वनों की कटाई जब चिंता का बड़ा विषय है, तब संयुक्त राज्य अमेरिका में दुनिया के सबसे बड़े वानिकी प्रयोग को 22 अप्रैल
को हरी झंडी मिल गई है। प्रयोग के तहत यह आकलन करने की कोशिश की जाएगी कि जैव
विविधता का संरक्षण करते हुए लकड़ी के उत्पादन के सबसे अच्छे तरीके क्या हो सकते
हैं। प्रयोग के लिए वनों की नियंत्रित कटाई करने की अनुमति भी मिलेगी।
परियोजना की शुरुआत करने वाले ओरेगन स्टेट युनिवर्सिटी (ओएसयू) के थॉमस डीलुका
का कहना है कि जंगल ज़रूरी हैं लेकिन हमें लकड़ी की भी ज़रूरत है। तो लकड़ी उत्पादन के
बेहतर तरीके खोजने होंगे और यह परियोजना हमें इसी काम में मदद करेगी।
दक्षिण-पश्चिमी ओरेगन में नव-निर्मित एलियट स्टेट रिसर्च फॉरेस्ट की लगभग
33,000 हैक्टर भूमि इस परियोजना के अधीन होगी। इसे 40 से अधिक भागों में बांटकर
वैज्ञानिक कई वन-प्रबंधन रणनीतियों का परीक्षण करेंगे, जिनमें
से कुछ में वनों की कटाई भी की जाएगी। इस परियोजना की सलाहकार समिति के सदस्यों
में पर्यावरणविद,
शिकारी, लकड़हारे और स्थानीय जनजातियों
के लोग शामिल हैं।
दशकों से एलियट वन क्षेत्र विवादों में घिरा रहा है। यहां वनों की कटाई एक बड़ा
व्यवसाय है। जंगल के एक हिस्से में महत्वपूर्ण और प्राचीन डगलस फर और अन्य वृक्ष
हैं। जंगल के अन्य हिस्सों में 1930 के बाद से सक्रिय रूप से कटाई और इनकी जगह नए
पौधे लगाने का काम हो रहा है। प्राचीन जंगलों में कई विलुप्तप्राय पक्षी रहते हैं।
2012 में,
इनके संरक्षण के उद्देश्य से यहां वाणिज्यिक वन कटाई पर रोक
लगा दी गई थी।
2018 में ओएसयू शोधकर्ताओं द्वारा यह परियोजना प्रस्तावित करने से पहले तक, ओरेगन राज्य ने वन संरक्षण के लिए कई बातें स्वीकार की थीं। लेकिन इस संपदा को
शोध वन में बदलने का ओएसयू का प्रस्ताव छोटे स्तर पर वनों की कटाई फिर से शुरू कर
देगा। योजना के मुताबिक एलियट वन में कटाई से होने वाली आमदनी प्रयोग का बुनियादी
ढांचा बनाने और संचालन में मदद करेगी।
यूएस सहित दुनिया भर में दर्जनों शोध वन हैं। यहां वैज्ञानिक पारिस्थितिकी और
मिट्टी से लेकर अम्लीय वर्षा और कार्बन डाईऑक्साइड के बढ़ते स्तर के प्रभावों का
अध्ययन करते हैं। लेकिन एलियट शोध वन इनसे अलग और बड़ी परियोजना है। परियोजना के
समर्थकों का कहना है कि यह वैज्ञानिकों को पहली बार इतने बड़े स्तर पर पारिस्थितिकी
वानिकी का परीक्षण करने का अवसर प्रदान करेगी।
परियोजना के अनुसार इसके अधीन जंगल के उस 40 प्रतिशत से अधिक हिस्से में जंगल
की कटाई नहीं होगी, जहां पुराने वृक्ष हैं। बाकी हिस्से को 40
छोटे हिस्सों में बांटकर विभिन्न तरह के भूमि प्रबंधन के अध्ययन किए जांएगे। इनमें
से कुछ हिस्सों में चुनिंदा पेड़ों की कटाई होगी। बाकी वन के आधे हिस्से को काट कर
पूरा साफ किया जाएगा, जबकि बाकी आधे वन क्षेत्र का संरक्षण किया
जाएगा। प्रत्येक तरह के प्रबंधन का प्रभाव समझने के लिए वैज्ञानिक जंगल में कार्बन
के स्तर,
नदी-नालों के स्वास्थ्य, और
कीटों,
पक्षियों और मछलियों में विविधता का आकलन करेंगे।
मंज़ूरी मिलने के बावजूद परियोजना को कई बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। 1930
से ही ओरेगन पब्लिक स्कूल एलियट वन से कटाई के माध्यम से कानूनन राजस्व लेता है।
परियोजना को इसकी क्षतिपूर्ति करनी होगी।
अन्य बाधाएं भी हैं। इस परियोजना में वे जंगलों को कैसे नियंत्रित करेंगे, और जोखिमग्रस्त और लुप्तप्राय प्रजातियों का किस तरह प्रबंधन करेंगे इसकी एक
विस्तृत योजना पहले ही तैयार करनी होगी। और इसके लिए यूएस फिश एंड वाइल्डलाइफ
सर्विस का अनुमोदन भी प्राप्त करना होगा।
ओएसयू के दल ने पिछले कुछ वर्षों में स्थानीय जनजातियों, उद्योगों,
पर्यावरणविदों और परियोजना समिति के अन्य सदस्यों के साथ
बैठकें और बातचीत करके सहमति बनाने की कोशिश की है। लेकिन इस पर बहस पूरी तरह खत्म
नहीं हुई है। कई पर्यावरणविदों का अब भी सवाल है कि जलवायु संकट के दौर में कार्बन
सोखने और संग्रहित करने वाले जंगलों का पूरी तरह सफाया करना कितना जायज़ है। सौ साल
पहले की गलतियों को फिर एक बार नहीं दोहराया जाना चाहिए।
इसके अलावा काष्ठ उद्योग के साथ ओएसयू के सम्बंध भी संदेह के दायरे में हैं।
जैसे 2019 में,
ओएसयू के कॉलेज ऑफ फॉरेस्ट्री ने अपने एक जंगल के 6.5
हैक्टर क्षेत्र में फैले पेड़ों को काटने की अनुमति दे दी थी, जिसमें सैकड़ों साल पुराने वृक्ष लगे थे।
डीलुका मानते हैं कि अतीत में गलतियां हुई थीं लेकिन युनिवर्सिटी का अच्छा अकादमिक रिकॉर्ड है, वे एलियट वन में एक विश्व स्तरीय अनुसंधान सुविधा बनाना चाहते हैं। अगर हम काष्ठ संसाधनों की आपूर्ति के लिए वनों में कटाई करते हुए प्रजातियों को बचाए रखने के तरीके पता कर लेते हैं, तो यह बहुत प्रभावी होगा। बहरहाल, सब कुछ अंतिम प्रबंधन योजना पर निर्भर करेगा लेकिन तब तक तो सलाहकार समिति ने परियोजना को अस्थायी हरी झंडी दिखा दी है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.nature.com/articles/d41586-021-01256-9
प्रकृति में शाकाहारी और वनस्पति, शिकारी
व शिकार,
तथा रोगकारी व पोषक के बीच गहरे सम्बंध पाए जाते हैं। ऐसी विविध अंतर्क्रियाएं जहां शिकारी या
रोगकारी की जीने की क्षमता को बढ़ाती हैं, वहीं शिकार या पोषक के
जीवित रहने की संभावना को कम करती हैं। इन अंतर-सम्बंधों को हम एक सामान्य शीर्षक
‘शोषण या दोहन’ के तहत देख सकते हैं।
भोज्य संसाधनों का दोहन आबादी को एक ताने-बाने में गूंथ देता है जिसे ‘खाद्य संजाल’
के नाम से जानते हैं। एक पौधे और रोगजनक के ऐसे ही एक आश्चर्यजनक, रोमांचक,
अद्भुत व कल्पनातीत सम्बंध की चर्चा हाल ही में साइंटिफिक
अमेरिकन,
प्लांट प्रेस तथा मायकोलॉजिया
और फंगल जीनोम के पृष्ठों पर हुई है।
फूलों की नकल
मेक्सिको में प्रति वर्ष दक्षिणी चट्टानी पहाड़ों के ढलान पर जंगली फूलों की
रंगीन बहार नज़र आती है। इसमें से कुछ जंगली फूल दिखते तो फूल जैसे हैं लेकिन होते
नहीं हैं। एक चमकदार पीला और मीठी गंधवाला फूल दरअसल एक रोगकारी फफूंद द्वारा अपने
पोषक पौधे में फेरबदल करके बनाया गया होता है। यह पौधे का असली फूल नहीं नकली फूल
होता है। इस रोगजनक को हम रस्ट के नाम से जानते हैं क्योंकि इसके बीजाणु जंग लगे
लोहे के रंग के होते हैं जो पौधों की पत्तियों पर बनते हैं।
यह गेहूं में लगने वाले रोग पक्सीनिया ग्रेमीनिस का
सम्बंधी पक्सीनिया मोनोइका है। इसका पोषक पौधा गेहूं न होकर सरसों कुल का अरेबिस
है।
अरेबिस प्रजातियां शाकीय पौधे हैं जो कुछ महीनों से लेकर वर्षों
तक रोज़ेट के रूप में रहते हैं। रोज़ेट पौधे का एक ऐसा रूप होता है जिसमें पौधे पर
ढेर सारी पत्तियां जमीन से सटी हुई लगभग एक घेरे में बहुत ही छोटे तने पर लगी होती
है।
इस रोज़ेट अवस्था में अरेबिस पौधा जड़ों के विकास और उनमें पोषण का
संग्रह करने में बहुत अधिक ऊर्जा लगाता है। इस अवस्था के अंत में यह तेज़ी से एकदम
लंबा हो जाता है और फूलने लगता है। वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को बोल्टिंग कहते हैं।
फूलों का परागण होता है, फूल में बीज बनते हैं, बीजों से फिर नए पौधे बनते हैं और यह चक्र चलता रहता है।
लेकिन पक्सीनिया तो अरेबिस के जीवन चक्र को पूरी तरह से बदल
देता है। यह पौधे की रोज़ेट अवस्था में उस पर आक्रमण करता है और इसके विकास में
फेरबदल कर पौधे का ऐसा रूप बनाता है जो स्वयं पक्सीनिया फफूंद के लैंगिक
प्रजनन को बढ़ावा देता है। इस दौरान सामान्यत: पोषक पौधा मर जाता है।
पक्सीनिया आम तौर पर अरेबिस को गर्मियों के आखरी दिनों में
संक्रमित करता है। फिर तेज़ी से वृद्धि करने वाले उन ऊतकों में घुस जाता है जो आने
वाली सर्दियों में पौधों की वृद्धि के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। बार-बार विभाजित
होने वाले ऊतकों पर आक्रमण करके यह पौधे के रोज़ेट आकार में भविष्य में होने वाले
परिवर्तन को अपने हिसाब से बदल डालता है। संक्रमित रोज़ेट आने वाले वसंत में तेज़ी
से लंबे हो जाते हैं उनकी पूरी लंबाई और शीर्ष पर पत्तियों का घनत्व बढ़ जाता है।
ये पत्तियां हरी होने की बजाय चमकदार पीली होती हैं। शीर्ष पर पीली पत्तियों का
समूह बिल्कुल फूलों जैसा लगता है। इन फूलों में मुख्यत: स्पर्मेगोनिया नामक रचनाएं
होती हैं,
जो फफूंद के लैंगिक प्रजनन अंग हैं और इनसे चिपचिपा मीठा
द्रव भी निकलता है। अधिकांश रस्ट में लैंगिक प्रजनन के लिए पर-परागण या संकरण की
ज़रूरत होती है। यह विभिन्न प्रकार के कीटों की मदद से होता है। ये कीट एक फफूंद के
बीजांड को दूसरी फफूंद पर ले जाते हैं।
शोधकर्ता बारबरा रॉय ने देखा कि पीले रंग और शर्करा युक्त यह संयोजन फूलों पर
आने वाले कई प्रकार के कीटों को अपनी ओर आकर्षित करता है जिनमें तितलियां, मधुमक्खियां और अन्य प्रकार की छोटी मक्खियां शामिल होती है। कोलरेडो में
मक्खियां इन नकली फूलों पर मंडराने वाली आम कीट हैं।
इस अध्ययन से यह भी पता चला कि पक्सीनिया पोषक पौधे के जीवन चक्र को
छिन्न-भिन्न कर देती है और उसे मार डालती है। जो पौधे बच जाते हैं उन पर फूल तो
बनते हैं परंतु बीज नहीं बनते। अर्थात पक्सीनिया अपने पोषक पौधे को भरपूर
नुकसान पहुंचाती है।
पक्सीनिया तो मात्र पोषक का रूप बदलता
है और पत्तियों को अपने स्पर्मेगोनिया से सजाकर रंगीन मीठे फूलों जैसा बना देती है, किंतु फ्यूसेरियम नामक फफूंद तो इससे चार कदम आगे है। यह पोषक पौधों को
फूलने ही नहीं देती और जो फूल दिखता है वह पूरी तरह कवक के ऊतकों से बना होता है।
फ्यूसेरियम नामक यह कवक गुआना के सवाना में घास जैसे पौधों को संक्रमित
करती है,
और उन्हें निष्फल कर संपूर्ण कवक-फूल में परिवर्तित कर देती
है। 2006 में गुआना में एक वनस्पति संग्रहकर्ता यात्री कैनेथ वर्डेक ने केटूर
नेशनल पार्क में टहलते हुए पीली आंखों वाली घास की दो प्रजातियों पर कुछ असामान्य
फूल देखे।
उन प्रजातियों के विशिष्ट फूलों के विपरीत वे ज़्यादा नारंगी, घने गुच्छेदार और स्पंजी थे। बाद की यात्राओं में उन्होंने ऐसी विचित्रताओं के
और उदाहरण देखे। वनस्पति साहित्य की खाक छानने पर उन्होंने पाया कि ये नारंगी
रचनाएं वास्तव में फूल थे ही नहीं और पीली आंखों वाले ज़ायरिस वंश के पौधों
ने उन्हें नहीं बनाया था। वे असली फूल ना होकर नकली फूल थे जो एक कवक की कारस्तानी
थे। इस कवक का नाम है फ्यूसेरियम ज़ायरोफिलम। यह ज़ायरिस पौधे को
संक्रमित करती है और पौधों के स्वयं के पुष्पन को रोक कर अपने नकली फूल उन पर
खिलाती है। इसके लिए फ्यूसेरियम पौधे की अब तक अज्ञात किसी व्यवस्था का
अपहरण कर लेती है। यही नहीं, यह ज़ायरिस के
परागणकर्ताओं को भी अपने बीजाणुओं को फैलाने के लिए छलती है।
वैज्ञानिक यह सोचकर हैरान हैं कि यह कवक धोखाधड़ी के लिए इतनी अच्छी तरह से
कैसे विकसित हुई है। अमेरिकी कृषि विभाग के सूक्ष्मजीव वैज्ञानिक कैरी ओडोनल का
कहना है कि “यह पृथ्वी पर एकमात्र ऐसा उदाहरण है जहां पूरा का पूरा नकली फूल कवक
से बना है।” नकली फूलों के बारे में यह अध्ययन हाल ही में फंगल जेनेटिक्स
और बॉयोलाजी नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
और भी हैं बाज़ीगर
मोनीलिनिया कोरिम्बोसी नामक कवक ब्लूबेरी की झाड़ी को
संक्रमित करती है। यह कवक संक्रमित पत्तियों पर फूलों जैसी रचनाएं तो नहीं बनाती
लेकिन ब्लूबेरी पत्तियां रोज़ेटनुमा हो जाती हैं, पराबैंगनी
प्रकाश को परावर्तित करती हैं, साथ ही ब्लूबेरी के असली फूलों
के समान किण्वित चाय जैसी गंध भी छोड़ती है। इससे कई कीट इसकी ओर आकर्षित होते हैं।
इसी तरह पीले रंग की फूलों वाली घास से बने कवक फूल से निकलने वाली गंध से कई कीट
इसका पता लगा लेते हैं और वे परावर्तित पराबैंगनी प्रकाश को भी पकड़ने में सक्षम
होते है।
सूक्ष्म जीव वैज्ञानिक इमेने लारबा ने फ्यूसेरियम ज़ायरोफिलम के नकली
फूलों के लिए पराबैंगनी फिल्टर का उपयोग किया था। ऐसा अनुमान है कि कवक के ऊतक
पराबैंगनी प्रकाश को परावर्तित करते हैं और पीला रंग दोनों मिलकर परागणकर्ताओं को
कवक के नकली फूलों का पता लगाने में मदद करते हैं। ऐसा ही असली फूलों पर भी होता
है। यह नकलपट्टी की पराकाष्ठा है।
शोधकर्ताओं ने इन नकली फूलों से दो रंजक अलग किए हैं जो पराबैंगनी प्रकाश के
परावर्तन तथा चमक के लिए ज़िम्मेदार हो सकते हैं। इसके अलावा, प्रयोगशाला में उन्होंने 10 गंधयुक्त पदार्थ भी प्राप्त किए जो परागणकर्ता
कीटों को लुभाने के लिए जाने जाते हैं।
क्या प्रयोगशाला में प्राप्त यह सुगंधित रासायनिक कॉकटेल जंगली (असंक्रमित)
फूलों की गंध से मेल खाता है? कोविड-19 के चलते गुयाना के
बजाय इसी दल ने दक्षिणी अमेरिका के सवाना जंगलों में उगने वाली एक मिलती-जुलती
प्रजाति ज़ायरिस लेक्सीफोलिया को खोजा। यह एक बारहमासी पौधा है और गुयाना
में देखे गए पौधे से मिलता-जुलता है। ज़ायरिस लेक्सीफोलिया के असंक्रमित फूल
और फ्यूसेरियम ज़ायरोफिलम कवक के कल्चर से निर्मित रसायनों के कॉकटेल की
तुलना से पता चला है कि दोनों एक ऐसे यौगिक का उत्सर्जन करते हैं जो परागणकर्ता और
अन्य प्रकार के कीटों (मधुमक्खियों, सफेद मक्खियों और काऊपी
वीवल्स) को अपनी ओर आकर्षित करता है।
अलबत्ता कुछ वैज्ञानिकों को लगता है कि मामले को और समझना ज़रूरी है क्योंकि
फूलों की गंध एक ही वंश की प्रजातियों के बीच भिन्न हो सकती है। अकेले यौगिक की
अपेक्षा गंध को मिश्रण के रूप में बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। फिर भी नकली
फूलों की आकृति और रंग से प्रभावित हुए बिना नहीं रहा जा सकता।
पेनसिल्वेनिया स्टेट विश्वविद्यालय के प्लांट पैथोलॉजी के शोध छात्र टेरी
टॉरैस क्रूज़ ने इनकी इस धोखाधड़ी के अध्ययन की अलग योजना भी बनाई है। इसमें वे ज़ायरिस
और फ्यूसेरियम दोनों के फूलों द्वारा उत्पादित सुगंध को इकट्ठा करेंगी और
उन फूलों पर मंडराने वाले कीटों की सूची बनाएंगी। वे यह देखने की कोशिश करेंगी कि
यह प्रणाली वास्तविक परिस्थिति में कैसे काम करती है। उम्मीद है कि यह अध्ययन इन
छलिया कवकों के रहस्य को उजागर करेगा।
उच्च श्रेणी के मेज़बान पौधों के फूलों और रोगजनक के बीच बना यह अनोखा सम्बंध कई मायनों में आश्चर्यजनक है। इससे कई रोचक सवाल उठते हैं जिनका उत्तर शायद अभी हमारे पास नहीं है। मसलन कवक को कैसे पता चलता है कि पौधों में फूलों जैसी रंगीन, सुगंधित और रसीली रचनाएं लैंगिक अंगों के प्रदर्शन का काम करती हैं। यह जानने के बाद कवक को इस रचना की नकल करना है। पोषक और परजीवी या परपोषी के बीच जैव विकास के दौरान विकसित हुआ यह आश्चर्यजनक रिश्ता दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर तो ज़रूर करता है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://heatherkellyblog.files.wordpress.com/2021/03/xyris-flowers.png
कई फूलों में मीठी-मीठी गंध होती है जो परागणकर्ताओं को
आकर्षित करती है और पौधे को अपनी अगली पीढ़ी तैयार करने में मदद करती है। लेकिन ये
सुगंधित अणु यदि फूल की कोशिकाओं में जमा हो जाएं तो हानिकारक भी हो सकते हैं।
इसलिए फूलों को ऐसी कुछ व्यवस्था करनी होती है कि यह गंध बाहर उड़ती रहे। हाल में नेचर
केमिकल बायोलॉजी में प्रकाशित एक शोध पत्र में इस व्यवस्था का खाका प्रस्तुत
हुआ है। सारे प्रयोग पेटुनिया के फूलों पर किए गए थे।
फूलों में गंध कुछ वाष्पशील कार्बनिक पदार्थों के कारण होती है। कोशिका में
पैदा होने के बाद ये अणु कोशिका द्रव्य में से होते हुए कोशिका की झिल्ली और उसके
आसपास मौजूद कोशिका भित्ती तक पहुंचते हैं। यहां से ये कोशिका के बाहर उपस्थित एक
मोमी परत क्यूटिकल में पहुंच जाते हैं जहां से ये बाहर हवा में फैलकर सुगंध फैलाते
हैं। ऐसा माना जाता था कि इन वाष्पशील अणुओं की यह यात्रा विसरण नामक क्रिया की
बदौलत सम्पन्न होती है जिसमें अणु अधिक सांद्रता से कम सांद्रता की ओर बढ़ते हैं। लेकिन
फिर 2015 में कंप्यूटर अनुकृति से पता चला कि यदि यह यात्रा सिर्फ विसरण के दम पर
चले तो ये कार्बनिक अणु बहुत तेज़ी से कोशिका के बाहर नहीं निकल पाएंगे और अंदर बने
रहे तो नुकसान करेंगे।
2017 में पर्ड्यू विश्वविद्यालय की जैव रसायनविद नतालिया डुडरेवा और उनके
साथियों ने इस संतुलन को बनाए रखने की तकनीक का खुलासा किया था। उन्होंने पाया कि
जब फूल खिलते हैं और गंध तीक्ष्ण हो जाती है, तो PhABCG1 नामक एक प्रोटीन की मात्रा बढ़ने
लगती है। यदि इस प्रोटीन के जीन की अभिव्यक्ति कम हो जाए तो गंध-अणुओं का बाहर
निकलना भी कम हो जाता है। ये अणु कोशिका में जमा होने लगते हैं और कोशिका की
झिल्ली का क्षय होने लगता है। इसके आधार पर डुडरेवा का निष्कर्ष था कि गंध-अणुओं
को झिल्ली के पार पहुंचाने का काम PhABCG1 करता है।
फिर डुडरेवा की टीम नो यह पता लगाया कि ये गंध-अणु फूल की पंखुड़ी में कहां
अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। पता चला कि इनमें से अधिकांश (लगभग 50 प्रतिशत)
पंखुड़ियों की क्यूटिकल में जमा होते हैं। जब शोधकर्ताओं ने किसी प्रकार से मोम में
से पार पहुंचाने वाले प्रोटीन PhABCG12 की मात्रा कम कर दी तो फूल की क्यूटिकल की मोटाई कम हो गई। और इसके साथ ही
गंध-अणुओं का उत्सर्जन भी कम हो गया, उत्पादन भी गिर गया और
क्यूटिकल में इन अणुओं का जमावड़ा भी कम हो गया। जब यह प्रयोग एक ऐसे रसायन के साथ
दोहराया गया जो क्यूटिकल की मोटाई को कम करता है, तो भी
ऐसे ही असर देखे गए।
यह बात थोड़ी विचित्र जान पड़ती है कि क्यूटिकल की मोटाई कम होने से गंध-अणुओं का उत्सर्जन कम हो जाता है क्योंकि सामान्य तौर पर हम मानते हैं कि जितनी पतली रुकावट होगी उत्सर्जन उतना अधिक होना चाहिए। जब और अधिक विश्लेषण किया गया तो पता चला कि यदि क्यूटिकल बहुत पतली हो तो वाष्पशील कार्बनिक अणु कोशिका में जमा होने लगते हैं और नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसा होने पर कोशिका किसी प्रकार से वाष्पशील कार्बनिक अणुओं का उत्पादन कम कर देती है। यानी क्यूटिकल इन फूलों की गंध में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://cdn.the-scientist.com/assets/articleNo/68376/iImg/41080/voc-infographic.png
ठंड
के साथ ही मालवा में गराड़ू (Dioscoreaalata) मिलने लगते हैं। गराड़ू बहुत स्वादिष्ट होता
है। इसका छिलका निकालकर तेल में तलकर, बस
थोड़ा-सा
नींबू निचोड़ो और नमक व मसाला बुरबुराओ। तैयार हो गई डिश! लेकिन गराड़ू को तलने के पहले छीलना व काटना
एक झंझट भरा काम होता है। गराड़ू काटते हैं तो हाथों में खुजली होती है। लगता है
मानो कुछ चुभन सी हो रही हो। मामला हाथों तक ही सीमित नहीं! अगर तलने में कच्चा रह जाए तो गराड़ू गले
में भी खुजली मचाता है। कच्चा खाने का तो सवाल ही नहीं उठता।
सिर्फ
गराड़ू ही नहीं अरबी के पत्ते व इसके कंद की सब्जी भी अगर कच्ची रह जाए तो गले में
चुभती है। तो आखिर इनमें वह क्या चीज़ है जो चुभन व खुजली पैदा करती है।
इस
सवाल का जवाब खोजने के लिए हमने अरबी के पत्ते के एक टुकड़े को अच्छे से मसलकर उसके
रस को स्लाइड पर फैलाकर सूक्ष्मदर्शी में देखा। स्लाइड में सुई जैसी रचनाएं स्पष्ट
दिखाई दीं। ये महीन सुइयां कोशिकाओं में गट्ठर के रूप में जमी होती हैं। चुभन का
एहसास इन्हीं की वजह से होता है।
जब
हम गराड़ू काटते हैं या उसका छिलका उतारते हैं तो ये सूक्ष्म सुइयां हमें चुभ जाती
है और खुजली मचाती है। वैसे गराड़ू को काटने के पहले कई लोग हाथों में तेल लगा लेते
हैं। ऐसा ही कुछ अरबी के मामले में भी होता है।
सूक्ष्मदर्शी में कुछ ऐसीं दिखती हैं सुइया यानी रैफाइड्स
मालवा के लोग इस बात से परिचित हैं कि गराड़ू और नींबू का
चोली दामन का साथ है। नींबू जहां अपने खट्टेपन से स्वाद को बढ़ाता है वहीं चुभन व
जलन से भी निजात दिलाता है। तो फिर से सवाल उठता है कि क्या नींबू मिलाने से वे
सुइयां गायब हो जाती हैं? इस
सवाल पर हम आगे बात करेंगे। लेकिन पहले हम यह समझ लेते हैं कि आखिर ये सुइयां क्या
है?
ये
सुइयां कैल्शियम ऑक्ज़लेट की बनी होती हैं। ये सुइयां जिन कोशिकाओं के अंदर होती है
उन्हें इडियोब्लास्ट कोशिकाएं कहा जाता है। यह तो हम जानते हैं कि कोशिकाओं में
कोशिकांग होते हैं। कोशिकाएं अपने सामान्य कामकाज के दौरान कई पदार्थों का निर्माण
करती हैं। ये पदार्थ कोशिकाओं में एक खास आकृति में जमा हो जाते हैं। इन पदार्थों
को कोशिका समावेशन (सेल इंक्लूज़न) कहा जाता है। यानी कोशिका में निर्जीव पदार्थों का समावेशन।
जैसे आलू में स्टार्च के कण, नागफनी
और अकाव में सितारे के आकार के कैल्शियम ऑक्ज़लेट के कण इत्यादि।
यह
बताना प्रासंगिक होगा कि पौधों में कैल्शियम ऑक्ज़लेट के क्रिस्टल कई आकृतियों में
पाए जाते हैं। जैसे, सुई के आकार में (रैफाइड),
घनाकार (स्टायलॉइड्स), प्रिज़्म के आकार में, गदा के आकार में।
रैफाइड
कैल्शियम ऑक्ज़लेट के सुई के आकार के क्रिस्टल होते हैं जो कुछ वनस्पति प्रजातियों
के पत्तों, जड़ों, अंकुरों,
फलों के ऊतकों में मौजूद होते हैं। ये किवी फ्रूट, अनानास,
यैम या जिमीकंद और अंगूर सहित कई प्रजातियों के पौधों में
पाए जाते हैं। यह देखा गया है कि रैफाइड आम तौर पर एकबीजपत्री वनस्पति कुलों में
पाए जाते हैं और कुछेक द्विबीजपत्री कुलों में देखे गए हैं।
रैफाइड
के व्यापक वितरण व विशिष्ट मौजूदगी के बावजूद इनकी प्राथमिक भूमिका को लंबे वक्त
तक नहीं समझा गया था। कैल्शियम के नियमन, पौधों
की शाकाहारियों से सुरक्षा जैसी बातें कही गई हैं। शाकाहारी जंतुओं से सुरक्षा के
मामले में एक पुराना अवलोकन है। पहली बार एक जर्मन वैज्ञानिक अर्न्स्ट स्टॉल ने देखा था कि घोंघे उन पौधों को अपना आहार नहीं
बनाते जिनमें रैफाइड होते हैं। उन्होंने यह भी देखा कि अगर उन पौधों की पत्तियों
को मसलकर उसमें थोड़ा अम्ल डाल दिया जाए तो फिर घोंघे उसे अच्छे से खाते हैं। इसका
अर्थ यह है कि अम्ल की कैल्शियम ऑक्ज़लेट से रासायनिक क्रिया से सुइयां गल जाती है।
अब स्पष्ट हो गया होगा कि नींबू क्या करता है।
दरअसल, रैफाइड शाकाहारी जीव के खिलाफ पौधों की
रक्षात्मक रणनीति है। पौधे अपने को बचाने के लिए कई तरीके अपनाते हैं। कहीं कांटे
तो कहीं द्वितीयक उपापचय पदार्थ होते हैं। रैफाइड ऊतकों और कोशिका झिल्लियों में
छेद करने का काम करते हैं। इसे सुई प्रभाव (निडिल इफेक्ट) कहा जाता है। यह देखा गया है कि जिन पौधों
में रैफाइड मिलते हैं उनमें प्रोटीएज़ एंज़ाइम पाए जाते हैं। इन प्रोटीएज़ व रैफाइड
की जुगलबंदी का ही कमाल है कि इनको काटने व खाने के दौरान चुभन व जलन होती है।
एक
शोध में रैफाइड व प्रोटीएज़ के प्रभाव को देखने की कोशिश की गई। वैज्ञानिकों ने
रैफाइड वाले किवी फ्रूट (एक्टिनिडिया
डेलिसिओसा) से
रैफाइड प्राप्त किए। सबसे पहले केवल रैफाइड का लेपन अरंडी की पत्ती पर किया और उस
पर लार्वा को छोड़ा। इस स्थिति में लार्वा पर कोई प्रभाव नहीं दिखा और सभी लार्वा
ज़िंदा रहे। जब रैफाइड सुइयों को अरंडी की पत्ती पर अधिक सांद्रता के साथ लेपन किया
गया तो भी लार्वा पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं देखा गया। इसका अर्थ यह है कि केवल
रैफाइड सुई की कोई भूमिका नहीं है।
फिर
जब अरंडी की पत्ती पर केवल सिस्टाइन प्रोटीएज़ का लेपन किया गया तब भी लार्वा पर
कोई असर नहीं हुआ। लेकिन जब अरंडी की पत्ती पर रैफाइड और सिस्टाइन प्रोटीएज़ दोनों
का लेपन किया तो 69 फीसदी
लार्वा का शरीर काला पड़ गया व लगभग दो घंटे में मर गए। नतीजों में यह भी पाया गया
कि जब बहुत थोड़े रैफाइड के साथ सिस्टाइन प्रोटीएज़ की मात्रा को बढ़ाया गया तो विषाक्तता
16-32 गुना
बढ़ गई।
बेशक, रैफाइड सुई का काम कोशिकाओं को पंचर करने
का होता है। जब कैल्शियम ऑक्ज़लेट की सुइयों की बजाय अक्रिस्टलीय कैल्शियम ऑक्ज़लेट
व साथ में सिस्टाइन प्रोटीएज़ का लेपन किया गया,
तो भी लार्वा पर कोई असर नहीं हुआ। इससे साबित होता है कि
कैल्शियम ऑक्ज़लेट से बनी सुई की भूमिका अहम है,
न कि कैल्शियम ऑक्ज़लेट की। यह भी देखा गया है कि काइटिन
पचाने वाले प्रोटीएज़ एंज़ाइम के साथ भी रैफाइड इसी प्रकार का व्यवहार प्रदर्शित
करते हैं।
एक
अनुभव और। घर के आंगन में डफनबेकिया का एक सजावटी पौधा गमले में लगा था। गमले में
गुलाब, चांदनी जैसे और भी
पौधे थे। अगर घर का गेट खुला रह जाता तो गमले के पौधों को बकरियां चट कर जाती।
लेकिन वे डफनबेकिया के पौधे को नहीं खाती थीं। खोजबीन करने पर पता चला कि
डफनबेकिया के पौधे की पत्तियों में भी रैफाइड सुइयां होती हैं।
कुल मिलाकर रैफाइड और प्रोटीएज़ की जुगलबंदी कुछ पौधों की रक्षा प्रणाली है। इसकी प्रबल संभावनाएं हैं कि रैफाइड और रक्षात्मक प्रोटीएज़ के बीच तालमेल से फसलों की कीट-प्रतिरोधी किस्मों के विकास में मदद मिल सकती है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://i.ytimg.com/vi/5j9rItkyPIc/maxresdefault.jpg
कोविड-19 के प्रकोप और खौफ के चलते बाज़ार में तरह-तरह की
दवाओं और एंटीडोट के साथ-साथ इम्यूनिटी बूस्टर पदार्थों एवं दवाइयों की बाढ़-सी आ
गई है। प्रोटीन जैसे सप्लीमेंट जो पहले मसल पॉवर बढ़ाने की बात करते थे, वे
अचानक इम्यूनिटी बूस्टर हो गए हैं। जिन दवाइयों का विज्ञापन पहले शक्तिवर्धक के
रूप में किया जाता था वे ही अचानक बाज़ार को देखते हुए इम्यूनिटी बूस्टर हो गई हैं।
पत्र-पत्रिकाओं में भी प्राकृतिक इम्यूनिटी
बूस्टर फलों एवम पदार्थों की चर्चाएं हैं। जैसे खट्टे फल,
नींबू, संतरा, अंगूर, लहसून, अदरख
आदि। कोरोना के डर के चलते ग्रीन टी, पपीता,
दही, कीवी, सूरजमुखी
के बीज की मांग बढ़ गई है। विटामिन सी से भरपूर खट्टे फलों के बारे में कहा जाता है
कि ये श्वेत रक्त कोशिकाओं को बढ़ाते हैं जो रोगकारकों से होने वाले संक्रमण से
लड़ने का काम करते हैं। इसी तरह हल्दी में उपस्थित करक्यूमिन को भी इम्यूनिटी
बूस्टर और एंटी-वायरल बताया जा रहा है। बचाव और सावधानी के लिए गोल्डन मिल्क आजकल
खूब पिया जा रहा है।
सवाल यह है कि आखिर इम्यूनिटी है क्या, जिसे
बूस्ट करने की ज़रूरत आन पड़ी है।
दरअसल शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली या रोग
रोधक क्षमता को ही इम्यूनिटी कहा जाता है। इससे बैक्टीरिया, कवक, विषाणु
जैसे संक्रमणकारी रोगजनक से लड़ने की हमारी शरीर की क्षमता बढ़ती है। इन दिनों
इम्यूनिटी बूस्टर के नाम पर सर्वाधिक चर्चा में जो औषधियां हैं वे हैं तुलसी
ड्रॉप्स और गिलोय वटी। आइए आज गिलोय के बारे में चर्चा करते हैं।
डॉ. विजय नेगीहॉल द्वारा लिखित पुस्तक हैंडबुक
ऑफ मेडिसिनल प्लांट्स में इसके कई नाम दिए गए हैं। आप और हम जिसे मात्र गिलोय
के नाम से जानते हैं उसे आयुर्वेद में गुडुची के नाम से जाना जाता है। वनस्पति
शास्त्र में गिलोय का टीनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया है। आयुर्वेद की किताबों में गुणों के आधार पर
इस पौधे के कई नाम मिलते हैं। जैसे पत्तियों से शहद जैसा गाढ़ा रस निकलता है तो नाम
दे दिया मधुपर्णी। कटे हुए तने से फूटकर नया पौधा बन जाता है तो नाम हो गया
छिन्नरूहा। इसका एक और नाम तंत्रिका है जो बेल से नीचे की ओर लटकती हवाई, तंतुनुमा, लंबी
पतली धागों जैसी जड़ों के कारण दिया गया है। एक और नाम चक्रलक्षणिका है क्योंकि तने
की आड़ी काट गाड़ी के पहियों जैसी नज़र आती है। किसी ने तो इसे कान के कुंडल की तरह
देखा और नाम दे दिया कुंडलिनी।
अंत में सबसे खास नाम है अमृता। किंवदंती
है कि अमृत मंथन के बाद निकले अमृत की बूंदें पृथ्वी पर जहां-जहां गिरीं उन्हीं
बूंदों से इस वनस्पति की उत्पत्ति हुई। अत: इसे नाम दिया गया अमृता।
यह औषधीय महत्व की एक बहुवर्षीय, आरोही
लता है जो बड़े-बड़े पेड़ों पर चढ़कर उन पर छा जाती है। यह मुख्यत: भारतीय उपमहाद्वीप
का पौधा है और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है। श्रीलंका और म्यांमार में
भी मिलता है। यह तेज़ी से फैलने वाली झाड़ी है। पत्तियां बड़ी-बड़ी 15 सेंटीमीटर तक की
होती हैं। बेल खेतों की मेड़ों, पहाड़ी चट्टानों और जंगलों में पेड़ों पर चढ़ी
हुई पाई जाती है। पौधे एकलिंगी होते हैं, अर्थात नर बेल अलग और मादा बेल अलग होती
है। ग्रीष्म ऋतु में पर्णहीन अवस्था में इस पर फूल आते हैं जो हरे पीले रंग के
लंबी डंडियों पर लगते हैं। नर फूल समूह में जबकि मादा फूल अकेले ही खिलते हैं। फल
चटक लाल नारंगी रंग के होते हैं जो 2 -3 के झुंड में लगते हैं। बीजों का फैलाव
बुलबुल पक्षी के माध्यम से होता है।
इस बेल की पत्तियों, तने
और जड़ में लगभग 29 प्रकार की एंडोफायटिक फफूंद पाई जाती हैं जो पौधे को कोई हानि
नहीं पहुंचातीं। इन एंडोफायटिक फफूंद का रस एक बहुभक्षी पतंगे के नियंत्रण में
बहुत उपयोगी पाया गया है।
इस औषधीय पौधे पर वर्तमान में दुनिया भर
में शोध चल रहा है। सोहम साहा और शामश्री घोष द्वारा 2012 में एनशिएन्ट साइंस
ऑफ लाइफ में प्रकाशित ‘वन प्लांट मैनी रोल्स’ के अनुसार इसमें एल्केलाइड्स, स्टेरॉयड्स, टरपीनॉइड्स
और ग्लाइकोसाइड्स जैसे सक्रिय तत्व पाए गए हैं। एंटीडायबेटिक और एंटीबायोटिक
प्रभाव के कारण विभिन्न बीमारियों में इसका काफी उपयोग किया जा रहा है।
गिलोय के इम्यूनोमॉड्यूलेटरी गुण अच्छी तरह
से ज्ञात है। मिथाइल पायरोलीडोन, हाइड्रोक्सीमस्किटोन फार्माइल लेनोलेन जैसे
सक्रिय तत्वों के प्रभाव प्रतिरक्षा तंत्र पर और कोशिका-विष के रूप में दर्ज किए
जा चुके हैं।
जर्नल ऑफ एथ्नोफार्मेकोलॉजी में प्रकाशित शोध पत्र में इसमें सात
इम्यूनोमॉड्यूलेटरी सक्रिय पदार्थ रिपोर्ट किए गए। 2019 में प्रियंका शर्मा और
अन्य द्वारा हैलियोन में प्रकाशित केमिकल कांस्टीट्यूएंट्स एंड डायवर्स
फार्मेकोलॉजिकल इम्पॉर्टेन्स ऑफ टीनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया में 100 से अधिक
सक्रिय तत्व पहचाने गए हैं। इनमें से कई इम्यूनोलॉजिकली सक्रिय पदार्थ हैं।
श्रीलंका विश्वविद्यालय एवं आयुर्वेद
संस्थान के दिसानायके और सहयोगियों द्वारा 2020 में प्रकाशित एक पर्चे इम्यूनोमॉड्यूलेटरी
एफिशिएंसी ऑफ टीनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया अगेंस्ट वायरल इंफेक्शन में बताया गया
है कि इसमें ऐसे पदार्थ पाए गए हैं जो इम्यूनिटी को बढ़ाते हैं। उन्होंने पाया कि
पौधों के शुष्क तने में इम्यूनोमॉड्यूलेटरी प्रोटीन पाया गया है जो मानव में
इम्यूनोलॉजिकल क्रिया बढ़ाता है।
गिलोय के सक्रिय पदार्थ कब तक असरकारी रहते
हैं इस संदर्भ में शांतिकुंज हरिद्वार द्वारा प्रकाशित पुस्तक जड़ी-बूटियों
द्वारा स्वास्थ्य संरक्षण में अमृता के बारे में लिखा गया है कि इसके सक्रिय
तत्व 2 महीने से ज़्यादा उपयोगी नहीं रहते। घनसत्व को भी 2 महीने से ज़्यादा सक्रिय
नहीं माना जाता। अत: अच्छे लाभ के लिए ताज़े रस की ही सलाह दी जाती है। वैसे छाया
में सुखाए गए तने को 3 महीने के अंदर उपयोग में लेने की बात कही गई है। तो यह शोध
का विषय है कि फिर आयुर्वेदिक दवाइयों की एक्सपायरी डेट दो-तीन साल तक कैसे हो
सकती है?
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि गिलोय में
बहुत सारे सक्रिय तत्व हैं जिनका गहन परीक्षण करने की ज़रूरत है। इसके औषधीय गुणों
का ज़िक्र चरक और भाव प्रकाश निघंटु में भी किया गया है। इतनी उपयोगी इस बेल पर और
गंभीरता से शोध की ज़रूरत है ।
एक और महत्वपूर्ण बात जो गिलोय के बारे में अक्सर पढ़ी-सुनी जाती है, वह यह कि नीम के ऊपर चढ़ी हुई गिलोय की बेल ज़्यादा औषधीय महत्व की होती है। इस पर भी शोध की आवश्यकता है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/0/0e/Tinospora_cordifolia.jpg
युरोप में एक काफी लोकप्रिय झाड़ी है – लॉरस्टाइनस (विबर्नम
टाइनस) और वहां कई बाग-बगीचों में शौक से लगाई जाती है। इसके चमकदार नीले फलों
पर हर किसी की निगाहें ठहर जाती हैं। लेकिन युनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल की रॉक्स
मिडलटन और उनके साथी इन फलों की रंगत के पीछे का कारण जानने को उत्सुक थे।
शोधकर्ताओं ने फलों की आंतरिक संरचना पता
करने के लिए फल के ऊतक लिए और इनका अवलोकन इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप में किया। अब
तक कई वैज्ञानिकों को लगता था कि अन्य नीले फलों (जैसे ब्लूबेरी) की तरह
लॉरस्टाइनस के फलों का नीला रंग भी किसी नीले रंजक से आता होगा। लेकिन करंट
बायोलॉजी में उक्त शोधकर्ताओं ने बताया है कि इन फलों में सिर्फ वसा की छोटी
बूंदें कई परतों में इस तरह व्यवस्थित होती हैं कि वे नीले रंग को परावर्तित करती
हैं। ऐसे रंगों को स्ट्रक्चरल कलर (यानी संरचनागत रंग) कहा जाता है जो किसी पदार्थ
की उपस्थिति की वजह से नहीं बल्कि पदार्थों की जमावट के कारण पैदा होते हैं।
वसा की बूंदों के नीचे गहरे लाल रंजक की एक
परत भी थी, जो किसी भी अन्य तरंग लंबाई के प्रकाश को सोख लेती है और
नीले रंग को गहरा बनाती है। शोधकर्ताओं ने कंप्यूटर सिमुलेशन की मदद से इन
निष्कर्षों की जांच की और दर्शाया कि वास्तव में स्ट्रक्चरल कलर लॉरस्टाइनस के
फलों का नीला रंग बना सकता है।
संभावना है कि लॉरस्टाइनस फलों का चटख रंग
पक्षियों को इनमें उच्च वसा मौजूद होने का संकेत देता हो।
वैसे तो स्ट्रक्चरल कलर के उदाहरण जानवरों में काफी दिखते हैं। जैसे मोर पंख और तितली के पंखों के चटख रंग। लेकिन पौधों में ऐसे रंग कम ही देखे गए हैं। और ऐसा पहली बार ही देखा गया है कि इन रंगों के लिए वसा ज़िम्मेदार है। शोधकर्ताओं को लगता है कि ऐसी व्यवस्था कई अन्य पौधों में भी हो सकती है और उनके बारे में पता लगाया जाना चाहिए।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_large/public/berries_1280p_0.jpg?itok=PliI8w1H
परागणकर्ताओं
के रूप में मधुमक्खियों की बराबरी करना मुश्किल है। लेकिन वैज्ञानिक इनके कुशल
कृत्रिम विकल्प खोजने में लगे हुए हैं। और अब शोधकर्ता साबुन के बुलबुले से परागण
कराने में सफल हुए हैं।
दरअसल
तापमान कम हो तो मधुमक्खियां परागण नहीं करतीं, तब
किसानों को कृत्रिम तरीकों से फूलों का परागण करना पड़ता है। ऐसे ही विकल्प के
प्रयास में 2017 में
जापान एडवांस्ड इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नॉलॉजी के पदार्थ-रसायनज्ञ इजिरो
मियाको और उनके साथियों ने रिमोट संचालित एक छोटे ड्रोन में घोड़े के बाल चिपकाकर
उन पर एक विशेष जेल लगा दी। विचार था कि मधुमक्खी की तरह बाल पर चिपककर परागकण एक
फूल से दूसरे फूल पर पहुंच जाएंगे। ड्रोन ने फूलों को परागित तो किया मगर इसके
पंखों ने फूलों को नुकसान भी पहुंचाया। फिर, जब
मियाको अपने बेटे के साथ साबुन के बुलबुले बना रहे थे तो उन्हें ऐसे बुलबुलों की
मदद से परागण करने का विचार आया।
उन्होंने
बुलबुलों के लिए एक ऐसा डिटर्जेंट चुना जो परागकणों के अंकुरण को कम से कम
प्रभावित करता हो। प्रयोगशाला में उन्होंने परागकण से भरे बुलबुलों की बौछार नाशपाती
के फूलों पर की। जब बुलबुले फूटे तो परागकण वर्तिकाग्र पर पहुंचे और पराग नलिकाएं
बनीं। लेकिन अगर 10 से
ज़्यादा बुलबुले फूल से टकराते हैं तो नलिकाएं सामान्य से छोटी बनती हैं,
जो शायद साबुन के घोल का प्रतिकूल प्रभाव हो सकता है।
इसके
बाद उन्होंने नाशपाती के एक बाग में तीन पेड़ों के फूलों पर पराग से भरे बुलबुलों
की बौछार की। 16 दिनों
के बाद इन फूलों से आए फल उतने ही अच्छे थे जितने कृत्रिम तरह से परागित करने पर
आते हैं। जापान में कुछ किसान नाशपाती और सेब के फूलों को पारंपरिक रूप से ब्रश से
परागित करते हैं। iscience पत्रिका में शोधकर्ताओं ने बताया है कि ब्रश
से एक फूल को परागित करने में लगभग 1800 मिलीग्राम पराग लगता है, वहीं
बुलबुले से महज 0.06 मिलीग्राम
में काम हो जाता है। यानी बुलबुलों से परागण करने में किसानों को बहुत कम पराग जमा
करना होगा।
इसके
बाद मियाको ने एक बबल गन को ड्रोन से जोड़ा और ड्रोन को नकली लिली के फूलों की कतार
के चारों ओर एक मार्ग में उड़ने के लिए प्रोग्राम किया। उन्होंने पाया कि ड्रोन
बुलबुले 90 प्रतिशत
फूलों को परागित कर सकते हैं। लेकिन ड्रोन के साथ समस्या यह आई कि कई बुलबुले अपने
लक्ष्य से चूक गए, जिससे परागकण बेकार
गए। मियाको बेहतर लक्ष्य साधने वाले ड्रोन पर काम रहे हैं। इसके अलावा वे जैव-विघटनशील पर्यावरण
हितैषी साबुन के लिए प्रयासरत हैं।
वेस्ट
वर्जीनिया विश्वविद्यालय के रोबोटिक विशेषज्ञ यू गु को लगता है कि ड्रोन के रोटर
से चलने वाली हवा के कारण बुलबुले का निशाना साधना मुश्किल होगा। ज़मीन पर चलने
वाले रोबोट बेहतर इसके विकल्प हो सकते हैं।
कुछ वैज्ञानिकों ने इन प्रयासों पर चिंता व्यक्त की है। उनके अनुसार इस तरह के प्रयास कम हो रहीं मधुमक्खियों के संरक्षण से ध्यान भटकाएंगे, परागण में रासायनिक हस्तक्षेप और मिट्टी प्रदूषण के खतरे बढ़ाएंगे। हम परागण के इससे कहीं अधिक प्रभावी और टिकाऊ तरीके ढूंढ सकते हैं।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_image_-1280w__no_aspect/public/Pollen_bubble_1280x720.jpg?itok=5z4hi6bR
किसी
पौधे में मांस का चस्का विकसित होना काफी अजीब लगता है। लेकिन हाल ही में
मांसाहारी पौधों की तीन नज़दीकी प्रजातियों पर किए गए अध्ययन से पता चला है कि कुशल
आनुवंशिक फेरबदल ने उन्हें प्रोटीन युक्त भोजन को प्राप्त करने और पचाने की क्षमता
विकसित करने में मदद की है।
मांसाहारी
पौधों ने शिकार के लिए कई कुटिल तरीके विकसित किए हैं। जैसे कलश पादप (पिचर प्लांट) तो एक फिसलन भरे कलश
की मदद से कीड़ों को पकड़ता है जिसमें प्रोटीन को पचाने वाले एंज़ाइम होते हैं।
मांसाहारी पौधों की कुछ अन्य प्रजातियां हैं: वीनस
फ्लाईट्रैप (Dionaea
muscipula),
जलीय वॉटरव्हील प्लांट (Aldrovandavesiculosa), और
सनड्यू (Droseraspatulata)। ये गतिशील ट्रैप का उपयोग करते हैं। जैसे सनड्यू पर जब
कोई मच्छर बैठता है तो उस जगह को लपेट लिया जाता है। वीनस फ्लायट्रैप में विशेष
पत्तियां होती हैं जो कीड़े के बैठने पर बंद हो जाती हैं।
इन
गतिशील ट्रैप्स के विकास की खोजबीन के लिए युनिवर्सिटी ऑफ वुर्ज़बर्ग के
कम्प्यूटेशनल वैकासिक जीव विज्ञानी जोर्ग शुल्ट्ज़ और वनस्पति विज्ञानी रेनर
हेड्रिक व अन्य शोधकर्ताओं ने इन तीनों प्रजातियों के जीनोम की तुलना नौ पौधों के
जीनोम से की जिनमें मांसाहारी पिचर प्लांट के अलावा चुकंदर एवं पपीते जैसे साधारण
पौधे शामिल थे।
करंट
बायोलॉजी में प्रकाशित एक रिपोर्ट में उन्होंने बताया है कि मांस भक्षण करने वाली
इन प्रजातियों के जीनोम में लगभग 6 करोड़ वर्ष पुराने एक
साझा पूर्वज के जीनोम में दोहराव हुआ है। इस दोहराव ने जड़ों, पत्तियों और संवेदी
प्रणाली में उपयोग किए जाने वाले जीन की प्रतियों को मुक्त किया जो शिकार की पहचान
पचाने में काम आने लगीं। उदाहरण के लिए, मांसाहारी पौधों ने कुछ जीन्स, जिनका उपयोग जड़ों
द्वारा पोषक पदार्थों के अवशोषण के लिए होता था, को नए काम के लिए
तैनात किया – पचे हुए कीट से पोषक तत्व सोखने में।
शोधकर्ताओं के मुताबिक,
यह रोचक बात है कि जड़ों के जीन्स पत्तियों में अभिव्यक्त हो
रहे हैं।
टीम का निष्कर्ष है कि इन तीन प्रजातियों में और कलश पादप में मांस भक्षण की प्रवृत्ति का विकास स्वतंत्र रूप से हुआ है। दरअसल, उनका कहना है कि पौधों में मांस भक्षण की उत्पत्ति कम से कम छह बार स्वतंत्र रूप से हुई है। वैसे, युनिवर्सिटी ऑफ बफैलो के पादप जीव विज्ञानी विक्टर अल्बर्ट इन दो स्वतंत्र उत्पत्तियों के पक्ष में डैटा को अपर्याप्त बताते हैं। उनके अनुसार शिकार के लिए कुछ आवश्यक जीन तो कलश पादप और इन तीन पौधों के साझा पूर्वज में उपस्थित थे। उनकी टीम अब अन्य दो सनड्यू पौधों का अनुक्रमण कर रही है ताकि स्थित को स्पष्ट किया जा सके। हेड्रिक को यह भी लगता है कि मांसाहार के जीन कई पौधों में पाए जाते हैं। अत: मांसाहार का मार्ग सबके लिए खुला है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://cdn.images.express.co.uk/img/dynamic/151/590x/Venus-fly-trap-766156.jpg
वनस्पतियों के महत्व को देखते हुए वर्ष 2020 को
अंतर्राष्ट्रीय पादप स्वास्थ्य वर्ष घोषित किया गया है जिसका उद्देश्य पादप जगत
एवं उसके संरक्षण के बारे में जागरूकता पैदा करना है।
जीवन को संभव बनाने वाले कारकों में वनस्पतियों की अहम भूमिका है। वनस्पतियां, भूमि ही नहीं समुद्रों तक में जीवन को पनाह दिए हुए हैं। पेड़-पौधों से हमें
जीवनदायी ऑक्सीजन मिलती है। वनस्पतियां हमारे और अन्य जीवों के आहार का मुख्य स्रोत
हैं। पेड़-पौधे औषधि, वस्त्र, साज-सज्जा, शृंगार सहित अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। ये करोड़ों लोगों की आजीविका
का साधन भी हैं।
2015 में,
पादप स्वच्छता सम्बंधी आयोग के 10वें सत्र में, फिनलैंड ने वर्ष 2020 को अंतर्राष्ट्रीय पादप स्वास्थ्य वर्ष के रूप में मनाए
जाने का प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव को उस सम्मेलन में ज़ोरदार समर्थन मिला, जिसे देखते हुए वर्ष 2020 को फिनलैंड के नेतृत्व में अंतर्राष्ट्रीय पादप
स्वास्थ्य वर्ष मनाए जाने पर विचार किया जाने लगा। संयुक्त राष्ट्र संघ आम सभा ने
दिसंबर 2018 में वर्ष 2020 को अंतर्राष्ट्रीय पादप स्वास्थ्य वर्ष के रूप में
मनाने की घोषणा की। इसके उपरांत विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन और अंतर्राष्ट्रीय
पादप सुरक्षा परिषद के विशेष सत्र में अंतर्राष्ट्रीय पादप स्वास्थ्य वर्ष का
शुभारंभ हुआ। यह वर्ष हमें इस बात के प्रति सचेत करता है कि किस प्रकार वनस्पतियों
के स्वास्थ्य पर ध्यान देकर हम भुखमरी, गरीबी से उबरते हुए पर्यावरणीय
और आर्थिक विकास को गति दे सकते हैं।
वनस्पतियों की प्रचुरता सम्पन्नता लाती है। वनस्पतियों से घिरा क्षेत्र
सुंदरता को जन्म देता है। हम जो ऑक्सीजन लेते हैं उसका 98 प्रतिशत हिस्सा
वनस्पतियों से आता है। पिछले एक दशक में वनस्पतियों पर आधारित व्यापार में तीन
गुना की वृद्धि हुई है।
भारत को फसलों की विविधता का का एक केंद्र माना जाता है। यह फसली वनस्पतियों
की उत्पत्ति के 12 केंद्रों में से एक है। भारत चावल, अरहर, आम,
हल्दी, अदरक, गन्ना, गूज़बेरी आदि की 30-50 हज़ार किस्मों के विकास का केंद्र है। भारत की असीम जैव
विविधता के मद्देनज़र युनेस्को ने भारत के पांच संरक्षित क्षेत्रों को वनस्पतियों
एवं प्राणियों के अनोखेपन के लिए विश्व विरासत स्थल घोषित किया है।
विश्व खाद्य संगठन के अनुसार वर्ष 2050 तक कृषि उत्पादन में 60 प्रतिशत की वृद्धि करने की आवश्यकता होगी ताकि बढ़ी हुई जनंसख्या के लिए पर्याप्त आहार की व्यवस्था की जा सके। वनस्पतियों को बीमारियों, कीटों और खरपतवारों से बचाने के लिए विज्ञान का सहारा लेना होगा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://krishijagran.com/media/25850/plant.png?format=webp
वर्ष 2019 विज्ञान जगत के इतिहास में एक ऐसे वर्ष के रूप में
याद किया जाएगा,
जब वैज्ञानिकों ने पहली बार ब्लैक होल की तस्वीर जारी की।
यह वही वर्ष था,
जब वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में कार्बन के एक और नए रूप
का निर्माण कर लिया। विदा हुए साल में गूगल ने क्वांटम प्रोसेसर में श्रेष्ठता
हासिल की। अनुसंधानकर्ताओं ने प्रयोगशाला में आठ रासायनिक अक्षरों वाले डीएनए अणु
बनाने की घोषणा की।
इस वर्ष 10 अप्रैल को खगोल वैज्ञानिकों ने ब्लैक होल की पहली तस्वीर जारी की।
यह तस्वीर विज्ञान की परिभाषाओं में की गई कल्पना से पूरी तरह मेल खाती है।
भौतिकीविद अल्बर्ट आइंस्टीन ने पहली बार 1916 में सापेक्षता के सिद्धांत के साथ
ब्लैक होल की भविष्यवाणी की थी। ब्लैक होल शब्द 1967 में अमेरिकी खगोलविद जॉन
व्हीलर ने गढ़ा था। 1971 में पहली बार एक ब्लैक होल खोजा गया था।
इस घटना को विज्ञान जगत की बहुत बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है। ब्लैक होल का
चित्र इवेंट होराइज़न दूरबीन से लिया गया, जो हवाई, एरिज़ोना,
स्पेन, मेक्सिको, चिली और दक्षिण ध्रुव में लगी है। वस्तुत: इवेंट होराइज़न दूरबीन एक संघ है। इस
परियोजना के साथ दो दशकों से लगभग 200 वैज्ञानिक जुड़े हुए हैं। इसी टीम की सदस्य
मैसाचूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी की 29 वर्षीय कैरी बोमेन ने एक कम्प्यूटर
एल्गोरिदम से ब्लैक होल की पहली तस्वीर बनाने में सहायता की। विज्ञान जगत की
अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका साइंस ने वर्ष 2019 की दस प्रमुख खोजों में ब्लैक
होल सम्बंधी अनुसंधान को प्रथम स्थान पर रखा है।
उक्त ब्लैक होल हमसे पांच करोड़ वर्ष दूर एम-87 नामक निहारिका में स्थित है।
ब्लैक होल हमेशा ही भौतिक वैज्ञानिकों के लिए उत्सुकता के विषय रहे हैं। ब्लैक होल
का गुरूत्वाकर्षण अत्यधिक शक्तिशाली होता है जिसके खिंचाव से कुछ भी नहीं बच सकता; प्रकाश भी यहां प्रवेश करने के बाद बाहर नहीं निकल पाता है। ब्लैक होल में
वस्तुएं गिर सकती हैं, लेकिन वापस नहीं लौट सकतीं।
इसी वर्ष 21 फरवरी को अनुसंधानकर्ताओं ने प्रयोगशाला में बनाए गए नए डीएनए अणु
की घोषणा की। डीएनए का पूरा नाम डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिक एसिड है। नए संश्लेषित
डीएनए में आठ अक्षर हैं, जबकि प्रकृति में विद्यमान
डीएनए अणु में चार अक्षर ही होते हैं। यहां अक्षर से तात्पर्य क्षारों से है।
संश्लेषित डीएनए को ‘हैचीमोजी’ नाम दिया गया है। ‘हैचीमोजी’ जापानी भाषा का शब्द
है,
जिसका अर्थ है आठ अक्षर। एक-कोशिकीय अमीबा से लेकर
बहुकोशिकीय मनुष्य तक में डीएनए होता है। डीएनए की दोहरी कुंडलीनुमा संरचना का
खुलासा 1953 में जेम्स वाट्सन और फ्रांसिक क्रिक ने किया था। यह वही डीएनए अणु है, जिसने जीवन के रहस्यों को सुलझाने और आनुवंशिक बीमारियों पर विजय पाने में अहम
योगदान दिया है। मातृत्व-पितृत्व का विवाद हो या अपराधों की जांच, डीएनए की अहम भूमिका रही है।
सुपरकम्प्यूटिंग के क्षेत्र में वर्ष 2019 यादगार रहेगा। इसी वर्ष गूगल ने 54
क्यूबिट साइकैमोर प्रोसेसर की घोषणा की जो एक क्वांटम प्रोसेसर है। गूगल ने दावा
किया है कि साइकैमोर वह कार्य 200 सेकंड में कर देता है, जिसे
पूरा करने में सुपर कम्प्यूटर दस हज़ार वर्ष लेगा। इस उपलब्धि के आधार पर कहा जा
सकता है कि भविष्य क्वांटम कम्यूटरों का होगा।
वर्ष 2019 में रासायनिक तत्वों की प्रथम आवर्त सारणी के प्रकाशन की 150वीं
वर्षगांठ मनाई गई। युनेस्को ने 2019 को अंतर्राष्ट्रीय आवर्त सारणी वर्ष मनाने की
घोषणा की थी,
जिसका उद्देश्य आवर्त सारणी के बारे में जागरूकता का
विस्तार करना था। विख्यात रूसी रसायनविद दिमित्री मेंडेलीव ने सन 1869 में प्रथम
आवर्त सारणी प्रकाशित की थी। आवर्त सारणी की रचना में विशेष योगदान के लिए
मेंडेलीव को अनेक सम्मान मिले थे। सारणी के 101वें तत्व का नाम मेंडेलेवियम रखा
गया। इस तत्व की खोज 1955 में हुई थी। इसी वर्ष जुलाई में इंटरनेशनल यूनियन ऑफ प्योर
एंड एप्लाइड केमिस्ट्री (IUPAC) का
शताब्दी वर्ष मनाया गया। इस संस्था की स्थापना 28 जुलाई 1919 में उद्योग जगत के
प्रतिनिधियों और रसायन विज्ञानियों ने मिलकर की थी। तत्वों के नामकरण में युनियन
का अहम योगदान रहा है।
विज्ञान की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका नेचर के अनुसार गुज़िश्ता साल रसायन
वैज्ञानिकों ने कार्बन के एक और नए रूप सी-18 सायक्लोकार्बन का सृजन किया। इसके
साथ ही कार्बन कुनबे में एक और नया सदस्य शामिल हो गया। इस अणु में 18 कार्बन
परमाणु हैं,
जो आपस में जुड़कर अंगूठी जैसी आकृति बनाते हैं। शोधकर्ताओं
के अनुसार इसकी संरचना से संकेत मिलता है कि यह एक अर्धचालक की तरह व्यवहार करेगा।
लिहाज़ा,
कहा जा सकता है कि आगे चलकर इलेक्ट्रॉनिकी में इसके उपयोग
की संभावनाएं हैं।
गुज़रे साल भी ब्रह्मांड के नए-नए रहस्यों के उद्घाटन का सिलसिला जारी रहा। इस
वर्ष शनि बृहस्पति को पीछे छोड़कर सबसे अधिक चंद्रमा वाला ग्रह बन गया। 20 नए
चंद्रमाओं की खोज के बाद शनि के चंद्रमाओं की संख्या 82 हो गई। जबकि बृहस्पति के
79 चंद्रमा हैं।
गत वर्ष बृहस्पति के चंद्रमा यूरोपा पर जल वाष्प होने के प्रमाण मिले। विज्ञान
पत्रिका नेचर में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया है कि यूरोपा की मोटी
बर्फ की चादर के नीचे तरल पानी का सागर लहरा रहा है। अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार
इससे यह संकेत मिलता है कि यहां पर जीवन के सभी आवश्यक तत्व विद्यमान हैं।
कनाडा स्थित मांट्रियल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बियर्न बेनेक के नेतृत्व में
वैज्ञानिकों ने हबल दूरबीन से हमारे सौर मंडल के बाहर एक ऐसे ग्रह (के-टू-18 बी)
का पता लगाया है,
जहां पर जीवन की प्रबल संभावनाएं हैं। यह पृथ्वी से दो गुना
बड़ा है। यहां न केवल पानी है, बल्कि
तापमान भी अनुकूल है।
साल की शुरुआत में चीन ने रोबोट अंतरिक्ष यान चांग-4 को चंद्रमा के अनदेखे
हिस्से पर सफलतापूर्वक उतारा और ऐसा करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया। चांग-4
जीवन सम्बंधी महत्वपूर्ण प्रयोगों के लिए अपने साथ रेशम के कीड़े और कपास के बीज भी
ले गया था।
अप्रैल में पहली बार नेपाल का अपना उपग्रह नेपालीसैट-1 सफलतापूर्वक लांच किया
गया। दो करोड़ रुपए की लागत से बने उपग्रह का वज़न 1.3 किलोग्राम है। इस उपग्रह की
मदद से नेपाल की भौगोलिक तस्वीरें जुटाई जा रही हैं। दिसंबर के उत्तरार्ध में युरोपीय
अंतरिक्ष एजेंसी ने बाह्य ग्रह खोजी उपग्रह केऑप्स सफलतापूर्वक भेजा। इसी साल
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा भेजा गया अपार्च्युनिटी रोवर पूरी तरह
निष्क्रिय हो गया। अपाच्र्युनिटी ने 14 वर्षों के दौरान लाखों चित्र भेजे। इन
चित्रों ने मंगल ग्रह के बारे में हमारी सीमित जानकारी का विस्तार किया।
बीते वर्ष में जीन सम्पादन तकनीक का विस्तार हुआ। आलोचना और विवादों के बावजूद
अनुसंधानकर्ता नए-नए प्रयोगों की ओर अग्रसर होते रहे। वैज्ञानिकों ने जीन सम्पादन
तकनीक क्रिसपर कॉस-9 तकनीक की मदद से डिज़ाइनर बच्चे पैदा करने के प्रयास जारी रखे।
जीन सम्पादन तकनीक से बेहतर चिकित्सा और नई औषधियां बनाने का मार्ग पहले ही
प्रशस्त हो चुका है। चीन ने जीन एडिटिंग तकनीक से चूहों और बंदरों के निर्माण का
दावा किया है। साल के उत्तरार्ध में ड्यूक विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने शरीर की
नरम हड्डी अर्थात उपास्थि की मरम्मत के लिए एक तकनीक खोजी, जिससे
जोड़ों को पुनर्जीवित किया जा सकता है।
बीते साल भी जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंता की लकीर लंबी होती गई। बायोसाइंस
जर्नल में प्रकाशित शोध पत्र के अनुसार पहली बार विश्व के 153 देशों के 11,258
वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन पर एक स्वर में चिंता जताई। वैज्ञानिकों ने
‘क्लाइमेट इमरजेंसी’ की चेतावनी देते हुए जलवायु परिवर्तन का सबसे प्रमुख कारण
कार्बन उत्सर्जन को बताया। दिसंबर में स्पेन की राजधानी मैड्रिड में संयुक्त
राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन हुआ। सम्मेलन में विचार मंथन का मुख्य मुद्दा पृथ्वी
का तापमान दो डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा बढ़ने से रोकना था।
इसी साल हीलियम की खोज के 150 वर्ष पूरे हुए। इस तत्व की खोज 1869 में हुई थी।
हीलियम का उपयोग गुब्बारों, मौसम विज्ञान सम्बंधी उपकरणों
में हो रहा है। इसी वर्ष विज्ञान की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका नेचर के
प्रकाशन के 150 वर्ष पूरे हुए। नेचर को विज्ञान की अति प्रतिष्ठित और
प्रामाणिक पत्रिकाओं में गिना जाता है। इस वर्ष भौतिकीविद रिचर्ड फाइनमैन द्वारा
पदार्थ में शोध के पूर्व अनुमानों को लेकर दिसंबर 1959 में दिए गए ऐतिहासिक
व्याख्यान की हीरक जयंती मनाई गई।
विदा हो चुके वर्ष में अंतर्राष्ट्रीय खगोल संघ (IAU) की स्थापना का शताब्दी वर्ष मनाया गया। इसकी स्थापना 28 जुलाई 1919 को ब्रुसेल्स
में की गई थी। वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय खगोल संघ के 13,701 सदस्य हैं। इसी साल
मानव के चंद्रमा पर पहुंचने की 50वीं वर्षगांठ मनाई गई। 21 जुलाई 1969 को अमेरिकी
अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग ने चांद की सतह पर कदम रखा था।
इसी वर्ष विश्व मापन दिवस 20 मई के दिन 101 देशों ने किलोग्राम की नई परिभाषा
को अपना लिया। हालांकि रोज़मर्रा के जीवन में इससे कोई अंतर नहीं आएगा, लेकिन अब पाठ्य पुस्तकों में किलोग्राम की परिभाषा बदल जाएगी। किलोग्राम की नई
परिभाषा प्लैंक स्थिरांक की मूलभूत इकाई पर आधारित है।
गत वर्ष अक्टूबर में साहित्य, शांति, अर्थशास्त्र
और विज्ञान के नोबेल पुरस्कारों की घोषणा की गई। विज्ञान के नोबेल पुरस्कार
विजेताओं में अमेरिका का वर्चस्व दिखाई दिया। रसायन शास्त्र में लीथियम आयन बैटरी
के विकास के लिए तीन वैज्ञानिकों को पुरस्कृत किया गया – जॉन गुडइनफ, एम. विटिंगहैम और अकीरा योशिनो। लीथियम बैटरी का उपयोग मोबाइल फोन, इलेक्ट्रिक कार, लैपटॉप आदि में होता है। 97 वर्षीय गुडइनफ
नोबेल सम्मान प्राप्त करने वाले सबसे उम्रदराज व्यक्ति हो गए हैं। चिकित्सा
विज्ञान का नोबेल पुरस्कार संयुक्त रूप से तीन वैज्ञानिकों को प्रदान किया गया –
विलियम केलिन जूनियर, ग्रेग एल. सेमेंज़ा और पीटर रैटक्लिफ।
इन्होंने कोशिका द्वारा ऑक्सीजन के उपयोग पर शोध करके कैंसर और एनीमिया जैसे रोगों
की चिकित्सा के लिए नई राह दिखाई है। इस वर्ष का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार जेम्स
पीबल्स,
मिशेल मेयर और डिडिएर क्वेलोज़ को दिया गया। तीनों
अनुसंधानकर्ताओं ने बाह्य ग्रहों खोज की और ब्रह्मांड के रहस्यों से पर्दा हटाया।
ऑस्ट्रेलिया के कार्ल क्रूसलेंकी को वर्ष 2019 का विज्ञान संचार का
अंतर्राष्ट्रीय कलिंग पुरस्कार प्रदान किया गया। यह प्रतिष्ठित सम्मान पाने वाले
वे पहले ऑस्ट्रेलियाई हैं।
वर्ष 2019 का गणित का प्रतिष्ठित एबेल पुरस्कार अमेरिका की प्रोफेसर केरन
उहलेनबेक को दिया गया है। इसे गणित का नोबेल पुरस्कार कहा जाता है। इसकी स्थापना
2002 में की गई थी। पुरस्कार की स्थापना के बाद यह सम्मान ग्रहण करने वाली केरन
उहलेनबेक पहली महिला हैं।
अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान पत्रिका नेचर ने वर्ष 2019 के दस प्रमुख
वैज्ञानिकों की सूची में स्वीडिश पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग को शामिल किया
है। टाइम पत्रिका ने भी ग्रेटा थनबर्ग को वर्ष 2019 का ‘टाइम पर्सन ऑफ दी
ईयर’ चुना है। उन्होंने विद्यार्थी जीवन से ही पर्यावरण कार्यकर्ता के रूप में
पहचान बनाई और जलवायु परिवर्तन रोकने के प्रयासों का ज़ोरदार अभियान चलाया।
5 अप्रैल को नोबेल सम्मानित सिडनी ब्रेनर का 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्हें 2002 में मेडिसिन का नोबेल सम्मान दिया गया था। उन्होंने सिनोरेब्डाइटिस एलेगेंस नामक एक कृमि को रिसर्च का प्रमुख मॉडल बनाया था। 11 अक्टूबर को सोवियत अंतरिक्ष यात्री अलेक्सी लीनोव का 85 वर्ष की आयु में देहांत हो गया। लीनोव पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने अंतरिक्ष में चहलकदमी करके इतिहास रचा था। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencenews.org/wp-content/uploads/2019/12/122119_YE_landing_full.jpg