अलविदा डॉ. एम.पी. परमेश्वरन

न विज्ञान के क्षेत्र में एमपी के नाम से लोकप्रिय लेखक, विचारक, वैज्ञानिक और एक्टिविस्ट एम. पी. परमेश्वरन (M.P. Parmeswaran) अब हमारे बीच नहीं रहे। 11 अगस्त 2026 को वे इस दुनिया को अलविदा कह गए। परमाणु वैज्ञानिक (nuclear scientist) के रूप में प्रशिक्षित परमेश्वरन ने विज्ञान की प्रयोगशालाओं में विज्ञान करने की बजाय समाज के बीच विज्ञान पहुंचाने और वैज्ञानिक चेतना जगाने की राह चुनी। वे केरल शास्त्र साहित्य परिषद के संस्थापकों में से थे।

एम. पी. परमेश्वरन का जन्म 18 जनवरी 1935 को केरल में हुआ था। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने मॉस्को से परमाणु इंजीनियंरिंग में डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की और फिर भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (Bhabha Atomic Research Centre) में वैज्ञानिक रहे। उन्होंने मलयालम भाषा के लिए की-बोर्ड विकसित करने में भूमिका निभाई, जो आगे चलकर इनस्क्रिप्ट (INSCRIPT) की-बोर्ड (key board) का आधार बना।

1975 में उन्होंने अपना वैज्ञानिक करियर छोड़कर केरल शास्त्र साहित्य परिषद (KSSP) के साथ काम करना चुना। यह निर्णय उनके जीवन की ही नहीं बल्कि समस्त भारत के जन-विज्ञान आंदोलन की दिशा बदलने वाला साबित हुआ। उन्होंने 1987 में देश भर के जन विज्ञान संगठनों के साथ मिलकर भारत जन विज्ञान जत्था की नींव रखी। आगे चलकर उन्होंने ऑल इंडिया पीपुल्स साइंस नेटवर्क (All India Peoples Science Network) के निर्माण में भूमिका निभाई जिसके माध्यम से देश भर के जन विज्ञान में सक्रिय संगठन एक साथ आए।

उन्होंने विज्ञान और विकास के सम्बंधों पर मलयालम और अंग्रेज़ी में लगातार लिखा और चर्चाएं की। उनका आग्रह था कि विकास का अर्थ केवल अधिक उत्पादन और अधिक उपभोग नहीं हो सकता; उसे मनुष्य, प्रकृति, समता और स्थानीय समुदायों की ज़रूरतों के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए।

परमेश्वरन के लिए विज्ञान मात्र एक विषय नहीं था और उनके लिए विज्ञान का प्रसार केवल वैज्ञानिक तथ्यों को सरल भाषा में लोगों तक पहुंचाना नहीं था। वे विज्ञान को समाज को समझने, सवाल उठाने और अपने भविष्य के बारे में निर्णय लेने का साधन और माध्यम मानते थे। केरल शास्त्र साहित्य परिषद (Science writers’ forum of Kerela) के ज़रिए उन्होंने विज्ञान, शिक्षा, पर्यावरण और विकास के सवालों को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

परमेश्वरन की सबसे बड़ी विरासत शायद यही है कि उन्होंने विज्ञान को केवल जानने और जिज्ञासा को शांत करने का साधन नहीं, बल्कि समाज को बदलने और लोकतांत्रिक (democratic) बनाने की शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। वे आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी वैचारिक विरासत हमारे साथ है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://images.indianexpress.com/2026/08/Nuclear-scientist-Parameswaran.jpg

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