‘शाश्वत’ रसायनों से निपटने के प्रयास

कुछ रसायन बहुत टिकाऊ होते हैं, इतने टिकाऊ कि एक बार बन जाने के बाद वे बरसों तक विघटित (disintegrate) नहीं होते। औषधियों में, लीथियम आयन बैटरियों में, रेफ्रिजरेटरों में और यहां तक कि अस्थमा के इनहेलर तथा अग्निशामक मिश्रणों में भी ऐसे पदार्थों का उपयोग होता है। इन पदार्थों के अणुओं में फ्लोरीन नामक तत्व पाया जाता है। कढ़ाइयों के नॉन-स्टिक लेप और वाटरप्रूफिंग पदार्थों में भी फ्लोरीन होता है।
यह सही है कि फ्लोरीन (Flourine) की उपस्थिति की बदौलत ये पदार्थ टिकाऊ बनते हैं लेकिन समस्या यह है कि इन पदार्थों का विघटन बहुत समय तक नहीं होता। इन सब में पर- या पोली-फ्लोरो अल्काइल पदार्थ (PFAS) होते हैं। कहा जा रहा है कि दूध से लेकर एवरेस्ट की चोटी तक PFAS (Per and polyfluoroalkyl substances) बिखरे हुए हैं। समस्या यह है कि इनमें से कई मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। ये शरीर का हॉर्मोन संतुलन बिगाड़ते हैं और लीवर तथा थॉयराइड जैसे अंगों के नुकसान पहुंचाते हैं।
एक और समस्या है – फ्लोरीन को यौगिकों में जोड़ने की प्रक्रिया भी घातक है। इसके लिए फ्लोरस्पार नामक एक खनिज (कैल्शियम फ्लोराइड) लिया जाता है और उसे गंधकाम्ल के साथ तपाकर हाइड्रोजन फ्लोराइड नामक रसायन प्राप्त किया जाता है। हाइड्रोजन फ्लोराइड एक खतरनाक क्षयकारक गैस है जो पानी में घुलकर हाइड्रोफ्लोरिक अम्ल (Hydrochloric acid) बनाती है। फायदा यह होता है कि खनिज (minerals) में उपस्थित फ्लोरीन क्रियाशील अवस्था में आ जाती है। रसायन शास्त्र का कोई भी विद्यार्थी बता देगा कि हाइड्रोजन फ्लोराइड (Hydrogen flouride) कितना क्षयकारक पदार्थ है।
यही कारण है कि फ्लोरीन की इस टिकाऊ उपयोगिता के बावजूद रसायन शास्त्री लोग इससे निपटने की जद्दोजहद में सदियों से लगे हैं। इनमें से एक हैं ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की वेरोनिक गवर्नर।
गवर्नर फ्लोरीन की समस्या से सिरे से निपटना चाहती हैं। वे कहती हैं कि कैल्शियम फ्लोराइड पानी या अन्य कार्बनिक विलायकों (organic solvents) में घुलनशील नहीं है; इसलिए इसका उपयोग सीधे रासायनिक अभिक्रियाओं में नहीं हो सकता। फिर 2023 में उनकी प्रयोगशाला के रसायनज्ञों ने फ्लोरस्पार (flourspar) से फ्लोरीन प्राप्त करने की एक ऐसी विधि विकसित की जिसमें हाइड्रोजन फ्लोराइड बनाने की ज़रूरत नहीं होती। उन्होंने देखा कि यदि फ्लोरस्पार और पोटेशियम फॉस्फेट को एक साथ पीसा जाए तो इतना घर्षण पैदा होता है कि फ्लोरीन मुक्त हो जाती है। अब एक स्टार्ट-अप इस तरीके को व्यावसायिक स्तर पर ले जा रहा है। गवर्नर बताती हैं कि वे इस विधि से लिपिटॉर (lipitor) नामक औषधि (कोलेस्ट्रॉल घटाने की दवा जिसमें फ्लोरीन होता है) का निर्माण कर पा रही हैं।
इसके अलावा, उनके दल ने इस यांत्रिक विधि का उपयोग PFAS को तोड़कर वापिस कच्चा माल प्राप्त करने के लिए आज़माया है। PFAS को पोटेशियम फॉस्फेट लवण के साथ पीसकर वे लोग पोटेशियम फ्लोराइड और डाईपोटेशियम मोनोफ्लोरो फॉस्फेट प्राप्त करने में सफल रहे हैं। ये दो फ्लोराइड लवण (पोटेशियम फ्लोराइड और डाईपोटेशियम मोनोफ्लोरो फॉस्फेट) हैं जिनका उपयोग उद्योगों में बहुतायत से होता है। लेकिन यह काम आगे तो तब बढ़ेगा जब सारे लोग यह समझ पाएं कि यह तरीका हाइड्रोजन फ्लोराइड मार्ग का एक अच्छा विकल्प है क्योंकि यह विकल्प सुरक्षित और सस्ता भी है।
अन्य रसायनज्ञ पूरी प्रक्रिया को चक्रीय बनाने पर ज़ोर दे रहे हैं – ताकि फ्लोरो-पोलीमर्स (flourine polymers) और अन्य फ्लोरीन युक्त पदार्थों को फिर से उपयोगी शुरुआती पदार्थों में बदला जा सके। जैसे इम्पीरियल कॉलेज, लंदन के एक रसायन शास्त्री मार्क क्रिमिन ने ऐसा एक चक्र विकसित किया है। संयोगवश हाथ लगे इस तरीके में कार्बन-फ्लोरीन बंध को तोड़ा जा सकता है।
क्रिमिन ने ऐसी अभिक्रियाएं विकसित कर ली हैं जिनकी मदद से फ्लोरो-यौगिकों को इस तरह बदला जा सकता है कि उनका उपयोग अन्य नवीन संश्लेषणों में किया जा सके। पहली अभिक्रिया वह है जिसे क्रिमिन ट्रांसफर फ्लोरिनेशन (transfer flourination) कहते हैं। इसमें रेफ्रिजरेटरों में इस्तेमाल किए जाने वाले हाइड्रोफ्लोरोकार्बन यौगिकों (HFC) की अभिक्रिया पोटेशियम क्षार से करवाकर पोटेशियम फ्लोराइड प्राप्त कर लिया जाता है। यह अन्य कई पदार्थों के निर्माण में उपयोगी है।
क्रिमिन द्वारा विकसित दूसरी प्रक्रिया (जिसे एचएफ शटलिंग कहते हैं) में एक अणु (जैसे पोलीविनाइलीडीन फ्लोराइड, PVDF) में से हाइड्रोजन व फ्लोरीन के परमाणु निकाले जाते हैं और एक उत्प्रेरक की मदद से इन्हें किसी अन्य अणु में जोड़कर फ्लोरोअल्काइन बनाया जाता है जो कई रसायनों के निर्माण का कच्चा माल है। PVDF का उपयोग लीथियम आयन बैटरियों में अस्तर के रूप में किया जाता है। क्रिमिन का विचार है कि पुरानी लीथियम आयन बैटरियों (lithium ion battery) से इसे प्राप्त करके फिर से उपयोगी बनाया जा सकता है। अलबत्ता, अभी ये प्रक्रियाएं प्रयोगशाला के स्तर पर हुई हैं और वास्तविक परिस्थितियों में इन्हें आज़माकर देखना होगा। इस दिशा में काम चल रहा है।
एक प्रमुख सवाल यह होगा कि उद्योगों को कैसे राजी किया जाए कि वे इसमें निवेश करें। इस संदर्भ में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल एक नज़ीर है। ओज़ोन को क्षति पहुंचाने वाले क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) यौगिकों पर प्रतिबंध लगाने के लिए 1987 में एक अंतर्राष्ट्रीय संधि (मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल) (montreal protocol) अपनाई गई थी और उसके परिणाम सकारात्मक रहे हैं। आगे चलकर इस संधि में हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (HCFC) को भी शामिल किया गया था।
फिलहाल PFAS पर रोक लगाने सम्बंधी नियम-कायदे अलग-अलग देशों में अलग-अलग हैं। इनमें से कुछ रसायनों (जैसे पर-फ्लोरो-ऑक्टेनोइक एसिड – PFOA और पर-फ्लोरो-ऑक्टेन सल्फोनेट – PFOS) पर युरोप व यूएस में प्रतिबंध है। इनका उपयोग नॉन-स्टिक लेपन (non-stick coating) और ऊष्मा-सह चीज़ों में किया जाता है। इनके कई हानिकारक असर प्रमाणित हुए हैं। एक तो, ये पर्यावरण में टिके रहते हैं। और दूसरा, इनका सम्बंध कैंसर तथा अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से देखा गया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://media.licdn.com/dms/image/v2/D5612AQHWgJvKra3iTw/article-cover_image-shrink_600_2000/B56ZfTaVBSGQAQ-/0/1751598585417?e=2147483647&v=beta&t=SIW-clJFe6B2B2OKBIhBXCIoaFHgSy-ApvleWfr0JiY

प्रातिक्रिया दे