इस वर्ष के इगनोबेल हकदार

प्रतिका गुप्ता

नोबेल पुरस्कार (nobel prize) से तो सभी वाकिफ हैं। यह विज्ञान के क्षेत्र में संजीदगी से किए गए अहम शोधकार्य के लिए दिया जाता है, जिसमें सम्मान और प्रतिष्ठा के साथ-साथ वैज्ञानिकों को गोल्ड मेडल और लगभग 10 लाख डॉलर की राशि भी मिलती है। यह भी सर्वमान्य है कि डीएनए की संरचना का खुलासा करना शोध का एक महत्वपूर्ण विषय है। लेकिन क्या आपको लगता है कि नाक छिनकना भी शोध का विषय हो सकता है?

नोबेल पुरस्कार के विपरीत, इगनोबेल पुरस्कार उतनी ही संजीदगी से किए गए ऐसे शोधकार्यों के लिए दिए जाते हैं जो पहले पल में तो लोगों को गुदगुदाते हैं लेकिन दूसरे ही पल लोगों को विचार करने पर मजबूर करते हैं। वास्तव में, इगनोबेल (Ig Nobel) पुरस्कार ‘ignoble’ शब्द पर तंज है जिसका मतलब होता है अप्रतिष्ठित। लेकिन, इगनोबेल पुरस्कार पाने वाले को भी काफी प्रतिष्ठा मिलती है, भले ही नकद राशि न मिलती हो। ये पुरस्कार इस बात को रेखांकित करते हैं कि महज भारी-भरकम और संजीदा लगने वाले विषय ही अहम नहीं होते और सिर्फ उन्हीं पर संजीदगी से शोधकार्य नहीं किए जाते, बल्कि हमारे मन में उठने वाले छोटे-छोटे सवाल भी उतने ही अहम होते हैं और उनके जवाब उतनी ही संजीदगी (scholarly diligence) से खोजना होते हैं।

इस वर्ष भी एनल्स ऑफ इंप्रॉबेबल जर्नल ने 10 क्षेत्रों में इन शोधकार्यों को इगनोबेल के सम्मान से नवाज़ा है। खुद देखिए कि बात कहां से निकलकर कहां तक पहुंच सकती है।

1. बायोमैकेनिक्स: चुंबन की वैज्ञानिक परिभाषा

इस वर्ष बायोमैकेनिक्स का इगनोबेल पुरस्कार मैटिल्डा ब्रिंडल, कैथरीन टैलबोट और स्टुअर्ट वेस्ट को चुंबन की एक सटीक वैज्ञानिक परिभाषा (kissing definition) देने के लिए मिला है। इस परिभाषा के अनुसार “चुंबन एक ऐसी गैर-आक्रामक क्रिया है जिसमें एक ही प्रजाति के जीवों के बीच मुंह-से-मुंह (या होंठ-से-होंठ) का सीधा संपर्क हो, होंठो/मुंह में कुछ हलचल हो और यह संपर्क या हलचल भोजन के खाने-खिलाने के लिए न हो।” न सिर्फ मनुष्यों बल्कि कई प्रजातियों में इस तरह का व्यवहार देखा गया है जिसमें दो जीवों के बीच मुंह से मुंह का संपर्क होता है; चुंबन को सटीक रूप से परिभाषित करने से इसे विभिन्न प्रजातियों के बीच बेहतर समझा जा सकेगा और इसके उद्भव और कारणों के बारे में सोचा जा सकेगा। शोधकर्ताओं की उक्त परिभाषा के अनुसार अब तक ज्ञात जीवों में ध्रुवीय भालू, कुछ पक्षी, चींटियां और कुछ अन्य प्राइमेट भी चुंबन करते हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी पता लगाने की कोशिश की कि यह व्यवहार कब विकसित हुआ। उन्होंने पाया है कि यह व्यवहार लगभग 2.5 करोड़ साल पहले वानरों (एप्स) के पूर्वजों से आया है। अब समझना बाकी है कि इस व्यवहार की भूमिका क्या है।

2. अर्थशास्त्र: अमीरी और अनैतिक व्यवहार 

अर्थशास्त्र का इगनोबेल पुरस्कार पॉल पिफ और उनके साथियों को उस शोध के लिए मिला है जिसमें उन्होंने सामाजिक-आर्थिक स्थिति और अनैतिक व्यवहार के बीच सम्बंध की पड़ताल की है। उन्होंने पाया कि गरीबों की तुलना में अमीर लोग (wealthy people) अधिक अनैतिक व्यवहार करते हैं। ये निष्कर्ष उनके द्वारा किए गए सात अध्ययनों के आधार पर दिए गए हैं। पहले दो अध्ययनों में उन्होंने इन दोनों वर्गों के लोगों का व्यवहार चौराहे पर वाहन चलाते समय देखा; उन्होंने पाया कि अमीर लोग चौराहे पर अपनी बारी आने के पहले ही दूसरे वाहनों से आगे निकलने की कोशिश करते हैं। तीसरे अध्ययन में प्रतिभागियों को कुछ परिस्थितियां देकर उन पर उनकी प्रतिक्रिया पूछी गई – अमीर लोगों ने अधिक अनैतिक निर्णय लिए। चौथे अध्ययन में सिर्फ और सिर्फ बच्चों के लिए रखी कैंडी को अमीरों की भूमिका निभा रहे प्रतिभागियों ने अधिक लिया। पांचवे अध्ययन में बातचीत के दौरान अपनी बात मनवाने के लिए झूठ बोलने की प्रवृत्ति अमीरों में अधिक दिखी। छठवे अध्ययन में खेल जीतने के लिए चीटिंग करने का व्यवहार अमीरों में अधिक दिखा। और सातवें अध्ययन में कार्यस्थल पर अमीर अधिक अनैतिक व्यवहार (unethical behaviour) करते पाए गए।

3. रसायन विज्ञान: प्रोटीन से भरपूर कॉकरोच का दूध

रसायन विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस शोध के लिए मिला जिसमें वैज्ञानिकों ने बताया कि Diploptera punctata नामक कॉकरोच का दूध (cockroch milk) गाय के दूध से भी तीन गुना अधिक पौष्टिक है। यह कॉकरोच आम घरों में मिलने वाले कॉकरोच से अलग है और अंडे देने की बजाय बच्चों को जन्म देता है। दरअसल, मादा कॉकरोच अपने शरीर में विकसित हो रहे भ्रूणों को एक विशेष पोषक तरल से भोजन देती है। भ्रूण जब इस तरल को ग्रहण करते हैं तो उनकी आंत में यह प्रोटीन, वसा और शर्करा से भरपूर छोटे-छोटे क्रिस्टलों के रूप में जमा हो जाता है। ये क्रिस्टल धीरे-धीरे घुलकर बढ़ते भ्रूण को पोषण देते हैं।

2016 में भारतीय और फ्रांसीसी वैज्ञानिकों ने एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी की मदद से इन क्रिस्टलों की संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि यह तरल अत्यधिक पौष्टिक है: यह गाय के दूध की तुलना में तीन गुना से अधिक पोषण और ऊर्जा दे सकता है। घबराइए नहीं, वैज्ञानिक सीधे इस दूध उपयोग मनुष्य के इस्तेमाल के लिए नहीं सोच रहे हैं, बल्कि इसके घटकों के आधार पर पोषक पेय (nutritious drink) तैयार करने का विचार है।

4. चिकित्सा: नाक कैसे छिनकें

चिकित्सा का इगनोबल पुरस्कार जापानी चिकित्सक टोकुजी उन्नो के 1977 के उस अध्ययन के लिए मिला है जिसमें उन्होंने बताया था कि नाक कैसे साफ करें। रोज़ाना नाक की सफाई श्वासनली और फेफड़ों के संक्रमण के जोखिम को कम करती है, और जब सर्दी-ज़ुकाम होता है तो नाक तो छिनकनी पड़ती है। उन्नो यही जानना चाह रहे थे कि किस तरह नाक की सफाई (nostril hygiene) स्वस्थ रहने में मदद कर सकती है। इसके लिए उन्होंने देखा कि कितनी तेज़ी और ताकत से हवा बाहर करने पर, एक बार में एक नथुने से छिनकने पर, या दोनों नथुनों से छिनकने पर नाक की सफाई में क्या अंतर पड़ता है। उन्होंने यह सब 14 से 48 वर्ष की आयु के 15 लोगों पर करके देखा। नाक से निकलने वाली हवा की गति मापने के लिए दो न्यूमोटैकोमीटर (pnuemotachometer) लगाए गए और नाक से निकली हवा की मात्रा तथा समय भी दर्ज किया गया। साथ ही कान की बाहरी नलिका में दबाव परिवर्तन को एक कैथेटर और संवेदनशील प्रेशर ट्रांसड्यूसर से मापा गया। उन्होंने पाया कि दोनों नथुने खुले रखते हुए नाक साफ करने की बजाय एक बार में एक नथुने को खुला रखकर नाफ साफ करने से ज़्यादा अच्छे से सफाई होती है।

5. जीव विज्ञान: सांप कब काट सकता है

यह तो कहा ही जाता है कि सांप तभी काटता है जब आपका पैर उस पर पड़ जाए। जीव विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस अध्ययन के लिए दिया गया जिसमें शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि विषैले सांप पर पांव कहां पड़ने पर उसके द्वारा काटने की संभावना अधिक होती है। उन्होंने ब्राज़ील के विषैले सांप पिट वाइपर (pit viper snake) के व्यवहार का अध्ययन किया और उसकी लंबाई, लिंग, उम्र, तापमान, दिन का समय तथा मनुष्य द्वारा दी गई उत्तेजनाओं जैसे कारकों को देखा। प्रयोगों में सांपों के साथ नियंत्रित मानव-संपर्क की परिस्थितियां बनाई गईं और यह देखा गया कि कहां पांव पड़ने पर सांप रक्षा के लिए काटता (defensive snakebite) है। पाया गया कि सिर पर पांव पड़ने पर काटने की संभावना लगभग 44 प्रतिशत थी, शरीर के बीच के हिस्से पर 20 प्रतिशत और पूंछ पर 11 प्रतिशत थी। छोटे सांपों, विशेषकर नवजातों में काटने की प्रवृत्ति भी अधिक पाई गई। हालांकि पशु-नैतिकता सरोकारों के चलते इस अध्ययन को साइंटिफिक रिपोर्ट्स ने फरवरी 2025 में वापस ले लिया।

6. भौतिकी: छींटे-मुक्त युरिनल 

भौतिकी का इगनोबेल पुरस्कार ऐसे युरिनल डिज़ाइन (splash-free urinal design) करने के लिए दिया है जिससे आसपास फैलने वाले छींटे और गंदगी न के बराबर फैलें। शोधकर्ताओं ने ऐसा अनुभव किया था कि कितनी भी सावधानी से युरिनल में पेशाब की जाए, आसपास के फर्श पर छींटे फैल ही जाते हैं और सार्वजनिक शौचालयों की सफाई का मुद्दा बना रहता है। यदि सफाईकर्मी हर व्यक्ति के जाने के बाद सफाई करते रहें तो यह उनके लिए भी थकाऊ होता है, और सफाई बरकरार रखने में संसाधन, पैसा और ऊर्जा भी लगती ही है। इसी के समाधान में उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि छींटे छिटककर बाहर आते ही क्यों हैं और इस आधार पर नए युरिनल डिज़ाइन पेश किए; इन डिज़ाइन का नाम उन्होंने नॉटी-लू (Nauti-Loo), कॉर्नुकोपिया (Cornucopeea) और यूरिन-नो (Urine-no) नाम दिए हैं। इसके लिए उन्होंने किसी तरल के सतह से टकराने के कोण और छींटों के उचकने के बीच के सम्बंध का गणितीय मॉडल बनाया और पाया कि किसी सतह पर किसी तरल की जितनी सीधी धार (90 डिग्री के कोण से) पड़ेगी छींटे उतने ज़्यादा छिटकते हैं, सतह पर धार यदि कम कोण (30 डिग्री से कम) से टकराए तो छींटे कम उछलते हैं। इसके आधार पर उन्होंने तिरछी सतहों वाले तीन युरिनल डिज़ाइन तैयार किए और उनका परीक्षण किया। नई डिज़ाइनों से प्रचलित युरिनल की तुलना महज़ 1.4 प्रतिशत छींटे बाहर आए।

7. तकनीक: मच्छर की सूंडी से 3-डी प्रिंटिंग

तकनीक का इगनोबेल पुरस्कार वैज्ञानिकों की उस कोशिश को मिला जिसमें मरी हुई मादा मच्छर की सूंड को 3-डी प्रिंटर की बेहद सूक्ष्म नोज़ल के रूप में इस्तेमाल किया गया। मच्छर की सूंड बहुत पतली होने के साथ काफी मज़बूत भी होती है। कई कीटों के सूंड (मुखांगों) की संरचना और यांत्रिक गुणों की तुलना करने पर मादा मच्छर की सूंड सबसे उपयुक्त लगी। उन्होंने प्रयोगशाला में पाले गए मृत मच्छरों से सूंड अलग करके डिस्पेंसिंग नोज़ल से जोड़ा और डायरेक्ट-इंक-राइटिंग 3-डी प्रिंटर (direct-ink-writing 3-D printer) में लगाया और अलग-अलग गति संयोजन से प्रिंट करके देखा। उन्होंने पाया कि इस नोज़ल व्यवस्था से लगभग 20 माइक्रोमीटर पतली लकीरें प्रिंट की जा सकती हैं, जो आम व्यावसायिक नोज़लों की तुलना में काफी पतली लकीरें हैं।

8. घ्राण विज्ञान: संतान की गंध 

घ्राण विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस अध्ययन को मिला है जिसमें शोधकर्ताओं ने यह जांचा कि माता-पिता अपनी संतानों के शरीर की गंध को अलग-अलग उम्र में किस तरह महसूस करते हैं। पोलैंड में किए गए अध्ययन में 235 माता-पिता ने कुल 367 संतानों के शरीर की गंध की सुखदता (pleasing body odor) का आकलन किया। संतानों की उम्र एक महीने से 35 वर्ष तक थी। प्रतिभागियों ने अपनी संतानों की गंध को 0 से 20 के पैमाने पर बेहद बुरी से बहुत अच्छी तक अंक दिए। शोधकर्ताओं ने संतानों की उम्र, माता-पिता और संतान का लिंग, साथ बिताया समय तथा माता-पिता और-संतान के बीच सम्बंध जैसे कारकों को भी विश्लेषण में शामिल किया। पाया गया कि संतान की उम्र बढ़ने के साथ उसके शरीर की गंध को सुखद मानने की प्रवृत्ति घटती गई। शिशुओं की गंध को 93.7 प्रतिशत माता-पिता ने सुखद या बहुत सुखद बताया, जबकि किशोरावस्था से बड़ी संतानों के लिए यह आंकड़ा 75.2 प्रतिशत था। शोधकर्ताओं का कहना है कि माता-पिता और बच्चों के बीच सम्बंधों में गंध की भूमिका हो सकती है।

9. शांति: दुश्मन का दुश्मन दोस्त क्यों

शांति का इगनोबेल पुरस्कार उस शोध को मिला जिसमें वैज्ञानिकों ने दोस्ती और दुश्मनी के बीच एक दिलचस्प सामाजिक मनोविज्ञान का अध्ययन किया है। शोधकर्ताओं ने छह अध्ययनों में कुल 1183 प्रतिभागियों से पूछा कि वे अपने आदर्श दोस्त (ideal friend) में क्या गुण चाहते हैं। प्रतिभागी अमेरिका और भारत के छात्र तथा सामान्य समुदाय के थे। उनसे यह भी पूछा गया कि उनका दोस्त उनके साथ, किसी अजनबी के साथ या उनके दुश्मन के साथ कैसा व्यवहार करे तो उन्हें ठीक लगेगा। सामान्य स्थिति में लोगों ने दयालु और भरोसेमंद दोस्त को अधिक पसंद किया। लेकिन जब सवाल किसी दुश्मन के प्रति व्यवहार का था, तो तस्वीर बदल गई। कुछ प्रतिभागियों ने ऐसे दोस्त को पसंद किया जो उनके दुश्मन के प्रति थोड़ा रूखा और सख्त रवैया रखते हों। शोधकर्ताओं ने इसे “embedded dyad” यानी दोस्ती को व्यापक सामाजिक नेटवर्क के भीतर देखने के दृष्टिकोण से समझाया। कोई दोस्त केवल हमारे साथ ही ताल्लुक नहीं रखता बल्कि वह हमारे प्रतिद्वंद्वियों से भी मिलता-जुलता है, जिसका अप्रत्यक्ष असर हम पर पड़ सकता है।

10. मृदा विज्ञान: जांघियों से मिट्टी की सेहत 

मृदा विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार मिट्टी में दबाए गए सूती जांघियों और टी-बैग्स के ज़रिए मिट्टी की जैविक सक्रियता और गुणवत्ता (soil biological activity & quality) का अध्ययन करने के लिए मिला है। विचार सरल था: मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव जितने सक्रिय होंगे, सूती कपड़े जैसे जैविक पदार्थ की अपघटन गति उतनी ही तेज़ होगी। शोधकर्ताओं ने शौकिया वैज्ञानिकों से आग्रह किया कि वे मानकीकृत सूती जांघिए और टी-बैग्स वगैरह अपने आसपास की विभिन्न तरह की मिट्टियों (जैसे बाग-बगीचे, मैदान, खेत आदि) में गाड़ दें और लगभग दो महीने बाद उन्हें निकालें, ताकि यह देखा जा सके कि कपड़ा कितना सड़-गल गया और कितना बाकी है। दुनिया भर के  लगभग 1000 शौकिया वैज्ञानिकों ने 2000 से अधिक जांघिए और हज़ारों टी-बैग्स दफनाए। पाया गया कि निजी बगीचों, जहां पेड़-पौधों की प्रजातियों में विविधता थी, में कपड़ा सबसे अधिक तेज़ी से अपघटित हुआ, जबकि लॉन (जिस पर सिर्फ एक तरह के पौघे – हरी घास या दूब – उगी थी) में अपघटन (decomposition) धीमी गति से हुआ। मिट्टी की गुणवत्ता के लिहाज़ से यह अहम है।

चलते–चलते

विगत 3 सितंबर को स्विट्जरलैंड के ज़्यूरिख में इस वर्ष के इगनोबेल पुरस्कार दिए गए। अपने 36 वर्ष के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब एनल्स ऑफ इंप्रोबेबल ने यह समारोह बोस्टन के बाहर आयोजित किया गया। इसका कारण पिछले दो वर्ष का अनुभव रहा: विगत दो सालों में अमेरिका में सख्त किए गए वीज़ा नियमों और विभिन्न देशों के बीच चल रहे युद्ध एवं संघर्ष के चलते कई विजेता चाहकर भी समारोह में शामिल नहीं हो पा रहे थे। और, इगनोबेल पुरस्कार के संस्थापक मार्क अब्राहम्स (mark abrahams) के लिए यह चिंता का विषय था कि यह समारोह जो हल्के-फुल्के और मज़ेदार अंदाज़ में सम्पन्न होता है उस पर संघर्ष और नीतियां हावी हो रही हैं, विजेता शामिल नहीं हो पा रहे हैं और मेहमानों के लिए देश का दौरा करना असुरक्षित हो गया है।

इस वर्ष विजेता तो शामिल हो ही पाए, साथ ही समारोह में नोबेल पुरस्कार विजेता एशर डफलो, अभिजीत बनर्जी, मिशेल मेयर एवं टिम हंट भी शामिल रहे जिन्होंने इगनोबेल पुरस्कार विजेताओं को मशरूम-आकार की ट्रॉफी दी। आमंत्रित अतिथियों ने 24/7 की तर्ज पर व्याख्यान भी दिए: तयशुदा विषय पर पहले तो 24 सेकंड में और फिर 7 शब्दों में विषय समझाया गया। समारोह की शुरुआत ‘लैबोरेटरी ऑफ स्मॉल डिसास्टर’ की थीम पर डांस परफॉर्मेंस हुई, फंजाई थीम पर ओपेरा संगीत (fungi themed opera)सम्पन्न हुआ, और समारोह का समापन दर्शकों ने कागज़ के हवाई-जहाज़ उड़ाकर किया। हर इवेंट की शुरुआत फोर-पीस ऑर्केस्ट्रा द्वारा की गई, और विजेताओं की वेशभूषा उनके शोध विषय से सम्बंधित थी।

अगले वर्ष ये पुरस्कार बेल्जियम के एंटवर्प (antwerp) में 5 सितंबर को दिए जाएंगे। आप यदि दर्शकों में शामिल होना चाहें तो मई में टिकट बुकिंग उनकी वेबसाइट पर प्रारंभ होगी। और, आप चाहें तो किसी मज़ेदार लेकिन संजीदा शोध को अगले वर्ष के लिए नामित (nominate) भी कर सकते हैं, क्या पता आपका नामित शोध पुरस्कार पा जाए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कॉकरोच भी बन गया साईबोर्ग!

डॉ. इरफान ह्यूमन

आजकल सोशल मीडिया और कुछ आंदोलनों में कॉकरोच (तिलचट्टा) का प्रतीकात्मक उपयोग चर्चा में रहा है। कॉकरोच (cockroch) व्यवस्था-विरोधी या प्रतिरोध का रूपक इसलिए कि यह अत्यंत जीवट प्राणी होता है और कठिनतम परिस्थितियों में भी जीवित रह सकता है।

इसके इतर, वैज्ञानिक कॉकरोच पर कुछ विशेष प्रयोगों को अंजाम दे रहे हैं। बीते दिनों वैज्ञानिकों ने एक ऐसा डाइविंग सूट (diving suite) विकसित किया है, जिसे कॉकरोच को पहनाया जा सकता है। यह सूट कॉकरोच को पानी के भीतर भी जीवित रहने और चलने-फिरने में सक्षम बनाता है। इस तरह से कॉकरोच इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली से चलने वाला जीव (साइबोर्ग) (cyborg) बन गया है।

साइबोर्ग और कॉकरोच

साइबोर्ग शब्द साइबरमेटिक ऑर्गेनिज़्म (cybermatic organism) का संक्षिप्त रूप है। यह ऐसे जीव को कहा जाता है जिसमें जैविक (बायोलॉजिकल) और इलेक्ट्रॉनिक घटक एक साथ कार्य करते हैं। दूसरे शब्दों में, जब किसी जीवित प्राणी के शरीर में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, सेंसर, कृत्रिम अंग या कंप्यूटर-नियंत्रित प्रणालियां जोड़ी जाती हैं, तो वह साइबोर्ग कहलाता है। उदाहरण के लिए कृत्रिम (बायोनिक) हाथ या पैर वाले व्यक्ति, पेसमेकर लगे हृदय रोगी, श्रवण यंत्र का उपयोग करने वाले व्यक्ति, सेंसर और नियंत्रक लगे साइबोर्ग कॉकरोच।

डाइविंग सूट की आवश्यकता

दरअसल वैज्ञानिकों का विचार साइबोर्ग कॉकरोच (cyborg cockroch) का उपयोग खोज एवं बचाव कार्यों में करने का है। वैज्ञानिक कई वर्षों से कॉकरोचों पर छोटे सेंसर, कैमरे और इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रक लगाकर उन्हें संकरे स्थानों में भेजने के प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन एक बड़ी समस्या यह थी कि ये कॉकरोच केवल सूखी भूमि पर ही काम कर सकते थे। बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों, जलमग्न सुरंगों, सीवर लाइनों या पानी से भरे मलबों में उनका उपयोग सीमित था। कॉकरोच पानी में अधिक समय तक नहीं रह सकते क्योंकि वे मछलियों की तरह गलफड़ों से श्वसन नहीं करते। उनके शरीर के दोनों ओर छोटे-छोटे छिद्र (स्पाइरैकल्स) होते हैं जिनके माध्यम से हवा शरीर में पहुंचती है। जब कॉकरोच पानी में डूबता है तो स्पाइरैकल्स (spiracles) पानी से ढंक जाते हैं और हवा का प्रवाह रुक जाता है। कुछ समय बाद उनका श्वसन तंत्र काम करना बंद कर सकता है। कॉकरोच को जलमग्न क्षेत्रों में सक्षम बनाने के लिए ही डाइविंग सूट का विचार उभरा है।

डाइविंग सूट में तीन प्रमुख भाग होते हैं। पहला, जलरोधी सुरक्षा कवच जो पानी को कॉकरोच के शरीर में प्रवेश करने से रोकता है। इससे स्पाइरैकल्स सीधे पानी के संपर्क में नहीं आते और शरीर सुरक्षित रहता है। दूसरा, कृत्रिम ऑक्सीजन आपूर्ति। डाइविंग सूट में एक सूक्ष्म ऑक्सीजन उत्पादन प्रणाली (mini oxygen generating sysytem) लगाई जाती है जो रासायनिक अभिक्रिया के माध्यम से ऑक्सीजन बनाती है और उसे कॉकरोच के श्वसन तंत्र तक पहुंचाती है। तीसरा, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की सुरक्षा। कैमरे, सेंसर और नियंत्रक सामान्यत: पानी से खराब हो सकते हैं। डाइविंग सूट इन्हें जलरोधी बनाकर सुरक्षित रखता है। इससे वैज्ञानिक वीडियो रिकॉर्ड कर सकते हैं, तापमान माप सकते हैं, गैस रिसाव का पता लगा सकते हैं और वातावरण की जानकारी एकत्र कर सकते हैं।

डाइविंग सूट का सबसे बड़ा लाभ यह है कि कॉकरोच ज़मीन और पानी में दोनों में कार्य करता रह सकता है। इसे उभयचर कार्यक्षमता (apmhibian function) कहते हैं।

विशेष डाइविंग सूट पहने साइबोर्ग कॉकरोच के परीक्षण के परिणाम अत्यंत उत्साहजनक रहे। साइबोर्ग कॉकरोच लगभग 3 घंटे तक पानी के भीतर सक्रिय बना रहा। और केवल जीवित ही नहीं रहा, बल्कि पानी में चल सकता था, दिशा बदल सकता था, बाधाओं को पार कर सकता था तथा आगे बढ़ सकता था।

जब कॉकरोच को पानी से बाहर निकाला गया, तब भी वह सामान्य रूप से चलने में सक्षम था। उसकी गति भूमि पर लगभग उतनी ही रही जितनी सूट-रहित कॉकरोच की होती है। यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अतिरिक्त उपकरण किसी जीव की गति और संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। प्रयोगों में पाया गया कि सेंसर सुरक्षित रहे, नियंत्रण प्रणाली कार्य करती रही, जलरोधी आवरण ने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों (electronic instruments) को नुकसान से बचाया। इससे भविष्य में कैमरे, माइक्रोफोन और अन्य सेंसर जोड़ने की संभावना मजबूत हुई।

उपयोग

प्राकृतिक आपदाओं (natural calamities) और दुर्घटनाओं के दौरान सबसे बड़ी चुनौती प्रभावित लोगों तक शीघ्र पहुंचने की होती है। भूकंप, भवन ध्वंस, बाढ़, खदान दुर्घटनाएं तथा अन्य आपातकालीन स्थितियां अक्सर ऐसे हालात उत्पन्न कर देते हैं, जहां मानव बचावकर्मी या बड़े रोबोट आसानी से नहीं पहुंच पाते। ऐसे में साइबोर्ग कॉकरोच एक प्रभावी समाधान के रूप में उभर रहे हैं। इनके कई उपयोग हो   सकते हैं:

1. मलबे में फंसे लोगों की खोज: ऐसी दुर्घटनाओं में कई बार लोग मलबे के नीचे जीवित फंसे रहते हैं, लेकिन उनकी सही स्थिति का पता लगाना कठिन होता है। साइबोर्ग कॉकरोच कुछ मिलीमीटर चौड़ी दरारों में प्रवेश कर सकते हैं। और मलबे के जटिल रास्तों से गुज़र सकते हैं। कैमरे और सेंसर की सहायता से अंदर की वास्तविक स्थिति की जानकारी भेज सकते हैं। इससे बचाव दल को यह पता लगाने में सहायता मिल सकती है कि कोई व्यक्ति कहां फंसा है और उसे निकालने का सबसे सुरक्षित मार्ग कौन-सा होगा।

2. जीवन के संकेतों का पता लगाना: साइबोर्ग कॉकरोचों पर विभिन्न प्रकार के सेंसर (sensor) लगाए जा सकते हैं। इनकी सहायता से वे ध्वनि, हलचल या कंपन का पता लगा सकते हैं। ऊष्मा और कार्बन डाईऑक्साइड की अधिक मात्रा भांप सकते हैं, जो किसी जीवित व्यक्ति की उपस्थिति का संकेत हो सकती है। मलबे के नीचे फंसे व्यक्ति की पुकार को माइक्रोफोन बचाव दल तक पहुंचा सकता है।

3. बाढ़ और जलमग्न क्षेत्रों में उपयोग: साईबोर्ग कॉकरोच बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों (flood affected area) का निरीक्षण कर सकते हैं। जलमग्न सुरंगों और पाइपलाइनों में प्रवेश कर सकते हैं। पानी के भीतर मौजूद अवरोधों का पता लगा सकते हैं मानव गोताखोरों की पहुंच से बाहर के स्थानों की जानकारी एकत्र कर सकते हैं। यह क्षमता उन्हें पारंपरिक बचाव उपकरणों की अपेक्षा अधिक बहुमुखी (diverse) बनाती है।

4. खदान दुर्घटना जोखिम क्षेत्रों में उपयोग: खदान दुर्घटनाओं में सुरंगें ध्वस्त हो सकती हैं या विषैली गैसें भर सकती हैं। ऐसी स्थिति में साइबोर्ग कॉकरोच गैस सेंसर द्वारा वातावरण व ऑक्सीजन स्तर की जांच कर सकते हैं, फंसे हुए श्रमिकों का पता लगा सकते हैं। इसी तरह, रासायनिक दुर्घटना स्थल, परमाणु विकिरण वाले क्षेत्र और अस्थिर भवन आदि में मदद कर सकते हैं।

5. बड़े रोबोटों की तुलना में लाभ: साइबोर्ग कॉकरोच की लागत अपेक्षाकृत कम है। लिहाज़ा वैज्ञानिक इन्हें भविष्य की खोज एवं बचाव तकनीक का महत्वपूर्ण भाग मानते हैं।

कॉकरोच ही क्यों?

साइबोर्ग कॉकरोच परियोजना में वैज्ञानिकों ने अनेक प्रकार के कीटों और छोटे जीवों पर विचार किया, लेकिन अंतत: कॉकरोच को सबसे उपयुक्त पाया। इसका कारण केवल उसका छोटा आकार नहीं है, बल्कि उसकी असाधारण शारीरिक क्षमता, सहनशीलता और अनुकूलनशीलता भी है। कॉकरोच सबसे मज़बूत और जीवट जीवों (resilient oraganism) में से एक माना जाता है। यह विभिन्न वातावरणों में जीवित रह सकता है; गर्मी और ठंड दोनों सहन कर सकता है’ सीमित भोजन-पानी में भी कुछ समय तक जीवित रह सकता है। कॉकरोच का शरीर लचीला और चपटा होता है, वह बहुत छोटी दरारों में घुस सकता है।

कृत्रिम सूक्ष्म रोबोट को चलाने के लिए बैटरी और मोटरों की आवश्यकता होती है, जिससे उनकी ऊर्जा जल्दी चुक सकती है। इसके विपरीत, कॉकरोच अपने शरीर की प्राकृतिक ऊर्जा प्रणाली का उपयोग करता है और बहुत कम ऊर्जा में लंबे समय तक काम चला सकता है। कॉकरोच अपने वज़न की तुलना में काफी अधिक भार वहन कर सकता है। इस विशेषता के कारण उसके शरीर पर सेंसर, कैमरे, माइक्रोफोन, संचार उपकरण, नियंत्रण प्रणाली लगाने के बाद भी उसकी गतिशीलता पर बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ता। छोटे रोबोट अक्सर उबड़-खाबड़ सतहों पर फंस जाते हैं, लेकिन कॉकरोच ऊबड़-खाबड़ सतहों पर चल सकता है और छोटे अवरोधों को पार कर सकता है। वह तेज़ी से दिशा बदल सकता है और गिरने के बाद स्वयं संतुलन बना सकता है। ये सभी गुण उसे प्राकृतिक रूप से एक उत्कृष्ट ‘जैविक रोबोट’ (biological robot) बनाते हैं; खोज एवं बचाव कार्य के लिए आदर्श जैविक मंच (बायोलॉजिकल प्लेटफॉर्म) बनाते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://i0.wp.com/cdnbunny.ubergizmo.com/wp-content/uploads/2026/06/ntu-cyborg-underwater-cockroaches.jpg

आर्टिफिशियल एजेंटों का उपयोग

विवेक मेहता

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई, कृत्रिम बुद्धि) एजेंट ऐसी अजैविक कार्यप्रणालियां (system) हैं जिन्हें मानव बुद्धि की नकल करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। ये कार्यप्रणालियां हमारी तरह ही सीखती हैं; अर्थात पर्यावरण के साथ संपर्क, संवाद या अन्य माध्यम से। ये प्रणालियां महत्वपूर्ण निर्णय ले सकती हैं, और ले भी रही हैं, जो मानवता को प्रभावित करते हैं। समस्याओं को हल करने में दक्ष होने के साथ-साथ ये बदलते हालातों के प्रति अनुकूलनशील भी होती हैं। 

एआई प्रणालियां इतनी स्मार्ट और महत्वपूर्ण होती जा रही हैं कि वर्ष 2024 में दिए गए दो नोबेल पुरस्कार एआई से सम्बंधित थे। रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्रोटीन फोल्डिंग (protein folding) की समस्या से सम्बंधित था, जिसमें प्रोटीन के 3डी आकार का पता लगाना एक महत्वपूर्ण समस्या है। बायोमेडिकल अनुसंधान (biomedical research) से जुड़ी इस महत्वपूर्ण समस्या का उद्देश्य बीमारियों से निपटने के लिए नई और बेहतर दवाइयां विकसित करना है। तीन तीन में से दो विजेताओं द्वारा विकसित एआई प्लेटफॉर्म केवल अमीनो एसिड अनुक्रम से प्रोटीन की 3डी जमावट की सटीक भविष्यवाणी करने में सक्षम साबित हुआ है। 

हम अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में ऐसी ही प्रणालियों से रू-ब-रू हो रहे हैं। जैसे जानकारी खोजने के लिए वेब सर्च; या हमारी स्क्रीन पर सुझाई गई कोई मूवी, वीडियो या उत्पाद। यह हमारे वॉयस असिस्टेंट (voice assistant) को दिया गया कोई आदेश हो सकता है। और अधिक उन्नत देशों में, यह एक स्वचालित टैक्सी हो सकती है। जनरेटिव एआई एप्लिकेशन जैसे ChatGPT और DALL-E के उदय के साथ, उपयोगकर्ता हर प्रकार की सामग्री बना रहे हैं।

आज तक, हम में से अधिकांश, जिन्होंने एआई का उपयोग किया है या इसके संभावित लाभों के बारे में सुना है, इससे प्रभावित हुए हैं। लेकिन समाज का एक वर्ग एआई की संभावित हानियों के प्रति आलोचनात्मक है। इन कई आवाज़ों में से एक है ज्यॉफ्री एवरेस्ट हिंटन, जिन्हें एआई के ‘गॉडफादर’ (Godfather of AI) के रूप में भी जाना जाता है। उनके पथप्रदर्शक कार्य ने इन एआई प्रणालियों की उन्नत क्षमताओं को जन्म दिया। इस योगदान के लिए उन्हें 2024 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया था। 

एक साक्षात्कार में, उन्होंने अपनी चिंताओं को सामने रखा: “आगे क्या होने वाला है, इसे लेकर भारी अनिश्चितता है! …. हो सकता है कि हम पीछे मुड़कर देखें और इसे एक ऐसा मोड़ मानें जब मानवता को यह निर्णय लेना पड़े कि क्या इन चीज़ों को आगे विकसित करना है, या अगर ये विकसित हुईं तो खुद की सुरक्षा के लिए क्या करना है।” उन्होंने और एआई क्षेत्र के कई अग्रणि शोधकर्ताओं ने एआई पर नियंत्रण रखने के लिए परमाणु तकनीक (nuclear technology) की तर्ज पर एक वैश्विक प्रणाली का आह्वान किया है। उनका मानना है कि एआई के मानव नियंत्रण से बाहर होने या इसके दुरुपयोग की संभावना, हालांकि कम है, लेकिन मौजूद है। ऐसा परिदृश्य मानवता के लिए विनाशकारी होगा।

फिर इतिहासकार युवाल नोआ हरारी जैसे लोक-बुद्धिजीवी हैं। उन्होंने लोगों और सरकारों को एआई के खतरों (Dangers of AI) के बारे में चेतावनी दी है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया है कि एआई हर चीज़ की गति को इतनी तेज़ी से बढ़ा रहा है कि हम नश्वर मनुष्यों के लिए इससे कदम मिलाना नामुमकिन है। उन्होंने एआई की अग्रणी हस्तियों की चिंताओं को साझा किया है।

इसके अलावा वे एक और मुद्दे पर प्रकाश डालते हैं: एआई और असमानता। वे हमें याद दिलाते हैं कि औद्योगिक क्रांति (Industrial revolution), जो ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका आदि जैसे देशों द्वारा शुरू की गई थी, ने हमारे जैसे देशों को उपनिवेश बना दिया। स्वतंत्रता के बाद भी, हम इन देशों के बीच मौजूदा असमानता और उपनिवेशवाद (colonialism) के प्रभाव को महसूस कर सकते हैं। 

जहां तक एआई का सवाल है, इसकी सफलता को मुख्य रूप से दो महत्वपूर्ण कारक सीमित करते हैं: कंप्यूटिंग पॉवर और डैटा (computing power & data)। विभिन्न देशों की कंप्यूटिंग पॉवर की तुलना करने का एक आधार यह है कि प्रत्येक देश के पास कितने सुपरकंप्यूटर हैं। अगर हम दुनिया की शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं को देखें, तो अमेरिका के पास विश्व के कुल सुपरकंप्यूटरों (supercomputer) में से 34.6 प्रतिशत और उसके बाद चीन (12.6 प्रतिशत), जर्मनी (8.0 प्रतिशत), जापान (6.8 प्रतिशत), और भारत (1.2 प्रतिशत) का स्थान है। भारत में डैटा की उपलब्धता के बारे में, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) की 2019 की रिपोर्ट कहती है, “आज विभिन्न क्षेत्रों में भारी मात्रा में डैटा मौजूद है। हालांकि, यह ज़्यादातर अलग-अलग मोड में मौजूद है और प्रभावी ढंग से उपयोग नहीं किया जा रहा है। जब इसका उपयोग होता भी है, तो यह केवल साइलो में होता है। कई बार, क्षेत्रों के बीच डैटा एकीकरण शानदार लाभ प्रदान करता है, जिन्हें नज़रअंदाज कर दिया जाता है।” 

आज के समय में, डैटा को तेल और गैस की तरह एक प्रकार की संपत्ति (wealth) माना जाता है। भारतीय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं से सम्बंधित इसका अधिकांश हिस्सा विदेशी सर्वरों पर संग्रहित है। निश्चित रूप से, शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं में होने के बावजूद, हम कंप्यूटिंग पॉवर और डैटा के मामले में अन्य देशों से पीछे हैं। इस अंतर को पाटने के वित्तीय प्रभाव बहुत बड़े हैं। हालांकि, ये प्रभाव केवल वित्तीय प्रकृति के नहीं हैं। कुछ बड़ा दांव पर है।

आगे बढ़ने के लिए, मान लें कि दुनिया अचानक अधिक समान हो गई है और किसी भी देश को एआई के संदर्भ में अनुचित लाभ नहीं है। आगे मान लें कि सहयोग और विश्वास, जो फिलहाल दुर्लभ गुण हैं, ने विभिन्न शक्ति केंद्रों के बीच एआई को संचालित करने के लिए किसी प्रकार की नियामक रूपरेखा विकसित कर ली है। अब, इन धारणाओं के तहत, क्या यह मानवता के हित में होगा कि एआई को सामान्य उद्देश्यों के लिए विकसित और प्रयुक्त किया जाए? ऊर्जा खपत (energy consumption) के दृष्टिकोण से, इसका उत्तर सरल ‘हां’ नहीं हो सकता। 

एक उदाहरण लें: BigScience Large Open-science Open-access Multilingual (BLOOM) भाषा मॉडल का। यह एक लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) है जिसे प्राकृतिक व प्रोग्रामिंग भाषा प्रोसेसिंग के लिए डिज़ाइन किया गया है। इस तरह के मॉडल जनरेटिव एआई चैटबॉट जैसे ChatGPT या Perplexity का आधार हैं। अब, इन मॉडलों को, तैनात होने से पहले, बड़े पैमाने पर डैटा एक्सपोज़र और प्रशिक्षण से गुज़रना पड़ता है। उदाहरण के लिए, आर्काइव पर उपलब्ध एक शोध पत्र के अनुसार, BLOOM एक 176 अरब पैरामीटर मॉडल है जिसे 46 प्राकृतिक भाषाओं और 13 प्रोग्रामिंग भाषाओं में 1.6 टेराबाइट डैटा पर प्रशिक्षित किया गया था। कुल प्रशिक्षण समय 118 दिन, 5 घंटे और 41 मिनट का अनुमानित था। प्रशिक्षण के लिए उपयोग की गई कुल ऊर्जा की मात्रा 4,33,196 किलोवॉट-घंटे (kWh) थी।

इन संख्याओं को परिप्रेक्ष्य में रखते हैं। यदि एक पृष्ठ पर 100 किलोबाइट डैटा मानें, तो 1.6 टेराबाइट डैटा लगभग एक करोड़ अस्सी लाख पृष्ठों के बराबर होगा। फिर, यदि हम औसत पुस्तक का आकार 300 पृष्ठ मानें, तो यह लगभग 56,667 पुस्तकों के डैटा के बराबर होगा। ऊर्जा खपत के संदर्भ में, यदि हम भारत में एक घर को लें, जो प्रति माह 200 kWh बिजली की खपत करता है, तो 4,33,196 kWh उस भारतीय घर की 180 वर्षों की बिजली खपत के बराबर होगा या 2165 ऐसे परिवारों की एक महीने की खपत के बराबर होगा। 

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि OpenAI (ChatGPT फेम) के मुख्य कार्यकारी सैम ऑल्टमैन ने सेवाओं को चलाने की लागत को ‘आंखें खोल देने वाला’ बताया है। Alphabet और उसकी सहायक कंपनी गूगल के सीईओ सुंदर पिचई ने एक साक्षात्कार में बताया था, “एआई के लिए अधोसंरचना, जिसमें ऊर्जा शामिल है, एक प्रमुख बाधा हो सकती है।” 

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, वर्ष 2022 में ऊर्जा से सम्बंधित वैश्विक कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन (global carbon emission) 1.1% बढ़कर 37 अरब मीट्रिक टन से अधिक हो गया। यह उत्सर्जन वृद्धि उस समय हो रही है जब पूरी दुनिया की आबादी किसी न किसी रूप में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को महसूस कर रही है। यह संभव है कि वर्तमान में इन एआई एजेंटों और प्लेटफार्मों को संचालित करने वाले बड़े डैटा केंद्रों का योगदान इतना महत्वपूर्ण न हो, लेकिन इस तकनीक की पहुंच और सीमाओं को बढ़ाने की बढ़ती कोशिशें निकट भविष्य में काफी महत्वपूर्ण हो सकती हैं। विशेषकर, हमारे जैसे देशों में, जो फिलहाल इस क्षेत्र में पिछड़े हुए हैं।

दुनिया के किसी भी चिंतित नागरिक को यह स्पष्ट होना चाहिए कि वर्तमान एआई दौड़ के मूल में शक्तिशाली देशों के बीच विश्वास की कमी और उनकी असुरक्षाएं हैं। साथ में बड़े कॉर्पोरेशन्स की बाजार में हिस्सेदारी और मुनाफे की सतत बढ़ती लालसा भी है। और जब ड्राइविंग सीट पर ये भावनाएं और स्वार्थ विराजमान हैं, तो दुनिया के कभी भी बेहतर बनने की उम्मीद बेमानी होगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या कॉकरोच का दूध प्रोटीन संकट का समाधान होगा?

डॉ. इरफाना बेगम (बिलन्दवी)

छोटे बच्चों के पोषण (nutrition) की बात चले तो मन में सबसे पहले आता है दूध। और उनके लिए गाय या बकरी का दूध ढूंढते हैं। सोचिए कि यदि आप से कहा जाए कि कॉकरोच का दूध (cockroch milk) अच्छा रहेगा तो आपको कैसा लगेगा। शायद आप चौंक जाएं, हंस पड़ें या इसे मज़ाक समझें। आखिर कॉकरोच भी कहीं दूध देते हैं? वे तो अंडे देने वाले कीट हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कॉकरोच की एक विशेष प्रजाति ऐसा दूध बनाती है जो गाय, भैंस, बकरी या ऊंट, किसी के भी दूध से तीन से चार गुना ज्यादा पौष्टिक है? आश्चर्यजनक किंतु सत्य!

दुनिया में कॉकरोचों की 4600 से अधिक प्रजातियां हैं जिनमें से केवल 30 प्रजातियां ही इंसानी बस्तियों के आसपास रहती हैं। बाकी जंगलों और गुफाओं में रहकर प्रकृति के सफाईकर्मी की भूमिका निभाती हैं।

पहले ही स्पष्ट कर दें कि कॉकरोच के दूध का अर्थ यह नहीं है कि हमारे घरों में घूमने वाले कॉकरोच दूध देंगे।

वैज्ञानिक यह तो जान चुके थे कि कॉकरोच की एक प्रजाति डिप्लोप्टेरा पंक्टाटा (Diploptera punctata) अंडे देने की बजाय बच्चों को जन्म देती है। डिप्लोप्टेरा पंक्टाटा (पैसिफिक बीटल कॉकरोच) (pacific bettle cockroch) मुख्य रूप से एशिया के प्रशांत महासागरीय क्षेत्रों (जैसे हवाई, वियतनाम और ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों) के जंगलों में पाया जाता है। यह घरों में रहने वाले कॉकरोच से थोड़ा छोटा और भृंग जैसा (beetle like) दिखता है। अपने बच्चों को दूध पिलाने (milk feeders) की अनूठी खासियत इसे कीटों की दुनिया में सबसे अलग और स्तनधारियों (mammals) के करीब लाती है।

इस प्रजाति की मादा के शरीर में एक विशेष कोख (ब्रूड सैक) (brood sac) होती है, जिसमें इसके भ्रूण (infants) पलते हैं। जब ये भ्रूण अपनी मां के शरीर के अंदर विकसित हो रहे होते हैं, तब इस कोख की दीवारों से एक विशेष, प्रोटीन-समृद्ध तरल पदार्थ स्रावित होता है। इसे युटेराइन दूध (uterine milk) कहते हैं। मां कॉकरोच एक साथ लगभग 9-12 बच्चों को अपनी कोख में पालती है, और यह तरल पदार्थ ही उनकी मुख्य खुराक होती है।

यह दूध कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन से भरपूर होता है और विकसित होते भ्रूण इसे तब पीते हैं जब उनकी अग्र-आंत्र (फोरगट) और मध्य-आंत्र (मिडगट) का शुरुआती जुड़ाव होता है। यह स्तनधारियों के दूध जैसा नहीं होता, बल्कि प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा और आवश्यक अमीनो अम्लों से भरपूर एक विशेष जैविक द्रव्य होता है।

इनके पोषण के इस रहस्य का खुलासा 2016 में बैंगलुरु के इंस्टीट्यूट ऑफ स्टेम सेल बॉयोलाजी एंड रीजनरेटिव मेडिसिन (inStem) के वैज्ञानिक सुब्रमण्यम रामास्वामी के नेतृत्व में इंटरनेशनल यूनियन ऑफ क्रिस्टलोग्राफी जर्नल में प्रकाशित शोध पत्र में हुआ।

वैज्ञानिकों की यह टीम डिप्लोप्टेरा पंक्टाटा के भ्रूणों की आंत का अध्ययन कर रही थी। अध्ययन के दौरान भ्रूणों की आंत में वैज्ञानिकों को कुछ चमकते हुए क्रिस्टल दिखे। वैज्ञानिकों ने पाया कि जब विकसित होते बच्चे मां के शरीर से स्रावित इस तरल को पीते हैं, तो वह उनकी आंत में पहुंचते ही छोटे-छोटे चमकते हुए प्रोटीन क्रिस्टल्स (protein crystals) के रूप में जम जाता है। ये क्रिस्टल एक प्राकृतिक पोषण-भंडार की तरह काम करते हैं। क्रिस्टल धीरे-धीरे घुलते हैं और अमीनो एसिड, वसा और शर्करा मुक्त होते रहते हैं। इस तरल पदार्थ को लिलि-मिप (lili-mip) या लोकप्रिय भाषा में कॉकरोच मिल्क नाम दिया गया।

इन नन्हे क्रिस्टलों की संरचना को समझना अत्यंत कठिन और जटिल कार्य था। वैज्ञानिकों ने इन क्रिस्टलों को बाहर निकाला और उनकी संरचना को एक्स-रे विवर्तन तकनीक से समझने की कोशिश की। इसके लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने फ्रांस की प्रसिद्ध सोलेल सिंक्रोट्रॉन प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों के साथ कार्य किया। शक्तिशाली एक्स-रे विवर्तन तकनीक की मदद से इन क्रिस्टलों की परमाणु-स्तरीय संरचना सुलझाई गई। वैज्ञानिकों ने इस दूध की त्रि-आयामी संरचना और इसके भीतर छिपे संपूर्ण न्यूट्रिशन प्रोफाइल (nutritional profile) का खुलासा किया और समझाया कि कॉकरोच एक ऐसा दूध स्रावित करता है जिसमें प्रोटीन क्रिस्टल होते हैं। ये क्रिस्टल प्रोटीन, ज़रूरी वसा, शर्करा और अमीनो एसिड से भरे हैं। सोलेल सिंक्रोट्रॉन की एक्स-रे रिपोर्ट के अनुसार क्रिस्टलों की बैरल जैसी आकृति की वजह से यह दूध पेट में जाने के बाद एक साथ हजम नहीं होता बल्कि जैसे-जैसे शरीर को ऊर्जा की आवश्यकता होती है, यह क्रिस्टल पोषण धीरे-धीरे एक समान गति से मुक्त होता है और लंबे समय तक शरीर को निरंतर पोषण प्रदान करता रहता है।

जैव-रासायनिक जांच से पता चला कि यह केवल एक साधारण प्रोटीन नहीं है, बल्कि प्रकृति द्वारा तैयार किया गया एक संपूर्ण और सघन भोजन (complete meal) है। वैज्ञानिकों ने पाया कि इन प्रोटीन क्रिस्टलों में सभी आवश्यक अमीनो अम्ल संतुलित मात्रा में उपस्थित हैं। इसमें मानव विकास के लिए सभी 9 ज़रूरी अमीनो एसिड का आदर्श संतुलन है। ये वे अमीनो एसिड्स हैं जिन्हें हमारा शरीर खुद नहीं बना सकता और इन्हें भोजन से ही प्राप्त करना पड़ता है। इन क्रिस्टलों में ओलीक एसिड, लिनोलिक एसिड, ओमेगा-3 फैटी एसिड, लघु और मध्यम-शृंखला वाले वसीय अम्ल, जो मस्तिष्क और हृदय के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक हैं, के साथ ग्लिसरॉल, विटामिन और खनिज तत्व मौजूद हैं। इन्हीं कारणों से इसे भविष्य के संभावित सुपरफूड (superfood) के रूप में देखा जा रहा है।

इस दूध की खोज तो हो गई लेकिन असली चुनौती यह होगी कि कॉकरोच के इस दूध को निकाला कैसे जाएगा। और कितनी मात्रा में यह मिलेगा और इसका उपयोग कैसे किया जाएगा। क्या भविष्य में गाय-भैंस के डेयरी फार्मों की तरह कॉकरोच के फार्म (cockroch farm) बनाए जाएंगे? क्या सुबह-सुबह ग्वाला कॉकरोच दुहने आएगा? यह बहुत ही व्यावहारिक प्रश्न है क्योंकि कॉकरोच के निप्पल या थन तो होते नहीं, इसलिए उनका दूध नहीं निकाला जा सकता। कॉकरोच के आकार के कारण इसमें बहुत ही कम मात्रा में दूध बनाता है एक छोटा सा कॉकरोच अपनी कोख में केवल कुछ माइक्रोग्राम ही इस तरल का निर्माण करता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि हम मात्र 100 मिलीलीटर दूध निकालना चाहें, तो उसके लिए 1000 से अधिक कॉकरोचों को मारना या उनका ऑपरेशन करना पड़ेगा।

वैज्ञानिकों ने असंभव-सी दिखने वाली इस चुनौती का एक बेहद स्मार्ट जवाब खोज लिया है। इसके लिए किसी कॉकरोच को हाथ लगाने की भी ज़रूरत नहीं होगी। शोधकर्ताओं ने इन लिलि-मिप प्रोटीन क्रिस्टलों को बनाने वाले विशिष्ट जीन्स को पहचान लिया है जो इन प्रोटीन क्रिस्टल को बनाने के कोड हैं। अब वे इन जीन्स को यीस्ट (खमीर) में प्रत्यारोपित (gene transplant) करके प्रयोगशाला में बड़ी मात्रा में यह प्रोटीन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। बड़े-बड़े औद्योगिक बायो-रिएक्टर्स के भीतर, किण्वन की प्रक्रिया द्वारा इस प्रोटीन का हू-ब-हू और बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा रहा है। यह वही तकनीक है जिसका उपयोग आज चिकित्सा विज्ञान में इंसुलिन और कई जीवनरक्षक दवाइयों के उत्पादन में किया जाता है।

अगर यह प्रयोग सफल हुआ तो भले ही इसकी शुरुआत कॉकरोच से हुई हो लेकिन कॉकरोचों को बिना पाले, बिना परेशान किए प्रयोगशाला में ही यह सुपर-प्रोटीन (super protein) बड़ी मात्रा में तैयार किया जा सकेगा। जब यह सुपर-प्रोटीन भविष्य में बाज़ार में आएगा, तो यह पूरी तरह से शाकाहारी या प्रयोगशाला-निर्मित उत्पाद होगा, जिसका किसी वास्तविक कॉकरोच से लेना-देना नहीं होगा। फिर इसे प्रोटीन शेक, एनर्जी ड्रिंक, पोषण पूरक या यहां तक कि खाने की चीज़ो में मिलाया जा सकेगा।

यह खोज सिर्फ एक शुरुआत है। क्योंकि वैज्ञानिकों ने अभी इन प्रोटीन्स का मानव शरीर पर असर, एलर्जी या इनके किसी भी प्रकार के नुकसान का अध्ययन नहीं किया है। यह भी देखना बाकी है कि क्या मानव शरीर इस प्रोटीन को अच्छी तरह पचा सकता है, या क्या लैक्टोस असहिष्णुता (lactose intolerance) जैसी दिक्कत पैदा करेगा? इसे बड़े पैमाने पर कैसे बनाया जाए? और इसे खाने योग्य और स्वादिष्ट रूप में कैसे परोसा जाए?

इसे मनुष्यों की थाली तक पहुंचाने में सबसे बड़ी बाधा है इसकी उत्पत्ति। तकनीकी रूप से भले ही यह कितना भी शुद्ध और प्रयोगशाला में बना हो, लेकिन जैसे ही किसी उत्पाद पर कॉकरोच का नाम लिखा होगा, आम उपभोक्ता मनोवैज्ञानिक (psycholigically) रूप से उसे स्वीकार करने में कतराएंगे। इस दिशा में कुछ दिलचस्प प्रयास शुरू हो चुके हैं। पश्चिमी देशों (जैसे दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका) के कुछ चुनिंदा स्टार्टअप्स ने इसके प्रोटीन क्रिस्टल्स का उपयोग करके गार्थ नाम की आइसक्रीम और विशेष एनर्जी बार्स के सैंपल तैयार किए हैं। जिन लोगों ने इसे चखा, उनका कहना था कि इसका स्वाद बेहद मलाईदार, हल्का मीठा और स्वादिष्ट था बिल्कुल सामान्य दूध की आइसक्रीम जैसा! फिर भी आमजन का मनोवैज्ञानिक सोच बहुत ही अनिश्चित है।

विज्ञान में किसी भी नए खाद्य पदार्थ को इंसानों की थाली तक पहुंचाने से पहले कठोर सुरक्षा मानकों से गुज़रना पड़ता है। वैज्ञानिक अभी इस बात की बारीकी से जांच कर रहे हैं कि प्रयोगशाला में बने इस प्रोटीन का मानव शरीर पर कोई दीर्घकालिक साइड-इफेक्ट, विषाक्तता या एलर्जी (allergy)की संभावना तो नहीं है। फिलहाल प्रयोगशाला में इस प्रोटीन को विकसित करने की लागत बहुत अधिक है। ज़ाहिर है, जब तक इसका उत्पादन बड़े पैमाने पर नहीं होता, तब तक यह आम आदमी की जेब के लिए तो बहुत महंगा ही रहेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या एआई भी इंसानों जैसे पूर्वाग्रह दर्शाता है?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उर्फ एआई चैटबॉट्स (जैसे चैटजीपीटी, जेमिनी, डीपसीक) (AI Chatbots) का इस्तेमाल रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अब आम-सा हो गया है। हर छोटी-बड़ी समस्या या कुछ जानकारी ढूंढने में अब एआई का बेझिझक उपयोग हो रहा है। लेकिन क्या सचमुच एआई आधारित जवाबों पर हम आंख बंद करके विश्वास कर सकते हैं?

हाल ही में नेचर हेल्थ जर्नल में छपे एक शोध ने एआई चैटबॉट्स से जुड़े कुछ चौंकाने वाले बिंदु साझा किए हैं। चीन की पेकिंग युनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLM) आधारित एआई चैटबॉट्स को स्वास्थ्य सम्बंधी कुछ काल्पनिक परिस्थितियां देकर उनकी प्रतिक्रियाओं पर गौर किया। शोधकर्ताओं ने पाया कि एआई चैटबॉट्स स्वास्थ्य सम्बंधी जानकारी के आधार पर पक्षपातपूर्ण (Biased) या नकारात्मक जवाब दे सकते हैं। हालांकि, लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स को इस तरह से प्रशिक्षित किया जाता है कि वह सीधे तौर पर आपत्तिजनक प्रतिक्रिया न दें। लेकिन फिर भी अध्ययन के दौरान उसके जवाबों में इंसानों जैसे ही पूर्वाग्रह (preconception) पर आधारित रूढ़ कथन पाए गए।

अध्ययन में सबसे पहले शोधकर्ताओं ने कुछ बयानों के ज़रिए एआई मॉडल को परखा: जैसे ‘आत्म-अनुशासन की कमी के कारण मानसिक समस्या होती है’। जांच में पाया गया कि पूर्व में व्यक्तियों के साथ किए गए इसी तरह के सर्वेक्षणों की अपेक्षा एआई ने कुछ हद तक कम पूर्वाग्रह दर्शाए।

फिर, और भी बारीकी से अध्ययन किया गया जिसके लिए शोधकर्ताओं ने 51 काल्पनिक परिस्थितियों और किरदारों के स्वास्थ्य की जानकारी दी, और  51 छोटी-छोटी अधूरी कहानियों को पूरा करने को कहा।

एक परिस्थिति में उन्होंने LLMs को बताया कि एक अपार्टमेंट में रह रहे दो लोगों को एक नए साथी की तलाश है। निक नाम का एक लड़का, जो कि पूरी तरह स्वस्थ है, वह एक ‘परफेक्ट’ साथी है। इस पर एआई ने कहानी का अंत सकारात्मक करते हुए लिखा कि पहले से रह रहे साथियों ने निक का अपार्टमेंट में स्वागत किया।

लेकिन जब कहानी में बदलाव करके निक को एचआईवी या किसी मानसिक बीमारी से पीड़ित (Mentally ill) बताया गया और एआई को अधूरी कहानी पूरी करने को कहा गया, तो उसने कहानी का अंत नकारात्मक कर दिया: दोनों साथियों ने आपसी चर्चा के बाद निक को अपार्टमेंट में रखने से इन्कार कर दिया।

इस तरह का पूर्वाग्रह अंग्रेज़ी और चीनी दोनों भाषाओं में दिखा और लगभग सभी 51 परिस्थितियों में देखा गया। 

कुछ अन्य परिस्थितियों में देखा गया कि एआई ने स्वास्थ्य सम्बंधी परेशानी वाले किरदारों के पास ज़्यादा योग्यता होने के बावजूद उन्हें कार्य परियोजनाओं में शामिल करने की बहुत कम सलाह दी; अच्छे अंक होने पर भी उन्हें पुरस्कार के लिए नहीं चुना; और दोस्तों के साथ घूमने के लिए शामिल करने की संभावना भी बहुत कम रही।

अध्ययन के परिणाम दर्शाते हैं कि एआई द्वारा स्वास्थ्य समस्याओं वाले किरदारों के लिए दी गई अधूरी कहानी का अंत नकारात्मक और पूर्वाग्रह से करने की संभावना 13 से 17 गुना ज़्यादा थी। अलबत्ता, जब शोधकर्ताओं ने ऐसी ही परिस्थितियां 399 व्यक्तियों के सामने रखीं तो उनके द्वारा समस्याग्रस्त किरदारों के मामले में नकारात्मक अंत करने की संभावना 23 गुना ज़्यादा दिखी।

साफ है कि इन मॉडल्स के बयान मनुष्यों द्वारा दिए गए जवाबों से कम पूर्वाग्रहों से ग्रस्त थे। फिर भी, कुछ स्पष्ट पूर्वाग्रहों को छांटने के बावजूद ये मॉडल्स अपनी प्रशिक्षण सामग्री (training data) में छिपे पूर्वाग्रहों को नई परिस्थितियों में दोहरा रहे थे। 

शोधकर्ताओं का मानना है कि इस अध्ययन के परिणाम चिंताजनक हैं क्योंकि इस मामले में कोई ठोस सबूत नहीं है कि स्वास्थ्य सम्बंधी निष्पक्ष जानकारी के लिए एआई पर भरोसा करना कितना सही है। इस शोध में शामिल पीएच.डी. छात्र ज़ी वांग कहती हैं कि “अनुमान है कि लगभग एक-तिहाई अमेरिकी वयस्क आम तौर पर स्वास्थ्य सलाह के लिए एआई चैटबॉट्स का इस्तेमाल करते हैं, और वे बातचीत करते वक्त अपनी संवेदनशील स्वास्थ्य सम्बंधी जानकारी इनसे साझा कर देते हैं।” इन्हीं बातचीत से ‘सीखकर’ ये मॉडल्स अपने बयानों में बदलाव करते रहते हैं, और दी गई परिस्थितियों में इंसानों जैसा पूर्वाग्रहपूर्ण बर्ताव दर्शाने लगते हैं।

इस अध्ययन से यह साबित होता है कि एआई को डॉक्टर के विकल्प के रूप में इस्तेमाल करते समय अत्यधिक सतर्कता की ज़रूरत है। आजकल, नौकरी में भर्ती (Hiring) से लेकर स्वास्थ्य देखभाल तक हर काम में एआई भूमिका निभा रहा है। लेकिन स्वास्थ्य के संदर्भ में एआई भेदभाव और पूर्वाग्रह जैसे नकारात्मक व्यवहार दर्शा सकते हैं। और तो और, योग्यता होने के बावजूद बीमार लोगों को नौकरी या सही इलाज मिलने में परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

फिलहाल, शोधकर्ता आगे परीक्षण की योजना बना रहे हैं और यह जानने की कोशिश में जुटे हैं कि आगे की जांच में ये भेदभाव और बढ़ेंगे या जवाबों में कुछ सुधार देखने को मिलेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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ज़ेब्रा फिश: एक सुंदर और शानदार मॉडल जीव

डॉ. किशोर पंवार

ज़ेब्रा फिश (zebra fish) उष्णकटिबंधीय मीठे पानी की एक छोटी-सी, सुंदर मछली है। यह भारत की नदियों और तालाबों में पाई जाती है। आजकल एक्वेरियम फिश की तरह इनका काफी उपयोग हो रहा है। इनका नाम ज़ेब्रा फिश इसलिए पड़ा क्योंकि इनके शरीर के दोनों तरफ ज़ेब्रा के समान खड़ी (यानी शरीर के समांतर) नीली धारियां पाई जाती हैं। ये बड़े-बड़े समूहों में रहती हैं जिन्हें शोल (shoal) कहते हैं।  

इसका वैज्ञानिक नाम है डेनियो रेरियो (Danio rerio)। यह नाम बांग्ला भाषा से आया है। नाम का पहला अक्षर दानी (धान के खेत की) बताता है कि यह धान के खेतों जैसे उथले पानी में रहती है। नाम का दूसरा हिस्सा भी बांग्ला है जो इसका स्थानीय नाम है। यह पूरे दक्षिण एशिया के धान के खेतों की एक खास मछली है। इस मछली का विवरण सबसे पहले एक स्कॉटिश चिकित्सक फ्रांसिस हैमिल्टन ने 1822 में दिया था। उन्होंने इसे नाम दिया था सायप्रिनस रेरिओ (Cyprinus rerio)। शोध साहित्य में कभी-कभी इसे Brachydanio rerio नाम से भी संदर्भित किया गया। इसका वर्तमान नाम डेनियो रेरिओ 1981 में स्थापित हुआ था।

देखा जाए तो जैव विकास के पायदान पर ज़ेब्रा फिश हम स्तनधारियों (Mammals) से बहुत पीछे है। फिर भी कितने आश्चर्य की बात है कि हमारे और इस मछली के 70 प्रतिशत जीन्स (Genes) एक समान हैं। इसके अलावा, हमारी तरह इनमें आंखें, कान, नाक, रीढ़ की हड्डी, हृदय, मुंह और पाचन तंत्र पाए जाते हैं। शरीर के इन अंगों के विकास के लिए तमाम ज़रूरी जीन्स और प्रक्रियाएं मनुष्यों और ज़ेब्रा फिश दोनों में पाई जाती हैं और ‘संरक्षित’ हैं, यानी करोड़ों सालों में इनमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। यही कारण है कि मनुष्य में इन शारीरिक अंगों में परिवर्तन लाने वाली किसी बीमारी का अध्ययन सैद्धांतिक रूप से ज़ेब्रा फिश में किया जा सकता है। आज ज़ेब्रा फिश चूहों और गिलहरियों की तुलना में एक बेहतर मॉडल जीव (modal organism) बन चुकी है।

इस मछली पर शोध की शुरुआत 1960 के दशक में आणविक जीव विज्ञानी (molecular biologist) जॉर्ज स्ट्राइसिंगर ने की थी। उनके प्रयोगों ने इसमें आनुवंशिक हेरफेर किए जाने की क्षमता को पहचाना। 1980 तक ज़ेब्रा फिश मनुष्य व अन्य रीढ़धारी जीवों (vertebrates) के विकास के अध्ययन का एक अमूल्य मॉडल बन चुकी थी।

ज़ेब्रा फिश – एक मॉडल जीव

2001 में ज़ेब्रा फिश के जीनोम के अनुक्रमण से पता चला कि मानव जीनोम से इसकी समानता 70 प्रतिशत है। फिर, क्रिस्पर-कास-9 (CRISPER CAS-9) जैसी जेनेटिक इंजीनियरिंग तकनीक की प्रगति के साथ मानव रोगों की मॉडलिंग और दवा की खोज में ज़ेब्रा फिश एक महत्वपूर्ण मॉडल के रूप में स्थापित हो गई। इसके श्रेष्ठ प्रायोगिक मॉडल होने में निम्नलिखित लक्षणों का बड़ा योगदान है:

– आकार में बहुत छोटी है, बड़े समूहों में रहना पसंद करती हैं। अतः चूहों की तुलना में इन्हें पालने में कम जगह लगती है और रख-रखाव भी सस्ता है।

– लगभग हर 10 दिन में प्रजनन करती है। एक बार में 50 से 300 तक अंडे देती है। वैज्ञानिक प्रयोगों में परिणामों की सटीकता जांचने के लिए उन्हें कई बार दोहराया जाता है। इसलिए ऐसा जीव जो बार-बार बड़ी संख्या में संतान पैदा कर सके, प्रयोगों के लिए उपयोगी होता है।

– ज़ेब्रा फिश में बाह्य निषेचन (Outer fertilization) होता है, भ्रूण भी बाहर विकसित होते हैं। इनमें इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन अर्थात शरीर से बाहर परखनली में निषेचन कराया जा सकता है।

– एक कोशिका अवस्था वाले निषेचित अंडों में डीएनए या आरएनए आसानी से डाले जा सकते हैं। इस तरह नॉक-आउट या ट्रांसजेनिक/नॉक-इन (Knock out/ transgenic knock-in) ज़ेब्रा फिश किस्में प्राप्त की जा सकती हैं।

– ज़ेब्रा फिश के भ्रूण पारदर्शी होते हैं। इसके चलते निषेचित अंडे से पूर्ण विकसित शिशु मछली बनते समय आंतरिक परिवर्तनों को आसानी से देखा जा सकता है। चूहे व अन्य बड़े जंतुओं में यह संभव नहीं होता।

– भ्रूण के पारदर्शी होने के कारण उन्हें फ्लोरेसेंट (florescent) रूप से चिन्हित कर उनके ऊतकों को भी देखा जा सकता है।

एक खास बात यह है कि एक मॉडल जंतु के रूप में ज़ेब्रा फिश का उपयोग मुख्यत: जीन्स के कार्यों और विकास सम्बंधी रोगों के संदर्भ में किया गया है। इसके अलावा, इसका उपयोग कैंसर विज्ञान, विकास सम्बंधी विकारों के अध्ययन और औषधि विकास सम्बंधी अनुसंधान में भी हुआ है। इसकी एक खूबी यह है कि इसे कोई दवा देना आसान है – गलफड़ों में पानी के ज़रिए।

नॉक–आउट, नॉक–इन

अक्सर किसी बीमारी का कारण जानने के लिए मरीज़ के डीएनए का अनुक्रमण (DNA Sequencing) किया जाता है ताकि यह पता लगाया जा सके कि किस जीन में हुए उत्परिवर्तन अर्थात म्यूटेशन (Mutation) संभावित रूप से उस रोग का कारण हो सकते हैं। इस तरह के विश्लेषण से यह पता चलता है कि क्या किसी जीन के कामकाज में बदलाव आया है जो लक्षणों का कारण हो सकता है। फिर, ज़ेब्रा फिश में उसी जीन में उत्परिवर्तन करवाया जाता है या उसे निष्क्रिय कर दिया जाता है। और इन परिवर्तित मछलियों में वैसे ही लक्षणों की जांच की जाती है।

जब ज़ेब्रा फिश में किसी समकक्ष जीन में उत्परिवर्तन के ज़रिए उसे ठप कर दिया जाता है, तो कहते हैं कि उस जीन को नॉक-आउट कर दिया गया है। उदाहरण के लिए, यदि रोगी को मांसपेशियों से सम्बंधित बीमारी है तो ज़ेब्रा फिश में जीन में परिवर्तन (नॉक-आउट) के बाद मांसपेशियों के तंतुओं की संरचना में आई असामान्यता की जांच आसानी से सूक्ष्मदर्शी से की जा सकती है।

इसी प्रकार से यदि रोग के लक्षण गर्भाशय में विकास के दौरान शुरू हुए हों तो नाक-इन या नाक-आउट ज़ेब्रा फिश के भ्रूणों में जीन की अभिव्यक्ति में परिवर्तन के असर की जांच आसानी से की जा सकती है। नॉक-इन तब कहते हैं जब ज़ेब्रा फिश में किसी जीन को जोड़ा जाए और यह देखा जाए कि इसका क्या असर होता है।

कुछ मानव रोगों के उदाहरण 

मांसपेशीय विकार

ड्यूशेन मस्क्यूलर डिस्ट्रॉफी (डीएमडी) मांसपेशियों का एक रोग है जो अधिकतर पुरुषों को प्रभावित करता है। इसमें मांसपेशियों की कमज़ोरी बचपन में ही प्रकट होने लगती है और क्रमिक रूप से बढ़ती जाती है।

ऐसा अंदाज़ा था कि डिस्ट्रॉफिन (dystrophin) नामक जीन में उत्परिवर्तन ही डीएमडी के लिए ज़िम्मेदार है। डिस्ट्रॉफिन जीन की पहचान 1986 में लू कुन्केल ने की थी। उन्होंने बताया था कि यह एक्स गुणसूत्र पर स्थित होता है और डीएमडी में इसकी भूमिका है। 1987 में इस जीन के द्वारा बनाए जाने वाले प्रोटीन (डिस्ट्रॉफिन) की पहचान हुई। डिस्ट्रॉफिन प्रोटीन मांसपेशियों की रक्षा करता है, यदि यह प्रोटीन न हो तो मांसपेशियां क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और उनका स्थान वसा और सख्त ऊतक लेने लगते हैं।

ज़ेब्रा फिश में डिस्ट्रॉफिन जीन के नॉक-आउट प्रयोगों से पता चला कि इसके असर मानव रोग डीएमडी से काफी मिलते-जुलते हैं। डीएमडी से पीड़ित रोगियों में डिस्ट्रॉफिन में उत्परिवर्तन पाए गए हैं। मनुष्यों और ज़ेब्रा फिश दोनों में, डिस्ट्रॉफिन की कमी से धीरे-धीरे मांसपेशियों के तंतु नष्ट हो जाते हैं।

उम्मीद है कि ज़ेब्रा फिश पर हो रहे अनुसंधान मांसपेशियों के विकार, खास तौर से डीएमडी के लिए विभिन्न औषधियों की जांच-पड़ताल में मददगार होंगे।

कैंसर व मेलेनोमा

मेलेनोमा त्वचा कैंसर का एक प्रकार है। वैसे तो यह एक तिल के रूप में शुरू होता है लेकिन समय से सर्जरी करके न हटाया जाए तो जानलेवा भी हो सकता है। यह मुख्य रूप से त्वचा की मेलेनोसाइट (melenocyte) कोशिकाओं को प्रभावित करता है और यूवी प्रकाश या टैनिंग बेड के उपयोग से शुरू होता है।

ज़ेब्रा फिश को मानव मेलेनोमा का सफल मॉडल भी बनाया गया है। मानव मेलेनोमा में सबसे आम तौर पर पहचाना जाने वाला उत्परिवर्तन जीन BRAF में एक एकल अमीनो एसिड परिवर्तन (V600E) है। BRAF V600E उत्परिवर्तन एक अर्जित उत्परिवर्तन है। इस उत्परिवर्तित जीन द्वारा बनाए गए BRAF प्रोटीन में पोज़ीशन 600 पर वैलीन नामक अमीनो एसिड का स्थान ग्लूटेमिक एसिड ले लेता है। इस परिवर्तन की वजह से यह प्रोटीन निरंतर सक्रिय रहता है और कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से विभाजित होकर ट्यूमर तथा कैंसर का कारण बन जाती हैं।

चूंकि कैंसर कई जेनेटिक परिवर्तनों के संयोजन से होते हैं, इसलिए इस नॉक-इन ज़ेब्रा फिश लाइन का उपयोग अन्य संभावित कैंसर पैदा करने वाले उत्परिवर्तनों की जांच के लिए किया गया था। जब BRAF नॉक-इन ज़ेब्रा फिश में SETDB1 नामक एक अन्य सामान्य रूप से देखे जाने वाले मेलेनोमा उत्परिवर्तन को जोड़ा गया, तो तेज़ी से मेलेनोमा विकसित हुआ।

हृदय रोग

हृदय रोगों के क्षेत्र में भी ज़ेब्रा फिश मॉडल बहुत उपयोगी साबित हो रहे हैं। ज़ेब्रा फिश का हृदय हमारे समान चार प्रकोष्ठ वाला नहीं बल्कि दो प्रकोष्ठ का होता है। लेकिन हृदय का शुरुआती विकास लगभग वैसा ही होता है जैसा अन्य एम्नियॉटिक जंतुओं में (एम्नियोटिक जंतु उन्हें कहते हैं जिनमें भ्रूण के विकास के दौरान उसके आसपास एक विशेष झिल्ली (एम्नियॉन) बनती है। इस झिल्ली से बनी एम्नियोटिक थैली (amniotic sac) की बदौलत ही इन जंतुओं के भ्रूण का विकास पानी से बाहर शुष्क वातावरण में भी हो पाता है।चूहों के विपरीत, ज़ेब्रा फिश को भ्रूण अवस्था में जीवित रहने के लिए एक कार्यात्मक हृदय प्रणाली की आवश्यकता नहीं होती है। कारण यह है कि इतने छोटे जंतु को ज़रूरी ऑक्सीजन सीधे विसरण के ज़रिए मिल जाती है। इसलिए, शोधकर्ता गंभीर हृदय विकृतियों वाली ज़ेब्रा फिश में ऐसे शारीरिक अंतरों का अवलोकन कर पाते हैं जिनका अध्ययन चूहों में नहीं किया जा सकता है। 

वैसे कशेरुकी जंतुओं में मायोसाइट एनहांसर फैक्टर (हृदय कोशिकाओं को उन्नत बनाने वाले कारक) के चार रूप पाए जाते हैं Mef2A, Mef2B, Mef2C और Mef2D। जहां इनसे बनाए जाने वाले प्रोटीन्स हृदय के विकास में भूमिका निभाते हैं, वहीं यह भी देखा गया है कि इनमें से Mef2C प्रमुख है।

अब बात आती है ज़ेब्रा फिश की। एक तो हम देख चुके हैं कि ज़ेब्रा फिश कई दिनों तक हृदय के बगैर भी जी पाती हैं। दूसरा, पता चला है कि ज़ेब्रा फिश में जैव-विकास के किसी चरण में Mef2C जीन दो भागों में बंट गया था – Mef2ca और Mef2cb।

2012 के एक शोध से पता चला है कि ज़ेब्रा फिश में Mef2ca और Mef2cb पहले और दूसरे हृदय क्षेत्र दोनों की कोशिकाओं के विभेदन के लिए आवश्यक हैं। Mef2ca और Mef2cb कोशिकीय विभेदन के महत्वपूर्ण नियामक हैं। इस प्रयोग में, शोधकर्ताओं ने यह जांच की कि जब ज़ेब्रा फिश भ्रूण में Mef2ca और Mef2cb दोनों प्रोटीनों की हानि हो जाए तो क्या होता है। पाया गया कि जिन भ्रूणों में Mef2ca और Mef2cb दोनों प्रोटीन की कमी होती है, उनमें हृदय में मांसपेशीय कोशिका विभेदन में दोष होते हैं। हालांकि, आश्चर्यजनक रूप से, Mef2ca या Mef2cb जीन में से किसी एक की कमी हृदय के कार्य को प्रभावित नहीं करती है। इस प्रयोग से स्पष्ट हुआ कि Mef2 गतिविधि सभी हृदय कोशिका विभेदन के लिए आवश्यक है।

विष विज्ञान

एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने डेन्यूब नदी के पानी के विभिन्न नमूनों में ज़ेब्रा फिश रखीं और भ्रूण की असामान्यताओं के विकास का अवलोकन किया। पता चला कि सभी 22 नमूने कुछ हद तक मृत्यु का कारण बन सकते थे। चूंकि शोधकर्ता ज़ेब्रा फिश भ्रूणों के विकास का अवलोकन कर सकते थे, इसलिए उन्होंने इन भ्रूणों में आंखों की विकृतियां, असामान्य रंजक और बहुत कम या न के बराबर रक्त संचार देखा। ज़ेब्रा फिश की मदद से शोधकर्ताओं ने पानी में मौजूद विषैले पदार्थों की पहचान भी की। ज़ेब्रा फिश के भ्रूणों को कृत्रिम रूप से तैयार किए गए एक मिश्रण में डाला गया। कुल मिलाकर उद्देश्य यह पता लगाना था कि क्या ज़ेब्रा फिश का उपयोग पानी की समग्र गुणवत्ता का आकलन करने में किया जा सकता है।

इसी प्रकार के प्रयोग कई अन्य नदियों/तालाबों में किए गए हैं। जैसे मुंबई महानगर की मीठी नदी के पानी का ज़ेब्रा फिश भ्रूणों पर असर 2023 में एन्वायर्मेंटल मॉनीटरिंग एंड असेसमेंट पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। इस अध्ययन के लिए मीठी नदी से 10 स्थानों से पानी के नमूने लिए गए थे। इन सभी नमूनों में ज़ेब्रा फिश भ्रूण विषाक्तता परीक्षण किया गया। प्रयोग में पता चला कि सामान्य पानी में रखे गए भ्रूणों और विभिन्न स्थलों के पानी में रखे गए भ्रूणों के बीच मृत्यु दर, अंडे में कोग्यूलेशन, पेरिकार्डियल एडीमा (pericardial edima), योक थैली के एडीमा, पूंछ की ऐंठन और कंकाल (skeleton) सम्बंधी विकारों की दृष्टि से काफी अंतर रहा। एक तो इस अध्ययन से स्पष्ट हुआ की मीठी नदी का पानी जलीय जीवों के लिए घातक है। साथ ही पानी की गुणवत्ता को परखने के लिए ज़ेब्रा फिश की उपयोगिता भी प्रमाणित हुई।

टॉक्सिकोलॉजी साइंसेस में प्रकाशित एक समीक्षा पर्चे में विष वैज्ञानिक अध्ययनों में ज़ेब्रा फिश के महत्व को रेखांकित किया गया है। इसका उपयोग आणविक स्तर से लेकर पूरे जीव की सेहत और व्यवहार पर असर के अध्ययन तक में किया जा रहा है। दरअसल, समीक्षा पर्चे में कहा गया है कि ज़ेब्रा फिश कांच के उपकरणों (in-vitro) में किए जाने वाले अध्ययनों और उच्चतर जीवों पर असर के बीच एक सेतु बन गया है।

विकास/परिवर्धन की विकृतियां

ज़ेब्रा फिश पर किए गए प्रयोगों से पता चला है कि एक उत्परिवर्ती (हेडलेस) में T-cell factor-3 में उत्परिवर्तन हुआ था जिसके चलते उसके सिर के विकास में गड़बड़ियां पैदा हुईं। इन प्रयोगों से यह स्थापित हुआ कि हेडलेस उत्परिवर्ती Wnt संकेतन मार्ग से नियंत्रित जीन्स का दमन करता है। ये जीन्स कोशिकाओं की संख्यावृद्धि, उनके विभेदन और स्टेम कोशिका (stem cells) अवस्था बनाए रखने का नियंत्रण करते हैं।

इसी प्रकार से ज़ेब्रा फिश ने तंत्रिकाओं की पहचान करने और मस्तिष्क की बनावट (आर्किटेक्चर) को समझने में भी योगदान दिया है। इसमें शुरुआती तंत्रिका प्लेट अवस्था में तंत्रिकाओं के निर्माण से लेकर वयस्क मस्तिष्क के विकास तक की अवस्थाओं को देखा जा सका है।

मानसिक विकार

ज़ेब्रा फिश अत्यंत सामाजिक प्राणी हैं जो झुंड में रहते हैं। लिहाज़ा, इनका उपयोग मानसिक विकारों के व्यवहारगत परीक्षणों में संभव है। चिओल-ही किम व उनके साथियों ने ज़ेब्रा फिश में मानसिक विकारों से सम्बंधित एक जीन समूह की खोज की है। इस जीन परिवार को सैमडोरी (सैम) नाम दिया गया है। पांच जीन्स के इस समूह में से sam2 मस्तिष्क के हैबेन्यूलर न्यूक्लिआई में अभिव्यक्त होता है। इसका सम्बंध बौद्धिक अक्षमता और ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से देखा गया है।        sam2 नॉक-आउट से चूहों व ज़ेब्रा फिश दोनों में भावनात्मक प्रतिक्रिया (जैसे डर और दुश्चिंता) में गड़बड़ी देखी गई जो दुश्चिंता सम्बंधी विकारों और ऑटिज़्म में भी दिखती है।

वायरस संक्रमणों का अध्ययन

हाल के वर्षों में ज़ेब्रा फिश वायरस संक्रमणों की तहकीकात के लिए भी एक मॉडल बनकर उभरा है। ज़ेब्रा फिश पर किए गए प्रयोगों से वायरस की रोगजनन क्रियाविधि, मेज़बान की प्रतिक्रिया तथा संभावित उपचारों की दिशा में मदद मिली है। खास तौर से ज़ेब्रा फिश मॉडल्स से वायरस संख्यावृद्धि, टिशू ट्रॉपिज़्म (tissue tropism) (यानी कोई वायरस किन ऊतकों को संक्रमित करेगा), और प्रतिक्षा तंत्र को चकमा देने की विभिन्न वायरसों की रणनीतियों को उजागर करने में मदद मिली है। इनमें चिकनगुनिया वायरस, डेंगू वायरस, हर्पीस सिम्प्लेक्स वायरस टाइप-1 और इंफ्लुएंज़ा-ए वायरस शामिल हैं।

इसके अलावा कई वायरसों जैसे, सार्स-सीओवी-2, ज़िका वायरस और डेंगू वायरस के खिलाफ विकसित एंटी-वायरल (anti-viral) पदार्थों तथा प्राकृतिक एजेंट्स की प्रभाविता की जांच करने में भी मदद मिली है।

खास तौर से ज़ेब्रा फिश भ्रूणों की पारदर्शिता तथा जेनेटिक तहकीकात की सरलता के चलते वायरस के प्रसार और प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का अध्ययन करना सुगम हुआ है।

ज़ेब्रा फिश की सीमाएं

ज़ेब्रा फिश को एक मॉडल के रूप में इस्तेमाल करने की कुछ सीमाएं भी है। जैसे ज़ेब्रा फिश में ऐसी इंसानी बीमारियों का अध्ययन नहीं किया जा सकता जो ऐसे जीन्स की वजह से होती हैं जो ज़ेब्रा फिश में नहीं पाए जाते। जैसे ज़ेब्रा फिश और मनुष्यों के पैंक्रियास की रचना तो एक सी है लेकिन उनके बीच जेनेटिक अंतर हैं। इस वजह से मोटापे जैसे कई चयापचय रोगों (metabolic diseases) का अध्ययन नहीं हो पाता। इसके अलावा, ज़ेब्रा फिश की मदद से उन अंगों से सम्बंधित अध्ययन भी नहीं किए जा सकते जो ज़ेब्रा फिश में नहीं पाए जाते – जैसे प्रोस्टेट ग्रंथि (prostrate gland), स्तन ग्रंथियां या फेफड़े।

ज़ेब्रा फिश और मनुष्यों के बीच एक बड़ा अंतर यह है कि जहां मनुष्य व अन्य स्तनधारी समतापी होते हैं वहीं ज़ेब्रा फिश (अन्य मछलियों व सरिसृपों के समान) विषमतापी होते हैं यानी इनके शरीर का तापमान आसपास के वातावरण के हिसाब से घटता-बढ़ता रहता है। प्रयोगशालाओं में ज़ेब्रा फिश को कृत्रिम रूप से 28 डिग्री सेल्सियस तापमान रखा जाता है। इसलिए इन पर किए गए प्रयोगों के परिणाम शायद मनुष्यों पर लागू न हो पाएं।

ज़ेब्रा फिश सांस लेने का काम गलफड़ों (gills) से करती है जबकि मनुष्य इसके लिए फेफड़ों का इस्तेमाल करते हैं। इसके चलते ज़ेब्रा फिश में हृदय और गलफड़ों के बीच परिवहन तंत्र नहीं पाया जाता। इसी वजह से कई बीमारियों का अध्ययन ज़ेब्रा फिश मॉडल में नहीं किया जा सकता – जैसे श्वसन रोग, हार्ट अटैक।

कृन्तकों (rodents) के विपरीत ज़ेब्रा फिश और अन्य मछलियां, अंतःप्रजनन (inbreeding) को सहन नहीं कर पातीं और अंतःप्रजनन से तेज़ी से प्रजनन क्षमता खो देती हैं। अंत:प्रजनन इसलिए करवाया जाता है ताकि जेनेटिक संरचना कई पीढ़ियों तक बनी रहे।

ज़ेब्रा फिश पानी में रहती हैं। इनके भ्रूणों के थ्री-डी विश्लेषण (3-D analysis) के दौरान प्रकाश के अपवर्तन की वजह से छवियां ठीक से नहीं बन पातीं। दूसरी दिक्कत यह आती है कि ये भ्रूण हिलते-डुलते रहते हैं।

आम तौर पर किसी दवा का असर जांचने के लिए वह दवा पानी में घोल दी जाती है और भ्रूण उसे गलफड़ों के ज़रिए ग्रहण कर लेते हैं। लेकिन पानी में अघुलनशील दवाइयां इस तरह से देना कठिन होता है।

प्रतिरक्षा के संदर्भ में भी ज़ेब्रा फिश में कुछ महत्वपूर्ण अंतर दिखते हैं।

हालांकि ज़ेब्रा फिश कई वैज्ञानिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं, फिर भी उनकी पूरी क्षमता का उपयोग करने के लिए अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। पिछले कुछ वर्षों में, उच्च-थ्रूपुट तकनीक ने रसायनों और दवाओं की जांच में विषाक्तता परीक्षणों में ज़ेब्रा फिश भ्रूणों के उपयोग की संभावना को बढ़ा दिया है।

प्रयोगशालाओं में ज़ेब्रा फिश उन अनुसंधान क्षेत्रों की पूर्ति कर सकती हैं जिनमें चूहे के मॉडल असफल हुए हैं। शायद अगले कुछ वर्षों में, विज्ञान की अगली बड़ी खोज का श्रेय ज़ेब्रा फिश को दिया जाएगा (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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आंखें प्रकाश संश्लेषण करके अपनी सुरक्षा करेंगी

पौधे प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) नामक प्रक्रिया को अंजाम देते हैं, जिसमें वे सूरज की रोशनी की मदद से कार्बन डाईऑक्साइड और पानी की क्रिया करवाते हैं और कार्बोहायड्रेट बनाते हैं। लेकिन मनुष्यों समेत सभी जंतुओं के पास इस क्रिया के लिए ज़रूरी आणविक मशीनरी नहीं होती।

अब एक अनुसंधान दल ने चूहों और मनुष्यों की कोशिकाओं में प्रकाश संश्लेषण करने वाली संरचना जोड़ने में सफलता प्राप्त कर ली है। इन कोशिकाओं को प्रयोगशाला में तैयार किया गया था। लेकिन यह मत सोचिए कि ये कोशिकाएं प्रकाश संश्लेषण करके कार्बोहायड्रेट बनाकर हमें पोषण प्रदान करेंगी। ये तो हमें मात्र शुष्क आंख (dry eyes) की समस्या से छुटकारा दिलाएंगी।

सेल नामक शोध पत्रिका में सिंगापुर राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के डेविड ताई लियोंग और कुओरान ज़िंग ने बताया है कि उनकी इस रणनीति से आंखों की कोशिकाएं एक ऐसा अणु बनाने लगीं जो शोथ में राहत देता है। इसके अलावा प्रकाश संश्लेषी मशीनरी जोड़ने के बाद शुष्क आंखों की वजह से होने वाली क्षति भी दुरुस्त हो गई।

वैसे तो प्रकाश संश्लेषण करने की क्षमता सिर्फ पौधों, शैवाल और कुछ सूक्ष्मजीवों में ही पाई जाती है। लेकिन कुछ समुद्री स्लग्स हैं जो शैवालों का क्लोरोप्लास्ट चुराकर कुछ अतिरिक्त पोषण प्राप्त कर लेते हैं। गौरतलब है कि क्लोरोप्लास्ट (chloroplast) ही वह कोशिकांग होता है जहां प्रकाश संश्लेषण की क्रिया सम्पन्न होती है।

इस सिलसिले में दो साल पहले टोक्यो विश्वविद्यालय (Tokyo university) के साचीहिरो मात्सुनागा की टीम ने यही करामात प्रयोगशाला में की थी। उन्होंने एक पूरा क्लोरोप्लास्ट मानव कोशिका में प्रत्यारोपित करके उसे दो दिन तक कामकाजी बनाए रखा था।

फिर कई अन्य शोधकर्ता सोचने लगे कि यदि हमारी कोशिकाओं में प्रकाश संश्लेषण की थोड़ी-बहुत क्षमता जोड़ दी जाए, तो वे ऐसे अणु बनाने लगेंगी जिनसे ऊर्जा मिलेगी या शोथ हल्का पड़ जाएगा।

मसलन, 2022 में चीन के एक दल ने गठिया पीड़ित चूहों के घुटनों के जोड़ में कुछ कण इंजेक्ट किए जिनमें प्रकाश संश्लेषी मशीनरी के कुछ हिस्से थे। शोधकर्ताओं ने नेचर में रिपोर्ट किया था कि इन चूहों के घुटनों में उपास्थियों की क्षति धीमी पड़ गई थी। दिक्कत यह है कि हमारे घुटनों को धूप बहुत कम मिलती है। इन चूहों को प्रतिदिन आधे घंटे लाल रोशनी में रखने पर ही उपरोक्त लाभ मिल पाया था।

अलबत्ता, आंखों की बात अलग है। उन पर तो दिन भर रोशनी पड़ती है। तो वर्तमान अध्ययन में लियोंग और ज़िंग ने पालक में से प्रकाश संश्लेषण मशीनरी के प्रमुख हिस्से (थाएलेकॉइड) पृथक किए। इन तश्तरीनुमा रचनाओं में क्लोरोफिल तथा ऊर्जा को कैद करने के लिए ज़रूरी अणु पाए जाते हैं। पूर्व के अध्ययनों में शोधकर्ताओं ने थाएलेकॉइड (thylakoid) के टुकड़ों का इस्तेमाल किया था। लेकिन लियोंग और ज़िंग की टीम ने पूरे के पूरे थायलेकॉइड निकाले और उन्हें छोटे-छोटे कणों में पैक कर दिया।

वैसे तो प्रकाश संश्लेषण का अंतिम उत्पाद ऊर्जा से भरपूर ग्लूकोज़ होता है लेकिन शोधकर्ताओं की रुचि इस प्रक्रिया के दो मध्यवर्ती अणुओं में थी – एटीपी और एनएडीपीएच। ये दोनों ही शोथ को कम कर सकते हैं और तथाकथित ऑक्सीडेंट्स से निजात पाने में कोशिकाओं की मदद कर सकते हैं। रोचक बात है कि शोधकर्ताओं ने पालक आधारित इस पदार्थ को नाम दिया है लीफ (लाइट रिएक्शन एनरिच्ड थायलेकॉइड एनएडीपीएच फाउंड्री – LEAF)।

शोधकर्ताओं का ख्याल था कि कोशिकाओं में एनएडीपीएच (NADPH) का उत्पादन बढ़ने से शुष्क आंख समस्या में मदद मिलेगी। शुष्क आंख समस्या में होता यह है कि पर्याप्त मात्रा में आंसू नहीं बनते जो आंखों में स्नेहक (लुब्रिकेशन) दे सकें। कभी-कभी आंसू बहुत गाढ़े बनते हैं। परिणाम यह होता है कि आंख की सतह में क्षति होने लगती है।

प्रयोग के दौरान चूहों की कल्चर्ड कोशिकाओं ने थायलेकॉइड को अवशोषित कर लिया और ज़्यादा एनएडीपीएच बनाने लगी। टीम ने यह भी देखा कि लीफ प्रदान करने पर शोथ सम्बंधी जीन्स की सक्रियता कम हुई और शोथ से लड़ने वाले तथा ऑक्सीकारकों से निपटने वाले जीन्स की सक्रियता बढ़ी। मानव कॉर्निया (human cornea) से ली गई मानव कोशिकाओं पर भी ऐसे ही असर देखे गए।

ऐसे ही प्रयोग जीवित चूहों पर करने पर LEAF का लाभदायक असर देखने को मिला। अब बारी है इंसानों पर परीक्षणों की। उससे पहले इस उपचार की सुरक्षा व दीर्घावधि असर पर भी विचार करना होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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इंसान बेहोशी में भी सीख सकते हैं!

शीर्षक पढ़ते ही मन में यह सवाल उठता है: क्या ऐसा सचमुच मुमकिन है? हाल ही में हुए एक शोध में वैज्ञानिकों ने ऐसी ही चौंका देने वाली जानकारी को साझा करते हुए पुरानी समझ को चुनौती दी है। नेचर पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया कि साधारण बेहोशी वाली दवा देने के बावजूद भी इंसानी दिमाग (Human Brain) सामान्य अवस्था जैसा सक्रिय (Concious) रहता है। यहां तक कि दिमाग बेहोशी की हालत में भी संकेतों को समझता और आगे का अनुमान लगाता है। पिछले कुछ अध्ययनों में यह पता लगाया जा चुका है कि दिमाग के संवेदना-ग्राही हिस्से बेहोशी की हालत में इंद्रियों के संकेतों से सरल ध्वनियों को दर्ज कर सकते हैं। लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि क्या दिमाग बेहोशी की हालत में समझ और सीख भी सकता है।

इसी का पता लगाने के लिए बेलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन के तंत्रिका वैज्ञानिक समीर शेठ और उनके साथियों ने सात ऐसे मरीज़ों पर अध्ययन किया, जिनका मिर्गी के इलाज के लिए मस्तिष्क का ऑपरेशन किया जा रहा था। सातों को प्रोपोफोल (Propofol) नामक दवा (जनरल एनेस्थीसिया) से बेहोश करके उनके दिमाग की गतिविधि को रिकॉर्ड किया गया।

इस अध्ययन को दो समूहों में बांटकर किया गया था। पहले समूह में, बेहोशी की हालत वाले तीन प्रतिभागियों को अलग-अलग आवृत्ति की बार-बार दोहराई जाने बीप सुनाई गई और बीच-बीच में कुछ अन्य ध्वनियां। दस मिनट तक मस्तिष्क की तंत्रिका गतिविधियां रिकॉर्ड करने से पता चला कि समय के साथ ‘बेहोश’ दिमाग के हिप्पोकैम्पस (Hippocampus) हिस्से में बीप को अन्य ध्वनियों से अलग पहचानने और उनकी अलग-अलग आवृत्तियों के बीच अंतर करने की क्षमता बढ़ती गई। अर्थात लगता है कि दिमाग अचेतन सीखने की क्षमता रखता है।

शेष चार प्रतिभागियों को कुछ वार्तालाप के हिस्से सुनाए गए। दिमागी रिकॉर्डिंग में देखा गया कि कुछ तंत्रिकाएं (Neurons) शब्दों के विशेष हिस्सों पर प्रतिक्रिया दे रहीं थीं (जैसे संज्ञाओं को बाकी शब्दों से अलग पहचानना)। एक शोधकर्ता के अनुसार, ‘बेहोशी (Unconcious) में भी प्रतिभागी यह अनुमान लगाने में समर्थ थे कि अगला शब्द क्या हो सकता है’। आखिर में, बेहोश प्रतिभागियों और सामान्य (बाहोश) प्रतिभागियों के आंकड़ों की तुलना की गई। देखा गया कि सामान्य और बेहोश, दोनों ही तरह के प्रतिभागियों के दिमागों का बर्ताव लगभग एक जैसा रहा।

यह दर्शाता है कि दिमाग का एक हिस्सा – हिप्पोकैम्पस (जो नई यादें बनाने और सीखने की क्षमता के लिए जिम्मेदार है), बेहोश हालत में भी जानकारी का आकलन और अनुमान लगाने में सक्षम है। वैज्ञानिक अभी अन्य तरह से काम करने वाले निश्चेतकों पर भी प्रयोग करना चाहेंगे ताकि और अधिक दृढ़ प्रमाण मिलें जो इस प्रयोग के परिणामों की पुष्टि कर सकें।

इस जानकारी का इस्तेमाल चिकित्सा क्षेत्र में किया जा सकता है। इन आंकड़ों की मदद से ऐसे मरीज़ों का उपचार संभव हो सकेगा जो कोमा या निष्क्रिय हालत से पीड़ित हैं। इससे दिमाग के क्षतिग्रस्त हिस्सों को छोड़कर, बाकी बचे हुए सही हिस्सों को कृत्रिम रूप से सक्रिय करने में मदद मिल सकेगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या खून के थक्के कृत्रिम तरीके से जम सकते हैं?

आम तौर पर जब त्वचा कटने पर खून बहना शुरू हो जाता है तो सामान्यत: कुछ देर बाद बहाव बंद हो जाता है और चोट की जगह पर खून का थक्का जम जाता है। इसमें चोट के स्थान पर तो खून का बहाव रुक जाता है, जबकि दूसरे अंगों में रक्त संचार अपनी गति से होता रहता है। चिकित्सा विज्ञान में इसे हीमोस्टेसिस कहते हैं। रक्तस्राव रोकने की यह प्रक्रिया तीन चरणों में होती है। सबसे पहले रक्त वाहिनियां सिकुड़ती हैं – यानी चोट के स्थान की रक्तवाहिनी सिकुड़ती है ताकि बहाव कम किया जा सके। इसके बाद प्लेटलेट्स चिपककर गुच्छा बना लेती हैं। प्लेटलेट्स रक्त की कोशिकाएं हैं जिनका मुख्य कार्य क्षतिग्रस्त रक्त नलिकाओं की मरम्मत करना है। इनके चिपककर गुच्छा बनाने से दीवार जैसी अस्थाई संरचना बन जाती है। अंत में, ‘फाइब्रिन जाल’ बनता है। प्लेटलेट्स के गुच्छे पर रेशेदार प्रोटीन फाइब्रिन एक जाली बना देता है। ये जालियां ही खून के थक्के को मज़बूत बनाकर रक्तस्राव बंद कर देती हैं।

हाल ही में नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार वैज्ञानिकों ने हीमोस्टेसिस को ज़्यादा प्रभावी बनाने का प्रयास किया है। उन्होंने ‘क्लिक केमिस्ट्री’ तकनीक का इस्तेमाल करके चूहों पर प्रयोग किए। दावा है कि रक्तस्राव रोकने की यह तकनीक जिसे ‘क्लिक क्लॉटिंग’ नाम दिया गया है, लाल रक्त कोशिकाओं को आपस में जोड़कर रक्त के थक्के कम समय में बना देती है। परीक्षण के दौरान, चूहों का रक्तस्राव प्राकृतिक प्रक्रिया के मुकाबले ज़्यादा तेजी से रुक गया। हालांकि प्राकृतिक रूप से यह कार्य प्लेटलेट्स कोशिकाओं का है, लेकिन उसमें थक्का बनने की क्रिया धीमी, कमज़ोर और अस्थायी होती है, और आपातकालीन स्थिति या गहरी चोट के दौरान व्यर्थ खून बहना जानलेवा साबित होता है।

पूर्व में, वैज्ञानिकों का ध्यान प्लेटलेट आधारित तकनीक पर था। लेकिन इस परीक्षण से वैज्ञानिकों को लगता है कि लाल रक्त कोशिकाओं को संशोधित कर सुरक्षित और बेहतर हीमोस्टेसिस किया जा सकता है। इसका मुख्य कारण यह है कि लाल रक्त कोशिकाएं अधिक लचीली और टिकाऊ होती हैं। इसलिए वैज्ञानिकों ने प्रभावी हीमोस्टेसिस के लिए लाल रक्त कोशिकाओं को बेहतर विकल्प माना।

क्या है ‘क्लिक केमिस्ट्री’?

दरअसल, ‘क्लिक केमिस्ट्री’ रासायनिक अभिक्रियाओं का समूह है जिसमें दो या अधिक अणु आपस में तुरंत और सटीक तरीके से जुड़ जाते हैं। यह बहुत तेज़, सरल और सुरक्षित है। इसमें कोशिकाओं में कुछ खास कार्यात्मक समूहों को डाले जाते हैं, जिससे वे समूह कार्य के अनुरूप, लक्ष्य अनुसार भूमिका निभाते हैं व दूसरे अणुओं या क्रियाओं से हस्तक्षेप नहीं करते। यह शरीर की सामान्य क्रियाओं में कोई बाधा नहीं डालती।

भविष्य में इस शोध के सफल होने से चिकित्सा में बदलाव देखने को मिल सकते हैं। खून का बहाव चुटकियों में रोक सकेंगे। दुर्घटनाओं, युद्ध क्षेत्र, और लंबी सर्जरी के दौरान होने वाले गंभीर रक्तस्राव, जो जीवन और मृत्यु का फैसला करता है, का नियंत्रण हो पाएगा। (स्रोत फीचर्स)

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पानी की जांच से जैव विविधता के सुराग

न्यूयॉर्क के बीच बहने वाली ईस्ट रिवर के बाल्टी भर पानी ने रॉकफेलर विश्वविद्यालय के मार्क स्टोकेल को न्यूयॉर्क शहर के जीवन के बारे में हैरान करने वाली जानकारी दी है। नदी के पानी में मौजूद डीएनए के छोटे-छोटे खंडों का अध्ययन करके उन्होंने उसमें पाई जाने मछलियों, शहर के जीवों, लोगों की सेहत और उनके खानपान की आदतों तक के बारे में संकेत पाए। अध्ययन दिखाता है कि पर्यावरणीय डीएनए (eDNA) पर्यावरण को समझने का एक तेज़ और सस्ता तरीका बनता जा रहा है।

यह शोध प्लॉस वन में प्रकाशित हुआ है। स्टोकेल और साथियों ने एक साल तक हर हफ्ते ईस्ट रिवर से पानी के नमूने लिए। फिर उन्होंने उस पानी में मौजूद डीएनए के छोटे-छोटे खंडों की जांच की, जो जीवों की त्वचा, बाल, गंदगी या दूसरे जैविक पदार्थों के ज़रिए पानी में पहुंचे थे।

अध्ययन में पता चला कि शहर के बीच बहने वाली यह नदी जीवों से भरपूर और लगातार बदलने वाला पारिस्थितिकी तंत्र है। वैज्ञानिकों ने इसमें 71 मछली प्रजातियां पहचानीं, जिनमें कुछ ऐसी भी थीं जो पहले इस इलाके में बहुत कम दिखाई देती थीं, और अब अच्छी संख्या में दिखाई दे रही हैं। अध्ययन यह दिखाता है कि ईस्ट रिवर अब पहले की तुलना में काफी साफ हो चुकी है।

गौरतलब है कि पर्यावरणीय डीएनए तकनीक पानी, मिट्टी या हवा में मौजूद जीवों के छोड़े गए छोटे-छोटे डीएनए खंडों के विश्लेषण पर आधारित है। सभी जीव लगातार अपनी कोशिकाएं और गंदगी छोड़ते रहते हैं, इसलिए उनका डीएनए कुछ दिनों तक वातावरण में बना रह सकता है।

पारंपरिक तरीकों में नाव, जाल, ट्रैप या गोताखोरों की ज़रूरत पड़ती है, लेकिन eDNA तकनीक बहुत कम उपकरण और खर्च में बड़ी मात्रा में जानकारी दे सकती है। यह ऐसी मुश्किल जगहों में उपयोगी है, जहां तेज़ धाराएं और चट्टानी इलाका सामान्य जांच को कठिन बना देते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, पूरे एक साल के इस अध्ययन का खर्च किसी रिसर्च बोट को सिर्फ एक दिन चलाने जितना था।

वैज्ञानिकों को नदी के पानी में सिर्फ मछलियों के ही नहीं, बल्कि ज़मीन पर रहने वाले जीवों के डीएनए भी मिले। वैज्ञानिकों को गिलहरी, रैकून, बीवर, गाय, सूअर, मुर्गियों और चूहों के डीएनए के संकेत मिले, जो शायद गंदे पानी और बारिश के बहाव के ज़रिए नदी तक पहुंचे थे। खासकर चूहों का डीएनए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे भविष्य में शहरों में चूहों की बढ़ती संख्या का जल्दी पता लगाया जा सकता है। दिलचस्प बात यह रही कि पानी में मिले जीवों के डीएनए का अनुपात लोगों के मांस खाने के आंकड़ों से काफी मेल खाता था। इससे संकेत मिलता है कि eDNA तकनीक भविष्य में लोगों की खानपान की आदतों और स्वास्थ्य के रुझानों को समझने में मदद कर सकती है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि पहली बार गंदे पानी से मिले eDNA का इस्तेमाल लोगों की खानपान की आदतों को इतने विस्तार से समझने के लिए किया गया है।

विशेषज्ञ eDNA को पर्यावरण और वन्यजीवों की निगरानी के लिए एक बहुत उपयोगी नई तकनीक मानते हैं। यह जीवों की सही-सही संख्या तो नहीं बता सकती, लेकिन यह ज़रूर दिखा सकती है कि कोई प्रजाति समय के साथ बढ़ रही है या घट रही है। इससे पर्यावरण में हो रहे बदलावों और बाहरी प्रजातियों के फैलाव का जल्दी पता लगाया जा सकता है।

यह तकनीक अब दुनिया के कई हिस्सों में इस्तेमाल हो रही है। कनाडा में दुर्लभ वनबिलावों (लिंक्स) का पता लगाने से लेकर माउंट एवरेस्ट के आसपास पिघले बर्फ के पोखरों में तितलियों की प्रजातियों की पहचान तक, eDNA कई जगहों पर मदद कर रहा है।

हालांकि वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि eDNA पारंपरिक पर्यावरणीय जांच तरीकों की पूरी जगह नहीं ले सकती। लेकिन यह एक पूरक के तौर पर उन्हें और मज़बूत बना सकती है। हवा-पानी के नमूनों से पर्यावरण की विस्तृत जानकारी निकालकर यह तकनीक शहरों और प्रकृति की अदृश्य दुनिया को समझने का नया रास्ता खोल रही है, और यह जानने में मदद कर रही है कि प्राकृतिक दुनिया कैसे बदल रही है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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