एक झील बहुमत से व्यक्ति बनी

संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा की सरहद पर एक झील है एरी झील। हाल ही में इस झील के किनारे बसे शहर टोलेडो (ओहायो प्रांत) के नागरिकों ने 61 प्रतिशत मतों से इसे एक व्यक्ति का दर्जा देने के कानून को समर्थन दिया है।

एरी झील अमेरिका की चौथी सबसे बड़ी और दुनिया भर की ग्यारहवीं सबसे बड़ी झील है। झील लगभग 25,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है। पिछले वर्षों में यह अत्यधिक प्रदूषित झीलों में से एक रही है। आसपास के खेतों से बहकर जो पानी इस झील में पहुंचता है उसमें बहुत अधिक मात्रा में फॉस्फोरस व नाइट्रोजन होते हैं। ये शैवाल के लिए उर्वरक का काम करते हैं और झील की पूरी सतह ज़हरीली शैवाल से ढंक जाती है। हालत यह हो गई थी कि इस झील का पानी पीने योग्य नहीं रह गया था। पिछले वर्ष गर्मियों में यहां के 5 लाख नागरिकों को पूरी तरह बोतल के पानी पर निर्भर रहना पड़ा था। यह झील इसके आसपास लगभग 875 कि.मी. के तट पर बसे विभिन्न शहरों के करीब 1 करोड़ लोगों के लिए पेयजल का स्रोत है।

झील की इस स्थिति से चिंतित होकर पिछले कई वर्षों से ओहायो में एक आंदोलन चल रहा है। इस आंदोलन ने एक कानून तैयार किया है जिसके तहत एरी झील को व्यक्ति का दर्जा दिया जाएगा। पिछले माह हुए मतदान में 61 प्रतिशत मतदाताओं ने इस कानून को समर्थन दिया है। इस कानून के तहत टोलेडो के नागरिकों को यह अधिकार मिल जाएगा कि वे एरी झील की ओर से प्रदूणकारियों पर मुकदमा चला सकेंगे।

इससे पहले इक्वेडोर, न्यूज़ीलैंड, कोलंबिया और भारत में भी नदियों, और जंगलों को व्यक्ति का दर्जा दिया जा चुका है। संभावना जताई जा रही है कि यूएस की इस नज़ीर के बाद कई अन्य स्थानों पर भी ‘प्रकृति के अधिकारों’ का यह आंदोलन ज़ोर पकड़ेगा।

कानूनी विशेषज्ञ ऐसे किसी कानून को लेकर दुविधा में हैं। कुछ लोगों को लगता है कि यह कानून संवैधानिक मुकदमों में टिक नहीं पाएगा। उनको लगता है कि परिणाम सिर्फ यह होगा कि मुकदमेबाज़ी में ढेरों पैसा खर्च होगा।

दूसरी ओर, कई अन्य लोगों का मानना है कि चाहे यह कानून मुकदमेबाज़ी में उलझ जाए किंतु यहां नागरिकों ने यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि वे प्रकृति के अतिक्रमण को बर्दाश्त नहीं करेंगे। (स्रोत फीचर्स)

 नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पर्यावरण पर्यटन का बढ़ता कारोबार – डॉ. दीपक कोहली

र्यटन आज दुनिया के सबसे बड़े उद्योगों में से है और पर्यटन उद्योग का सबसे तेज़ी से फैलता क्षेत्र पर्यावरण पर्यटन है। कोस्टा रिका और बेलिज जैसे देशों में विदेशी मुद्रा अर्जित करने का सबसे बड़ा रुाोत पर्यटन ही है जबकि ग्वाटेमाला में इसका स्थान दूसरा है। समूचे विकासशील ऊष्णकटिबंधीय क्षेत्र में वन्य जीव संरक्षित क्षेत्र प्रबंधकों और स्थानीय समुदायों को आर्थिक विकास और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता के बीच संतुलन कायम करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। पर्यावरण पर्यटन भी इस महत्वपूर्ण संतुलन का एक पक्ष है। सुनियोजित पर्यावरण पर्यटन से संरक्षित क्षेत्रों और उनके आसपास रहने वाले समुदायों को लाभ पहुंचाया जा सकता है। इसके लिए जैव विविधता संरक्षण के दीर्घावधि उपायों और स्थानीय विकास के बीच समन्वय कायम करना होगा।

सामान्य शब्दों में पर्यावरण पर्यटन या इको टूरिज़्म का अर्थ है पर्यटन और प्रकृति संरक्षण का प्रबंधन इस ढंग से करना कि एक तरफ पर्यटन और पारिस्थितिकी की आवश्यकताएं पूरी हों और दूसरी तरफ स्थानीय समुदायों के लिए रोज़गार – नए कौशल, आय और महिलाओं के लिए बेहतर जीवन स्तर सुनिश्चित किया जा सके। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा वर्ष 2002 को अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण-पर्यटन वर्ष के रूप में मनाए जाने से पर्यावरण पर्यटन के विश्वव्यापी महत्व, उसके लाभों और प्रभावों को मान्यता मिली। अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण पर्यटन वर्ष ने हमें विश्व स्तर पर पर्यावरण पर्यटन की समीक्षा और भविष्य में इसका स्थायी विकास सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त साधनों और संस्थागत ढांचे को मज़बूत करने का अवसर प्रदान किया। इसका अर्थ है कि पर्यावरण पर्यटन की खामियां और नकारात्मक प्रभाव दूर करते हुए इससे अधिकतम आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक लाभ प्राप्त किए जा सकें।

पर्यावरण पर्यटन को अब सब रोगों की औषधि के रूप में देखा जा रहा है जिससे भारी मात्रा में पर्यटन राजस्व मिलता है और पारिस्थितिकी प्रणाली को कोई क्षति नहीं पहुंचती क्योंकि इसमें वन संसाधनों का दोहन नहीं किया जाता। एक अवधारणा के रूप में पर्यावरण पर्यटन को भारत में हाल ही में बल मिला है, लेकिन एक जीवन पद्धति के रूप में भारतीय सदियों से इस अवधारणा पर अमल कर रहे हैं। पर्यावरण पर्यटन को विभिन्न रूपों में परिभाषित किया गया है। इंटरनेशनल इको टूरिज़्म सोसायटी ने 1991 में इसकी परिभाषा इस प्रकार की थी: पर्यावरण पर्यटन प्राकृतिक क्षेत्रों की वह दायित्वपूर्ण यात्रा है जिससे पर्यावरण संरक्षण होता है और स्थानीय लोगों की खुशहाली बढ़ती है।

विश्व पर्यटन संगठन (डब्ल्यूटीओ) द्वारा दी गई परिभाषा के अनुसार पर्यावरण पर्यटन के अंतर्गत अपेक्षाकृत अबाधित प्राकृतिक क्षेत्रों की ऐसी यात्रा शामिल है जिसका निर्दिष्ट लक्ष्य प्रकृति का अध्ययन और सम्मान करना तथा वनस्पति और जीव-जंतुओं के दर्शन का आऩंद लेना तथा साथ ही इन क्षेत्रों से संबद्ध सांस्कृतिक पहलुओं (अतीत और वर्तमान, दोनों) का अध्ययन करना है। वल्र्ड कंज़र्वेशन यूनियन (आईयूसीएन, 1996) के अनुसार पर्यावरण पर्यटन का अर्थ है प्राकृतिक क्षेत्रों की पर्यावरण अनुकूल यात्रा ताकि प्रकृति (साथ ही अतीत और वर्तमान की सांस्कृतिक विशेषताओं) को सराहा जा सके और उनका आनंद उठाया जा सके, जिससे संरक्षण को प्रोत्साहन मिले, पर्यटकों का असर कम पड़े और स्थानीय लोगों की सक्रिय सामाजिक-आर्थिक भागीदारी का लाभ उठाया जा सके। संक्षेप में, इसकी परिभाषाओं में तीन पहलुओं को रेखांकित किया गया है – प्रकृति, पर्यटन और स्थानीय समुदाय। सार्वजनिक पर्यटन से इसका अर्थ भिन्न है, जिसका लक्ष्य प्रकृति का दोहन है। संरक्षण, स्थिरता और जैव-विविधता पर्यावरण पर्यटन के तीन परस्पर सम्बंधित पहलू हैं। विकास के एक साधन के रूप में पर्यावरण पर्यटन जैव विविधता समझौते’ के तीन बुनियादी लक्ष्यों को हासिल करने में मदद दे सकता है:

– संरक्षित क्षेत्र प्रबंधन प्रणालियां (सार्वजनिक या निजी) मज़बूत बनाकर और सुदृढ़ पारिस्थितिकी प्रणालियों का योगदान बढ़ाकर जैव-विविधता (और सांस्कृतिक विविधता) का संरक्षण।

– पर्यावरण पर्यटन और सम्बंधित व्यापार नेटवर्क में आमदनी, रोज़गार और व्यापार के अवसर पैदा करके जैव विविधता के स्थायी इस्तेमाल को प्रोत्साहन, और

– स्थानीय समुदायों और जनजातीय लोगों को पर्यावरण-पर्यटन गतिविधियों के लाभ में समान रूप से भागीदार बनाना और इसके लिए पर्यावरण पर्यटन की आयोजना और प्रबंधन में उनकी पूर्ण सहमति एवं भागीदारी प्राप्त करना।

पर्यावरण पर्यटन का सिद्धांतों, दिशा-निर्देशों और स्थिरता के मानदंडों पर आधारित होना इसे पर्यटन क्षेत्र में विशेष स्थान प्रदान करता है। पहली बार इस धारणा को परिभाषित किए जाने के बाद के वर्षों में पर्यावरण पर्यटन के अनिवार्य बुनियादी तत्वों के बारे में आम सहमति बनी है जो इस प्रकार है: भली-भांति संरक्षित पारिस्थितिकी तंत्र पर्यटकों को आकर्षित करते हैं, विभिन्न सांस्कृतिक और साहसिक गतिविधियों के दौरान एक ज़िम्मेदार, कम असर डालने वाला पर्यटक व्यवहार, पुनर्भरण न हो सकने वाले संसाधनों की कम से कम खपत, स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी, जो प्रकृति, संस्कृति और परम्पराओं के बारे में पर्यटकों को प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध कराने में सक्षम होते हैं और अंत में स्थानीय लोगों को पर्यावरण पर्यटन प्रबंधन के अधिकार प्रदान करना ताकि वे जीविका के वैकल्पिक अवसर अपनाकर संरक्षण सुनिश्चित कर सकें तथा पर्यटक और स्थानीय समुदाय, दोनों के लिए शैक्षिक पहलू शामिल कर सकें।

पर्यावरण अनुकूल गतिविधि होने के कारण पर्यावरण पर्यटन का लक्ष्य पर्यावरण मूल्यों और शिष्टाचार को प्रोत्साहित करना तथा निर्बाध रूप में प्रकृति का संरक्षण करना है। इस तरह यह वन्य जीवों और प्रकृति को लाभ पहुंचाता है तथा स्थानीय लोगों की भागीदारी उनके लिए आर्थिक लाभ सुनिश्चित करती है जो आगे चलकर उन्हें बेहतर और आसान जीवन स्तर उपलब्ध कराती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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2018 चौथा सबसे गर्म वर्ष रहा

ब से हम तापमान का रिकॉर्ड रख रहे हैं, तब से आज तक 2018 चौथा सबसे गर्म साल रहा है। यह निष्कर्ष यूएस के नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) और नेशनल ओशिओनोग्राफिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिनिस्ट्रेशन (एनओओए) की अलग-अलग रिपोर्ट में बताया गया है।

एनओओए की रिपोर्ट के मुताबिक पिछला साल इतना गर्म था कि समुद्र सतह का तापमान बीसवीं सदी के औसत से 0.79 डिग्री सेल्सियस ज़्यादा रहा। तापमान के रिकॉर्ड 1880 से उपलब्ध हैं। तब से आज तक मात्र 2016, 2015 और 2017 ही इससे गर्म रहे हैं। नासा के वैज्ञानिक गेविन श्मिट का कहना है मुख्य बात यह है कि पृथ्वी गर्म हो रही है और हम भलीभांति समझते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है। इसका मुख्य कारण है ग्रीनहाउस गैसें जो हम वायुमंडल में छोड़ते चले जा रहे हैं।

गर्म वर्षों की ओर यह रुझान कोई नई बात नहीं है। सदी के 10 सबसे गर्म वर्षों में से 9 तो 2005 के बाद के हैं। और सबसे गर्म 5 साल दरअसल पिछले 5 वर्ष (2014-2018) रहे हैं।

नासा तथा एनओओए का यह निष्कर्ष अन्य संस्थाओं के आंकड़ों से मेल खाता है। जैसे युनाइटेड किंगडम के मौसम कार्यालय तथा विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने भी वर्ष 2018 को ही चौथा सबसे गर्म वर्ष बताया है। युरोप के अधिकांश हिस्सों, भूमध्यसागर क्षेत्र, मध्य पूर्व, न्यूज़ीलैंड और रूस के अलावा अटलांटिक महासागर तथा पश्चिमी प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों में भी धरती और समुद्र का तापमान रिकॉर्ड ऊंचाई पर रहा। हालांकि पृथ्वी के कुछ हिस्सों में ठंडक रही किंतु कुल मिलाकर 2018 गर्म रहा। वैश्विक औसत देखें तो बीसवीं सदी के औसत की तुलना में 2018 में धरती का तापमान 1.12 डिग्री सेल्सियस तथा समुद्र का तापमान 0.66 डिग्री सेल्सियस अधिक रिकॉर्ड किया गया। (स्रोत फीचर्स)

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कीटों की घटती आबादी और प्रकृति पर संकट

हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक कीटों की जनसंख्या में तेज़ी से गिरावट आ रही है और यह गिरावट किसी भी इकोसिस्टम के लिए खतरे की चेतावनी है। सिडनी विश्वविद्यालय के फ्रांसिस्को सांचेज़-बायो और बेजिंग स्थित चायना एकडमी ऑफ एग्रिकल्चरल साइन्सेज़ के क्रिस वायचुइस द्वारा बॉयोलॉजिकल कंज़र्वेशन पत्रिका में प्रकाशित इस रिपोर्ट के मुताबिक 40 प्रतिशत से ज़्यादा कीटों की संख्या घट रही है और एक-तिहाई कीट तो विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुके हैं। कीट का कुल द्रव्यमान सालाना 2.5 प्रतिशत की दर से कम हो रहा है, जिसका मतलब है कि एक सदी में ये गायब हो जाएंगे।

रिपोर्ट में तो यहां तक कहा गया है कि धरती छठे व्यापक विलुप्तिकरण की दहलीज़ पर खड़ी है। कीट पारिस्थितिक तंत्रों के सुचारु कामकाज के लिए अनिवार्य हैं। वे पक्षियों, सरिसृपों तथा उभयचर जीवों का भोजन हैं। इस भोजन के अभाव में ये प्राणि जीवित नहीं रह पाएंगे। कीट वनस्पतियों के लिए परागण की महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाते हैं। इसके अलावा वे पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण भी करते हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि कीटों की आबादी में गिरावट का सबसे बड़ा कारण सघन खेती है। इसमें खेतों के आसपास से सारे पेड़-पौधे साफ कर दिए जाते हैं और फिर नंगे खेतों पर उर्वरकों और कीटनाशकों का बेतहाशा इस्तेमाल किया जाता है। आबादी में गिरावट का दूसरा प्रमुख कारण जलवायु परिवर्तन है। कई कीट तेज़ी से बदलती जलवायु के साथ अनुकूलित नहीं हो पा रहे हैं।

सांचेज़-बायो का कहना है कि पिछले 25-30 वर्षों में कीटों के कुल द्रव्यमान में से 80 प्रतिशत गायब हो चुका है।

इस रिपोर्ट को तैयार करने में कीटों में गिरावट के 73 अलग-अलग अध्ययनों का विश्लेषण किया गया। तितलियां और पतंगे सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं। जैसे, 2000 से 2009 के बीच इंगलैंड में तितली की एक प्रजाति की संख्या में 58 प्रतिशत की कमी आई है। इसी प्रकार से मधुमक्खियों की संख्या में ज़बरदस्त कमी देखी गई है। ओक्लाहामा (यूएस) में 1949 में बंबलबी की जितनी प्रजातियां थीं, उनमें से 2013 में मात्र आधी बची थीं। 1947 में यूएस में मधुमक्खियों के 60 लाख छत्ते थे और उनमें से 35 लाख खत्म हो चुके हैं।

वैसे रिपोर्ट को तैयार करने में जिन अध्ययनों का विश्लेषण किया गया वे ज़्यादातर पश्चिमी युरोप और यूएस से सम्बंधित हैं और कुछ अध्ययन ऑस्ट्रेलिया से चीन तथा ब्रााज़ील से दक्षिण अफ्रीका के बीच के भी हैं। मगर शोधकर्ताओं का मत है कि अन्यत्र भी स्थिति बेहतर नहीं होगी। (स्रोत फीचर्स)

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कॉफी पर संकट: जंगली प्रजातियां विलुप्त होने को हैं

ई लोगों का प्रिय पेय पदार्थ कॉफी अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहा है। वैसे तो दुनिया भर में कॉफी की 124 प्रजातियां पाई जाती हैं किंतु जो कॉफी हमारे घरों में पहुंचती है, वह मात्र दो प्रजातियों से प्राप्त होती है। इनमें से एक है कॉफी अरेबिका जिसका बाज़ार में बोलबाला है और यह कुल कॉफी उत्पादन में लगभग 70 प्रतिशत का आधार है। दूसरी प्रजाति कॉफी केनीफोरा शेष उत्पादन का आधार है। इसे रोबस्टा भी कहते हैं।

कॉफी की शेष समस्त प्रजातियां जंगली हैं और इनके फल बहुत रोमिल होते हैं, बीज बड़े-बड़े होते हैं और इनमें कैफीन नहीं होता। मगर इन जंगली प्रजातियों में ऐसे जेनेटिक गुण पाए जाते हैं जो इन्हें विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों का सामना करने में मदद करते हैं। और आज जब कृष्य कॉफी पर संकट मंडरा रहा है तो शायद ये जंगली प्रजातियां हमारी मदद कर सकती हैं।

तो जंगली कॉफी के भौगोलिक विस्तार और उनकी सेहत का आकलन करना एक महत्वपूर्ण काम है। इसी दृष्टि से क्यू स्थित रॉयल बॉटेनिकल गार्डन के आरोन डेविड और उनके साथियों ने कॉफी का एक विश्वव्यापी आकलन किया। सबसे पहले उन्होंने जंगली प्रजातियों के 5000 उपलब्ध रिकॉर्डस को खंगाला। इसके बाद इन शोधकर्ताओं ने अफ्रीका, मेडागास्कर और हिंद महासागर के टापुओं में जा-जाकर आंकड़े एकत्रित किए।

प्रत्येक प्रजाति का भौगोलिक स्थान चिंहित करने के बाद उन्होंने अंदाज़ लगाया कि कौन-सी प्रजातियां जोखिम में हैं। इसके लिए उनका आधार यह था कि उस प्रजाति के पौधों की आबादी कितनी है और उसके प्राकृतवास की हालत क्या है। साइंस एडवांसेस में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में उन्होंने बताया है कि कम से कम 60 प्रतिशत प्रजातियां जोखिम में है और कुछ तो शायद विलुप्त भी हो चुकी हैं। तुलना के लिए यह देख सकते हैं कि सारी पादप प्रजातियों में से मात्र 22 प्रतिशत जोखिम में हैं।

एक अन्य अध्ययन में डेविस ने अरेबिका प्रजाति का अध्ययन किया, जिसे वैश्विक विश्लेषण में सामान्यत: कम जोखिमग्रस्त माना जाता है। डेविस की टीम ने दूर-संवेदन से प्राप्त जलवायु परिवर्तन के आंकड़ों को जोड़कर कंप्यूटर पर विश्लेषण किया तो पता चला कि शायद 2080 तक जलवायु परिवर्तन इस प्रजाति को आधा समाप्त कर देगा। यह अध्ययन ग्लोबल चेंज बायोलॉजी में प्रकाशित हुआ है।

अब विचार चल रहा है कि कॉफी को इस संकट से कैसे बचाया जाए। एक सुझाव यह है कि कॉफी की विभिन्न प्रजातियों के बीजों को बीज संग्रह में रखा जाए। लेकिन दिक्कत यह है कि शीतलीकरण के बाद कॉफी के बीज उगते नहीं हैं। तो एक ही तरीका रह जाता है कि कॉफी के बीजों के हर साल उगाया जाए और अगले साल के लिए बीज एकत्रित करके रखे जाएं। मगर वह बहुत महंगा है। (स्रोत फीचर्स)

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नई कोयला खदान खोलने पर रोक

हाल ही में ऑस्ट्रेलिया की अदालत ने कोयला खदानों के कारण बढ़ रहे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और ग्लोबल वार्मिंग के मद्देनज़र कोयला खनन कंपनी की नई खुली खदान लगाने की अर्जी खारिज कर दी है।

ऑस्ट्रेलिया विश्व का सबसे बड़ा कोयला निर्यातक देश है। कोयला खनन कंपनी, ग्लॉसेस्टर रिसोर्सेस, हंटर घाटी के ग्लॉसेस्टर शहर के पास एक खुली कोयला खदान शुरू करना चाहती थी। इसके पहले पर्यावरणीय कारणों से न्यू साउथ वेल्स की भूमि व पर्यावरण अदालत ने कंपनी की अर्जी खारिज कर दी थी। कंपनी ने खदान लगाने के लिए दोबारा अर्जी दी थी। ऑस्ट्रेलिया में ऐसा पहली बार हुआ है कि नई कोयला खदान के लिए अनुमति ना मिली हो।

चीफ जज ब्रायन प्रेस्टन ने अपने आदेश में कहा है कि इस कोयला खनन परियोजना को इसलिए अस्वीकृत किया जा रहा है क्योंकि कोयला खदानों और उनके उत्पादों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसें विश्व स्तर पर पर्यावरण को प्रभावित करती हैं और इस समय पर्यावरण सम्बंधी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए इन गैसों के उत्सर्जन को बहुत कम करने की ज़रूरत है।

दुनिया भर में पर्यावरण बदलाव के प्रभाव नज़र आ रहे हैं। विगत जनवरी का महीना ऑस्ट्रेलिया के अब तक के सबसे गर्म महीनों में दर्ज हुआ। इसी दौरान बिगड़े मौसम के कारण ऑस्ट्रेलिया के कई हिस्सों में भारी नुकसान हुए हैं। तस्मानिया का लगभग तीन प्रतिशत हिस्सा दावानल की चपेट में आया, उत्तरी क्वींसलैंड ने भारी बारिश के कारण बाढ़ का सामना किया। और अनुमान है कि दुनिया के कई हिस्सों में पर्यावरण बदलाव के कारण मौसम सम्बंधी अप्रत्याशित घटनाओं का सामना करना पड़ सकता है। (स्रोत फीचर्स)

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वेटलैंड एक महत्वपूर्ण इकोसिस्टम है – डॉ. दीपक कोहली

जीव-जन्तु विभिन्न प्रकार के प्राकृतवासों में रहते हैं। इन्हीं में से एक है वेटलैंड यानी नमभूमि। सामान्य भाषा में वेटलैंड ताल, झील, पोखर, जलाशय, दलदल आदि के नाम से जाने जाते हैं। सामान्यतया वर्षा ऋतु में ये पूर्ण रूप से जलमग्न हो जाते हैं। वेटलैंड्स का जलस्तर परिवर्तित होता रहता है। कई वेटलैंड वर्ष भर जल प्लावित रहते हैं जबकि कई ग्रीष्म ऋतु में सूख जाते हैं।

वेटलैंड एक विशिष्ट प्रकार का पारिस्थितिक तंत्र है तथा जैव विविधता का महत्वपूर्ण अंग है। ज़मीन व जल क्षेत्र का मिलन स्थल होने के कारण वेटलैंड समृद्ध पारिस्थितिक तंत्र होता है। वेटलैंड न केवल जल भंडारण का कार्य करते हैं, अपितु बाढ़ की विभीषिका कम करते हैं और पर्यावरण संतुलन में सहायक हैं।

वेटलैंड्स को जैविक सुपर मार्केट कहा जाता है। इनमें विस्तृत खाद्य जाल पाया जाता है। इन्हें धरती के गुर्दे भी कहा जाता है, क्योंकि ये जल को शुद्ध करते हैं। ये मछली, खाद्य वनस्पति, लकड़ी, छप्पर बनाने व ईंधन के रूप में उपयोगी वनस्पति एवं औषधीय पौधों के उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

वेटलैंड्स असंख्य लोगों को भोजन (मछली व चावल) प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वेटलैंड्स कार्बन अवशोषण व भूजल स्तर में वृद्धि जैसी महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाते हैं। ये पक्षियों और जानवरों, देशज पौधों और कीटों को आवास उपलब्ध कराते हैं।

भारत के अधिकांश वेटलैंड्स गंगा, कावेरी, कृष्णा, गोदावरी और ताप्ती जैसी प्रमुख नदी तंत्रों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुडे हुए हैं। एशियन वेटलैंड्स कोश के अनुसार वेटलैंड्स का देश के क्षेत्रफल (नदियों को छोड़कर) में 18.4 प्रतिशत हिस्सा है, जिसके 70 प्रतिशत भाग में धान की खेती होती है। भारत में वेटलैंड्स का अनुमानित क्षेत्रफल 41 लाख हैक्टर है, जिसमें 15 लाख हैक्टर प्राकृतिक और 26 लाख हैक्टर मानव निर्मित है। तटीय वेटलैंड्स का क्षेत्रफल 6750 वर्ग किलोमीटर है और यहां मुख्यत: मैंग्रोव पाए जाते हैं।

वर्तमान में प्रदूषण और औद्योगीकरण के कारण वेटलैंड्स पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। आजकल वेटलैंड्स के किनारे कूड़ा डम्प किया जा रहा है जिसके कारण ये प्रदूषित हो रहे हैं। कई जगहों पर वेटलैंड्स को पाटकर उन पर कांक्रीट के जंगल उगाए जा रहे हैं। वेटलैंड्स के संकटग्रस्त होने के कारण वहां रहने वाले पशु, पक्षी एवं वनस्पतियों का अस्तित्व भी संकट में है। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल के दलदली क्षेत्र में पाया जाने वाला दलदली हिरण कम हो रहा है। इसी प्रकार तराई क्षेत्र में पाई जाने वाली फिशिंग कैट पर भी बुरा असर पड़ रहा है। गुजरात के कच्छ क्षेत्र में जंगली गधा भी खतरे में है। असम के काजीरंगा का एक सींग वाला भारतीय गैंडा भी संकटग्रस्त प्राणियों की श्रेणी में शामिल है। इसी प्रकार ओटर, गंगा डॉल्फिन, डूगोंग, एशियाई जलीय भैंस जैसे वेटलैंड से जुड़े अनेक जीव खतरे में हैं।

वेटलैंड संरक्षण के लिए अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास में ‘रामसर संधि’ प्रमुख है। यह एक अन्तर-सरकारी संधि है, जो वेटलैंड्स और उनके संसाधनों के संरक्षण और बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग के लिए राष्ट्रीय कार्य और अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग का ढांचा उपलब्ध कराती है। 1971 में देशों ने ईरान के रामसर में विश्व के वेटलैंड्स के संरक्षण हेतु एक संधि पर हस्ताक्षर किए थे। इस दिन ‘विश्व वेटलैंड्स दिवस’ का आयोजन किया जाता है।

वर्तमान में सम्पूर्ण विश्व में 2200 से अधिक वेटलैंड्स हैं, जिन्हें अन्तर्राष्ट्रीय महत्व के वेटलैंड्स की रामसर सूची में शामिल किया गया है । रामसर कन्वेंशन में शामिल होने वाले देश वेटलैंड्स को पहुंची हानि और उनके स्तर में आई गिरावट को दूर करने के लिए सहायता प्रदान करने हेतु प्रतिबद्ध हैं।

वेटलैंड्स संरक्षण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रयास किए गए हैं। 1986 में केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों के सहयोग से राष्ट्रीय वेटलैंड संरक्षण कार्यक्रम शुरू किया गया था। इसके अन्तर्गत संरक्षण और प्रबंधन के लिए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा देश में 115 वेटलैंड्स की पहचान की गई थी।

वर्ष 2017 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा वेटलैंड्स के संरक्षण से सम्बंधित नए नियम अधिसूचित किए गए थे। नए नियमों में वेटलैंड्स प्रबंधन के प्रति विकेंद्रीकृत दृष्टिकोण अपनाया गया है, ताकि क्षेत्रीय विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके और राज्य अपनी प्राथमिकताएं निर्धारित कर सकें।

उल्लेखनीय है कि देश में मौजूद 26 वेटलैंड्स को ही संरक्षित किया गया है, लेकिन ऐसे हज़ारों वेटलैंड्स हैं जो जैविक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण तो हैं लेकिन उनकी कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं है।

वेटलैंड परितंत्र के अदृश्य अर्थतंत्र का आकलन करने वाली संस्था ‘दी इकॉनॉमिक्स ऑफ इकोसिस्टम एंड बायोडायवर्सिटी सर्विसेज़’ के अनुसार समाज के हाशिए पर रहने वाले लोगों के लिए वेटलैंड जीवनरेखा है। वेटलैंड्स की सेवाओं को चार भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

(क) जीवन-यापन के रुाोत उपलब्ध कराना ताकि इन क्षेत्रों में निवास करने वाले गरीब लोगों को कमाई का अवसर मिल सके। वेटलैंड से शुद्ध पेयजल, भोजन, रेशे, र्इंधन, जेनेटिक संसाधन, जैव रसायन, प्राकृतिक औषधियां आदि प्राप्त होते हैं।

(ख) स्थानीय जलवायु विनियमन, ग्रीनहाउस गैसों के नियंत्रण हेतु एक वृहद कार्बन सिंक, जलीय चक्र को रेगुलेट करना और भूमिगत जल के स्तर को नियंत्रित करना भी वेटलैंड के लाभ के अन्तर्गत आता है। आपदा जोखिम को कम करना, खासकर बाढ़ और आंधी से बचाव। मृदा सृजन और मृदा अपरदन का नियंत्रण, सतही और भूमिगत जल में उपस्थित जैव रसायन और आर्सेनिक, लेड, आयरन, फ्लोरीन आदि का उपचार। वेटलैंड्स जल का शुद्धिकरण करते हैं और प्राकृतिक संतुलन बनाने में भूमिका निभाते हैं।

(ग) वेटलैंड्स सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आस्था का केंद्र माने जाते हैं। ग्रामीण अंचल में लोग इनकी पूजा करते हैं। आजकल वेटलैंड्स को इकोटूरिज़्म के विशेष केंद्र के तौर पर देखा जा रहा है। इकोटूरिज़्म के साथ-साथ शिक्षा और वैज्ञानिक-शोध के केंद्र के तौर पर भी इन्हें विकसित किया जा रहा है।

(घ) वेटलैंड्स को जैव विविधता का स्वर्ग भी कहा जाता है। ये शीतकालीन पक्षियों और विभिन्न जीव-जन्तुओं का आश्रय स्थल होते हैं। विभिन्न प्रकार की मछलियों और जन्तुओं के प्रजनन के लिए भी ये उपयुक्त होते हैं।

वेटलैंड्स से हमारा जीवन प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होता है। वेटलैंड्स बचाए बगैर न तो वैश्विक तापमान में वृद्धि रोकी जा सकती है और न ही जलवायु परिवर्तन की मार से बचा जा सकता है। अत: अपने स्वार्थ के लिए सही, अब ज़रूरी हो गया है कि वेटलैंड्स को बचाएं। (स्रोत फीचर्स)

भारत के प्रमुख वेटलैंड्स

भितरकनिका (उड़ीसा), चिलिका (उड़ीसा), भोज ताल (मध्य प्रदेश), चंद्रताल (हिमाचल प्रदेश), पोंग बांध झील (हिमाचल प्रदेश)रेणुका नमभूमि (हिमाचल प्रदेश), डिपोल बिल (असम), पूर्वी कोलकाता नमभूमि (पश्चिम बंगाल), हरिका झील (पंजाब), कंजली (पंजाब), रोपर (पंजाब), सांभर झील (राजस्थान), केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (राजस्थान), कौलुरू झील (आंध्र प्रदेश), लोकटक झील (मणिपुर), नलसरोवर पक्षी अभयारण्य (गुजरात), पाइंट कैलियर पक्षी विहार (तमिलनाडु), रूद्रसागर झील (त्रिपुरा), ऊपरी गंगा नदी (उत्तर प्रदेश), अष्टमुडी (केरल), वायनाड-कोल नमभूमि (केरल), साथामुकोटा झील (केरल), सौमित्री (जम्मू एवं कश्मीर), सुरिनसर-मान्सर झील (जम्मू एवं कश्मीर), होकेरा (जम्मू एवं कश्मीर) तथा वूलर झील (जम्मू एवं कश्मीर)।

प्रमुख जीव-जन्तु और वनस्पतियां

गैंडा, हिस्पिड हेअर (खरगोश), हिरण, ऊदबिलाव, गंगा डॉल्फिन, बारहसिंघा, बंगाल फ्लोरिकन, सारस, ककेर, घड़ियाल, मगर, फ्रेशवाटर टर्टल्स, पनकौआ, ब्लैक नेक्ड स्टॉर्क, संगमरमरी टील आदि। वनस्पतियों में सरपत, मूंज, नरकुल, सेवार, तिन्नाधान, कसेरू, कमलगट्टा, मखाना, सिंघाड़ा आदि प्रमुख हैं।

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चावल की भूसी से लकड़ी

वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जिससे चावल की भूसी से लकड़ी बनाई जा सकती है। इससे अब लकड़ी के लिए पेड़ काटना ज़रूरी नहीं होगा। साथ ही किसानों को धान के साथ भूसी के भी दाम मिलेंगे। सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट, रुड़की के निदेशक एन. गोपाल कृष्णन के अनुसार उनके संस्थान ने धान की भूसी तथा देवदार के कांटों से लकड़ी बनाने की तकनीक विकसित की है। इससे किसानों को भी काफी फायदा होगा तथा लकड़ी के लिए पेड़ों की कटाई भी कम हो सकेगी। देवदार के कांटे जंगल में गिरकर यूं ही पड़े रहते हैं। इनसे जंगल में आग लगने की आशंका रहती है। इनसे लकड़ी तैयार करने से पेड़ बचाने के साथ जंगल में आग लगने की समस्या भी कम की जा सकेगी। भूसी को लकड़ी में बदलने के लिए पहले से बने खांचे में उच्च दाब की तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इस तकनीक से बनी लकड़ी को बढ़ई आम लकड़ी की तरह हर प्रकार का आकार दे सकते हैं। और इनसे चौखट, तख्ते, बेंच आदि बनाए जा सकते हैं और फ्लोरिंग के लिए इनका उपयोग किया जा सकता है। यह लकड़ी नेशनल बिल्डिंग कोड के सभी मानकों पर खरी उतरी है। इसके अलावा यह दीमक प्रतिरोधी भी है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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प्राकृतिक तटरक्षक: मैंग्रोव वन – डॉ. दीपक कोहली

मैंग्रोव सामान्यत: ऐसे पेड़-पौधे होते हैं, जो तटीय क्षेत्रों में खारे पानी में पाए जाते हैं। ये उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इन वनस्पतियों को तटीय वनस्पतियां अथवा कच्छीय वनस्पतियां भी कहा जाता है। ये वनस्पतियां समुद्र तटों पर, नदियों के मुहानों व ज्वार प्रभावित क्षेत्रों में पाई जाती हैं। विषुवत रेखा के आसपास के क्षेत्रों में जहां जलवायु गर्म तथा नम होती है, वहां मैंग्रोव वन की लगभग सभी प्रजातियां पाई जाती हैं।

पृथ्वी पर इस प्रकार के मैंग्रोव वनों का विस्तार एक लाख वर्ग किलोमीटर में है। मैंग्रोव वन मुख्य रूप से ब्राज़ील (25,000 वर्ग किलोमीटर), इंडोनेशिया (21,000 वर्ग किलोमीटर) और ऑस्ट्रेलिया (11,000 वर्ग किलोमीटर) में है। भारत में 6,740 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर इस प्रकार के वन फैले हुए हैं। यह विश्व भर में विद्यमान मैंग्रोव वनों का 7 प्रतिशत है। इन वनों में 50 से भी अधिक जातियों के मैंग्रोव वृक्ष पाए जाते हैं। मैंग्रोव वनों का 82 प्रतिशत देश के पश्चिमी भागों में पाया जाता है।

मैंग्रोव वृक्षों के बीजों का अंकुरण एवं विकास पेड़ पर लगे-लगे ही होता है। जब समुद्र में ज्वार आता है और पानी ज़मीन की ओर फैलता है, तब कुछ अंकुरित बीज पानी के बहाव से टूटकर गिर जाते हैं और पानी के साथ बहने लगते हैं। ज्वार के उतरने पर ये जमीन पर यहां-वहां जम जाते हैं और आगे विकसित होते हैं। इसी कारण इन्हें जरायुज (या पिंडज) कहते हैं, यानी सीधे संतान उत्पन्न करने वाले।

चूंकि ये पौधे लवणीय पानी में रहते हैं, इसलिए उनके लिए यह आवश्यक होता है कि इस पानी में मौजूद लवण उनके शरीर में एकत्र न होने लगें। इन वृक्षों की जड़ों एवं पत्तियों पर खास तरह की लवण ग्रंथियां होती हैं, जिनसे लवण निरंतर घुलित रूप में निकलता रहता है। वर्षा का पानी इस लवण को बहा ले जाता है। इन पेड़ों की एक अन्य विशेषता उनकी श्वसन जड़ें हैं। पानी में ऑक्सीजन की कमी के कारण इन पेड़ों की जड़ों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है। इस समस्या से निपटने के लिए उनमें विशेष प्रकार की जड़ें होती हैं, जो सामान्य जड़ों के विपरीत ज़मीन से ऊपर निकल आती हैं। इनमें छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जिनकी सहायता से ये हवा ग्रहण करके उसे नीचे की जड़ों को पहुंचाती हैं। इन जड़ों को श्वसन मूल कहा जाता है।

इन श्वसन मूलों का दूसरा कार्य दलदली भूमि में इन वृक्षों को स्थिरता प्रदान करना भी है। मैंग्रोव पौधों के तनों के केन्द्र में कठोर लकड़ी नहीं पाई जाती है। इसके स्थान पर पतली नलिकाएं होती हैं जो पूरे तने में फैली रहती हैं। इस कारण मैंग्रोव पौधे बाहरी छाल तथा तने को होने वाली क्षति को सहन नहीं कर सकते हैं। इन पौधों में पाई जाने वाली वायवीय जड़ें कई रूप ले सकती हैं। ऐविसेनिया जैसी प्रजाति के पौधों में ये जड़ें छोटी तथा तार जैसी होती हैं जो तने से निकलकर चारों ओर फैली होती हैं। ये जड़ें भूमि तक पहुंचकर पौधों को सहारा देती हैं।

मैंग्रोव वृक्षों में जल संरक्षण की क्षमता भी पाई जाती है। वाष्पोत्सर्जन द्वारा पानी के उत्सर्जन को रोकने के लिए इन पौधों में मोटी चिकनी पत्तियां होती हैं। पत्तियों की सतह पर पाए जाने वाले रोम पत्ती के चारों ओर वायु की एक परत को बनाए रखते हैं। ये पौधे रसदार पत्तियों में पानी संचित कर सकते हैं। ये सभी विशेषताएं इन्हें प्रतिकूल वातावरण में जीवित रहने योग्य बनाती हैं।

विश्व में चार मुख्य प्रकार के मैंग्रोव वृक्ष पाए जाते हैं – लाल मैंग्रोव, काले मैंग्रोव, सफेद मैंग्रोव और बटनवुड मैंग्रोव। लाल मैंग्रोव वनस्पति की श्रेणी में वे पौधे आते हैं जो बहुत अधिक खारे पानी को सहन करने की क्षमता रखते हैं तथा समुद्र के नज़दीक उगते हैं। राइज़ोफोरा प्रजाति के वृक्ष इसी श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं।

काली मैंग्रोव वनस्पति की श्रेणी में वे पौधे आते हैं जिनकी खारे पानी को सहने की क्षमता अपेक्षाकृत कम होती है। ब्रुगेरिया प्रजाति के वृक्ष इस श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं।

सफेद मैंग्रोव वनस्पति का नाम इनकी चिकनी सफेद छाल के कारण पड़ा है। इन पौधों को इनकी जड़ों तथा पत्तियों की विशेष प्रकार की बनावट के कारण अलग से पहचाना जा सकता है। ऐविसेनिया प्रजाति के पौधे इस श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं।

बटनवुड मैंग्रोव पौधे झाड़ी के आकार के होते हैं तथा इनका यह नाम इनके लाल-भूरे रंग के तिकोने फलों के कारण है। कोनोकार्पस प्रजाति के पौधे इस श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं।

भारत में मैंग्रोव वनों का 59 प्रतिशत पूर्वी तट (बंगाल की खाड़ी), 23 प्रतिशत पश्चिमी तट (अरब सागर) तथा 18 प्रतिशत अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में पाया जाता है। भारतीय मैंग्रोव वनस्पतियां मुख्यत: तीन प्रकार के तटीय क्षेत्रों में पाई जाती है – डेल्टा, बैकवॉटर व नदी मुहाने तथा द्वीपीय क्षेत्र। डेल्टा क्षेत्र में उगने वाले मैंग्रोव  मुख्यत: पूर्वी तट पर (बंगाल की खाड़ी में) पाए जाते हैं जहां गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी, कृष्णा, गोदावरी और कावेरी जैसी बड़ी नदियां विशाल डेल्टा क्षेत्रों का निर्माण करती हैं। नदी मुहानों पर उगने वाली मैंग्रोव वनस्पति मुख्यत: पश्चिमी तट पर पाई जाती हैं जहां सिन्धु, नर्मदा, ताप्ती जैसी प्रमुख नदियां कीप के आकार के मुहानों का निर्माण करती हैं। द्वीपीय मैंग्रोव द्वीपों में पाए जाते हैं जहां छोटी नदियों, ज्वारीय क्षेत्रों तथा खारे पानी की झीलों में उगने के लिए आदर्श परिस्थितियां उपस्थित होती हैं।

भारत में विश्व के कुछ प्रसिद्ध मैंग्रोव क्षेत्र पाए जाते हैं। सुन्दरवन विश्व का सबसे बड़ा मैंग्रोव क्षेत्र है। इसका कुछ भाग भारत में तथा कुछ बांग्लादेश में है। सुन्दरवन का भारत में आने वाला क्षेत्र गंगा तथा ब्रह्मपुत्र नदियों के डेल्टा क्षेत्रों के पश्चिमी भाग में है। इन नदियों द्वारा ताज़े पानी की लगातार आपूर्ति के कारण वन क्षेत्र में तथा समुद्र के नज़दीक पानी में खारापन समुद्र की अपेक्षा सदैव कम रहता है। उड़ीसा तट पर स्थित महानदी डेल्टा का निर्माण महानदी, ब्रह्मणी तथा वैतरणी नदियों द्वारा होता है। ताज़े पानी की आपूर्ति के कारण यहां भी जैव विविधता तथा पौधों का घनत्व सुन्दरवन जैसा ही है। गोदावरी मैंग्रोव क्षेत्र (आंध्र प्रदेश) गोदावरी नदी के डेल्टा में स्थित है। कृष्णा डेल्टा में भी मैंग्रोव वनस्पतियां पाई जाती हैं। तमिलनाडु में कावेरी डेल्टा में पिचावरम और मुथुपेट मैंग्रोव वन स्थित हैं।

मनुष्य द्वारा मैंग्रोव वनों का प्रयोग कई तरह से किया जाता है। स्थानीय निवासियों द्वारा इनका उपयोग भोजन, औषधि, टैनिन, ईंधन तथा इमारती लकड़ी के लिए किया जाता रहा है। तटीय इलाकों में रहने वाले लाखों लोगों के लिए जीवनयापन का साधन इन वनों से प्राप्त होता है तथा ये उनकी पारम्परिक संस्कृति को जीवित रखते हैं। मैंग्रोव वन धरती व समुद्र के बीच एक अवरोधक बफर की तरह कार्य करते हैं तथा समुद्री प्राकृतिक आपदाओं से तटों की रक्षा करते हैं। ये तटीय क्षेत्रों में तलछट के कारण होने वाले जान-माल के नुकसान को रोकते हैं।

मैंग्रोव उस क्षेत्र में पाई जाने वाली कई जंतु प्रजातियों को शरण उपलब्ध कराते हैं। अनेक प्रकार के शैवालों तथा मछलियों द्वारा जड़ों का उपयोग आश्रय के लिए होता है। मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र मत्स्य उत्पादन के लिए भी महत्वपूर्ण है। मछली तथा शंखमीन (शेल फिश) की बहुत सी प्रजातियों के लिए मैंग्रोव प्रजनन स्थल तथा संवर्धन ग्रह की तरह कार्य करते हैं। मछलियों के अतिरिक्त मैंग्रोव वनों में अन्य जीव-जंतु भी पाए जाते हैं। जैसे, बाघ (बंगाल टाइगर), मगरमच्छ, हिरन, फिशिंग कैट तथा पक्षी। डॉल्फिन, मैंग्रोव-बंदर, ऊदबिलाव आदि मैंग्रोव से सम्बद्ध अन्य जीव हैं।                                                      

बंदर, केकड़े तथा अन्य जीव जंतु मैंग्रोव की पत्तियां खाते हैं। उनके द्वारा उत्सर्जित पदार्थों को जीवाणुओं द्वारा उपयोगी तत्वों में अपघटित कर दिया जाता है।

मैंग्रोव वृक्ष पानी से कार्बनिक अपशिष्ट पदार्थों तथा मिट्टी के कणों को अलग कर देते हैं जिससे पानी साफ होता है तथा उसमें पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है। यह अन्य सम्बद्ध इकोसिस्टम्स के लिए लाभप्रद है। मैंग्रोव क्षेत्रों में प्रवाल भित्तियां, समुद्री शैवाल तथा समुद्री घास अच्छी तरह पनपती हैं।

मैंग्रोव पौधों में सूर्य की तीव्र किरणों तथा पराबैंगनी-बी किरणों से बचाव की क्षमता होती है। उदाहरण के लिए, ऐविसीनिया प्रजाति के मैंग्रोव पौधे गर्म तथा शुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों में उगते हैं जहां पर सूर्य की प्रखर किरणें प्रचुर मात्रा में पहुंचती हैं। यह प्रजाति शुष्क जलवायु के लिए भलीभांति अनुकूलित है। राइज़ोफोरा प्रजाति के पौधे अन्य मैंग्रोव पौधों की अपेक्षा अधिक पराबैंगनी-बी किरणों को सहन कर सकते हैं। मैंग्रोव पौधों की पत्तियों में फ्लेवोनाइड होता है जो पराबैंगनी किरणों को रोकने का कार्य करता है।

मैंग्रोव वृक्षों की जड़ें ज्वार तथा तेज़ जल-धाराओं द्वारा होने वाले मिट्टी के कटाव को कम करती हैं। मैंग्रोव वृक्ष धीरे-धीरे मिट्टी को भेदकर तथा उसमें हवा पहुंचाकर उसे पुनर्जीवित करते हैं। जैसे-जैसे दलदली मिट्टी की दशा सुधरती है, उसमें दूसरे पौधे भी उगने लगते हैं जिससे तूफान तथा चक्रवात के समय क्षति कम होती है। चक्रवात तटीय क्षेत्रों पर बहुत तीव्र गति से टकराते हैं और तट जलमग्न हो जाते हैं जिससे तटों पर रहने वाले जीव-जंतुओं की भारी हानि होती है। राइज़ोफोरा जैसी कुछ मैंग्रोव प्रजातियां इन प्राकृतिक आपदाओं के विरूद्ध ढाल का काम करती हैं।

मैंग्रोव वनों की सुरक्षात्मक भूमिका का सबसे अच्छा उदाहरण 1999 में उड़ीसा तट पर आए चक्रवात के समय देखने को मिला था। इस चक्रवात ने मैंग्रोव रहित क्षेत्रों में भारी तबाही मचाई थी जबकि उन क्षेत्रों में नुकसान नगण्य था जहां मैंग्रोव वृक्षों की संख्या अधिक थी। सदियों से समुद्री तूफानों और तेज़ हवाओं का सामना करते आ रहे मैंग्रोव वन आज मनुष्य के क्रियाकलापों के कारण खतरे में हैं। लेकिन हाल के वर्षों की घटनाओं ने मनुष्य को मैंग्रोव वनों के प्रति अपने रवैये के बारे में सोचने पर विवश किया है।

सन 2004 में तटीय क्षेत्रों में सुनामी से हुई भयंकर तबाही से वे क्षेत्र बच गए जहां मैंग्रोव वन इन लहरों के सामने एक ढाल की तरह खड़े थे। उस समय इन वनों ने हज़ारों लोगों की रक्षा की। इस घटना के बाद तटीय क्षेत्र के गांवों में रहने वाले लोगों ने मैंग्रोव वनों को संरक्षण देने का निश्चय किया।

मैंग्रोव वनों का औषधीय उपयोग भी है। मैंग्रोव पौधों की प्रजातियों का उपयोग सर्पदंश, चर्मरोग, पेचिश तथा मूत्र सम्बंधी रोगों के उपचार के लिए तथा रक्त शोधक के रूप में किया जाता है। स्थानीय मछुआरे ऐविसीनिया ऑफिसिनेलिस की पत्तियों को उबालकर उनके रस का उपयोग पेट तथा मूत्र सम्बंधी रोगों के उपचार के लिए करते हैं।

इस प्रकार देखें तो मैंग्रोव कई प्रकार से उपयोगी हैं। सौभाग्य से पिछले कुछ समय में मैंग्रोव वनों में लोगों की रुचि जाग्रत हुई है। मानव सभ्यता के तथाकथित विकास के कारण अन्य पारिस्थितिकी तंत्रों की तरह मैंग्रोव क्षेत्रों के लिए भी खतरा उत्पन्न हो गया है। तटीय इलाकों में बढ़ते औद्योगीकरण तथा घरेलू एवं औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थों को समुद्र में छोड़े जाने से इन क्षेत्रों में प्रदूषण फैल रहा है। मैंग्रोव वनों के संरक्षण के लिए आवश्यक है इन पारिस्थितिकी तंत्रों का बारीकी से अध्ययन किया जाए।

तटवर्ती क्षेत्रों में मैंग्रोव वनों के विकास के कई कार्यक्रम आरम्भ किए गए हैं। भारत में भी इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य हो रहा है। तमिलनाडु के पिचावरम क्षेत्र में मैंग्रोव वृक्षारोपण के लिए इन्हें हरित-पट्टिका के रूप में लगाने का वृहत अभियान चलाया गया जिससे क्षेत्र में मैंग्रोव वनों की सघनता बढ़ी है। मैंग्रोव वनों का उचित प्रकार से संरक्षण एवं संवर्धन समय की मांग है। तभी तो हम आने वाली पीढि़यों को समृद्ध मैंग्रोव वन विरासत में दे पाएंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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नए वर्ष में धरती की रक्षा से जुड़ें – भारत डोगरा

ए वर्ष का समय मित्रों व प्रियजनों को शुभकामनाएं देने का समय है। इसके साथ यह जीवन में अधिक सार्थकता के लिए सोचते-समझने का भी समय है क्योंकि एक नया वर्ष अपनी तमाम संभावनाओं के साथ हमारे सामने है।

इस सार्थकता की खोज करें तो स्पष्ट है कि धरती की गंभीर व बड़ी समस्याओं के समाधान से जुड़ने में ही सबसे बड़ी सार्थकता है। इस समय समस्याएं तो बहुत हैं, पर संभवत: सबसे बड़ी व गंभीर समस्या यह है कि धरती की जीवनदायिनी क्षमता ही खतरे में है।

वर्ष 1992 में विश्व के 1575 वैज्ञानिकों (जिनमें उस समय जीवित नोबेल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिकों में से लगभग आधे वैज्ञानिक भी सम्मिलित थे) ने एक बयान जारी किया था, जिसमें उन्होंने कहा था, “हम मानवता को इस बारे में चेतावनी देना चाहते हैं कि भविष्य में क्या हो सकता है? पृथ्वी और उसके जीवन की व्यवस्था जिस तरह हो रही है उसमें एक व्यापक बदलाव की ज़रूरत है अन्यथा दुख-दर्द बहुत बढ़ेंगे और हम सबका घर – यह पृथ्वी – इतनी बुरी तरह तहस-नहस हो जाएगी कि फिर उसे बचाया नहीं जा सकेगा।”

इन वैज्ञानिकों ने आगे कहा था कि तबाह हो रहे पर्यावरण का बहुत दबाव वायुमंडल, समुद्र, मिट्टी, वन और जीवन के विभिन्न रूपों, सभी पर पड़ रहा है और वर्ष 2100 तक पृथ्वी के विभिन्न जीवन रूपों में से एक तिहाई लुप्त हो सकते हैं। मनुष्य की वर्तमान जीवन पद्धति शैली के कई तौर-तरीके भविष्य में सुरक्षित जीवन की संभावनाओं को नष्ट कर रहे हैं और इस जीती-जागती दुनिया को इतना बदल सकते हैं कि जिस रूप में जीवन को हमने जाना है, उसका अस्तित्व ही कठिन हो जाए।

इस चेतावनी के 25 वर्ष पूरा होने पर अनेक प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों ने वर्ष 2017 में फिर एक नई चेतावनी जारी की। इस चेतावनी पर कहीं अधिक वैज्ञानिकों व विशेषज्ञों ने हस्ताक्षर किए। इसमें कहा गया है कि वर्ष 1992 में जो चिंता के बिंदु गिनाए गए थे उनमें से अधिकांश पर अभी तक समुचित कार्रवाई नहीं हुई है व कई मामलों में स्थितियां पहले से और बिगड़ गई हैं।

इससे पहले एमआईटी द्वारा प्रकाशित चर्चित अध्ययन ‘इम्पेरिल्ड प्लैनेट’(संकटग्रस्त ग्रह) में एडवर्ड गोल्डस्मिथ व उनके साथी पर्यावरण विशेषज्ञों ने कहा था कि धरती की जीवनदायिनी क्षमता सदा ऐसी ही बनी रहेगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है। इस रिपोर्ट में बताया गया सबसे बड़ा खतरा यही है कि हम उन प्रक्रियाओं को ही अस्त-व्यस्त कर रहे हैं जिनसे धरती की जीवनदायिनी क्षमता बनती है।

स्टॉकहोम रेसिलिएंस सेंटर के वैज्ञानिकों के अनुसंधान ने हाल के समय में धरती के सबसे बड़े संकटों की ओर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास किया है। यह अनुसंधान बहुत चर्चित रहा है। इस अनुसंधान में धरती पर जीवन की सुरक्षा के लिए नौ विशिष्ट सीमा-रेखाओं की पहचान की गई है जिनका अतिक्रमण मनुष्य को नहीं करना चाहिए। गहरी चिंता की बात है कि इन नौ में से तीन सीमाओं का अतिक्रमण आरंभ हो चुका है। ये तीन सीमाएं है – जलवायु बदलाव, जैव-विविधता का ह्यास व भूमंडलीय नाइट्रोजन चक्र में बदलाव।

इसके अतिरिक्त चार अन्य सीमाएं ऐसी हैं जिनका अतिक्रमण होने की संभावना निकट भविष्य में है। ये चार क्षेत्र हैं – भूमंडलीय फॉस्फोरस चक्र, भूमंडलीय जल उपयोग, समुद्रों का अम्लीकरण व भूमंडलीय स्तर पर भूमि उपयोग में बदलाव।

इस अनुसंधान में सामने आ रहा है कि इन अति संवेदनशील क्षेत्रों में कोई सीमा-रेखा एक ‘टिपिंग पॉइंट’ (यानी डगमगाने के बिंदु) के आगे पहुंच गई तो अचानक बड़े पर्यावरणीय बदलाव हो सकते हैं। ये बदलाव ऐसे भी हो सकते हैं जिन्हें सीमा-रेखा पार होने के बाद रोका न जा सकेगा या पहले की जीवन पनपाने वाली स्थिति में लौटाया न जा सकेगा। वैज्ञानिकों की तकनीकी भाषा में, ये बदलाव शायद रिवर्सिबल यानी उत्क्रमणीय न हो।

इन चिंताजनक स्थितियों को देखते हुए बहुत ज़रूरी है कि अधिक से अधिक लोग इन समस्याओं के समाधान से जुड़ें। इसके लिए इन समस्याओं की सही जानकारी लोगों तक ले जाना बहुत ज़रूरी है। इस संदर्भ में वैज्ञानिकों व विज्ञान की अच्छी जानकारी रखने वाले नागरिकों की भूमिका व विज्ञान मीडिया की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण है। जन साधारण को इन गंभीर समस्याओं के समाधान से जोड़ने के लिए पहला ज़रूरी कदम यह है कि उन तक इन गंभीर समस्याओं व उनके समाधानों की सही जानकारी पंहुचे।

नए वर्ष के आगमन का समय इन बड़ी चुनौतियों को ध्यान में रखने, इन पर सोचने-विचारने का समय भी है ताकि नए वर्ष में इन गंभीर समस्याओं के समाधान से जुड़कर अपने जीवन में अधिक सार्थकता ला सकें। (स्रोत फीचर्स)

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