कॉकरोच भी बन गया साईबोर्ग!

डॉ. इरफान ह्यूमन

जकल सोशल मीडिया और कुछ आंदोलनों में कॉकरोच (तिलचट्टा) का प्रतीकात्मक उपयोग चर्चा में रहा है। कॉकरोच (cockroch) व्यवस्था-विरोधी या प्रतिरोध का रूपक इसलिए कि यह अत्यंत जीवट प्राणी होता है और कठिनतम परिस्थितियों में भी जीवित रह सकता है।

इसके इतर, वैज्ञानिक कॉकरोच पर कुछ विशेष प्रयोगों को अंजाम दे रहे हैं। बीते दिनों वैज्ञानिकों ने एक ऐसा डाइविंग सूट (diving suite) विकसित किया है, जिसे कॉकरोच को पहनाया जा सकता है। यह सूट कॉकरोच को पानी के भीतर भी जीवित रहने और चलने-फिरने में सक्षम बनाता है। इस तरह से कॉकरोच इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली से चलने वाला जीव (साइबोर्ग) (cyborg) बन गया है।

साइबोर्ग और कॉकरोच

साइबोर्ग शब्द साइबरमेटिक ऑर्गेनिज़्म (cybermatic organism) का संक्षिप्त रूप है। यह ऐसे जीव को कहा जाता है जिसमें जैविक (बायोलॉजिकल) और इलेक्ट्रॉनिक घटक एक साथ कार्य करते हैं। दूसरे शब्दों में, जब किसी जीवित प्राणी के शरीर में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, सेंसर, कृत्रिम अंग या कंप्यूटर-नियंत्रित प्रणालियां जोड़ी जाती हैं, तो वह साइबोर्ग कहलाता है। उदाहरण के लिए कृत्रिम (बायोनिक) हाथ या पैर वाले व्यक्ति, पेसमेकर लगे हृदय रोगी, श्रवण यंत्र का उपयोग करने वाले व्यक्ति, सेंसर और नियंत्रक लगे साइबोर्ग कॉकरोच।

डाइविंग सूट की आवश्यकता

दरअसल वैज्ञानिकों का विचार साइबोर्ग कॉकरोच (cyborg cockroch) का उपयोग खोज एवं बचाव कार्यों में करने का है। वैज्ञानिक कई वर्षों से कॉकरोचों पर छोटे सेंसर, कैमरे और इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रक लगाकर उन्हें संकरे स्थानों में भेजने के प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन एक बड़ी समस्या यह थी कि ये कॉकरोच केवल सूखी भूमि पर ही काम कर सकते थे। बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों, जलमग्न सुरंगों, सीवर लाइनों या पानी से भरे मलबों में उनका उपयोग सीमित था। कॉकरोच पानी में अधिक समय तक नहीं रह सकते क्योंकि वे मछलियों की तरह गलफड़ों से श्वसन नहीं करते। उनके शरीर के दोनों ओर छोटे-छोटे छिद्र (स्पाइरैकल्स) होते हैं जिनके माध्यम से हवा शरीर में पहुंचती है। जब कॉकरोच पानी में डूबता है तो स्पाइरैकल्स (spiracles) पानी से ढंक जाते हैं और हवा का प्रवाह रुक जाता है। कुछ समय बाद उनका श्वसन तंत्र काम करना बंद कर सकता है। कॉकरोच को जलमग्न क्षेत्रों में सक्षम बनाने के लिए ही डाइविंग सूट का विचार उभरा है।

डाइविंग सूट में तीन प्रमुख भाग होते हैं। पहला, जलरोधी सुरक्षा कवच जो पानी को कॉकरोच के शरीर में प्रवेश करने से रोकता है। इससे स्पाइरैकल्स सीधे पानी के संपर्क में नहीं आते और शरीर सुरक्षित रहता है। दूसरा, कृत्रिम ऑक्सीजन आपूर्ति। डाइविंग सूट में एक सूक्ष्म ऑक्सीजन उत्पादन प्रणाली (mini oxygen generating sysytem) लगाई जाती है जो रासायनिक अभिक्रिया के माध्यम से ऑक्सीजन बनाती है और उसे कॉकरोच के श्वसन तंत्र तक पहुंचाती है। तीसरा, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की सुरक्षा। कैमरे, सेंसर और नियंत्रक सामान्यत: पानी से खराब हो सकते हैं। डाइविंग सूट इन्हें जलरोधी बनाकर सुरक्षित रखता है। इससे वैज्ञानिक वीडियो रिकॉर्ड कर सकते हैं, तापमान माप सकते हैं, गैस रिसाव का पता लगा सकते हैं और वातावरण की जानकारी एकत्र कर सकते हैं।

डाइविंग सूट का सबसे बड़ा लाभ यह है कि कॉकरोच ज़मीन और पानी में दोनों में कार्य करता रह सकता है। इसे उभयचर कार्यक्षमता (apmhibian function) कहते हैं।

विशेष डाइविंग सूट पहने साइबोर्ग कॉकरोच के परीक्षण के परिणाम अत्यंत उत्साहजनक रहे। साइबोर्ग कॉकरोच लगभग 3 घंटे तक पानी के भीतर सक्रिय बना रहा। और केवल जीवित ही नहीं रहा, बल्कि पानी में चल सकता था, दिशा बदल सकता था, बाधाओं को पार कर सकता था तथा आगे बढ़ सकता था।

जब कॉकरोच को पानी से बाहर निकाला गया, तब भी वह सामान्य रूप से चलने में सक्षम था। उसकी गति भूमि पर लगभग उतनी ही रही जितनी सूट-रहित कॉकरोच की होती है। यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अतिरिक्त उपकरण किसी जीव की गति और संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। प्रयोगों में पाया गया कि सेंसर सुरक्षित रहे, नियंत्रण प्रणाली कार्य करती रही, जलरोधी आवरण ने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों (electronic instruments) को नुकसान से बचाया। इससे भविष्य में कैमरे, माइक्रोफोन और अन्य सेंसर जोड़ने की संभावना मजबूत हुई।

उपयोग

प्राकृतिक आपदाओं (natural calamities) और दुर्घटनाओं के दौरान सबसे बड़ी चुनौती प्रभावित लोगों तक शीघ्र पहुंचने की होती है। भूकंप, भवन ध्वंस, बाढ़, खदान दुर्घटनाएं तथा अन्य आपातकालीन स्थितियां अक्सर ऐसे हालात उत्पन्न कर देते हैं, जहां मानव बचावकर्मी या बड़े रोबोट आसानी से नहीं पहुंच पाते। ऐसे में साइबोर्ग कॉकरोच एक प्रभावी समाधान के रूप में उभर रहे हैं। इनके कई उपयोग हो   सकते हैं:

1. मलबे में फंसे लोगों की खोज: ऐसी दुर्घटनाओं में कई बार लोग मलबे के नीचे जीवित फंसे रहते हैं, लेकिन उनकी सही स्थिति का पता लगाना कठिन होता है। साइबोर्ग कॉकरोच कुछ मिलीमीटर चौड़ी दरारों में प्रवेश कर सकते हैं। और मलबे के जटिल रास्तों से गुज़र सकते हैं। कैमरे और सेंसर की सहायता से अंदर की वास्तविक स्थिति की जानकारी भेज सकते हैं। इससे बचाव दल को यह पता लगाने में सहायता मिल सकती है कि कोई व्यक्ति कहां फंसा है और उसे निकालने का सबसे सुरक्षित मार्ग कौन-सा होगा।

2. जीवन के संकेतों का पता लगाना: साइबोर्ग कॉकरोचों पर विभिन्न प्रकार के सेंसर (sensor) लगाए जा सकते हैं। इनकी सहायता से वे ध्वनि, हलचल या कंपन का पता लगा सकते हैं। ऊष्मा और कार्बन डाईऑक्साइड की अधिक मात्रा भांप सकते हैं, जो किसी जीवित व्यक्ति की उपस्थिति का संकेत हो सकती है। मलबे के नीचे फंसे व्यक्ति की पुकार को माइक्रोफोन बचाव दल तक पहुंचा सकता है।

3. बाढ़ और जलमग्न क्षेत्रों में उपयोग: साईबोर्ग कॉकरोच बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों (flood affected area) का निरीक्षण कर सकते हैं। जलमग्न सुरंगों और पाइपलाइनों में प्रवेश कर सकते हैं। पानी के भीतर मौजूद अवरोधों का पता लगा सकते हैं मानव गोताखोरों की पहुंच से बाहर के स्थानों की जानकारी एकत्र कर सकते हैं। यह क्षमता उन्हें पारंपरिक बचाव उपकरणों की अपेक्षा अधिक बहुमुखी (diverse) बनाती है।

4. खदान दुर्घटना जोखिम क्षेत्रों में उपयोग: खदान दुर्घटनाओं में सुरंगें ध्वस्त हो सकती हैं या विषैली गैसें भर सकती हैं। ऐसी स्थिति में साइबोर्ग कॉकरोच गैस सेंसर द्वारा वातावरण व ऑक्सीजन स्तर की जांच कर सकते हैं, फंसे हुए श्रमिकों का पता लगा सकते हैं। इसी तरह, रासायनिक दुर्घटना स्थल, परमाणु विकिरण वाले क्षेत्र और अस्थिर भवन आदि में मदद कर सकते हैं।

5. बड़े रोबोटों की तुलना में लाभ: साइबोर्ग कॉकरोच की लागत अपेक्षाकृत कम है। लिहाज़ा वैज्ञानिक इन्हें भविष्य की खोज एवं बचाव तकनीक का महत्वपूर्ण भाग मानते हैं।

कॉकरोच ही क्यों?

साइबोर्ग कॉकरोच परियोजना में वैज्ञानिकों ने अनेक प्रकार के कीटों और छोटे जीवों पर विचार किया, लेकिन अंतत: कॉकरोच को सबसे उपयुक्त पाया। इसका कारण केवल उसका छोटा आकार नहीं है, बल्कि उसकी असाधारण शारीरिक क्षमता, सहनशीलता और अनुकूलनशीलता भी है। कॉकरोच सबसे मज़बूत और जीवट जीवों (resilient oraganism) में से एक माना जाता है। यह विभिन्न वातावरणों में जीवित रह सकता है; गर्मी और ठंड दोनों सहन कर सकता है’ सीमित भोजन-पानी में भी कुछ समय तक जीवित रह सकता है। कॉकरोच का शरीर लचीला और चपटा होता है, वह बहुत छोटी दरारों में घुस सकता है।

कृत्रिम सूक्ष्म रोबोट को चलाने के लिए बैटरी और मोटरों की आवश्यकता होती है, जिससे उनकी ऊर्जा जल्दी चुक सकती है। इसके विपरीत, कॉकरोच अपने शरीर की प्राकृतिक ऊर्जा प्रणाली का उपयोग करता है और बहुत कम ऊर्जा में लंबे समय तक काम चला सकता है। कॉकरोच अपने वज़न की तुलना में काफी अधिक भार वहन कर सकता है। इस विशेषता के कारण उसके शरीर पर सेंसर, कैमरे, माइक्रोफोन, संचार उपकरण, नियंत्रण प्रणाली लगाने के बाद भी उसकी गतिशीलता पर बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ता। छोटे रोबोट अक्सर उबड़-खाबड़ सतहों पर फंस जाते हैं, लेकिन कॉकरोच ऊबड़-खाबड़ सतहों पर चल सकता है और छोटे अवरोधों को पार कर सकता है। वह तेज़ी से दिशा बदल सकता है और गिरने के बाद स्वयं संतुलन बना सकता है। ये सभी गुण उसे प्राकृतिक रूप से एक उत्कृष्ट ‘जैविक रोबोट’ (biological robot) बनाते हैं; खोज एवं बचाव कार्य के लिए आदर्श जैविक मंच (बायोलॉजिकल प्लेटफॉर्म) बनाते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://i0.wp.com/cdnbunny.ubergizmo.com/wp-content/uploads/2026/06/ntu-cyborg-underwater-cockroaches.jpg

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