
फुटबॉल, हॉकी, बास्केटबॉल, टेनिस, बेडमिंटन जैसे खेलों में खिलाड़ियों (sportsman) को काफी भाग-दौड़ करनी पड़ती है। इस वजह से शरीर काफी गर्म हो जाता है और ठंडक देने के लिए व्यवस्था करनी होती है। इस मकसद से 2026 के फुटबॉल विश्व कप में हाइड्रेशन ब्रेक (hydration break) रखे गए थे। फीफा का कहना है कि ये ब्रेक खिलाड़ियों की भलाई को ध्यान में रखकर जोड़े गए थे।
अलबत्ता, देखा यह गया कि खेल रुकते ही ड्रिंक्स मैदान पर पहुंचते, खिलाड़ी मैदान पर ही बने रहते और विज्ञापनों का सिलसिला शुरू हो जाता। कई खेलकूद विज्ञानियों का कहना है कि जिस ढंग से ये ब्रेक्स लागू किए गए वे शरीर के बढ़ते तापमान और उसकी वजह से पैदा होने वाले तनाव को संभालने में नाकाम थे।
दरअसल, कूलिंग ब्रेक्स(cooling breaks) गर्मी के तनाव से उत्पन्न जोखिम के हिसाब से निर्धारित होने चाहिए और उन्हें कारगर ढंग से ठंडक प्रदान करनी चाहिए। लेकिन देखा गया कि इन ब्रेक्स के समय खिलाड़ी धूप में ही खड़े रहकर आगे की रणनीति के निर्देश सुनते रहते थे। ठंडक के लिए सबसे पहली ज़रूरत होगी कि खिलाड़ी छाया में बैठ जाएं।
इस संदर्भ में फीफा (FIFA) के अपने चिकित्सा दिशानिर्देश काफी स्पष्ट हैं: कूलिंग ब्रेक्स का एकमात्र मकसद ऊष्मा-जनित बीमारियों की रोकथाम है और ऐसे ब्रेक्स तभी दिए जाने चाहिए जब पर्यावरणीय ऊष्मा-जनित तनाव एक हद से ज़्यादा हो जाए। इस हद को वेट-बल्ब तापमान 32 डिग्री सेल्सियस माना जाता है। वेट-बल्ब तापमान हवा में नमी की मात्रा और तापमान दोनों का मिला-जुला पैमाना है। हम इंसान अपने शरीर को ठंडा रखने के लिए मूलत: पसीने के वाष्पीकरण पर निर्भर हैं। यदि हवा में पहले से ही ज़्यादा नमी (उमस) है तो पसीने का वाष्पीकरण धीमा पड़ जाता है। इसलिए तापमान अपेक्षाकृत कम हो और हवा में नमी ज़्यादा हो तो गर्मी ज़्यादा महसूस होती है। वेट-बल्ब तापमान (wet bulb temperature) हमें इसी संतुलन की सूचना देता है।
तो फीफा के दिशानिर्देशों के अनुसार कूलिंग ब्रेक की ज़रूरत तब होती है जब वेट-बल्ब तापमान 32 डिग्री से ज़्यादा हो जाए। लेकिन देखा यह गया है कि सारे मैचों में कूलिंग ब्रेक निश्चित अंतराल पर आ जाते हैं, यहां तक कि नियंत्रित जलवायु वाले स्टेडियम में भी। यानी इन ब्रेक्स का सम्बंध ऊष्मीय तनाव (humidity stress) से नहीं रह गया है बल्कि ये रस्म बन गए हैं।
इस बात से तो इन्कार नहीं किया जा सकता कि एथलीट्स (athletes) के लिए गर्मी से परास्त होना आम बात है। लेकिन जर्नल ऑफ साइन्स एंड मेडिसिन इन स्पोर्ट्स तथा ब्रिटिश जर्नल ऑफ स्पोर्ट्स मेडिसिन में एच. ए. ब्राउन व उनके साथियों के शोधपत्र में इस मामले में एक परीक्षण के परिणाम प्रकाशित किए हैं जो ऐसे कूलिंग ब्रेक्स के अर्थहीन होने की बात कहते हैं।
ब्राउन एवं उनके साथियों ने कुछ प्रतिभागियों के साथ एक प्रयोग किया था। यह 40 डिग्री सेल्सियस तथा 41 प्रतिशत आर्द्रता पर खेले गए 90 मिनट के एक फुटबॉल मैच का सिमुलेशन (simulation) था। इस दौरान उन्होंने ठंडक के तीन तरीके अपनाए थे – निष्क्रिय ब्रेक, सक्रिय ठंडक वाले ब्रेक तथा रिकवरी पीरियड। तीनों में ज़बरदस्त अंतर देखने को मिले।
चलते खेल में छोटे-छोटे ब्रेक्स जिनमें बर्फ में भीगे तौलियों और कोल्ड-ड्रिंक्स का इस्तेमाल किया गया था और साथ में थोड़ा लंबा हाफ-टाइम ब्रेक (long half-time break) दिया गया था, उनमें शरीर का केंद्रीय तापमान भी कम रहा और कार्डियो-वैसक्यूलर तनाव (cardiovascular stress) भी काफी कम रहा। दूसरी ओर, ठंडक देने के सक्रिय प्रयासों के बिना मिले ब्रेक्स ने नगण्य राहत पहुंचाई।
दरअसल, महत्व खेल के दौरान मिलने वाली रुकावट का नहीं है, बल्कि इसका है कि इस रुकावट का इस्तेमाल कैसे किया जाता है। ब्राउन का कहना है कि ठंडक हासिल करने के सक्रिय प्रयासों के बिना ऐसे ब्रेक्स बेकार ही होंगे। और यह बात सिर्फ खिलाड़ियों के लिए नहीं बल्कि सामान्य मानव स्वास्थ्य की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है – चाहे वे निर्माण स्थलों के मज़दूर हों, खेत पर काम कर रहे श्रमिक हों। इन सभी के लिए हस्तक्षेप की रणनीति एक सी होगी। इसमें विश्राम, कार्यिकीय क्षति की रोकथाम और स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए पानी की आपूर्ति जैसे तत्व शामिल होंगे।
ब्राउन के मुताबिक फुटबॉल पर ध्यान देना इस लिहाज़ से महत्वपूर्ण है कि जब आप ऐसे प्रतिष्ठित आयोजनों में सही तरीके नहीं अपनाते तो एक गलत संदेश देते हैं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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