
एक ताज़ा शोध के क्लीनिकल ट्रायल (Clinical trial) में चिकित्सा जगत को बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। शोधकर्ताओं ने शरीर के भीतर ही बीमारी से लड़ने वाली प्रतिरक्षा कोशिकाओं को तैयार करने के लिए एक संशोधित वायरस का सफल परीक्षण किया है। नेचर में प्रकाशित अध्ययन के शुरुआती नतीजे दर्शाते हैं कि इस खास तकनीक के जरिए भविष्य में गंभीर ऑटोइम्यून बीमारियों (autoimmune diseases) का इलाज आज के मुकाबले अधिक सटीक, किफायती और त्वरित हो सकता है।
ऑटोइम्यून बीमारियों में शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र (immune system) खुद अपनी ही स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला करने लगता है। मल्टीपल स्क्लेरोसिस (एमएस) जैसी स्थिति में शरीर की विकृत बी-कोशिकाएं ऐसी ऑटो-एंटीबॉडी बनाती हैं जो मस्तिष्क, मेरु-दंड और तंत्रिकाओं को नुकसान पहुंचाती हैं।
इस अध्ययन में एमएस, तंत्रिका को नुकसान पहुंचाने वाली और शोथ बढ़ाने वाली ऑटोइम्यून बीमारियों के 16 मरीज़ों को शामिल किया गया। मरीज़ों को चीन की बायोटेक्नोलॉजी कंपनी द्वारा विकसित ‘लेंटीवायरस’ (एक सुरक्षित और आनुवंशिक रूप से संशोधित वायरस) (lentivirus) की एक खुराक दी गई। शरीर में प्रवेश करते ही इस वायरस ने टी-कोशिकाओं को आनुवंशिक निर्देश दिए, जिससे वे CAR-T कोशिकाओं (Chimaeric Antigen Receptor – T cells) में बदल गई। नतीजतन, नई CAR-T कोशिकाओं ने विकृत बी-कोशिकाओं को नष्ट कर दिया। इसके बाद शरीर में नई स्वस्थ बी-कोशिकाएं बनीं और उन्होंने ऑटो-एंटीबॉडी बनाना बंद कर दिया। शोधकर्ताओं ने इसे ‘इम्यून रीसेट’ (immune reset) नाम दिया है।
छह महीने की निगरानी के दौरान एमएस के मरीज़ों में शारीरिक गतिशीलता, सोचने-समझने की क्षमता में सुधार देखा गया और लगातार थकान में भी कमी आई। इसके अलावा, अन्य ऑटोइम्यून बीमारियों के मरीज़ों में शोथ (inflammation) की कमी और शारीरिक ताकत में बढ़ोतरी दर्ज की गई।
पारंपरिक CAR-T थेरपी (फिलहाल ब्लड कैंसर के इलाज में इस्तेमाल हो रही है) में मरीज़ का खून निकालकर टी-कोशिकाओं को अलग किया जाता है। उसके बाद प्रयोगशाला में कोशिकाओं को (शरीर से बाहर) संशोधित करके शरीर में डाला जाता है। लिहाज़ा, शरीर के भीतर कोशिकाएं तैयार करने की यह तकनीक (इन-विवो) पारंपरिक थेरपी (conventional therapy) के मुकाबले सस्ती और तेज़ होगी। (साल 2025 में लेंटीवायरस आधारित CAR-T थेरपी से ब्लड कैंसर का सफल इलाज किया जा चुका है।)
परीक्षण के दौरान दुष्प्रभाव बेहद मामूली रहे – जैसे थोड़े समय के लिए हल्का बुखार, सूजन या श्वेत रक्त कोशिकाओं की संख्या में अस्थायी कमी। वैसे, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह थेरपी शरीर के भीतर ही डीएनए में बदलाव करती है, इसलिए भविष्य में ट्यूमर या कैंसर (tumor) बनने का जोखिम हो सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, ट्यूमर और दीर्घकालिक जोखिमों को खारिज करने और सुरक्षा के प्रमाण हेतु मरीज़ों की कम से कम 10 वर्ष तक निगरानी ज़रूरी है। शोधकर्ताओं के मुताबिक मरीज़ों की निगरानी जारी है और जल्द ही बड़े पैमाने पर ट्रायल (large scale trials) शुरू किए जाएंगे। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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