
चिकित्सा जगत में कैंसर (cancer)जैसी घातक बीमारी के सटीक उपचार के लिए शोधकर्ता लगातार नई संभावनाएं खोजने में लगे हुए हैं। इस कोशिश में शोधकर्ताओं के लिए एक सवाल पहेली बना हुआ है “क्या कारण है कैंसर के जोखिम का असर अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग होता है। कोई व्यक्ति तो कैंसर रोगी बन जाता है, वहीं कोई अन्य व्यक्ति सारे जोखिमों के बावजूद इस खतरनाक बीमारी से बचा रहता है?” जैसे कई सालों से धूम्रपान (smoking) करने वाले दो व्यक्तियों में से एक तो कैंसर का मरीज़ बन जाता है, और दूसरा बिलकुल स्वस्थ रहता है।
हाल ही में, साइंस जर्नल में बताया गया है कि कैंसर रिसर्च यूके (ब्रिटेन) और नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट (अमेरिका) मिलकर एटलस (ATLAS) परियोजना के अंतर्गत एक अंतर्राष्ट्रीय शोध करने जा रहे हैं। लगभग ढाई करोड़ डॉलर का यह शोध कैंसर ग्रैण्ड चैलेंजेस (cancer grand challenges) द्वारा वित्तपोषित है। एटलस वह अंतर्राष्ट्रीय परियोजना है जिसके तहत हज़ारों वैज्ञानिक मिलकर एक स्वस्थ मानव शरीर की समस्त कोशिकाओं की पहचान करने का प्रयास कर रहे हैं।
डॉ. पॉल बस्टर्ड और उनकी टीम एक कैंसर एंटीबॉडी एटलस (cancer antibody atlas) बनाने में जुटी है, जिससे पता लगाया जा सकेगा कि प्राकृतिक तौर पर भारी जोखिम वाले व्यक्ति कैंसर से कैसे बचे रहते हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस सवाल का जवाब शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली में हो सकता है। आम तौर पर बाहरी रोगजनकों से बचाव के लिए शरीर की बी-कोशिकाएं एंटीबॉडी बनाती हैं, लेकिन कुछ परिस्थितियों में यही बी कोशिकाएं अपने ही प्रतिरक्षा तंत्र के खिलाफ काम करने वाली ऑटो-एंटीबॉडी (autiantibody) बनाने लगती हैं (यही ऑटो-एंटीबॉडी स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला कर देती हैं, जिससे ऑटोइम्यून बीमारियां होती हैं)।
वैज्ञानिकों का मानना है कि ये ऑटो-एंटीबॉडी शरीर में दो तरह की हो सकती हैं – कैंसर को बढ़ावा देने वाली या कैंसर से बचाने वाली। अनुमान है कि कैंसर को बढ़ावा देने वाली ऑटो-एंटीबॉडी ट्यूमर से बचाव करने वाले प्रतिरक्षा रसायनों (साइटोकाइंस) (cytokines) को खत्म कर सकती हैं, जिसके चलते कैंसर कोशिकाएं शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र से बचकर ट्यूमर बना लेती हैं। वहीं दूसरी ओर, बचाव करने वाली ऑटो-एंटीबॉडी कैंसर-कारी कोशिकाओं को शुरुआत में ही पहचान कर खत्म कर सकती हैं, या फिर कैंसर प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा सकती हैं।
दरअसल, इस अध्ययन का विचार कोविड-19 (COVID-19) महामारी के दौरान किए गए एक अध्ययन से उभरा है। वैज्ञानिकों ने उस अध्ययन में पाया था कि गंभीर हालत वाले 10 से 15 प्रतिशत मरीज़ों में कुछ ऐसी ऑटो-एंटीबॉडीज़ थीं जो वायरस से लड़ने वाले उनके अपने प्रतिरक्षा रसायनों (टाइप-1 इंटरफेरॉन) का खात्मा कर रही थीं। इसलिए वे मरीज़ कोविड के प्रति बहुत ज़्यादा संवेदनशील हो गए थे। अब शोधकर्ता कैंसर में भी इनकी भूमिका समझने की कोशिश कर रहे हैं।
पांच साल तक चलने वाले इस अध्ययन के शुरुआती चरण में दुनिया भर के 16,000 से ज़्यादा लोगों के खून के नमूनों की जांच की जाएगी। इसमें मुख्य रूप से तीन विशेष समूहों को शामिल किया जाएगा: 100 वर्ष से अधिक उम्र वाले लोग, स्मोकर्स जो कैंसर-मुक्त हैं, और ऐसे जुड़वां बच्चे जिनमें सिर्फ एक कैंसर-रोगी है। खून के नमूनों में 20,000 से ज़्यादा अलग-अलग प्रोटीनों (proteins) का परीक्षण किया जाएगा। आगे चलकर 50,000 से ज़्यादा लोगों को शामिल किया जाएगा।
वैज्ञानिकों का मकसद ट्यूमर के विकास में प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली ऑटो-एंटीबॉडीज़ की भूमिका की पहचान करना है। इससे समय रहते कैंसर के जोखिम का सटीक अनुमान लगाया जा सकेगा, कैंसर रोकथाम उपचार और दवाइयों का विकास हो सकेगा और वर्तमान इम्यूनोथेरेपी (immunotherapy) में सुधार किए जा सकेंगे। साथ ही, यदि कुछ हानिकारक ऑटो-एंटीबॉडीज़ की पहचान हुई, तो उन्हें जड़ से खत्म करने के उपचार भी विकसित किए जा सकते हैं। यह शोध कैंसर के खिलाफ जंग में एक नई उम्मीद साबित हो सकता है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://www.science.org/do/10.1126/science.z0cr0li/full/_20260723_on_antibody.jpg