रभाव अधिक देखा गया।

चूहों पर किए गए प्रयोगों (animal studies) में पाया गया कि टैटू की स्याही के सूक्ष्म कण (nanoparticles) कुछ ही घंटों में लसिका ग्रंथियों तक पहुंच जाते हैं और कम से कम दो महीने तक टिके रहते हैं। इस दौरान चूहों में कोविड-19 टीके (COVID-19 vaccine) के प्रति प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया कमज़ोर हो गई, जबकि हैरानी की बात यह थी कि पराबैंगनी विकिरण से निष्क्रिय फ्लू टीके (influenza vaccine) के प्रति उनकी प्रतिक्रिया बेहतर हो गई। वैज्ञानिकों का कहना है कि मनुष्यों पर शोध ज़रूरी है, क्योंकि अलग-अलग टीके, टैटू स्याही के साथ अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया कर सकते हैं।

बहरहाल आज टैटू पहले से कहीं ज़्यादा लोकप्रिय (tattoo popularity) हो चुके हैं। लेकिन एक चिंता यह है कि टैटू की स्याही में लगभग 100 तरह के रसायन होते हैं, जिनमें कई औद्योगिक पिगमेंट (industrial pigments) भी शामिल होते हैं। यही वजह है कि अब कई देशों में निगरानी कड़ी की जा रही है। युरोप ने 2022 में रेस्ट्रिक्शन ऑफ हैज़ार्डस सब्सटेंसेस इन टैटू इंक्स एंड पर्मानेंट मेक-अप (REACH) नियम के तहत टैटू स्याही के लिए कड़े रासायनिक मानक (chemical safety standards) लागू कर दिए।

टैटू जितने ज़्यादा लोकप्रिय हो रहे हैं, वैज्ञानिकों का कहना है कि स्वास्थ्य पर उनके प्रभाव को समझना और भी ज़रूरी हो गया है। अन्यत्र भी मानक (regulatory guidelines) लागू करने की ज़रूरत है। (स्रोत फीचर्स)

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टीकों में एल्युमिनियम को लेकर छिड़ी बहस

डॉ. सुशील जोशी

हाल में इस बात को लेकर विवाद पैदा हो गया है कि टीकों में एल्युमिनियम (aluminum in vaccines) के उपयोग से शारीरिक नुकसान होता है और इसकी वजह से ऑटिज़्म (autism) जैसी तकलीफों में वृद्धि हो रही है। यह विवाद अमेरिका में चल रहा है। लेकिन उस विवाद में जाने से पहले यह देखना लाभप्रद होगा कि टीके काम कैसे करते हैं और उनमें एल्युमिनियम के उपयोग का आधार क्या है।

सरल शब्दों में कहें तो टीके (vaccination) किसी रोगजनक (pathogen) की नकल करते पदार्थ होते हैं जो रोग पैदा नहीं करते। तकनीकी शब्दों में इन टीकों पर उस रोगजनक का कोई अणु होता है जिसे एंटीजन कहते हैं। जब यह एंटीजन शरीर में पहुंचता है तो शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र (immune system) की कोशिकाएं इस पर हमला करती हैं और हमला करते हुए वे सीख जाती हैं कि यह कोई हानिकारक चीज़ है और इसे कैसे निष्क्रिय करना है। यही स्थिति तब भी होती है जब वास्तविक रोगजनक शरीर में पहुंचता है। प्रतिरक्षा तंत्र उससे निपटने की कोशिश करता है और कई बार निपट भी लेता है। टीके इसी संघर्ष के लिए प्रतिरक्षा तंत्र को तैयार करते हैं। हाल में टीकों पर जो शोध कार्य हुआ है उसे छोड़ दिया जाए तो टीके दो प्रकार के होते हैं – एक प्रकार वह है जिसमें वास्तविक रोगजनक को जीवित अवस्था में दुर्बल करके (सैबिन द्वारा विकसित पोलियो (oral polio vaccine) का जीवित दुर्बल टीका) या मारकर (सैबिन का मृत पोलियो वायरस टीका) इस्तेमाल किया जाता है और दूसरा प्रकार वह है जिसमें रोगजनक के एंटीजन को पृथक करके इस्तेमाल किया जाता है (जैसे डिफ्थीरिया-टिटेनस-पर्टूसिस (DPT vaccine) या हिपेटाइटिस (hepatitis vaccine) ए व बी के टीके)।

इसके बाद मामला आता है एल्युमिनियम (aluminum adjuvant) का। दरअसल, एल्युमिनियम टीके के साथ एक सह-औषध (एडजुवेंट- adjuvant) के तौर पर मिलाया जाता है। अलबत्ता, यही एकमात्र एडजुवेंट नहीं है। पिछले लगभग 40 सालों में वैज्ञानिकों ने शोध करके कई एडजुवेंट (vaccine adjuvants) पहचाने हैं और इस्तेमाल किए हैं। वैसे तो कई लोगों में टीकों को लेकर ही शंकाएं हैं और वे मानते हैं कि टीके हानिकारक होते हैं। खैर, फिलहाल बात करते हैं एडजुवेंट्स की चूंकि वर्तमान विवाद का मुद्दा यही है।

टीकों का उपयोग तो काफी पहले शुरू हो चुका था। इसका श्रेय एडवर्ड जेनर (Edward Jenner) को दिया जाता है जिन्होंने 1796 में पहली बार एक लड़के को चेचक का टीका (smallpox vaccine) लगाया था। 1926 में एक प्रतिरक्षा वैज्ञानिक एलेंक्जेंडर थॉमस ग्लेनी (Alexander Glenny) ने एक महत्वपूर्ण अवलोकन किया था जिसने एडजुवेंट की बुनियाद रखी थी। उन्होंने देखा कि यदि टीकाकरण से पहले घुलनशील एंटीजन को फिटकरी (एल्यूमिनियम पोटेशियम सल्फेट) के साथ रखा जाए तो वह एंटीजन फिटकरी के साथ अवक्षेपित हो जाता है और इस प्रकार उपचारित एंटीजन कहीं बेहतर प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है। यह प्रक्रिया लगभग वैसी ही है जैसी मटमैले पानी को साफ करने के लिए फिटकरी का उपयोग। उन्होंने ये प्रयोग गिनी पिग पर किए थे और देखा था कि अवक्षेपित एंटीजन से उनमें एंटीबॉडी का उत्पादन अधिक होता है। इसी बाहर से मिलाए गए पदार्थ को एडजुवेंट कहते हैं।

इस खोज के बाद सबसे पहले एल्यूमिनियम लवण (aluminum salts) एडजुवेंट का उपयोग टिटेनस (tetanus vaccine) तथा डिफ्थीरिया टॉक्साइड के टीकों (diphtheria vaccine) में किया गया था। आजकल तो दुनिया भर में अघुलनशील एल्युमिनियम लवणों का उपयोग विभिन्न टीकों में किया जाता है।

वैसे 1940 के दशक में जूल्स फ्रायंड (Jules Freund) ने एडजुवेंट की एक और किस्म विकसित की थी। ये पानी और तेल के इमल्शन थे जो एंटीजन के साथ दिए जाने पर एंटीजन की उम्र बढ़ा देते हैं और वह काफी समय तक प्रतिरक्षा प्रणाली को सक्रिय रखता है। अलबत्ता, फ्रायंड के एडजुवेंट का उपयोग सीमित ही रहा है।

यहां एक सवाल यह उठता है कि ये एडजुवेंट करते क्या हैं। रोचक बात है कि एडजुवेंट्स (immune adjuvants) का उपयोग करते हमें एक सदी बीत चुकी है लेकिन आज भी इनकी क्रियाविधि (mechanism of action) को लेकर बहुत स्पष्टता नहीं है। काफी अनुसंधान के बाद यह समझ में आया है कि एडजुवेंट दो-तीन तरह से काम करते हैं और टीके की प्रभावशीलता या उनकी क्रियाशील अवधि को बढ़ाते हैं। एक तरीका तो यह है कि एडजुवेंट शरीर में एंटीजन के प्रसार में मदद करते हैं और इस तरह से प्रतिरक्षा तंत्र की ज़्यादा कोशिकाएं उसके संपर्क में आती हैं। इसके अलावा इमल्शन में घुले हुए एंटीजन अपेक्षाकृत धीरे-धीरे विघटित होते हैं। इसके चलते प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया देर तक बनी रहती है और दीर्घावधि प्रतिरक्षा (long-term immunity) प्राप्त होती है।

दूसरा तरीका यह है कि (खास तौर से एल्युमिनियम लवण जैसे एडजुवेंट (aluminum-based adjuvants)) एंटीजन से जुड़ जाते हैं और उसे प्रतिरक्षा कोशिकाओं में प्रवेश करने में मदद करते हैं। ये प्रतिरक्षा कोशिकाएं जन्मजात प्रतिरक्षा का हिस्सा होती हैं। जब एंटीजन इनमें प्रवेश करता है तो कोशिका उसे प्रोसेस करती है और परिणाम यह होता है कि वह कोशिका की सतह पर दिखने लगता है। अब ये कोशिकाएं अनुकूली प्रतिरक्षा (adaptive immunity) कोशिकाओं (जैसे टी कोशिकाओं) के संपर्क में आती हैं और टी कोशिकाएं उस एंटीजन को पहचानकर आगे की कार्रवाई शुरू कर देती हैं। कहने का मतलब है कि जन्मजात प्रतिरक्षा तंत्र अनुकूली प्रतिरक्षा तंत्र को सक्रिय करता है और एडजुवेंट इसमें मदद करते हैं।

अर्थात कुल मिलाकर एडजुवेंट अनुकूली प्रतिरक्षा कोशिकाओं को सक्रिय करने में और एंटीजन को देर तक शरीर में टिके रहने में मदद करते हैं।

अब आते हैं एल्युमिनियम (aluminum exposure) पर। सबसे पहले तो यह जान लेना ज़रूरी है कि टीकों में एडजुवेंट के तौर पर एल्युमिनियम लवणों का उपयोग एक सदी से होता आया है। लिहाज़ा इनके उपयोग का परीक्षण और जांच भी सबसे अधिक हुई है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि एल्यूमिनियम से हमारा संपर्क कई तरह से होता है – खानपान (dietary aluminum) के साथ और हवा के ज़रिए। मानव शरीर में एल्युमिनियम का अवशोषण पाचन तंत्र और श्वसन तंत्र में होता है। फिर इसे बाहर निकालने का काम होता है। बहरहाल, एक इंसान द्वारा सांस के साथ लिए गए एल्युमिनियम में से 3 प्रतिशत और खानपान के रूप में लिए गए एल्युमिनियम में से 1 प्रतिशत पूरे शरीर में फैल जाता है। वैसे शरीर में जमा कुल एल्युमिनियम में से 95 प्रतिशत तो खानपान के साथ आता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization – WHO) ने कुल अंतर्ग्रहित एल्युमिनियम की मात्रा तय की है – 1 मिलीग्राम/प्रति किलोग्राम प्रतिदिन (safe intake limit)। यानी यदि आपका वज़न 60 किलो है तो अधिकतम 60 मि.ग्रा. एल्युमिनियम ले सकते हैं। इसके अलावा इंजेक्शन से दिया जाने वाला एल्युमिनियम तो खून के ज़रिए पूरे शरीर में फैल सकता है। इसलिए निर्धारित किया गया है कि ऐसे किसी भी घोल में एल्युमिनियम प्रति लीटर 25 ग्राम से कम होना चाहिए (vaccine safety)।

एक बार अवशोषित होने के बाद एल्युमिनियम हड्डियों, लीवर, फेफड़ों तथा तंत्रिका तंत्र (nervous system) में जमा हो जाता है। सामान्यत: यह धीरे-धीरे उत्सर्जित किया जाता है लेकिन गुर्दों की समस्याओं से ग्रस्त लोगों में उत्सर्जन बहुत प्रभावी नहीं होता। ऐसे लोगों में काफी सारा एल्युमिनियम मस्तिष्क में जमा हो सकता है। इसे लेकर कई प्रयोग हुए हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि वयस्कों में स्थायी रूप से जमा हुए एल्युमिनियम की मात्रा 30-50 मिलीग्राम ही पाई गई है।

टीके की प्रति खुराक में एल्युमिनियम की अधिकतम मात्रा भी निर्धारित की गई है। जैसे युरोप में यह मात्रा प्रति खुराक 1.25 मि.ग्रा. और यूएस में 0.85 मि.ग्रा. प्रति खुराक है। भारत में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित मानकों का उपयोग होता है। गौरतलब है कि हम खानपान के ज़रिए प्रतिदिन इससे कहीं अधिक मात्रा में एल्युमिनियम का सेवन करते हैं। एक बड़ा अंतर यह भी है कि टीकों में एल्युमिनियम अघुलनशील लवणों के रूप में होता है जबकि खानपान में प्राय: घुलनशील लवण पाए जाते हैं। लिहाज़ा, टीकों के एल्युमिनियम का शरीर में अवशोषण अपेक्षाकृत कम होता है।

जंतुओं पर किए गए कुछ प्रयोगों में पता चला है कि 0.85 ग्राम एल्युमिनियम देने पर सीरम में एल्युमिनियम की मात्रा 2 माइक्रोग्राम प्रति लीटर रही जो सामान्य स्तर से महज 7 प्रतिशत थी। इस प्रयोग में यह भी देखा गया था कि मस्तिष्क में एल्युमिनियम की मात्रा (brain aluminum levels) कितनी रही। देखा गया कि मस्तिष्क में एल्युमिनियम 0.0001 माइक्रोग्राम प्रति ग्राम बढ़ा जो मस्तिष्क में एल्युमिनियम के सामान्य औसत (0.2 माइक्रोग्राम प्रति ग्राम) से 2000 गुना कम है। यह संभव है कि गुर्दों की दिक्कत से पीड़ित लोगों में यह स्तर ज़्यादा होता होगा। वैसे तंत्रिका-क्षति तथा उससे जुड़े रोगों के एल्युमिनियम से सम्बंध को लेकर कोई ठोस प्रमाण भी नहीं हैं।

कुछ समय से टीकों को लेकर एक और शंका जताई जा रही है। कहा गया है कि टीके प्रतिरक्षा तंत्र को स्वयं अपनी शरीर की कोशिकाओं के विरुद्ध सक्रिय कर सकते हैं। हालांकि यह भी सामने आया है कि ऐसी प्रतिक्रिया कतिपय अन्य कारकों (जैसे किसी संक्रामक इकाई) की उपस्थिति की वजह से होती है और उस कारक को हटाने पर वह प्रतिक्रिया भी समाप्त हो जाती है।

निष्कर्ष के तौर पर, एल्युमिनियम एडजुवेंट को लेकर जो सवाल उठ रहे हैं, उनका कोई वैज्ञानिक या ऐतिहासिक आधार नहीं है। दरअसल, टीकों ने और टीकों में जोड़े गए एडजुवेंट्स ने हमें कई रोगों से बचाया है। एडजुवेंट जोड़ने से एंटीजन की कम मात्रा इंजेक्ट करना होती है और वे दीर्घावधि सुरक्षा प्रदान करते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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दृष्टि बहाली के लिए एक मॉडल जीव घोंघा

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

काश ऐसा कोई स्विच होता जो ऑन होकर हमें आंखों की रोशनी (vision restoration) जैसी असाधारण क्षमताएं वापिस दे सकता? मनुष्यों और कई अन्य प्रजातियों की आंखें कैमरे की तरह होती हैं; आंख में एक लेंस होता है जो प्रकाश को रेटिना पर फोकस करता है। पुनर्जनन (regeneration) आंखों की उस क्षमता को कहेंगे जिसमें वह पूरी तरह से हटाए जाने या घायल हो जाने के बाद फिर से अपना निर्माण कर सके। नेचर कम्युनिकेशंस (Nature Communications) में एलिस एकोर्सी और एलेज़ांद्रो सांचेज़ अल्वारेडो की टीम ने अपने हालिया काम में दिखाया है कि गोल्डन एप्पल घोंघे में आंख का ऐसा पुनर्निर्माण कैसे होता है।

घोंघा एक मोलस्क (mollusk) जीव है, यानी अकेशरुकी (invertebrate) जीव जिसके ऊपर खोल होती है और वह भूमि और पानी दोनों में अच्छी तरह से जीवित रह सकता है।

घोंघे में पुनर्जनन का यह कारनामा कोई जादू नहीं है, बल्कि सुंदर आणविक संयोजन (molecular mechanisms) का नतीजा है। जब घोंघा अपनी एक आंख खो देता है तो हज़ारों जीन स्विच (खटकों) की तरह ऑन हो जाते हैं: पहले वे स्विच ऑन होते हैं जो घाव भरने में मदद करते हैं, फिर वे जीन सक्रिय होते हैं जो कोशिकाओं के विकास और विभाजन के लिए ज़िम्मेदार होते हैं, उसके बाद नई रेटिना कोशिकाओं, प्रकाशग्रहियों और लेंस के निर्माण के लिए ज़िम्मेदार अलग-अलग जीन/नेटवर्क सक्रिय होते हैं। इनमें से एक जीन, PAX6 (eye development gene), आंख के प्रारंभिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। घोंघे में, यह प्रक्रिया कई अन्य जीन्स द्वारा सावधानीपूर्वक प्रबंधित की जाती है। इसमें नई तंत्रिका कोशिकाओं को बनाने वाले जीन, तंत्रिका तंतुओं को उनके सही लक्ष्यों तक पहुंचाने वाले और प्रकाश को ताड़ने के लिए ज़िम्मेदार जीन शामिल हैं। आंख एकदम ठीक तरीके से विकसित हो, इसे सुनिश्चित करने के लिए इनमें से प्रत्येक जीन एकदम ठीक चरण पर सक्रिय हो जाता है।

फिलहाल, हम मनुष्य ऐसा नहीं कर सकते हैं, लेकिन इन जेनेटिक ट्रिगर्स (genetic triggers) को समझकर एक दिन हम अपनी सुप्त पुनर्निर्माण प्रणाली (regenerative system) को सक्रिय कर पाएंगे।

जिस तरह घोंघे अपनी आंखें फिर से विकसित सकते हैं, उसी तरह मेंढक, प्लेनेरिया (planaria) और अफ्रीकी कांटेदार चूहे (African spiny mouse) जैसे अन्य जीवों में भी मज़बूत पुनर्जनन क्षमताएं होती हैं। एक तरह के सैलेमेंडर (एक्सोलोट्ल- (axolotl)) में क्षतिग्रस्त ऊतक हरफनमौला स्टेम कोशिका (stem cells) जैसे बन सकते हैं और हड्डियों, मांसपेशियों और शरीर के अन्य अंगों का पुनर्निर्माण कर सकते हैं। क्रिस्पर (CRISPR gene editing)  एक जीन-संपादन तकनीक है, जिसकी मदद से हम अपनी वांछित जीनोम संरचना को फिर से डिज़ाइन कर सकते हैं, रीमॉडल कर सकते हैं और पुनर्निर्मित कर सकते हैं।

हैदराबाद के एल. वी. प्रसाद आई इंस्टीट्यूट (LV Prasad Eye Institute) में, वैज्ञानिकों ने ज़ेब्राफिश (zebrafish model) को जंतु मॉडल के तौर पर इस्तेमाल करके लेबर कॉन्जेनाइटल एमॉरोसिस (LCA) (Leber Congenital Amaurosis – LCA) और स्टारगार्ड्ट (Stargardt disease) जैसी आंखों की जेनेटिक बीमारियों को ठीक करने के लिए क्रिस्पर तकनीक का इस्तेमाल किया है।

जंतुओं से मनुष्यों तक

शुरुआती परीक्षणों में पहले से ही क्रिस्पर संपादन का इस्तेमाल करके मनुष्यों की जेनेटिक बीमारियों (genetic disorders) को दूर करने के प्रयास किए जा रहे हैं, जैसे सिकल सेल एनीमिया (sickle cell anemia); β-थैलेसीमिया (beta thalassemia), जन्मजात खून की कमी; और LCA (genetic blindness), जो एक तरह का जन्मजात अंधापन है।

हाल ही में, हार्वर्ड युनिवर्सिटी (Harvard University) की एक टीम द्वारा क्रिस्पर तकनीक का इस्तेमाल करके मनुष्यों में LCA के इलाज के लिए किए जा रहे पहले क्लीनिकल परीक्षण (clinical trials) के नतीजे सामने आए हैं। ये नतीजे दी न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित हुए हैं जिसमें जन्मांधता से पीड़ित लोगों की दृष्टि में सुधार दिखाई दिया है। यह प्रयास, जंतु मॉडल में पुनर्जनन को समझकर मानव कोशिकाओं में मरम्मत प्रोग्राम को फिर से सक्रिय कर सकने की उम्मीद जगाता है। यह जीन-निर्देशित पुनर्जनन चिकित्सा (gene-guided regenerative medicine) के लिए एक फ्रेमवर्क देता है।

ये उदाहरण हमें याद दिलाते हैं कि पुनर्जनन (biological regeneration) कोई दुर्लभ चमत्कार नहीं है। बल्कि यह एक प्राचीन जैविक कार्यप्रणाली (biological process) है जो अभी भी कई प्रजातियों के DNA (genetic code) में अंकित है, और जिसे विज्ञान धीरे-धीरे समझना और फिर से सक्रिय करना सीख रहा है।

गोल्डन एप्पल घोंघे (golden apple snail study) पर किए गए नए अध्ययन ने खुलासा किया है कि कैसे उसका जीनोम (genome memory) उस अंग को पुनर्निर्मित करना याद रखता है जिसे दोबारा बनाना हमें असाध्य लगता है। और, घोंघे की इस याददाश्त (biological memory) को डीकोड करके चिकित्सा विज्ञान मनुष्य की आंखों को बहाल करने की क्षमता के करीब पहुंच सकता है। (स्रोत फीचर्स)

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उम्र के साथ मस्तिष्क में परिवर्तन

इंसानी मस्तिष्क उम्र के साथ लगातार बदलता (human brain aging) है। बचपन से बुढ़ापे तक हमारी सीखने, याद रखने, सोचने और अनुकूलन की क्षमता कई बार बदलती है। एक बड़े अध्ययन से पता चला है कि मस्तिष्क की आंतरिक ‘वायरिंग’ (brain connectivity) के विकास के चार प्रमुख पड़ाव होते हैं, जो लगभग 9, 32, 66 और 83 साल की उम्र के आसपास दिखाई देते हैं। शायद इसी वजह से बचपन में सीखना आसान लगता है, युवाओं की सोच तेज़ होती है, और उम्र बढ़ने के साथ याददाश्त और मानसिक क्षमता घटने लगती है।

इस शोध में यूके और अमेरिका के करीब 3800 लोगों (सभी गोरे और किसी तंत्रिका क्षति से रहित) के एमआरआई स्कैन का विश्लेषण (MRI brain study) किया गया – इनमें नवजात शिशु से लेकर 90 वर्ष तक के लोग शामिल थे। पहले के अध्ययनों में माना जाता था कि शरीर में उम्र बढ़ने के बड़े बदलाव 40, 60 और 80 की उम्र पर दिखते हैं, लेकिन मस्तिष्क की जटिलता के चलते इन परिवर्तनों को समझना मुश्किल है। मस्तिष्क में मूलत: दो भाग होते हैं – व्हाइट मैटर और ग्रे मैटर (white matter, grey matter)। व्हाइट मैटर मुख्य रूप से तंत्रिकाओं से बना होता है जिनसे लंबे-लंबे तंतु निकलते हैं। इन तंतुओं को एक्सॉन कहते हैं। ग्रे मैटर के अलग-अलग हिस्से व्हाइट मैटर के इन्हीं एक्सॉन के ज़रिए जुड़े होते हैं। एक्सॉन ऐसे तंतु हैं जो सूचना को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुंचाते हैं। ये तंतु जितने लंबे, घने या मज़बूत होते हैं, उतना ही मस्तिष्क के हिस्से एक-दूसरे से बेहतर संवाद कर पाते हैं।

चरण 1: जन्म से 9 वर्ष – कई सारे नए कनेक्शन, लेकिन कम क्षमता

बचपन में मस्तिष्क के व्हाइट मैटर के एक्सॉन लंबे और उलझे हुए होते हैं, जिससे सूचना का प्रवाह धीमा और कम प्रभावी हो जाता है। लगता है कि मस्तिष्क धीरे-धीरे उन तंत्रिकाओं की छंटनी कर देता है जो उपयोगी नहीं हैं जबकि कुछ तंत्रिकाओं को प्राथमिकता देता है जो भाषा, गति, तर्क, और नई क्षमताएं सीखने (child brain development) में मददगार होती हैं।

चरण 2: 9 से 32 वर्ष तेज़ी, छंटाई, और सोचने की चरम क्षमता

लगभग 9 साल की उम्र के बाद स्थिति बदलने लगती है। किशोरावस्था और हार्मोनल बदलावों के प्रभाव से मस्तिष्क अपने नेटवर्क को व्यवस्थित करता है। गैर-ज़रूरी कनेक्शन हटने लगते हैं, और ज़रूरी कनेक्शन छोटे व तेज़ बन जाते हैं। इसी समय योजना बनाने, फैसले लेने, याद रखने और भावनाओं को संभालने जैसी क्षमताएं मज़बूत होती हैं। इस अवधि में संज्ञान क्षमता अपने चरम (cognitive peak performance) पर होती है।

चरण 3: 32 से 66 वर्ष – क्षमताओं में धीरे-धीरे गिरावट

30 से लेकर 60 की उम्र में बदलाव जारी तो रहता है, लेकिन बहुत धीमी गति से। कुल मिलाकर, अलग-अलग हिस्सों के बीच जानकारी पहुंचाने की क्षमता थोड़ी कम होने लगती है – यानी दिमाग के दूरस्थ हिस्सों के बीच संदेश पहुंचने में थोड़ा ज़्यादा समय लगता है। वैज्ञानिक अभी ठीक-ठीक नहीं जानते कि ऐसा क्यों होता है, लेकिन इसका कारण उम्र बढ़ना, लगातार तनाव, या जीवन की जिम्मेदारियां जैसे बच्चे, नौकरी का दबाव या कम नींद हो सकते हैं (brain aging slowdown)।

चरण 4: 66 से 83 वर्ष – पास के कनेक्शन मज़बूत, दूर के कनेक्शन कमज़ोर

66 वर्ष के बाद दिमाग में एक नया पैटर्न दिखाई देता है। किसी एक हिस्से के भीतर के कनेक्शन तो ठीक रहते हैं, लेकिन दूर-दराज़ के हिस्सों के बीच के कनेक्शन कमज़ोर होने लगते हैं। यही समय स्मृतिभ्रंश (डिमेंशिया- dementia risk) के बढ़ते जोखिम से भी जुड़ा होता है। इससे संकेत मिलता है कि लंबी दूरी के कनेक्शनों की कमज़ोरी बुज़ुर्गों में शुरुआती मानसिक गिरावट में भूमिका निभा सकती है।

चरण 5: 83 से 90 वर्ष – मस्तिष्क का कुछ केंद्रों पर निर्भर होना

इस अंतिम चरण में मस्तिष्क की वायरिंग और कमज़ोर हो जाती है। पहले जहां कई हिस्से सीधे-सीधे जुड़कर जानकारी भेजते थे, वहीं अब मस्तिष्क जानकारी को कुछ चुनिंदा और महत्वपूर्ण केंद्रों के ज़रिए भेजता है। यह इस बात को दिखाता है कि उम्र बढ़ने पर दिमाग के पास संसाधन कम हो जाते हैं और वह बची हुई क्षमता के साथ काम चलाने की कोशिश करता है (brain decline in old age)।

इन मुख्य पड़ावों को समझना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि इससे पता चलता है कि मानसिक स्वास्थ्य की कई समस्याएं 25 साल से पहले क्यों उभरती हैं, और 65 के बाद डिमेंशिया का खतरा क्यों तेज़ी से बढ़ता है। साथ ही, यह जानकारी वैज्ञानिकों को ऐसी स्थितियों – जैसे शिज़ोफ्रेनिया, ऑटिज़्म या अल्ज़ाइमर (Alzheimer’s disease) – में असामान्य दिमागी पैटर्न जल्दी पकड़ने में मदद कर सकती है। अलबत्ता, शोधकर्ता मानते हैं कि इन निष्कर्षों को दुनिया भर पर लागू करने से पहले अलग-अलग,  विविध आबादियों के अध्ययन की ज़रूरत है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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