ज़ेब्राफिश हमारी तरह सोती है

क हालिया अध्ययन बताता है कि ज़ेब्राफिश (Danio rerio) की नींद का पैटर्न लगभग मनुष्यों जैसा होता है। एक बड़ा अंतर यह होता है कि ज़ेब्राफिश की पलकें नहीं होती और वे खुली आंखों से सोती हैं। पलकें न होने के बावजूद उनकी आंखें रोशनी बढ़ने-घटने के प्रति प्रतिक्रिया देती हैं। तेज़ रोशनी में उनकी नींद खराब भी होती है।

हमारी तरह ज़ेब्राफिश दिनचर (diurnal) होती हैं और रात में सोती हैं। हमारे समान सोते समय वे निश्चल रहती हैं और पर्यावरण के संकेतों पर प्रतिक्रिया धीमी गति से देती हैं। और तो और, यदि एक रात नींद न मिले, तो अगली रात देर तक सोकर भरपाई करती हैं।

यह सब तो काफी समय से पता है। अब, नेचर कम्यूनिकेशन्स में मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर बॉयोलॉजिकल सायबर्नेटिक्स की जेनिफर मेंगबो ली और उनके साथियों ने बताया है कि ज़ेब्राफिश की नींद में कई अवस्थाएं होती हैं, जो मनुष्यों जैसी हैं। अध्ययन के लिए शोधदल ने एक विशेष स्व-चालित सूक्ष्मदर्शी (Automatic microscope) बनाया, जिसमें कैमरा लगा था। इसकी मदद से उन्होंने 105 चलती-फिरती, सोती, शिकार करती ज़ेब्राफिश का करीबी से अध्ययन किया।

सबसे पहले, उनकी आंखों की हरकतों के आधार पर शोधकर्ताओं ने ज़ेब्राफिश में नींद की चार अवस्थाओं को पहचाना। इन चार में तीन अवस्थाएं रात में नज़र आती है। पहली अवस्था गहरी नींद की होती है जिसमें ज़ेब्राफिश (Zebra fish) की आंखें बेहोशी जैसे एकटक निहारती रहती हैं। जब जागने का समय नज़दीक आता है तो दूसरी हल्की नींद की अवस्था शुरू हो जाती है – इसमें उनकी आंखें फड़कती हैं, दोनों आंखों की पुतलियां एक तरफ जाती हैं और फिर केंद्र में आ जाती हैं। सुबह आने के समय दोनों आंखों की पुतलियां एक तरफ हो जाती हैं और वहीं टिकी रहती हैं। चौथी अवस्था प्राय: दिन के समय छोटी-छोटी अवधि की होती है जब उनकी आंखें तेज़ी से दाएं-बाएं, ऊपर-नीचे होती हैं। 5-10 मिनट की इन झपकियों के दौरान मस्तिष्क की गतिविधियां लगभग ठप हो जाती हैं।

गौरतलब है कि अपने जीवन के पहले तीन सप्ताह तक ज़ेब्राफिश पारदर्शी होती है। इसलिए शोधकर्ताओं के लिए कैल्शियम इमेजिंग (calcium imaging) नामक तकनीक की मदद से यह देखना संभव हुआ कि नींद की किन अवस्थाओं में कौन-सी तंत्रिकाएं (nerves) सक्रिय रहती हैं। इस तरह से शोधकर्ता यह दर्शा पाए कि ज़ेब्राफिश में नींद की विशिष्ट अवस्थाएं (specific states) होती हैं और प्रत्येक के लिए कौन-से तंत्रिका समूह का इस्तेमाल निशानदेही के लिए किया जा सकता है।

इससे एक बात उभरती है कि भले ही ज़ेब्राफिश का मस्तिष्क मनुष्य से छोटा और सरल हो, किंतु वह नींद से जुड़ी क्रियाविधियों को समझने में मददगार हो सकता है। यह भी देखा गया है कि मनुष्यों और ज़ेब्राफिश में नींद का नियमन करने वाले कई जीन्स व तंत्रिकाओं में समानता है और दवाइयों का असर भी लगभग एक जैसा ही होता है।

हालांकि हम जानते हैं कि सारे जंतु जीवन के एक बड़े हिस्से में सोते रहते हैं लेकिन इसका कारण और नियमन की क्रियाविधि अभी पूरी तरह समझी नहीं गई है। शायद ज़ेब्राफिश इसमें मददगार हो।

(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://www.popsci.com/wp-content/uploads/2019/07/12/VS67QYVGDYR7RJ2EVB2VHECT2I.jpg?quality=85&w=1200

प्रातिक्रिया दे