कुछ समय पहले दक्षिणी पेरू में 3925 मीटर की ऊंचाई पर स्थित
विल्माया पटजक्सा नामक पुरातात्विक स्थल पर युनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के रैन्डी
हास और उनके साथियों को छ: कब्रगाहों में लगभग 9000 साल पुराने मानव अवशेष मिले
थे। इनमें से दो कब्रों में पत्थर के औज़ार मिले थे जो शिकार में उपयोग किए जाते
थे। लेकिन इनमें से भी एक कब्र काफी दिलचस्प थी;
इसमें पत्थर के 20
फेंककर इस्तेमाल करने वाले औज़ार और ब्लेड शव की जांघ के ऊपरी हिस्से के पास करीने
से रखे हुए थे। ऐसा लगता था जैसे ये कमर पर किसी पाउच में रखे गए हैं। औज़ारों को
देखकर लगता था कि शव किसी प्रमुख शिकारी का होगा। और मान लिया गया कि वह पुरुष ही
रहा होगा।
लेकिन एरिज़ोना विश्वविद्यालय के
जैव-पुरातत्वविद् जिम वाटसन ने गौर किया कि हड्डियां पतली और हल्की हैं, इस
आधार पर उनका अनुमान था यह कोई महिला होगी। और अब हाल ही में हुआ अध्ययन इस अनुमान
की पुष्टि करता है कि वास्तव में यह शव महिला का ही है।
अब तक यह माना जाता रहा है कि प्राचीन
शिकारी-संग्रहकर्ता समूहों में शिकार का काम पुरुष किया करते थे और महिलाएं संग्रह
किया करती थीं। और शायद ही कभी उनकी इस लैंगिक भूमिका में अदला-बदली हुई होगी।
वर्तमान में मौजूद शिकारी-संग्रहकर्ता समूहों पर हुए अध्ययनों ने इस मान्यता को और
भी पुख्ता किया था; जैसे वर्तमान तंजानिया के हदजा समूह और दक्षिणी अफ्रीका के
सैन समूहों में पुरुष बड़े जानवरों का शिकार करते हैं और महिलाएं कंद, फल, मेवे
और बीज इकट्ठा करती हैं। लेकिन साइंस एडवांसेस पत्रिका में प्रकाशित यह
अध्ययन इस मान्यता को चुनौती देता और बताता है कि हमेशा से महिलाएं शिकार में
सक्षम थीं और वास्तव में करती भी थीं।
प्राप्त कंकालों के लिंग निर्धारण के लिए
शोधकर्ताओं ने एक नई विधि का उपयोग किया। उन्होंने पता लगाया कि दांत के एनेमल में
एमिलोजेनिन नामक प्रोटीन का नर संस्करण मौजूद है या मादा। पाया गया कि 20 औज़ारों
के साथ दफन शव महिला का था जिसकी उम्र 17-19 वर्ष के बीच होगी, औज़ारों
के साथ मिली दूसरी कब्र पुरुष की थी जिसकी उम्र 25-35 वर्ष के बीच होगी। महिला
कंकाल के दांतों में कार्बन और नाइट्रोजन के समस्थानिकों के अध्ययन से पता चला कि
उसका आहार विशिष्ट शिकारी आहार था।
इन नतीजों से प्रेरित होकर शोधकर्ताओं ने
अमेरिका के अन्य 107 पुरातात्विक स्थलों की 14,000 से 8000 वर्ष पुरानी 429 कब्रों
की पुन: जांच की। शिकार करने वाले औज़ारों के साथ 10 महिलाओं और 16 पुरुषों की कब्र
मिलीं। यह मेटा-विश्लेषण बताता है कि शुरुआत में शिकारी होने का आधार लैंगिक नहीं
था।
लेकिन कुछ शोधकर्ताओं का कहना है कि किसी
व्यक्ति की कब्र में औज़ारों के मिलने का हमेशा यह मतलब नहीं होता कि वे उनका उपयोग
भी करते होंगे, जैसे दो मादा शिशुओं की कब्र में भी औज़ार पाए गए थे। हो
सकता है कि नर शिकारी अपना दुख व्यक्त करने के लिए औज़ार समर्पित करते हों।
बहरहाल, यह शोध जेंडर भूमिकाओं सम्बंधी विमर्श में नया आयाम तो जोड़ता ही है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_image_-1280w__no_aspect/public/hunt_1000p.jpg?itok=mitNxcgF
दुनिया भर के कई देश/शहर कोरोनावायरस की दूसरी लहर और एक के
बाद एक लगते जा रहे दोबारा लॉकडाउन से गुज़र रहे हैं। संभवत: यह महामारी आने वाले
कुछ महीनों या सालों तक बनी रहने वाली है। ऐसे में आर्थिक,
सामाजिक और
मनौवैज्ञानिक क्षति पहुंचाने वाली संपूर्ण तालाबंदी की बजाय अन्य प्रभावी और
स्थायी विकल्प तलाशने की ज़रूरत है।
इस डिजिटल युग में दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा
डैटा कोविड-19 के प्रसार को रोकने में मदद कर सकता है। विभिन्न स्रोतों से जुटाए
गए डैटा की मदद से कोविड-19 के ‘सुपरस्प्रेडर स्थानों’ को पहचाना जा सकता है ताकि
हम पूरे शहर या देश में तालाबंदी करने की बजाय,
तालाबंदी की अन्य
निभने योग्य रणनीति बना सकें या सिर्फ उन स्थानों की तालाबंदी करें जहां से कोविड-19
के फैलने की संभावना अधिक है।
लोगों की तरह कुछ स्थान भी अधिक संक्रमण
फैलाने वाले ‘सुपरस्प्रेडर्स स्थान’ हो सकते हैं। शहरों में लगातार कुछ ना कुछ
गतिविधि होती रहती है। जैसे शहरों से होकर लोग गुज़रते हैं,
आते-जाते हैं, मिलते
हैं। इसलिए शहर मानव संपर्क और बीमारी फैलाने के केंद्र होते हैं। छोटी-बड़ी हर तरह
की बीमारी को फैलने से रोकने के प्रबंधन के लिए शहरों में लोगों की सामूहिक
गतिविधियों की रूपरेखा और शहरों में लोगों के आने-जाने और शहरों से गुज़रने के
पैटर्न को पहचानना-समझना ज़रूरी है।
अच्छी बात यह कि इन सुपरस्प्रेडर स्थानों
की पहचान के लिए हमारे पास मानव आवागमन का काफी डैटा है। हांगकांग, पेरिस
और सिंगापुर जैसे शहरों में बेहतर शहरी और आवागमन योजना के लिए पहले से ही परिवहन
डैटा का व्यवस्थित तरीके से विश्लेषण किया जाता रहा है। और अब राइड-शेयरिंग सेवाओं, इंटरनेट
से जुड़े डिवाइसेस (जैसे स्मार्ट लैम्पपोस्ट और स्मार्ट फोन) पर ट्रैफिक ऐप, और
स्थान को टैग करती हुई सोशल मीडिया पोस्ट से मानव आवागमन के पैटर्न, सामूहिक
गतिविधि और महामारी वाली जगहों को चिंहित करने में मदद मिल सकती है।
फिर इस डैटा को कोविड-19 के प्रसार के ताज़ा
आंकड़ों के आधार पर प्रोसेस किया जा सकता है। कोविड-19 के कुछ प्रभावी कारक भी
पहचाने गए हैं। जैसे, खुली जगहों पर मेलजोल छोटे,
बंद कमरों में मेलजोल
की तुलना में कम जोखिम भरा है। मास्क पहनने और सामाजिक दूरी रखने की कारगरता से तो
सभी सहमत हैं। बहरहाल कोविड-19 के प्रसार और मानव संपर्क की हमारी टूटी-फूटी समझ
संक्रमण के फैलाव का विस्तृत नक्शा बनाने में हमारी प्रमुख चुनौती है।
इसलिए नए प्रमाण इकट्ठे किए जा रहे हैं ताकि
संक्रमण की रोकथाम और नियंत्रण की योजनाएं बनाने,
उन्हें परिष्कृत और
सटीक करने के लिए स्थानीय सरकार और स्वास्थ्य विभागों के पास जानकारी उपलब्ध हो।
इसके अलावा, शहरों की मानव गतिविधि और सामाजिक संपर्क वाले स्थानों को
पहचानने वाले अनुसंधान कार्यों को बढ़ावा देने के लिए स्वस्थ वित्त-पोषण भी ज़रूरी
है। शहरों को ऐसे स्रोत भी बनाने चाहिए जो मानव गतिविधि का डैटा जुटा सकें। इसके
अलावा शहरों को, इस डैटा का सामाजिक हित के अनुसंधान में उपयोग करने के लिए
कानूनी और तकनीकी व्यवस्था भी बनानी चाहिए।
मानव आवागमन और संपर्क के डैटा को कोविड-19 के डैटा के साथ जोड़कर सुपरस्प्रेडर स्थानों को पहचानकर नियंत्रित किया जा सकता है, और असुरक्षित लोगों के लिए बेहतर प्रबंधन किया जा सकता है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://static.scientificamerican.com/sciam/cache/file/1CAED818-0543-4A83-993708175CF9A417_source.jpg?w=590&h=800&6FD09873-1B47-45EF-92E0B164EA3C6C8B
यह
काफी हैरत की बात है कि जब आप किसी मीठे खाद्य पदार्थ में नमक डालते हैं तो उसकी
मिठास और बढ़ जाती है। और अब हाल ही में वैज्ञानिकों ने मिठास में इस वृद्धि का
कारण खोज निकाला है।
भोजन
के स्वाद की पहचान हमारी जीभ की स्वाद-कलिकाओं में उपस्थित ग्राही कोशिकाओं से होती है। इनमें टी1आर समूह के ग्राही
दोनों प्रकार के मीठे, प्राकृतिक या
कृत्रिम शर्करा, के प्रति संवेदनशील
होते हैं। शुरू में वैज्ञानिकों का मानना था कि टी1आर को निष्क्रिय कर दिया जाए तो मीठे के
प्रति संवेदना खत्म हो जाएगी। लेकिन 2003 में देखा गया कि चूहों में टी1आर के जीन को ठप करने पर भी उनमें ग्लूकोज़
के प्रति संवेदना में कोई कमी नहीं आई। इस खोज से पता चला कि चूहों और संभवत: मनुष्यों में मिठास
की संवेदना का कोई अन्य रास्ता भी है।
इस
मीठे रास्ते का पता लगाने के लिए टोकियो डेंटल जूनियर कॉलेज के कीको यासुमत्सु और
उनके सहयोगियों ने सोडियम-ग्लूकोज़
कोट्रांसपोर्टर-1 (एसजीएलटी1) नामक प्रोटीन पर
ध्यान दिया। एसजीएलटी1 शरीर
के अन्य हिस्सों में ग्लूकोज़ के साथ काम करता है। गुर्दों और आंत में, एसजीएलटी1 ग्लूकोज़ को कोशिकाओं तक पहुंचाने के लिए
सोडियम का उपयोग करता है। यह काफी दिलचस्प है कि यही प्रोटीन मीठे के प्रति
संवेदनशील स्वाद-कोशिकाओं
में भी पाया जाता है।
इसके
बाद शोधकर्ताओं ने स्वाद कोशिकाओं से जुड़ी तंत्रिकाओं की प्रक्रिया का पता लगाने
के लिए ग्लूकोज़ और नमक के घोल को बेहोश टी1आर-युक्त चूहों की जीभ पर रगड़ा। यानी इस घोल
में एसजीएलटी1 की
क्रिया के लिए ज़रूरी सोडियम था। पता चला कि नमक की उपस्थिति होने से चूहों की
तंत्रिकाओं ने अधिक तेज़ी से संकेत प्रेषित किए बजाय उन चूहों के जिनके टी1आर ग्राही ठप कर दिए
गए थे और सिर्फ ग्लूकोज़ दिया गया था। गौरतलब है कि सामान्य चूहों ने भी चीनी-नमक को ज़्यादा तरजीह
दी लेकिन ऐसा केवल ग्लूकोज़ के साथ ही हुआ,
सैकरीन जैसी कृत्रिम मिठास के साथ नहीं।
यह
भी पता चला है कि जो पदार्थ एसजीएलटी1 की क्रिया को बाधित करते हैं,
वे टी1आर विहीन चूहों में ग्लूकोज़ संवेदना को खत्म कर देते हैं।
इससे यह पता लगता है कि एसजीएलटी1 ग्लूकोज़ की छिपी हुई संवेदना का कारण हो सकता है। संभावना
है कि इससे टी1आर
विहीन चूहों में ग्लूकोज़ की संवेदना बनी रही और सामान्य चूहों में मीठे के प्रति
संवेदना और बढ़ गई। एक्टा फिज़ियोलॉजिका में शोधकर्ताओं ने संभावना व्यक्त की
है कि शायद यह निष्कर्ष मनुष्यों के लिए भी सही है।
शोधकर्ताओं ने मीठे के प्रति संवेदनशील तीन प्रकार की कोशिकाओं के बारे में बताया है। पहली दो या तो टी1आर या एसजीएलटी1 का उपयोग करती हैं जो शरीर को प्राकृतिक और कृत्रिम शर्करा में अंतर करने में मदद करते हैं। एक अंतिम प्रकार टी1आर और एसजीएलटी1 दोनों का उपयोग करती हैं और वसीय अम्ल तथा उमामी स्वादों को पकड़ती हैं। लगता है, इनकी सहायता से कैलोरी युक्त खाद्य पदार्थों का पता चलता है।(स्रोत फीचर्स)
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पंजीकरण करना, फॉर्म भरना,
ई-मेल अकांउट खोलना
या अनुदान के लिए आवेदन करना, ये काम अधिकांश लोगों के लिए आसान हो सकते
हैं, लेकिन कुछ लोगों के लिए नहीं।
इंडोनेशियाई लोगों की तरह दुनिया के कई
समुदाय के लोगों का सिर्फ नाम होता है, उपनाम नहीं। लेकिन वेबसाइट के माध्यम से
कोई भी फॉर्म भरते वक्त या आवेदन करते वक्त आवेदक के लिए उपनाम भरना ज़रूरी रखा
जाता है, जब तक उपनाम ना लिखो तब तक फॉर्म सबमिट नहीं किया जाता। इन
हालात में, फॉर्म में उपनाम की खानापूर्ति के लिए कई लोग दोबारा अपना
नाम, ‘NA’
(लागू नहीं), ‘NULL’ (निरंक) या ऐसा ही कोई शब्द भर देते हैं।
अनुसंधान अनुदान पाने के लिए, फेलोशिप
आवेदन के समय, स्नातक कार्यक्रमों में दाखिले के वक्त या किसी शोधपत्र के
प्रकाशन में कई वैज्ञानिकों को भी इन्हीं स्थितियों का सामना करना पड़ता है। फार्म
भरे जाने के बाद वैज्ञानिकों को संस्थानों और पत्रिका के संपादकों को ई-मेल लिखकर
अपने नाम-उपनाम की इस स्थिति को स्पष्ट करना पड़ता है। लेकिन कभी वे स्पष्ट करना भूल
जाते हैं तो उन्हें भेजे पत्र में उपनाम की जगह भी उनका नाम ही लिख दिया जाता है
या ‘Dear NULL’ या ‘Dear NA’ से सम्बोधित किया जाता है। वह भी तब जब इन वैज्ञानिकों का आवेदन स्पैम मानकर
डैटाबेस से विलोपित न कर दिया जाए।
इस मुश्किल की वजह से कई इंडोनेशियाई वैज्ञानिकों
के कुछ ही शोधपत्र अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो पाए हैं या वे कुछ ही
सम्मेलनों में शामिल हो पाते हैं। लेकिन वैज्ञानिक समुदाय अब तक इस मुद्दे से पूरी
तरह से वाकिफ नहीं है। यह समस्या सिर्फ इंडोनेशियाई वैज्ञानिकों के साथ नहीं है
बल्कि एशिया के कई वैज्ञानिक भी ऐसी मुश्किलों का सामना करते हैं। जैसे दक्षिण
भारतीय लोग उपनाम के विकल्प के रूप में पिता का नाम लगाते हैं; जापानी, कोरियाई
और चीनी वैज्ञानिकों का नाम नामुनासिब तरीके से छोटा कर दिया जाता है, जो
भ्रम पैदा करता है।
इन अजीबो-गरीब सम्बोधनों से बचने के लिए कई
इंडोनेशियाई वैज्ञानिक अपना पारिवारिक नाम (उपनाम) तय करने को मजबूर हो जाते हैं
या कई एशियाई वैज्ञानिक पश्चिमी नामों को अपना लेते हैं। या ई-मेल अकाउंट खोलने
जैसे कामों में परिवार के किसी सदस्य का नाम इस्तेमाल कर लेते हैं। लेकिन इस तरह वैज्ञानिकों
के लिए सही नाम के साथ अपना वैज्ञानिक रिकॉर्ड बनाना मुश्किल है। लोग नकली उपनामों
को असली मानकर दस्तावेज़ या प्रमाण पत्र में लिख देते हैं। जब तक वैज्ञानिक स्थिति
स्पष्ट करते हैं तब तक दस्तावेज़ों पर वह नाम छप चुका होता है और उन्हें गलत नाम
वाले दस्तावेज़ स्वीकार करने पड़ते हैं। जैसे-जैसे डिजिटल दुनिया हावी हो रही है और
लिंक्डइन और रिसर्चगेट जैसी ऑनलाइन सेवाएं शक्तिशाली हो रही हैं, एकल
नाम वाले वैज्ञानिक दौड़ में पिछड़ते जा रहे हैं।
अब ज़रूरत है कि विज्ञान संस्कृति संवेदी बने। लेखकों की पहचान के लिए नाम की बजाय ORCID (ओपन रिसर्चर एंड कॉन्ट्रीब्यूटर) कोड जैसी विशिष्ट पहचान प्रणाली हो; पुष्टिकरण ई-मेल में सरनेम का आग्रह न हो; और अकादमिक जगहों पर उपनाम देना अनिवार्य ना हो।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://media.nature.com/lw800/magazine-assets/d41586-020-02761-z/d41586-020-02761-z_18416114.jpg
वैसे तो यहां जिन मिथकों की चर्चा की गई है, वे मूलत: संयुक्त राज्य अमेरिका के सोशल मीडिया पर किए गए शोध और अन्य जानकारियों पर आधारित हैं। लेकिन थोड़े अलग रूप में ये भारत के सोशल मीडिया में भी नज़र आ जाते हैं।
कोरोनावायरस महामारी के साथ-साथ विश्व एक और महामारी से लड़
रहा है जिसे ‘इंफोडेमिक’ का नाम दिया गया है। इस ‘सूचनामारी’ के चलते लोग रोग की
गंभीरता को कम आंकते हैं और सुरक्षा के उपायों को अनदेखा करते हैं। यहां इस
महामारी से सम्बंधित कुछ मिथकों पर चर्चा की गई है।
मिथक 1: नया कोरोनावायरस चीन की प्रयोगशाला
में तैयार किया गया है
चूंकि इस वायरस का सबसे पहला संक्रमण चीन
में हुआ था, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बिना किसी सबूत के यह
दावा कर दिया कि इसे चीन की प्रयोगशाला में तैयार किया गया है। हालांकि अमेरिकी
खुफिया एजेंसियों ने इन सभी दावों को खारिज करते हुए कहा है कि न तो यह मानव
निर्मित है और न ही आनुवंशिक फेरबदल से बना है। साइंटिफिक अमेरिकन में
प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार चीनी वायरोलॉजिस्ट शी ज़ेंगली और उनकी टीम द्वारा इस
वायरस के डीएनए अनुक्रम की तुलना गुफावासी चमगादड़ों में पाए जाने वाले कोरोनावायरसों
से करने पर कोई समानता नज़र नहीं आई। इस वायरस के प्रयोगशाला में तैयार न किए जाने
पर ज़ेंगली ने एक विस्तृत आलेख साइंस पत्रिका में प्रकाशित भी किया है।
गौरतलब है कि ट्रम्प ने ज़ेंगली की प्रयोगशाला पर वायरस विकसित करने का इल्ज़ाम
लगाया था। इस मुद्दे पर स्वतंत्र जांच की मांग को देखते हुए चीन ने विश्व
स्वास्थ्य संगठन के शोधकर्ताओं को भी आमंत्रित किया है। लेकिन सबूत के आधार पर यही
कहा जा सकता है कि सार्स-कोव-2 को प्रयोगशाला में तैयार नहीं किया गया है।
मिथक 2: उच्च वर्ग के लोगों ने ताकत और
मुनाफे के लिए वायरस को जानबूझकर फैलाया है
जूडी मिकोविट्स नामक एक महिला ने सोशल
मीडिया पर 26 मिनट की षडयंत्र-सिद्धांत आधारित फिल्म ‘प्लानडेमिक’ और अपने ही
द्वारा लिखित एक किताब में नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इन्फेक्शियस डिसीज़ के
निर्देशक एंथोनी फौसी और माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स पर इल्ज़ाम लगाया
है कि उन्होंने इस बीमारी से फायदा उठाने के लिए अपनी ताकत का उपयोग किया है। यह
वीडियो कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर 80 लाख से अधिक लोगों ने देखा।
साइंस और एक अन्य वेबसाइट politifact ने जांच करने के बाद इस दावे को झूठा
पाया। हालांकि इस वीडियो को अब सोशल मीडिया से हटा लिया गया है लेकिन इससे स्पष्ट
है कि गलत सूचनाएं बहुत तेज़ी से फैलती हैं।
मिथक 3: कोविड-19 सामान्य फ्लू के समान ही
है
महामारी के शुरुआती दिनों से ही राष्ट्रपति
ट्रम्प ने बार-बार दावा किया कि कोविड-19 मौसमी फ्लू से अधिक खतरनाक नहीं है।
लेकिन 9 सितंबर को वाशिंगटन पोस्ट ने ट्रम्प के फरवरी और मार्च में लिए गए
साक्षात्कार की एक रिकॉर्डिंग जारी की जिससे पता चलता है कि वे (ट्रम्प) जानते थे
कि कोविड-19 सामान्य फ्लू से अधिक घातक है लेकिन इसकी गंभीरता को कम करके दिखाना
चाहते थे।
हालांकि कोविड-19 की मृत्यु दर का सटीक
आकलन तो मुश्किल है लेकिन महामारी विज्ञानियों का विचार है कि यह फ्लू की तुलना
में कहीं अधिक है। फ्लू के मामले में टीकाकरण या पूर्व संक्रमण के कारण कई लोगों
में कुछ प्रतिरोधक क्षमता तो है, जबकि अधिकांश विश्व ने अभी तक कोविड-19 का
सामना ही नहीं किया है। ऐसे में कोरोनावायरस सामान्य फ्लू के समान तो नहीं है।
मिथक 4: मास्क पहनने की ज़रूरत नहीं है
हालांकि सीडीसी और डब्ल्यूएचओ द्वारा मास्क
के उपयोग पर प्रारंभिक दिशानिर्देश थोड़े भ्रामक थे लेकिन अब सभी मानते हैं कि
मास्क का उपयोग करने से कोरोनावायरस को फैलने से रोका जा सकता है। काफी समय से पता
रहा है कि मास्क का उपयोग किसी संक्रमण को फैलने से रोकने में काफी प्रभावी है। अब
तो यह भी स्पष्ट है कि कपड़े से बने मास्क भी कारगर हैं। फिर भी कई साक्ष्यों के
बावजूद कुछ लोगों ने मास्क को नागरिक स्वतंत्रता का उल्लंघन बताते हुए पहनने से
इन्कार कर दिया।
मिथक 5: हायड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन एक प्रभावी
उपचार है
फ्रांस में किए गए एक छोटे अध्ययन के आधार
पर सुझाव दिया गया कि मलेरिया की दवा हायड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का उपयोग इस बीमारी
के इलाज में प्रभावी हो सकता है। इसकी व्यापक आलोचना और इसके प्रभावी न होने के
साक्ष्य के बावजूद ट्रम्प और अन्य लोगों ने इसे जारी रखा। फूड एंड ड्रग
एडमिनिस्ट्रेशन ने भी शुरुआत में अनुमति देने के बाद ह्रदय सम्बंधी समस्याओं के
जोखिम के कारण इसे नामंज़ूर कर दिया। कई अध्ययनों से पर्याप्त साक्ष्य मिलने के बाद
भी ट्रम्प ने इस दवा का प्रचार जारी रखा।
मिथक 6: ‘ब्लैक लाइव्ज़ मैटर’ प्रदर्शन के
कारण संक्रमण में वृद्धि हुई है
अमेरिका में पुलिस द्वारा जॉर्ज फ्लॉयड की
हत्या के बाद मई-जून में अश्वेत अमरीकियों के विरुद्ध हिंसा के खिलाफ बड़े स्तर पर
लोगों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया। कई लोगों ने दावा किया कि इन प्रदर्शनों
में भीड़ जमा होने से कोरोनावायरस के मामलों में वृद्धि हुई। लेकिन नेशनल ब्यूरो ऑफ
इकॉनोमिक रिसर्च द्वारा अमेरिका के 315 बड़े शहरों में हुए विरोध प्रदर्शनों के एक
विश्लेषण से ऐसे कोई प्रमाण नहीं मिले हैं जिससे यह कहा जा सके कि इन प्रदर्शनों
के कारण कोविड-19 मामलों में वृद्धि हुई है या अधिक मौतें हुई हैं। वास्तव में
प्रदर्शन करने वाले लोगों में संचरण का जोखिम बहुत कम था और अधिकांश
प्रदर्शनकारियों ने मास्क का उपयोग किया था।
मिथक 7: अधिक परीक्षण के कारण कोरोनावायरस
मामलों में वृद्धि हुई है
राष्ट्रपति ट्रम्प ने यह दावा किया कि
अमेरिका में कोरोनावायरस के बढ़ते मामलों का कारण परीक्षण में हो रही वृद्धि है।
यदि यह सही है तो परीक्षणों में पॉज़िटिव परिणामों के प्रतिशत में कमी आनी चाहिए
थी। लेकिन कई विश्लेषणों ने इसके विपरीत परिणाम दर्शाए हैं। यानी वृद्धि वास्तव
में हुई है।
मिथक 8: संक्रमण फैलेगा तो झुंड प्रतिरक्षा
प्राप्त की जा सकती है
महामारी की शुरुआत में यूके और स्वीडन ने
झुंड प्रतिरक्षा के तरीके को अपनाया। इस तकनीक में वायरस को फैलने दिया जाता है जब
तक आबादी में झुंड प्रतिरक्षा विकसित नहीं हो जाती है। लेकिन इस दृष्टिकोण में एक
बुनियादी दोष है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि झुंड प्रतिरक्षा हासिल करने के लिए
60 से 70 प्रतिशत लोगों का संक्रमित होना आवश्यक है। कोविड-19 की उच्च मृत्यु दर
को देखते हुए झुंड प्रतिरक्षा प्राप्त करते-करते करोड़ों लोग मारे जाते। इसी कारण
इस महामारी में यूके की मृत्यु दर सबसे अधिक है। यूके और स्वीडन में लोगों की जान
और अर्थव्यवस्था का भी काफी नुकसान हुआ। देर से ही सही,
यू.के. सरकार ने इस
गलती में सुधार किया और लॉकडाउन लागू किया।
मिथक 9: कोई भी टीका असुरक्षित होगा और
कोविड-19 से अधिक घातक होगा
एक ओर वैज्ञानिक निरंतर टीका विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं ये चिंताजनक रिपोर्ट्स भी सामने आ रही हैं कि शायद कई लोग इसे लेने से इन्कार कर देंगे। संभावित टीके को साज़िश के रूप में देखा जा रहा है। प्लानडेमिक फिल्म में तो यह भी दावा किया गया है कि कोविड-19 का टीका लाखों लोगों की जान ले लेगा। साथ ही यह दावा भी किया गया है कि पहले भी टीकों ने लाखों लोगों को मौत के घाट उतारा है। लेकिन तथ्य यह है कि टीकों ने करोड़ों जानें बचाई हैं। यदि उपरोक्त दावा सही है, तो अलग-अलग चरणों में परीक्षण के दौरान लोगों की मौत हो जानी चाहिए थी। टीका-विरोधी समूहों द्वारा प्रस्तुत एक अन्य साज़िश-सिद्धांत में तो कहा गया है कि बिल गेट्स एक गुप्त योजना बना रहे हैं जिसके तहत टीकों के माध्यम से लोगों में माइक्रोचिप लगा दी जाएगी। इससे इतना तो स्पष्ट है कि टीके के निरापद होने की बात पर अत्यधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है, अन्यथा ऐसी बातों को तूल मिलेगा।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://static.scientificamerican.com/sciam/cache/file/E4027069-A4E4-41E2-8E1556539BCCC03E_source.jpg?w=590&h=800&9E43B90F-9523-4D32-B59E75B0645A6602
हम में से कई लोगों को अजीबो-गरीब सपने आते हैं। मनोविज्ञानी
इन सपनों का विश्लेषण करके मरीज़ को तनाव की स्थिति से उबरने में मदद करते हैं। और
अब, शोधकर्ताओं ने एक ऐसा एल्गोरिदम विकसित किया है जो सपनों का
विश्लेषण कर मरीज़ों के तनाव और मानसिक समस्या का कारण पहचानने में मदद कर सकता है।
वैसे तो सपनों के आधार पर निष्कर्ष निकालना
प्राचीन काल से चला आ रहा है। लेकिन आजकल के अधिकांश मनोविज्ञानी ‘सातत्य
परिकल्पना’ के तहत मानते हैं कि सपने हमारे जागते जीवन की निरंतरता होते हैं। वे
सपनों को अलग-अलग वर्गों में छांटते हैं और उनमें किसी तरह का पैटर्न देखने की
कोशिश करते हैं। इसमें समय लगता है। इस समय को घटाने के लिए नोकिया बेल लैब के
कंप्यूटेशनल सोशल साइंटिस्ट लुसा मारिया एइलो और उनके साथियों ने एक एल्गोरिदम
तैयार किया है। इस एल्गोरिदम की मदद से उन्होंने 24,000 से अधिक सपनों का विश्लेषण
किया। इन सपनों के विवरण उन्होंने सपनों के सार्वजनिक डैटाबेस DreamBank.net से लिए थे।
यह एल्गोरिदम सपनों के विवरणों की भाषा को
छोटे-छोटे हिस्सो में तोड़ता है: पैराग्राफ को वाक्यों में,
वाक्यों को वाक्यांश
में, और वाक्यांश को शब्दों में। फिर,
हर शब्द का एक-दूसरे
से सम्बंध पता करने के लिए एक वृक्ष बनाता है। वृक्ष का प्रत्येक शब्द एक पत्ती और
शब्दों को जोड़ने वाली शाखाएं व्याकरण के नियम दर्शाती हैं। एल्गोरिदम इन शब्दों को
अलग-अलग वर्गों में बांटता है (जैसे लोग या जानवर) और उन्हें सकारात्मक या
नकारात्मक भावनाओं से जोड़ता है। शब्दों के बीच आक्रामक,
दोस्ताना या लैंगिक
सम्बंध भी देखे जाते हैं।
फिर,
मनोविज्ञानियों के
बीच लोकप्रिय एक कोडिंग प्रणाली का उपयोग कर एल्गोरिदम हर सपने के लिए स्कोर की
गणना करता है, जैसे आक्रामकता का औसत,
या नकारात्मक और
सकारात्मक भावनाओं का अनुपात। रॉयल सोसाइटी ओपन साइंस में शोधकर्ताओं ने
बताया है कि मनोविज्ञानियों द्वारा दिए गए स्कोर और एल्गोरिदम द्वारा दिए गए स्कोर
76 प्रतिशत मेल खाते थे।
शोधकर्ताओं के अनुसार यह एल्गोरिदम
मनोविज्ञानियों को असामान्य सपनों की पहचान करने में मदद कर सकता है, जिनसे
मरीज़ के तनाव या मानसिक समस्या का कारण पता लगाया जा सकता है। एल्गोरिदम स्वस्थ
व्यक्ति के सपनों के औसत स्कोर से मरीज़ों के सपनों के स्कोर की तुलना करके
असामान्य सपनों की पहचान करता है। इसके अलावा,
एल्गोरिदम यह भी
बताता है कि अलग-अलग लिंग, आयु या मन:स्थिति के सपने किस तरह अलग-अलग
होते हैं।
इस सम्बंध में हारवर्ड विश्वविद्यालय के रॉबर्ट स्टिकगोल्ड का कहना है कि यह तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है। लेकिन विभिन्न जनांकिक समूहों के अपने सपनों का वर्णन करने के तरीके में अंतर के होने के कारण, सपनों में अंतर दिख सकते हैं। जैसे, ज़रूरी नहीं कि महिलाएं सपने में पुरुषों से अधिक भावनाओं का अनुभव करती हों, लेकिन वे सपनों को बताते वक्त अधिक भावुक शब्दों का उपयोग कर सकती हैं। इसलिए सपनों और सपनों के वर्णन में फर्क पहचानने की ज़रूरत है। स्टिकगोल्ड यह भी कहते हैं कि सपने देखने वाले के बारे में जाने बिना सपनों को जीवन से जोड़ना मुश्किल है। एइलो इससे सहमत हैं और मानते हैं कि यह एल्गोरिदम चिकित्सकों के मददगार औज़ार के रूप में काम करेगा, उनकी जगह नहीं लेगा।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/grid_thumb_-290x163__16_9/public/ca_0731NID_Drawing_online.jpg?itok=V1VzWAOc
आजकल साबुन, हैंड सेनिटाइज़र्स,
कपड़े धोने के
डिटर्जेंट, बाथरूम-टॉयलेट साफ करने के एसिड्स,
फर्श साफ करने, बर्तन
साफ करने, सब्ज़ियां धोने के उत्पादों वगैरह सबके विज्ञापनों में एक
महत्वपूर्ण बात जुड़ गई है। वह बात यह है कि ये उत्पाद 99.9 प्रतिशत जम्र्स को
मारते हैं। मज़ेदार बात यह है कि सारे उत्पाद जादुई ढंग से 99.9 प्रतिशत जम्र्स को ही
मारते हैं। और तो और, ये विज्ञापन आपको यह भी सूचित करते हैं कि ये कोरोनावायरस
को भी मार देते हैं।
मेरा ख्याल है कि काफी लोग बहुत खुश होंगे
कि चलो, अब जम्र्स से छुटकारा मिलेगा और खुशी-खुशी इनमें से कोई
उत्पाद खरीद लेंगे। विज्ञापनों का मकसद इसी के साथ पूरा हो जाता है। दरअसल, ऐसे
विज्ञापनों के दो मकसद होते हैं – पहला प्रत्यक्ष मकसद होता है उस उत्पाद विशेष की
बिक्री को बढ़ाना। लेकिन दूसरा मकसद भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है – उस श्रेणी के
उत्पादों की ज़रूरत की महत्ता को स्थापित करना। जैसे,
गोरेपन की क्रीम के
विज्ञापन उस क्रीम विशेष की बिक्री को बढ़ाने की कोशिश तो करते ही हैं, गोरेपन
को एक वांछनीय गुण के रूप में भी स्थापित करते हैं। तो जर्म-नाशी उत्पादों के
विज्ञापन जर्म-नाश के महत्व को प्रतिपादित करते हैं।
इन जर्म-नाशी उत्पादों के 99.9 प्रतिशत के
दावों पर संदेह नहीं करेंगे, हालांकि वह अपने आप में एक मुद्दा है। मेरी
चिंता तो उन बचे हुए 0.1 प्रतिशत जम्र्स की है जिन्हें ये उत्पाद इकबालिया रूप से
नहीं मार पाते। यहां एक बात स्पष्ट कर देना ज़रूरी है। कोरोनावायरस समेत सारे वायरस
निर्जीव कण होते हैं, इसलिए मारने की बात ही बेमानी है। मरे हुए को क्या मारेंगे? लेकिन
मान लेते हैं कि ये उत्पाद 99.9 प्रतिशत कोरोनावायरस को भी मार डालेंगे और 0.1
प्रतिशत को बख्श देंगे। सवाल है कि ये 0.1 प्रतिशत क्या करेंगे। इन 0.1 प्रतिशत का
हश्र देखने के लिए हमें थोड़ा इतिहास में लौटना होगा।
एलेक्ज़ेंडर फ्लेमिंग ने पेनिसिलीन नामक
एंटीबायोटिक औषधि की खोज 1928 में की थी और 1941 में इसका उपयोग एक दवा के रूप में
शुरू हुआ। 1942 में पहला पेनिसिलीन-प्रतिरोधी बैक्टीरिया खबरों में आ चुका था।
डीडीटी से तो काफी लोग परिचित हैं। यह भी सभी जानते हैं कि मलेरिया मच्छर के काटने
से फैलता है। मलेरिया पर नियंत्रण की एक प्रमुख रणनीति यह थी कि मच्छरों का सफाया
कर दिया जाए। डीडीटी के छिड़काव से मच्छर तेज़ी से मरते थे। लेकिन कुछ ही वर्षों में
स्पष्ट हो गया कि डीडीटी मच्छरों को मारने में असमर्थ हो गया है। मच्छरों में
डीडीटी के खिलाफ प्रतिरोध पैदा हो गया था।
प्रतिरोधी जीवों का यह मसला आज एक
महत्वपूर्ण समस्या है। चाहे जम्र्स हों, फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीट हों, रोगवाहक
मच्छर हों, हर तरफ प्रतिरोधी जीव नज़र आ रहे हैं। सवाल है कि प्रतिरोध
पैदा कैसे होता है।
एंटीबायोटिक प्रतिरोध का कारण क्या है? बैक्टीरिया
का जीवन चक्र और प्रत्येक पीढ़ी का समय मिनटों और घंटों में होता है। और जब इस तरह
की बैक्टीरिया कॉलोनी को एंटीबायोटिक दवा से उपचारित किया जाता है तो कॉलोनी का
सफाया (99.9 प्रतिशत!) हो जाता है। लेकिन कॉलोनी में कभी-कभी संयोगवश म्यूटेशन
उत्पन्न हो जाता है या उनमें एकाध बैक्टीरिया ऐसा होता है (0.1 प्रतिशत) जो उस
एंटीबायोटिक से अप्रभावित रहता है। 99.9 प्रतिशत तो मर गए लेकिन वे 0.1 प्रतिशत
संख्या वृद्धि करते रहते हैं, बल्कि प्रतिस्पर्धा के अभाव में और तेज़ी से
संख्या वृद्धि करते हैं। इसकी वजह से ऐसी संतति पैदा होती है जो एंटीबायोटिक की
प्रतिरोधी होती है। धीरे-धीरे दवा-प्रतिरोधी गुण वाले बैक्टीरिया तेज़ी से वृद्धि
करके कॉलोनी पर हावी हो जाते हैं। यह एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी किस्म है। उसी
एंटीबायोटिक से इन्हें मारने की कोशिश में सफलता कम या नहीं मिलेगी। इस प्रक्रिया
के चलते हमारे द्वारा खोजे गए कई एंटीबायोटिक निष्प्रभावी हो चुके हैं।
एंटीबायोटिक-प्रतिरोध की समस्या को स्वास्थ्य जगत में अत्यंत महत्वपूर्ण समस्या
माना गया है।
यही हाल डीडीटी का भी हुआ था और विभिन्न कीटनाशकों (पेस्टिसाइड्स) का भी। और अब हम घर-घर पर, सतह-सतह पर यही प्रयोग दोहराने को तत्पर हैं। सोचने वाली बात यह है कि यदि एक साथ इतने सारे जर्म-नाशी निष्प्रभावी हो गए तो क्या होगा। (स्रोत फीचर्स)
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जब कोविड-19 का टीका बनकर तैयार होगा, वैश्विक
आवश्यकता की तुलना में इसकी आपूर्ति सीमित होगी। कई स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना
है कि टीका सबसे पहले दुनिया भर के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को, फिर
गंभीर जोखिम वाले लोगों को, फिर उन क्षेत्रों को जहां बीमारी तेज़ी से
फैल रही है, और आखिर में बाकी लोगों को मिलना चाहिए। टीका वितरण की यह
रणनीति सबसे अधिक ज़िंदगियां बचाएगी और संक्रमण के प्रसार को रोकेगी। यह बेतुका
होगा कि टीका दक्षिण अफ्रीका के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की बजाय अमीर देशों के कम
जोखिम वाले लोगों को पहले मिले।
फिर भी पैसा और राष्ट्रीय हित जीत सकते
हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका और युरोप पहले ही टीका निर्माताओं को करोड़ों खुराक का
ऑर्डर दे रहे हैं जिससे शायद दुनिया के गरीब देशों के लिए बहुत कम टीके बचेंगे। इस
स्थिति से बचने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने
टीके के समतामूलक वितरण का एक तरीका निकाला है: कोविड-19 वैक्सीन ग्लोबल एक्सेस (COVAX) फेसिलिटी। वे अमीर देशों से इस पर हस्ताक्षर करवा कर टीकों पर उनकी अनुचित
दावेदारी के खतरे को कम करना चाहते हैं।
वैसे टीका या औषधि वितरण का इतिहास आशाजनक
नहीं रहा है। 1996 में एचआईवी संक्रमण के उपचार में एंटीवायरल औषधि ने पश्चिम
देशों में कई ज़िंदगियां बचाई, लेकिन इसे व्यापक रूप से अफ्रीका तक
पहुंचने में 7 साल लग गए। 2009 में H1N1
इन्फ्लूएंज़ा महामारी के दौरान कई देशों को बहुत कम संख्या में टीके मिले थे वह भी
लंबे इंतज़ार के बाद।
इस बार भी अमीर देशों की चिंता अपने
नागरिकों तक सीमित है। यूएस ने टीका कंपनियों के साथ 6 अरब डॉलर के समझौते किए हैं
और युरोपीय संघ ने एस्ट्राज़ेनेका के साथ 40 करोड़ टीके खरीदने के सौदे पर हस्ताक्षर
किए हैं। यूके ने भी यही रणनीति अपनाई है।
COVAX के पीछे विचार यह है कि विभिन्न 12 टीकों में निवेश किया जाए और उन तक आसान
पहुंच सुनिश्चित की जाए। 2021 के अंत तक टीकों की 2 अरब खुराक प्राप्त करने का
लक्ष्य है: 95 करोड़ उच्च व उच्च-मध्यम आय वाले देशों के लिए, 95
करोड़ निम्न व निम्न-मध्यम आय वाले देशों के लिए और 10 करोड़ आपात उपयोग के लिए।
COVAX के अधिकारी जानते हैं कि COVAX से जुड़ने के बावजूद कई अमीर देश टीका
निर्माता कंपनियों के साथ सौदे तो करेंगे। लेकिन COVAX अनुबंध एक प्रकार का
बीमा है कि यदि उनके खरीदे टीके असफल रहे तो COVAX के माध्यम से उनकी
पहुंच अन्य टीकों तक रहेगी।
टीकों के असफल होने के जोखिम को कम करने के
लिए COVAX की योजना विभिन्न प्रकार के टीकों में निवेश करने की है। इसके अलावा COVAX विभिन्न देशों की कंपनियों से टीके लेना चाहता है ताकि कोई भी देश उनका
निर्यात रोक ना सके।
अब तक, 70 से अधिक देशों ने COVAX में रुचि दिखाई है। यह बात और है कि वे इस पर हस्ताक्षर करते हैं या नहीं। वहीं युरोपीय संघ के कुछ देश, जो अक्सर वैश्विक एकजुटता के महत्व पर बल देते हैं, COVAX को वित्तीय मदद देने का इरादा रखते हैं लेकिन COVAX के माध्यम से खुद के लिए टीके नहीं लेंगे। डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स एक्सेस अभियान की टीका विशेषज्ञ कैट एल्डर का कहना है कि COVAX समतामूलक वितरण का अच्छा तरीका है लेकिन यह अधिक पारदर्शी होना चाहिए।(स्रोत फीचर्स)
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हीरा तराश रॉबर्ट फिलिप्स ने 2018 में अपने 90वें जन्मदिन पर
इतिहास की एक अनमोल धरोहर युनाइटेड किंगडम को लौटाने का फैसला लिया था। यह धरोहर
प्रसिद्ध समारक स्टोनहेंज के केंद्र में स्थित एक शिला का 91 सेंटीमीटर लंबा
बेलनाकार हिस्सा है। और अब इस हिस्से का विश्लेषण कर पुरातत्वविदों ने इस बात की
पुष्टि की है कि स्मारक की सबसे बड़ी शिला का पत्थर लगभग 25 किलोमीटर दूर स्थित
जंगल मार्लबोरो डाउंस से लाया गया था।
स्टोनहेंज का निर्माण अनुष्ठान स्थल के रूप में लगभग 3000 ईसा पूर्व शुरू हुआ था। यह बड़ी और छोटी शिलाओं को एक वृत्त में जमा कर बना है। इस स्मारक में 25 टन वजनी, 52 विशाल सिलिका शिलाएं हैं जिन्हें सारसेन्स कहा जाता है। शोधकर्ताओं का मानना था कि सारसेन्स शिलाएं मार्लबोरो डाउंस से लाई गईं थी। जबकि स्टोनहेंज के केंद्र में स्थित अन्य छोटी शिलाएं, जिन्हें ब्लूस्टोन्स कहा जाता है, लगभग 150 किलोमीटर दूर वेल्स के विभिन्न स्थलों से लाईं गई थीं।
दरअसल 1958 में फिलिप्स एक ऐसे दल का
हिस्सा थे जो स्टोनहेंज की तीन सारसेन्स शिलाओं को फिर से खड़ा करने का काम कर रहा
था। जब शिला क्रमांक 58 को उठाया गया तो पता चला कि वह टूट चुकी थी। इसे जोड़ने के
लिए उन्होंने शिला के बीच में एक सुराख किया और धातु के बोल्ट की मदद से कस दिया।
सुराख से जो टुकड़ा निकला था उसे फिलिप्स ने अपने पास रख लिया था।
चूंकि अब जब स्टोनहेंज के अवशेषों को किसी
भी तरह की क्षति पहुंचाना प्रतिबंधित है, तो जब फिलिप्स ने यह टुकड़ा लौटाया तो ब्राइटन
युनिवर्सिटी के पुरातत्वविद और भूगोलविद डेविड नैश और उनके साथियों को सारसेन्स
शिलाओं के मूल स्थान के बारे में पता लगाने का महत्वपूर्ण साधन मिल गया।
शोधकर्ताओं ने पोर्टेबल एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर की मदद से सभी 52 सारसेन्स शिलाओं की रासायनिक संरचना पता की, उन्हें नुकसान पहुंचाए बगैर। शिलाओं में 99 प्रतिशत से अधिक सिलिका के अलावा एल्यूमीनियम, कार्बन, लोहा, पोटेशियम और मैग्नीशियम सहित अन्य तत्व मौजूद थे। सभी 52 में से 50 शिलाओं की रासायनिक रचना एकदम समान थी, जिससे लगता है कि सभी शिलाएं एक ही जगह से लाई गईं थी।
इसके बाद शोधकर्ताओं ने एक्स-रे
स्पेक्ट्रोमेट्री से भी अधिक बारीकी से रासायनिक पहचान के लिए फिलिप्स द्वारा
लौटाए टुकड़े के आधे हिस्से को चूर-चूर किया और इसका रासायनिक विश्लेषण किया। इसकी
तुलना उन्होंने दक्षिणी और पूर्वी इंग्लैंड के 20 विभिन्न क्षेत्रों से लिए गए
चट्टान के नमूनों से की। उन्होंने पाया कि सारसेन्स शिला का वह टुकड़ा वेस्ट वुड
चट्टानी क्षेत्र के नमूने से पूरी तरह से मेल खाता है। यह क्षेत्र मार्लबोरो डाउंस
के दक्षिण पूर्व में स्थित है। शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन के नतीजे साइंस
एडवांसेस पत्रिका में प्रकाशित किए हैं।
कुछ शोधकर्ताओं का कहना है कि तुलना के लिए अधिक इलाकों के नमूने लिए जाने चाहिए थे। लेकिन यह खुशी की बात है कि लंबे समय से शोध का केंद्र बने ब्लूस्टोन शिलाओं के इतर सारसेन्स शिलाओं का अध्ययन किया गया। शोध के मामले में सारसेन्स शिलाएं लंबे समय से उपेक्षित थीं।(स्रोत फीचर्स)
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मैकजी
एक सरिसृप जीव विज्ञानी यानी हर्पेटोलॉजिस्ट हैं। वे दक्षिण-पूर्वी युनाइटेड स्टेट्स में पाई जाने वाली
यैरोस कंटीली छिपकली का अध्ययन करती हैं। हर्पेटोलॉजिस्ट लोग छिपकली को पकड़ने के
लिए आम तौर पर जिस शब्द का उपयोग करते हैं वह है ‘नूसिंग’। लेकिन मैकजी,
जो कि एक अश्वेत वैज्ञानिक हैं,
को इस शब्द का उपयोग काफी बेचैन करता है।
वास्तव
में ‘नूसिंग’ शब्द का उपयोग
अमेरिका में 19वीं
और 20वीं
सदी में गोरे लोगों द्वारा अश्वेत लोगों को घेरकर मारने के लिए किया जाता था।
मैकजी अपने साथियों को समझाने की कोशिश कर रही हैं कि इस कार्य के लिए ‘लैसोइंग’ शब्द ज़्यादा माकूल
होगा। लैसो डोरी को कहते हैं और छिपकली-गिरगिटों को इसी की मदद से पकड़ा जाता है।
मैकजी
ही नहीं, कई अन्य शोधकर्ता भी
विज्ञान को ऐसे शब्दों व नामों से छुटकारा दिलाने की बात कर रहे हैं जो घिनौने
लगते हैं या नस्लवादी विचारों का महिमामंडन करते हैं। इसी सम्बंध में एक वैज्ञानिक
समिति एक शोध पत्रिका का नाम बदलने पर विचार कर रही है जो एक नस्लवादी वैज्ञानिक
के नाम पर रखा गया था। इसी तरह कोल्ड स्प्रिंग हार्बर लेबोरेटरी (सीएसएचएल) और अन्य संस्थान भी
अपने कैंपस की इमारतों का नाम बदलने पर विचार कर रहे हैं जो नस्लवादी सोच रखने
वाले लोगों के नाम पर रखे गए थे।
वास्तव
में मई माह में मिनियापोलिस के श्वेत पुलिस अधिकारी द्वारा एक अश्वेत व्यक्ति
जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या से पूरे अमेरिका में आक्रोश देखने को मिला। इसके
परिणामस्वरूप देश भर में संस्थागत नस्लवाद के विरोध में प्रदर्शन हुए। ऐसे में
विज्ञान क्षेत्र में भी श्वेत श्रेष्ठतावाद को खत्म करने की पहल की जा रही है।
इसके अंतर्गत ऐसी इमारतों, पत्रिकाओं,
पुरस्कारों तथा जीवों के नामों की छानबीन की जा रही है
जिनमें नस्लवाद झलकता है। यहां तक कि ऐसी बड़ी-बड़ी हस्तियों को भी जांच के दायरे में लाया
जा रहा है जिन्होंने अश्वेत लोगों की मनुष्यता को कमतर बताने के प्रयास किए और
वास्तविक भेदभाव, वंध्याकरण या
नरसंहार की वैचारिक बुनियाद तैयार की।
गौरतलब
है कि इस तरह की पहल नाज़ी जर्मनी और दक्षिण अफ्रीका में रंगभेदी शासन के पतन के
बाद भी की गई थी। उस समय भी नाज़ी जर्मनी का समर्थन करने वाले वैज्ञानिकों के
पुरस्कार छीन कर उनको संस्थानों से भी बाहर कर दिया गया था। हालिया विरोध प्रदर्शन
के काफी पहले से ही नस्लवादी सोच वाले वैज्ञानिकों के नाम पर रखे गए इमारतों,
पत्रिकाओं के नाम आदि का निरंतर विरोध किया जा रहा है।
मिशिगन विश्वविद्यालय की इतिहासकार एलेक्ज़ेंड्रा मिन्ना स्टर्न के अनुसार अपने
कैंपस में विविध और सशक्त माहौल प्रदान करने वाले विश्वविद्यालयों ने अपनी इमारतों
के नामों पर पुन: विचार
करने का समर्थन किया है।
ऐसे
ही कुछ प्रयत्नों के तहत 20वीं
सदी के प्रमुख जेनेटिक विज्ञानी क्लेरेंस कुक लिटिल का नाम मिशिगन विश्वविद्यालय (यू.एम.) की साइंस बिल्डेंग
से हटा लिया गया है। लिटिल ने यूजेनिक्स जैसे विचार का समर्थन किया था और वे
तम्बाकू उद्योग को तंबाकू और कैंसर के सम्बंध के प्रमाणों को झुठलाने में मदद करते
रहे थे। इसी तरह साउथ कैरोलिना विश्वविद्यालय ने महिला चिकित्सक छात्रावास से जे. मैरियन सिम्स का नाम
नाम भी हटा दिया है। गौरतलब है कि सिम्स ने अपने शोध के दौरान गुलाम बनाई गई
महिलाओं पर बगैर एनेस्थेशिया के प्रयोग किए थे। सीएचएसएल ने तो नोबल विजेता जेम्स
वॉटसन के नाम पर रखे गए स्कूल ऑफ बायोलॉजिकल साइंस का नाम भी बदल दिया है। इस
संस्था के बोर्ड के 75 प्रतिशत
सदस्यों, 133 छात्रों और 1 भूतपूर्व छात्र ने वॉटसन को नस्लवाद से
जुड़ा पाया। वॉटसन ने एक समाचार पत्र के माध्यम से अश्वेत लोगों को बुद्धिहीन बताया
था। उस समय संस्थान ने वॉटसन को कुलपति के पद से हटाते हुए सभी पुरस्कार छीन लिए
थे और अब स्कूल का नाम भी बदल दिया है।
यू.के. के प्रसिद्ध कैंब्रिज
विश्वविद्यालय ने उस रंगीन कांच की खिड़की को हटा दिया है जिसका नाम मशहूर बायो-सांख्यिकीविद
रोनाल्ड फिशर के नाम पर था। फिशर 20वीं सदी के मशहूर सांख्यिकीविद रहे हैं और यूजेनिक्स के
मुख्य समर्थक रहे हैं। हालांकि विश्वविद्यालय ने उनके वैज्ञानिक आविष्कारों की
सराहना की है लेकिन विभिन्न समुदायों के बीच मज़बूती बनाए रखने के लिए उनके नाम को
हटा दिया गया है। युनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के अधिकारी भी यूजेनिक्स के समर्थक
फ्रांसिस गाल्टन और गणितज्ञ कार्ल पियरसन के नाम पर रखे गए इमारतों के नाम बदलने
पर विचार कर रहे हैं।
यह
पहल केवल कैंपस तक ही सीमित नहीं है। जिनेवा के निवासियों ने नगर पालिका की ग्रैंड
कौंसिल को कार्ल वोग्ट के नाम पर रखे गए एक मोहल्ले का नाम बदलने का प्रस्ताव
सौंपा है। गौरतलब है कि कार्ल वोग्ट चार्ल्स डार्विन के विकासवादी सिद्धांत से
काफी प्रभावित थे लेकिन वे श्वेत और अश्वेत लोगों के बीच खोपड़ी की साइज़ में
अपरिवर्तनीय अंतर के मुखर समर्थक भी रहे हैं। वे अश्वेत लोगों को शारीरिक रूप से
मनुष्यों की तुलना में बंदरों के अधिक करीब मानते थे। अमेरिकन सोसाइटी ऑफ
इक्थियोलॉजिस्ट और हरपेटोलॉजिस्ट अपने प्रमुख जर्नल कोपिया का नाम बदलने पर
विचार कर रहे हैं। यह नाम नस्लवादी विचार रखने वाले वैज्ञानिक एडवर्ड कोप के नाम
पर रखा गया था। इसके अलावा कई प्रतियोगिताओं, जैसे
वार्षिक लीनियन गेम्स, का नाम भी बदला जा
रहा है जो कार्ल लिनियस के नाम पर आयोजित किए जाते हैं। कार्ल लीनियस ने जीवों के
वर्गीकरण की एक प्रणाली विकसित की थी। इसमें होमो सेपियन्स को नस्ल के आधार पर इस
तरह वर्गीकृत किया था कि अश्वेत लोगों को नकारात्मक सामाजिक गुणों से विभूषित किया
था। इसी पहल के चलते कुछ शोधकर्ता कई प्रजातियों के आपत्तिजनक नामकरण को भी बदलने
की कोशिश में हैं।
इन नामों को बदलने की प्रक्रिया का विरोध भी जारी है। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह से नाम बदलने से आमजन का विज्ञान में सार्वजनिक विश्वास कम होगा। वैज्ञानिक प्रगति का मूल्यांकन न केवल वैज्ञानिक उपलब्धि से होता है बल्कि सामाजिक स्वीकृति भी महत्वपूर्ण होती है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_image_-1280w__no_aspect/public/Racist_names_1280x720.jpg?itok=iElJjbix