एक हालिया अध्ययन से पता चला है कि किसी गर्म दिन में हाथी
अपने शरीर का 10 प्रतिशत तक पानी गंवा देते हैं। यह ज़मीन पर पाए जाने वाले किसी भी
जीव की तुलना में अधिक है।
यह समाचार लाड़-प्यार में पलने वाले
चिड़ियाघर के हाथियों के लिए तो कोई मायने नहीं रखता,
लेकिन वैश्विक तापमान
में वृद्धि को देखते हुए जंगली हाथियों के लिए यह चिंता का विषय है। गौरतलब है कि
हाथियों पर पहले से ही विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है,
ऐसे में पानी की कमी
से उनकी जन्म-दर में कमी, बच्चे के लिए दूध की कमी और निर्जलीकरण के
कारण मृत्यु की संभावना बढ़ जाएगी।
हाथियों को हर दिन सैकड़ों लीटर पानी की
आवश्यकता होती है, लेकिन जलवायु परिवर्तन से उनकी पानी की ज़रूरतों में किस तरह
के बदलाव होंगे यह अभी तक स्पष्ट नहीं है। इसके लिए संरक्षण जीव विज्ञानी खोरीन
केंडल ने नार्थ कैरोलिना चिड़ियाघर के पांच अफ्रीकी सवाना हाथियों पर अध्ययन किया।
साधारण पानी हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से बना अणु होता है। केंडल और उनकी टीम ने तीन
वर्षों के दौरान छह अवसरों पर हाथियों को हाइड्रोजन की बजाय हाइड्रोजन के भारी
समस्थानिक ड्यूटेरियम से बने पानी (‘भारी पानी’) की खुराक दी। ड्यूटेरियम हानिरहित
है। यह भारी पानी शरीर के पानी में घुल जाता है और जीवों द्वारा उत्सर्जित तरल में
ट्रेस किया जा सकता है। वैज्ञानिकों ने नियमित रूप से 10 दिनों तक ‘भारी पानी’ की
नपी-तुली खुराक देने के बाद रक्त के नमूने लिए और ड्यूटेरियम की बची हुई मात्रा के
आधार पर यह पता लगाया कि हाथी कितनी तेज़ी से शरीर का पानी गंवा रहे हैं।
रॉयल सोसाइटी ओपन साइंस में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार ठंडे मौसम
(6 से 14 डिग्री सेल्सियस तापमान पर) में नर हाथी औसतन 325 लीटर तक पानी गंवा देते
हैं जबकि गर्म दिनों (24 डिग्री सेल्सियस तापमान पर) में यह मात्रा औसतन 427 लीटर
होती है और कभी-कभी 516 लीटर तक हो सकती है। यह मात्रा शरीर में उपस्थित कुल पानी
का 10 प्रतिशत या शरीर के द्रव्यमान का 7.5 प्रतिशत तक है। इसलिए हाथियों को
निर्जलीकरण के खतरनाक स्तर से बचने के लिए हर 2 से 3 दिन में कम से कम एक बार खूब
पानी पीना पड़ता है। तुलना के लिए किसी गर्म वातावरण में घोड़े प्रतिदिन 40 लीटर
पानी गंवाते हैं जो उनके शरीर के द्रव्यमान का 6 प्रतिशत है। मनुष्यों में यह
मात्रा 3-5 लीटर प्रतिदिन है जो हमारे शरीर के द्रव्यमान का 5 प्रतिशत है। यह
मात्रा मैराथन धावकों और फौजियों में दो गुनी होती है।
इस चर्चा में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी के साथ हाथियों को अधिक पानी की आवश्यकता होगी। लेकिन पानी के स्रोत और पानी से भरपूर पेड़ों में कमी आने से समस्या काफी जटिल हो सकती है। ऐसे में संसाधनों की कमी के चलते मनुष्यों और हाथियों में संघर्ष के हालात और बिगड़ सकते हैं। कभी-कभी हाथी फसलों पर हमला कर देते हैं या फिर भूमिगत जल संरचनाओं को नष्ट करते हैं। इससे दोनों प्रजातियों में टकराव घातक हो जाता है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_image_-1280w__no_aspect/public/elephant_1280p.jpg?itok=loupVgZw
घुड़दौड़ काफी लोकप्रिय खेल है और इसमें पैसा भी खूब लगता है।
रेस जीतने के लिए घुड़सवार (जॉकी) और प्रशिक्षक घोड़े की पिछली दौड़ों के डैटा, घोड़ों
के दौड़ने की क्षमता, वर्षों के अनुभव और अपने एहसास पर निर्भर करते हैं। लेकिन
हाल ही में पेरिस के स्कूल फॉर एडवांस्ड स्टडीज़ ऑफ सोशल साइंसेज की गणितज्ञ
एमैंडाइन एफ्टेलियन ने घुड़दौड़ के लिए घोड़ों द्वारा खर्च की गई ऊर्जा का गणितीय
मॉडल तैयार किया है। मॉडल के अनुसार छोटी दूरी की दौड़ जीतने के लिए शुरुआत तो तेज़
रफ्तार के साथ करनी चाहिए लेकिन आखिर में तेज़ दौड़ने के लिए ऊर्जा बचाकर रखनी
चाहिए। उनका कहना है कि इस मॉडल की मदद से विभिन्न घोड़ों की क्षमता के मुताबिक
उनके दौड़ने की रफ्तार बनाए रखने की रणनीति बनाई जा सकती है।
एफ्टेलियन 2013 से मनुष्यों की रेस के
विश्व चैंपियन धावकों के प्रदर्शन का विश्लेषण कर रही थीं। उन्होंने देखा कि कम
दूरी की दौड़ों में धावक तब जीतते हैं जब वे दौड़ की शुरुआत तेज़ रफ्तार से करते हैं
और फिनिश लाइन की ओर बढ़ते हुए धीरे-धीरे अपनी रफ्तार कम करते जाते हैं। लेकिन
मध्यम दूरी की दौड़ में धावक तब बेहतर प्रदर्शन करते हैं जब वे शुरुआत तेज़ रफ्तार
से करते हैं, फिर स्थिर रफ्तार से दौड़ते हुए फिनिश लाइन की ओर बढ़ते हैं
और फिनिश लाइन के करीब बहुत तेज़ दौड़ते हैं।
उन्होंने अपने मॉडल में दर्शाया था कि किस
तरह जीतने की इन दो रणनीतियों में दो अलग-अलग तरीकों से मांसपेशियों को अधिकतम
ऊर्जा मिलती हैं। पहली विधि एरोबिक है, जिसमें ऑक्सीजन की ज़रूरत होती है और दौड़ के
दौरान ऑक्सीजन की आपूर्ति सीमित हो सकती है। दूसरी एनएरोबिक विधि है, जिसमें
ऑक्सीजन की ज़रूरत तो नहीं होती लेकिन इस तरीके में ऐसे अपशिष्ट बनते हैं जिनसे
थकान पैदा होती है।
एफ्टेलियन देखना चाहती थीं कि इनमें से कौन
सी रणनीति घोड़ों के लिए बेहतर होगी। इसके लिए उनकी टीम ने फ्रेंच रेस के घोड़ों की
काठियों (जीन) में लगे जीपीएस ट्रैकिंग डिवाइस से घोड़ों की वास्तविक गति और स्थिति
का डैटा लिया और दर्जनों रेस के पैटर्न का अध्ययन किया। उन्होंने तीन तरह की दौड़ –
1300 मीटर की छोटी दौड़, 1900 मीटर की मध्यम दूरी दौड़,
और 2100 मीटर की लंबी
दौड़ – के लिए अलग-अलग मॉडल विकसित किए। मॉडल्स में दौड़ की अलग-अलग दूरियों के
अलावा ट्रैक के घुमाव और उतार-चढ़ाव का भी ध्यान रखा।
प्लॉस वन में प्रकाशित परिणाम उन जॉकी को चकित कर सकते हैं जो आखिर
में तेज़ दौड़कर रेस जीतने के लिए शुरुआत में घोड़े की रफ्तार पर काबू रखते हैं। मॉडल
के अनुसार दौड़ की बेहतर शुरुआत बेहतर अंत देती है। लेकिन शुरू में बहुत तेज़ रफ्तार
से अंत तक घोड़े निढाल भी हो सकते हैं।
कुछ शोधकर्ताओं का कहना है कि जीत का मामला, प्रशिक्षक
और जॉकी या घोड़ों की कद-काठी और एरोबिक क्षमता भर का नहीं है। घोड़ों का व्यवहार भी
महत्वपूर्ण है। जब तक घोड़े के मनोवैज्ञानिक व्यवहार को मॉडलों में शामिल नहीं किया
जाएगा, मॉडल सही प्रदर्शन नहीं कर पाएंगे।
और सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि क्या वास्तव में इन मॉडल्स की ज़रूरत है? घुड़दौड़ का असली मज़ा तो उसकी अनिश्चितता में ही है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_large/public/horse_1280p.jpg?itok=8eHT1fMl
पिछले 9 माह से देश के स्कूल कमोबेश बंद पड़े हैं। कहने को तो
रिमोट शिक्षा की व्यवस्था की गई है लेकिन उसकी अपनी समस्याएं हैं। वैसे तो केंद्र
सरकार ने अक्टूबर में आदेश जारी कर दिए थे कि राज्य अपने विवेक के अनुसार स्कूल
खोलने का निर्णय ले सकते हैं किंतु अधिकांश राज्यों ने स्कूल न खोलने या आंशिक रूप
से खोलने का ही निर्णय लिया है। इस संदर्भ में मुख्य सवाल यह है कि स्कूल खोलने या
बंद रखने का निर्णय किन आधारों पर लिया जाएगा।
पहले तो यह देखना होगा कि हमारे सामने
विकल्प क्या हैं। पहला विकल्प तो यही है कि सब कुछ सामान्य हो जाए और सारे स्कूल
पहले की भांति (जैसे लॉकडाउन से पहले थे) चलने लगें। इसका मतलब यह तो नहीं लगाया
जा सकता कि सब कुछ ठीक हो गया क्योंकि देश में शिक्षा की हालत को लेकर कई अन्य
चिंताएं तो बनी रहेंगी।
दूसरा विकल्प है स्कूलों को पूरी तरह बंद
रखना। और तीसरा विकल्प है स्कूलों को आंशिक रूप से खोलना यानी कुछ कक्षाएं शुरू कर
देना या प्रत्येक कक्षा में सीमित संख्या में छात्रों को आने देना। स्कूल बंद रखने
का मतलब होगा कि देश के 15 लाख से ज़्यादा स्कूलों में दाखिल 28 करोड़ बच्चे घरों
में बंद रहेंगे और संभव हुआ तो ऑनलाइन कुछ सीखने की कोशिश करेंगे। लेकिन इसके साथ
जुड़े कई मसले हैं।
सबसे पहला मुद्दा तो ऑनलाइन शिक्षा तक
पहुंच का है। युनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में मात्र 23 प्रतिशत घरों में
इंटरनेट कनेक्शन हैं जिनके माध्यम से ऑनलाइन शिक्षा तक पहुंच बनाई जा सकती है।
दुनिया भर में देखें तो ऐसे डिजिटल-वंचित बच्चों की संख्या 50 करोड़ के आसपास है।
इस मामले में विशाल ग्रामीण-शहरी अंतर भी है। इंटरनेट उपलब्धता में इस अंतर का
स्पष्ट परिणाम यह होगा कि सीखने के मामले में खाई और बढ़ेगी। स्मार्ट फोन वगैरह भी
काफी कम परिवारों के पास हैं और यदि हैं भी,
तो वे पूरे परिवार के
इस्तेमाल के लिए हैं। ज़ाहिर है, ग्रामीण बच्चे,
लड़कियां और शहरी गरीब
बच्चे पिछड़ जाएंगे।
यह सही है कि शासन की ओर से यह प्रयास किया
गया है कि इंटरनेट से स्वतंत्र प्लेटफॉम्र्स (जैसे टेलीविज़न) पर भी शिक्षा का
उपक्रम किया जाए लेकिन उसकी समस्याएं भी कम नहीं हैं। एक तो इस शैली में मानकर चला
जाता है कि पर्दे पर किसी जानकार को सुनकर शिक्षा पूरी हो जाती है। इस माध्यम में
बच्चों और शिक्षक के बीच किसी वार्तालाप के लिए कोई गुंजाइश नहीं होती। दूसरी बात
यह है कि लगभग सारे शिक्षक बताएंगे कि बच्चे कक्षा में लगातार ध्यान केंद्रित नहीं
करते/कर पाते। शिक्षक की नज़र रहती है कि किसका ध्यान कब व कहां भटक रहा है।
टेलीविज़न जैसा माध्यम तो इसमें कोई मदद नहीं कर सकता। यानी यह रिमोट शिक्षा एक ओर
तो शिक्षा की गुणवत्ता को बिगाड़ेगी और साथ ही गरीब-अमीर,
ग्रामीण-शहरी बच्चों
के बीच तथा लड़के-लड़कियों के बीच असमानता को बढ़ाएगी।
युनिसेफ की उक्त रिपोर्ट में आगाह किया गया
है कि रिमोट शिक्षा के माध्यम उपलब्ध होने के बावजूद भी शायद बच्चे उतने अच्छे से
न सीख पाएं क्योंकि घर के परिवेश में कई अन्य दबाव भी काम करते हैं। यदि
बच्ची/बच्चा स्कूल चला जाए तो उतने घंटे तो समझिए,
‘सीखने’ के लिए
आरक्षित हो गए। लेकिन वह घर पर ही है तो कई अन्य प्राथमिकताएं सिर उठाने लगती हैं।
अधिकांश लोग शायद यह तो स्वीकार करेंगे कि
बच्चे स्कूल सिर्फ ‘पढ़ाई’ करने नहीं जाते। स्कूल हमजोलियों से मेलजोल का एक स्थान
भी होता है जहां तमाम तरह के खेलकूद होते हैं,
रिश्ते-नाते बनते
हैं। स्कूल बंद रहने से बच्चे इन महत्वपूर्ण सामाजिक अवसरों से वंचित हो रहे हैं।
यह बात कई अध्ययनों में उभरी है कि सतत माता-पिता की निगरानी में रहना और हमउम्र
बच्चों के साथ मेलजोल न होना बच्चों के लिए मानसिक दबाव पैदा कर रहा है और
मनोवैज्ञानिक समस्याएं भी। माता-पिता के लिए जो समस्याएं सामने आ रही हैं, वे
तो सूद के रूप में हैं। वॉशिंगटन स्थित चिल्ड्रन नेशनल हॉस्पिटल की डॉ. डेनियल
डूली ने कहा है कि स्कूल बंद होने की वजह से शिक्षा का तो नुकसान हुआ ही है, मानसिक
स्वास्थ्य, कुपोषण वगैरह के खतरे भी बढ़े हैं।
एक मुद्दा मध्यान्ह भोजन यानी मिडडे मील का
भी है। मिडडे मील को दुनिया का सबसे बड़ा पोषण कार्यक्रम कहा गया है। इसके तहत दिन
में एक बार कक्षा 1 से 8 तक के सारे स्कूली बच्चों को पौष्टिक भोजन प्राप्त होता
है। इनकी संख्या करीब 6 करोड़ होगी। इतने ही बच्चों को आंगनवाड़ी से भोजन दिया जाता
है और वे भी बंद हैं। यह उनके पोषण स्तर को बेहतर करने में एक महत्वपूर्ण योगदान
देता है। हो सकता है यह योजना बहुत अच्छी तरह से लागू न हुई है, फिर
भी इसने स्कूली बच्चों की सेहत पर सकारात्मक असर डाला है। स्कूल बंद मतलब मिडडे
मील भी बंद। भारत में कुपोषण की स्थिति को देखते हुए यह एक बहुत बड़ा व महत्वपूर्ण
नुकसान है।
कुल मिलाकर स्कूल बंद रहने का मतलब बच्चों
के लिए संज्ञानात्मक विकास और तंदुरुस्ती में ज़बर्दस्त नुकसान। इसके साथ-साथ
खेलकूद का अभाव, हमउम्र बच्चों से मेलजोल के अभाव वगैरह का मनोवैज्ञानिक असर
तो हो ही रहा है। इसके अलावा, कई संस्थाओं ने आशंका व्यक्त की है कि यदि
यह साल इसी तरह गया तो 2021 में बड़ी संख्या में बच्चे शायद स्कूल न लौटें, नए
दाखिलों की तो बात ही जाने दें। स्कूलों में दाखिलों को लेकर जो प्रगति पिछले
एक-डेढ़ दशकों में हुई है वह शायद वापिस पुरानी स्थिति में पहुंच जाए। लैंसेट
के एक शोध पत्र में यह भी शंका व्यक्त की गई है कि इस तरह स्कूल बंद रहने से
बाल-विवाह में भी वृद्धि की संभावना है।
तो स्कूलों को जल्द से जल्द बहाल करने के
पक्ष में काफी दलीलें हैं। लेकिन यदि सरकारें स्कूलों को नहीं खोल रही हैं, तो
यकीनन कुछ कारण होंगे। सरकार तो सरकार, माता-पिता भी कह रहे हैं कि स्कूल खुलेंगे
तो भी वे अपने बच्चों को नहीं भेजेंगे। एक सर्वेक्षण में 70 प्रतिशत अभिभावकों ने
यह राय व्यक्त की है। वैसे यदि पालकों को कहा जाएगा कि वे बच्चों को स्कूल अपनी
ज़िम्मेदारी पर ही भेजें, तो पालकों का कोई अन्य जवाब हो भी नहीं
सकता। कई स्कूल प्रबंधन भी ऐसा ही सोचते हैं। और इन सबकी हिचक का प्रमुख (या शायद
एकमात्र) कारण है कि स्कूल में भीड़भाड़ होगी,
बच्चों के बीच निकटता
होगी, बच्चे मास्क वगैरह भूल जाएंगे और खुद संक्रमित होंगे, और
संक्रमण को घर ले आएंगे। कहा जा रहा है कि स्कूल संक्रमण प्रसार के अड्डे बन
जाएंगे। इसी मूल चिंता के चलते समाज में स्कूल खोलने के विरुद्ध माहौल बना है। तो
सवाल है कि यह चिंता कितनी जायज़ है।
पिछले दिनों कई देशों में स्कूल पूर्ण या
आंशिक रूप से खोले गए हैं। भारत में भी कुछ राज्यों ने स्कूल खोले हैं। कहना न
होगा कि स्कूल खोलने को लेकर केंद्र सरकार द्वारा प्रोटोकॉल जारी किए गए हैं और
शायद शत प्रतिशत नहीं लेकिन इनका पालन भी हुआ है। तो उनसे किस तरह के आंकड़े व अनुभव
मिले हैं।
स्विटज़लैंड स्थित इनसाइट्स फॉर एजूकेशन
नामक एक संस्था ने स्कूल खोलने के बाद के अनुभवों का एक अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन
किया था। उनके अध्ययन में 191 देशों के अनुभवों का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट
का पहला चौंकाने वाला निष्कर्ष यह है कि कोविड-19 वैश्विक महामारी ने दुनिया भर
में बच्चों की शिक्षा के 3 खरब स्कूल दिवसों की हानि की है।
बहरहाल,
रिपोर्ट का सबसे
महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि स्कूलों के खुलने और संक्रमण दर में वृद्धि के बीच
कोई सम्बंध नहीं है। इनसाइट्स फॉर एजूकेशन की मुख्य कार्यकारी अधिकारी रैण्डा
ग्रोब-ज़कारी का कहना है कि यह तो सही है कि स्कूल खोलने या ना खोलने का निर्णय तो
स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा लेकिन कुछ मान्यताओं की छानबीन आवश्यक है।
जैसे यह मान लिया गया है स्कूल खुले तो संक्रमण फैलने की दर में उछाल आएगा और
स्कूल बंद रखने से संक्रमण फैलने की दर कम रहेगी। देखना यह है कि विभिन्न देशों का
अनुभव क्या कहता है। इसे समझने के लिए शोधकर्ताओं ने 191 अलग-अलग देशों में अपनाए
गए तरीकों और उनके परिणामों का विश्लेषण किया है।
जिन देशों का अध्ययन किया गया उनमें से कम
से कम 92 देशों में स्कूल खोले गए हैं। इनमें से कुछ देश तो ऐसे भी थे जहां
कोविड-19 काफी अधिक था। रिपोर्ट में बताया गया है कि फ्रांस व स्पैन समेत 52 देशों
में बच्चे अगस्त और सितंबर में स्कूल आने लगे थे। ये सभी वे देश हैं जहां लॉकडाउन
के दौरान संक्रमण दर बढ़ रही थी लेकिन स्कूल खुलने के बाद और नहीं बढ़ी थी। दूसरी ओर, यू.के.
व हंगरी में स्कूल खुलने के बाद संक्रमण दर बढ़ी थी। 52 देशों का विश्लेषण बताता है
कि संक्रमण दर बढ़ने का स्कूल खुलने से कोई सम्बंध नहीं दिखता। इसके लिए अन्य
परिस्थितियों पर विचार करना होगा। यूएस में भी स्कूल खुलने और संक्रमण दर में
वृद्धि का कोई सीधा सम्बंध स्थापित नहीं हुआ है।
भारत में कुछ राज्यों ने स्कूल खोलने का
निर्णय लिया है। अधिकांश राज्यों में कक्षा 9 तथा उससे ऊपर की कक्षाओं को ही शुरू
किया गया है। इस संदर्भ में आंध्र प्रदेश की रिपोर्ट है कि वहां स्कूल खुलने के
बाद राज्य के कुल 1.89 लाख शिक्षकों में से लगभग 71 हज़ार की जांच की गई और उनमें
से 829 (1.17 प्रतिशत) पॉज़िटिव पाए गए। कुल 96 हज़ार छात्रों की जांच में 575 (0.6
प्रतिशत) पॉज़िटिव निकले। राज्य के शिक्षा आयुक्त ने माना है कि ये आंकड़े कदापि
चिंताजनक नहीं हैं क्योंकि पहली बात तो यह है कि शिक्षकों की जांच स्कूल खुलने से
पहले की गई थी जिसके परिणाम स्कूल खुलने के बाद आए हैं।
मिशिगन विश्वविद्यालय चिकित्सा अध्ययन शाला
की संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रीति मालनी ने स्कूल खोलने के बारे में कहा है कि
अब तक उपलब्ध आंकड़ों से नहीं लगता कि स्कूल सुपरस्प्रेडर स्थान हैं। दरअसल ऐसा
लगता है कि स्कूल अपने इलाके के सामान्य रुझान को ही प्रतिबिंबित करते हैं। स्पैन
के पोलीटेक्निक विश्वविद्यालय के एनरिक अल्वारेज़ ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि
स्पैन में दूसरी लहर में संक्रमणों में वृद्धि स्कूल खुलने से कई सप्ताह पहले शुरू
हो गई थी और स्कूल खुलने के तीन सप्ताह बाद गिरने लगी थी। कहीं भी यह नहीं देखा
गया कि स्कूल खुलने से संक्रमण के प्रसार में वृद्धि हुई हो। और उनके आंकड़े बताते
हैं कि स्कूल संक्रमण फैलाने के हॉट-स्पॉट तो कदापि नहीं बने हैं। अलबत्ता, उन्होंने
स्पष्ट किया है कि यह स्पैन की बात है जहां जांच और संपर्कों की खोज काफी
व्यवस्थित रूप से की जाती है। इसके अलावा स्पैन में मास्क पहनना, शारीरिक
दूरी बनाए रखना तथा साफ-सफाई का भी विशेष ध्यान रखा जा रहा है।
इसी प्रकार से थाईलैंड व दक्षिण अफ्रीका
में स्कूल पूरी तरह खोल दिए गए और संक्रमण के फैलाव पर इसका कोई असर नहीं देखा
गया। वियतनाम व गाम्बिया में गर्मी की छुट्टियों में मामले बढ़े लेकिन स्कूल खुलने
के बाद कम हो गए। जापान में भी पहले तो मामले बढ़े लेकिन फिर घटने लगे। इस पूरे
दौरान स्कूल खुले रहे। सिर्फ यू.के. में ही देखा गया कि स्कूल खुलने के समय के बाद
से संक्रमणों में वृद्धि हुई।
अधिकांश देशों में,
और खासकर यू.एस. व
यू.के. में वैज्ञानिकों का मत है कि कहीं-कहीं स्कूल खुलने के बाद संक्रमण दर में
वृद्धि हुई है लेकिन इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि ऐसा स्कूल खुलने के कारण हुआ
है। साथ ही वे कहते हैं कि इस बात का भी कोई प्रमाण नहीं है कि इसमें स्कूलों की
कोई भूमिका नहीं रही है।
महामारी और स्कूल खोलने के संदर्भ में एक
महत्वपूर्ण सवाल यह उठता रहा है कि क्या बच्चे कम संक्रमित होते हैं और संक्रमण को
कम फैलाते हैं। सामान्य आंकड़ों से पता चला है कि संक्रमित लोगों में बच्चे सबसे कम
हैं। इसकी कई व्याख्याएं प्रस्तुत की गई हैं और काफी मतभेद भी हैं। कुछ विशेषज्ञों
का मत है कि बच्चों की प्रतिरक्षा प्रणाली अप्रशिक्षित होने की वजह से वे सुरक्षित
रहते हैं। इसके विपरीत कुछ लोगों का कहना है कि यदि ऐसा होता तो वे अन्य संक्रमणों
से भी सुरक्षित रहते लेकिन हकीकत अलग है। कुछ लोगों को कहना है कि बच्चों के
फेफड़ों की कम कोशिकाओं में वे ग्राही (ACE2 ग्राही) होते हैं जो कोरोनावायरस को
कोशिका में प्रवेश का रास्ता प्रदान करते हैं। यह भी कहा गया है कि बच्चे संक्रमण
को बहुत अधिक नहीं फैलाते क्योंकि उनके फेफड़े छोटे होते हैं और उनकी छींक या खांसी
के साथ निकली बूंदों में वायरस की संख्या कम होती है और ये बूंदें बहुत दूर तक
नहीं जातीं।
बहरहाल, मामला यह है कि अधिकांश आंकड़े दर्शाते हैं कि स्कूल कोविड-19 वायरस फैलाने के प्रमुख या बड़े स्रोत नहीं हैं। यह भी स्पष्ट है कि स्कूलों के बंद रहने का शैक्षणिक व स्वास्थ्य सम्बंधी खामियाजा खास तौर से गरीब व वंचित तबके के बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। इसलिए इस मुद्दे को मात्र प्रशासनिक सहूलियत के नज़रिए से न देखकर व्यापक अर्थों में देखकर निर्णय करने की ज़रूरत है।(स्रोत फीचर्स)
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विश्व एड्स दिवस (1 दिसंबर) हमें याद दिलाता है कि वर्तमान
में हम ना सिर्फ कोविड-19 बल्कि कई अन्य महामारियों का एक साथ सामना कर रहे हैं।
इनमें से एक महामारी एड्स की है जिसने पिछले चालीस सालों में लगभग सवा तीन करोड़
लोगों की जान ली है।
यूएनएड्स के अनुसार, वर्ष
2019 में विश्व में लगभग 3.8 करोड़ लोग एचआईवी से संक्रमित थे और एड्स-सम्बंधी
बीमारियों से लगभग 6.9 लाख लोगों की मृत्यु हुई थी। वर्ष 2004 में एड्स से
सर्वाधिक मौतें हुई थीं। उसके मुकाबले वर्ष 2019 में एड्स की मृत्यु दर में 60
प्रतिशत की कमी आई थी। लेकिन मुमकिन है कि कोविड-19 के फैलने से इन 15 सालों में
एड्स मृत्यु दर में आई यह कमी प्रभावित हो।
कोविड-19 ने एचआईवी संक्रमितों और एड्स
कार्यकर्ताओं के लिए कई मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। जैसे लॉकडाउन के दौरान लोगों के
एचआईवी परीक्षण और उपचार की मुश्किल। कोविड-19 के कारण एचआईवी, टीबी
और मलेरिया से प्रभावित लोगों की देखभाल के लिए ज़रूरी संसाधनों-औषधियों की आपूर्ति
और उन तक लोगों की पहुंच प्रभावित हुई। इसके अलावा अफीमी दवाइयों की लत, ओवरडोज़
के कारण होने वाली मौतें और एचआईवी जैसी समस्याएं इस दौरान नज़रअंदाज़ रहीं।
कोरोनावायरस का टीका जल्द ही बाज़ार में आने
वाला है। उम्मीद है कि यह टीका कम से कम एक महामारी से तो निज़ात दिलाएगा और उन
लोगों को राहत पहुंचाएगा जो पहले ही काफी प्रभावित हैं। लेकिन एड्स के इतिहास को
देखकर यह उम्मीद पूरी होती तो नहीं लगती।
पिछले 25 वर्षों से एचआईवी के लिए प्रभावी
एंटीरेट्रोवायरल दवाएं मौजूद हैं। फिर भी हर साल एड्स से लाखों लोग मारे जाते हैं, इन
मरने वालों में ज़्यादातर अश्वेत होते हैं। ऐसा क्यों है?
और इस अनुभव के आधार
पर कोरोनावायरस के टीके के बारे में क्या अंदाज़ा मिलता है?
अब तक एचआईवी का कोई टीका तो नहीं बन सका
है। लेकिन एचआईवी के साथ जी रहे लोग एंटीरेट्रोवायरल उपचार (ART) और एचआईवी के जोखिम वाले लोग सुरक्षा के लिए प्री-एक्सपोज़र प्रोफायलैक्सिस (PrEP) लेते हैं, जो कुछ हद तक टीकों का काम कर देते हैं। ये
उपाय ना केवल एचआईवी जोखिम वाले या एचआईवी संक्रमित लोगों के लिए मददगार हैं बल्कि
ये उपाय अन्य लोगों में एचआईवी के प्रसार पर भी अंकुश लगाते हैं।
इसी तरह कुछ अन्य टीकों जैसे खसरा, इन्फ्लूएंज़ा
(या संभवत: कोविड-19) का टीकाकरण ना केवल टीकाकृत व्यक्ति को संक्रमण से सुरक्षित
रखता है बल्कि उनसे होने वाले रोगजनक के प्रसार को थाम कर आसपास के लोगों भी
सुरक्षित करता है।
लेकिन वास्तव में स्थिति इसके उलट भी बनती
है। जब औषधियों-टीकों से संरक्षित लोगों में किसी वायरस का प्रसार कम हो जाता है
और भेदभाव पूर्ण नीति के कारण इन टीकों-औषधियों से कुछ खास वर्ग, नस्ल
के लोग वंचित रह जाते हैं तो नतीजतन इन वंचित लोगों में वायरस संक्रमण का जोखिम और
भी बढ़ जाता है। इस तरह, पहले से मौजूद असमानता की खाई और गहरी हो जाती है। एड्स के
मामले में ऐसा ही हुआ था; एंटीरेट्रोवायरल उपचार के उपलब्ध हो जाने
के बाद भी एड्स की बीमारी कुछ चुनिंदा वर्ग/नस्ल की बनकर रह गई, और
असमानता की यह खाई और भी चौड़ी हो गई।
कोरोनावायरस के संभावित टीकों के
समानतापूर्ण वितरण के अभाव में हाशियाकृत लोगों में कोरोनोवायरस का संक्रमण फैलता
रहेगा, जैसा कि अमेरिका में अश्वेत लोगों में एचआईवी का संक्रमण
अत्यधिक है।
वैसे तो एड्स वायरस और कोविड-19 वायरस
प्रसार और संक्रमण की दृष्टि से बहुत भिन्न हैं,
लेकिन ये दोनों ही एक
ही तरह की आबादी को प्रभावित करते हैं, खासकर बेघर लोगों को। अश्वेत अमेरिकी आबादी
के लगभग आधे से दो तिहाई लोग मजबूरन बेघर हैं। बेघर लोगों को अपराधी की तरह देखा
जाता है जो उन्हें गरीबी, उत्पीड़न,
यौन शोषण, स्वास्थ्य
देखभाल की कमी, औपचारिक अर्थव्यवस्था से बेदखली,
कारावास और विभिन्न
अन्य बीमारियों की ओर धकेलता है जो एचआईवी और एड्स के जोखिम को बढ़ाती हैं। बेघर
होना स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच भले ही अंसभव ना करे लेकिन मुश्किल ज़रूर कर देता
है।
एक रिपोर्ट के अनुसार 2016 के डैटा के
अनुसार अमरीका में लगभग 37 लाख लोग घरों से निकाल दिए गए थे, खासकर
अश्वेत और हिस्पैनिक किराएदार। उसके बाद से यूएस में आवास का संकट और विकट हुआ है
तथा बेघरों की संख्या बहुत बढ़ी है। यह ज़रूरी नहीं कि बेघर लोग सड़कों पर ही रहें।
वे रात गुज़ारने भर की जगह तलाशते हैं, आश्रय स्थलों में रहते हैं, कार
में या बाहर सोते हैं, या दोस्तों या परिवार के साथ रहने लगते हैं। जिन लोगों के
साथ वे रहने लगते हैं उनमें से अधिकतर लोग उच्च जोखिम वाले काम करते हैं इसलिए सभी
में संक्रमण फैलने के आसार बढ़ जाते हैं।
बेघर किए जाने के कारण कोविड-19 परीक्षण और
चिकित्सकीय देखभाल मिलने की संभावना भी कम हो जाती है। और यदि कोरोनोवायरस के
टीकों की एक से अधिक खुराक देने की ज़रूरत होगी,
तो समस्या और भी
गंभीर हो जाएगी। क्योंकि दर-दर भटकने को मजबूर लोग टीकों की एक से अधिक खुराक कैसे
नियमित रूप से ले पाएंगे? यही समस्या एचआईवी के साथ भी थी। नियमित
चिकित्सा लाभ लेने के लिए एक स्थिर ठिकाना तो चाहिए ही।
इसलिए हम एड्स महामारी की इन गलतियों से सबक लेते हुए, एड्स और उसके साथ-साथ कोविड-19 महामारी को भी समाप्त करने के प्रयास तो कर ही सकते हैं।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://akm-img-a-in.tosshub.com/sites/btmt/images/stories/1280px_aids_day_660_011220114228.jpg?size=1200:675
चीतों, तेंदुओं के शरीर पर धब्बे या बिल्लियों के
शरीर पर धारियां पाई जाती हैं। यह सवाल अनसुलझा रहा है कि कुछ जानवरों के शरीर के
पैटर्न कैसे बनते हैं? अब, हडसनअल्फा इंस्टीट्यूट फॉर बायोटेक्नॉलॉजी
के ग्रेगरी बार्श बताते हैं कि प्रकृति में पैटर्नों की व्याख्या करने वाला 70 साल
पुराना सिद्धांत इस पहेली को सुलझाने में भी सक्षम है।
दरअसल 1952 में कंप्यूटिंग में अग्रणी एलन
ट्यूरिंग ने बताया था कि प्रकृति में दिखने वाले पैटर्न संभवत: तब बनते हैं जब
एक-दूसरे के कार्य को प्रेरित और बाधित करने वाले अणु ऊतकों में अलग-अलग गति से
बहते हैं। इसके तीस साल बाद कुछ वैज्ञानिकों ने ट्यूरिंग के इस सिद्धांत पर एक
परिकल्पना बनाई थी कि उत्प्रेरक अणु कोशिकाओं को रंग प्रदान करते हैं लेकिन साथ ही
वे अणु अवरोधकों का भी निर्माण करने लगते हैं। अवरोधक अणु प्रेरकों की तुलना में
अधिक तेज़ी से फैलते हैं और रंजकों का निर्माण रोक देते हैं। इस सिद्धांत के आधार
पर विभिन्न रंग के फर या बालों के रंजक के पैटर्न के स्रोत का स्पष्टीकरण तो हुआ
लेकिन शरीर पर पैटर्न बनने की शुरुआत कब और कहां होती है,
यह सवाल अनसुलझा ही
था।
इसलिए बार्श की टीम ने घरेलू बिल्लियों की
चमड़ी के रंग के प्रेरकों और अवरोधकों को देखा। करीब एक दशक पहले उन्होंने
बिल्लियों में टैबी नामक जीन की पहचान की थी। इस जीन में उत्परिवर्तन हो
जाए तो टैबी बिल्लियों में धारियों की जगह काले धब्बे बन जाते हैं।
हडसनअल्फा के आनुवंशिकीविद क्रिस्टोफर कैलिन ने बड़े और काले धब्बों वाले किंग
चीतों में भी इसी जीन का उत्परिवर्तन पाया था। इससे लगता है कि जंगली व घरेलू
दोनों बिल्लियों में रंग एक ही जीन के कारण आता है।
लेकिन विकास के दौरान अन्य जीन और उनमें
हुए उत्परिवर्तन क्या करते हैं यह जानने के लिए कैलिन और उनके साथियों ने कई
वर्षों तक जंगली बिल्लियों का गर्भाशय निकालकर बांझ बनाने वाले क्लीनिक से उनके
हटाए गए ऊतकों का अध्ययन किया, इनमें कई गर्भवती बिल्लियों के भी ऊतक थे।
उन्हें पहली बार त्वचा में अस्थायी मोटाई 28 से 30 दिन के भ्रूण में दिखी, बाद
में इन्हीं जगहों पर काली धारियां बनती हैं।
इसके बाद शोधकर्ताओं ने प्रारंभिक अवस्था के भ्रूण की एक-एक त्वचा कोशिका से सक्रिय जीन पृथक किए और उन्हें अनुक्रमित किया। लगभग 20 दिन के भ्रूण में त्वचा के उस हिस्से में, जहां स्थायी रूप से काली धारियां बनने वाली थीं, Wnt संकेतों से सम्बंधित कुछ जीन्स की गतिविधि में तेज़ी दिखाई दी। Wnt संकेत कई जानवरों में विकास के दौरान कोशिका की भूमिका तय करने और वृद्धि के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। इनमें सबसे सक्रिय जीन था Dkk4। बायोआर्काइव में शोधकर्ताओं ने बताया है कि Dkk4 जीन को निष्क्रिय करने वाले उत्परिवर्तन के कारण ही बिल्लियों की कुछ किस्मों (एबिसिनियन और सिंगापुरा) के शरीर के निशान बहुत छोटे-छोटे हो गए हैं। यह भी पाया गया कि घरेलू बिल्लियों में Wnt और Dkk4 जीन्स प्रेरक और अवरोधक की तरह कार्य करते हैं। गहरे रंग की त्वचा में ये लगभग समान मात्रा में मौजूद रहते हैं। लेकिन पीली रंगत वाली त्वचा में तेज़ी से फैलने वाला Dkk4 प्रोटीन Wnt संकेतों को बाधित कर देता है जिससे रंजक का निर्माण बंद हो जाता है। इसी के परिणामस्वरूप धारियां बनती हैं।(स्रोत फीचर्स)
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असुरक्षित दवाएं, उत्पाद और यहां तक कि पर्यावरण में
उथल-पुथल उन शोधों का परिणाम हैं जिनमें सेक्स और जेंडर को शामिल नहीं किया गया
था। इसी के मद्देनज़र युरोपीय आयोग, उसके द्वारा होराइज़न युरोप नामक कार्यक्रम
के तहत वित्तपोषित समस्त अनुसंधान के लिए,
साल 2021 से सेक्स और
जेंडर विश्लेषण अनिवार्य कर देगा। अनुसंधान कार्यक्रमों से उम्मीद होगी कि वे
अध्ययन की रूपरेखा तैयार करने से लेकर डैटा संग्रह और विश्लेषण तक के हर चरण में
इन कारकों को ध्यान में रखें। यह नीति विशुद्ध गणित जैसे विषयों के अलावा सभी
विषयों पर लागू होगी।
स्टैनफोर्ड युनिवर्सिटी की लोन्डा शीबिंजर
की अध्यक्षता में 25 सदस्यीय समिति द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट शोधकर्ताओं का
मार्गदर्शन करती है कि आर्थिक प्रबंधन से लेकर कृषि अनुसंधान तक सभी विषयों में इन
कारकों को किस तरह शामिल किया जा सकता है। शीबिंजर बताती है कि सेक्स और जेंडर
कारकों को शोध में ना शामिल होने के कारण हुई विफलताओं के परिणाम हमारे सामने हैं।
जैसे, 1997 से 2001 के बीच अमरीकी बाज़ार से लगभग 10 दवाओं को वापस
लिया गया था, जिनमें से आठ दवाएं पुरुषों की तुलना में महिलाओं के लिए
अधिक हानिकारक थीं। जब दवाएं नाकाम होती हैं तो धन की बरबादी के अलावा लोग पीड़ा
झेलते है और जान तक गंवा देते हैं। इसलिए,
शिबिंजर को लगता है
कि कोशिका और जानवरों पर होने वाले परीक्षणों से लेकर मनुष्यों पर होने वाले
क्लीनिकल परीक्षण तक, सभी में पुरुषों और महिलाओं का डैटा अलग-अलग लेना चाहिए और
उनका अलग-अलग विश्लेषण करना चाहिए। शोध में उम्र और आनुवंशिक वंशावली देखना भी
महत्वपूर्ण है, और गर्भवती महिलाओं पर असर को भी अलग से देखने की ज़रूरत है।
और उनके मुताबिक यह सिर्फ महिलाओं की बात
नहीं है – इसका सम्बंध शोध के सही होने से भी है। उदाहरण के लिए, ऑस्टियोपोरोसिस
(अस्थि-छिद्रता) की समस्या को अक्सर रजोनिवृत्त (मीनोपॉज़) होती महिलाओं की समस्या
के रूप में देखा जाता है और पुरुष उपेक्षित रह जाते हैं।
शोध में इन कारकों को अपनाने में देरी को
लेकर वे कहती हैं कि जागरूकता तो धीरे-धीरे बढ़ रही है लेकिन अधिकतर शोधकर्ता इस
तरह का विश्लेषण करना अच्छी तरह नहीं जानते। इस सम्बंध में उनकी पहली रिपोर्ट 2013
में आई थी और अब यह दूसरी रिपोर्ट है। इस रिपोर्ट का ज़ोर ना सिर्फ सेक्स और जेंडर
पर है बल्कि उम्र, भौगोलिक स्थिति और सामाजिक-आर्थिक स्थिति के प्रभाव भी
शामिल किए गए हैं। दूसरा, जेंडर को सिर्फ स्त्री और पुरुष के रूप में
न देखकर जेंडर-विविधता के पूरे परास को ध्यान में रखा गया है।
उनका कहना है कि शोधकर्ता इन विश्लेषणों में
कई गलतियां करते हैं। सबसे बड़ी गलती तो यही है कि वे सेक्स, जेंडर
और तबकों के आपसी सम्बंधों को अनदेखा करते हैं। दूसरी आम गलती यह है कि शोधकर्ता
जन्मजात लिंग और सामाजिक जेंडर के बीच अंतर नहीं करते। यह समझना ज़रूरी है कि जेंडर
पर जातीयता, आयु और संस्कृति का असर होता है। शोध में सही परिवर्ती
चुनने, सही ढंग से डैटा जुटाने और अच्छी तरह विश्लेषण करना ज़रूरी
है।
शीबिंजर का कहना है कि कुछ समकक्ष-समीक्षित
पत्रिकाओं में सेक्स और जेंडर विश्लेषण की नीतियां हैं। लेकिन इंजीनियरिंग के
जर्नलों में भी इस तरह की नीतियां होना चाहिए। एक बड़ी समस्या यह है कि विज्ञान और
इंजीनियरिंग, और यहां तक कि चिकित्सा की कक्षाओं में भी इस तरह के
विश्लेषण नहीं सिखाए जाते। इंजीनियरिंग में इस बात पर विचार ही नहीं किया जाता कि
वृद्ध लोगों, खासकर महिलाओं की कमज़ोर हड्डियों के अध्ययन के लिए
‘क्रैश-टेस्ट डमी’ (मानव डमी) बनाई जाएं।
वैसे कुछ सकारात्मक उदाहरण भी सामने आए
हैं। जैसे हारवर्ड विश्वविद्यालय और स्टैनफोर्ड में अब कंप्यूटर विज्ञान में एक
कोर्स पढ़ाया जा रहा है। इसमें छात्रों को एल्गोरिद्म के साथ-साथ सामाजिक मुद्दों
और परिणामों के बारे में सोचने के लिए भी प्रशिक्षित किया जाता है। जैसे, कोर्स
में इस बात पर चर्चा की जाती है कि किसी एक समूह के लोगों को नज़रअंदाज़ करने पर
कृत्रिम बुद्धि क्या और कितनी समस्याएं पैदा कर सकती है।
वर्तमान संदर्भ में वे बताती हैं कि
कोरोनावायरस महामारी में लिंग और जेंडर के प्रभाव का विश्लेषण करना बहुत ज़रूरी है।
कोविड-19 की एक केस स्टडी में उन्होंने पाया था कि वायरस के प्रति अलग-अलग लिंग के
लोगों की प्रतिक्रिया में अंतर था, लेकिन इसमें जेंडर भी बहुत महत्वपूर्ण है।
जैसा कि दिख रहा है, कोविड-19 से पुरुष अधिक मर रहे हैं,
और ऐसा जेंडर सम्बंधी
कायदों और व्यवहार के कारण है। उदाहरण के लिए,
अधिक पुरुष धूम्रपान
करते हैं और सामान्यत: हाथ कम धोते हैं। दूसरी ओर,
स्वास्थ्य कार्यकर्ता
अधिकतर महिलाएं होती हैं, वे वायरस के संपर्क में अधिक आ सकती हैं।
उन्होंने कुछ ऐसे अनुसंधान विषयों के बारे में भी बताया है जिनके बारे में जानकर लोगों को शायद आश्चर्य होगा कि इनमें भी सेक्स और जेंडर का विश्लेषण आवश्यक है? ये विषय सीधे-सीधे मनुष्यों से सम्बंध नहीं रखते। जैसे कुछ समुद्री जीवों का लिंग विश्लेषण करना बहुत महत्वपूर्ण है। कुछ जीवों में लिंग निर्धारण तापमान से होता है। यदि नर-मादा के अनुपात या उभयलिंगी में बहुत अंतर आएगा तो ये जीव विलुप्त हो जाएंगे। जैसे, एक अध्ययन में देखा गया कि ग्रेट बैरियर रीफ के उत्तरी भाग में 99 प्रतिशत कछुए मादा थे, जबकि अपेक्षाकृत ठंडे दक्षिणी भाग में सिर्फ 67 प्रतिशत कछुए मादा थे। इसलिए यह समझना महत्वपूर्ण होगा कि वैश्विक तापमान में वृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) किस तरह से लिंग अनुपात को बदल रही है, ताकि हम पारिस्थितिक तंत्रों का बेहतर प्रबंधन कर सकें।(स्रोत फीचर्स)
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कोविड-19 टीकों के शुरुआती क्लीनिकल परीक्षणों के सकारात्मक
परिणामों के बाद से ही इनके ‘आपातकालीन उपयोग’ की स्वीकृति की मांग होने लगी है।
इस तरह की मांग ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। वैज्ञानिकों की प्रमुख चिंता
यह है कि इस तरह के उपयोग से चलते हुए क्लीनिकल परीक्षण खटाई में पड़ जाएंगे। दवा
कंपनी नोवर्टिस के वैक्सीन डिज़ाइन के पूर्व प्रमुख क्लाउस स्टोहर इसे टीका विकास
के लिए असमंजस के रूप में तो देखते हैं लेकिन आपातकालीन उपयोग के पक्ष में भी हैं
क्योंकि शुरुआती चरणों में प्रभावशीलता स्थापित हो गई है।
इस संदर्भ में गौरतलब है कि विश्व
स्वास्थ्य संगठन ने नवंबर माह में ही पोलियो टीकाकरण के लिए एक नए टीके को कुछ
देशो में आपातकालीन उपयोग की मंज़ूरी दे दी है। जबकि इस टीके के तो तीसरे चरण के
परीक्षण अभी शुरू भी नहीं हुए हैं।
इसी दौरान टीका निर्माता फाइज़र और
बायोएनटेक ने तीसरे चरण के परीक्षणों के बाद इस तरह की विनियामक अनुमति की मांग की
है। देखा जाए तो कोविड-19 के लिए यूएस एफडीए के नियमों के अनुसार आपातकालीन उपयोग
में आधे प्रतिभागियों पर डोज़ देने के दो माह बाद तक निगरानी रखी जानी चाहिए।
फिलहाल फाइज़र और बायोएनटेक इस लक्ष्य को पार कर चुके हैं।
लेकिन इससे जुड़ी कुछ नैतिक समस्याएं भी
हैं। परीक्षण के दौरान आम तौर पर प्रतिभागियों को ‘अंधकार’ में रखा जाता है कि
उनको टीका दिया गया है या प्लेसिबो। लेकिन एक बार जब टीका काम करने लगता है तो
प्लेसिबो समूह के प्रतिभागियों को टीका न देकर असुरक्षित रखना अनैतिक लगता है।
स्टोहर के अनुसार यदि इन परीक्षणों में बड़ी संख्या में प्रतिभागी पाला बदलकर
‘प्लेसिबो समूह’ से ‘टीका समूह’ में चले
जाएंगे तो क्लीनिकल परीक्षण से सही आंकड़े प्राप्त करना मुश्किल हो जाएगा और टीके
के दीर्घकालिक प्रभावों की बात धरी की धरी रह जाएगी। अर्थात जल्दबाज़ी से टीके की
प्रभाविता का पर्याप्त डैटा नहीं मिल पाएगा। इससे यह पता लगाना भी मुश्किल होगा कि
टीका कितने समय तक प्रभावी रहेगा और क्या इससे संक्रमण को रोका जा सकता है या फिर
यह सिर्फ लक्षणों में राहत देगा। फिर भी फाइज़र के प्रवक्ता के अनुसार कंपनी एफडीए
के साथ प्रतिभागियों के क्रॉसओवर और प्रभाविता को मापने के लिए डैटा एकत्र करने की
प्रकिया पर चर्चा करेगी।
कुछ वैज्ञानिकों का सुझाव है कि ऐसे
प्रतिभागी जिनको शुरुआत में प्लेसिबो प्राप्त हुआ है और बाद में टीका लगवाते हैं, उनका
निरीक्षण एक अलग समूह के रूप में किया जा सकता है। इस तरह से ऐसे समूहों के बीच
टीके की दीर्घकालिक प्रभाविता और सुरक्षा की तुलना भी की जा सकेगी।
फिर भी, एक बार कोविड-19 टीके को आपातकालीन स्वीकृति मिलने से टीके का परीक्षण और अधिक जटिल हो जाएगा। ऐसे में नए परीक्षण शुरू करने वाली कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके टीके आपातकालीन स्वीकृति प्राप्त टीकों से बेहतर हैं। इसके लिए उनकी परीक्षण की प्रक्रिया और अधिक महंगी हो जाएगी। कुल मिलाकर बात यह है कि किसी भी टीके को मंज़ूरी मिलना, भले ही आपातकालीन उपयोग के लिए हो, टीकों के बाज़ार में आने के परिदृश्य को बदल देगा।(स्रोत फीचर्स)
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साल 2017 के अंत में दक्षिण अफ्रीका के ड्रैकन्सबर्ग पहाड़ों
में परागण पारिस्थितिकी विज्ञानी रूथ कोज़ियन की नज़र एक अजीब से पौधे पर पड़ी। इस
पौधे के फूलों का रंग हरा था और वे पौधे की पत्तियों के बीच नज़र नहीं आ रहे थे।
फूल की गंध बहुत तीखी थी, और उनमें इतना मकरंद था कि कोई कीट उसमें
डूब ही जाए।
आम तौर पर फूल चटख रंग के होते हैं जो
पक्षियों, मधुमक्खियों और तितलियों जैसे परागणकर्ताओं को आकर्षित करते
हैं। लेकिन इस पौधे के फूल हरे रंग के थे जो पत्तियों के बीच दिखाई ही नहीं पड़ते
थे, और ज़मीन से बहुत करीब खिले थे। कोज़ियन को लगा कि यह पौधा, गुथरीया
कैपेंसिस, पौधों की उस प्रजाति से सम्बंधित होगा जिनका परागण चूहे, हाथीनुमा
छछूंदर जैसे छोटे स्तनधारी जीव करते हैं।
इसलिए शुरुआत में उन्होंने कैमरे से
रिकार्डिंग सिर्फ रात में की। लेकिन जब पांच दिन तक कैमरे की पकड़ में वह
परागणकर्ता नहीं आ सका तो उन्होंने कैमरे की गति-संवेदनशीलता सेटिंग्स बदलकर पूरे
24 घंटों की रिकॉर्डिंग करना शुरू कर दिया।
ऐसा करने पर उन्हें फूलों पर आती-जाती
छिपकली की छवि दिखाई दी। यह ड्रेकेन्सबर्ग में पाई जाने वाली 26 सेंटीमीटर लंबी स्यूडोकॉर्डिलस
सबविरिडिस थी। शोधकर्ताओं ने फुटेज में पाया कि मकरंद पीने के लिए ये
छिपकलियां फूलों में अपने थूथन को अंदर तक धंसा देती हैं।
वैसे गेको और छिपकलियों की लगभग 40
प्रजातियां देखी गई हैं जो फूलों का मकरंद पीती हैं। लेकिन मकरंद पीने और परागण
करने में अंतर है। अक्सर छिपकलियां पूरा फूल ही खा जाती हैं।
इसके बाद शोधकर्ताओं ने कुछ छिपकलियां पकड़ी
तो पाया कि छिपकलियों के चिकने थूथन पर गुथरीया पौधे के पराग कण चिपके हुए थे।
इसके बाद शोधकर्ताओं ने कुछ पौधों के पास छिपकलियों को जाने से रोका। तो उन्होंने
पाया कि जिन पौधों के पास छिपकलियों को नहीं जाने दिया गया था, कुछ
हफ्तों के बाद उन पौधों पर अन्य की तुलना में 95 प्रतिशत कम फल आए थे। फल बनने के
लिए परागण आवश्यक होता है। फिर, शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में कुछ नर फूलों
के पराग कोशों को साफ किया और उन पर रंगीन पावडर छिड़का,
और देखा कि अब भी ये
छिपकलियां मादा फूलों के प्रजनन अंग तक रंगीन पावडर ले जाती हैं।
गुथरीया फूल
परागण विशेषज्ञ आज भी यह समझने में लगे हैं
कि छिपकलियों को इन फूलों की ओर क्या चीज़ आकर्षित करती है और सरिसृपों द्वारा
परागण किन परिस्थितियों में विकसित होता है और यह कितना महत्व रखता है। कारण यह है
कि छिपकली द्वारा परागण की प्रक्रिया कठिन पर्यावरणों में ही विकसित होती है।
गुथरिया अब तक का ज्ञात दूसरा ऐसा पौधा है
जो परागणकर्ता के रूप में छिपकली जैसे सरीसृपों का उपयोग करता है। इसके पहले
मॉरीशस द्वीप पर पाए जाने वाले ट्रोकेशिया ब्लैकबर्नियाना के बारे में पता
चला था। ट्रोकेशिया ब्लैकबर्नियाना का पेड़ औसतन तीन मीटर ऊंचा होता है जिस
पर सुर्ख लाल रंग के फूल खिलते है, इस पेड़ का परागण एक गेको द्वारा किया जाता
है। यह दिलचस्प है कि ट्रोकेशिया के लाल फूलों का रंग गेको के शरीर के लाल धब्बों
से मेल खाता है और गुथरीया के फूलों के नीचे के हिस्से का नारंगी रंग छिपकली के
शरीर के नारंगी धब्बों से मेल खाता है। इससे लगता है पौधों के फूल परागणकर्ता के
अनुरूप हो गए थे।
ट्रोकेशिया और गुथरीया के बीच सिर्फ यही
समानता नहीं है, बल्कि दोनों पौधों के फूल कप के आकार के होते हैं जिनमें
पीले-नारंगी रंग का मकरंद होता है। देखा गया है कि ट्रोकेशिया के फूलों का रंगीन
मकरंद परागणकर्ता गेको को आकर्षित करता है,
इसलिए ऐसा लगता है कि
गुथरिया में भी मकरंद का यह रंग पत्थरों के नीचे भी फूलों को खोजने में परागणकर्ता
की मदद करता होगा।
बहरहाल, शोधकर्ता इस अनपेक्षित परागणकर्ता की खोज को लेकर काफी उत्साहित हैं।(स्रोत फीचर्स)
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कोविड-19 से ग्रस्त लगभग 80 प्रतिशत लोगों में गंध संवेदना के
ह्रास की बात सामने आई है। समस्या इतनी आम है कि एक सुझाव है कि इसे एक नैदानिक
परीक्षण के रूप में उपयोग किया जाए। इस महामारी की शुरुआत में सोचा गया था गंध
संवेदना की क्षति का मतलब है कि वायरस नाक के माध्यम से मस्तिष्क में पहुंचकर
गंभीर व दीर्घावधि क्षति पहुंचा सकता है। यह सोचा गया कि वायरस शायद गंध-संवेदी
तंत्रिकाओं के ज़रिए मस्तिष्क तक पहुंचता होगा। लेकिन हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के
न्यूरोसाइंटिस्ट संदीप रॉबर्ट दत्ता के हालिया अध्ययन से पता चला है कि गंध की
क्षति का कारण नाक की उपकला की क्षति से है। यह कोशिकाओं की एक ऐसी परत होती है जो
गंध को दर्ज करती है। दत्ता को लगता है कि वायरस सीधे-सीधे न्यूरॉन्स को नहीं
बल्कि सपोर्ट कोशिकाओं और स्टेम कोशिकाओं पर हमला करता
है।
गंध संवेदी (घ्राण) तंत्रिकाओं में ACE2 ग्राही नहीं होते हैं। ACE2 ग्राही ही वायरस का कोशिकाओं में प्रवेश
संभव बनाते हैं। लेकिन इन घ्राण तंत्रिकाओं से सम्बंधित सस्टेंटेक्यूलर कोशिकाओं
में ये ग्राही बहुतायत में पाए जाते हैं। ये कोशिकाएं श्लेष्मा में आयन का नाज़ुक
संतुलन बनाए रखती हैं। तंत्रिकाएं मस्तिष्क को संदेश भेजने के लिए इसी संतुलन पर
निर्भर करती हैं। यह संतुलन गड़बड़ा जाए तो तंत्रिका संदेश ठप हो जाते हैं और साथ ही
गंध संवेदना भी।
मामले को समझने के लिए पेरिस सैकले
युनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट निकोलस मुनियर ने कुछ चूहों को सार्स-कोव-2 से
संक्रमित किया। दो दिन बाद लगभग आधे चूहों की सस्टेंटेक्यूलर कोशिकाएं संक्रमित
थीं लेकिन दो हफ्तों बाद भी घ्राण तंत्रिकाएं संक्रमित नहीं हुई थीं। यह भी देखा
गया कि घ्राण उपकला पूरी तरह से अलग हो गई थी जैसे धूप से झुलसकर चमड़ी अलग हो जाती
है। हालांकि घ्राण तंत्रिकाएं संक्रमित नहीं हुई लेकिन उनके रोम पूरी तरह से खत्म
हो गए थे। इस तरह से घ्राण उपकला के विघटन से गंध संवेदना की क्षति की व्याख्या तो
की जा सकती है। लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि यह क्षति वायरस के कारण हुई है या इसके
लिए प्रतिरक्षा कोशिकाएं ज़िम्मेदार हैं। संक्रमण के बाद प्रतिरक्षा कोशिकाएं भी
सस्टेंटेक्यूलर कोशिकाओं में देखी गर्इं। एक बात साफ है कि सामान्यत: श्वसन
सम्बंधी संक्रमणों में घ्राण उपकला की सस्टेंटेक्यूलर कोशिकाओं में संक्रमण नहीं
देखा गया है, यह सार्स-कोव-2 का विशेष लक्षण है।
अब तक यह समझ में नहीं आया है कि यह वायरस
स्वाद संवेदना को कैसे ध्वस्त करता है। स्वाद संवेदना कोशिकाओं में तो ACE2 ग्राही नहीं होते लेकिन जीभ की अन्य सहायक कोशिकाओं में ये ग्राही उपस्थित
होते हैं जो शायद स्वाद संवेदना के कम होने का कारण बनते हैं। यह भी हो सकता है कि
गंध संवेदना जाने के कारण स्वाद प्रभावित हो रहा हो क्योंकि स्वाद की अनुभूति काफी
हद तक गंध पर निर्भर करती है।
रासायनिक संवेदना की कमी, जैसे
तीखी मिर्च या ताज़े पुदीने की संवेदना, का गायब होना भी अभी तक अस्पष्ट है। दरअसल, ये
संवेदनाएं स्वाद नहीं हैं। इनके संदेश दर्द-संवेदना तंत्रिकाओं द्वारा भेजे जाते
हैं। इनमें से कुछ में ACE2 ग्राही भी होते हैं।
गंध अनुभूति की क्षति अलग-अलग मरीज़ों में अलग-अलग अवधियों के लिए देखी गई है। कुछ में तो छ: माह बाद भी गंध महसूस करने की क्षमता लौटी नहीं है। कई शोधकर्ता इसका इलाज खोजने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन अब तक कोई सफलता नहीं मिली है। (स्रोत फीचर्स)
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ब्रिस्टल विश्वविद्यालय के ध्वनि जीव विज्ञानी मार्क होल्डरीड
और उनकी टीम ने हाल ही में पता लगाया है कि पतंगों के ध्वनि-शोषक पंख उन्हें
चमगादड़ों का शिकार बनने से बचाते हैं। पतंगों के पंख से जुड़ी शल्कों की परतें
चमगादड़ द्वारा भेजी गई पराध्वनि (यानी ऊंची आवृत्ति की ध्वनि) को सोख लेती हैं।
जिससे प्रतिध्वनि चमगादड़ों तक नहीं पहुंच पाती और पतंगे बच जाते हैं। गौरतलब है कि
चमगादड़ आवाज़ें फेंकते हैं और किसी वस्तु से टकराकर आई उनकी प्रतिध्वनि की मदद से
वस्तुओं की स्थिति का अनुमान लगाते हैं।
टीम को ये शल्की
लबादे पतंगों की दो प्रजातियां, चीनी टसर मोथ (एंथेरा पेर्नी) और
अफ्रीकी पतंगा डैक्टिलोसेरस ल्यूसिना,
में दिखे। कांटे
(फोर्क) जैसी संरचना वाले इन शल्कों की कई परतें पतंगों के पंखों की झिल्ली से
जुड़ी होती हैं। शिकारी चमगादड़ों द्वारा छोड़ी गई अल्ट्रासाउंड आवृत्तियां जब इन
शल्कों से टकराती हैं तो वे मुड़ जाते हैं और ध्वनि की ऊर्जा गतिज ऊर्जा में
परिवर्तित हो जाती है। इससे वापस चमगादड़ों तक पहुंचने वाली प्रतिध्वनि बहुत दुर्बल
होती है। अर्थात ये पतंगे चमगादड़ों के सोनार से ओझल या लगभग ओझल रहते हैं और शिकार
होने से बच जाते हैं। इन दो पतंगों के चयन का एक विशेष कारण यह भी था कि इनमें
चमगादड़ों द्वारा प्रेषित आवाज़ को सुनने के लिए कान नहीं होते। इन पतंगों में यह
क्षमता शायद इसलिए विकसित हुई होगी क्योंकि ये निकट आते शिकारी चमगादड़ की ध्वनि को
सुन नहीं सकते।
ये शल्क एक मिलीमीटर से भी छोटे होते हैं, और
इनकी मोटाई केवल चंद सौ माइक्रोमीटर होती है। प्रत्येक शल्क ध्वनि की एक विशेष
आवृत्ति पर अनुनाद करता है। लेकिन दसियों हज़ार शल्क मिलकर ध्वनि के कम से कम तीन
सप्तक को अवशोषित कर सकते हैं। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि प्रत्येक शल्क एक खास
आवृत्ति पर अनुनाद करके उसे सोख लेता है लेकिन इनकी जमावट कुछ ऐसी होती है कि सब
मिलकर एक महा-अवशोषक की तरह काम करते हैं।
पंख पर उभरे फोर्क जैसे शल्क
यह ध्वनि-शोषक लबादा 20 किलोहर्ट्ज़ से 160
किलोहर्ट्ज़ आवृत्ति के बीच काम करता है। और यह सबसे बढ़िया काम उन निम्नतर
आवृत्तियों पर करता है जो चमगादड़ अपने शिकार का पता करने के लिए उपयोग करते हैं।
लबादे ने 78 किलोहर्ट्ज़ पर सबसे अधिक ध्वनि,
लगभग 72 प्रतिशत का
अवशोषण किया।
पहले ये शोधकर्ता दर्शा चुके हैं कि कुछ पतंगों के पंखों पर उपस्थित रोम भी ध्वनि को सोखकर बचाव में मदद करते हैं। अब उन्होंने यह नई तकनीक खोज निकाली है। उम्मीद है कि ध्वनि अवशोषण की नई तकनीक से बेहतर ध्वनि अवशोषक उपकरण बनाने में मदद मिलेगी। घरों-दफ्तरों में ध्वनि-अवशोषक पैनल का स्थान ध्वनि-अवशोषक वॉलपेपर ले सकते हैं।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/3/35/Antheraea_pernyi_female_sjh.JPG https://d2cbg94ubxgsnp.cloudfront.net/Pictures/1024×536/7/9/0/509790_mothscales_959147.jpg