पांच करोड़ वर्ष पहले की जंगल गाथा              

डॉ. किशोर पंवार

न दिनों ग्लोबल वार्मिंग की चर्चा कुछ ज़्यादा ही हो रही है और तरह-तरह के पर्यावरणीय खतरों की बातें अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर होती रहती हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि ग्लोबल वार्मिंग हमारी पृथ्वी के इतिहास में पहली बार हो रहा है। जियोलॉजिकल इतिहास (geological history) को देखें तो पता चलता है कि ऐसा पूर्व में भी हो चुका है; इस धरा पर हमारे पदार्पण से करोड़ों वर्षों पहले। यह घटना लगभग पांच करोड़ साठ लाख वर्ष पूर्व जिस काल खंड में घटी थी उसे पैलियोसीन-इयोसीन थर्मल मैक्सिमम (पीईटीएम) (Paleocene-eocene thermal maximum- PETM) कहा गया है। पृथ्वी के इतिहास में 6.6 करोड़ से 5.6 करोड़ वर्ष पूर्व की अवधि को पैलियोसीन युग और 5.6 करोड़ से 3.39 करोड़ वर्ष पूर्व की अवधि को इयोसीन युग कहा जाता है।

हाल ही में अमेरिका में जीवाश्म वैज्ञानिकों के एक दल ने उस कालखंड के वनों के घनेपन (Forest density) के बारे में बहुत ही शानदार जानकारी उपलब्ध कराई है। यह आश्चर्यजनक है कि जब हम नहीं थे, उस अतीत के बारे में इतनी विस्तार पूर्वक जानकारी कैसे हासिल की गई। आइए देखते हैं।

यह महती काम सैमुअल ऑश्चिन ग्लोबल सेंटर फॉर आइस एज रिसर्च की रेगन डन, व्योमिंग विश्वविद्यालय में प्रोफसर एलेन कुरानो और उनकी टीम ने किया है। टीम ने व्योमिंग के हैना बेसिन से पीईटीएम से पहले और बाद के सैकड़ों नमूने एकत्र करके उन प्राचीन जंगलों के जीवाश्म प्रमाणों की खोज की। इस जीवाश्म रिकॉर्ड (fossil records) का उपयोग करते हुए उन्होंने उस काल की गाथा को पुनः रचा है। आज से लगभग पांच करोड़ साठ लाख वर्ष पूर्व, पृथ्वी के वन एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गए थे। वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन के आधार पर बताया है कि पृथ्वी पर ग्रीनहाउस प्रभाव के सबसे तीव्र दौरों में से एक की शुरुआत में तो जंगल ज़्यादा घने और हरे-भरे हो गए थे। लेकिन फिर यह वृक्षावरण झीना होने लगा। वैश्विक तापमान में 6 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि के कारण गर्मी और सूखे ने जंगलों पर दबाव डाला, जिससे बड़ी संख्या में पेड़ नष्ट हो गए। जंगलों की ऊपरी छतरी खुल गई, जिससे ज़मीन पर अधिक सूर्य की रोशनी पड़ने लगी और भूभाग में पानी की गति में बदलाव आ गया।

वैज्ञानिकों ने यह अध्ययन अमेरिका के एक राज्य दक्षिण व्योमिंग (south wyoming) में किया है जहां पर फॉसिल ब्यूट राष्ट्रीय स्मारक स्थित है। यहां पर पांच करोड़ साठ लाख वर्ष पूर्व से लेकर तीन करोड़ चालीस लाख वर्ष पूर्व के जंतुओं और पौधों के शानदार जीवाश्म मिलते हैं।

ऊपरी परत (चंदवा या कैनपी) जंगल की भू-सतह तक पहुंचने वाले प्रकाश की मात्रा, तापमान, जलीय आवास और वन द्वारा संग्रहित की जा सकने वाली कार्बन की मात्रा को नियंत्रित करती है। इस तरह, यह कैनपी और इसका घनापन पारिस्थितिक तंत्र के कार्य करने के तरीके का सबसे स्पष्ट संकेतक बन जाते हैं। वर्तमान जंगलों के घनेपन के आकलन का सर्वोत्तम तरीका लीफ एरिया इंडेक्स (Leaf Area Index – LAI) का है।

लीफ एरिया इंडेक्स

यह पत्तियों के कुल क्षेत्रफल और पेड़ के नीचे की भूमि के क्षेत्रफल का अनुपात है – इसमें नापा जाता है कि पेड़ों का फैलाव कितनी भूमि पर है और उन पेड़ों की पत्तियों का कुल क्षेत्रफल कितना है। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मापदंड है। यह तो जानी-मानी बात है कि किसी पेड़ पर सारी पत्तियां एक बराबर ऊंचाई पर नहीं लगी होतीं – वे अलग-अलग परतों में जमी होती हैं। इसके अध्ययन को फिलोमेट्री (phyllometry) कहा जाता है। सबसे ऊपर वाली पत्तियों पर भरपूर प्रकाश पड़ता है, निचली पत्तियों पर कम। अंतत: नीचे की ज़मीन जो प्रकाश पहुंचेगा वह इन सारी पत्तियों की रुकावट के बाद ही पहुंचेगा। वनों का घनापन छाया, तापमान, जल हानि और प्रकाश संश्लेषण को प्रभावित करता है।

लेकिन सवाल तो यह है कि साढ़े पांच करोड़ वर्ष पूर्व अस्तित्व में रहे जंगलों का लीफ एरिया इंडेक्स कैसे निकाला जाए।

पुरातन जंगल का लीफ एरिया इंडेक्स

डन, कुरानो और उनके साथियों ने इसी सवाल के जवाब में एक नया तरीका खोज निकाला है। यह देखा गया है कि पत्तियों की कोशिका का आकार (shape of leaf cells) उनके विकास के दौरान प्राप्त धूप की मात्रा को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, छाया में उगने वाली पत्तियां धूप की तलाश में फैलते समय लंबी और अधिक चौड़ी कोशिकाएं विकसित करती हैं। वहीं, अधिक धूप में उगने वाली पत्तियां छोटी और गोल कोशिकाएं विकसित करती हैं।

लेकिन इसका अध्ययन तो आजकल की पत्तियों में किया जा सकता है। साढ़े पांच करोड़ वर्ष पूर्व (5 crore yeras ago) जो पत्तियां गिरी होंगी वे तो पूरी तरह सड़-गल गई होंगी। यानी उनकी कोशिकाओं का अध्ययन तो हो नहीं सकता। यहां एक दूसरा सुराग काम आया। यह सुराग था पत्ती की क्यूटिकल के टुकड़े।

पत्ती की सबसे बाहरी जीवित परत (एपिडर्मिस) के ऊपर एक पतली सुरक्षा परत चढ़ी होती है जिसे क्यूटिकल कहते हैं। क्यूटिकल एक अघुलनशील पॉलीमर से बनी होती है। यह जल-अवरोधी गुण (water-resistent quality) प्रदान करती है। इसकी रचना, आकार-प्रकार एपिडर्मिस कोशिकाओं से मेल खाते हैं। अतः क्यूटिकल के अध्ययन से एपिडर्मिस कोशिकाओं की रचना के बारे में खास जानकारी मिलती है। रोचक बात है कि क्यूटिकल का अपघटन करोड़ों सालों तक नहीं होता। पौधों के जीवाश्म अवसादी (तलछटी) चट्टानों में पाए जाते हैं जिनमें ऑक्सीजन का सीमित संचय होता है। इनमें जीवाश्म का संरक्षण अच्छी तरह से हो जाता है। जीवाश्मों में पत्तियों के ये खंडित क्यूटिकल अवशेष संरक्षित हैं।

वैज्ञानिकों ने क्यूटिकल और एपिडर्मिस कोशिकाओं के इस सम्बंध को प्राचीन जंगलों के पुनर्निर्माण के लिए एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया। इसे सटीक रूप से समझने के लिए, पहले उन्होंने मध्य और दक्षिण अमेरिका के वर्तमान जंगलों से मिट्टी के नमूने लिए, जिनमें विभिन्न सघनता (varied plant density) वाले पेड़ों की एक विस्तृत शृंखला शामिल थी। मिट्टी के प्रत्येक नमूने में कई अलग-अलग पेड़-पौधों द्वारा छोड़ी गई क्यूटिकल पाई जाती है।

क्यूटिकल और एपिडर्मिस (leaf cuticle & epidermis) कोशिकाओं की रचना (गोल बनाम लंबी) की तुलना करने पर स्पष्ट हो गया कि अधिक घनी कैनपी वाले नमूनों में अधिक लंबी कोशिकाएं दिखाई देती हैं, जबकि विरल कैनपी नमूनों में अधिक गोलाकार कोशिकाएं पाई जाती हैं। शोधकर्ताओं ने पेड़ के नीचे की भूमि पर कैमरे लगाए, जिनके मुंह ऊपर की ओर थे। इनमें कैद तस्वीरों से पता चल गया कि भूमि पर कितनी रोशनी पहुंच रही है जो जंगल के घनेपन का द्योतक है। फिर इसका सम्बंध उन्होंने क्यूटिकल की कोशिकाओं से जोड़ा।

क्यूटिकल के आधार पर हज़ारों एपिडर्मिस कोशिकाओं के आकार की तुलना शोधकर्ताओं ने उनके द्वारा वास्तव में आकलित लीफ एरिया इंडेक्स से की। देखा गया कि पत्ती की कोशिकाओं का आकार लीफ एरिया इंडेक्स से और इस प्रकार से जंगल के घनत्व से निकट से संम्बधित है। कोशिकाएं जितनी अधिक लंबी होती हैं, उनके ऊपर वन आवरण उतना ही घना होता है। इस रिश्ते ने लाखों साल पहले व्योमिंग के जंगलों की बनावट का पुनर्निर्माण करने और यह दिखाने में मदद की कि समय के साथ वे कैसे बदलते रहे। (LAI & forest density relation)

पीईटीएम के दौरान वन संरचना में आए बदलावों (forest development changes) को समझना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे हमें पता चलता है कि वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा बहुत अधिक बढ़ने से पौधों की वृद्धि, बायोमास और उत्पादकता कैसे प्रभावित होती है। अत्यधिक कार्बन डाईऑक्साइड वनों के लिए हानिकारक है क्योंकि इसके साथ होने वाली गर्मी और सूखा पेड़ों पर दबाव डालते हैं और इससे कई पेड़ों की मृत्यु हो जाती है।

इस शोध से पता चलता है कि पीईटीएम के दौरान, वनों की ऊपरी परत अधिक खुली (open canopy) हो गई थी, बड़े पेड़ों की संख्या कम हो गई थी, और इस बदलाव ने जलवायु, पोषक तत्वों के चक्रण, अपक्षय और निश्चित रूप से, वनों में रहने वाले जानवरों को प्रभावित किया।

जंगल: हद कर दी आपने

एक बात यह पता चली कि तीव्र वैश्विक तापमान वृद्धि शुरू होने से ठीक पहले, वनों का घनत्व अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया था, जो संभवतः वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने का परिणाम था क्योंकि कार्बन डाईऑक्साइड पेड़-पौधों को प्रकाश संश्लेषण के ज़रिए कार्बोहायड्रेट व अन्य सामग्री के निर्माण में मददगार होती है। लिहाज़ा, वातावरण में अधिक कार्बन डाईऑक्साइड हो, तो प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) ज़्यादा होगा और उनकी वृद्धि भी ज़्यादा होगी।   

लेकिन कार्बन डाईऑक्साइड का एक अन्य असर भी होता है – ग्रीनहाउस प्रभाव (green house effect), जिसके कारण तापमान बढ़ता है। तो वह शुरुआती हरा-भरा जंगल ज़्यादा समय तक नहीं टिक पाया। तापमान बढ़ने के साथ-साथ, गर्मी और सूखे के चलते पेड़ों के मरने से जंगल की ऊपरी परत तेज़ी से झीनी होती गई।

लेकिन 5.6 करोड़ वर्ष पूर्व के प्राचीन जंगलों की कहानी उनके पतन के साथ समाप्त नहीं होती है। समय के साथ, गर्म जलवायु में चट्टानों के विघटन (जिसे अपक्षय कहा जाता है) (rock weathering) की प्रक्रिया ने धीरे-धीरे हवा से कार्बन को खींचकर समुद्री तलछट में जमा कर दिया। इससे एक बार फिर वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड में कमी आई, जिसके परिणामस्वरूप जलवायु ठंडी हुई और पानी अधिक आसानी से उपलब्ध हो गया। वन आवरण फिर से विकसित हो गए और अंततः वैश्विक तापमान वृद्धि शुरू होने से पहले की तुलना में और भी अधिक घने हो गए। वनों के विस्तार के साथ, संभवतः मिट्टी को स्थिर करने, जल-चक्र को नियंत्रित करने और वायुमंडल से कार्बन को अवशोषित करने की उनकी क्षमता बहाल हो गई। जब पेड़-पौधे फिर से अधिक कार्बन डाईऑक्साइड सोखने लगे तो ग्रीनहाउस प्रभाव को कम करने और ग्रह के दीर्घकालिक पुनरुद्धार को बढ़ावा देने में मदद मिली। लेकिन इसमें एक लाख वर्षों से भी अधिक समय लगा।

वर्तमान परिदृश्य

इस घटनाक्रम में आज के लिए एक महत्वपूर्ण सबक छिपा है। दुनिया में इस समय कार्बन डाईऑक्साइड की बढ़ती मात्रा पेड़-पौधों की वृद्धि को बढ़ावा दे सकती है, लेकिन केवल तभी जब तापमान और पानी पेड़ों की सहनशीलता की सीमा (saturation limit) के भीतर रहें। एक हद से ज़्यादा गर्मी, सूखा, कीड़े, रोगजनक और जंगल की आग कार्बन डाईऑक्साइड के किसी भी वृद्धिकारक प्रभाव को खत्म कर सकते हैं।

विश्व भर में, तापमान में वृद्धि (temperature increase) के साथ-साथ लकड़ी, फसलों और चारागाहों के लिए वनों की कटाई से जंगलों की सहनशीलता और भी कम हो रही है, जिसके कारण कई जंगलों में पहले से ही कम होने के संकेत दिखने  लगे हैं।

आज, मानव जनित कार्बन उत्सर्जन और वैश्विक तापमान में वृद्धि उस काल की तुलना में कहीं अधिक तेज़ी से हो रही है। जीवाश्म रिकॉर्ड यह तो बताते हैं कि वन पुनर्जीवित (forest restoration) हो सकते हैं, बशर्ते मनुष्य उन्हें उन सीमाओं से आगे न धकेलें, जिनसे उबरने में लाखों वर्ष लग जाते हैं।

इस अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता डन आगे कहती हैं, “पेड़ अद्भुत हैं। जंगल हर दिन करोड़ों टन कार्बन सोखते हैं, लेकिन जब जंगल कम होने लगते हैं, तो कार्बन सोखने वाले सोख्ते भी कम होने लगते हैं। पीईटीएम हमें याद दिलाता है कि जब जंगल कम होते हैं, तो इसके दूरगामी परिणाम पूरे जलवायु तंत्र पर पड़ते हैं। मानव जनित जलवायु परिवर्तन की अभूतपूर्व गति को कम करने में वनों की क्षमता को देखते हुए, इनकी रक्षा और पुनर्स्थापन (forest re-establishment & conservation) करना ही बुद्धिमानी होगी।” (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://www.sciencenews.org/wp-content/uploads/sites/2/2020/04/040120_cg_antarctica_forest_feat.jpg

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