कृत्रिम रोशनी मच्छरों को देर तक सक्रिय रखती हैं

सा माना जाता है कि पतझड़ में क्यूलेक्स पिपिएन्स (Culex pipiens) नामक मच्छर प्रजाति दिन की घटती अवधि को भांपकर आने वाले जाड़ों के लिए सुप्तावस्था (Diapause) में चली जाती हैं। मच्छर की यह प्रजाति यूएस में वेस्ट नाइल वायरस (West Nile Virus) की प्रमुख वाहक है। लेकिन हाल ही में किए गए एक ‘घर के पिछवाड़े’ अध्ययन से पता चला है कि एक फ्लडलाइट की रोशनी भी इस सुप्तावस्था को मुल्तवी कर सकती है। इससे मच्छरों को काटने और खून पीने का और समय मिल जाएगा।

जर्नल ऑफ इंसेक्ट फिज़ियोलॉजी में प्रकाशित यह अध्ययन चेतावनी देता है कि रात में कृत्रिम रोशनी मच्छरों की सुप्तावस्था को टालने का ज़रिया बन सकती है। यानी जब शहर और जगमगाएंगे तो मच्छरों का मौसम लंबा हो जाएगा।

मच्छर के लार्वा (इल्लियों) से वयस्क मच्छर निकलते हैं जो खूब खा-पीकर मोटे हो जाते हैं। फिर दिन की घटती अवधि और घटते तापमान से जाड़ों का आगमन भांपकर ये किसी अंधेरी जगह में सो जाते हैं। इस अवस्था को डायपॉज़ कहते हैं। यह बात तो काफी समय से पता रही है कि मच्छरों को इस अवस्था में जाने के लिए  मुख्य संकेत दिन की लंबाई से मिलता है। दिन छोटे होने के साथ वे डायपॉज़ की तैयारी करने लगते हैं।

पहले प्रयोगशालाओं में किए गए प्रयोगों से पता चला था कि हल्की सी कृत्रिम रोशनी (Artificial Light) भी मच्छरों को भ्रमित कर सकती है  और डायपॉज़ को टाल सकती है। सवाल यह था कि क्या यही बात शहरों के परिवेश में लागू होगी।

सवाल का जवाब पाने के लिए शोधकर्ताओं ने कोलंबस शहर (Columbus city) के बाशिंदों से कहा कि वे अपने आंगन में एक बर्तन में मच्छर के लार्वा रख लें। कुछ बर्तनों को पहले से मौजूद बाहरी रोशनी के ठीक नीचे रखा गया था, कुछ को उसी इमारत के अंधेरे कोनों में रखा गया था। फिर इन लार्वा को मच्छरों (Mosquito Larva) में विकसित होने दिया गया। उसके बाद शोधकर्ताओं ने वे सारे बर्तन एकत्रित करके यह देखा कि क्या उनमें पलते मच्छर डायपॉज़ में प्रवेश कर चुके थे या अभी भी खून पीने और प्रजनन के लिए सक्रिय थे।

देखा गया कि सितंबर में रोशनी के नीचे पले मच्छरों के डायपॉज़ में प्रवेश की दर उन मच्छरों की तुलना में एक-चौथाई ही थी जिन्हें अंधेरे में पाला गया था। अक्टूबर आने तक अंधेरे में पले सारे मच्छर सुप्तावस्था में जा चुके थे जबकि रोशनी में पले 59 प्रतिशत मच्छर सक्रिय थे।

अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता लिडिया फाई कहती हैं कि तापमान की बजाय कृत्रिम रोशनी सुप्तावस्था को टालने में ज़्यादा बड़ा कारक रहा। मात्र 0.87 लक्स की रोशनी भी मच्छरों को सक्रिय रखने के लिए पर्याप्त रही। यह रोशनी तारों से जगमग किसी रात की रोशनी के बराबर है।

अध्ययन दर्शाता है कि कृत्रिम रोशनी क्यूलेक्स मच्छरों को ज़्यादा दिनों तक सक्रिय रख सकती है, जिसका मतलब है वे ज़्यादा दिनों तक काटेंगे और रोग फैलाएंगे। इसका मतलब यह भी है कि वे ज़्यादा दिनों तक प्रजनन करेंगे और अगले मौसम में मच्छरों की संख्या भी ज़्यादा बनी रहेगी।

शोधकर्ता अपने अध्ययन को आगे बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं। वे सामान्य परिस्थितियों में दिन की लंबाई और रोशनी की तीव्रता का असर परखना चाहते हैं। इसके लिए कृत्रिम रूप से नहीं बल्कि प्राकृतिक रूप से पैदा (वन्य-मच्छरों) की आबादियों Wild Mosquito Populations) का अध्ययन ज़्यादा रोशनी तथा कम रोशनी वाले स्थलों पर करना होगा और उनके डायपॉज़ में तथा सक्रियता में फर्क (Active Involvement) का आकलन करना होगा।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://www.science.org/do/10.1126/science.zk72w4n/full/_20260526_on_mosquitoes_light.jpg

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