डॉ. सुशील जोशी

उंगलियां चटकाना तो सभी जानते हैं। हालांकि कुछ लोग आदतन ऐसा करते हैं जबकि कुछ नहीं करते। इसके अलग-अलग तरीके भी होते हैं; कुछ लोग उंगलियों को सीधी रखकर उन्हें खींचते हैं, तो कुछ लोग उंगलियों को जोड़ों पर से मोड़कर उन्हें दबाते हैं। परिणाम कुल मिलाकर एक ही होता है – उंगलियों से चटक की आवाज़ आती है और कहते हैं कि इससे सुकून मिलता है। तो सवाल यह उठता है कि यह आवाज़ कहां से आती है और सुकून क्यों मिलता है। साथ में सवाल यह भी है कि क्या उंगलियां चटकाना (knuckle cracking) लंबे समय में नुकसानदायक भी हो सकता है।
दरअसल, उंगलियां चटकाने पर तमाम तरह की क्रियाएं होने लगती हैं। सबसे पहले तो यह देखिए कि चटक की आवाज़ कहां से निकलती है। बात की शुरुआत यह बताकर करना मुनासिब होगा कि वैज्ञानिकों-चिकित्सकों-अस्थि विशेषज्ञों के बीच इस सम्बंध में आम सहमति नहीं है।
हमारे शरीर के जोड़ों में हड्डियों को आपस में जोड़ने की तीन व्यवस्थाएं होती हैं। एक होती है जिसमें हड्डियां तंतुओं या रेशों के ज़रिए जुड़ी होती हैं। कपाल (cranium) की हड्डियों के बीच जोड़ इसी प्रकार के होते हैं। इन जोड़ों में गति नहीं होती। दूसरी होती है जिसमें हड्डियों को उपास्थियों के ज़रिए जोड़ा जाता है। इनमें थोड़ी गति संभव होती है। और तीसरी व्यवस्था में हड्डियों के जोड़ों पर एक रेशेदार कैप्सूल में तरल भरा होता है। कोहनी, घुटनों, कलाइयों, ऐड़ियों के जोड़ इसी प्रकार के होते हैं। हमारी उंगलियों के जोड़ों में भी एक तरल भरा होता है जो उन्हें गति करने में घर्षण से बचाता है। इस तरल को सिनोवियल द्रव (synovial fluid) कहते हैं। इसके अलावा यह एक नरम गद्दी की तरह कार्य करता है और उपास्थियों को पोषण भी पहुंचाता है। जोड़ों में यह तरल न हो या कम हो तो कई तरह की दिक्कतें हो सकती है।
हाथ की संरचना और खास तौर से उसमें हड्डियों की जमावट चित्र 1 की तरह होती है। कलाई और हथेली के जोड़ पर कई सारी हड्डियां होती हैं जिन्हें कार्पल्स कहते हैं। कार्पल्स अनियमित आकार की हड्डियां होती हैं जो अनियमित ढंग जमी होती हैं। इसके बाद आती हैं बेलनाकार मेटाकार्पल्स (metacarpels) जो हथेलियों में जमी होती हैं, और अलग-अलग उंगली की हड्डियों से जुड़ी होती हैं। चार उंगली और एक अंगूठे के लिए पांच मेटाकार्पल्स होती हैं। फिर आती हैं उंगलियों की हड्डियां – फैलेंजेस (phalanges)। चारों उंगलियों में तीन-तीन फेलेंजेस होती हैं जबकि अंगूठे में मात्र 2। मेटाकार्पल्स से लेकर फैलेंजेस तक के सारे जोड़ सिनोवियल होते हैं। चटकाने की मुख्य क्रिया को मेटाकार्पल और फैलेंजेस के जोड़ों पर अंजाम दिया जाता है। इन्हें संक्षेप में एमसीपी (MCP) जोड़ कहते हैं।
चटकाने की क्रिया
उंगलियां चटकाने पर काफी अनुसंधान हुए हैं। इस सामान्य सी क्रिया पर ध्यान देने का प्रमुख कारण यह रहा है कि इसे लेकर तमाम धारणाएं-मान्यताएं हैं, खास तौर से इसके कारण होने वाले नुकसान को लेकर।
1947 में जे. बी. रोस्टन और आर. व्हीलर हैन्स ने जर्नल ऑफ एनाटॉमी में पहली बार MCP जोड़ों की क्रमिक रेडियोग्राफी (sequential radiography) के आधार पर उंगलियां चटकाने के चार चरणों का विवरण दिया था:
विश्राम की अवस्था, जब जोड़ पर कोई बल नहीं लगाया जा रहा है और सतहें लगभग परस्पर संपर्क में होती हैं;
जब थोड़ा बल लगाया जाता है तो जोड़ की सतहें एक-दूसरे से दूर जाने लगती हैं;
बल का परिमाण एक सीमा से अधिक होने पर सतहें इतनी दूर हो जाती हैं कि बीच में एक खाली जगह बन जाती है। तब चटकने की अवस्था आती है;
अंतिम चरण बहाली का होता है जिसके दौरान उंगलियों को फिर से नहीं चटकाया जा सकता। यह चरण लगभग 20 मिनट का होता है।
आवाज़ का उद्गम
एक मत यह है कि सिनोवियल द्रव में गैसें (मुख्यत: कार्बन डाईऑक्साइड और नाइट्रोजन) घुली होती हैं। जब जोड़ों को तेज़ी से खींचा जाता है तो बीच की जगह में एक खाली स्थान पैदा हो जाता है। इस निर्वात की वजह से गैस के बुलबुले (gas bubbles) सिनोवियल द्रव से बाहर निकलकर इस जगह में भर जाते हैं। फिर जब बुलबुले खूब फूल जाते हैं तो अपने ही तनाव की वजह से गुब्बारे की तरह फूट जाते हैं। आवाज़ इन्हीं बुलबुलों के फूटने की होती है। और यही कारण है कि एक बार चटकाने के बाद कुछ समय तक ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि बुलबुलों को फिर से बनने में समय लगता है।
लेकिन… विज्ञान में लेकिन तो हमेशा बना रहता है।
रोस्टन और हैन्स की परिकल्पना थी कि जोड़ों की सतहों के बीच खाली स्थान पर जलवाष्प (watervapour) भरी होती है। उनका मत था कि आवाज़ जोड़ों की तेज़ गति के कारण उत्पन्न कंपनों से पैदा होती है।
इस संदर्भ में ए. अन्सवर्थ, डी. डावसन और वी. राइट ने अपने प्रयोगों के परिणाम 1971 में एनल्स ऑफ दी रुमेटिक डिसीसेज़ में प्रकाशित करके बताया था कि बुलबुलों का बनना और फूटना ही चटकने की आवाज़ का स्रोत है। जैसे-जैसे जोड़ की सतहें एक-दूसरे से दूर हटती हैं, वहां कम दबाव का क्षेत्र (low pressure zone) बन जाता है। परिणामस्वरूप, द्रव का वाष्पीकरण होता है और द्रव में घुली गैसें बुलबुले बन जाती हैं।
हालांकि इस बात पर सहमति है कि उंगली चटकाने के दौरान जोड़ों पर बुलबुले बनते हैं लेकिन बुलबुलों के बनने की क्रियाविधि और आवाज़ का स्रोत विवाद का विषय रहा है।
जैसे 2015 में अलबर्टा विश्वविद्यालय के ग्रेगरी कॉचुक और उनके साथियों ने चटकाने की प्रक्रिया का एमआरआई अध्ययन किया। यह अध्ययन दस MCP जोड़ों पर किया गया था। उन्होंने चटकने वाली उंगली को एक लंबी लचीली नली में पिरोकर उसका एमआरआई अध्ययन (MRI scan) किया था। शोधकर्ताओं ने पाया कि आवाज़ आने के बाद भी बुलबुला मौजूद था। यानी आवाज़ बुलबुले के निर्माण के समय आई थी, न कि बुलबुला फटने के कारण।
कॉचुक व साथियों ने बुलबुला बनने के कारण के रूप में ट्राइबोन्यूक्लिएशन (tribonucleation) नामक क्रियाविधि सुझाई थी। इसमें होता यह है कि दो सतहें एक आसंजन (चिपकू) बल द्वारा चिपकी होती हैं। जब उन्हें अलग-अलग करने के लिए लगाया जा रहा बल इस आसंजन बल से अधिक हो जाता है तो सतहें अलग-अलग होने लगती हैं लेकिन उन्हें चिपकाकर रखने वाला द्रव उतनी तेज़ी से फैल नहीं पाता। लिहाज़ा वहां वाष्प की एक गुहा (कैविटी) बन जाती है। द्रव में मौजूद गैसें बुलबुले के रूप में बाहर निकलने लगती हैं। इस प्रक्रिया को ट्रायबोन्यूक्लिएशन कहते हैं। लेकिन चटकने की आवाज़ इस खाली स्थान के बनने के समय ही पैदा हो जाती है, उसके वापिस पिचकने से पहले।
इसके बाद 2017 में रॉबर्ट बूटिन और उनके साथियों ने चटकते जोड़ों में सोनोग्राफी की मदद से इकोजेनिक क्षेत्रों की पहचान की। ये वे क्षेत्र होते हैं जो सोनोग्राफी (sonography) करते समय ध्वनि तरंगों को परावर्तित कर देते हैं। उनके अध्ययन के निष्कर्ष दर्शाते हैं कि बुलबुले बनने में ट्रायबोन्यूक्लिएशन की प्रक्रिया ही क्रियाशील है।
जब कुछ शोधकर्ताओं ने चटकती उंगलियों की जांच अल्ट्रासोनोग्राफी (ultrasonography) से की तो कुछ अलग ही तस्वीर सामने आई। इस अनुसंधान में 40 सहभागी थे (23 पुरुष और 17 महिलाएं)। इनमें से 30 आदतन उंगलियां चटकाने वाले थे जबकि 10 को ऐसी कोई आदत नहीं थी। शोधकर्ताओं ने इन सबका चिकित्सा इतिहास रिकॉर्ड किया – जैसे वे कितनी बार उंगलियां चटकाते हैं, उनकी हाथों की पकड़ कितनी मज़बूत है वगैरह। इसके बाद सभी सहभागियों के एमसीपी जोड़ की अल्ट्रासोनोग्राफी चटकाने के पहले, उसके दौरान और उसके बाद की गई।
प्रयोग के दौरान 40 सहभागियों के 400 एमसीपी जोड़ों का अवलोकन किया गया। 400 एमसीपी में 62 के तोड़ने-मरोड़ने पर चटक की आवाज़ सुनाई पड़ी। साथ में अल्ट्रासाउंड तस्वीर में चटकाने की क्रिया के दौरान एक चमक दिखाई दी। अल्ट्रासाउंड तस्वीरों में उत्पन्न चमक की मदद से रेडियोलॉजिस्ट सुनाई पड़ने वाली चटक को 94 प्रतिशत सटीकता से पहचान पाए। इससे इतना तो पता चलता है कि चटकने की आवाज़ का सम्बंध जोड़ में गैस के बुलबुले के दबाव में परिवर्तन से जुड़ा है। अलबत्ता, अभी भी यह कहना मुश्किल है कि पहले क्या होता है – चटकने की आवाज़ या चमक। लेकिन अल्ट्रासोनोग्राफी जांच ने इतना तो स्पष्ट कर ही दिया कि चटकने की आवाज़ गैस का बुलबुला फटने से 10 मिलीसेकंड पहले सुनाई पड़ती है। बुलबुले का फटना सोनोग्राम (sonogram) में एक चमक के रूप में दिखता है।
इस मामले में अलबर्टा विश्वविद्यालय के इमेजिंग विशेषज्ञ रिचर्ड थॉमसन ने यह विचार प्रस्तुत किया है कि हो सकता है कि आवाज़ सुनाई पड़ने से पहले ही बुलबुले का बनना शुरू हो जाता है लेकिन अल्ट्रासाउंड तस्वीर में वह पूरा बनने के बाद ही नज़र आता है। यही वह क्षण होता है जब आपको आवाज़ सुनाई पड़ती है। वैसे थॉमसन ने इसी तरह के शोध के लिए एमआरआई का उपयोग किया था। चूंकि उसमें प्रति सेकंड बहुत ज़्यादा तस्वीरें नहीं मिलती हैं (जो उस अध्ययन की सीमा थी) इसलिए वे यह नहीं बता पाए थे कि पहले आवाज़ आती है या बुलबुला बनता है।
और इस सिलसिले में सबसे हालिया शोध चंद्रन सूजा और अब्दुल बरकत (2018) का रहा है। इन्होंने साइन्टिफिक रिपोर्ट्स में उंगलियां चटकाने की आवाज़ की व्याख्या करते हुए एक गणितीय मॉडल प्रकाशित किया था। उनका मत था कि एमआरआई या सिनेरेडियोग्राफी जैसी तकनीकों में विभेदन बहुत कम है (क्रमश: 80-100 फ्रेम प्रति सेकंड और 100 फ्रेम प्रति सेकंड)। जबकि चटकने की आवाज़ का स्रोत पकड़ने के लिए कम से कम 1200 फ्रेम प्रति सेकंड का विभेदन चाहिए। इसलिए उन्होंने एक गणितीय मॉडल (mathematical model) विकसित किया।
उन्होंने दर्शाया कि उनके मॉडल में बुलबुले के आंशिक फूटने के ध्वनि हस्ताक्षर वैसे ही रहे जैसे प्रयोगों में देखे गए थे। तो संभव है कि वाष्प गुहा (vapour cavity) बनने और आंशिक रूप से बुलबुलों के फूटने को मिलाकर चटक की आवाज़ आती हो।
उंगलियां चटकाने का सुख
तो, सवाल यह है कि यदि जोड़ों में सिर्फ गैस के बुलबुले पिचक और फूट रहे हैं तो सुकून क्यों मिलता है।
इस संदर्भ में कैलिफोर्निया के अस्थि सर्जन रोजे मेलिकन का मत है कि जोड़ों की त्वरित हरकत वहां उपस्थित तंत्रिकाओं को भी उत्तेजित कर सकती है, जिसकी वजह से दर्द में कमी आती है और एंडॉर्फिन (endorphin) नामक पदार्थ मुक्त होते हैं। वैसे यह बात अभी प्रमाणित नहीं हुई है।
लगता है कि मामला सिर्फ शरीर की अंदरुनी क्रियाओं यानी कार्यिकी का न हो। कुछ मनोवैज्ञानिक पहलू भी इसमें जुड़े हैं। जैसे एक तो यह है कि उंगलियां चटकाना कुछ लोगों के लिए एक आदत बन जाती है। और जब इससे सुकून मिलता है तो इस आदत को बढ़ावा मिलता है। कुछ लोगों को सिर्फ चटकने की आवाज़ सुनना अच्छा लगने लगता है। लेकिन कहते हैं कि कभी-कभी आसपास के लोगों को इससे परेशानी होती है।
नुकसान
अक्सर अत्यधिक उंगलियां चटकाने वालों को टोका जाता है। कहा जाता है कि इससे नुकसान होगा, उंगलियां कमज़ोर पड़ जाएंगी, गठिया (arthritis) का खतरा बढ़ जाएगा। इस मामले में किए गए कई अध्ययनों में ऐसी सारी चेतावनियों को खारिज किया गया है। हां, कुछ अध्ययनों में यह बात ज़रूर सामने आई है कि आदतन उंगलियां चटकाने से व्यक्ति की उंगलियों में सूजन आ सकती है या पकड़ कमज़ोर पड़ सकती है।
उंगलियां चटकाने के हानिकारक असर को लेकर कई प्रयोग किए गए हैं। इनमें से सबसे मशहूर प्रयोग कैलिफोर्निया के एक चिकित्सक डॉ. डोनाल्ड एल. उन्गर ने किया था। वे यह देखना चाहते थे कि क्या उंगलियां चटकाने से गठिया (आर्थ्राइटिस) होता है। उन्होंने पूरे 50 साल तक अपने बाएं हाथ की उंगलियों को रोज़ाना कम से कम दो बार चटकाया जबकि दाएं हाथ को अछूता छोड़ रखा। बाद में जब उन्होंने दोनों हाथों का एक्सरे (X-Ray) निकाला तो उनमें कोई अंतर नहीं था। किसी में भी गठिया का कोई प्रमाण नहीं था।
खैर, यह तो हुई एक व्यक्ति के निजी प्रयोग की बात लेकिन ज़्यादा व्यापक अध्ययनों के परिणाम भी ऐसे ही रहे हैं।
उदाहरण के लिए, 2017 में हैंड सर्जरी एंड रिहैबिलिटेशन जर्नल में प्रकाशित एक पर्चे में 35 उंगलियां चटकाने वालों और न चटकाने वालों की तुलना की गई थी। आदतन उंगलियां चटकाने वाले लोग दिन में कम से कम पांच बार ऐसा करते थे। यह देखा गया कि उंगलियां चटकाने वालों में मेटाकार्पल के सिरों की उपास्थियां (cartilages) अपेक्षाकृत मोटी हो गई थीं। अलबत्ता, उनके हाथों की पकड़ पर कोई नकारात्मक असर नहीं हुआ था।
ऐसा एक प्रयोग 1975 में रॉबर्ट स्वीज़ी और स्टुअर्ट स्वीज़ी ने किया था। इसके परिणाम वेस्टर्न जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित हुए थे। इस अध्ययन का निष्कर्ष था कि कम उम्र में उंगलियां चटकाने की आदत से बुढ़ापे में एमसीपी जोड़ों में किसी क्षतिकारक परिवर्तन का कोई प्रमाण नहीं है।
दूसरी ओर, जे. कोस्टेलोन और डी. एक्सलरॉड द्वारा एनल्स ऑफ दी रुमेटिक डिसीज़ेस में 1990 में प्रकाशित अध्ययन में 45 वर्ष से अधिक उम्र के 300 मरीज़ों को शामिल किया गया था। 300 में से 74 आदतन उंगलियां चटकाने वाले थे जबकि 226 गैर-चटकाने वाले। दोनों समूहों के हाथों में अतिरिक्त गठिया का कोई लक्षण नहीं दिखा। अलबत्ता, आदतन उंगलियां चटकाने वालों के हाथों में सूजन और पकड़ की कमज़ोरी की संभावना ज़्यादा पाई गई। एक अवलोकन यह था कि उंगलियां चटकाने की आदत का सम्बंध शारीरिक श्रम वाले काम, नाखून चबाने, धूम्रपान और शराब पीने से होता है।
बैंगलुरु प्रयोग
यह प्रयोग एस. कांचन तथा आर. मेघना द्वारा बेंगलुरु में 18-25 वर्ष के 150 कॉलेज छात्रों पर किया गया था। जर्नल ऑफ इकोफिज़ियोलॉजी एंड हेल्थ में 2025 में प्रकाशित इस अध्ययन का निष्कर्ष था कि आदतन उंगलियां चटकाने के प्रमुख हाथ (यानी जिस हाथ का वह व्यक्ति प्रमुखता से इस्तेमाल करता है – डॉमिनेन्ट हाथ) के एमसीपी जोड़ों की गतिशीलता में कमी आती है और पकड़ की मज़बूती (hand grip) भी कम हो जाती है।
2001 में क्रिस्टोफर पीटरसन, चेरिल बार्नेस और लोरेटा डेविस ने उंगलियां चटकाने को लेकर एक अलग ही किस्म का अध्ययन किया था। पीडियॉट्रिक डर्मेटोलॉजी में प्रकाशित इस अध्ययन में जोड़ों पर आने वाले उभारों (नकल पैड्स) पर ध्यान दिया गया था। प्राय: इन सूजननुमा उभारों का कारण पता नहीं चल पाता। और इनके प्रभावों की बात बहुत कम हुई है। यह अध्ययन एक ही मरीज़ (14 वर्षीय बच्ची) पर किया गया था जिसकी कई उंगलियों के जोड़ों पर 3 साल से गठान जैसी दिख रही थीं। शोधकर्ताओं का कहना है कि ये गठानें (knots) उसकी उंगलियां चटकाने की आदत के चलते उभरी हैं।
ऐसा ही लीक से हटकर एक और अध्ययन गौरतलब है। एडवर्ड रॉस, जेनिफर पॉग-मिलर और रॉबर्ट नेप्पो का यह अध्ययन क्लीनिकल किडनी जर्नल में 2023 में प्रकाशित हुआ था। देखा गया कि किडनी रोग के अंतिम दौर के मरीज़ों में सेकंडरी हायपरथॉयराइडिज़्म (यानी थॉयराइड की अति-सक्रियता) प्रकट होती है और मांसपेशियों और कंकाल तंत्र पर उसके विविध लक्षण नज़र आते हैं। इन शोधकर्ताओं के कई मरीज़, जो डायलिसिस पर थे, ने स्वत: बताया था कि उनमें अब उंगलियां चटकाने की क्षमता नहीं रही। आश्चर्य की बात यह रही कि पैराथॉयराइड ग्रंथि को सर्जरी के ज़रिए निकाल देने के बाद उंगली चटकाने की क्षमता लौट आई। मतलब है कि पैराथॉयराइड से सम्बंधित खनिज लवण तथा अस्थि विकारों (bone disorders) का असर उंगलियां चटकाने के कार्यिकीय व यांत्रिकी आधार पर होता है।
कुल मिलाकर लगता है कि उंगलियां चटकाने के तात्कालिक या दीर्घावधि नुकसान का कोई सुस्पष्ट प्रमाण नहीं है। हालांकि कुछेक अध्ययनों में नकारात्मक परिणाम दिखे हैं। लेकिन सभी शोधकर्ता यह चेतावनी दोहराते हैं कि शरीर के बाकी जोड़ों के साथ खिलवाड़ सही नहीं है क्योंकि उनमें से कई जोड़ सिनोवियल जोड़ (synovial joints) नहीं होते। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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