इस साल जून में यदि आपने अत्यधिक गर्मी का अहसास किया है तो आपका एहसास एकदम
सही है। वास्तव में जून 2019 पृथ्वी पर अब तक का सर्वाधिक गर्म जून रहा है। साथ ही
यह लगातार दूसरा महीना था जब अधिक तापमान के कारण अंटार्कटिक सागर में सबसे कम
बर्फ की चादर दर्ज की गई।
नेशनल ओशिएनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के नेशनल सेंटर फॉर एनवॉयरमेंटल
इंफरमेशन के अनुसार विगत जून में भूमि और सागर का औसत तापमान वैश्विक औसत तापमान
(15.5 डिग्री सेल्सियस) से 0.95 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। यह पिछले 140 वर्षों
में जून माह में दजऱ् किए गए तापमान में सर्वाधिक था। 10 में से 9 सबसे गर्म जून
माह तो साल 2010 के बाद रिकॉर्ड किए गए हैं।
उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों, मेक्सिको खाड़ी के देशों, युरोप,
ऑस्ट्रिया, हंगरी और जर्मनी में इस वर्ष का
जून सर्वाधिक गर्म जून रहा। वहीं स्विटज़रलैंड में दूसरा सर्वाधिक गर्म जून रहा।
यही हाल यूएस के अलास्का में भी रहा। यहां भी 1925 के बाद से अब तक का दूसरा सबसे
गर्म जून दर्ज किया गया।
जून में पूरी पृथ्वी का हाल ऐसा था जैसे इसने गर्म कंबल ओढ़ रखा हो। इतनी अधिक
गर्मी के कारण ध्रुवों पर बर्फ पिघलने
लगी। जून 2019 लगातार ऐसा बीसवां जून रहा जब आर्कटिक में औसत से भी कम बर्फ दर्ज
की गई है। और अंटार्कटिक में लगातार चौथा ऐसा जून रहा जब वहां औसत से भी कम बर्फ
आच्छादन रहा। अंटार्कटिक में पिछले 41 सालों में सबसे कम बर्फ देखा गया। यह 2002
में दर्ज सबसे कम बर्फ आच्छादन (1,60,580 वर्ग किलोमीटर) से भी कम था।
क्या इतना अधिक तापमान ग्लोबल वार्मिंग का नतीजा है? जी हां।
युनिवर्सिटी ऑफ पीट्सबर्ग के जोसेफ वर्न बताते हैं कि कई सालों में लंबी अवधि के
मौसम का औसत जलवायु कहलाती है। कोई एक गर्म या ठंडे साल का पूरी जलवायु पर बहुत कम
असर पड़ता है। लेकिन जब ठंडे या गर्म वर्ष का दोहराव बार-बार होने लगता है तो यह
जलवायु परिवर्तन है।
पूरी पृथ्वी पर अत्यधिक गर्म हवाएं (लू) अधिक चलने लगी हैं। पृथ्वी का तापमान भी लगातार बढ़ता जा रहा है, ऐसे में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को नज़रअंदाज करना मुश्किल है। नेचर क्लाईमेट चेंज पत्रिका के जून अंक के अनुसार यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम नहीं किया गया तो हर साल झुलसा देने वाली गर्मी बढ़ती जाएगी। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://s.yimg.com/uu/api/res/1.2/1U8x9FYvsbdZExBSN.gJ6g–~B/aD0xMDY3O3c9MTYwMDtzbT0xO2FwcGlkPXl0YWNoeW9u/https://o.aolcdn.com/images/dims?crop=1104,736,0,0&quality=85&format=jpg&resize=1600,1067&image_uri=https://s.yimg.com/os/creatr-uploaded-images/2019-07/ae970c60-a7d8-11e9-bdff-cf6a07805be6&client=a1acac3e1b3290917d92&signature=ec3459062006001b9237a4608daa6039b00b7f87
यह
आलेख डॉ. सी. सत्यमाला के ब्लॉग डेपो-प्रॉवेरा एंड एच.आई.वी. ट्रांसमिशन: दी
ज्यूरी इस स्टिल आउट का अनुवाद है। मूल आलेख को निम्नलिखित लिंक पर पढ़ा जा सकता
है: https://issblog.nl/2019/07/23/depo-provera-and-hiv-transmission-the-jurys-still-out-by-c-sathyamala/
एड्स वायरस (एच.आई.वी.) के प्रसार और डेपो-प्रॉवेरा नामक एक गर्भनिरोधक
इंजेक्शन के बीच सम्बंध की संभावना ने कई चिंताओं को जन्म दिया है। एक प्रमुख
चिंता यह है कि यदि इस गर्भनिरोधक इंजेक्शन के इस्तेमाल से एच.आई.वी. संक्रमण का
खतरा बढ़ता है तो क्या उन इलाकों में इसका उपयोग किया जाना चाहिए जहां एच.आई.वी.
का प्रकोप ज़्यादा है। जुलाई के अंत में विश्व स्वास्थ्य संगठन इस संदर्भ में
दिशानिर्देश विकसित करने के लिए एक समूह का गठन करने जा रहा है ताकि हाल ही में
सम्पन्न एक अध्ययन के परिणामों पर विचार करके डेपो-प्रॉवेरा की स्थिति की समीक्षा
की जा सके। अलबत्ता, जिस अध्ययन के आधार पर यह समीक्षा करने का प्रस्ताव है, उसके अपने नतीजे स्पष्ट नहीं हैं। इसलिए ज़रूरी होगा कि जल्दबाज़ी न करते हुए
विशेषज्ञों,
सम्बंधित देशों के स्वास्थ्य अधिकारियों और सामाजिक संगठनों
के प्रतिनिधियों को अपनी राय व्यक्त करने हेतु पर्याप्त समय दिया जाए।
जुलाई 29-31 को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) एक दिशानिर्देश विकास समूह का गठन
करने जा रहा है जो “एच.आई.वी. का उच्च जोखिम झेल रही” महिलाओं के लिए गर्भनिरोधक
विधियों के बारे में मौजूदा सिफारिशों की समीक्षा करेगा। इस समीक्षा में खास तौर
से एक रैंडमाइज़्ड क्लीनिकल ट्रायल के नतीजों पर ध्यान दिया जाएगा। एविडेंस फॉर
कॉन्ट्रासेप्टिव ऑप्शन्स एंड एच.आई.वी. आउटकम्स (गर्भनिरोधक के विकल्प और
एच.आई.वी. सम्बंधी परिणाम, ECHO) नामक इस अध्ययन के परिणाम
पिछले महीने लैन्सेट नामक पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं। ECHO ट्रायल चार अफ्रीकी
देशों (दक्षिण अफ्रीका, केन्या, स्वाज़ीलैंड और ज़ाम्बिया) में
किया गया था। इसका मकसद लंबे समय से चले आ रहे उस विवाद का पटाक्षेप करना था कि
डेपो-प्रॉवेरा इंजेक्शन लेने से महिलाओं में एच.आई.वी. प्रसार की संभावना बढ़ती
है। गौरतलब है कि डेपो-प्रॉवेरा एक गर्भनिरोधक इंजेक्शन है जो महिला को तीन महीने
में एक बार लेना होता है।
डेपो-प्रॉवेरा कोई नया गर्भनिरोधक नहीं है। 1960 के दशक में अमरीकी दवा कंपनी
अपजॉन ने गर्भनिरोधक के रूप में इसके उपयोग का लायसेंस प्राप्त करने के लिए आवेदन
किया था। तब से ही यह विवादों से घिरा रहा है। डेपो-प्रॉवेरा को खतरनाक माना जाता
है क्योंकि इसके कैंसरकारी, भ्रूण-विकृतिकारी और
उत्परिवर्तनकारी असर होते हैं।
अलबत्ता,
1992 में मंज़ूरी मिलने के बाद इस बात के प्रमाण मिलने लगे
थे कि इसका उपयोग करने वाली महिलाओं में एच.आई.वी. संक्रमण की आशंका बढ़ जाती है।
2012 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी जारी की थी कि इसका उपयोग करने वाली
महिलाओं को “स्पष्ट सलाह दी जानी चाहिए कि वे हमेशा कंडोम का उपयोग भी करें।”
अवलोकन आधारित अध्ययनों के परिणामों में अनिश्चितताओं को देखते हुए एक रैंडमाइज़्ड
ट्रायल डिज़ाइन करने हेतु 2012 में ECHO संघ का गठन किया गया। रैंडमाइज़ का मतलब
होता है सहभागियों को दिए जाने उपचार का चयन पूरी तरह बेतरतीबी से किया जाता है।
चूंकि इस ट्रायल में तीन अलग-अलग गर्भनिरोधकों का उपयोग किया जाना था, इसलिए रैंडमाइज़ का अर्थ होगा कि बेतरतीब तरीके से प्रत्येक महिला के लिए
इनमें से कोई तरीका निर्धारित कर दिया जाएगा।
शुरू से ही इस ट्रायल लेकर कई आशंकाएं भी ज़ाहिर की गर्इं। जैसे यह कहा गया कि
रैंडमाइज़ेशन समस्यामूलक है क्योंकि इसके ज़रिए कुछ सहभागियों को एक ऐसे
गर्भनिरोधक का इस्तेमाल करवाया जाएगा जो एच.आई.वी. संक्रमण की संभावना को बढ़ा
सकता है। ऐसी सारी शंकाओं के बावजूद कक्क्तग्र् संघ ने 2015 में ट्रायल का काम
किया। अपेक्षाओं के विपरीत, पर्याप्त संख्या में महिलाएं इस
अध्ययन में शामिल हो गर्इं और उन्होंने स्वीकार कर लिया कि उन्हें बेतरतीबी से तीन
में से किसी एक गर्भनिरोधक इस्तेमाल करने वाले समूह में रख दिया जाएगा। ये तीन
गर्भनिरोधक थे: डेपो-प्रॉवेरा, लेवोनोजेस्ट्रल युक्त त्वचा के
नीचे लगाया जाने वाला एक इम्प्लांट और कॉपर-टी जैसा कोई गर्भाशय में रखा जाने वाला
गर्भनिरोधक साधन। पूरा अध्ययन डेपो-प्रॉवेरा के बारे में तो निष्कर्ष निकालने के
लिए था। शेष दो गर्भनिरोधक इसलिए रखे गए थे ताकि एच.आई.वी. प्रसार के साथ
डेपो-प्रॉवेरा के सम्बंधों की तुलना की जा सके। कई लोगों ने कहा है कि इतनी संख्या
में महिलाओं को अध्ययन में भर्ती कर पाना और उन्हें बेतरतीबी से विभिन्न
गर्भनिरोधक समूहों में बांट पाना इसलिए संभव हुआ है क्योंकि उन पर दबाव डाला गया
था और ट्रायल के वास्तविक मकसद को छिपाया गया था। इस दृष्टि से ECHO ट्रायल ने विश्व
चिकित्सा संघ के हेलसिंकी घोषणा पत्र के एक प्रमुख बिंदु का उल्लंघन किया है।
हेलसिंकी घोषणा पत्र में स्पष्ट कहा गया है कि “यह सही है कि चिकित्सा अनुसंधान का
मुख्य उद्देश्य नए ज्ञान का सृजन करना है किंतु यह लक्ष्य कभी भी अध्ययन के
सहभागियों के अधिकारों व हितों के ऊपर नहीं हो सकता।” स्पष्ट है कि संघ ने महिलाओं
को पूरी जानकारी न देकर अपने मकसद को उनके अधिकारों व हितों से ऊपर रखा।
एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस अध्ययन में सैम्पल साइज़ (यानी उसमें कितनी
महिलाओं को शामिल किया जाए) का निर्धारण यह जानने के हिसाब से किया गया था कि क्या
डेपो-प्रॉवेरा के उपयोग से एच.आई.वी. के प्रसार के जोखिम में 30 प्रतिशत से
ज़्यादा की वृद्धि होती है। जोखिम में इससे कम वृद्धि को पहचानने की क्षमता इस
अध्ययन में नहीं रखी गई थी। इसका मतलब है कि यदि त्वचा के नीचे लगाए जाने वाले
इम्प्लांट के मुकाबले डेपो-प्रॉवेरा के इस्तेमाल से एच.आई.वी. प्रसार की दर 23-29
प्रतिशत तक अधिक होती है, तो उसे यह कहकर नज़रअंदाज़ कर
दिया जाएगा कि वह सांख्यिकीय दृष्टि से उल्लेखनीय नहीं है। जो महिला डेपो-प्रॉवेरा
का इस्तेमाल करती है या ट्रायल के दौरान जिसे डेपो-प्रॉवेरा समूह में रखा जाएगा, उसकी दृष्टि से यह सीमा-रेखा बेमानी है। यह सीमा-रेखा सार्वजनिक स्वास्थ्य
सम्बंधी निर्णयों की दृष्टि से भी निरर्थक है।
विभिन्न परिदृश्यों को समझने के लिए मॉडल विकसित करने के एक प्रयास में देखा
गया है कि यदि डेपो-प्रॉवेरा के इस्तेमाल से एच.आई.वी. का प्रसार बढ़कर 1.2 गुना
भी हो जाए,
तो इसकी वजह से प्रति वर्ष एच.आई.वी. संक्रमण के 27,000 नए
मामले सामने आएंगे। इसकी तुलना प्राय: गर्भ निरोधक के रूप में डेपो-प्रॉवेरा के
इस्तेमाल से मातृत्व सम्बंधी कारणों से होने वाली मौतों में संभावित कमी से की
जाती है। डेपो-प्रॉवेरा के इस्तेमाल से मातृत्व सम्बंधी मृत्यु दर में जितनी कमी
आने की संभावना है, उससे कहीं ज़्यादा महिलाएं तो इस गर्भनिरोधक का उपयोग करने
की वजह से एच.आई.वी. से संक्रमित हो जाएंगी। ऐसा नहीं है कि कक्क्तग्र् टीम इस बात
से अनभिज्ञ थी। उन्होंने माना है कि उनकी ट्रायल में 30 प्रतिशत से कम जोखिम पता
करने की शक्ति नहीं है।
पूरे अध्ययन का एक और पहलू अत्यधिक चिंताजनक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का
कहना है कि डेपो-प्रॉवेरा के उपयोग से एच.आई.वी. संक्रमण का खतरा बढ़ने के कुछ
प्रमाण हैं। संगठन का मत है कि जिन महिलाओं को एच.आई.वी. संक्रमण का खतरा अधिक है
वे इसका उपयोग कर सकती हैं क्योंकि गर्भनिरोध के रूप में जो फायदे इससे मिलेंगे वे
एच.आई.वी. के बढ़े हुए जोखिम से कहीं अधिक हैं। साफ है कि इस ट्रायल में शामिल
एक-तिहाई महिलाओं को जानते-बूझते इस बढ़े हुए जोखिम को झेलना होगा। दवा सम्बंधी
अधिकांश ट्रायल में जो लोग भाग लेते हैं उन्हें कोई बीमारी होती है जिसके लिए
विकसित दवा का परीक्षण किया जा रहा होता है। मगर गर्भनिरोध का मामला बिलकुल भिन्न
है। गर्भनिरोधकों का परीक्षण स्वस्थ महिलाओं पर किया जाता है। बीमार व्यक्ति को एक
आशा होती है कि बीमारी का इलाज इस परीक्षण से मिल सकेगा लेकिन इन महिलाओं को तो
मात्र जोखिम ही झेलना है।
इसी संदर्भ में ECHO ट्रायल की एक और खासियत है। इस अध्ययन का एक जानलेवा
अंजाम ही यह है कि शायद वह महिला एच.आई.वी. से संक्रमित हो जाएगी। यही जांचने के
लिए तो अध्ययन हो रहा है कि क्या डेपो-प्रॉवेरा के उपयोग से एच.आई.वी. संक्रमित
होने की संभावना बढ़ती है। यह शायद क्लीनिकल ट्रायल के इतिहास में पहली बार है कि
कुछ स्वस्थ महिलाओं को जान-बूझकर एक गर्भनिरोधक दिया जा रहा है जिसका मकसद यह
जानना नहीं है कि वह गर्भनिरोधक गर्भावस्था को रोकने/टालने में कितना कारगर है
बल्कि यह जानना है कि उसका उपयोग खतरनाक या जानलेवा है या नहीं। यानी ट्रायल के
दौरान कुछ स्वस्थ शरीरों को बीमार शरीरों में बदल दिया जाएगा।
इस सबके बावजूद मीडिया में भ्रामक जानकारी का एक अभियान छेड़ दिया गया है। इस अभियान को स्वयं विश्व स्वास्थ्य संगठन के इस वक्तव्य से हवा मिली है कि ट्रायल में इस्तेमाल की गई गर्भनिरोधक विधियों और एच.आई.वी. प्रसार का कोई सम्बंध नहीं देखा गया है। इससे तो लगता है कि डेपो-प्रॉवेरा को उच्च जोखिम वाली आबादी में उपयोग के लिए सुरक्षित घोषित करने का निर्णय पहले ही लिया जा चुका है। हकीकत यह है कि ECHO ट्रायल ने मुद्दे का पटाक्षेप करने की बजाय नई अनिश्चितताएं उत्पन्न कर दी हैं। लिहाज़ा, यह ज़रूरी है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन का दिशानिर्देश विकास समूह जल्दबाज़ी में कोई निर्णय न करे। बेहतर यह होगा कि विशेषज्ञों, सम्बंधित देशों के स्वास्थ्य अधिकारियों और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों को समय दिया जाए कि वे कक्क्तग्र् और इसके नीतिगत निहितार्थों को उजागर कर सकें। तभी एक ऐसे मुद्दे पर जानकारी-आधारित निर्णय हो सकेगा जो करोड़ों महिलाओं को प्रभावित करने वाला है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.bmj.com/sites/default/files/sites/defautl/files/attachments/bmj-article/2019/07/depo-provera-injection.jpg
अपोलो 11 यान के चांद पर उतरने की आधी शताब्दी के बाद भी कई
लोग इस घटना को झूठा मानते हैं। आम तौर पर कहा जाता रहा है कि फिल्म निर्देशक
स्टेनली कुब्रिक ने चांद पर उतरने के छह ऐतिहासिक झूठे फुटेज तैयार करने में नासा
की मदद की।
लेकिन क्या वास्तव में उस समय की उपलब्ध
तकनीक से ऐसा कर पाना संभव था? एमए-फिल्म और टेलीविज़न प्रोडक्शन के
प्रमुख हॉवर्ड बैरी का कहना है कि एक फिल्म निर्माता के रूप में वह यह तो नहीं बता
सकते कि नासा का यान 1969 में चांद पर कैसे पहुंचा था लेकिन दावे के साथ कह सकते
हैं कि इन ऐतिहासिक फुटेज का झूठा होना असंभव है। उन्होंने इस सम्बंध में कुछ आम
मान्यताओं और सवालों का जवाब दिया है।
आम तौर इस घटना को एक स्टूडियो में फिल्माए
जाने की बातें कही गई हैं। गौरतलब है कि चलती छवियों को कैमरे में कैद करने के दो
तरीके होते हैं। एक तो फोटोग्राफिक सामग्री का उपयोग करके और दूसरा चुम्बकीय टेप
का उपयोग करके इलेक्ट्रॉनिक तरीके से। एक मानक मोशन पिक्चर फिल्म 24 फ्रेम प्रति
सेकंड से छवियों को रिकॉर्ड करती है, जबकि प्रसारण टेलीविज़न आम तौर पर 25 से 30
फ्रेम प्रति सेकंड का होता है। यदि हम यह मान भी लें कि चंद्रमा पर उतरना टीवी
स्टूडियो में फिल्माया गया था तो वीडियो उस समय के मानक 30 फ्रेम प्रति सेकंड का
होना चाहिए था। हम जानते हैं कि चंद्रमा पर प्रथम अवतरण को स्लो स्कैन टेलीविज़न
(एसएसटीवी) के विशेष कैमरे से 10 फ्रेम प्रति सेकंड पर रिकॉर्ड किया गया था।
एक बात यह भी कही जाती है कि वीडियो फुटेज
को किसी स्टूडियो में विशेष अपोलो कैमरा पर रिकॉर्ड करके स्लो मोशन में प्रस्तुत
किया गया ताकि यह भ्रम पैदा किया जा सके कि पूरी घटना कम गुरुत्वाकर्षण के परिवेश
में फिल्माई गई है। गौरतलब है कि फिल्म को धीमा करने के लिए ऐसे कैमरे की ज़रूरत
होती है जो प्रति सेकंड सामान्य से अधिक फ्रेम रिकॉर्ड करने में सक्षम हो। इसे
ओवरक्रैंकिंग कहा जाता है। जब ऐसी फिल्म को सामान्य फ्रेम दर पर चलाया जाता है तो
यह लंबे समय तक चलती है। यदि आप अपने कैमरे को ओवरक्रैंक नहीं कर सकते हैं तो
सामान्य फ्रेम दर पर रिकॉर्ड करके कृत्रिम रूप से फुटेज को धीमा कर सकते हैं।
लेकिन उसके लिए आपको अतिरिक्त फ्रेम उत्पन्न करने की तकनीक की आवश्यकता होगी
अन्यथा बीच-बीच में खाली जगह छूटेगी।
अपोलो अवतरण के ज़माने में स्लो मोशन को
रिकॉर्ड करने में सक्षम चुंबकीय रिकॉर्डर कुल 30 सेकंड का ही फुटेज रिकॉर्ड कर
सकते थे। इसे 90 सेकंड के स्लो मोशन वीडियो के रूप में चलाया जा सकता था। लेकिन
यदि आपको 143 मिनट का स्लो मोशन फुटेज चाहिए तो वास्तविक घटना का 47 मिनट का
रिकॉर्डिंग करना होता। यह उस समय असंभव था।
यह भी शंका व्यक्त की गई है कि नासा के पास
उन्नत स्टोरेज रिकॉर्डर था। लोग मानते हैं कि नासा के पास अत्यधिक उन्नत
टेक्नॉलॉजी सबसे पहले आ जाती है। बैरी कहते हैं कि हो सकता है कि नासा के पास उस
समय कोई गुप्त एडवांस स्टोरेज रिकॉर्डर रहा हो लेकिन वह सार्वजनिक रूप से उपलब्ध
रिकॉर्डर से 3000 गुना अधिक उन्नत रहा होगा,
जो संभव नहीं
है।
कुछ लोग यह भी कहते हैं कि नासा ने पहले
साधारण फोटोग्राफिक फिल्म पर रिकॉर्डिंग किया और फिर उसे धीमा करके चलाया और टीवी
पर प्रदर्शन के लिए परिवर्तित कर लिया। फिल्म तो जितनी चाहे उपलब्ध हो सकती थी!
थोड़ी गणना करते हैं। 24 फ्रेम प्रति सेकंड
पर चलने वाली 35 मि.मी. फिल्म की एक रील 11 मिनट तक चलती है और उसकी लम्बाई लगभग
1,000 फुट होती है। अगर हम इसे 12 फ्रेम प्रति सेकंड की फिल्म पर लागू करें तो
अपोलो-11 के 143 मिनट के फुटेज के लिए कुल साढ़े छह रीलों की आवश्यकता होगी।
फिर शूटिंग के बाद इन्हें एक साथ जोड़ना
पड़ता। जोड़ने के निशान, नेगेटिव्स के स्थानांतरण और प्रिंट निकालने के अलावा संभावित धूल, कचरा या खरोंचों के निशान सारा सच बयान कर
देते। लेकिन अपोलो-11 अवतरण की फिल्म में ऐसा कुछ नज़र नहीं आता। मतलब साफ है कि
इसे फोटोग्राफिक फिल्म पर शूट नहीं किया गया था।
यह भी कहा गया है कि चांद पर तो हवा है
नहीं, फिर अमेरिका का झंडा हवा से फहरा क्यों रहा है? ज़रूर
यह स्टूडियो में लगे पंखे का कमाल है। सच्चाई यह है कि एक बार लगाए जाने के बाद
पूरे फुटेज में कहीं भी झंडा हिलता हुआ नज़र नहीं आ रहा है, फहराने
की तो बात ही जाने दें।
कुछ लोगों को लगता है कि फुटेज में स्पष्ट
रूप से स्पॉटलाइट का प्रकाश नज़र आ रहा है। इस पर बैरी कटाक्ष करते हुए कहते हैं
कि सही है। वह प्रकाश 15 करोड़ किलोमीटर दूर स्थित एक स्पॉटलाइट से आ रहा है, जिसे
हम सूरज कहते हैं। उनका कहना है कि यदि स्पॉटलाइट नज़दीक होता तो छाया एक
केन्द्रीय बिंदु से उत्पन्न होती, लेकिन रुाोत इतनी दूर है कि परछाइयां
अधिकांशत: समानांतर हैं।
अंत में बैरी का कहना है कि जो लोग मानते हैं कि इसे स्टेनली कुब्रिक ने फिल्माया था तो उन्हें यह बता दें कुब्रिक इतने परफेक्शनिस्ट (सटीकतावादी) थे कि वे इस फिल्म को लोकेशन यानी चांद पर ही शूट करने पर ज़ोर देते। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.abc.net.au/news/image/4166712-3×2-700×467.jpg
अभी कुछ समय पहले, 2014 में गुरुत्वाकर्षण तरंगों का पता
लगाया गया और इस वर्ष ब्लैक होल की पहली तस्वीर ली गई। दोनों ही खोजें आइंस्टाइन
के सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत की भविष्यवाणी के प्रभावशाली प्रमाण हैं। ये
दोनों घटनाएं वर्ष 2015 के दोनों ओर घटी हैं जो आइंस्टाइन के युगांतरकारी शोध पत्र
के प्रकाशन का शताब्दी वर्ष था। सौ वर्षों के इस अंतराल में काफी बहसें और चर्चाएं
तो होती रही हैं साथ ही साथ प्रकृति को लेकर इस महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि ने हमें
अचंभित भी किया है।
इस सिद्धांत का पहला भाग, विशिष्ट
सिद्धांत, 1905 में प्रकाशित हुआ था। इसमें उच्च वेगों पर वस्तुओं के
व्यवहार तथा द्रव्यमान और ऊर्जा की आपसी तुल्यता की बात की गई थी।
दूसरा भाग,
सामान्य सापेक्षता, गुरुत्वाकर्षण
पर विचार करता है और ऐसे प्रभावों के बारे में चर्चा करता है जो ब्राहृांड के स्तर
पर नज़र आते हैं। ये वो चीज़ें हैं जिनको हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में नहीं देखते
हैं। लेकिन सामान्य सापेक्षता को असाधारण सटीकता के साथ सत्यापित किया गया है और
यह प्रकृति का एक निर्विवाद हिस्सा है। प्रकृति के नियमों को समझने का काम इसी के
मार्गदर्शन में करना होगा।
इन आविष्कारों के महत्व और विशिष्ट प्रकृति, दोनों
को देखते हुए आइंस्टाइन ने स्वयं उन पाठकों,
जो पेशेवर वैज्ञानिक
नहीं थे, के लिए एक स्पष्ट और सरल,
लेकिन सैद्धांतिक रूप
से गहन विवरण प्रस्तुत करने का काम हाथ में लिया। परिणामस्वरूप 1917 के वसंत में
उन्होंने जर्मन भाषा में एक पुस्तिका का प्रकाशन किया था: ‘रिलेटिविटी: दी स्पेशल
एंड दी जनरल थ्योरी (ए पॉपुलर अकाउंट)’। इसकी शताब्दी के अवसर पर प्रिंसटन
युनिवर्सिटी ने हिब्रू विश्वविद्यालय, यरुशलम के साथ मिलकर 1960 में किए गए इसके
अंग्रेज़ी अनुवाद को फिर से प्रकाशित किया है। इसमें बाद में जोड़े गए परिशिष्ट भी
शामिल किए गए हैं और साथ ही एक रीडिंग कम्पेनियन,
टिप्पणियां और अन्य
अनुवादों पर नोट्स तथा अन्य स्मृतियां भी शामिल की गई हैं।
मूल पुस्तक तो केवल 132 पृष्ठों की है
जिसमें 32 अध्याय हैं। बहुत सारे अध्याय हैं,
नहीं? जी
हां, आइंस्टाइन ने सापेक्षता की अपनी पहली पुस्तक को छोटे-छोटे
हिस्सों में विभाजित किया था। एक अध्याय तो केवल एक पृष्ठ लंबा है। सहजता और
स्पष्टता तथा गणित के कम से कम उपयोग के साथ,
उन्होंने इस सिद्धांत
के मूल विचार को विकसित करने के लिए सिर्फ आवश्यक चीज़ों को ही प्रस्तुत किया है।
जैसा कि वे प्रस्तावना में कहते हैं, “यह पुस्तिका उन पाठकों के लिए है जो एक
सामान्य वैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से सिद्धांत में रुचि तो रखते हैं, लेकिन
सैद्धांतिक भौतिकी के गणितीय औज़ारों से परिचित नहीं हैं।”
आइंस्टाइन पहले पारंपरिक विचार का परिचय
देते हैं। उसके अनुसार यदि अवलोकन के दो प्रेक्षण मंच एक-दूसरे के सापेक्ष एकरूप
गति से चल रहे हैं, तब दोनों मंचों की सापेक्ष गतियों को जोड़कर-घटाकर एक-दूसरे
में परिवर्तित किया जा सकता है। कोई भी प्रेक्षक यह नहीं बता सकता है कि वह एक ऐसे
मंच पर है जो ‘स्थिर’ है या एकरूप गति से चलायमान है क्योंकि भौतिकी के नियम एकरूप
सापेक्ष गति में प्रेक्षकों के किसी भी जोड़े के लिए एक जैसे होते हैं। इस
अभिन्नता को आइंस्टाइन ने सापेक्षता का नियम कहा।
सिर्फ प्रकाश की गति एक अपवाद है। प्रकाश
के मामले में होता यह है कि प्रकाश का स्रोत या प्रेक्षण करने वाला उपकरण किसी भी
वेग से चले, प्रकाश का वेग हमेशा 3,00,000 कि.मी. प्रति सेकंड (निर्वात
में) होता है। यह सापेक्षता के उपरोक्त नियम के विरुद्ध है। चूंकि प्रकाश के वेग
के स्थिर होने की बात को एच.ए. लॉरेंट्ज़ ने विद्युत चुंबकत्व के सिद्धांतों के
आधार पर प्रतिपादित किया था, इसलिए लगता था कि इस मामले में सापेक्षता
के नियम को तिलांजलि दे दी जाए, हालांकि इस नियम के विरुद्ध कोई सबूत नहीं
था।
यहीं पर सापेक्षता के विशेष सिद्धांत का
प्रवेश होता है। विशेष सिद्धांत में लॉरेंट्ज़ के काम का उपयोग करते हुए स्थान और
समय की प्रकृति की पुन: व्याख्या की गई है। यह पुन:व्याख्या उक्त विरोधाभास का
समाधान कर देती है – इसके अनुसार एक-दूसरे के सापेक्ष गति कर रहे दोनों मंचों के
लिए प्रकाश का वेग तो समान रहता है, लेकिन गतिशील ताने-बाने के संदर्भ में मापन
किया जाए तो लंबाई और समय के अंतराल ही सिकुड़ या फैल जाते हैं।
इस पुनव्र्याख्या का एक और निष्कर्ष यह है
कि किसी कण की गति की ऊर्जा न केवल उसके स्थिर द्रव्यमान और चाल पर निर्भर करती है, बल्कि
द्रव्यमान और एक ऐसे कारक पर भी निर्भर करती है,
जिसका मान चाल के साथ
बढ़ता है। यह कारक चाल के वर्ग को प्रकाश के वेग के वर्ग से विभाजित करने पर
प्राप्त होता है। इसलिए द्रव्यमान में यह वृद्धि नगण्य रहती है, सिवाय
उस स्थिति के जब वस्तु का वेग बहुत अधिक हो। हालांकि ऊर्जा के इस समीकरण से हमें
किसी स्थिर कण की आंतरिक ऊर्जा का मान मिलता है जो E = mc2 के रूप में मशहूर
है।
सामान्य सिद्धांत
उपरोक्त विचार एकरूप सापेक्ष गति पर चलने
वाले प्लेटफार्मों के बारे में हैं। इसके बाद आइंस्टाइन एक ऐसे मामले पर विचार
करते हैं जहां एक प्लेटफार्म को त्वरण प्रदान किया जाता है यानी उसकी चाल बदलती
जाती है। इस स्थिति में दो मंचों की परस्पर सापेक्ष गति लगातार बदलती रहती है।
त्वरणशील प्लेटफॉर्म पर प्रेक्षक त्वरण की विपरीत दिशा में एक बल का अनुभव करेगा, और
उसे सभी स्वतंत्र वस्तुएं इसी विपरीत दिशा में गिरती हुई प्रतीत होंगी। और इस
प्रेक्षक के पास गुरुत्वाकर्षण बल और त्वरण के कारण लग रहे बल के बीच अंतर जानने
का कोई तरीका नहीं होगा। आइंस्टाइन का मत है कि वास्तव में इनके बीच कोई अंतर है
भी नहीं। इस आधार पर उन्होंने सापेक्षता के नियम को सामान्य रूप से गुरुत्वाकर्षण
क्षेत्र में स्थित मंच अथवा त्वरणशील मंच दोनों पर लागू करने का सुझाव दिया था।
यहां स्थिति यह हो जाती है कि प्रकाश किरण
का मार्ग, जो एक प्लेटफॉर्म पर सरल रेखा में दिखाई देता है, वह
त्वरणशील गति या गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में स्थित मंच से एक वक्र के रूप में दिखाई
देगा। तो इसका मतलब यह होगा कि सापेक्षता का नियम सामान्य रूप से लागू नहीं होता
है? आइंस्टाइन इस सवाल से निपटने के लिए कुछ परिमापों के रूप
में घटनाओं के निर्धारण का एक नया तरीका विकसित करते हैं – जैसे किसी स्थिर बिंदु
से दूरी व दिशा, और समय के माप।
किसी समतल सतह पर किसी बिंदु की स्थिति
बताने का सामान्य तरीका दो लंबवत रेखाओं से उसकी दूरी बताने का है (यह ग्राफ का
तरीका है)। इस तरह दर्शाने के बाद दो बिंदुओं के बीच की दूरी निकाली जा सकती है।
किंतु यदि जिस सतह पर रेखाएं खींची जाएं वह समतल न होते हुए गोलाई लिए हो (जैसे
पृथ्वी) तो बिंदुओं के बीच की दूरी समतल सतह के समान नहीं होगी। गणित का उपयोग किए
बगैर, इस तरह के तर्क का उपयोग करते हुए,
आइंस्टाइन ने एक
गोलाईदार स्थान का विचार विकसित किया जो एक गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र की उपस्थिति से
मेल खाता है। इसकी मदद से उन्होंने साबित किया कि गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में
प्रकाश की वक्र मार्ग पर चलती किरण अभी भी उसी चाल से चल रही है!
इस विचार ने ब्राहृांड की एक नई प्रणाली का
मार्ग प्रशस्त किया। यह प्रणाली ब्राहृांड पर लागू होती है, जहां
विशाल द्रव्यमान के पिंड और गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र हैं। यह प्रणाली न्यूटन की उस
प्रणाली से अलग है जो 17वीं शताब्दी से सौर मंडल का वर्णन करने में काफी
प्रभावशाली साबित हुई थी। द्रव्यमान ‘कम’,
यानी तुलनात्मक रूप
से कम हो, तो आइंस्टाइन की प्रणाली न्यूटन प्रणाली का ही रूप ले लेती
है।
इसलिए न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत
में एक सन्निकटन था। यह उस स्थिति में काफी अच्छे परिणाम देती थी जब मापन पर्याप्त
रूप से सटीक नहीं थे। न्यूटन द्वारा प्रतिपादित व्युत्क्रम वर्ग का नियम (जो कहता
है कि दो पिंडों के बीच लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल उनके बीच की दूरी के वर्ग के
व्युत्क्रमानुपाती होता है) भी एक सन्निकटन ही है। आइंस्टाइन के सामान्य सापेक्षता
सिद्धांत के आने के बाद तथ्यों की व्याख्या के लिए इस नियम को अलग से कहने की
ज़रूरत नहीं रह जाती क्योंकि कम द्रव्यमान पर वह आइंस्टाइन के सामान्य सापेक्षता
सिद्धांत का एक सीमित रूप ही है।
आइंस्टाइन पारंपरिक ब्राहृांड विज्ञान में अन्य विसंगतियों का जि़क्र भी करते हैं, जिन्हें सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत ने सुलझाया है। बुध की कक्षा के अग्रगमन (या पुरस्सरण, प्रेसेशन) की अवधि की गणना करना इस सिद्धांत की एक प्रमुख सफलता रही। न्यूटोनियन यांत्रिकी के तहत, ग्रहों की कक्षाएं दीर्घवृत्ताकार हैं और ये दीर्घवृत्त परिवर्तनशील नहीं हैं। और बुध (सूर्य का सबसे करीब ग्रह) के अलावा शेष सभी ग्रहों के लिए यह बात सही पाई गई थी। बुध के मामले में दीर्घवृत्ताकार कक्षा स्वयं भी घूमती है। यह गति काफी धीमी है, हर सदी में केवल 43 सेकंड (ध्यान दें कि 1 सेकंड डिग्री का 3600वां भाग होता है)। न्यूटोनियन यांत्रिकी इसको समझाने में असमर्थ थी। लेकिन सामान्य सापेक्षता सिद्धांत की मदद से, आइंस्टाइन ने यह दर्शा दिया कि सभी ग्रहों की कक्षाएं घूमती हैं, और बुध के मामले में उन्होंने एक सदी में 43 सेकंड के अग्रगमन की गणना भी की! (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://images-eu.ssl-images-amazon.com/images/I/41FGpIFB1BL.jpg
व्यक्तिगत, सामाजिक,
आर्थिक और राष्ट्रीय
विकास के लिए ईमानदारी अनिवार्य है। लेकिन आजकल हम देखते हैं कि कैसे लोग, कंपनियां
और सरकार अपने मतलब और फायदे के लिए धोखाधड़ी कर रहे हैं। क्या दुनिया के सभी 205
देशों में ऐसा ही होता है? क्या लोग व्यक्तिगत लेन-देन में ईमानदारी
को तवज़्जो देते हैं? यही सवाल ए. कोह्न और उनके साथियों के शोध पत्र का विषय था
(कोह्न और उनके साथी जानकारी संग्रहण और विश्लेषण,
अर्थशास्त्र और
प्रबंधन विषयों के विशेषज्ञ हैं)। उनका शोध पत्र “civic honesty around the globe” साइंस पत्रिका के जून अंक में
प्रकाशित हुआ है। यह अध्ययन उन्होंने 40 देशों के 355 शहरों में लगभग 17,000 लोगों
के साथ किया, जिसमें उन्होंने लोगों में ईमानदारी और खुदगर्ज़ी के बीच
संतुलन को जांचा। इस अध्ययन के नतीजे काफी दिलचस्प रहे। अध्ययन में उन्होंने पाया
कि लोग व्यक्तिगत स्तर पर वास्तव में उससे ज़्यादा ईमानदार होते हैं जितना वे खुद
अपने बारे में सोचते हैं।
यह प्रयोग उन्होंने कैसे किया। शोधकर्ताओं
ने कुछ वालन्टियर चुने जो किसी बैंक, पुलिस स्टेशन या होटल के पास एक बटुआ गिरा
देते थे। हर बटुए के एक तरफ एक पारदर्शी कवर लगा था,
जिसके अंदर एक कार्ड
रखा होता था। इस कार्ड पर बटुए के मालिक का नाम और उससे संपर्क सम्बंधी जानकारी
होती थी। कार्ड के साथ घर के लिए खरीदने के कुछ सामान (जैसे दूध, ब्रोड, दवाई
वगैरह) की एक सूची भी होती थी। इस जानकारी के साथ बटुओं के अलग-अलग सेट बनाए गए।
जैसे, कुछ बटुए बिना रुपयों के थे,
कुछ बटुओं में
थोड़े-से रुपए (14 डॉलर या उस देश के उतने ही मूल्य की नगदी) और कुछ में अधिक (95
डॉलर या समान मूल्य की नगदी) रखे गए। अर्थात बटुओं के 5 अलग-अलग सेट थे। पहले सेट
में नगदी नहीं थी, दूसरे सेट में मामूली रकम थी,
तीसरे सेट में अधिक
रकम थी, चौथे सेट में नगदी नहीं लेकिन एक चाबी रखी गई थी, और
पांचवे सेट में नगदी के साथ एक चाबी रखी थी।
वालन्टियर्स ने इन बटुओं को किसी सार्वजनिक
स्थल (जैसे पुलिस स्टेशन, होटल या बैंक के पास) पर गिराया और इस बात
पर नज़र रखी कि जब बटुआ किसी व्यक्ति को मिलता है तो वह उसके साथ क्या करता है।
क्या वह नज़दीकी सहायता काउंटर पर जाकर सम्बंधित व्यक्ति तक बटुआ वापस पहुंचाने को
कहता है? अध्ययन के नतीजे क्या रहे?
अध्ययन में उन्होंने पाया कि उन बटुओं को
लोगों ने अधिक लौटाया जिनमें पैसे थे, बजाए बिना पैसों वाले बटुओं के। सभी 40
देशों में उन्हें इसी तरह के नतीजे मिले।
और यदि बटुओं में बहुत अधिक रुपए रहे हों, तो? क्या
वे बटुआ लौटाने के पहले उसमें से थोड़े या सारे रुपए निकाल लेते? क्या
उन्होंने सिर्फ सज़ा के डर से बटुए लौटाए?
या इनाम मिलने की
उम्मीद में लोगों ने पूरे रुपयों सहित बटुआ लौटाया?
या ऐसा सिर्फ परोपकार
की मंशा से किया गया था? यह वाला प्रयोग उन्होंने तीन देशों (यूके, यूएस
और पोलैंड) में किया, जिसके नतीजे काफी उल्लेखनीय रहे। 98 प्रतिशत से अधिक लोगों
ने अधिक रुपयों से भरा बटुआ भी लौटाया। (यह अध्ययन उन देशों में करना काफी दिलचस्प
होगा जो आर्थिक रूप से सम्पन्न नहीं हैं।)
अपने अगले प्रयोग में उन्होंने बटुओं के
तीन सेट बनाए। पहले सेट में बटुए में सिर्फ थोड़े रुपए रखे, दूसरे
सेट में बटुए में थोड़ी-सी रकम और एक चाबी रखी,
और तीसरे सेट में
बटुए में काफी सारे रुपए और चाबी दोनों रखे। इस अध्ययन में देखा गया कि बिना चाबी
वाले बटुओं की तुलना में चाबी वाले बटुओं को अधिक लोगों ने लौटाया। इन नतीजों को
देखकर लगता है कि लोग बटुए के मालिक को परेशानी में नहीं देखना चाहते। इसी तरह के
नतीजे सभी देशों में देखने को मिले।
भारतीय शहर
इस अध्ययन में हमारे लिए दिलचस्प बात यह है
कि शोधकर्ताओं ने भारत के दिल्ली, बैंगलुरू,
मुंबई, अहमदाबाद, कोयम्बटूर
और कोलकाता शहर में लगभग 400 लोगों के साथ यह अध्ययन किया। इन शहरों के नतीजे अन्य
जगहों के समान ही रहे। एशिया के थाईलैंड, मलेशिया और चीन,
और केन्या और साउथ
अफ्रीका के शहरों में भी इसी तरह के परिणाम मिले।
शोधकर्ताओं के अनुसार “हमने यह जानने के
लिए 40 देशों में प्रयोग किया कि क्या लोग तब ज़्यादा बेईमान होते हैं जब प्रलोभन
बड़ा हो, लेकिन नतीजे इसके विपरीत रहे। ज़्यादा नगदी से भरे बटुओं को
अधिक लोगों द्वारा लौटाया गया। यह व्यवहार समस्त देशों और संस्थानों में मज़बूती
से देखने को मिला, तब भी जब बटुओं में बेईमानी उकसाने के लिए पर्याप्त रकम थी।
हमारे अध्ययन के नतीजे उन सैद्धांतिक मॉडल्स से मेल खाते हैं जिनमें परोपकार और
आत्म-छवि को स्थान दिया जाता है, साथ ही यह भी दर्शाते हैं कि बेईमानी करने
पर मिलने वाले भौतिक लाभ के साथ गैर-आर्थिक प्रेरणाओं का भी प्रत्यक्ष योगदान होता
है। जब बेईमानी करने पर बड़ा लाभ मिलता है तो बेईमानी करने या धोखा देने की इच्छा
बढ़ती है, लेकिन अपने आप को चोर के रूप में देखने की कल्पना इस इच्छा
पर हावी हो जाती है। …तुलनात्मक अध्ययन इस बात की ओर इशारा करता है कि आर्थिक
रूप से अनुकूल भौगोलिक परिवेश, समावेशी राजनैतिक संस्थान, राष्ट्रीय
शिक्षा और नैतिक मानदंडों पर ज़ोर देने वाले सांस्कृतिक मूल्यों का सीधा सम्बंध
नागरिक ईमानदारी से है।”
ऐसे अध्ययन भारत के विभिन्न स्थानों, गांवों (गरीब और सम्पन्न दोनों), कस्बों, नगरों, शहरों और आदिवासी इलाकों में करना चाहिए और देखना चाहिए कि यहां के नतीजे उपरोक्त अध्ययन से निकले सामान्य निष्कर्षों से मेल खाते हैं या नहीं। भारत उन 40 देशों का प्रतिनिधित्व करता है जो आर्थिक और सामाजिक आदर्शों, मूल्यों और विश्वासों को साझा करते हैं। (स्रोत फीचर्स)
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पाकिस्तान के तट के समीप 6 साल पहले भूकंप के कारण अस्तित्व
में आया एक छोटा-सा द्वीप हाल ही में लहरों में समा गया है।
दरअसल साल 2013 में पाकिस्तान में आए तीव्र
भूकंप के कारण तट के नज़दीक समुद्र में एक द्वीप बन गया था। रिक्टर पैमाने पर 7.7
की तीव्रता के इस प्रलयंकारी भूकंप में लगभग 320 लोग मारे गए थे और हज़ारों लोग
बेघर हो गए थे। अरेबियन टेक्टॉनिक प्लेट के युरेशियन प्लेट पर रगड़ने के कारण नीचे
दबी मिट्टी ज्वालामुखी से बाहर निकलने लगी। ऐसे ज्वालामुखी जो आग और लावा की बजाय
कीचड़ उगलते हैं, उन्हें मड वॉल्केनो या पंक ज्वालामुखी कहते हैं। यह इतनी
तेज़ी से बाहर निकली कि इसके साथ चट्टान और चिकने पत्थर भी ऊपर आ गए और इस द्वीप
की सतह पर जमा हो गए। यह द्वीप 20 मीटर ऊंचा,
90 मीटर चौड़ा और 40
मीटर लंबा था। इस पंक ज्वालामुखी विस्फोट से निकले मलबे से बने इस द्वीप को
ज़लज़ला कोह नाम दिया गया था।
इस दौरान लिए गए उपग्रह चित्रों से पता चलता है कि समय के साथ यह द्वीप किनारों से धीरे-धीरे खत्म होता गया और 27 अप्रैल के चित्रों में यह पूरी तरह ओझल हो गया। लेकिन ज़लज़ला कोह अभी पूरी तरह गायब नहीं हुआ है। द्वीप के स्थान के आसपास इस द्वीप के पदार्थ मंडरा रहे हैं। नासा के अनुसार इस क्षेत्र में पंक ज्वालामुखी विस्फोटों से द्वीपों के बनने और गायब हो जाने का लंबा इतिहास रहा है। तेज़ी से जमा हुई गाद से बने इस ज़लज़ला कोह द्वीप की लंबे समय तक रहने की संभावना वैसे भी नहीं थी। नासा के अनुसार इन दरारों से भविष्य में और भी द्वीप बनने की संभावना है। (स्रोत फीचर्स)
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इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार ग्लोबल
वार्मिंग पर रोक लगाने के लिए 1 अरब हैक्टर अतिरिक्त जंगल लगाने की आवश्यकता है।
यह क्षेत्र लगभग संयुक्त राज्य अमेरिका के बराबर बैठता है। हालांकि यह काफी कठिन
मालूम होता है लेकिन साइंस पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, पृथ्वी
पर पेड़ लगाने के लिए इतनी जगह तो मौजूद है।
कृषि क्षेत्रों,
शहरों और मौजूदा
जंगलों को न भी गिना जाए तो दुनिया में 0.9 अरब हैक्टर अतिरिक्त वन लगाया जा सकता
है। इतने बड़े वन क्षेत्र को विकसित किया जाए तो अनुमानित 205 गीगाटन कार्बन का
स्थिरीकरण हो सकता है। यह उस कार्बन का लगभग दो-तिहाई होगा जो पिछले दो सौ वर्षां
में मनुष्य ने वायुमंडल में उड़ेला है। इस अध्ययन का नेतृत्व करने वाले थॉमस
क्रॉथर के अनुसार यह जलवायु परिवर्तन से निपटने का सबसे सस्ता समाधान है और सबसे
कारगर भी है।
आखिर यह कैसे संभव है? यह
पता लगाने के लिए क्रॉथर और उनके सहयोगियों ने लगभग 80,000 उपग्रह तस्वीरों का
विश्लेषण किया और यह देखने की कोशिश की कि कौन-से क्षेत्र जंगल के लिए उपयुक्त
होंगे। इसमें से उन्होंने मौजूदा जंगलों, कृषि क्षेत्रों और शहरी क्षेत्रों को घटाकर
पता किया कि नए जंगल लगाने के लिए कितनी जमीन बची है। आंकड़ा आया 0.9 अरब हैक्टर।
एक अनुमान के मुताबिक 0.9 अरब हैक्टर में 10-15 खरब पेड़ लगाए जा सकते हैं। पृथ्वी
पर इस समय पेड़ों की संख्या 30 खरब है। इसमें आधी से अधिक बहाली क्षमता तो मात्र
छह देशों – रूस, अमेरिका, कनाडा,
ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील
और चीन – में है।
परिणाम बताते हैं कि यह लक्ष्य वर्तमान जलवायु के तहत प्राप्त करने योग्य है। लेकिन जलवायु बदल रही है, इसलिए हमें इस संभावित समाधान का लाभ लेने के लिए तेज़ी से कार्य करना होगा। यदि धरती के गर्म होने का मौजूदा रुझान जारी रहता है तो 2050 तक नए जंगलों के लिए उपलब्ध क्षेत्र में 22.3 करोड़ हैक्टर की कमी आ जाएगी। (स्रोत फीचर्स)
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पूर्व में शोधकर्ताओं द्वारा ऐसे उपकरण विकसित किए जा चुके
हैं जो कोनों के पीछे ओझल चीज़ों को देखने के लिए प्रकाश तरंगों का उपयोग करते थे।
इस प्रक्रिया में प्रकाश तरंगों को कोनों पर टकराकर उछलने दिया जाता था ताकि जो
वस्तुएं आंखों की सीध में नहीं हैं उन्हें भी देखा जा सके। हाल ही में इसी से
प्रेरित एक प्रयोग में वैज्ञानिकों के एक अन्य समूह ने प्रकाश तरंगों की बजाय
ध्वनि का प्रयोग किया। माइक्रोफोन और कार में उपयोग किए जाने वाले छोटे स्पीकरों
की सहायता से एक खंभे जैसा हार्डवेयर तैयार किया गया है।
ये स्पीकर ध्वनियों की एक शृंखला उत्सर्जित करते हैं जो एक दीवार पर एक कोण पर
टकराने के बाद दूसरी दीवार पर छिपी हुई वस्तु पर पड़ती है। वैज्ञानिकों ने दूसरी
दीवार पर H अक्षर का एक पोस्टर बोर्ड रखा था। इसके बाद उन्होंने इस उपकरण को धीरे-धीरे
घुमाया और हर बार अधिक ध्वनियों की संख्या बढ़ाते गए। हर बार ध्वनियां एक दीवार से
परावर्तित होकर दूसरी दीवार पर रखे पोस्टर बोर्ड से टकराकर माइक्रोफोन में वापस
आई।
भूकंपीय इमेजिंग एल्गोरिदम का उपयोग करते हुए उनके यंत्र ने H अक्षर की एक मोटी-मोटी छवि बना दी। शोधकर्ताओं ने एल (L) और टी (T) अक्षरों के साथ भी प्रयोग किया और अपने परिणामों की तुलना प्रकाशीय विधि से
की। प्रकाशीय विधि, जिसके लिए महंगे उपकरणों की आवश्यकता होती
है,
अधिक दूरी के L की छवि
बनाने में विफल रही। इसके साथ ही ध्वनि-आधारित विधि में केवल 4-5 मिनट लगे जबकि
प्रकाशीय विधि में एक घंटे से अधिक समय लगता है। शोधकर्ता अपने इस कार्य को
कंप्यूटर विज़न एंड पैटर्न रिकॉग्निशन काफ्रेंस में प्रस्तुत करेंगे।
इस तकनीक की व्यावहारिक उपयोगिता में अभी काफी समय है, लेकिन शोधपत्र के लेखकों का ऐसा मानना है कि आगे चलकर इस तकनीक का उपयोग वाहनों में अनदेखी बाधाओं को देखने के लिए किया जा सकता है। (स्रोत फीचर्स)
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‘तुम्हें कुछ भी महसूस नहीं होगा।’ यह आश्वासन था महिला सोनोग्राफर
का। न कोई इंजेक्शन, न निश्चेतक। वह केवल एक ठंडी और चिकनी जेल
काफी मात्रा में मरीज़ की छाती पर पोत देती है। वॉशिंग मशीन के बराबर स्कैनर को
ठेलती हुई वह मरीज़ के पलंग के पास लाती है। उसके ऊपर टेलीविज़न स्क्रीन लगा है।
फिर वह एक छोटे माइक्रोफोन से मिलते-जुलते ट्रांसड्यूसर को मरीज़ की पांचवीं और
छठी पसली के बीच में रखती है।
मशीन को चालू करने के बाद वीडियो पर एक
विचित्र-सी चीज़ का चित्र प्रकट होता है जिसका गड्ढेनुमा मुंह लयबद्ध तरीके से
फूलता और पिचकता है। यह होता है परा-ध्वनि (अल्ट्रासाउंड) की सहायता से, जिसकी ध्वनि तरंगों की आवृत्ति इतनी अधिक है कि मनुष्य
उन्हें नहीं सुन सकते। मरीज़ अपने धड़कते हुए ह्मदय के महाधमनी वाल्व को खुलते और
बंद होते देख रहा है। एकदम भीतर तक उतर जाने वाली यह दृष्टि चिकित्सा के लिए एक
क्रांतिकारी आयाम है। अब चिकित्सक बगैर चीरफाड़ शरीर के लगभग हर भाग की गहन जांच
कर सकते हैं।
पराध्वनि तरंगों की मदद से देखा जा सकता है
कि कौन-सी धमनियां मोटी या अवरुद्ध हो गई हैं, किन
मांसपेशियों को रक्त नहीं मिल पा रहा है। वास्तव में शरीर के लगभग हर भाग की ऐसी
जांच संभव है। चिकित्सक ग्रंथियों, घावों, अवरोधों के बारे में पता लगा सकते हैं।
जांच के अलावा परा-ध्वनि तरंगों को लेंस की
मदद से संकेंद्रित किया जा सकता है जिससे वे शरीर के भीतर एक सूक्ष्म स्थान पर
प्रहार कर सकें। नेत्र रोग विशेषज्ञ इनका प्रयोग आंखों के ट्यूमर का उपचार करने के
अलावा उस दबाव को कम करने में भी करते हैं जिससे मोतियाबिंद होता है। अति तीव्र
पराध्वनि की केवल एक चोट गुर्दे की पथरी को चूर-चूर कर देती है, और पीड़ादायक ऑपरेशनों की ज़रूरत ही नहीं रहती।
एक्सरे के विपरीत परा-ध्वनि के कोई
दुष्प्रभाव नहीं हैं। लगभग हर किस्म की जांच में इनका प्रयोग किया जा सकता है।
जांच के अन्य तरीकों की तुलना में यह तेज़ भी है और सस्ता भी।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान समुद्र की
गहराइयों को नाप कर जर्मन पनडुब्बियों का पता लगाने के लिए ईजाद किया गया
प्रतिध्वनि मापी परा-ध्वनि पर आधारित था। ध्वनि तरंगों के रास्ते में कोई वस्तु आए
(चाहे वह समुद्र में पनडुब्बी हो, हमारे कान के पर्दे
हों या स्टील के टुकड़े में दरार हो) तो तरंगें टकरा कर बिखर जाती हैं और कुछ वहीं
लौट आती हैं, जहां से शुरू हुई थीं। इस तरह प्राप्त
प्रतिध्वनियों को एकत्रित करके इलेक्ट्रॉनिक के ज़रिए चित्र में परिवर्तित किया जा
सकता है।
प्रतिध्वनि चित्र द्वारा शारीरिक जांच का
विचार द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उपजा था। पर वे चित्र इतने अस्पष्ट थे कि उनसे
विश्वसनीय निदान नहीं हो सकते थे। सत्तर के दशक में सॉलिड स्टेट इलेक्ट्रॉनिक
तकनीक के विकास के कारण बहुत सारी जानकारी का लगभग तत्क्षण विश्लेषण किया जाने
लगा।
उपरोक्त ट्रांसड्यूसर में पिन के सिरे के
आकार के 64 लाउडस्पीकर लगे थे। हर लाउडस्पीकर मरीज़ की त्वचा से ध्वनि के अविश्वसनीय
25 लाख स्पंदन प्रति सेकंड भेजता है, और
लौटती हुई मंद प्रतिध्वनियों को सुनता है। कंप्यूटर गणना करता है कि वे कितने
सेंटीमीटर तक चली हैं और तुरंत उस जानकारी को एक चित्र में परिवर्तित कर देता है।
अपने अनुभवी हाथों से ट्रांसड्यूसर को
फिराती हुई महिला सोनोग्राफर ह्मदय के विभिन्न वाल्व और प्रकोष्ठों के चित्र दिखा
सकी। मरीज़ अपने मिट्रल वाल्व को भी तितली के पंख की तरह फड़फड़ाते देख सकता था।
एक महिला मरीज़ को सांस लेने में कठिनाई हो
रही थी। महिला सोनोग्राफर स्कैनर को उसके पास लाई और कुछ ही क्षणों में उसकी तकलीफ
स्पष्ट दिखाई दी। ह्मदय के आसपास तरल पदार्थ इकट्ठा हो कर उसे दबा रहा था जिससे
उसके प्रकोष्ठ हवा नहीं भर पा रहे थे। उसका ह्मदय किसी भी क्षण रुक सकता था। रोग
का पता तुरंत चल गया और तरल पदार्थ को निकाल दिया गया।
अगर तब परा-ध्वनि उपलब्ध नहीं होता तो रोग
का पता चलाने के लिए चिकित्सकों को एक्सरे और अन्य चिकित्सा तकनीकों की सहायता
लेनी पड़ती या फिर तारों को शिराओं में घुसाकर ह्मदय तक पहुंचाने वाला लंबा और
अंतरवेधी तरीका अपनाना पड़ता।
परा-ध्वनि गर्भवती महिलाओं के लिए भी
उपयोगी है। क्या बच्चे जुड़वां हैं? क्या शिशु ठीक जगह पर
है? क्या उसका दिल धड़क रहा है? परा-ध्वनि की सहायता से शल्य चिकित्सक भ्रूण का ऑपरेशन भी
कर सकते हैं।
पूर्व में यकृत के कुछ रोगों का पता कई
सप्ताहों तक किए जाने वाले जटिल रक्त परीक्षणों या फिर जोखिम भरे ऑपरेशन के बाद
चलता था। परा-ध्वनि की सहायता से चिकित्सक तुरंत ही अवरोध या घाव को देख सकते हैं, एकदम सही स्थान पर सुई डाल कर परीक्षण के लिए कोशिकाएं
प्राप्त कर सकते हैं और कुछ ही घंटों के भीतर रोग का कारण, गंभीरता
और विस्तार जान सकते हैं।
चिकित्सा के अलावा भी परा-ध्वनि से तकनीकी
उपलब्धियों के नए आयाम खुले हैं। प्रबल ध्वनि तरंगें प्लास्टिक और पोलीमर को
जोड़ने का काम करती हैं। वैक्यूम क्लीनर के थैले, जूस
के गत्ते के डिब्बे, कैसेट टेप, डिब्बे
वगैरह परा-ध्वनि द्वारा पैक किए जाते हैं। और आपको अंगवस्त्र या मूंगफलियों का
पैकेट खोलने में जो मुश्किल होती है वह इसलिए कि उनके जोड़ों को संकेंद्रित
परा-ध्वनि से तब तक गरम किया जाता है जब तक वे पिघलते नहीं और दोनों भाग जुड़कर एक
नहीं बन जाते।
परा-ध्वनि से सफाई भी कर सकते हैं। तरल
पदार्थ पर परा-ध्वनि ऊर्जा की बौछार करने से वह नन्हे बुलबुलों वाला झाग बन जाता
है जो सूक्ष्म दरारों में घुस कर मैल को निकाल फेंकते हैं। हालांकि यह तकनीक
रसोईघर में इस्तेमाल करने के लिए अभी भी बहुत महंगी है। इसका बड़े पैमाने पर
इस्तेमाल प्रयोगशालाओं, युद्ध पोतों, कारखानों
और आभूषणों की सफाई में होता है।
परा-ध्वनि गहराई मापी की मदद से मछुआरे
समुद्रों में मछलियों के समूहों का पता लगा सकते हैं। फिलहाल विमानों में
छोटी-मोटी खराबियों का पता लगाने के लिए विमान को खोल कर उसके ज़रूरी कलपुर्जों की
जांच करने में लाखों डॉलर खर्च होते हैं। एक जेट विमान के रोटर की जांच में 40
घंटे लगते हैं। परा-ध्वनि तकनीक से यह काम चंद मिनटों में हो सकता है।
जब धातु के एक कलपुर्ज़े से ध्वनि तरंगें
टकराती हैं तो वह एक निश्चित आवृत्ति पर ‘बजता’ है। अनुनाद का पैटर्न फिंगर प्रिंट
की भांति अनूठा होता है, और कोई खराबी होने पर
ही बदलता है। परा-ध्वनि टेस्टिंग प्रोजेक्ट के मुख्य भौतिक विज्ञानी अल्बर्ट
मिगलिमोरी के अनुसार, “हर कलपुर्ज़े के बनने के समय उसके ध्वनि
चित्र को संचित करने का प्रस्ताव है। बाद में जांच करने पर अगर यह उससे भिन्न
निकलता है तो उस कलपुर्ज़े को निकाल देंगे। आशा है कि हर कॉकपिट में एक बॉक्स होगा
जिससे विमान अपनी जांच स्वयं करेगा।”
सबसे अधिक रोचक प्रगति चिकित्सा के क्षेत्र
में हुई है। नई प्रणालियां, जिनमें डिजिटल तकनीक
का प्रयोग होता है, उनके द्वारा महज़ एक मिलीमीटर मोटी शिराओं
को देखा जा सकता है और रक्त प्रवाह का पता लग सकता है। पर चिकित्सक केवल उनको देख
पाने से ही संतुष्ट नहीं हैं। परा-ध्वनि के उन्नत तरीकों द्वारा ह्मदय रोग
विशेषज्ञ को इस बात की सटीक जानकारी मिलेगी कि आपके ह्मदय के वाल्व से कितनी
मात्रा में रक्त प्रवाहित हो रहा है।
सान फ्रांसिस्को हार्ट इंस्टीट्यूट में
शोधकर्ताओं का एक दल ट्रांसड्यूसर को ही ह्मदय तक ले जाने और अल्ट्रासाउंड के
द्वारा अवरुद्ध और सख्त हो गई धमनियों की सफाई के तरीके खोजने में जुटा है।
धमनियों में जमा हुआ प्लाक परा-ध्वनि के प्रहार से गायब हो जाता है। इसमें धमनी के
क्षतिग्रस्त होने का कोई खतरा नहीं है।
प्रतिदिन नई खोजें हो रही हैं। चिकित्सक परा-ध्वनि की सहायता से वह सब देख रहे हैं जिसे पहले कभी नहीं देखा गया था और ऐसे नतीजे पा रहे हैं जिनकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.physics-and-radio-electronics.com/blog/wp-content/uploads/2016/05/sonarworking.png
गौरैया के साथ मेरा रिश्ता बचपन से ही रहा है। गौरैया छत में
लकड़ी व बांस की बल्लियों के बीच की जगह और दीवारों पर टंगे फोटो के पीछे दुबकी
रहती और सुबह होते ही यहां-वहां चहकती फिरती,
गली-मोहल्ले में धूल
में नहाती। आंगन में झूठे बर्तनों में बचे हुए अन्न कणों को चुगना आम बात थी। कई
बार तो खाना खाने के दौरान इतना पास आ जाती कि बस चले तो थाली में ही चोंच मार दे।
वे घर की दीवार पर टंगे शीशे में अपने को ही चोंच मारती रहती। शाम होते अनेक गौरैया
एक साथ मिलकर कलरव मचाती।
बरसात के दिनों में हम बच्चों का एक प्रमुख
काम होता गौरैया को पकड़ने का। तकनीक का खुलासा नहीं करूंगा। गौरैया को पकड़कर
उसके पंखों को स्याही से रंगकर वापस छोड़ देते। उस रंगी हुई चिड़िया को देखकर हम
खुश होते रहते।
अब गौरैया की संख्या काफी कम हो चुकी है, खासकर
महानगरों व शहरों में। रहन-सहन व घरों की डिज़ाइन में बदलाव के साथ गौरैया शहरी
घरों से अमूमन विदा ले चुकी है। अनेक गांवों-कस्बों में आज भी गौरैया बहुतायत से
दिखाई देती है। यह सही है कि गौरैया कम होती जा रही है लेकिन इंटरनेशनल यूनियन फॉर
कंज़र्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) की जोखिमग्रस्त प्रजातियों की रेड लिस्ट में गौरैया
को अभी भी कम चिंताजनक ही बताया गया है।
मैं यहां यह बात करना चाहता हूं कि इसने
कैसे और कब मानव के साथ जीना सीखा? माना जाता है कि गौरैया ने मानव के साथ
जीना तब शुरू किया था जब उसने कृषि की शुरुआत की थी। जब गौरैया ने मानव के साथ
जीना सीखा तो इसमें क्या बदलाव आया होगा? उसके खान-पान में बदलाव ज़रूर आए होंगे।
इसके चलते इसकी शारीरिक बनावट में क्या कोई अंतर आए होंगे?
गौरैया (पैसर डोमेस्टिकस) को अक्सर हम
पालतू चिड़िया की श्रेणी में रखने की भूल कर बैठते हैं। सच तो यह है कि वह मानव के
निकट रहती है मगर पालतू नहीं है। दरअसल, गौरैया को कुत्ते,
गाय, घोड़े, मुर्गी
की तरह मानव ने पालतू नहीं बनाया है बल्कि इसने मानव के निकट जीना सीख लिया है।
सलीम अली ने अपनी पुस्तक ‘भारत के पक्षी’ में लिखा है कि यह मनुष्य की बस्तियों से
अलग नहीं रह सकती।
गौरैया एक नन्ही चिड़िया है जो पैसेराइन
समूह की सदस्य है। इसकी लगभग 25 प्रजातियां हैं जो पैसर वंश के अंतर्गत आती हैं।
घरेलू चिड़िया युरोप, भूमध्यसागर के तटों और अधिकांश एशिया में पाई जाती है।
ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका, और अमेरिका व अन्य कई क्षेत्रों में इसे
जानबूझकर पहुंचाया गया या आकस्मिक कारणों से पहुंच गई।
जहां भी हो,
यह मानव बस्तियों के
इर्द-गिर्द ही पाई जाती है। जहां-जहां मनुष्य गए,
गौरैया साथ गई! घने
जंगलों, घास के मैदानों और रेगिस्तान,
जहां मानव की मौजूदगी
नहीं होती वहां गौरैया नहीं पाई जाती।
यह अनाज और खरपतवार के बीज खाती है। वैसे
यह एक अवसरवादी भक्षक है, जिसे जो मिल जाए खा लेती है। कीट और
इल्लियों को भी खाती है। इसके शिकारियों में बाज,
उल्लू जैसे शिकारी
पक्षी और बिल्ली जैसे स्तनधारी शामिल हैं।
पक्षियों की चोंच
पक्षियों की चोंच और इससे सम्बंधित लक्षण
विकास की विशेषताओं को समझने में कारगर रहे हैं। चोंच भोजन प्राप्त करने का प्रमुख
औज़ार है। पक्षियों के अध्ययन के दौरान अक्सर उनकी चोंच का अवलोकन करने को कहा
जाता है। चोंच के आधार पर पक्षी के भोजन का अनुमान लगाया जा सकता है।
डार्विन ने गैलापेगोस द्वीपसमूह पर फिंच
पक्षियों का अध्ययन कर बताया था कि वास्तव में पक्षियों की चोंच की शक्ल और आकृति
को प्राकृतिक चयन द्वारा इस तरह से तराशा जाता है कि वह उपलब्ध भोजन के साथ फिट
बैठ सके। डार्विन ने बताया था कि फिंच की अलग-अलग प्रजातियों में भोजन के अनुसार
चोंच का आकार विकसित हुआ है। गौरैया जब मानव के साथ रहने लगी तो खेती में उपलब्ध
बीजों को खाने के मुताबिक गौरैया की चोंच में परिवर्तन हुआ।
दो गौरैया की तुलना
गौरैया की एक उप प्रजाति है: पैसर
डोमेस्टिकस बैक्ट्रिएनस। यह हमारी घरेलू गौरैया पैसर डोमेस्टिकस की ही तरह दिखती
है। बैक्ट्रिएनस गौरैया शर्मिली और मानवों से दूर रहने की कोशिश करती है। यह
प्रवासी पक्षी है। दोनों के डीएनए विश्लेषण से पता चला है कि लगभग 10 हजार वर्ष
पहले गौरैया का एक उपसमूह मुख्य समूह से अलग होकर घरेलू गौरैया बन गया।
गौरैया का मानव के साथ सहभोजिता का रिश्ता
रहा है। लगभग दस हज़ार वर्ष पूर्व मनुष्यों ने जब मध्य-पूर्व में खेती प्रारंभ की
उसी समय गौरैया ने मानव के साथ रिश्ता बिठाना शुरू किया। लगभग चार हज़ार वर्ष
पूर्व खेती के फैलाव के साथ-साथ गौरैया भी तेज़ी से फैलती गई। हालांकि घरेलू
गौरैया की कई उपप्रजातियां हैं लेकिन जेनेटिक विश्लेषण से पता चलता है कि ये हाल
ही में अलग-अलग हुई हैं।
अलबत्ता,
बैक्ट्रिएनस गौरैया
ने आज तक अपने प्राचीन पारिस्थितिक गुणधर्म बचाकर रखे हैं। बैक्ट्रिएनस मानव के
साथ नहीं जुड़ी है बल्कि मानव बस्तियों से दूर प्राकृतिक आवासों में (जैसे नदी, झाड़ियों, घास
के मैदानों और पेड़ों पर) रहती है। इनकी तुलना करके हम घरेलू गौरैया के मनुष्यों
से रिश्ता बनने में हुए परिवर्तनों को देख सकते हैं।
शरद ऋतु में बैक्ट्रिएनस गौरैया अपने
प्रजनन स्थल मध्य एशिया से बड़ी तादाद में सर्दियां बिताने के लिए उड़कर
दक्षिण-पूर्वी ईरान और भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमी भागों में पहुंच जाती है।
गौरतलब है कि बैक्ट्रिएनस मुख्य रूप से जंगली घास के बीज खाती है जबकि मानव के साथ
रहने वाली गौरैया खेती में उगने वाली गेहूं और जौं जैसी फसलों के बीज खाती हैं।
अध्ययन से पता चला है कि अस्थि संरचनाओं का विकास प्रवासी बैक्ट्रिएनस गौरैया की
तुलना में घरेलू गौरैया में संभवत: जल्दी हुआ क्योंकि प्रवासी व्यवहार के चलते
पक्षी पर वज़न सम्बंधी अड़चनें ज़्यादा आएंगी जबकि एक ही जगह पर रहने वाली गौरैया
के लिए इस तरह की अड़चन बाधक नहीं बनेगी क्योंकि उन्हें दूर-दूर तक उड़कर तो जाना
नहीं है। इसलिए प्रवासी व्यवहार का परित्याग करने के साथ ही घरेलू गौरैया की चोंच
और खोपड़ी मज़बूत होने लगी।
गौरैया में प्रवास के परित्याग के फलस्वरूप
चोंच व खोपड़ी में होने वाले परिवर्तन एक प्रकार से अपने नए भोजन के साथ अनुकूलन
है। जंगली अनाज के दानों और खेती में उगाए गए अनाज के दानों के बीच कई अंतर हैं।
फसली बीजों का आकार बढ़ने लगा और ये बीज जंगली बीजों से कठोर व बनावट में अलग थे।
अत: बीजों के गुणधर्मों में परिवर्तन के चलते खोपडी और चोंच पर प्राकृतिक चयन का
दबाव बढा।
खेती में उगाए जाने वाले अनाज के दाने पौधे
में एक डंडी (रेकिस) पर काफी पास-पास मज़बूती से बंधे होते हैं जबकि जंगली घास के
पौधों में पकने पर रेचिस के टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं। बैक्ट्रिएनस उप प्रजाति
मानवों से दूर ही रही और उनकी चोंच व खोपड़ी में कोई फर्क नहीं आया। यह भी देखा
गया कि मानव के निकट रहने वाली गौरैया की उप प्रजाति डील-डौल में भी थोड़ी बड़ी
है।
गौरैया ने मानव सभ्यता के साथ रहते हुए
अपने आपको मानव-निर्भर पर्यावरण के अनुसार ढाल लिया है। प्राकृतिक चयन की
प्रक्रिया ने उन आनुवंशिक परिवर्तनों को सहारा दिया या उन्हें संजोया जिनके चलते
इनकी खोपड़ी के आकार में बदलाव के अलावा इनमें मांड या स्टार्च को पचाने की क्षमता
भी विकसित होती गई।
आखिर कृषि ने कैसे गौरैया के जीनोम को
प्रभावित किया होगा? घरेलू गौरैया में ऐसे जीन मिले हैं जो इसके करीबी जंगली
रिश्तेदार में नहीं हैं।
घरेलू गौरैया में प्रमुख रूप से ऐसे दो जीन मिले हैं। इनमें से एक जीन जानवरों की खोपड़ी की संरचना के लिए ज़िम्मेदार होता है और दूसरा स्टार्च के पाचन में प्रमुख भूमिका अदा करता है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/6/6e/Passer_domesticus_male_(15).jpg