हिंदी विज्ञान पत्रिकाएं: एक समीक्षा – मनीष श्रीवास्तव

विगत दो सदी में भारत में विज्ञान लेखन वृहद स्तर पर हुआ है और कई विशिष्ट शैलियों का विकास हुआ है। इन्हें पुस्तकों तथा पत्रिकाओं के ज़रिए पाठकों तक पहुंचाया जा चुका है। यहां मूलत: विज्ञान पत्रिकाओं की चर्चा की गई है।

पत्रिकाओं की विषयवस्तु

शुरुआत में भारतीय विज्ञान पत्रिकाओं में 19वीं सदी का समय मूल रूप से साहित्य, सूचना और शिक्षा पर केंद्रित रहा। विज्ञान को भी प्राथमिक स्तर पर साहित्यिक मनीषियों, पत्रिकाओं ने जगह दी। भारतीय संदर्भ में विज्ञान जागृति की अलख जगाने की शुरुआत सर्वप्रथम साहित्यिक पत्रिकाओं से हुई। साहित्यिक पत्रिकाओं ने जनमानस में विज्ञान जागरण के प्रति महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

विज्ञान जागरण की पहली आधार स्तंभ बांग्ला भाषा बनी। अप्रैल 1818 में श्रीरामपुर (ज़िला हुगली, पश्चिम बंगाल) के बेपटिस्ट मिशनरियों ने बांग्ला और अंग्रेज़ी में मासिक दिग्दर्शन पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया। इसके संपादक थे क्लार्क मार्शमैन (1793-1877)। दिग्दर्शन का हिंदी अनुवाद भी प्रकाशित किया गया था। पत्रिका के हिंदी में अंक में दो वैज्ञानिक लेख प्रकाशित किए गए थे – ‘अमेरिका की खोज’ और ‘बैलून द्वारा आकाश यात्रा’। यह भारत में विज्ञान प्रकाशन का पहला कदम था।

जनवरी 1878 से बनारस से प्रकाशित द्विभाषी पत्रिका काशी को हिंदी में विज्ञान लोकप्रियकरण का पहला उदाहरण माना जा सकता है। बालेश्वर प्रसाद के संपादन और रामानंद के प्रबंधन में चन्द्रप्रभा प्रेस द्वारा हिंदी और उर्दू में यह पत्रिका हर शुक्रवार को प्रकाशित होती थी। इसके मुखपृष्ठ पर छपा होता था – ‘ए वीकली एजुकेशनल जर्नल ऑफ साइंस, लिटरेचर एण्ड न्यूज़ इन हिन्दुस्तानी’।

विज्ञान पत्रिकाओं का आरंभ

विज्ञान पत्रिकाओं में सर्वप्रथम विज्ञान के किसी एक विषय को ही आधार बनाते हुए प्रकाशन आरंभ हुआ। चिकित्सा पहला मुख्य विषय रहा जिस पर किसी विज्ञान पत्रिका का प्रकाशन हुआ। डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित के अनुसार चिकित्सा विषय की पहली पत्रिका 1842 में चिकित्सा सोपान नाम से श्रीराम शास्त्री के संपादन में प्रकाशित हुई। इसके बाद सन 1881 में प्रयाग से आरोग्य दर्पण नाम से चिकित्सा सम्बंधी विषयों को लेकर एक और पत्रिका प्रकाशित हुई।

चिकित्सा के बाद कृषि मुख्य विषय रहा जिस पर पत्रिका प्रकाशन हुआ। डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित के अनुसार कृषि की पहली पत्रिका 1911 में किसान मित्र नाम से पटना से रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा हिंदी भाषा में प्रकाशित की गई।

अलबत्ता विज्ञान के और भी विविध विषय थे जो अभी तक अछूते रहे थे। 20वीं सदी के दूसरे दशक में विज्ञान के सभी विषयों को समावेशित कर उन पर लेख, समाचार और जानकारी प्रकाशित करने का कार्य हुआ। विशुद्ध रूप से विज्ञान पत्रिका होने का श्रेय विज्ञान नामक पत्रिका को जाता है। 1913 में प्रयागराज में विज्ञान परिषद की स्थापना की गई थी जिसने 1915 से विज्ञान पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया था।

विज्ञान पत्रिका के बाद सबसे महत्वपूर्ण नाम प्राणिशास्त्र नामक पत्रिका का आता है। इसका प्रकाशन प्रसिद्ध विद्वान देवी शंकर मिश्र द्वारा किया गया। 1948 में देवी शंकर द्वारा भारतीय प्राणिशास्त्र परिषद की स्थापना की गई थी और इसी परिषद के अंतर्गत 1948 में प्राणिशास्त्र का प्रकाशन आरंभ किया गया।

भारत सरकार द्वारा भी आज़ादी के बाद विज्ञान प्रसार को बढ़ावा देने का कार्य आरंभ किया गया। इसके लिए सन 1952 से भारत सरकार की वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद द्वारा विज्ञान प्रगति पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया गया। पत्रिका अपने उत्कृष्ट प्रकाशन तथा सामग्री के लिए सन 2022 में राष्ट्रीय राजभाषा कीर्ति सम्मान से भी सम्मानित हो चुकी है।

विज्ञान संसार की एक और महत्वपूर्ण पत्रिका का प्रकाशन 1961 में इंडियन प्रेस, प्रयाग द्वारा विज्ञान जगत नाम से हुआ। इस सचित्र मासिक पत्रिका के संपादक आर. डी. विद्यार्थी थे।

सन 1969 से भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र, मुंबई द्वारा वैज्ञानिक विषयों पर वैज्ञानिक नामक त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन किया जा रहा है। पत्रिका के शुरुआती अंकों का संपादन ब्रजमोहन पांडे, डॉ. प्रताप कुमार माथुर, उमेश चंद्र मिश्र तथा माधव सक्सेना द्वारा किया गया था।

भारत सरकार के उपक्रम द्वारा एक और राष्ट्रीय पत्रिका आविष्कार का प्रकाशन सन 1971 से नेशनल रिसर्च डेवलेपमेंट कॉर्पोरेशन, नई दिल्ली द्वारा किया जा रहा है।

हिंदी विज्ञान पत्रिकाओं के प्रकाशन इतिहास के क्रम में सन 2018 तक कई अन्य पत्रिकाएं भी प्रकाशित की गईं। इनकी सूची लेख के अंत में दी गई है।

सामाजिक प्रभाव

साक्षरता के स्तर को बढ़ाने तथा जन-जागृति पैदा करने में पत्र-पत्रिकाओं की विशेष भूमिका रही है। इस दृष्टिकोण से हिंदी की विज्ञान पत्रिकाओं ने अपने सौ वर्षों से भी लंबे सफर में महत्वपूर्ण कार्य किया है। पत्रिकाओं ने जनमानस और विद्यार्थियों में तार्किक वैज्ञानिक सोच विकसित करने का कार्य किया। नवागत विज्ञान लेखकों का सृजन हुआ। हिंदी विज्ञान लेखन हिंदी साहित्य की नई विधा के रूप में स्थापित हुआ। महिलाओं को भी विज्ञान लेखन के प्रति आकृष्ट करने का कार्य विज्ञान पत्रिकाओं ने किया। विज्ञान विषयों पर प्रकाशित महत्वपूर्ण विशेषांकों ने विषय विशेष पर सामाजिक जागरूकता उत्पन्न की। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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भारत में प्रकाशित हिन्दी भाषीय विज्ञान पत्रिकाओं की सूची
क्र.पत्रिका प्रकाशन प्रकाषन वर्ष
1 विज्ञान मासिक 1915
2 धनवन्तरी मासिक 1924
3 बालक मासिक 1926
4 मैसूर मासिक 1942
5 कृषक जगत मासिक 1945
6 सचित्रा आयुर्वेद मासिक 1948
7 होम्योपैथी संदेश मासिक 1948
8 किसानी समाचार मासिक 1948
9 प्राकृतिक जीवन मासिक 1948
10 बाल भारती मासिक 1948
11 खेती मासिक 1949
12 प्राणिशास्त्रमासिक 1950
13 स्वास्थ्य और जीवन मासिक 1950
14 कृषि और पशुपालन मासिक 1952
15 उन्नत कृषि मासिक 1952
16 गौ संवर्धन मासिक 1952
17 विज्ञान प्रगति मासिक 1958
18 विज्ञान परिषद् अनुसंधान पत्रिका त्रैमासिक 1960
19 आयुर्वेद महासम्मेलन पत्रिका मासिक 1960
20 साइंस टुडे मासिक 1960
21 लोक विज्ञान मासिक 1960
22 विज्ञान जगत मासिक 1961
23 विज्ञान लोक मासिक 1961
24 नंदन मासिक 1964
25 वैज्ञानिक बालक मासिक 1964
26 वैज्ञानिक त्रैमासिक 1968
27 कृषि चयनिका त्रैमासिक 1969
28 आविष्कार मासिक 1971
29 भारतीय चिकित्सा संपदा मासिक 1975
30 विज्ञान डाइजेस्ट मासिक 1975
31 विज्ञान भारती द्वैमासिक 1978
32 निरोगधाम मासिक 1979
33 फल-फूल द्वैमासिक 1979
34 विज्ञान परिचय मासिक 1979
35 ज्ञान-विज्ञान मासिक 1979
36 होशंगाबाद विज्ञान मासिक 1980
37 आयुर्वेदिक विज्ञान औषधि अनुसंधान मासिक 1980
38 ग्राम शिल्प त्रैमासिक 1981
39 विज्ञानपुरी त्रैमासिक 1981
40 विज्ञानदूत मासिक 1982
41 पर्यावरण अर्धवार्षिक 1983
42 विज्ञान प्रवाह मासिक 1983
43 चकमक मासिक 1985
44 ब्रिटिश वैज्ञानिक एवं आर्थिक समीक्षा त्रैमासिक 1985
45 विज्ञान गरिमा सिंधु त्रैमासिक 1986
46 आई.सी.एम.आर. मासिक 1986
47 साइफन मासिक 1986
48 विज्ञान विथिका मासिक 1986
49 विज्ञान बन्धु साप्ताहिक 1987
50 जिज्ञासा अर्धवार्षिक 1987
51 पर्यावरण डाइजेस्ट मासिक 1987
52 स्पेस इंडिया त्रैमासिक 1987
53 इलेक्ट्रानिकी आपके लिए मासिक 1988
54 विज्ञान गंगा त्रैमासिक 1988
55 स्रोत मासिक 1989
56 पर्यावरण मासिक 1990
57 भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान अर्धवार्षिक 1993
58 बालवाटिका मासिक 1995
59 प्रसार दूत अर्धवार्षिक 1996
60 ड्रीम 2047 मासिक 1998
61 पर्यावरण ऊर्जा टाइम्स मासिक 1998
62 विज्ञान आपके लिए मासिक 1998
63 विज्ञान आलोक त्रैमासिक 1998
64 नवसंचेतना (राजभाषा पत्रिका) अर्धवार्षिक 1998
65 ज्ञान गारिमा सिंधु त्रैमासिक 2000
66 तरंग वार्षिक2000
67 विज्ञान कथा त्रैमासिक 2001
68 ऊर्जायन वार्षिक2001
69 विपनेट मासिक 2002
70 विज्ञान प्रकाश त्रैमासिक 2002
71 स्पैन मासिक 2003
72 बच्चों का इंद्रधनुष मासिक 2004
73 ज्ञान विज्ञान बुलेटिन मासिक 2004
74 बच्चों का इंद्रधनुष मासिक 2004
75 बाल प्रहरी मासिक 2004
76 साइंस टाइम्स न्यूज एवं व्यूज मासिक 2005
77 मुक्त शिक्षा अर्धवार्षिक 2005
78 साइंस इंडिया मासिक 2005
79 गर्भनाल वार्षिक2006
80 कृषि प्रसंस्करण दर्पण अर्धवार्षिक 2006
81 अक्षय ऊर्जा द्वैमासिक 2006
82 पैदावार मासिक कृषि मासिक 2007
83 विज्ञान गंगा वार्षिक2007
84 साइंटिफिक वर्ल्ड मासिक 2007
85 हरबोला मासिक 2007
86 विज्ञान परिचर्चा त्रैमासिक 2009
87 दुधवा लाइव मासिक 2010
88 सर्प संसार मासिक 2010
89 हरियाणा साइंस बुलेटिन मासिक 2010
90 हमारा भूमंडल मासिक 2010
91 जल चेतना त्रैमासिक 2011
92 भूगोल और आप द्वैमासिक 2011
93 भारतीय मसाला फसल अनुसंधान संस्थानवार्षिक2012
94 कृषि का शोध वार्षिक2012
95 जिज्ञासा वार्षिक2012
96 अनुसंधान शोध वार्षिक2013
97 किसान खेती त्रैमासिक 2014
98 विपनेट क्यूरीसिटी मासिक 2016
99 डाउन टू अर्थ मासिक 2016
100 टेक्निकल टुडे त्रैमासिक 2016
101 बालवाणी द्वैमासिक 2016
102 आई वंडर अर्धवार्षिक 2017
103 प्रौद्योगिकी विशेष द्वैमासिक 2018
104 कृषि मंजूषा अर्धवार्षिक 2018

हाथियों की मदद के लिए कृत्रिम बुद्धि (एआई) – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

भारत में हाथियों की आबादी करीब 25-30 हज़ार बची है। नतीजतन, इन्हें ‘लुप्तप्राय’ श्रेणि में रखा गया है। अनुमान है कि पहले हाथी जितने बड़े क्षेत्र में फैले हुए थे, उसकी तुलना में आज ये उसके मात्र 3.5 प्रतिशत क्षेत्र में सिमट गए हैं – अब ये हिमालय की तलहटी, पूर्वोत्तर भारत, मध्य भारत के कुछ जंगलों और पश्चिमी एवं पूर्वी घाट के पहाड़ी जंगलों तक ही सीमित हैं।

विशेष चिंता का विषय उनके प्राकृतवास का छोटे-छोटे क्षेत्रों में बंट जाना है: हाथियों को भोजन एवं आश्रय देने वाले वन मनुष्यों द्वारा विकसित भू-क्षेत्रों (रेलमार्ग, सड़कमार्ग, गांव-शहर वगैरह बनने) की वजह से खंडित होकर छोटे-छोटे वन क्षेत्र रह गए हैं। इस विखंडन से हाथियों के प्रजनन विकल्प भी सीमित हो सकते हैं। इससे आनुवंशिक अड़चनें पैदा होती हैं और आगे जाकर झुंड की फिटनेस में कमी आती है।

हाथियों का अपने आवास क्षेत्र में लगातार आवागमन उन्हें सड़कों और रेलवे लाइनों के संपर्क में लाता है। दरअसल, एक हथिनी के आवास क्षेत्र का दायरा लगभग 500 वर्ग किलोमीटर होता है, और टुकड़ों-टुकड़ों में बंटे अपने आवास में इतनी दूरी तय करते हुए उसकी सड़क या रेलवे लाइन से गुज़रने की संभावना (और इसके चलते दुर्घटना की संभावना) बहुत बढ़ जाती है।

सौभाग्य से, सभी हाथी-मार्गों (जिन रास्तों से वे आवागमन करते हैं) पर इस तरह के खतरे नहीं हैं। बांदीपुर, मुदुमलाई और वायनाड के हाथी गर्मियों में मौसमी प्रवास पर जाते हैं। वे पानी और हरी घास के लिए काबिनी बांध के बैकवाटर की ओर जाते हैं। अध्ययनों से पता चला है कि तमिलनाडु और केरल के बीच हाथियों के 18 प्रवास-मार्ग मौजूद हैं।

इस समस्या का एक समाधान वन्यजीव गलियारे हैं – ये गलियारे मनुष्यों के साथ कम से कम संपर्क के साथ जानवरों को प्रवास करने का रास्ता देते हैं। इसका एक अच्छा उदाहरण उत्तराखंड का मोतीचूर-चिल्ला गलियारा है, जो कॉर्बेट और राजाजी राष्ट्रीय उद्यानों के बीच हाथियों के आने-जाने (और इस तरह जीन के प्रवाह) को सुगम बनाता है। हालांकि, मनुष्यों के साथ संघर्ष का खतरा तो हमेशा बना रहता है – हाथी कभी-कभी फसलों को खा जाते हैं, या सड़कों और रेल पटरियों पर आ जाते हैं।

ट्रेन की रफ्तार

कनाडा में हुई एक पहल ने पशु-ट्रेन टकराव को कम करने का प्रयास किया है – इस प्रयास में ट्रेन के आने की चेतावनी देने के लिए पटरियों के किनारे विभिन्न स्थानों पर जल-बुझ लाइट्स और घंटियां लगाई गई थीं। ये लाइट्स और घंटियां ट्रेन के आने के 30 सेकंड पहले चालू हो जाती थीं – इन संकेतों का उद्देश्य जानवरों में इन चेतावनियों और ट्रेन आने के बीच सम्बंध बैठाना था।

चेतावनी प्रणाली युक्त और चेतावनी प्रणाली रहित सीधी और घुमावदार दोनों तरह की पटरियों पर कैमरों ने ट्रेन आने के प्रति जानवरों की प्रतिक्रियाओं को रिकॉर्ड किया। देखा गया कि बड़े जानवर, जैसे हिरण परिवार के एल्क और धूसर भालू चेतावनी प्रणाली विहीन ट्रैक पर ट्रेन आने से लगभग 10 सेकंड पहले पटरियों से दूर चले जाते हैं, जबकि चेतावनी प्रणाली युक्त ट्रैक पर ट्रेन आने से लगभग 17 सेकंड पहले। (यह अध्ययन ट्रांसपोर्टेशन रिसर्च जर्नल में प्रकाशित हुआ है।)

घुमावदार ट्रैक पर आती ट्रेन के प्रति प्रतिक्रिया कम दिखी, संभवत: कम दृश्यता के कारण। ऐसी जगहों पर, जानवर ट्रेन की आहट का आवाज़ से पता लगाते हैं। अलबत्ता, ट्रेन आ रही है या नहीं इसकी टोह आवाज़ से मिलना ट्रेन की तेज़ रफ्तार जैसे कारकों से काफी प्रभावित होती है।

कृत्रिम बुद्धि (एआई) की मदद

हाथियों के आवास वाले जंगलों से गुज़रते समय इंजन चालक को कब ट्रेन की रफ्तार कम करनी चाहिए? भारतीय रेलवे के पास ऑप्टिकल फाइबर केबल का एक विशाल नेटवर्क है। ये केबल दूरसंचार और डैटा के आवागमन को संभव बनाते हैं, और सबसे महत्वपूर्ण रूप से ट्रेन नियंत्रण के लिए संकेत भेजते हैं। हाल ही में शुरू की गई गजराज नामक प्रणाली में, इन ऑप्टिकल फाइबल केबल की लाइनों पर जियोफोनिक सेंसर लगाए गए हैं, जो हाथियों के भारी और ज़मीन को थरथरा देने वाले कदमों के कंपन को पकड़ सकते हैं।

एआई-आधारित प्रणाली इन सेंसर से प्राप्त डैटा का विश्लेषण करती है और प्रासंगिक जानकारियां निकालती है – जैसे आवागमन की आवृत्ति और कंपन की अवधि। यदि हाथी-जनित विशिष्ट कंपन का पता चलता है, तो उस क्षेत्र के इंजन ड्राइवरों को तुरंत अलर्ट भेजा जाता है, और ट्रेन की रफ्तार कम कर दी जाती है। ऐसी प्रणालियां फिलहाल उत्तर पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार क्षेत्र में लगाई गई हैं, जहां पूर्व में कई दुर्घटनाएं हुई हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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अवसाद के लिए केटामाइन की गोली

श्व प्रशांतक और पार्टी ड्रग के रूप में मशहूर केटामाइन को इन दिनों गंभीर अवसाद के आसान उपचार के रूप में विकसित किया जा रहा है। पारंपरिक रूप से, अवसाद से ग्रस्त लोगों को केटामाइन की खुराक अस्पताल में इंट्रावीनस रूप में दी जाती है। लेकिन नेचर मेडिसिन में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन बताता है कि केटामाइन का स्लो-रिलीज़ गोली के रूप में उपयोग इस उपचार को अधिक सुलभ बना सकता है।

ओटागो विश्वविद्यालय के मनोचिकित्सक पॉल ग्लू के अनुसार गोली के रूप में इस औषधि का सेवन आसानी से अन्य किसी साधारण गोली की तरह घर पर किया जा सकेगा और इसके लिए विशेष निगरानी की आवश्यकता भी नहीं होगी।

गौरतलब है कि नसों या नेज़ल स्प्रे के माध्यम से केटामाइन का उपयोग अवसाद के उपचार के लिए किया जाता रहा है। लेकिन इन तरीकों से उच्च रक्तचाप, तेज़ हृदय गति और आसपास की दुनिया और स्वयं से असम्बद्धता जैसे दुष्प्रभाव देखे गए हैं। वहीं, केटामाइन औषधि को स्लो-रिलीज़ तरीके से देने पर ये दुष्प्रभाव कम देखे गए हैं।

इसके मद्देनज़र ग्लू और उनकी टीम ने एक स्लो-रिलीज़ केटामाइन गोली (R-107) विकसित की है। कारगरता की जांच के लिए उन्होंने गंभीर अवसाद विकार वाले 231 प्रतिभागियों को अध्ययन में शामिल किया। ये प्रतिभागी कम से कम दो तरह की अवसादरोधी औषधियों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहे थे। इन रोगियों को पांच दिनों तक रोज़ाना 120-मिलीग्राम R-107 की खुराक दी गई। आठ दिन बाद भी जिन रोगियों के लक्षणों में सुधार नहीं हुआ वे स्वयं इस अध्ययन से हट गए। इसके बाद 168 प्रतिभागियों के साथ इस अध्ययन को जारी रखा गया। उन्हें या तो प्लेसिबो या फिर R-107 टेबलेट्स (30, 60, 120, या 180 मिलीग्राम) की एक खुराक हफ्ते में दो बार 12 सप्ताह के लिए दी गई।

टीम ने पाया कि 13 हफ्तों के बाद, प्लेसिबो वाले 71 प्रतिशत प्रतिभागियों में अवसाद के लक्षण मध्यम पाए गए, जबकि उच्चतम खुराक वाले केवल 43 प्रतिशत प्रतिभागियों में अवसाद के लक्षण बने रहे। इस प्रक्रिया के दौरान प्रतिभागियों में दुष्प्रभाव न्यूनतम रहे: रक्तचाप में कोई परिवर्तन नहीं देखा गया जबकि कुछ रोगियों ने केवल बेहोशी या अम्बद्धता की शिकायत की।

ये निष्कर्ष आशाजनक लगते हैं। लेकिन बड़े पैमाने पर जांच और दुरुपयोग सम्बंधी चिंताओं को संबोधित करने के बाद ही इसे आम उपयोग में लाया जा सकेगा। फिलहाल दुरुपयोग के जोखिम को कम करने के लिए, R-107 गोली को अत्यधिक कठोर और कुचलने में कठिन बनाया गया है ताकि इसे सूंघकर नशा करना मुश्किल हो जाए।

इसके अलावा, शराब की लत जैसी अन्य मानसिक स्थितियों से निपटने के लिए केटामाइन की प्रभाविता पता लगाने की योजना भी है। प्रारंभिक शोध से पता चलता है कि केटामाइन शराब की लालसा को कम करने में भी मददगार साबित हो सकती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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तारों का जन्म एवं मृत्यु – डॉ. मॉइज़ रस्सीवाला

बचपन से ही हम तारों को देखते आए हैं। परंतु बहुत कम ही लोगों के दिमाग में सवाल उठते हैं कि आकाश में इतने सारे तारें क्यों हैं? ये हम से कितनी दूर हैं? कितने बड़े हैं? ये किन चीज़ों से बने हैं? और ये सतत जगमगाते क्यों रहते हैं?

सभी को प्राय: हर रात नज़र आने वाले तारों के इन नज़ारों के बारे में हमारे दिमाग में ये सवाल कोलाहल क्यों नहीं मचाते? क्यों नहीं हम सब इन सवालों के उत्तर जानने के लिए लालायित हो उठते?

तारों-भरे खगोल को हम प्रतिदिन पृथ्वी की परिक्रमा करते देखते हैं। बस, इसके अलावा तारों में हमें कोई उलटफेर नज़र नहीं आता। चंद्रमा की कलाएं घटती-बढ़ती हैं। आकाश के ग्रह भी तारों के सापेक्ष अपनी स्थितियां बदलते रहते हैं। सूर्य भी स्थान बदलता है। उल्कापात तथा पुच्छल तारे (धूमकेतु) जैसे आकाश के नज़ारे पुरातन काल से मानव को प्रभावित करते रहे हैं, भयभीत करते रहे हैं। किंतु तारे हमें उस तरह प्रभावित नहीं करते, क्योंकि परंपरा से हमने उन्हें ‘स्थिर’ मान लिया है। वस्तुत:, इस भौतिक विश्व में कोई भी वस्तु स्थिर या निश्चल नहीं है।

तारों के अध्ययन के प्रति हमारी उपेक्षा का एक और कारण है कि बचपन से ही हमको बताया जाता है कि आकाश में अनगिनत तारे हैं एवं ये हमसे अनंत दूरी पर स्थित हैं। परिणामस्वरूप इस ‘अनगिनत और अनंत’ के सामने हम घुटने टेक देते हैं। ‘अनादि-अनंत’ जैसे विशेषणों से विभूषित काल्पनिक ईश्वर के प्रति हममें से बहुतों का यही भाव है। परंतु तारों का भौतिक अस्तित्व है और आज हम जानते हैं कि इस भौतिक विश्व में अनादि-अनंत जैसी कोई चीज़ नहीं है। ब्रह्मांड के सारे तारों के सारे अणु-परमाणु भी अनंत नहीं हैं। ‘शून्य’ की तरह ‘अनंत’ का भी इस विश्व में कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है।

आज हम जानते हैं कि तारे कितने बड़े हैं और ये किन तत्वों से बने हैं। तारे सतत क्यों जगमगाते रहते हैं, इसकी जानकारी हमें पिछले करीब 90 वर्षों में ही मिली है। आज हम जानते हैं कि तारों में भीषण उथल-पुथल होती रहती है। ये जन्म लेते हैं, ये तरुण होते हैं, इन्हें बुढ़ापा आता है और अंत में इनकी ‘मृत्य’ भी होती है!

नक्षत्र लोक के बारे में और एक बात। आप स्वयं देख लीजिए, पुराकाल में कल्पित किसी भी ‘अनादि, अनंत और निश्चल’ धारणा का पोषण एवं प्रतिनिधित्व करने के लिए मानव समाज में एक वर्ग-विशेष का उत्थान होता रहा है। जैसे, पुरोहित वर्ग। तारों को जब अनादि, अनंत एवं स्थिर मान लिया गया तो उनकी तरफ से बोलने वाला, मानव-जीवन पर उनके तथाकथित ‘प्रभाव’ की पैरवी करने वाला, एक वर्ग पैदा हो गया – बहुत प्राचीन काल में ही। यह वर्ग है – फलित ज्योतिषियों का वर्ग!

आज हम जानते हैं कि तारे अनादि-अनंत एवं स्थिर तो नहीं ही हैं, बल्कि ये मूक भी नहीं हैं। हालांकि ये स्वयं अपनी बात कहने में असमर्थ हैं। लेकिन इनकी एक वैज्ञानिक भाषा है। इस भाषा को आज हम समझ सकते हैं। यह भाषा है – तारों की किरणों की भाषा। अपनी किरणों के माध्यम से तारे अपने बारे में हम तक जानकारी भेजते रहते हैं। यह जानकारी हमें फलित-ज्योतिषियों की पोथियों में नहीं बल्कि वेधशालाओं की दूरबीनों, वर्णक्रम-दर्शियों, कैमरों आदि से ही प्राप्त हो सकती है।

विश्व की हर चीज़ हर दूसरी चीज़ को प्रभावित करती है। तारे भी पार्थिव जीवन पर अपना ‘प्रभाव’ डालते हैं। उदाहरण के लिए, सूर्य एक तारा है और इसकी प्रत्येक हलचल का पृथ्वी के प्राणी-जगत पर प्रभाव पड़ता है। मानव जीवन पर तारों के प्रभाव को जन्म-कुण्डलियों से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक उपकरणों से जाना जा सकता है।

इस लेख का मकसद यही है कि इन सारे प्रश्नों को सिलसिलेवार समझने की कोशिश की जाए।

तारों की चमक और रंग

रात को आकाश पर एक उड़ती सी नज़र ही आपको बता देगी कि कुछ तारे चमकदार हैं और कुछ धुंधले। कुछ तारों को तो देखना भी मुश्किल होता है और कुछ बल्ब की तरह दमकते हैं। ज़्यादा ध्यान से देखने पर मालूम होता है कि सारे तारे, चाहे धुंधले हों या चमकदार, एक से रंग में नहीं दमकते। कम से कम दो रंग साफ तौर पर अलग-अलग देखे जा सकते हैं – लाल और नीला। ज़्यादा गहराई से अध्ययन करने पर मालूम होगा कि ये रंग नीले से पीले और नारंगी से लाल तक होते हैं। पहले हम इन्हीं दो गुणों को समझने की कोशिश करेंगे।

तारों की चमक – दो तारों की चमक की आपस में तुलना कैसे की जाए? एक 100 वॉट के बल्ब की तुलना टॉर्च के बल्ब से कैसे की जाए? स्वाभाविक रूप से 100 वॉट का बल्ब ‘अपने आप में’ टॉर्च के बल्ब से कहीं ज़्यादा चमकदार होता है। परंतु यदि इस 100 वॉट के बल्ब को आपसे बहुत दूर और टॉर्च को बहुत पास रख दिया जाए तो? तो 100 वॉट के बल्ब की अपेक्षा टॉर्च का बल्ब कहीं अधिक चमकदार दिखेगा। तब आपको यह मानना ही पड़ेगा कि यदि दोनों की वास्तविक चमक की तुलना करना है तो दोनों को देखने वाले से बराबर दूरी पर रखना होगा। इसे हम स्टैण्डर्ड या मानक दूरी कह सकते हैं – यह दूरी कुछ भी तय की जा सकती है, दस मीटर, सौ मीटर या कुछ और। सबसे ज़रूरी बात यह है कि जिन चीज़ों की तुलना करना है उन सब को इस निर्धारित मानक दूरी पर ही रखा जाए।

यही बात तारों पर भी लागू होती है। कुछ तारे वास्तव में तो बहुत चमकदार होते हैं – वे प्रकाश के बहुत शक्तिशाली स्रोत हैं, किंतु हो सकता है कि वे धुंधले दिखें क्योंकि वे हमसे बहुत दूर हैं। कुछ तारे ऐसे भी हो सकते हैं जो वाकई बहुत ज़्यादा चमकदार न हों पर पास होने के कारण तेज़ चमकते दिखें। तारों की इस चमक की तुलना करने के लिए आपको कल्पना करनी होगी कि वे देखने वाले से बराबर की दूरी पर रखने पर कितने चमकेंगे। (क्योंकि आप इन्हें वास्तव में बराबर दूरी पर रख तो सकते नहीं!)। वैसे तो यह दूरी पृथ्वी से नापी जा सकती है परंतु ज़्यादा उपयुक्त यह होगा कि इस दूरी को सूर्य से नापा जाए। खगोलशास्त्रियों ने गणना के लिए यह दूरी पृथ्वी और सूर्य की दूरी से तकरीबन दो लाख गुना (पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी करीब 90 लाख किलोमीटर है) तय की है। गणना के लिए खगोलशास्त्री काल्पनिक तौर पर सारे तारों (जिनकी चमक की तुलना करनी है) को सूर्य से इस मानक दूरी पर रखते हैं। यदि सूर्य सहित इन सभी तारों को इस मानक दूरी पर रखा जाए तो जानते हैं क्या होगा? हमारा सूरज दिखाई देना बंद हो जाएगा। हमारा सूरज भी एक तारा है, और यह वास्तव में न तो बहुत बड़ा है और न ही बहुत चमकदार। आकाश में ऐसे भी तारे हैं जो हमारे सूरज से सैकड़ों गुना बड़े और सैकड़ों गुना चमकदार हैं।

किसी तारे की मानक दूरी पर दिखने वाली चमक ‘परम दीप्तता’ (absolute luminosity) कहलाती है।

तारों का रंग – जैसे कि पहले ही कहा गया है, तारों का रंग नीले से लाल तक कुछ भी हो सकता है (दूसरे शब्दों में इंद्रधनुष के सारे रंगों के तारे देखे जा सकते हैं)। प्रत्येक तारे से आने वाले प्रकाश को स्पेक्ट्रोस्कोप (वर्णक्रमदर्शी) नामक यंत्र की मदद से बारीकी से जांचा जा सकता है। जैसे एक प्रिज़्म सूर्य के प्रकाश के रंगों को अलग-अलग कर देता है, उसी प्रकार वर्णक्रमदर्शी भी प्रत्येक तारों से आने वाले प्रकाश के रंगों को अलग-अलग कर देता है (इस प्रकार के चित्र को,  जिसमें प्रकाश के सारे रंग अलग-अलग दिखते हैं, उस प्रकाश का वर्णक्रम या स्पेक्ट्रम कहते हैं)। यदि सूर्य के प्रकाश को किसी पारदर्शी बॉलपेन (जैसे रोटोमेक या सेलो-ग्रिपर के पेन) में से सफेद सतह पर गिरने दें तो आपको इंद्रधनुष के सारे रंग उसमें दिखेंगे। यही सूर्य के प्रकाश का वर्णक्रम है।

इसी प्रकार की प्रक्रिया वर्णक्रमदर्शी में भी होती है और वर्णक्रम की तस्वीर प्राप्त हो जाती है, जिसका बाद में गहराई से अध्ययन किया जाता है।

अब तक हज़ारों तारों के वर्णक्रमों का अध्ययन किया जा चुका है। आश्चर्य की बात यह है कि इन परिमाणों में गज़ब की समानता पाई जाती है। इन्हीं समानताओं के आधार पर सारे तारों को नौ वर्गों में बांटा जा सकता है – इन वर्गों को रोमन वर्णमाला के अक्षरों O, B, A, F, G, K, M, R, N और I द्वारा दिखाया जाता है। अत: जब तारों की बात करते हैं तो कहते हैं कि अमुक तारा O वर्ग का है या B वर्ग का है। हमारा सूरज G वर्ग का एक नारंगी तारा है।

जब तारों के जन्म और मृत्यु की खोजबीन करनी होती है तो हर एक तारे का अध्ययन करना ज़रूरी नहीं होता। सिर्फ इतना काफी होता है कि एक विशेष वर्ग के कुछ तारों का अध्ययन कर लिया जाए। इससे उस वर्ग में आने वाले अनगिनत तारों के बारे में पर्याप्त जानकारी मिल जाती है। कहने का मतलब यह है कि सारे O वर्ग के तारे एक जैसे होते हैं और उनके परम परिमाण इस हद तक समान होते हैं कि यदि एक वर्ग के सारे तारों को मानक दूरी पर रख दिया जाए तो वे लगभग एक जैसे दिखेंगे – लगभग एक समान वर्णकम, एक समान साइज़, एक समान चमक! सिर्फ लाल तारों में थोड़ी जटिलता होती है। क्योंकि लाल दानव और लाल वामन (रेड ड्वार्फ) दोनों प्रकार के लाल तारे पाए जाते हैं। बहरहाल, हम इन दोनों जटिलताओं को छोड़कर इस बात को ध्यान में रखेंगे कि सारे तारों को समझने के लिए मात्र कुछ प्रतिनिधि तारों को समझना पर्याप्त है। यह बात कि एक ही रंग के तारे एक बराबर वास्तविक चमक वाले होते हैं, दो भौतिक शास्त्रियों आयनार हर्ट्ज़स्प्रन्ग और हेनरी नॉरिस रसेल ने खोजी थी।

तारों का जीवन चक्र

करीब डेढ़ सौ साल पहले तक यह मालूम नहीं था कि तारे जन्म लेते हैं और मरते हैं। कोई तारा करोड़ों सालों तक ज़िंदा रह सकता है, पर एक दिन ऐसा आता है जब उसका ऊर्जा का स्रोत चुक जाता है। और तब वह या तो फूट सकता है या एक ठंडे, शांत, काले पिंड में परिवर्तित हो सकता है।

जब खगोलशास्त्री दूरदर्शी से आकाश का अध्ययन करते हैं तो वे न सिर्फ अनगिनत तारे देखते हैं बल्कि हाइड्रोजन नामक गैस का धब्बों के रूप में वितरण भी देखते हैं, जिन्हें वे ‘बादल’ कहते हैं। हमारे वातावरण के बाहर की सारी जगह, जिसे अंतरिक्ष कहते हैं, इसी हाइड्रोजन गैस से भरी है। किंतु गैस का घनत्व अविश्वसनीय रूप से कम है – करीब एक परमाणु प्रति घन सेंटीमीटर (जो कि करीब-करीब निर्वात ही है)। इसका अर्थ है कि एक गिलास में करीब 20 परमाणु आएंगे, जबकि सामान्य वातावरण में उसी गिलास में अरबों परमाणु होते हैं। परंतु अंतरिक्ष इतना विस्तृत है कि इतने कम घनत्व पर भी उसमें अरबों तारे बनाने के लिए पर्याप्त पदार्थ मौजूद हैं। कहीं-कहीं यह घनत्व ज़्यादा भी होता है – करीब 10 से 100 परमाणु प्रति घन सेंटीमीटर। अब, सवाल उठता है कि अंतरिक्ष में कौन सी शक्ति इन बादलों को स्थिरता देती है? इनके कण खुद एक-दूसरे को केंद्र की तरफ खींचते हैं और इसलिए इन्हें स्व-गुरुत्वाकर्षण जनित कहा जाता है। ये ‘बादल’ काफी स्थिर होते हैं और लाखों साल तक एक जैसे बने रहते हैं परंतु समय-समय पर कुछ भौतिक क्रियाएं इन्हें सिमटने पर मजबूर कर देती हैं। इन प्रक्रियाओं को भली-भांति समझा नहीं जा सका है। जब कोई गैस गर्म की जाती है तो वह फैलती है और जब ठंडी की जाती है तो सिकुड़ती है। इसके विपरीत जब गुरुत्वाकर्षण शक्ति ज़्यादा होती है तो कोई भी वस्तु सिकुड़ती है और जब गुरुत्वाकर्षण शक्ति कम होती है तो वस्तु फैलती है।

अभी तक प्राप्त जानकारी के अनुसार इन ‘बादलों’ में केंद्र की तरफ खींचने वाली शक्ति (गुरुत्वाकर्षण) और उनके तापमान के बीच एक संतुलन होता है। तापमान के कारण बादल फैलने की कोशिश करते हैं। और गुरुत्वाकर्षण के कारण सिकुड़ने की। जब इन दो शक्तियों में संतुलन होता है तो ‘बादल’ स्थिर रहता है। जब बादल ठंडा होता है और उसका तापमान कम होने लगता है तो वह गुरुत्वाकर्षण के कारण सिकुड़ने लगता है। जब यह सिकुड़न शुरू होती है, तो बादल का तापमान बढ़ने लगता है। इसी के साथ-साथ ‘बादल’ छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटता है और ये टुकड़े अपने आप में सिकुड़ते हैं। इस प्रकार से सिकुड़ते हुए टुकड़े एक हल्की लाल आभा से दमकते हैं। इस लाल आभा को पृथ्वी पर विशेष उपकरणों द्वारा देखा जा सकता है और जब यह देखी जाती है तो कहा जाता है कि एक नए तारे का प्रादुर्भाव हो रहा है।

सवाल यह उठता है कि यह सिकुड़ना कब तक जारी रहेगा? एक विशेष अवस्था आएगी जब अंदर के द्रव्य का तापमान इतना बढ़ जाएगा कि वहां उपस्थित हाइड्रोजन परमाणु एक-दूसरे से रासायनिक रूप से जुड़ने लगेंगे। इस क्रिया को संलयन (fusion) कहते हैं। इसमें हाइड्रोजन के चार परमाणुओं के केंद्रक मिलकर हीलियम नामक एक नया तत्व बनाते हैं। हाइड्रोजन के इस प्रकार हीलियम में बदलने की प्रक्रिया के दौरान निहायत बड़ी मात्रा में ऊर्जा निकलती है (यही प्रक्रिया हाइड्रोजन बम में भी होती है)। यह गर्मी जो केंद्र में उत्पन्न होती है वह गैस को फैलने पर मजबूर करती है और सिकुड़ना रुक जाता है। अब फिर एक संतुलन स्थापित हो गया है – गर्मी के कारण फैलने और गुरुत्वाकर्षण के कारण सिकुड़ने की प्रक्रिया के बीच। इस अवस्था में तारा स्थिर हो जाता है और कहा जाता है कि वह अपने जीवनचक्र के मुख्यक्रम की अवस्था में पहुंच गया है। इस प्रकार से केंद्र की गर्मी और गुरुत्वाकर्षण के बीच का संतुलन बहुत महत्वपूर्ण है। केंद्र में जो भी गर्मी पैदा होती है वह तारे की सतह से अंतरिक्ष में बिखेर दी जाती है (इस क्रिया को विकिरण कहते हैं)। धीरे-धीरे तारे के केंद्र में गर्मी कम हो जाती है। जब यह गर्मी बहुत ही कम हो जाती है तो गुरुत्वाकर्षण के साथ इसका संतुलन खत्म हो जाता है। ऐसी स्थिति में गुरुत्वाकर्षण का बल फिर तारे को सिकुड़ने पर मजबूर करता है। कई बार यह प्रकिया बहुत तेज़ी से हो सकती है। इसके विपरीत, यदि केंद्र में इतनी ज़्यादा शक्ति या गर्मी पैदा हो रही है जो तारे की सतह से विकिरण द्वारा अंतरिक्ष में नहीं बिखेरी जा सकती तो भी संतुलन समाप्त हो जाता है, किंतु इस बार तारा गर्मी के कारण फैलता है और कई बार इतनी तेज़ी से फैलता है कि फट पड़ता है।

किसी तारे के केंद्र में हाइड्रोजन का विपुल भंडार होता है। और इसे धीरे-धीरे हीलियम में बदला जाता है। इस तरह से कोई तारा करोड़ों वर्षों तक ऊर्जा के स्रोत के रूप में चमकता रह सकता है। हमारा सूरज इस वक्त अपनी मुख्यक्रम अवस्था में है। यह ‘बादलों’ से करोड़ों वर्ष पहले बना था और करोड़ों वर्ष तक चमकता रहेगा।

तारे के जीनव चक्र में आगे की कहानी इस बात पर निर्भर करेगी कि उसकी संहति क्या है। (मोटे-मोटे शब्दों में उसके वज़न पर निर्भर करेगी)।

बहुत बड़े तारे – हमारे सूरज से सौ गुना बड़े तारों को ‘बहुत बड़े तारे’ कहते हैं। ये चमकदार, O और B वर्ग के तारे हैं जिन्हें नीले दानव कहा जाता है। ये अंतरिक्ष में इतनी ऊर्जा बिखेरते हैं कि इनकी ऊर्जा का स्रोत (केंद्र में हाइड्रोजन का भंडार) बहुत जल्दी समाप्त हो जाएगा – मात्र 10-20 करोड़ वर्षों में। यह वैसा ही है जैसे समुद्र को इतनी तेज़ी से खाली किया जाए कि वह सूख जाए। एक छोटी टंकी ज़्यादा देर तक चलेगी यदि उसका पानी धीरे-धीरे उपयोग किया जाए। 10-20 करोड़ वर्षों के बाद सारी हाइड्रोजन समाप्त हो जाएगी तो क्या होगा? केंद्र का तापमान धीरे-धीरे कम होने लगेगा और इसके साथ ही साथ अंदर की गैस के फैलने से जो दवाब उत्पन्न होता है वह भी कम होगा। ऐसी स्थिति में खुद के गुरुत्वाकर्षण के कारण तारा सिकुड़ने लगेगा। पर इसके साथ ही (जैसा पहले भी हुआ था) केंद्र का तापमान बढ़ेगा और इस बार हीलियम (हाइड्रोजन तो है नहीं) के परमाणुओं के बीच रासायनिक क्रिया आरंभ हो जाएगी। इस क्रिया में हीलियम के तीन परमाणु मिलकर कार्बन नामक पदार्थ का एक परमाणु बनाएंगे। इस क्रिया में भी बहुत सारी ऊर्जा निकलती है। इस ऊर्जा के कारण तापमान बढ़ेगा और यह बढ़ता तापमान तारे की सिकुड़ने की प्रक्रिया को रोक देगा। परंतु बहुत बड़े तारे में यह स्थिति थोड़ी देर ही रहेगी क्योंकि सारी हीलियम जल्दी ही कार्बन में तबदील हो जाएगी। फिर से वही कहानी दोहराई जाएगी किंतु ज़्यादा रफ्तार से। कार्बन के परमाणु मिलकर और भारी तत्व बनाएंगे। इस सारी प्रक्रिया के दौरान इतनी ज़्यादा ऊर्जा पैदा होगी कि उसे तारे की सतह से धीरे-धीरे बिखेरना असंभव हो जाएगा। और ऐसी स्थिति में गर्मी और गुरुत्वाकर्षण का संतुलन इस कदर बिगड़ेगा कि तारे में ज़बरदस्त विस्फोट होगा। विस्फोट हज़ारों सूर्य की चमक के बराबर चमक पैदा करेगा और हो सकता है कि पृथ्वी पर भी दिखे। इस प्रकार का एक विस्फोट चीनवासियों ने पंद्रहवी शताब्दी में देखा था। ऐसे विस्फोट को सुपरनोवा विस्फोट कहते हैं। ऐसे सुपरनोवा विस्फोट में करोड़ों टन गैस अंतरिक्ष में छोड़ी जाएगी और यह अंतरिक्ष में पहले से उपस्थित गैस के साथ घुल-मिल जाएगी। इस गैस के द्वारा ही तारों की अगली पीढ़ी निर्मित होगी। इस नए तारे का जीवन चक्र मुख्यत: इस मिश्रण के तत्वों पर निर्भर करेगा, खास तौर से भारी तत्वों पर। तारे का बचा हुआ केंद्रीय भाग धीरे-धीरे एक ठंडे मृत पिंड में बदल जाएगा। इस बचे हुए भाग में ऊर्जा पैदा करने के लिए कोई ईंधन नहीं है, इसलिए यह अपने गुरुत्वाकर्षण के कारण सिकुड़ता ही जाएगा। और इस कदर सिकुड़ेगा कि इसका घनत्व बहुत ही ज़्यादा हो जाएगा। इतने अधिक घनत्व के कारण इसका गुरुत्वाकर्षण बहुत बढ़ जाएगा और यह अपने आसपास की हर चीज़ को आकर्षित करेगा। इसका गुरुत्वाकर्षण इतना तीव्र होगा कि जो भी चीज़ इस पर पड़ेगी वापस नहीं लौटेगी – यहां तक कि प्रकाश भी! चूंकि इससे कोई प्रकाश नहीं निकलेगा, इसलिए यह अदृश्य हो जाएगा। ऐसे पिंड को ब्लैकहोल या न्यूट्रॉन तारा कहते हैं।

छोटे तारे – ये वे तारे हैं जिनकी मात्रा लगभग सूर्य के बराबर होती है। इनका जीवनचक्र करीब-करीब वैसा ही होता है जैसा बहुत बड़े तारों का। अंतर इतना है कि ये ज़्यादा लंबे समय तक जीवित रहेंगे और इनका हाइड्रोजन भंडार धीरे-धीरे खत्म होगा। जब सारी हाइड्रोजन हीलियम में बदल जाएगी तो सिकुड़ना शुरु होगा; किंतु सारी प्रक्रिया में उत्पन्न ऊर्जा और बिखेरी गई ऊर्जा के बीच एक संतुलन बना रहेगा। अत: विस्फोट नहीं होगा।

छोटे तारों के विकास में एक विशेष गुण होता है। जब केंद्रीय भाग में हीलियम का संलयन (दहन) शुरु होता है तो इस प्रकिया के दौरान उत्पन्न गर्मी के कारण तारे का बाहरी भाग फैलना शुरू करता है और साथ ही साथ ठंडा होता है। इसके फलस्वरूप तारा एक फूला हुआ लाल दानव बन जाता है। यदि हमारे सूरज के साथ ऐसा हुआ तो हमारे सूरज का बाहरी हिस्सा पृथ्वी तक पहुंच जाएगा। यद्यपि यह बाहरी हिस्सा ‘अपेक्षाकृत ठंडा’ होगा, फिर भी यह धरती का तापमान कुछ हज़ार डिग्री सेल्सियस बढ़ा देगा और यह तापक्रम इतना होगा कि धरती वाष्प बनकर अंतरिक्ष में उड़ जाएगी! पर ऐसा होने में अभी कई करोड़ वर्ष बाकी हैं। और जिस तरह मानव जाति चल रही है वह अपने विनाश का कोई अन्य रास्ता इस घटना के पहले स्वयं ही ढूंढ लेगी।

यह लाल दानव धीरे-धीरे अपने केंद्र के हीलियम का स्रोत समाप्त कर देगा और फिर गुरुत्वाकर्षण के कारण सिकुड़ने लगेगा। और इतना सिकुड़ेगा कि पृथ्वी से भी छोटा हो जाएगा। ऐसी अवस्था में इसके अंदर का पदार्थ बहुत ही दबाव की स्थिति में रहेगा। इसका घनत्व बहुत ज़्यादा बढ़ जाएगा। ऐसे तारों को श्वेत वामन (व्हाइट ड्वार्फ) कहते हैं, जो करीब-करीब अदृश्य होते हैं।

इस प्रकार से तारों की कहानी खत्म होती है, फिर शुरू होने के लिए। यह पूरी प्रक्रिया कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया है। (स्रोत फीचर्स)

दो शब्द…

1937 में मुंबई (तत्कालीन बंबई) में जन्मे डॉ. मॉइज़ रस्सीवाला विज्ञान के अध्यापन व लोकप्रियकरण में सक्रिय रहे। बंबई विश्वविद्यालय से भौतिकी में स्नातक उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने हाइडेलबर्ग (जर्मनी) से स्नातकोत्तर उपाधि पूरी की। इसके बाद वे अल्जीरिया, फ्रांस वगैरह के कई विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में अध्यापन व शोध कार्य में जुटे रहे। उनका प्रिय विषय खगोल-भौतिकी रहा।

विज्ञान शिक्षा में रुचि के चलते 1970 के दशक में वे होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम) स्थित संस्था किशोर भारती में होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम के प्रारंभिक विकास में शरीक रहे। कुछ अंतराल के बाद वे एकलव्य संस्था में आए और उज्जैन केंद्र के प्रभारी के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंतत: वे फ्रांस में बस गए। अपने लंबे फलदायी कार्यकाल में उन्होंने कई शोध पत्र लिखे और लगभग सात किताबों का लेखन किया।

विगत 21 जून को वे इस दुनिया से रुखसत हो गए और अपने पीछे अपने लेख, शोध कार्य, किताबों और सौम्यता की विरासत छोड़ गए।

यहां प्रकाशित उनका यह लेख मूलत: पिपरिया में आयोजित ‘विज्ञान व्याख्यानमाला’ शृंखला का पहला व्याख्यान है। उनके इस व्याख्यान को ‘होशंगाबाद विज्ञान बुलेटिन’ के जनवरी-फरवरी 1985 के अंक में प्रकाशित किया गया था।

बढ़ता तापमान फफूंदों को खतरनाक बना सकता है

चीनी शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन से पता चला है कि जैसे-जैसे पृथ्वी गर्म हो रही है, फफूंद जन्य रोग मानव स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा साबित हो सकते हैं। अध्ययन के दौरान दो रोगियों में एक ऐसी फफूंद पाई गई जो पहले मनुष्यों को संक्रमित नहीं करती थी। इस फफूंद में न केवल दो आम फंफूद-रोधी दवाओं के प्रति प्रतिरोध विकसित हो गया था बल्कि उच्च तापमान के संपर्क में आने पर तीसरी दवा के प्रति भी जल्द प्रतिरोध विकसित हो गया, जिससे यह लगभग असाध्य हो गई।

आम तौर पर बैक्टीरिया या वायरस की तुलना में फफूंद मनुष्यों को कम ही बीमार करती है। मानव प्रतिरक्षा प्रणाली फफूंद से प्रभावी रूप से लड़ती है और शरीर का तापमान उन्हें पनपने भी नहीं देता है। लेकिन, पिछले कुछ समय में फफूंद संक्रमणों में वृद्धि हुई है जिसका एक कारण एचआईवी और प्रतिरक्षा-शामक दवाओं के कारण लोगों की कमज़ोर होती प्रतिरक्षा प्रणाली है। और अब, नए दवा प्रतिरोधी फफूंद संक्रमण सामने आए हैं जो काफी चिंताजनक है।

एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय फफूंद को मानव शरीर तापमान के प्रति अनुकूलित होने और दवा प्रतिरोध विकसित करने में मदद कर सकता है? इसे समझने के लिए शोधकर्ताओं ने 2009 से 2019 तक चीन के 96 अस्पतालों में रोगियों से नमूने एकत्र किए, जिसमें उन्होंने दो रोगियों में एक प्रकार की खमीर रोडोस्पोरिडियोबोलस फ्लुविएलिस (आर. फ्लुविएलिस) पाई। दोनों रोगी परस्पर असम्बंधित थे। ये गंभीर रूप से बीमार हुए थे और दवा प्रतिरोधी फफूंद से संक्रमित थे। बाद में इनकी मृत्यु हो गई।

फफूंद द्वारा स्तनधारियों को संक्रमित करने की क्षमता का पता लगाने के लिए, शोधकर्ताओं ने इसे कमज़ोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले चूहों में इंजेक्ट किया। इससे चूहे बीमार हो गए, और कुछ फफूंद तो उत्परिवर्तित होकर अधिक आक्रामक भी हो गई। शोधकर्ताओं ने पाया कि 37 डिग्री सेल्सियस (मानव शरीर का सामान्य तापमान) पर संवर्धित फफूंदों में उन फफूंदों की तुलना में 21 गुना तेज़ी से उत्परिवर्तन हुए जिन्हें 25 डिग्री सेल्सियस पर संवर्धित किया गया था। इसके अलावा, 37 डिग्री सेल्सियस पर फफूंद-रोधी दवा एम्फोटेरिसिन बी के संपर्क में आने वाली फफूंदों में प्रतिरोध भी अधिक तेज़ी से विकसित हुआ।

बहरहाल, वर्तमान परिस्थिति में इसके प्रभाव का सामान्यीकरण करना थोड़ी जल्दबाज़ी होगी, लेकिन विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस पैटर्न को समझने के लिए अधिक उच्च तापमान पर जांच करना होगा। हालांकि आर. फ्लुविएलिस से तत्काल मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा तो नहीं है, लेकिन ये परिणाम इस क्षेत्र में और अधिक शोध की आवश्यकता दर्शाते हैं।

चाइनीज़ अकेडमी ऑफ साइंसेज़ के माइक्रोबायोलॉजिस्ट लिंकी वांग के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग अधिक खतरनाक रोगजनक फफूंदों के विकसित होने में भूमिका निभा सकता है। ज़ाहिर है इस विषय में सतर्कता एवं अधिक अध्ययन की ज़रूरत है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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हाथी एक-दूसरे को नाम से पुकारते हैं

क अभूतपूर्व अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने पाया है कि हाथी एक-दूसरे को संबोधित करने के लिए विशिष्ट नामों का उपयोग करते हैं। अभी तक ऐसे व्यवहार को मनुष्यों के लिए अद्वितीय माना जाता था। हालांकि डॉल्फिन और तोतों के बारे में यह देखा गया है कि वे अपने साथियों द्वारा निकाली गई ध्वनि की नकल करके उन्हें पुकारते हैं, लेकिन हाथी अपने झुंड के प्रत्येक सदस्य के लिए विशिष्ट ध्वनि का उपयोग करते हैं।

इस अध्ययन में शोधकर्ताओं की एक अंतर्राष्ट्रीय टीम ने कृत्रिम बुद्धि (एआई) का उपयोग करके केन्या स्थित अफ्रीकी सवाना हाथियों के दो जंगली झुंडों की आवाज़ों का विश्लेषण किया। उन्होंने 469 अलग-अलग आवाज़ों की पहचान की, जिसमें 101 ध्वनि संकेत हाथियों द्वारा उत्पन्न किए गए थे और 117 प्राप्त ध्वनि संकेत शामिल थे। नेचर इकॉलॉजी एंड इवॉल्यूशन में प्रकाशित इस अध्ययन से पता चलता है कि हाथी अपने नाम की पुकार को पहचानते हैं और उनका जवाब देते हैं। वे अन्य को दी जा रही पुकार को अनदेखा कर देते हैं। यह मनुष्यों के समान अमूर्त विचारों के परिष्कृत स्तर का संकेत देता है।

इसके अवाला शोधकर्ताओं ने केन्या स्थित सांबुरु नेशनल रिज़र्व और एम्बोसेली नेशनल पार्क से 1986 और 2022 के बीच रिकॉर्ड की गई हाथियों की ‘चिंघाड़’ ध्वनियों का विश्लेषण करके पाया कि नामों का इस्तेमाल अक्सर लंबी दूरी पर और ज़्यादातर वयस्कों द्वारा शिशु हाथियों को संबोधित करने के लिए किया जाता था। नन्हे हाथियों की तुलना में वयस्कों द्वारा नामों के अधिक उपयोग से लगता है कि इस कौशल में महारत हासिल करने में वर्षों लगते होंगे।

अध्ययन से पता चला कि सबसे आम आवाज़ कम आवृत्ति की संगीतमय ध्वनि होती है। जब हाथियों ने अपने किसी करीबी द्वारा पैदा की गई अपने नाम की रिकॉर्डिंग सुनी, तो उनकी प्रतिक्रिया अधिक उत्साहपूर्ण थी।

इस अध्ययन के वरिष्ठ लेखक जॉर्ज विटमायर इस खोज के आधार पर बताते हैं कि एक-दूसरे के लिए नाम गढ़ना मनुष्यों और हाथियों में ही नज़र आता है, जो अमूर्त विचार की उन्नत क्षमता का द्योतक है।

‘सेव दी एलीफेंट्स’ के सीईओ फ्रैंक पोप का कहना है कि सारे अंतरों के बावजूद मनुष्यों और हाथियों के बीच विस्तृत सामाजिक ताने-बाने की उपस्थिति जैसी समानताएं भी हैं जो एक विकसित दिमाग का प्रमाण है। यह अध्ययन हाथियों के बीच संवाद को समझने की शुरुआत मात्र है और जैव विकास में नामकरण की उत्पत्ति का अध्ययन करने के लिए नए रास्ते खोलता है तथा हाथियों की गहन संज्ञानात्मक क्षमताओं को और उजागर करता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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अंतत: अमेरिका में एस्बेस्टस पर प्रतिबंध लगाया गया

मेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) ने कई वर्षों की जद्दोज़हद के बाद मार्च 2024 से एस्बेस्टस के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध की घोषणा की है। यह घोषणा एक आश्चर्य के रूप में सामने आई। सब मानते आए थे कि एस्बेस्टस पर प्रतिबंध तो पहले से ही लगा हुआ था, और 1970 के दशक से ही इसे अमरीकी स्कूलों और अस्पतालों से हटा दिया गया था।

गौरतलब है कि एस्बेस्टस प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला खनिज है जो गर्मी और आग की लपटों के प्रति प्रतिरोधी है, लेकिन यह अत्यधिक ज़हरीला है और कैंसर का कारण बनता है। 1898 में, ब्रिटिश फैक्ट्री इंस्पेक्टर लूसी डीन ने एस्बेस्टस निर्माण को श्रमिकों के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बताया था। 1927 तक, ‘एस्बेस्टोसिस’ शब्द का इस्तेमाल एस्बेस्टस श्रमिकों में आम तौर पर होने वाली फेफड़ों की एक गंभीर बीमारी के लिए किया जाने लगा। 1960 के दशक में कई अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ कि एस्बेस्टस के संपर्क में आने से न केवल एस्बेस्टोसिस होता है, बल्कि फेफड़ों का कैंसर, मेसोथेलियोमा और अन्य प्रकार के कैंसर भी होते हैं। और तो और, शोध से यह भी पता चला कि एस्बेस्टस का कोई सुरक्षित स्तर नहीं है।

इन निष्कर्षों के बावजूद, सरकारों को कार्रवाई करने में कई साल लग गए। 1970 के दशक में, कई देशों ने एस्बेस्टस पर प्रतिबंध लगाना शुरू कर दिया था। 2020 तक, कम से कम 67 देशों ने प्रतिबंध लागू किए थे। लेकिन अमेरिका ने अब तक केवल आंशिक प्रतिबंध ही लगाए थे। भारत में 1993 में एस्बेस्टस खनन पर प्रतिबंध लगाने के बावजूद, इसके उत्पादन, आयात या व्यापार में इसके उपयोग को प्रतिबंधित करने के लिए कोई कानून नहीं है। वर्तमान में भारत एस्बेस्टस निर्मित उत्पादों का निर्यात भी करता है।

अमेरिका में देरी के लिए कई कारकों को ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है। इसमें 1980 के दशक से उद्योग जगत द्वारा प्रतिबंध के विरोध और यूएस में व्याप्त नियमन विरोधी आम रवैये ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1989 में, EPA ने विषाक्त पदार्थ नियंत्रण अधिनियम (TOSCA) के तहत अधिकांश एस्बेस्टस उत्पादों पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की, लेकिन इस नियम को करोज़न प्रूफ फिटिंग्स नामक एक कंपनी और अन्य व्यापार संघों द्वारा अदालत में चुनौती दी गई। हालांकि, अदालत व्यापार संघों द्वारा दिए गए कम लागत के झूठे दावों से सहमत नहीं थी, लेकिन EPA द्वारा अपनाए गए तरीके के साथ भी प्रक्रियात्मक मुद्दे पाए गए। इसके नतीजे में EPA ने एक नया और व्यापक प्रतिबंध नहीं लगाया। इसकी बजाय, उसने छोटे-छोटे मामलों पर ध्यान दिया, जिसने स्कूलों को एस्बेस्टस का प्रबंधन करने में मदद की, लेकिन इसे पूरी तरह से खत्म नहीं किया।

इसके अलावा, तंबाकू उद्योग के समान एस्बेस्टस उद्योग ने एस्बेस्टस के नुकसान के प्रमाणों को शंकास्पद साबित करने का प्रयास किया। शोधकर्ताओं को बदनाम किया गया और कहा गया कि केवल कुछ प्रकार के एस्बेस्टस ही खतरनाक हैं। अलबत्ता, 2016 के बाद संसद ने TOSCA में संशोधन किया, जिससे व्यापक प्रतिबंध लगाने का रास्ता खुल गया। नया एस्बेस्टस प्रतिबंध, संशोधित कानून के तहत जारी पहला नियम है।

गौरतलब है कि एस्बेस्टस का प्रभाव काफी विनाशकारी रहा है। वाशिंगटन विश्वविद्यालय के स्वास्थ्य मापन और मूल्यांकन संस्थान का अनुमान है कि 2019 में एस्बेस्टस के कारण करीब 40,764 श्रमिकों की मृत्यु हुई। यू.एस. रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र ने 1999 और 2015 के बीच 45,221 मेसोथेलियोमा से हुई मौतों को दर्ज किया। जबकि 20वीं सदी में, सिर्फ यू.एस. में एस्बेस्टस के कारण लगभग 1.7 करोड़ व्यावसायिक मौतें और 20 लाख गैर-व्यावसायिक मौतें हुई हैं।

हालिया प्रतिबंध एक महत्वपूर्ण कदम है। एस्बेस्टस पर प्रतिबंध के लिए चला लंबा संघर्ष दर्शाता है कि वैज्ञानिक निष्कर्षों को कुशलतापूर्वक और प्रभावी ढंग से नीति का रूप देना कितना महत्वपूर्ण और कठिन है। बहरहाल, यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि कोई भी हानिकारक पदार्थ प्रतिबंधित होने से पहले सदियों तक इस्तेमाल न होता रहे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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विचित्र बैक्टीरिया नए जीन्स बनाते हैं

म तौर पर जेनेटिक सूचना एक ही दिशा में बहती है – डीएनए नामक अणु में जीन्स होते हैं, ये जीन्स एक सांचे की तरह काम करते हैं और एक अन्य अणु आरएनए का निर्माण करते हैं और आरएनए प्रोटीन बनवाता है। डीएनए से आरएनए बनने की प्रक्रिया को ट्रांसक्रिप्शन कहते हैं और यह जिन एंज़ाइमों के दम पर चलती है उन्हें ट्रांसक्रिप्टेस कहते हैं। यह सीधी-सरल कथा 1970 में पेचीदा हो गई। उस साल वैज्ञानिकों ने खोजा कि कुछ वायरसों में रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेस नामक एंज़ाइम होता है। और यह एंज़ाइम उपरोक्त एकदिशीय प्रक्रिया को उल्टा चला सकता है यानी आरएनए से डीएनए बनवा सकता है।

अब नई खोज से इसमें एक और पेंच आ गया है। रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेस का बैक्टीरिया संस्करण खोजा गया है। यह आरएनए अणु का इस्तेमाल सांचे के रूप में करके डीएनए में सर्वथा नए जीन्स जोड़ सकता है। ट्रांसक्रिप्शन के ज़रिए ये जीन फिर से आएनए में बदल सकते हैं और प्रोटीन का निर्माण करवा सकते हैं। ऐसे प्रोटीन का निर्माण तब किया जाता है जब कोई वायरस बैक्टीरिया को संक्रमित कर दे। यहां बताना मुनासिब है कि वायरस का रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेस नए जीन्स का निर्माण नहीं करता; वह तो मात्र आरएनए में लिखी सूचना को डीएनए में बदलता है।

एक मायने में यह बैक्टीरिया के सुरक्षा तंत्र का हिस्सा है। वायरस संक्रमण के विरुद्ध बैक्टीरिया की एक और सुरक्षा व्यवस्था होती है जो आजकल क्रिस्पर नामक जीन संपादन तकनीक के रूप में मशहूर है। इस तकनीक से बैक्टीरिया वायरस के डीएनए/आरएनए के कुछ अंशों को अपने डीएनए में जोड़ लेता है और फिर ये उस वायरस की पहचान में काम आते हैं।

जिस नई व्यवस्था की खोज हुई है वह थोड़ी ज़्यादा रहस्यमय है। इस तंत्र की कार्यविधि का खुलासा कोलंबिया विश्वविद्यालय के स्टीफन टैंग और सैमुअल स्टर्नबर्ग ने किया है। यह देखा गया था कि कतिपय बैक्टीरिया के डीएनए में एक जीन होता है जो रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेस का कोड होता है और आरएनए का छोटा-सा खंड होता है जिसका कोई प्रकट काम नहीं होता यानी यह किसी प्रोटीन का निर्माण नहीं करवाता। टैंग और स्टर्नबर्ग ने क्लेबसिएला न्यूमोनिए (Klebsiella pneumoniae) में रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेस द्वारा बनाए गए डीएनए अणु की तलाश की। पता चला कि यह डीएनए की अति दीर्घ शृंखला थी जिसमें एक सरीखे खंड बार-बार दोहराए गए थे और प्रत्येक खंड का अनुक्रम उस रहस्यमय आरएनए के खंडों से मेल खाता था।

ऐसा कैसे होता है? शोधकर्ताओं का मत है कि लंबे-लंबे आरएनए सूत्र मुड़कर हेयरपिन का आकार ग्रहण कर सकते हैं। ऐसा होने पर एक ही शृंखला के दो दूर-दूर के खंड पास-पास आ जाते हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि क्लेबसिएला न्यूमोनिए का ट्रांसक्रिप्टेस इस आरएनए शृंखला को डीएनए में तबदील करते समय बार-बार उसी स्थान की नकल बनाता है और इस तरह दोहराव वाली डीएनए शृंखला बन जाती है।

इस तरह बनी दोहराव वाली शृंखला प्रोटीन-कोडिंग शृंखला बन जाती है जिसमें प्रोटीन निर्माण के समापन को दर्शाने वाला कोई संकेत नहीं होता – इसलिए इसे ओपन रीडिंग फ्रेम कहते हैं और शोधकर्ताओं ने इस शृंखला को नाम दिया है नेवर एंडिंग ओपन रीडिंग फ्रेम (neo – नीयो)। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि वायरस का संक्रमण नीयो प्रोटीन के निर्माण को प्रेरित करता है। इस प्रोटीन का असर यह होता है कि उस प्रोटीन से युक्त कोशिका विभाजन करना बंद कर देती है। इससे तो लगता है कि यह उस कोशिका के लिए एक नया प्रोटीन है। अर्थात यहां रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेस की मदद से एक सर्वथा नया जीन बैक्टीरिया के जीनोम में जुड़ रहा है। यह खोज जीव विज्ञान में एक नई कार्य प्रणाली की उपस्थिति का संकेत है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जैव विकास का चक्र

हाल ही में साइन्स एडवांसेस में प्रकाशित एक अध्ययन में एक कीट की विभिन्न आबादियों का 10 वर्षों तक अध्ययन करके इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि कैसे जैव विकास के चक्र का नियमन होता है।

स्टिक इंसेक्ट नामक यह कीट (Timema cristinae) कैलिफोर्निया के जंगलों में बहुतायत में पाया जाता है। वहां यह तीन रूपों में मिलता है और तीनों रूप अपने परिवेश में ओझल होने में सक्षम होते हैं। एक रूप सादा हरा होता है और लिलैक की पत्तियों के बीच आसानी से छिप जाता है। इसी के एक रूप पर सफेद धारियां होती हैं और यह वहां के जंगलों में पाई जाने वाली सदाबहार चैमाइज़ झाड़ियों में छिपता है। तीसरा रूप गहरे रंग का होता है और दोनों वनस्पतियों पर पाया जाता है लेकिन इसका गहरा रंग जंगल के फर्श से ज़्यादा मेल खाता है।

अध्ययन के दौरान सबसे पहली बात तो यह स्पष्ट हुई कि जिन 10 आबादियों का अध्ययन किया गया था उनमें हरे रंग वाला कीट लिलैक बहुल इलाकों में ज़्यादा पाया जाता है जबकि धारीदार रूप चैमाइज़ इलाकों में। गहरे रंग वाला कीट कम मिलता है और दोनों ही तरह के पेड़ों पर मिलता है। यह तो कोई अचरज की बात नहीं थी लेकिन फ्रांस की राष्ट्रीय शोध संस्था सीएनआरएस के पैट्रिक नोसिल और उनके साथियों द्वारा किए गए इस अध्ययन का अगला अवलोकन चौंकाने वाला था।

देखा यह गया कि सारी 10 आबादियों में उपरोक्त अनुपात साल-दर-साल एक चक्र के रूप में बदलता है जिसका पूर्वानुमान किया जा सकता है। 10 साल के इस अध्ययन में देखा गया कि जो रूप एक वर्ष प्रचुरता में पाया जाता है, वह अगले वर्ष कम हो जाता है – जैसे, यदि किसी वर्ष धारीदार कीट अधिक संख्या में हैं तो अगले वर्ष सादे हरे रंग वाले कीट का बोलबाला होगा। गहरे रंग वाले कीटों की संख्या अपेक्षाकृत स्थिर बनी रही।

नोसिल की टीम ने कीट-रूपों को यहां-वहां बसाकर उनके अनुपात को बदलकर भी देखा। इस प्रयोग से उनका निष्कर्ष है कि किसी कीट-रूप के लिए बिरला होना फायदेमंद होता है। शायद इसलिए कि पक्षी अपने भोजन में उन कीटों को प्राथमिकता देते हैं जो प्रचुरता से उपलब्ध हों, जिसके चलते अगली पीढ़ी में उनकी संख्या कम हो जाती है। तब पक्षी अपना शिकार बदल देते हैं और चक्र चलता रहता है। जीव वैज्ञानिक इसे प्रचुरता-आधारित नकारात्मक चयन कहते हैं। यह कई प्रजातियों में देखा गया है।

कीटों के जेनेटिक विश्लेषण में पाया गया कि उनके पैटर्न में परिवर्तन उनके जीनोम में व्यापक उलट-पलट के ज़रिए होता है। दरअसल पर्यावरण के असर से ऐसे फेरबदल पहले भी रिपोर्ट किए गए हैं। जैसे स्टिकलबैक नामक मछलियां जब खारे पानी से मीठे पानी की ओर जाती हैं, तो उन सबमें एक से जेनेटिक परिवर्तनों के ज़रिए एक-से शारीरिक व कार्यिकीय परिवर्तन होते हैं। यह भी देखा गया है कि कतिपय एंटीबायोटिक के संपर्क में आने पर बैक्टीरिया जीवित रहने के लिए एक-से जेनेटिक परिवर्तनों का सहारा लेते हैं। खास बात यह है कि वर्तमान अध्ययन में इसे प्राकृतिक परिस्थितियों में देखा गया है। (स्रोत फीचर्स)

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छलांग लगाती जोंक

जोंक अपने चिपकूपने के लिए जानी जाती हैं। लेकिन शोधकर्ताओं द्वारा हाल ही में खोजी गई एक जोंक प्रजाति की खासियत है हवा में छलांग लगाना।

मेडागास्कर में खोजी गई यह जोंक (Chtonobdella fallax) यहां काफी पाई जाती है। शोधकर्ता बायोट्रॉपिका में इसकी छलांग के बारे में बताते हैं कि यह किसी पत्ती या झाड़ी पर से ज़मीन पर छलांग लगाने के लिए पहले तो किसी सांप की तरह पीछे की ओर सरकती है, और फिर सीधे तनकर अपने शरीर को आगे की ओर फेंकते हुए ज़मीन पर कूद जाती है। थोड़ी ही देर की रिकॉर्डिंग में शोधकर्ताओं ने इसे तीन बार यह करतब करते देखा, जिसके आधार पर उनका कहना है कि जोंक की यह प्रजाति संभवत: अक्सर छलांग लगाती होगी।https://www.amnh.org/explore/news-blogs/research-posts/leaping-leeches इस लिंक पर जाकर आप इसकी दिलचस्प कलाबाज़ी देख सकते हैं।

यह बहस सालों से चली आ रही थी कि ज़मीन पर रहने वाली जोंक अपने मेज़बानों पर कूद सकती हैं या नहीं। जोंक के इस व्यवहार के लिखित किस्से तो लगभग 14वीं सदी से मिलते हैं। लेकिन इन किस्सों की सच्चाई का कोई ठोस प्रमाण नहीं था। अब वैज्ञानिकों के पास छलांग लगाती जोंक के वीडियो हैं।

इनके बारे में तो अभी तो पता ही चला है। ये ऐसा व्यवहार क्यों प्रदर्शित करती हैं, क्या अपने मेज़बानों पर कूदने के लिए छलांग लगाती हैं या कोई और कारण है, उनका भोजन कौन से जानवर हैं? इन सभी सवालों के जवाब अभी अनुत्तरित हैं और शोधकर्ता इनके जवाब खोजने के लिए आगे अध्ययन कर रहे हैं। (स्रोत फीचर्स)

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