चिंता का सबब बना अंतरिक्ष में फैला कचरा – प्रदीप

बीते दिनों गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कई इलाकों में आसमान से आग के गोले गिरते दिखाई दिए थे। कई जगह पर ठोस रूप में इन्हें धरती पर गिरते हुए भी देखा गया। इस तरह की आसमानी घटनाओं के संदर्भ में वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अंतरिक्ष का कचरा या मलबा हो सकता है। अगर यह मलबा ज़्यादा बड़े आकार का होता और किसी आवासीय क्षेत्र में गिरता तो जानमाल को भी भारी नुकसान पहुंचा सकता था।

दरअसल अंतरिक्ष में एकत्रित हो रहा मलबा भविष्य में धरती पर रह रहे लोगों के साथ-साथ यहां सक्रिय तमाम उपग्रहों, अंतरिक्ष यात्रियों और अंतरिक्ष स्टेशनों के लिए भी बेहद घातक साबित हो सकता है। इतना ही नहीं, इससे हमारी संचार व्यवस्था के भी प्रभावित होने की आशंका पैदा हो सकती है। ऐसे में जिस तरह से आज आधुनिक तकनीक आधारित तमाम गैजेट्स हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन गए हैं, उससे अलग तरह के नुकसान की आशंका भी हो सकती है।

यदि हम अंतरिक्ष में मौजूद तमाम मानव जनित पदार्थों की बात करें तो एक अनुमान के मुताबिक छोटे-बड़े मिलाकर लगभग 17 करोड़ पुराने रॉकेट और बेकार हो चुके उपग्रहों के टुकड़े आठ किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से पृथ्वी की कक्षा में चक्कर लगा रहे हैं। आपस में टक्कर होने से ये और भी छोटे टुकड़ों में बंट रहे हैं जिससे इनकी संख्या में दिनों-दिन बढ़ोतरी हो रही है।

ब्रिटिश खगोल विज्ञानी रिचर्ड क्राउटडर के अनुसार इस सम्बंध में सबसे बड़ी समस्या यह है कि पृथ्वी से लगभग 36 हज़ार किलोमीटर ऊपर की भू-स्थैतिक कक्षा में अंतरिक्ष कचरे के जमघट और आपसी टक्कर के परिणामस्वरूप दुनिया की संचार व्यवस्था भी चौपट हो सकती है। इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अंतरिक्ष में आठ किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से चक्कर काट रहे सिक्के के आकार की किसी वस्तु से किसी दूसरे सिक्के के आकार वाली वस्तु की टकराहट होती है तो उससे वैसा ही प्रभाव होगा जैसा धरती पर लगभग सौ किलोमीटर की रफ्तार से चल रही दो बसों की टक्कर से होता है। अंतरिक्ष में तैरते कचरे से टकराने पर अंतरिक्ष यान और सक्रिय उपग्रह नष्ट हो सकते हैं। इसके साथ ही, धरती पर इंटरनेट, जीपीएस, टेलीविज़न प्रसारण जैसी अनेक आवश्यक सेवाएं भी बाधित हो सकती हैं।

अंतरिक्ष में मानवीय दखल का इतिहास कोई बहुत पुराना नहीं है। महज छह दशक पहले ही पहली बार इंसान ने अंतरिक्ष में अपनी उपस्थिति दर्ज थी। उल्लेखनीय है कि अक्टूबर 1957 में तत्कालीन सोवियत संघ द्वारा अंतरिक्ष में भेजे गए पहले मानव निर्मित सेटेलाइट स्पुतनिक-1 के बाद से हज़ारों रॉकेट, सेटेलाइट, स्पेस प्रोब और टेलीस्कोप अंतरिक्ष में भेजे गए हैं। लिहाज़ा समय के साथ अंतरिक्ष में कचरा बढने की रफ्तार भी बढ़ती गई। यह कुछ-कुछ वैसा ही है, जैसे पृथ्वी के कई पहाड़ों पर अत्यधिक पर्वतारोहण की वजह से तरह-तरह के कूड़े-करकट के अंबार लगे हैं। अंतरिक्ष में पृथ्वी की कक्षा में कबाड़ की एक चादर फैल गई है। एक अनुमान के अनुसार पिछले 25 वर्षों में अंतरिक्ष में कचरे की मात्रा दुगनी से भी ज़्यादा हो गई है।

अंतरिक्ष का कचरा मानव जाति और इस पृथ्वी के समस्त जीव जगत के लिए घातक है। अगर ये अनियंत्रित लाखों डिग्री सेल्सियस ताप पर दहकते टुकड़े घनी बस्तियों पर गिरते हैं तो जानमाल की बड़ी हानि हो सकती है। वर्ष 2001 में कोलंबिया स्पेस शटल की दुर्घटना में भारतीय मूल की कल्पना चावला समेत सात अन्य अंतरिक्ष यात्रियों की जानें चली गई थीं। इस दुर्घटना के अलग-अलग कारण बताए जाते हैं, लेकिन कुछ रिपोर्टों में यह आशंका जताई गई थी कि अंतरिक्ष में भटकते एक टुकड़े से टकराने की वजह से यह भीषण त्रासदी हुई थी।

जिस तरह से सभी देश अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों को अंजाम दे रहे हैं, उसके चलते तो अंतरिक्ष में भीड़ और भी बढ़ेगी और इससे दुर्घटनाओं की आशंका भी बढ़ेगी। तो फिर इस समस्या का समाधान क्या है? इसके जवाब में वैज्ञानिक कहते हैं कि अंतरिक्ष से कचरे को एकत्रित करके वापस धरती पर लाना ही इस समस्या का एकमात्र समाधान है। दूसरे शब्दों में, अंतरिक्ष में भी धरती की ही तरह स्वच्छता अभियान चलाने की आवश्यकता है। परंतु यह काम इतना आसान भी नहीं है। ऐसे में सभी देश यदि चाहें तो कम से कम इतना तो अवश्य किया जा सकता है कि जो भी देश अंतरिक्ष में जितना कचरा पैदा कर रहा है, वह उसे वापस लाने का खर्च वहन करे। इससे अंतरिक्ष में पैदा होने वाले कचरे पर लगाम लगाई जा सकती है हालांकि इस काम की तकनीकी समस्याएं फिर भी रहेंगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चांद की बर्फ प्राचीन चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा संरक्षित है

चंद्रमा के ध्रुवों पर उपस्थित बर्फ वैज्ञानिकों के लिए कौतूहल का विषय होने के साथ आगामी मानव अभियानों के लिए एक संभावित संसाधन भी है। हाल ही में चंद्रमा जैसे शुष्क स्थान पर लंबे समय से बर्फ के उपस्थित होने का कारण का पता लगाया गया है। शोधकर्ताओं के अनुसार कुछ ध्रुवीय क्रेटर प्राचीन चुम्बकीय क्षेत्र के कारण संरक्षित हैं।       

गौरतलब है कि चंद्रमा का अपने अक्ष पर झुकाव पृथ्वी के 23.4 डिग्री की तुलना में मात्र 1.5 डिग्री है। कम झुकाव के कारण सूर्य आसमान में बहुत ऊपर नहीं उठता और सूर्य की किरणें इन क्रेटर्स के अंदर पहुंच नहीं पातीं। यहां तापमान शून्य से 250 डिग्री सेल्सियस से भी कम रहता है। यहां कुछ गड्ढों में पानी और बर्फ के साक्ष्य मिले हैं। 2018 में भारत के चंद्रयान-1 ने भी ध्रुवीय बर्फ के साक्ष्य प्रदान किए थे।     

चंद्रमा पर बर्फ के अस्तित्व की व्याख्या एक चुनौती रही है। हालांकि वहां सूर्य की रोशनी तो नहीं पहुंच सकती लेकिन सौर हवाएं तो पहुंच सकती हैं जो बर्फ को अणु-अणु-दर नष्ट कर सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इन सौर हवाओं के चलते बर्फ को कुछ लाख वर्षों में पूरी तरह नष्ट हो जाना चाहिए था।

लिहाज़ा, युनिवर्सिटी ऑफ एरिज़ोना के ग्रह वैज्ञानिक लोन हुड और उनके सहयोगियों ने बर्फ के बचे रहने का कारण समझने का प्रयास किया। ल्यूनर एंड प्लेनेटरी साइंस कांफ्रेंस में हुड ने बताया कि चंद्रमा के सुदूर अतीत की चुम्बकीय विसंगतियां कई ध्रुवीय क्रेटर की रक्षा कर रही हैं। ये विसंगतियां सौर हवा को विक्षेपित करने की क्षमता रखती हैं और सूर्य की किरणों से ओझल क्रेटर्स में बर्फ को सुरक्षित रखने में भूमिका निभाती हैं।     

गौरतलब है 1971 और 1972 के अपोलो 15 और 16 मिशनों के बाद से ही असामान्य चुम्बकीय शक्ति वाले क्षेत्रों को मापा गया था। हालांकि, स्पष्ट रूप से तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन संभावना है कि इनकी उत्पत्ति 4 अरब वर्ष पूर्व हुई होगी जब चंद्रमा पर चुम्बकीय क्षेत्र उपस्थित था और लौह से भरपूर क्षुद्रग्रह इसकी सतह से टकराए होंगे। इन टक्करों के नतीजे में पिघला हुआ पदार्थ स्थायी रूप से चुम्बकित हो गया होगा।

हुड ने 2007 से 2009 के बीच चंद्रमा की परिक्रमा करने वाले एक जापानी अंतरिक्ष यान कागुया के डैटा का उपयोग करके दक्षिण ध्रुव का विस्तार से अध्ययन किया। उन्हें स्थायी रूप से ओझल कम से कम दो क्रेटर मिले जो इन विसंगतियों से प्रभावित थे। हालांकि चुम्बकीय क्षेत्र अत्यंत कमज़ोर है लेकिन सौर हवाओं को विक्षेपित करने के लिए पर्याप्त हो सकता है।

निकट भविष्य में चंद्रमा पर कई अभियान पहुंचने की अपेक्षा है। नासा मनुष्यों को भी भेजने की योजना बना रहा है। चंद्रमा की बर्फ के अध्ययन से पता चलेगा कि चांद पर पानी कैसे पहुंचा था और पृथ्वी पर पानी की उपस्थिति की गुत्थी भी सुलझ सकती है।    

चुम्बकीय क्षेत्र के सुरक्षात्मक प्रभाव की पुष्टि करने के लिए और डैटा ज़रूरी है। इसके लिए हुड चंद्रमा की सतह पर सौर पवन उपकरण लगाना चाहते हैं ताकि क्रेटर के किनारों से गुज़रने वाले आवेशित कणों का मापन किया जा सके। (स्रोत फीचर्स) 

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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सूर्य के पड़ोसी तारे का पृथ्वी जैसा ग्रह मिला

हाल ही में खगोलविदों ने एक नए ग्रह की खोज की है। यह सूर्य के निकटतम तारे प्रॉक्सिमा सेंटोरी की परिक्रमा करने वाला तीसरा ग्रह है जिसे प्रॉक्सिमा सेंटोरी-डी नाम दिया गया है, और यहां तरल पानी का समंदर होने की संभावना है।

युनिवर्सिटी ऑफ पोर्तो के इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिज़िक्स एंड स्पेस साइंस के खगोलविद जोआओ फारिया और उनके साथियों ने प्रॉक्सिमा सेंटोरी तारे से आने वाले प्रकाश वर्णक्रम में सूक्ष्म विचलन को मापकर प्रॉक्सिमा सेंटोरी-डी का पता लगाया है – ग्रह का गुरुत्वाकर्षण परिक्रमा के दौरान सूर्य को अपनी ओर खींचता है। खगोलविदों ने एस्प्रेसो नामक एक अत्याधुनिक दूरबीन की मदद से यह ग्रह खोजा है। यह दूरबीन चिली की युरोपीय दक्षिणी वेधशाला में स्थापित है। ये नतीजे एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिज़िक्स पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं।

‘डगमगाने’ की इस तकनीक में पृथ्वी की सीध में तारे की गति में बदलाव देखा जाता है; एस्प्रेसो 10 सेंटीमीटर प्रति सेकंड तक की डगमग भी पता लगा सकता है। फारिया बताते हैं कि प्रॉक्सिमा सेंटोरी पर ग्रह का कुल प्रभाव लगभग 40 सेंटीमीटर प्रति सेकंड तक है।

विचलन का पता लगाने के लिए शोधकर्ताओं ने दो वर्ष से कुछ अधिक समय तक प्रॉक्सिमा सेंटोरी के वर्णक्रम के 100 से अधिक अवलोकन किए। एस्प्रेसो को वेधशाला के एक विशेष कमरे में एक (भूमिगत) टंकी के अंदर रखा गया है ताकि इसका दाब और तापमान स्थिर रहे। इससे माप सुसंगत रहते हैं और दोहराए जा सकते हैं। एस्प्रेसो वर्णक्रम की तरंग दैर्ध्य को 10-5 ऑन्गस्ट्रॉम तक, यानी हाइड्रोजन परमाणु के व्यास के दस-हज़ारवें हिस्से तक सटीकता से माप सकता है।

तारे के स्पेक्ट्रम पर पड़ने वाले इसके प्रभाव के आधार पर शोधकर्ताओं का अनुमान है कि यह ग्रह संभवत: पृथ्वी से छोटा है, लेकिन इसका द्रव्यमान हमारी पृथ्वी के द्रव्यमान के 26 प्रतिशत से कम नहीं है।

एस्प्रेसो को मुख्य रूप से बाह्य ग्रहों की खोज करने के साथ-साथ क्वासर जैसे अत्यंत उज्ज्वल दूरस्थ पिण्डों से आने वाले प्रकाश का अध्ययन करने के लिए बनाया गया था।

खगोलविदों के लिए प्रॉक्सिमा सेंटोरी का एक विशेष महत्व है। हमारा नज़दीकी तारा होने के कारण इसके बारे में हमेशा बहुत उत्सुकता रही है। यह जानना रोमांचक है कि तीन छोटे ग्रह हमारे इस निकटतम पड़ोसी तारे की परिक्रमा कर रहे हैं। उनकी समीपता ही आगे अध्ययन का मुख्य कारण है – उनकी प्रकृति कैसी है और वे कैसे बने वगैरह। (स्रोत फीचर्स)

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कुछ धूमकेतु हरे क्यों चमकते हैं?

र्ष 2014 में लवजॉय नाम का धूमकेतु (पुच्छल तारा) अपनी धुंधली हरी आभा के साथ दिखाई दिया था। ऐसी ही हरी चमक कुछ अन्य धूमकेतुओं में भी देखी गई है। अब, प्रयोगशाला में किए गए एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इस रंगीन चमक का कारण पता लगाया है।

वैज्ञानिकों को यह तो अंदेशा था कि धूमकेतुओं के आसपास की हरे रंग की आभा डाईकार्बन (C2) नामक एक अभिक्रियाशील अणु के टूटने से आती है। इसकी पुष्टि के लिए शोधकर्ताओं ने कार्बन क्लोराइड (C2Cl4) से अल्ट्रावायलेट लेज़र की मदद से क्लोरीन परमाणुओं को अलग कर दिया और फिर शेष रहे डाईकार्बन अणुओं पर उच्च-तीव्रता वाला प्रकाश डाला। नतीजतन हुई रासायनिक अभिक्रिया ने शोधकर्ताओं को आश्चर्यचकित कर दिया।

प्रोसिडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस में शोधकर्ताओं ने बताया है कि डाईकार्बन अणु ने प्रकाश का एक फोटॉन अवशोषित करके हरा फोटॉन उत्सर्जित करने की बजाय दो फोटॉन अवशोषित किए, और फिर टूटकर हरे रंग का प्रकाश उत्सर्जित किया। पहले अवशोषित फोटॉन से डाईकार्बन अणु एक अर्ध-स्थिर अवस्था में पहुंचा, और दूसरे अवशोषित फोटॉन से और अधिक ऊर्जा लेकर यह अस्थिर अवस्था में पहुंचा और टूट गया। इस अभिक्रिया में हरे रंग का फोटॉन उत्सर्जित हुआ।

इस प्रक्रिया में डाईकार्बन अणु दो बार ऊर्जा लेकर अवस्था परिवर्तन (ट्रांज़िशन) करता है। आम तौर पर रसायनज्ञ मानते हैं कि ऐसे ट्रांज़िशन निषिद्ध है। हालांकि भौतिकी के नियम अनुसार ये ट्रांज़िशन पूरी तरह निषिद्ध भी नहीं हैं। ये ट्रांज़िशन प्रयोगशाला में नहीं देखे जाते क्योंकि प्रयोगशाला में अणु अपेक्षाकृत पास-पास होते हैं। लेकिन अंतरिक्ष में अणु काफी दूर-दूर होते हैं और शायद ही कभी अन्य अणुओं या परमाणुओं के संपर्क में आते हैं।

डाईकार्बन अणु का जीवनकाल दो दिन से भी कम समय का होता है। प्रयोगों के दौरान एकत्रित डैटा से पता चलता है कि सूर्य से पृथ्वी की दूरी के मुताबिक, इससे यह समझने में मदद मिलती है कि अणु के टूटने से जुड़ी हरी चमक केवल धूमकेतु के सिर के आसपास ही क्यों दिखाई देती है, इसकी पूंछ में यह कभी क्यों दिखाई नहीं देती। (स्रोत फीचर्स)

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नोबेल पुरस्कार: भौतिक शास्त्र

इस वर्ष भौतिकी का नोबेल पुरस्कार तीन वैज्ञानिकों को दिया गया है। इन तीनों ने स्वतंत्र रूप से काम करते हुए जटिल तंत्रों व परिघटनाओं के अध्ययन के तौर-तरीके विकसित किए और जलवायु को समझने के लिए मॉडल विकसित करने में मदद की।

प्रिंसटन विश्वविद्यालय, यू.एस. के स्यूकुरो मनाबे और मैंक्स प्लांक मौसम विज्ञान विभाग, जर्मनी के क्लॉस हैसलमान ने पृथ्वी के जलवायु सम्बंधी हमारे ज्ञान की बुनियाद रखी और दर्शाया कि हम मनुष्य इसे कैसे प्रभावित करते हैं। इटली के सैपिएंज़ा विश्वविद्यालय के जियार्जियो पैरिसी ने बेतरतीब और अव्यवस्थित परिघटनाओं को समझने के क्षेत्र में क्रांतिकारी योगदान दिया।

जटिल तंत्र वे होते हैं जिनमें कई घटक होते हैं और वे एक-दूसरे के साथ कई अलग-अलग ढंग से परस्पर क्रिया करते हैं। ज़ाहिर है, इनका विवरण गणित की समीकरणों में नहीं समेटा जा सकता – कई बार तो ये संयोग के नियंत्रण में होते हैं।

जैसे मौसम को ही लें। मौसम पर न सिर्फ कई कारकों का असर होता है बल्कि कभी-कभी शुरुआती तनिक से विचलन से आगे चलकर असाधारण असर देखने को मिलते हैं। मनाबे, हैसलमान और पैरिसी ने ऐसे ही तंत्रों-परिघटनाओं को समझने तथा उनके दीर्घावधि विकास का पूर्वानुमान करने में योगदान दिया है।

मनाबे धरती की जलवायु के भौतिक मॉडल की मदद से यह दर्शा पाने में सफल रहे कि कैसे वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड की बढ़ती सांद्रता के साथ धरती का तापमान बढ़ता है। इसी काम को आगे बढ़ाते हुए हैसलमान ने वह मॉडल विकसित किया जिसमें मौसम और जलवायु की कड़ियां जोड़ी जा सकती हैं। उन्होंने ऐसे संकेतक भी विकसित किए जिनकी मदद से जलवायु पर मनुष्य के प्रभाव को आंका जा सकता है। मनाबे व हैसलमान द्वारा विकसित मॉडल से यह स्पष्ट हुआ कि धरती के तापमान में हो रही वृद्धि मूलत: मानव-जनित कार्बन डाईऑक्साइड की वजह से हो रही है।

इन दोनों से अलग पैरिसी ने अव्यवस्थित जटिल पदार्थों में पैटर्न खोज निकाले। उनकी खोज के फलस्वरूप आज हम भौतिकी के साथ-साथ गणित, जीव विज्ञान, तंत्रिका विज्ञान और मशीन लर्निंग जैसे क्षेत्रों में सर्वथा बेतरतीब पदार्थों और परिघटनाओं को समझ पा रहे हैं। (स्रोत फीचर्स)

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हबल दूरबीन लौट आई है!

प्रतिष्ठित अंतरिक्ष दूरबीन हबल में लगभग एक महीने पहले कंप्यूटर सम्बंधी गड़बड़ी आ जाने के कारण उसने काम करना बंद कर दिया था, अब यह फिर से काम करने लगी है। साइंस पत्रिका के अनुसार दूरबीन का नियंत्रण ऑपरेटिंग पेलोड कंट्रोल कंप्यूटर से हटाकर बैकअप उपकरणों पर लाने के बाद हबल दूरबीन के सभी उपकरणों के साथ पुन: संवाद स्थापित कर लिया गया है।

दरअसल 13 जून को हबल के विज्ञान उपकरणों को नियंत्रित करने वाला और इनकी सेहत की निगरानी करने वाला पेलोड कंप्यूटर उपकरणों के साथ संवाद नहीं कर पा रहा था, इसलिए उसने इन्हें सामान्य मोड से हटाकर सुरक्षित मोड में डाल दिया था। हबल के ऑपरेटरों को पहले तो लगा कि मेमोरी मॉड्यूल में गड़बड़ी हुई होगी जिसके चलते यह समस्या हो रही है। लेकिन तीन में से एक बैकअप मॉड्यूल पर डालने के बावजूद भी समस्या बरकरार थी। कई अन्य उपकरणों को भी जांचा गया लेकिन गड़बड़ी का कारण उनमें भी नहीं मिला।

अंतत: यह निर्णय लिया गया कि पूरी की पूरी साइंस इंस्ट्रूमेंट कमांड एंड डैटा हैंडलिंग (SIC&DH) युनिट को बैकअप पर डाल दिया जाए, पेलोड कंप्यूटर इस युनिट का ही एक हिस्सा है। मरम्मत दल ने पहले पृथ्वी पर ही हार्डवेयर के साथ इस पूरी प्रक्रिया का अभ्यास किया और यह सुनिश्चित किया कि ऐसा करने से दूरबीन को कोई अन्य नुकसान न पहुंचे। युनिट को जैसे ही स्थानांतरित करना शुरू किया गया समस्या की जड़ पकड़ में आ गई। समस्या SIC&DH के पावर कंट्रोल युनिट में थी। यह युनिट पेलोड कंप्यूटर को स्थिर वोल्टेज देता है और समस्या इस कारण थी कि या तो सामान्य से कम-ज़्यादा वोल्टेज मिल रहा था या वोल्टेज का पता लगाने वाला सेंसर गलत रीडिंग दे रहा था। चूंकि SIC&DH में अतिरिक्त पॉवर कंट्रोल युनिट भी होती है इसलिए पूरी युनिट को बैकअप पर डाला जाना जारी रहा।

हबल मिशन कार्यालय के प्रमुख टॉम ब्राउन ने बताया कि SIC&DH के साइड ए पर हबल को सामान्य मोड में सफलतापूर्वक ले आया गया है। यदि सब कुछ सामान्य रहा तो इस सप्ताहांत तक हबल फिर से अवलोकन का अपना काम शुरू कर देगा। (स्रोत फीचर्स)

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नासा की शुक्र की ओर उड़ान

हाल ही में नासा ने शुक्र ग्रह पर दो यान भेजने की घोषणा है। शुक्र हमारा पड़ोसी है और अत्यधिक गर्म है। इस मिशन का उद्देश्य यह समझना है कि शुक्र ऐसा आग का गोला कैसे बन गया जहां लेड भी पिघल जाता है, पृथ्वी कैसे विकसित हुई और पृथ्वी पर जीवन योग्य परिस्थितियां कैसे बनीं?

इन दो अंतरिक्ष यान में से एक यान है DAVINCI+ (डीप एटमॉस्फियर वीनस इनवेस्टिगेशन ऑफ नोबेल गैसेस, कैमिस्ट्री एंड इमेजिंग)। यह शुक्र पर कार्बन डाईऑक्साइड और सल्फ्यूरिक एसिड से संतृप्त विषाक्त बादलों की मोटी परत का अध्ययन करेगा। दूसरा यान है VERITAS (वीनस एमिसिविटी, रेडियो साइंस, इनसार, टोपोग्राफी एंड स्पेक्ट्रोस्कोपी) जो शुक्र की सतह का विस्तृत नक्शा बनाएगा और इसका भूगर्भीय इतिहास पता लगाएगा।

आकार और द्रव्यमान में शुक्र लगभग पृथ्वी के समान है। दूसरी ओर, पृथ्वी के विपरीत इसका वातावरण अत्यंत गर्म और दुर्गम है, लेकिन इस पर कभी हमारी पृथ्वी की तरह समशीतोष्ण वातावरण और समुद्र रहे होंगे। शुक्र की परिस्थितियों में यह बदलाव कैसे आए, इसे समझना यह समझने के लिए भी महत्वपूर्ण है कि वास्तव में शुक्र और पृथ्वी में कितनी समानता थी।

नासा के इस मिशन की घोषणा भूले-बिसरे ग्रह शुक्र में अंतरिक्ष विज्ञानियों की बढ़ती दिलचस्पी के दौर में हुई है। अमेरिका का अंतिम शुक्र मिशन, मैजेलन, वर्ष 1994 में समाप्त हुआ था। उसके बाद युरोप और जापान ने अपने यान शुक्र पर भेजे, और पृथ्वी स्थित दूरबीनों की मदद से ही वैज्ञानिक इस पर नज़र रखे हुए थे। लेकिन इतने अध्ययन के बावजूद भी शुक्र के बारे में कई जानकारियां स्पष्ट नहीं हैं। जैसे शुक्र की सतह पर ज्वालामुखीय गतिविधियों के प्रमाण मिले थे, लेकिन वहां वैसी टेक्टॉनिक गतिविधियों का अभाव है जो पृथ्वी पर ज्वालामुखीय गतिविधियां चलाती है। इसके अलावा शुक्र के वायुमंडल में फॉस्फीन गैस की उपस्थिति भी विवादास्पद रही है, जो वहां जीवन होने का संकेत हो सकती है।

संभवत: 2030 तक DAVINCI+ अंतरिक्ष यान शुक्र के लिए रवाना हो जाएगा। शुक्र पर पहुंचकर यह वहां के पृथ्वी की तुलना में 90 गुना घने वायुमंडल मे उतरेगा, उतरते-उतरते विभिन्न ऊंचाइयों पर हवा के नमूने लेगा और पृथ्वी पर जानकारियां भेजता रहेगा। ये वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद करेंगी कि शुक्र कैसे विकसित हुआ था, और क्या इस पर कभी महासागर थे।

एक ओर, DAVINCI+ शुक्र के वायुमंडल का अध्ययन करेगा, वहीं VERITAS शुक्र की कक्षा में रहकर ही उसकी सतह का मानचित्रण करेगा। इससे प्राप्त चित्र, सतह के रसायन विज्ञान और स्थलाकृति के बारे में विस्तृत जानकारी शुक्र के भूगर्भीय इतिहास को समझने में मदद करेगी, और इस गुत्थी को सुलझाएगी कि शुक्र पर इतनी भीषण परिस्थितियां कैसे बनीं? (स्रोत फीचर्स)

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चांद पर पहुंचे टार्डिग्रेड शायद मर चुके होंगे

ह तो सब जानते हैं कि सख्तजान टार्डिग्रेड्स बहुत अधिक ठंड और गर्मी दोनों बर्दाश्त कर सकते हैं। वे निर्वात में जीवित रह सकते हैं और हानिकारक विकिरण भी झेल जाते हैं। और अब, शोधकर्ताओं ने पाया है कि टार्डिग्रेड्स ज़ोरदार टक्कर भी झेल लेते हैं, लेकिन एक सीमा तक। यह अध्ययन टार्डिग्रेड द्वारा अंतरिक्ष की टक्करों को झेल कर जीवित बच निकलने की उनकी क्षमता और अन्य ग्रहों पर जीवन के स्थानांतरण में उनकी भूमिका की सीमाएं दर्शाता है।

2019 में इस्राइली चंद्र मिशन, बेरेशीट, दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। इस इस्राइली यान के साथ गुपचुप तरीके से चांद पर सूक्ष्मजीव टार्डिग्रेड्स (जलीय भालू, साइज़ करीब 1.5 मि.मी.) भेजे गए थे। लेकिन चांद पर उतरते वक्त लैंडर और साथ में उसकी सारी सवारियां दुर्घटनाग्रस्त हो गर्इं। टार्डिग्रेड्स चांद पर यहां-वहां बिखरे और यह चिंता पैदा हो गई कि वे वहां के वातावरण में फैल गए होंगे। इसलिए क्वीन मेरी युनिवर्सिटी की अलेजांड्रा ट्रेस्पस जानना चाहती थीं कि क्या टार्डिग्रेड्स इतनी ज़ोरदार टक्कर झेल कर जीवित बचे होंगे?

यह जानने के लिए उनकी टीम ने लगभग 20 टार्डिग्रेड्स को अच्छे से खिला-पिलाकर फ्रीज़ करके शीतनिद्रा की अवस्था में पहुंचा दिया, जिसमें उनकी चयापचय गतिविधि की दर महज़ 0.1 प्रतिशत रह गई।

फिर, उन्होंने नायलॉन की एक खोखली बुलेट में एक बार में दो से चार टार्डिग्रेड भरे और गैस गन से उन्हें कुछ मीटर दूरी पर स्थित एक रेतीले लक्ष्य पर दागा। यह गन पारंपरिक बंदूकों की तुलना में कहीं अधिक वेग से गोली दाग सकती है। एस्ट्रोबायोलॉजी में प्रकाशित नतीजों के अनुसार टार्डिग्रेड लगभग 900 मीटर प्रति सेकंड (लगभग 3000 किलोमीटर प्रति घंटे) तक की टक्कर के बाद जीवित रह सके, और 1.14 गीगापास्कल तक की ज़ोरदार टक्कर सहन कर गए। इससे तेज़ टक्कर होने पर उनका कचूमर निकल गया था।

तो बेरेशीट के दुर्घटनाग्रस्त होने पर टार्डिग्रेड्स जीवित नहीं बचे होंगे। हालांकि लैंडर कुछ सैकड़ा मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार पर टकराया था, लेकिन टक्कर इतनी ज़ोरदार थी कि इससे 1.14 गीगापास्कल से कहीं अधिक तेज़ झटका पैदा हुआ होगा, जो कि टार्डिग्रेड की सहनशक्ति से अधिक रहा होगा।

ये नतीजे पैनस्पर्मिया सिद्धांत को भी सीमित करते हैं, जो कहता है कि किसी उल्कापिंड या क्षुद्रग्रह की टक्कर के साथ जीवन किसी अन्य ग्रह पर पहुंच सकता है। ऐसी टक्कर से उल्का पिंड में उपस्थित जीवन भी प्रभावित या नष्ट होगा। यानी किसी उल्कापिंड के साथ पृथ्वी पर जीवन आने (पैनस्पर्मिया) की संभावना कम है। कम से कम जटिल बहु-कोशिकीय जीवों का इस तरह स्थानांतरण आसानी से संभव नहीं है।

वैसे ट्रैस्पस का कहना है कि स्थानांतरण भले ‘मुश्किल’ हो, लेकिन असंभव भी नहीं है। पृथ्वी से उल्कापिंड आम तौर पर 11 किलोमीटर प्रति सेकंड से अधिक की रफ्तार से टकराते हैं; मंगल पर 8 किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से। ये टार्डिग्रेड्स की सहनशक्ति से कहीं अधिक हैं। लेकिन पृथ्वी या मंगल पर कहीं-कहीं उल्कापिंड की टक्कर कम वेग से भी होती है, जिसे टार्डिग्रेड बर्दाश्त कर सकते हैं।

इसके अलावा, पृथ्वी से टक्कर के बाद चट्टानों के जो छोटे टुकड़े चंद्रमा की तरफ उछलते हैं, उनमें से लगभग 40 प्रतिशत की रफ्तार इतनी धीमी होती है कि टार्डिग्रेड जीवित रह सकें। यानी सैद्धांतिक रूप से यह संभव है कि पृथ्वी से चंद्रमा पर जीवन सुरक्षित पहुंच सकता है। कुछ सूक्ष्मजीव 5000 मीटर प्रति सेकंड का वेग झेल सकते हैं। उनके जीवित रहने की संभावना और भी अधिक है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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ब्रह्मांड में जीवन की उत्पत्ति कब हुई थी?

हाविस्फोट (बिग बैंग) के लगभग 1.5 करोड़ वर्ष बाद ब्रह्मांड धीरे-धीरे ठंडा होना शुरू हुआ। इस दौरान विद्युत-चुंबकीय विकिरण सामान्य तापमान पर आने लगा था। अमेरिकी भौतिक विज्ञानी एवी लोएब इस दौर को प्रारंभिक ब्रह्मांड का जीवन-योग्य युग कहते हैं। लोएब के अनुसार यदि हम उस दौर में रहते होते तो हमें गर्मी के लिए सूर्य की आवश्यकता नहीं होती बल्कि ब्रह्मांडीय पृष्ठभूमि विकिरण से प्राप्त गर्मी ही हमारे लिए पर्याप्त होती।

तो क्या यह माना जाए कि जीवन की शुरुआत इतनी जल्दी हुई थी। बिग बैंग घटना के बाद, पहले 20 मिनट की गर्म और सघन परिस्थितियों में केवल हाइड्रोजन और हीलियम के साथ मामूली मात्रा (10 अरब परमाणुओं में एक) में लीथियम भी उपस्थित था। अपेक्षाकृत भारी तत्व नगण्य थे।

जीवन के लिए तो पानी और कार्बनिक यौगिकों का होना आवश्यक है। इनके अस्तित्व में आने के लिए लगभग 5 करोड़ वर्ष और इंतज़ार करना पड़ा जब शुरुआती तारों में हाइड्रोजन और हीलियम के संलयन से ऑक्सीजन और कार्बन का निर्माण हुआ। यानी जीवन की शुरुआत के लिए प्रारंभिक अड़चन उपयुक्त तापमान नहीं बल्कि आवश्यक तत्वों की उपलब्धता भी थी।     

शुरुआत में भारी तत्वों की सीमित मात्रा को देखते हुए, जीवन की शुरुआत कितनी जल्दी हुई होगी? गौरतलब है कि ब्रह्मांड के अधिकांश तारे सूर्य से भी अरबों वर्ष पहले उपस्थित थे। तारों के निर्माण के इतिहास के आधार पर लोएब और उनके सहयोगियों का अनुमान है कि सूर्य जैसे तारों के आसपास जीवन की शुरुआत हाल के कुछ अरब वर्षों के दौरान हुई थी। अलबत्ता, भविष्य में बौने तारों (हमारे निकटतम पड़ोसी प्रॉक्सिमा सेंटॉरी जैसे) की परिक्रमा करने वाले ग्रहों में जीवन की शुरुआत होती रह सकती है। ये सूर्य की तुलना में सैकड़ों गुना अधिक समय तक जीवित रहेंगे। अंतत: शायद हमें प्रॉक्सिमा सेंटॉरी बी जैसे तारों के आसपास रहने योग्य ग्रहों पर जाकर बस जाना होगा जो कई खरब वर्षों तक जीवित रहने वाले हैं।

हमारी वर्तमान जानकारी के अनुसार पानी एकमात्र ऐसा पदार्थ है जो जीवन को सहारा दे सकता है। लेकिन इसके बारे में हमें अधिक जानकारी नहीं है। क्या शुरुआती ब्रह्मांड में कोई अन्य तरल पदार्थ मौजूद थे? मनस्वी लिंगम के साथ किए गए एक अध्ययन में लोएब बताते हैं कि शुरुआती तारों के निर्माण के समय अमोनिया, मिथेनॉल और हाइड्रोजन सल्फाइड तरल अवस्था में उपस्थित थे जबकि इथेन और प्रोपेन कुछ समय बाद तरल अवस्था में उपस्थित रहे। हालांकि जीवन की शुरुआत में इन पदार्थों की उपयुक्तता के बारे में तो अभी कोई जानकारी नहीं है लेकिन इनका प्रायोगिक अध्ययन किया जा सकता है। यदि भविष्य में हम संश्लेषित जीवन विकसित करने में सफल होते हैं तो हम यह भी खोज कर सकते हैं कि क्या जीवन पानी के अलावा अन्य तरल पदार्थों में भी उभर सकता है।

ब्रह्मांड में जीवन की शुरुआत का पता लगाने का एक तरीका यह हो सकता है कि क्या यह सबसे पुराने तारों के आसपास के ग्रहों पर शुरू हुआ था। ऐसे तारों पर हीलियम से अधिक भारी तत्वों की कमी होने की उम्मीद की जा सकती है जिन्हें खगोलविज्ञानी ‘धातु’ कहते हैं (यह परिभाषा आम रासायनिक परिभाषा से थोड़ी अलग है और इसमें ऑक्सीजन को धातु कहा जाता है)। धातु की कमी वाले तारे आकाशगंगा की परिधि में खोजे गए हैं और ये ब्रह्मांड के शुरुआती तारे माने गए हैं। इन तारों में अक्सर प्रचुर मात्रा में कार्बन दिखता है और इन्हें ‘कार्बन प्रचुर धातु विहीन’ (सीईएमपी) तारे कहा जाता है। लोएब का मत है कि सीईएमपी के आसपास के ग्रह ज़्यादातर कार्बन से बने होते हैं जिससे उनकी सतह पर प्रारंभिक जीवन का आधार मिल सकता है।

लिहाज़ा हम ऐसे ग्रहों की खोज कर सकते हैं जो सीईएमपी तारों के आसपास हैं और अपने वायुमंडलीय संघटन में जीवन की उपस्थिति के कुछ साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। हम इन तारों की उम्र के आधार पर यह अनुमान लगा पाएंगे कि ब्रह्मांड में जीवन की शुरुआत कितनी पहले हुई होगी।

इसके साथ ही हम अंतर-तारकीय तकनीकी उपकरणों की उम्र का भी अनुमान लगा सकते हैं जो पृथ्वी के नज़दीक चक्कर लगाते हुए दिखें या चंद्रमा से टकरा गए हों।

इसमें एक पूरक रणनीति अंतरिक्ष में प्रारंभिक दौर की सभ्यताओं के तकनीकी संकेतों की खोज करना भी हो सकती है। संचार संकेतों को भी खोजा जा सकता है लेकिन ऐसे संकेतों को यात्रा करने में अरबों वर्षों का समय लगता है और कोई भी सभ्यता इतनी धीमी गति से सूचनाओं के आदान-प्रदान में रुचि नहीं रखेगी। जीवन के संकेत हमेशा के लिए बने नहीं रहते हैं। खैर, अंतरिक्ष में जीवन जब मिलेगा, तब मिलेगा लेकिन तब तक हमें प्रकृति से मिले हुए अस्थायी उपहारों का जश्न मनाना चाहिए, लुत्फ उठाना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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अंतरिक्ष स्टेशन पर मिले उपयोगी बैक्टीरिया

पिछले 20 वर्षों से अंतरिक्ष यात्रियों का घर – अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (आईएसएस) – कुछ अनोखे बैक्टीरिया का मेज़बान भी बन गया है। स्पेस स्टेशन पर पाए गए चार बैक्टीरिया स्ट्रेन में से तीन के बारे में पूर्व में कोई जानकारी नहीं थी। फ्रंटियर्स इन माइक्रोबायोलॉजी जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार इन बैक्टीरिया स्ट्रेन्स का उपयोग भविष्य में लंबी अंतरिक्ष उड़ानों के दौरान पौधे उगाने के लिए किया जा सकता है।

गौरतलब है कि कई वर्षों से पृथ्वी से पूरी तरह से अलग होने से स्पेस स्टेशन एक अनूठा पर्यावरण है। ऐसे में यह जानने के लिए तरह-तरह के प्रयोग किए गए हैं कि यहां कौन-से बैक्टीरिया मौजूद हैं। पिछले 6 वर्षों में स्पेस स्टेशन के 8 विशिष्ट स्थानों पर निरंतर सूक्ष्मजीवों और बैक्टीरिया की वृद्धि की जांच की जा रही है। इन स्थानों में वह स्थान भी शामिल है जहां सैकड़ों वैज्ञानिक प्रयोग किए जाते हैं, पौधों की खेती का प्रकोष्ठ भी शामिल है और वह जगह भी जहां क्रू-सदस्य भोजन और अन्य अवसरों पर साथ आते हैं। इस तरह सैकड़ों नमूने पृथ्वी पर विश्लेषण के लिए आए हैं और कई हज़ार अभी कतार में हैं।

पृथक किए गए बैक्टीरिया के चारों स्ट्रेन मिथाइलोबैक्टीरिएसी कुल से हैं। मिथाइलोबैक्टीरियम प्रजातियां विशेष रूप से पौधों की वृद्धि में और रोगजनकों से लड़ने में सहायक होती हैं। हालांकि इन चार में से एक (मिथाइलोरुब्रम रोडेशिएनम) पहले से ज्ञात था जबकि छड़ आकार के तीन अन्य बैक्टीरिया अज्ञात थे। इनके आनुवंशिक विश्लेषण में वैज्ञानिकों ने पाया कि ये बैक्टीरिया प्रजातियां मिथाइलोबैक्टीरियम इंडीकम के निकट सम्बंधी हैं। अब इनमें से एक बैक्टीरिया का नाम भारतीय जैव-विविधता वैज्ञानिक मुहम्मद अजमल खान के सम्मान में मिथाइलोबैक्टीरियम अजमाली रखा गया है।

इस बैक्टीरिया के संभावित अनुप्रयोगों को समझने के लिए नासा जेट प्रपल्शन लेबोरेटरी के वैज्ञानिक कस्तूरी वेंकटेश्वरन और नितीश कुमार ने इस शोध पर काम किया है। वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि यह नया स्ट्रेन पौधों की वृद्धि में उपयोगी हो सकता है। न्यूनतम संसाधनों वाले क्षेत्रों में यह जीवाणु मुश्किल परिस्थितियों में भी पौधे के बढ़ने में सहायक होगा। पत्तेदार सब्ज़ियों और मूली को तो सफलतापूर्वक अंतरिक्ष स्टेशन पर उगाया गया है लेकिन फसलों को उगाने में थोड़ी कठिनाई होती है। ऐसे में मिथाइलोबैक्टीरियम इस संदर्भ में उपयोगी हो सकता है।

अभी इस बैक्टीरिया के सही उपयोग को समझने के लिए समय और कई प्रयोगों की ज़रूरत है। आईएसएस पर मिले ये तीन स्ट्रेन अलग-अलग समय पर और अलग-अलग स्थानों से लिए गए थे इसलिए आईएसएस में इनके टिकाऊपन और पारिस्थितिक महत्व का अध्ययन करना होगा। मंगल पर मानव को भेजा जाए, उससे पहले इस तरह के अध्ययन महत्वपूर्ण और ज़रूरी हैं। (स्रोत फीचर्स)

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