जीन को सक्रिय करने वाले जीन की गुत्थी सुलझी

भरत नागेश 

हमारे शरीर की हर कोशिका में मौजूद DNA में लगभग 20 हज़ार से ज़्यादा जीन्स होते हैं, लेकिन हर जीन हर समय सक्रिय नहीं रहता। शरीर का सही ढंग से विकास और कामकाज तभी संभव हो पाता है जब सही जीन, सही समय पर और सही जगह पर ‘ऑन’ हों। तो, यह कौन तय करता है कि कौन सा जीन कब ऑन होगा? इसका जवाब DNA के उन खास हिस्सों में छिपा है जो जीन्स को सक्रिय करने का संकेत देते हैं। अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने अब कृत्रिम बुद्धि (AI) की मदद से इसी छिपे हुए ‘जेनेटिक स्विच’ (genetic switch) को डिकोड करने में बड़ी सफलता हासिल की है।

रहस्यमयी इनिशिएटर 

वैज्ञानिकों ने डीएनए के जिस भाग पर शोध किया, उसे इनिशिएटर (initiator) कहते हैं। यह वह जगह है जहां से किसी जीन में मौजूद जानकारी को प्रतिलेखन-अनुलेखन के माध्यम से प्रोटी न या किसी अन्य ज़रूरी अणु में बदलने की प्रक्रिया शुरू होती है। दूसरे शब्दों में कहें, तो इनिशिएटर वह स्टार्ट बटन है, जो तय करता है कि जीन की गतिविधि कहां से शुरू होगी। यह जीन अभिव्यक्ति (gene expression) की पूरी प्रक्रिया की नींव माना जाता है, क्योंकि शरीर में एंज़ाइम, हॉर्मोन और तमाम ज़रूरी प्रोटीन इसी प्रक्रिया के ज़रिए बनते हैं।

अब तक वैज्ञानिकों के लिए यह एक बड़ी पहेली रही है कि आखिर डीएनए की अरबों क्षार-जोड़ियों (base pairs) में इस इनिशिएटर को ठीक-ठीक कैसे पहचाना जाए। इसकी बनावट इतनी जटिल और विविधतापूर्ण थी कि पारंपरिक तरीकों से इसका पूरा पैटर्न समझना मुश्किल हो रहा था।

खोज प्रक्रिया

इस शोध का नेतृत्व कैलिफोर्निया के मॉलीक्यूलर बायोलॉजी विभाग के प्रोफेसर जेम्स टी. कैडोनागा (James T. Kadonaga) और ग्रेजुएट रिसर्चर टॉरी राइन-कैरिग (Torrey Rhyne-Carrigg) ने किया। टीम ने सबसे पहले हाई-थ्रूपुट अनुक्रमण (High-throughput DNA sequencing) तकनीक का इस्तेमाल करते हुए डीएनए के लगभग 5,00,000 अलग-अलग वैरिएंट अनुक्रम तैयार किए और उनकी गतिविधि को मापा। इस तकनीक की मदद से एक साथ बहुत बड़ी संख्या में डीएनए अनुक्रम को तेजी से पढ़ा जा सकता है।

इसके बाद इन आंकड़ों का इस्तेमाल एक मशीन लर्निंग मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए किया गया। इस मॉडल ने लाखों अनुक्रमों का विश्लेषण करके यह सीखा कि इनिशिएटर की पहचान करने वाला क्षार-जोड़ी पैटर्न (base pair pattern) आखिर होता क्या है। यह मॉडल पहली बार मानव जीन्स में इनिशिएटर की उपस्थति या अनुपस्थिति का सटीक अनुमान लगाने में सफल रहा, और लगभग 60 प्रतिशत मानव जीन्स में इस इनिशिएटर को सफलतापूर्वक पहचान लिया गया।

प्रोफेसर कैडोनागा के मुताबिक, यह पहली बार है जब किसी एआई मॉडल ने डीएनए में मौजूद इनिशिएटर की मौजूदगी का इतना मज़बूत और भरोसेमंद अनुमान दिया है। इसके आधार पर डीएनए के इस क्षार अनुक्रम पैटर्न को असल मायनों में डिकोड (decode) किया जा सका।

खोज का महत्व

यह शोध सिर्फ अकादमिक जिज्ञासा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके कई व्यावहारिक और चिकित्सकीय पहलू भी हैं:

1. बीमारियों को समझने में मदद: जब इनिशिएटर जैसे नियामक क्षेत्रों में उत्परिवर्तन होता है, तो जीन की गतिविधि गड़बड़ा सकती है, जिससे कोशिकाओं में खराबी आ सकती है। यह गड़बड़ी कैंसर सहित कई गंभीर बीमारियों से जुड़ी मानी जाती है। अब वैज्ञानिक इस नए मॉडल की मदद से यह अनुमान लगा सकेंगे कि कोई खास उत्परिवर्तन इनिशिएटर को कैसे प्रभावित करेगा और उससे जीन गतिविधि (gene activtiy) में क्या बदलाव आ सकता है।

2. सिंथेटिक प्रमोटर डिज़ाइन करना: इस शोध से मिले आंकड़े भविष्य में सिंथेटिक प्रमोटर डिज़ाइन करने में मदद कर सकते हैं। ये ऐसे कृत्रिम डीएनए अनुक्रम (artificila DNA sequences) होते हैं जिन्हें खास मकसद के हिसाब से जीन्स को चालू या बंद करने के लिए तैयार किया जाता है। इनका इस्तेमाल जीन थेरपी, बायोटेक्नोलॉजी और सिंथेटिक बायोलॉजी जैसे क्षेत्रों में हो सकता है।

3. जीनोम की समझ: मानव जीनोम में सिर्फ जीन्स ही नहीं, बल्कि उन्हें नियंत्रित करने वाले असंख्य नियामक घटक भी मौजूद हैं। इन घटकों को डिकोड करना पूरे जीनोम की भाषा (genome understanding) को समझने की दिशा में एक अहम कदम है।

वास्तविक प्रयोग और कृत्रिम बुद्धि का मेल

डीएनए का यह चालू-बंद स्विच (DNA switch) दशकों से एक पहेली बना हुआ था। इस अध्ययन की सबसे खास बात यह रही कि इसमें पारंपरिक प्रयोगों और कृत्रिम बुद्धि (एआई) की आधुनिक तकनीक, दोनों को साथ लाया गया। पहले वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में बड़े पैमाने पर आंकड़े जुटाए और फिर उस एक एआई मॉडल को इन आंकड़ों के आधार पर प्रशिक्षित किया ताकि वह पैटर्न पहचान सके। यह तरीका भविष्य में जीनोम की अन्य उलझनों को समझने के लिए भी एक मॉडल के तौर पर काम आ सकता है।

आगे की राह

हालांकि इस शोध ने लगभग 60 प्रतिशत मानव जीन्स में इनिशिएटर को पहचान लिया है, फिर भी बाकी बचे जीन्स में इनकी पहचान करना अभी बाकी है। वैज्ञानिकों का अगला लक्ष्य होगा कि वे मॉडल (model) को और बेहतर बनाएं, ताकि बाकी जीन्स में भी इनिशिएटर या उससे मिलते-जुलते नियामक घटकों को खोजा जा सके। इसके अलावा, यह समझना भी ज़रूरी होगा कि अलग-अलग प्रकार की कोशिकाओं और ऊतकों में यह स्विच किस तरह अलग-अलग व्यवहार करता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://www.sciencedaily.com/images/1920/biological-dna-structure-with-gene-mutation.webp

एक जीन में उत्परिवर्तन का दोहरा प्रभाव

अर्पिता व्यास 

मच्छर मलेरिया सहित कई रोगों का वाहक है। एक अनुमान के मुताबिक 2024 में दुनिया के 80 देशों में मलेरिया के पौने तीन करोड़ से ज़्यादा मामले सामने आए थे और इसकी वजह से 6 लाख से अधिक मौतें हुई थीं। मलेरिया के प्रमुख वाहक मच्छर एनॉफिलीज़ प्रजातियों के होते हैं। मलेरिया पर नियंत्रण का एक प्रमुख तरीका मच्छरों पर नियंत्रण का रहा है। इसके लिए कीटनाशकों (insecticide) का व्यापक उपयोग भी किया गया है।

1950 के दशक में मलेरिया की रोकथाम के लिए डाइएल्ड्रिन नामक कीटनाशक का छिड़काव किया गया था। यह एनॉफिलीज़ मच्छर को मारता था। लेकिन कुछ ही सालों में इसका असर होना बंद हो गया क्योंकि डाइएल्ड्रिन छिड़काव के बाद वही मच्छर जिंदा बचे जिनमें Rdl (resistance to dieldrin) जीन में उत्परिवर्तन मौजूद था और उनकी संख्या बढ़ने लगी। प्रतिरोध पैदा हो जाने के कारण डाइएल्ड्रिन का उपयोग बंद कर दिया गया। साथ ही डाएल्ड्रिन की विषाक्तता को लेकर चिंताएं भी बढ़ गई थीं।

दशकों बाद भी मच्छरों में इनमें से एक उत्परिवर्तन बना रहा। क्योंकि इस उत्परिवर्तन का एक असर यह भी था कि यह इन मच्छरों को डाइएल्ड्रिन के अलावा अन्य कीटनाशकों के खतरे से भी सुरक्षा प्रदान करता था। Rdl मच्छरों में डाइएल्ड्रिन एक रिसेप्टर (GABA receptor) पर काम करता है। अन्य कई कीटनाशक भी इसी रिसेप्टर को निशाना बनाते हैं। लेकिन साथ ही यह उत्परिवर्तन उनकी सक्रियता को कम करता था।

अब एक नए अध्ययन ने इस मामले में और प्रकाश डाला है। अपने मूल रूप में Rdl कई जंतुओं की संवेदनाओं को मंद करता है। यह देखा गया कि एनॉफिलीज़ मच्छरों में यह उनकी आवाज़ के प्रति संवेदना को मंद करता है। लेकिन उत्परिवर्तन के बाद इसकी यह भूमिका जाती रही और परिणामस्वरूप उत्परिवर्तित Rdl वाले मच्छर आवाज़ों के प्रति अधिक संवेदनशील (auditory sensitivity) हो गए।  गौरतलब है कि मच्छर संभोग के लिए साथी की तलाश के लिए मुख्यत: ध्वनि संकेतों का सहारा लेते हैं। नर मच्छर मादा के पंखों की हल्की फड़फड़ाहट पर ध्यान देकर साथी ढूंढते हैं। ध्वनि संवेदना बढ़ जाने पर वे शहरी इलाकों के शोर में भी अपने लिए साथी ढूंढ लेते हैं। यानी यह उत्परिवर्तन ज़हर से तो बचाता ही है, साथी ढूंढने में भी मददगार (mating advantage) होता है।

स्पैनिश नेशनल रिसर्च काउंसिल की न्यूरोबायोलॉजिस्ट मार्टा एंड्रेस ने इसकी जांच करने के लिए प्रयोग किए। उन्होंने अपने प्रयोगों में पाया था कि Rdl वह जीन है जिसमें उत्परिवर्तन से डाइएल्ड्रिन-प्रतिरोध (dieldrin resistance) पैदा होता है। यह जीन मूल रूप में मच्छर की श्रवण तंत्रिकाओं की सक्रियता को कम करता है। Rdl में उत्परिवर्तन होने से श्रवण तंत्रिकाएं ज़्यादा क्रियाशील हो जाती हैं। यानी वे मादा मच्छरों के पंखों की फड़फड़ाहट की ध्वनि को बेहतर सुन पाते हैं। बारी आई प्रयोगशाला में अध्ययन की।

उन्होंने एक स्पीकर से 300–550 हर्ट्ज़ आवृत्ति की आवाज़ पैदा जो मादा के पंखों की फड़फड़ाहट के लगभग समान थी। प्रयोग में देखा गया कि Rdl उत्परिवर्तित (Rdl mutated mosquitoes) नर मच्छरों की स्पीकर पर पहुंचने की संभावना अपेक्षाकृत ज़्यादा थी।

लेकिन मादा को खोज लेने का मतलब यह नहीं माना जा सकता कि नर उनके साथ संभोग (successful mating) में भी सफल होंगे। इसकी जांच के लिए शोधकर्ताओं ने 25 नर मच्छरों को 25 मादाओं के साथ छोटे पिंजरों में रखा, फिर उन्हें 48 घंटे के लिए दो अलग-अलग इनक्यूबेटर में रखा – एक में शोर 70 डेसीबल का था और दूसरे में 93 डेसीबल का (लगभग शहरों जैसा) था। दोनों परिस्थितियों उत्परिवर्तित मच्छरों में तो संभोग लगभग बराबर (40 प्रतिशत) रहा जबकि गैर-उत्परिवर्तित मच्छरों में यह दर ज़्यादा शोर वाले इन्क्यूबेटर में घटकर 33 प्रतिशत रह गई।

इस प्रयोग से स्पष्ट निष्कर्ष निकालने में एक समस्या यह है कि मच्छरों और हम मनुष्यों में ध्वनि संवेदना के ढंग थोड़े अलग-अलग हैं। जहां मनुष्य मूलत: ध्वनि स्रोत से उत्पन्न दबाव की तंरगों का सहारा लेते हैं, वहीं मच्छर ध्वनि स्रोत के आसपास कणों के कंपनों को भांपते हैं। इस वजह से दोनों मामलों में शोर को परिभाषित करने में अंतर होगा।

शोधकर्ताओं ने अपने निष्कर्षों की जांच वास्तविक परिस्थिति में भी की है। उन्होंने पाया कि शोरगुल वाले परिवेश में उत्परिवर्तन की दर ज़्यादा थी। और तो और, जिन मादाओं में यह उत्परिवर्तन नहीं था उनमें संभोग करने की संभावना ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शोर भरे शहरों में कम थी। अलबत्ता, सीधे-सीधे कोई निष्कर्ष निकालना मुश्किल है क्योंकि शहरी और ग्रामीण परिवेश में और भी कई अंतर होते हैं।

कीटनाशक का उपयोग समाप्त होने के लंबे समय बाद भी उत्परिवर्तन की निरंतरता का अध्ययन करना महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। यदि हम कुछ समय के लिए किसी कीटनाशक का उपयोग करते हैं और जेनेटिक बदलाव (genetic modifications) कर देते हैं, तो जीवों की शारीरिक क्रिया में परिवर्तन आ जाता है। यह वास्तव में पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलन बिगाड़ देता है। यहां एक और महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है: एक जीन में होने वाले परिवर्तन दो अलग-अलग तरह के प्रभाव दर्शा सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://www.science.org/do/10.1126/science.z2v2318/full/_20260804_on_mosquito_breeding.jpg

पांच करोड़ वर्ष पहले की जंगल गाथा              

डॉ. किशोर पंवार

इन दिनों ग्लोबल वार्मिंग की चर्चा कुछ ज़्यादा ही हो रही है और तरह-तरह के पर्यावरणीय खतरों की बातें अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर होती रहती हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि ग्लोबल वार्मिंग हमारी पृथ्वी के इतिहास में पहली बार हो रहा है। जियोलॉजिकल इतिहास (geological history) को देखें तो पता चलता है कि ऐसा पूर्व में भी हो चुका है; इस धरा पर हमारे पदार्पण से करोड़ों वर्षों पहले। यह घटना लगभग पांच करोड़ साठ लाख वर्ष पूर्व जिस काल खंड में घटी थी उसे पैलियोसीन-इयोसीन थर्मल मैक्सिमम (पीईटीएम) (Paleocene-eocene thermal maximum- PETM) कहा गया है। पृथ्वी के इतिहास में 6.6 करोड़ से 5.6 करोड़ वर्ष पूर्व की अवधि को पैलियोसीन युग और 5.6 करोड़ से 3.39 करोड़ वर्ष पूर्व की अवधि को इयोसीन युग कहा जाता है।

हाल ही में अमेरिका में जीवाश्म वैज्ञानिकों के एक दल ने उस कालखंड के वनों के घनेपन (Forest density) के बारे में बहुत ही शानदार जानकारी उपलब्ध कराई है। यह आश्चर्यजनक है कि जब हम नहीं थे, उस अतीत के बारे में इतनी विस्तार पूर्वक जानकारी कैसे हासिल की गई। आइए देखते हैं।

यह महती काम सैमुअल ऑश्चिन ग्लोबल सेंटर फॉर आइस एज रिसर्च की रेगन डन, व्योमिंग विश्वविद्यालय में प्रोफसर एलेन कुरानो और उनकी टीम ने किया है। टीम ने व्योमिंग के हैना बेसिन से पीईटीएम से पहले और बाद के सैकड़ों नमूने एकत्र करके उन प्राचीन जंगलों के जीवाश्म प्रमाणों की खोज की। इस जीवाश्म रिकॉर्ड (fossil records) का उपयोग करते हुए उन्होंने उस काल की गाथा को पुनः रचा है। आज से लगभग पांच करोड़ साठ लाख वर्ष पूर्व, पृथ्वी के वन एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गए थे। वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन के आधार पर बताया है कि पृथ्वी पर ग्रीनहाउस प्रभाव के सबसे तीव्र दौरों में से एक की शुरुआत में तो जंगल ज़्यादा घने और हरे-भरे हो गए थे। लेकिन फिर यह वृक्षावरण झीना होने लगा। वैश्विक तापमान में 6 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि के कारण गर्मी और सूखे ने जंगलों पर दबाव डाला, जिससे बड़ी संख्या में पेड़ नष्ट हो गए। जंगलों की ऊपरी छतरी खुल गई, जिससे ज़मीन पर अधिक सूर्य की रोशनी पड़ने लगी और भूभाग में पानी की गति में बदलाव आ गया।

वैज्ञानिकों ने यह अध्ययन अमेरिका के एक राज्य दक्षिण व्योमिंग (south wyoming) में किया है जहां पर फॉसिल ब्यूट राष्ट्रीय स्मारक स्थित है। यहां पर पांच करोड़ साठ लाख वर्ष पूर्व से लेकर तीन करोड़ चालीस लाख वर्ष पूर्व के जंतुओं और पौधों के शानदार जीवाश्म मिलते हैं।

ऊपरी परत (चंदवा या कैनपी) जंगल की भू-सतह तक पहुंचने वाले प्रकाश की मात्रा, तापमान, जलीय आवास और वन द्वारा संग्रहित की जा सकने वाली कार्बन की मात्रा को नियंत्रित करती है। इस तरह, यह कैनपी और इसका घनापन पारिस्थितिक तंत्र के कार्य करने के तरीके का सबसे स्पष्ट संकेतक बन जाते हैं। वर्तमान जंगलों के घनेपन के आकलन का सर्वोत्तम तरीका लीफ एरिया इंडेक्स (Leaf Area Index – LAI) का है।

लीफ एरिया इंडेक्स

यह पत्तियों के कुल क्षेत्रफल और पेड़ के नीचे की भूमि के क्षेत्रफल का अनुपात है – इसमें नापा जाता है कि पेड़ों का फैलाव कितनी भूमि पर है और उन पेड़ों की पत्तियों का कुल क्षेत्रफल कितना है। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मापदंड है। यह तो जानी-मानी बात है कि किसी पेड़ पर सारी पत्तियां एक बराबर ऊंचाई पर नहीं लगी होतीं – वे अलग-अलग परतों में जमी होती हैं। इसके अध्ययन को फिलोमेट्री (phyllometry) कहा जाता है। सबसे ऊपर वाली पत्तियों पर भरपूर प्रकाश पड़ता है, निचली पत्तियों पर कम। अंतत: नीचे की ज़मीन जो प्रकाश पहुंचेगा वह इन सारी पत्तियों की रुकावट के बाद ही पहुंचेगा। वनों का घनापन छाया, तापमान, जल हानि और प्रकाश संश्लेषण को प्रभावित करता है।

लेकिन सवाल तो यह है कि साढ़े पांच करोड़ वर्ष पूर्व अस्तित्व में रहे जंगलों का लीफ एरिया इंडेक्स कैसे निकाला जाए।

पुरातन जंगल का लीफ एरिया इंडेक्स

डन, कुरानो और उनके साथियों ने इसी सवाल के जवाब में एक नया तरीका खोज निकाला है। यह देखा गया है कि पत्तियों की कोशिका का आकार (shape of leaf cells) उनके विकास के दौरान प्राप्त धूप की मात्रा को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, छाया में उगने वाली पत्तियां धूप की तलाश में फैलते समय लंबी और अधिक चौड़ी कोशिकाएं विकसित करती हैं। वहीं, अधिक धूप में उगने वाली पत्तियां छोटी और गोल कोशिकाएं विकसित करती हैं।

लेकिन इसका अध्ययन तो आजकल की पत्तियों में किया जा सकता है। साढ़े पांच करोड़ वर्ष पूर्व (5 crore yeras ago) जो पत्तियां गिरी होंगी वे तो पूरी तरह सड़-गल गई होंगी। यानी उनकी कोशिकाओं का अध्ययन तो हो नहीं सकता। यहां एक दूसरा सुराग काम आया। यह सुराग था पत्ती की क्यूटिकल के टुकड़े।

पत्ती की सबसे बाहरी जीवित परत (एपिडर्मिस) के ऊपर एक पतली सुरक्षा परत चढ़ी होती है जिसे क्यूटिकल कहते हैं। क्यूटिकल एक अघुलनशील पॉलीमर से बनी होती है। यह जल-अवरोधी गुण (water-resistent quality) प्रदान करती है। इसकी रचना, आकार-प्रकार एपिडर्मिस कोशिकाओं से मेल खाते हैं। अतः क्यूटिकल के अध्ययन से एपिडर्मिस कोशिकाओं की रचना के बारे में खास जानकारी मिलती है। रोचक बात है कि क्यूटिकल का अपघटन करोड़ों सालों तक नहीं होता। पौधों के जीवाश्म अवसादी (तलछटी) चट्टानों में पाए जाते हैं जिनमें ऑक्सीजन का सीमित संचय होता है। इनमें जीवाश्म का संरक्षण अच्छी तरह से हो जाता है। जीवाश्मों में पत्तियों के ये खंडित क्यूटिकल अवशेष संरक्षित हैं।

वैज्ञानिकों ने क्यूटिकल और एपिडर्मिस कोशिकाओं के इस सम्बंध को प्राचीन जंगलों के पुनर्निर्माण के लिए एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया। इसे सटीक रूप से समझने के लिए, पहले उन्होंने मध्य और दक्षिण अमेरिका के वर्तमान जंगलों से मिट्टी के नमूने लिए, जिनमें विभिन्न सघनता (varied plant density) वाले पेड़ों की एक विस्तृत शृंखला शामिल थी। मिट्टी के प्रत्येक नमूने में कई अलग-अलग पेड़-पौधों द्वारा छोड़ी गई क्यूटिकल पाई जाती है।

क्यूटिकल और एपिडर्मिस (leaf cuticle & epidermis) कोशिकाओं की रचना (गोल बनाम लंबी) की तुलना करने पर स्पष्ट हो गया कि अधिक घनी कैनपी वाले नमूनों में अधिक लंबी कोशिकाएं दिखाई देती हैं, जबकि विरल कैनपी नमूनों में अधिक गोलाकार कोशिकाएं पाई जाती हैं। शोधकर्ताओं ने पेड़ के नीचे की भूमि पर कैमरे लगाए, जिनके मुंह ऊपर की ओर थे। इनमें कैद तस्वीरों से पता चल गया कि भूमि पर कितनी रोशनी पहुंच रही है जो जंगल के घनेपन का द्योतक है। फिर इसका सम्बंध उन्होंने क्यूटिकल की कोशिकाओं से जोड़ा।

क्यूटिकल के आधार पर हज़ारों एपिडर्मिस कोशिकाओं के आकार की तुलना शोधकर्ताओं ने उनके द्वारा वास्तव में आकलित लीफ एरिया इंडेक्स से की। देखा गया कि पत्ती की कोशिकाओं का आकार लीफ एरिया इंडेक्स से और इस प्रकार से जंगल के घनत्व से निकट से संम्बधित है। कोशिकाएं जितनी अधिक लंबी होती हैं, उनके ऊपर वन आवरण उतना ही घना होता है। इस रिश्ते ने लाखों साल पहले व्योमिंग के जंगलों की बनावट का पुनर्निर्माण करने और यह दिखाने में मदद की कि समय के साथ वे कैसे बदलते रहे। (LAI & forest density relation)

पीईटीएम के दौरान वन संरचना में आए बदलावों (forest development changes) को समझना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे हमें पता चलता है कि वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा बहुत अधिक बढ़ने से पौधों की वृद्धि, बायोमास और उत्पादकता कैसे प्रभावित होती है। अत्यधिक कार्बन डाईऑक्साइड वनों के लिए हानिकारक है क्योंकि इसके साथ होने वाली गर्मी और सूखा पेड़ों पर दबाव डालते हैं और इससे कई पेड़ों की मृत्यु हो जाती है।

इस शोध से पता चलता है कि पीईटीएम के दौरान, वनों की ऊपरी परत अधिक खुली (open canopy) हो गई थी, बड़े पेड़ों की संख्या कम हो गई थी, और इस बदलाव ने जलवायु, पोषक तत्वों के चक्रण, अपक्षय और निश्चित रूप से, वनों में रहने वाले जानवरों को प्रभावित किया।

जंगल: हद कर दी आपने

एक बात यह पता चली कि तीव्र वैश्विक तापमान वृद्धि शुरू होने से ठीक पहले, वनों का घनत्व अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया था, जो संभवतः वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने का परिणाम था क्योंकि कार्बन डाईऑक्साइड पेड़-पौधों को प्रकाश संश्लेषण के ज़रिए कार्बोहायड्रेट व अन्य सामग्री के निर्माण में मददगार होती है। लिहाज़ा, वातावरण में अधिक कार्बन डाईऑक्साइड हो, तो प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) ज़्यादा होगा और उनकी वृद्धि भी ज़्यादा होगी।   

लेकिन कार्बन डाईऑक्साइड का एक अन्य असर भी होता है – ग्रीनहाउस प्रभाव (green house effect), जिसके कारण तापमान बढ़ता है। तो वह शुरुआती हरा-भरा जंगल ज़्यादा समय तक नहीं टिक पाया। तापमान बढ़ने के साथ-साथ, गर्मी और सूखे के चलते पेड़ों के मरने से जंगल की ऊपरी परत तेज़ी से झीनी होती गई।

लेकिन 5.6 करोड़ वर्ष पूर्व के प्राचीन जंगलों की कहानी उनके पतन के साथ समाप्त नहीं होती है। समय के साथ, गर्म जलवायु में चट्टानों के विघटन (जिसे अपक्षय कहा जाता है) (rock weathering) की प्रक्रिया ने धीरे-धीरे हवा से कार्बन को खींचकर समुद्री तलछट में जमा कर दिया। इससे एक बार फिर वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड में कमी आई, जिसके परिणामस्वरूप जलवायु ठंडी हुई और पानी अधिक आसानी से उपलब्ध हो गया। वन आवरण फिर से विकसित हो गए और अंततः वैश्विक तापमान वृद्धि शुरू होने से पहले की तुलना में और भी अधिक घने हो गए। वनों के विस्तार के साथ, संभवतः मिट्टी को स्थिर करने, जल-चक्र को नियंत्रित करने और वायुमंडल से कार्बन को अवशोषित करने की उनकी क्षमता बहाल हो गई। जब पेड़-पौधे फिर से अधिक कार्बन डाईऑक्साइड सोखने लगे तो ग्रीनहाउस प्रभाव को कम करने और ग्रह के दीर्घकालिक पुनरुद्धार को बढ़ावा देने में मदद मिली। लेकिन इसमें एक लाख वर्षों से भी अधिक समय लगा।

वर्तमान परिदृश्य

इस घटनाक्रम में आज के लिए एक महत्वपूर्ण सबक छिपा है। दुनिया में इस समय कार्बन डाईऑक्साइड की बढ़ती मात्रा पेड़-पौधों की वृद्धि को बढ़ावा दे सकती है, लेकिन केवल तभी जब तापमान और पानी पेड़ों की सहनशीलता की सीमा (saturation limit) के भीतर रहें। एक हद से ज़्यादा गर्मी, सूखा, कीड़े, रोगजनक और जंगल की आग कार्बन डाईऑक्साइड के किसी भी वृद्धिकारक प्रभाव को खत्म कर सकते हैं।

विश्व भर में, तापमान में वृद्धि (temperature increase) के साथ-साथ लकड़ी, फसलों और चारागाहों के लिए वनों की कटाई से जंगलों की सहनशीलता और भी कम हो रही है, जिसके कारण कई जंगलों में पहले से ही कम होने के संकेत दिखने  लगे हैं।

आज, मानव जनित कार्बन उत्सर्जन और वैश्विक तापमान में वृद्धि उस काल की तुलना में कहीं अधिक तेज़ी से हो रही है। जीवाश्म रिकॉर्ड यह तो बताते हैं कि वन पुनर्जीवित (forest restoration) हो सकते हैं, बशर्ते मनुष्य उन्हें उन सीमाओं से आगे न धकेलें, जिनसे उबरने में लाखों वर्ष लग जाते हैं।

इस अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता डन आगे कहती हैं, “पेड़ अद्भुत हैं। जंगल हर दिन करोड़ों टन कार्बन सोखते हैं, लेकिन जब जंगल कम होने लगते हैं, तो कार्बन सोखने वाले सोख्ते भी कम होने लगते हैं। पीईटीएम हमें याद दिलाता है कि जब जंगल कम होते हैं, तो इसके दूरगामी परिणाम पूरे जलवायु तंत्र पर पड़ते हैं। मानव जनित जलवायु परिवर्तन की अभूतपूर्व गति को कम करने में वनों की क्षमता को देखते हुए, इनकी रक्षा और पुनर्स्थापन (forest re-establishment & conservation) करना ही बुद्धिमानी होगी।” (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://www.sciencenews.org/wp-content/uploads/sites/2/2020/04/040120_cg_antarctica_forest_feat.jpg

दुनिया में कितनी कीट प्रजातियां हैं

जीव वैज्ञानिकों ने पिछली तीन सदियों के प्रयासों से अब तक करीब 10 लाख कीट प्रजातियां पहचानकर उनका वर्णन किया है। कीट पृथ्वी पर जीवों का सबसे अधिक विविधतापूर्ण समूह (diverse group) है। इनमें आधे मीटर साइज़ की ततैया से लेकर अनाज के दाने के बराबर कीट भी हैं, और पानी में रहने वाले कीटों से लेकर ज़मीन में बिल बनाकर रहने वाले और हवा में उड़ने वाले कीट भी हैं।

अब प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ (यूएस) में प्रकाशित एक नया अध्ययन बताता है कि वैज्ञानिकों द्वारा खोजे गए कीट शायद वास्तविक संख्या (exact insect population) का एक छोटा-सा अंश ही हैं। इस अध्ययन में सांख्यिकी की विधियों का उपयोग करके यह अद्भुत आंकड़ा प्रस्तुत किया गया है कि पृथ्वी पर कीट प्रजातियों की संख्या संभवत: 2 करोड़ तक हो सकती है। यह पूर्व अनुमानों (60 लाख प्रजातियां) से 3 गुना से भी अधिक है।

एक बेहतर अनुमान लगाने के लिए कनेक्टिकट विश्वविद्यालय के कीट वैज्ञानिक रॉबर्ट कोलवेल और उनके साथियों ने कोस्टा रिका गुआनाकास्टे राष्ट्रीय उद्यान में पिछले कई वर्षों में किए गए कीट सर्वेक्षणों (insect survey) से प्राप्त आंकड़ों का अध्ययन किया और फिर इन आंकड़ों पर रोग-प्रसार विज्ञान में प्रयुक्त की जाने वाली सांख्यिकीय विधियों को लागू किया।

शुरुआत में उन्होंने पैरासिटॉइड ततैयों (parasitoid wasps) के एक उपकुल (माइक्रोगैस्ट्रीने) पर गौर किया। पैरासिटॉइड (parasitoid) उन कीटों को कहते हैं जो अपने जीवन चक्र की अपरिपक्व अवस्था में किसी अन्य पर परजीवी होते हैं। इन ततैयों का काफी विस्तृत व बारीकी से अध्ययन किया गया है। वैज्ञानिकों ने कोस्टा रिका (costa rica) में पाई जाने वाली ऐसी 3000 प्रजातियों का वर्णन किया है। तो कोलवेल की टीम ने यह जांच करने की ठानी कि उद्यान में किए गए कीट सर्वेक्षण इन ततैयों की विविधता का प्रतिनिधित्व करते हैं या नहीं।

पिछले कई वर्षों में उद्यान में उड़ने वाले कीटों का सर्वेक्षण करने के लिए वैज्ञानिकों ने जो ट्रैप (शिकंजे) लगाए थे उनमें से मुख्य सेट में माइक्रोगैस्ट्रिने (microgastrinae) की 388 प्रजातियों का ब्यौरा दिया गया। इसके अलावा कुछ अतिरिक्त शिकंजों में 578 प्रजातियों को पहचाना गया। जब वैज्ञानिकों ने उन इल्लियों (कैटरपिलर) पर गौर किया जो परजीवी प्रकोप का शिकार हुई थीं, तो उन्हें 889 ततैया प्रजातियों का पता चला।

रोचक बात यह रही कि जब कोलवेल की टीम ने इन दो समूहों को एक साथ देखा, तो पाया कि शिकंजों में कैद हुई प्रजातियां और कैटरपिलर की जांच से दिखी प्रजातियां एकदम अलग-अलग थीं – यानी इन दो समूहों के बीच ओव्हरलैप (अतिव्याप्ति) (species overlap) बहुत कम था। इसका एक ही मतलब हो सकता है कि ये दोनों विधियां उद्यान में उपस्थित माइक्रोगैस्ट्रिने प्रजातियों के एक-एक अंश को ही देख पा रही थीं। यदि दोनों तरीकों को जोड़कर सांख्यिकीय विधियां लागू की जाए, तो पता चलता है कि उद्यान में पूरी-पूरी 2394 माइक्रोगैस्ट्रिने प्रजातियां मौजूद हैं।

यदि यह सही है, तो इसका मतलब है कि सर्वेक्षणों ने उद्यान के केंद्रीय भाग की माइक्रोगैस्ट्रिने प्रजातियों के मात्र छठे भाग (लगभग 16 प्रतिशत) को उजागर किया है। यदि इस प्रतिशत को पूरे उद्यान (53,945 ज्ञात प्रजातियां) पर लागू किया जाए, गुआनाकास्टे उद्यान (guanacaste park) में 3,32,846 प्रजातियां मौजूद हैं जिनमें से अधिकांश का अवलोकन ही नहीं किया गया है।

इसके बाद शोधकर्ताओं ने इन गणनाओं को एक अन्य समूह (वृक्षों) पर लागू करके देखा। पूरी पृथ्वी पर वृक्षों की 73,000 प्रजातियां पाई जाती हैं और गुआनाकास्टे उद्यान में 1200 से 1500 प्रजातियां। अर्थात उद्यान में कुल वैश्विक वृक्ष प्रजातियों (global tree species) का लगभग 1.6 से 2.1 प्रतिशत पाया जाता है। यदि यही प्रतिशत कीटों पर भी लागू होता हो, तो पृथ्वी पर 1.33 करोड़ से 2.47 करोड़ कीट प्रजातियां होनी चाहिए। औसत के आधार पर यह माना जा सकता है कि पृथ्वी पर 2.03 करोड़ कीट प्रजातियां (insect species) होंगी।

अध्ययन दल का कहना है कि उनका अनुमान थोड़ा कम ही बैठेगा। अलबत्ता संरक्षण के लिहाज़ से यह एक अच्छा आंकड़ा हो सकता है। और इससे हमें यह समझने में मदद मिलेगी कि जैव विविधता (biodiversity) का विस्तार कितना व्यापक है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://psu-gatsby-files-prod.s3.amazonaws.com/s3fs-public/styles/16_9_1000w/public/Frost%20Museum%20outreach%20display%20-%20Frost%20Ento%20Museum.jpg?h=aece3988&itok=v-0Y-gmo

जंतु संग्रहालयों के मददगार मांसभक्षी कृमि

जंतु संग्रहालयों के प्रबंधकों के सामने एक बड़ी समस्या यह होती है कि उन्हें प्रदर्शन के लिए मिले कंकालों की सफाई करना होती है क्योंकि इन कंकालों पर मांस चिपका होता है। फिलहाल कई संग्रहालयों (museums) में कंकालों पर से मांस साफ करने के लिए विभिन्न रसायनों या एंज़ाइमों का इस्तेमाल किया जाता है। ये तरीके महंगे होने के अलावा पर्यावरण के लिए हानिकारक भी हो सकते हैं, और कई बार कंकाल को क्षति पहुंचाते हैं।

कुछ संग्रहालयों में इस काम के लिए डर्मेस्टिड भृंग (dermestid beetle) छोड़ दिए जाते हैं ताकि वे कंकालों पर चिपका मांस चट कर जाएं। लेकिन इन भृंगों के समूहों को कैद करके रखना होता है क्योंकि इनमें जीवन चक्र की विभिन्न अवस्थाओं के कीट होते हैं। यदि वयस्क कीट कंकाल पर अपने अंडे छोड़ दें या खुद कैद से निकल भागें तो वे अन्य नमूनों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

अब इस मामले में कृमि उनकी मदद करने वाले हैं। स्टुटगार्ड के स्टेट म्यूज़ियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के निलूफर अलाई कहकी विचार कर रही थीं कि ऐसे कौन-से अन्य कीट हो सकते हैं जो इस काम में मदद कर सकें। उनकी टीम के दिमाग में सुपरकृमियों (superworms) का विचार कौंधा।

सुपरकृमि वास्तव में कीट नहीं हैं बल्कि भृंग (Zophobas atratus) की इल्लियां हैं। ये आसानी से मिल जाते हैं क्योंकि इनका उपयोग पालतू सरिसृपों, उभयचरों, मछलियों और पक्षियों के भोजन के लिए किया जाता है। खास बात यह है कि जब ये बड़े-बड़े समूहों में होते हैं तो प्यूपा में परिवर्तित नहीं होते। अर्थात इनमें से वयस्क कीट नहीं बनते यानी इनके भाग निकलने की संभावना भी नहीं होती। शोधकर्ताओं ने इस विचार को परखा।

उन्होंने अलग-अलग साइज़ और प्रजातियों के विभिन्न मृत जानवरों (dead animals) पर इन्हें छुट्टा छोड़ दिया। पहले तो उन्होंने प्रत्येक मृत जानवर की चमड़ी हटाई और उसके सारे अंग निकल दिए। बड़े जानवरों के ऊतकों को मुलायम करने के लिए उन्हें उबाला गया। इसके बाद इन शवों को एक डिब्बे में रखकर सैकड़ों इल्लियां (सुपरकृमि) डाल दिए गए।

इल्लियों के झुंड ने छोटे जानवरों का मांस तो घंटों में साफ कर दिया, पर बड़े जानवरों के लिए उन्हें एक-दो दिन लगे। और तो और, बड़े जानवरों  की सफाई (skeleton cleaning) के लिए हर आठ घंटे में नई और भूखी इल्लियां डालनी पड़ी। यदि इल्लियों की संख्या बहुत ज़्यादा रही तो उन्होंने छोटे जानवरों की हड्डियां भी चबा डालीं। हां, बड़े जानवरों की हड्डियां सलामत रहीं। कई सारे प्रयोगों के बाद टीम का निष्कर्ष है कि जानवर के प्रति ग्राम शव के लिए 10-15 ग्राम इल्लियां उपयुक्त होती हैं।

वैसे कई संग्रहालय प्रबंधकों का कहना है कि सुपरकृमियों को पालना भोजन वगैरह की दृष्टि से थोड़ा मुश्किल होगा। इसके अलावा इनके नए कीट तैयार करने के लिए (worm rearing) इल्लियों को झुंड से अलग करके रखना होगा। दूसरी ओर, कहकी का मत है कि इन्हें साधारण परिस्थितियों में रखा जा सकता है जबकि डर्मेस्टिड कीटों के लिए संग्रहालय में एक अलग प्रयोगशाला ही बनानी पड़ती है। तो अब कई संग्रहालयों में इनके उपयोग को परखने की बारी है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://cdn.the-scientist.com/assets/articleNo/67251/aImg/36437/superworms-thumb-l.png

ज़ेब्राफिश हमारी तरह सोती है

एक हालिया अध्ययन बताता है कि ज़ेब्राफिश (Danio rerio) की नींद का पैटर्न लगभग मनुष्यों जैसा होता है। एक बड़ा अंतर यह होता है कि ज़ेब्राफिश की पलकें नहीं होती और वे खुली आंखों से सोती हैं। पलकें न होने के बावजूद उनकी आंखें रोशनी बढ़ने-घटने के प्रति प्रतिक्रिया देती हैं। तेज़ रोशनी में उनकी नींद खराब भी होती है।

हमारी तरह ज़ेब्राफिश दिनचर (diurnal) होती हैं और रात में सोती हैं। हमारे समान सोते समय वे निश्चल रहती हैं और पर्यावरण के संकेतों पर प्रतिक्रिया धीमी गति से देती हैं। और तो और, यदि एक रात नींद न मिले, तो अगली रात देर तक सोकर भरपाई करती हैं।

यह सब तो काफी समय से पता है। अब, नेचर कम्यूनिकेशन्स में मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर बॉयोलॉजिकल सायबर्नेटिक्स की जेनिफर मेंगबो ली और उनके साथियों ने बताया है कि ज़ेब्राफिश की नींद में कई अवस्थाएं होती हैं, जो मनुष्यों जैसी हैं। अध्ययन के लिए शोधदल ने एक विशेष स्व-चालित सूक्ष्मदर्शी (Automatic microscope) बनाया, जिसमें कैमरा लगा था। इसकी मदद से उन्होंने 105 चलती-फिरती, सोती, शिकार करती ज़ेब्राफिश का करीबी से अध्ययन किया।

सबसे पहले, उनकी आंखों की हरकतों के आधार पर शोधकर्ताओं ने ज़ेब्राफिश में नींद की चार अवस्थाओं को पहचाना। इन चार में तीन अवस्थाएं रात में नज़र आती है। पहली अवस्था गहरी नींद की होती है जिसमें ज़ेब्राफिश (Zebra fish) की आंखें बेहोशी जैसे एकटक निहारती रहती हैं। जब जागने का समय नज़दीक आता है तो दूसरी हल्की नींद की अवस्था शुरू हो जाती है – इसमें उनकी आंखें फड़कती हैं, दोनों आंखों की पुतलियां एक तरफ जाती हैं और फिर केंद्र में आ जाती हैं। सुबह आने के समय दोनों आंखों की पुतलियां एक तरफ हो जाती हैं और वहीं टिकी रहती हैं। चौथी अवस्था प्राय: दिन के समय छोटी-छोटी अवधि की होती है जब उनकी आंखें तेज़ी से दाएं-बाएं, ऊपर-नीचे होती हैं। 5-10 मिनट की इन झपकियों के दौरान मस्तिष्क की गतिविधियां लगभग ठप हो जाती हैं।

गौरतलब है कि अपने जीवन के पहले तीन सप्ताह तक ज़ेब्राफिश पारदर्शी होती है। इसलिए शोधकर्ताओं के लिए कैल्शियम इमेजिंग (calcium imaging) नामक तकनीक की मदद से यह देखना संभव हुआ कि नींद की किन अवस्थाओं में कौन-सी तंत्रिकाएं (nerves) सक्रिय रहती हैं। इस तरह से शोधकर्ता यह दर्शा पाए कि ज़ेब्राफिश में नींद की विशिष्ट अवस्थाएं (specific states) होती हैं और प्रत्येक के लिए कौन-से तंत्रिका समूह का इस्तेमाल निशानदेही के लिए किया जा सकता है।

इससे एक बात उभरती है कि भले ही ज़ेब्राफिश का मस्तिष्क मनुष्य से छोटा और सरल हो, किंतु वह नींद से जुड़ी क्रियाविधियों को समझने में मददगार हो सकता है। यह भी देखा गया है कि मनुष्यों और ज़ेब्राफिश में नींद का नियमन करने वाले कई जीन्स व तंत्रिकाओं में समानता है और दवाइयों का असर भी लगभग एक जैसा ही होता है।

हालांकि हम जानते हैं कि सारे जंतु जीवन के एक बड़े हिस्से में सोते रहते हैं लेकिन इसका कारण और नियमन की क्रियाविधि अभी पूरी तरह समझी नहीं गई है। शायद ज़ेब्राफिश इसमें मददगार हो।

(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://www.popsci.com/wp-content/uploads/2019/07/12/VS67QYVGDYR7RJ2EVB2VHECT2I.jpg?quality=85&w=1200

ऑक्टोपस ने त्रुटिरहित प्रोटीन निर्माण की राह दिखाई

दक्षिण अफ्रीका में आयोजित 2010 के फीफा विश्व कप फुटबॉल में मैचों के परिणामों की भविष्यवाणी करके पॉल ऑक्टोपस (Octopus vulgaris) काफी मशहूर हुआ था। खैर, वे भविष्यवाणियां जो भी रही हों, लेकिन अब ऑक्टोपस एक जीव वैज्ञानिक कारण से मशहूर होने को हैं। करंट बायोलॉजी में प्रकाशित होने जा रहे एक शोध पत्र में उथले पानी में रहने वाले ऑक्टोपस की नई खूबी का खुलासा किया गया है। इस अध्ययन में देखा गया है कि ऑक्टोपस के कतिपय वंशों (lineages) में ऐसे उत्परिवर्तन (mutations) हुए हैं जो उनमें प्रोटीन संश्लेषण (protein synthesis) को कहीं सटीक बना देते हैं। फायदा यह होता है कि उनके प्रोटीन्स के विषैले लौंदे नहीं बन पाते।

समस्त जीव – बैक्टीरिया से लेकर इंसानों तक – प्रोटीन बनाने के लिए एक ही रास्ते पर चलते हैं। हर कोशिका में प्रोटीन निर्माण के निर्देश डीएनए नामक अणु में अंकित होते हैं। डीएनए के निर्देशों की प्रतिलिपि संदेशवाहक आरएनए (mRNA) के रूप में बनाई जाती है। ये mRNA फिर पहुंच जाते हैं राइबोसोम (ribosome) नामक कोशिकांग पर। राइबोसोम इस mRNA पर अंकित सूचना के अनुसार एक-एक अमीनो एसिड को क्रमानुसार जोड़कर प्रोटीन का निर्माण करता है। राइबोसोम स्वयं भी प्रोटीन्स और RNA से बने होते हैं। राइबोसोम पर पाए जाने वाले RNA को राइबोसोमल RNA (rRNA) कहते हैं। दरअसल, rRNA का अनुक्रम इतना सटीक और विश्वसनीय होता है कि शोधकर्ता इसका उपयोग अपने प्रयोग की सटीकता की जांचने के लिए करते हैं।

हारवर्ड विश्वविद्यालय के जीव वैज्ञानिक एमी ली का छात्र यही कर रहा था। उसने किसी अन्य मकसद से ऑक्टोपस की एक प्रजाति (Octopus bimaculoides) पर किए जा रहे प्रयोग के दौरान देखा कि उस प्रजाति में rRNA के खंडों के बीच खाली स्थान थे। आम तौर पर राइबोसोम का RNA एक विशाल अणु होता है लेकिन इस मामले में शोधकर्ताओं को अलग-अलग पट्टे दिख रहे थे। पहले तो उन्होंने सोचा कि शायद RNA को अलग करने में कोई गलती हुई है। लेकिन एक अन्य पोस्ट-डॉक छात्र रिशव मित्रा ने खोजा कि यह कोई गलती नहीं थी बल्कि यह rRNA के जीन में एक उत्परिवर्तन का परिणाम था जिसकी वजह से पूरा सूत्र खंडों में बंट जाता है। बहरहाल, ये खंड मिलकर ही काम करते हैं जिसके चलते प्रोटीन तो बन ही जाता है।

खोजबीन करने पर पता चला कि यह टूटन राइबोसोम के मूल हिस्से में एक विशिष्ट जगह पर होती है जहां rRNA सही अमीनो एसिड का मिलान सही जेनेटिक सूचना से करता है।

अब यह समझने की बारी थी कि यह टूटन करती क्या है। इसके लिए शोधकर्ताओं ने टूटन से सम्बंधित उत्परिवर्तन को एक बैक्टीरिया एशरीशिया कोली (Escherichia coli) यानी ई. कोली के जीनोम में रोप दिया। आश्चर्य की बात थी कि इस परिवर्तन ने ई. कोली के राइबोसोम को अति-सटीक बना दिया। अमीनो एसिड्स को प्रोटीन्स में जोड़ने के लिहाज़ से परिवर्तनशुदा बैक्टीरिया ने सामान्य बैक्टीरिया की तुलना में 50 प्रतिशत कम त्रुटियां कीं। अलबत्ता, परिवर्तनशुदा बैक्टीरिया प्रोटीन बनाने के मामले में धीमे साबित हुए।

शोधकर्ताओं का कहना है कि इस प्रक्रिया में त्रुटिपूर्ण प्रोटीन बनने की संभावना कम होती है। ऐसे त्रुटिपूर्ण प्रोटीन लौंदे बना लेते हैं जो जीव के लिए दिक्कतें  पैदा कर सकते हैं।

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि rRNA में टूटन की बदौलत ऑक्टोपस उन mRNA को भी सही ढंग से प्रोटीन में अनुदित (protein translation) कर पाते हैं जिन्हें अनुवाद से पहले संपादित किया गया हो। ऐसा होने पर संभवत: वह प्रोटीन किसी नए कार्य में सक्षम हो जाए।

शोधकर्ता दल ने rRNA टूटन के प्रमाण उथले पानी में रहने वाली 15 प्रजातियों में देखे, लेकिन गहरे पानी में रहने वाली 12 में से एक भी प्रजाति में इसके प्रमाण नहीं मिले। इससे ऐसा लगता है कि यह विविधता 10 करोड़ वर्ष पहले तब आई होगी जब ऑक्टोपस के कुछ वंशों ने उथले पानी को अपना आवास बनाया होगा। अलबत्ता, इस बात को अभी गहन छानबीन की ज़रूरत है।

ली को लगता है कि प्रोटीन की सटीकता को बेहतर बनाने की क्षमता जैव-इंजीनियरिंग (Genetic engineering) के क्षेत्र में उपयोगी हो सकती है। कई कंपनियां आरएनए में फेरबदल को एक उपचार के रूप में देख रही हैं। लेकिन स्वयं राइबोसोम में परिवर्तन पर किसी का ध्यान नहीं है। शायद यह उपयोगी साबित हो। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://mediasvc.eurekalert.org/Api/v1/Multimedia/7ab714a7-db9a-4d86-8d98-9ba89d340d5f/Rendition/low-res/Content/Public

वनस्पतियों का अदृश्य संवाद

सुदर्शन सोलंकी

बीसवीं सदी के अंत तक, पादप पारिस्थितिकी मुख्य रूप से चार्ल्स डार्विन के ‘प्राकृतिक चयन’ और प्रजातियों के बीच प्रतिस्पर्धा (Interspecific Competition) के सिद्धांतों के इर्द-गिर्द घूमती रही। यह स्थापित धारणा थी कि किसी भी वन पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) में वनस्पति केवल सूर्य के प्रकाश, जल और मृदा के पोषक तत्वों के लिए एक-दूसरे से संघर्ष करते हैं। फिर, 1997 में ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय की पादप विज्ञानी डॉ. सुज़ैन सिमार्ड द्वारा नेचर में प्रकाशित एक ऐतिहासिक शोध पत्र ने इस स्थापित धारणा को पूरी तरह से बदल दिया।

सिमार्ड और उनकी टीम ने कार्बन-14 (कार्बन के रेडियोधर्मी समस्थानिक) और कार्बन-13 (स्थिर समस्थानिक) का उपयोग करके यह प्रमाणित किया कि वनस्पतियां आपस में कवक-तंतुओं के माध्यम से रासायनिक रूप से जुड़ी हुई हैं। इस सहजीवी प्रणाली को माइकोराइज़ल नेटवर्क (mycorrhizal network) कहा गया, जो पादप विज्ञान में पारस्परिक सहयोग की एक नई धारणा के रूप में सामने आई। यह भूमिगत फफूंदों (कवक) और पौधों की जड़ों के बीच समन्वय होता है। एक मायने में यह पादप विज्ञान में पैराडाइम शिफ्ट था।

संरचना और सहजीवन

माइकोराइज़ल नेटवर्क  भूमिगत अंतःसंचार प्रणाली मुख्य रूप से दो प्रकार के कवकों पर आधारित होती है। एक होते हैं एक्टोमाइकोराइज़ा (actomycorrhiza), जो मुख्य रूप से समशीतोष्ण वनों के वृक्षों की जड़ों के चारों ओर एक सुरक्षात्मक आवरण बनाते हैं। दूसरे होते हैं अर्बस्कुलर माइकोराइज़ा (arbuscular mycorrhiza), जो पादप जड़ों की कोशिकाओं के भीतर तक प्रवेश करके घनिष्ठ अंतःसम्बंध स्थापित करते हैं।

यह नेटवर्क एक परिष्कृत जैविक और पारस्परिक सहजीवी विनिमय से संचालित होता है। प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) की प्रक्रिया से पादप कार्बन का स्थिरीकरण करके कार्बोहाइड्रेट का निर्माण करते हैं। वे उसका लगभग 10 प्रतिशत से 30 प्रतिशत हिस्सा इन कवक तंतुओं (मायसेलियम) (mycellium) को स्थानांतरित कर देते हैं। बदले में, ये कवक तंतु (जो अपनी सूक्ष्म संरचना के कारण मिट्टी के अत्यंत बारीक छिद्रों तक पहुंचने में सक्षम होते हैं) पेड़-पौधों को पानी, फॉस्फोरस और नाइट्रोजन जैसे आवश्यक पोषक तत्व प्राप्त करने में मददगार होते हैं। यह जटिल नेटवर्क वनस्पति जड़ों के प्रभावी अवशोषण क्षेत्र को 100 से 1000 गुना तक विस्तृत कर देता है, जिससे पूरे वन क्षेत्र की पोषण क्षमता सुदृढ़ होती है।

संकेतन तंत्र

पादपों में जंतुओं की तरह कोई केंद्रीय तंत्रिका प्रणाली नहीं होती, परंतु वे विशिष्ट जैव-रासायनिक और विद्युतीय संकेतों के माध्यम से इस कवक नेटवर्क (funal network) को एक ‘सिग्नलिंग चैनल’ (signaling channel) की तरह उपयोग करते हैं। इसके माध्यम से वे कई तरह के संकेत (signals) प्रेषित कर पाते हैं। जैसे,

शाकाहारी आक्रमण: जब किसी वन क्षेत्र में शाकाहारी कीटों का हमला होता है, तो प्रभावित पादप तुरंत जैस्मोनिक एसिड (Jasmonic acid) और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (VOCs) का उत्पादन करते हैं। इसे वे अपनी जड़ों के माध्यम से कवक जाल में पहुंचा देते हैं। यह रासायनिक संकेत पड़ोसी पादपों तक पहुंचता है। यह एक उद्दीपन होता है जिससे वे पादप अपनी पत्तियों में टैनिन और फिनोलिक्स जैसे विषाक्त रसायनों का संचय बढ़ा लेते हैं, जिससे पत्तियां कीटों के लिए अभोज्य हो जाती हैं।

जल तनाव: गंभीर जल तनाव या सूखे की स्थिति में पादपों द्वारा उत्सर्जित एब्सिसिक एसिड (ABA) इस नेटवर्क के माध्यम से अन्य वृक्षों को सचेत करता है, जिससे वे अपने पर्णरंध्रों (स्टोमैटा) को आंशिक रूप से बंद कर वाष्पोत्सर्जन की दर घटा लेते हैं।

रोगजनक कवक का आक्रमण: प्रयोगशालाओं में देखे गए साक्ष्यों के अनुसार, रोगजनक कवक (disease causing fungi) के आक्रमण के समय सैलिसिलिक एसिड का प्रवाह पूरे नेटवर्क में सिस्टेमिक एक्वायर्ड रेज़िस्टेंस (systemic accquired resistence) को सक्रिय करता है, जिससे स्वस्थ पादपों में मात्र 6 से 18 घंटे के भीतर रक्षात्मक एंज़ाइम क्रियाशील हो जाते हैं।

‘मदर ट्री’ (Mother tree) और सहोदरों की पहचान: इस नेटवर्क का सबसे विस्मयकारी वैज्ञानिक पहलू तब सामने आता है जब हम वन के सबसे वयोवृद्ध और विशाल वृक्षों का अध्ययन करते हैं। जिन्हें पारिस्थितिकी विज्ञान में ‘मदर ट्री’ या ‘हब ट्री’ (hub tree) कहा जाता है। ये विशाल वृक्ष इस भूमिगत कवक जाल के मुख्य केंद्र या ‘राउटर’ (router) की तरह कार्य करते हैं, जहां से ऊर्जा और संसाधनों का प्रवाह नियंत्रित होता है। कभी-कभी वन के सघन चंदवे या छतरी के कारण छोटे नवजात पौधों तक सूर्य का प्रकाश नहीं पहुंच पाता और वे प्रकाश संश्लेषण करने में असमर्थ हो जाते हैं। ऐसा होने पर ये मदर ट्री इस कवक नेटवर्क के माध्यम से अपने संचित कार्बन और नाइट्रोजन को उन कमज़ोर पौधों की ओर प्रवाहित करते हैं।

कनाडा के वनों में किए गए अध्ययनों से यह भी प्रमाणित हुआ है कि ये वृद्ध वृक्ष सहोदर पहचान (किन्शिप रिकग्निशन) (kinship recognition) की क्षमता रखते हैं। वे रासायनिक संकेतों के माध्यम से यह पहचान लेते हैं कि कौन-सा अंकुरित पौधा उन्हीं के बीजों से विकसित हुआ है, और वे जानबूझकर अपनी प्रजाति के और विशेषकर अपने स्वयं के सहोदर पौधों को अन्य पौधों की तुलना में अधिक मात्रा में पोषण और सुरक्षात्मक रसायन स्थानांतरित करते हैं। और तो और, जब ये मदर ट्री मरणासन्न अवस्था में होते हैं, तो वे अपनी बची हुई अधिकांश कार्बनिक ऊर्जा और रक्षात्मक आनुवंशिक सूचनाएं इस नेटवर्क के ज़रिए युवा पीढ़ी को सौंप देते हैं। यह वनस्पति जगत की एक अदभुत प्राकृतिक वसीयत है।

पारिस्थितिकीय संकट 

यह भूमिगत तंत्र हमें जितना सुदृढ़ दिखाई देता है, आधुनिक मानवीय हस्तक्षेपों के प्रति उतना ही संवेदनशील भी है। वैश्विक स्तर पर हो रही अंधाधुंध कटाई और सघन एकफसली कृषि (moncropping) के कारण यह सदियों पुराना माइकोराइज़ल नेटवर्क खंडित हो रहा है, जिससे वनों की स्वाभाविक रोग प्रतिरोधक क्षमता नष्ट हो रही है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग मिट्टी की इस कवक संरचना को स्थायी रूप से नष्ट कर देता है, जिससे कृत्रिम रूप से उगाए गए पौधे इस प्राकृतिक सुरक्षा कवच से वंचित हो जाते हैं।

यद्यपि समकालीन पादप विज्ञान ने इस ‘अदृश्य संवाद’ की बुनियादी रूपरेखा को समझ लिया है, परंतु विभिन्न पादप प्रजातियों के मध्य होने वाले सूक्ष्म रासायनिक विनिमय के पूर्ण कोड को डिकोड करना आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी चुनौती है। अंततः, यह शोध हमें यह संदेश देता है कि वन केवल वृक्षों का संग्रह नहीं हैं, बल्कि एक एकीकृत, परस्पर निर्भर और सचेत जैव-प्रणाली हैं, जिनका संरक्षण समग्र रूप में ही संभव है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://aleximreh.wordpress.com/wp-content/uploads/2021/08/micelia.jpg

ज़ेब्रा फिश: एक सुंदर और शानदार मॉडल जीव

डॉ. किशोर पंवार

ज़ेब्रा फिश (zebra fish) उष्णकटिबंधीय मीठे पानी की एक छोटी-सी, सुंदर मछली है। यह भारत की नदियों और तालाबों में पाई जाती है। आजकल एक्वेरियम फिश की तरह इनका काफी उपयोग हो रहा है। इनका नाम ज़ेब्रा फिश इसलिए पड़ा क्योंकि इनके शरीर के दोनों तरफ ज़ेब्रा के समान खड़ी (यानी शरीर के समांतर) नीली धारियां पाई जाती हैं। ये बड़े-बड़े समूहों में रहती हैं जिन्हें शोल (shoal) कहते हैं।  

इसका वैज्ञानिक नाम है डेनियो रेरियो (Danio rerio)। यह नाम बांग्ला भाषा से आया है। नाम का पहला अक्षर दानी (धान के खेत की) बताता है कि यह धान के खेतों जैसे उथले पानी में रहती है। नाम का दूसरा हिस्सा भी बांग्ला है जो इसका स्थानीय नाम है। यह पूरे दक्षिण एशिया के धान के खेतों की एक खास मछली है। इस मछली का विवरण सबसे पहले एक स्कॉटिश चिकित्सक फ्रांसिस हैमिल्टन ने 1822 में दिया था। उन्होंने इसे नाम दिया था सायप्रिनस रेरिओ (Cyprinus rerio)। शोध साहित्य में कभी-कभी इसे Brachydanio rerio नाम से भी संदर्भित किया गया। इसका वर्तमान नाम डेनियो रेरिओ 1981 में स्थापित हुआ था।

देखा जाए तो जैव विकास के पायदान पर ज़ेब्रा फिश हम स्तनधारियों (Mammals) से बहुत पीछे है। फिर भी कितने आश्चर्य की बात है कि हमारे और इस मछली के 70 प्रतिशत जीन्स (Genes) एक समान हैं। इसके अलावा, हमारी तरह इनमें आंखें, कान, नाक, रीढ़ की हड्डी, हृदय, मुंह और पाचन तंत्र पाए जाते हैं। शरीर के इन अंगों के विकास के लिए तमाम ज़रूरी जीन्स और प्रक्रियाएं मनुष्यों और ज़ेब्रा फिश दोनों में पाई जाती हैं और ‘संरक्षित’ हैं, यानी करोड़ों सालों में इनमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। यही कारण है कि मनुष्य में इन शारीरिक अंगों में परिवर्तन लाने वाली किसी बीमारी का अध्ययन सैद्धांतिक रूप से ज़ेब्रा फिश में किया जा सकता है। आज ज़ेब्रा फिश चूहों और गिलहरियों की तुलना में एक बेहतर मॉडल जीव (modal organism) बन चुकी है।

इस मछली पर शोध की शुरुआत 1960 के दशक में आणविक जीव विज्ञानी (molecular biologist) जॉर्ज स्ट्राइसिंगर ने की थी। उनके प्रयोगों ने इसमें आनुवंशिक हेरफेर किए जाने की क्षमता को पहचाना। 1980 तक ज़ेब्रा फिश मनुष्य व अन्य रीढ़धारी जीवों (vertebrates) के विकास के अध्ययन का एक अमूल्य मॉडल बन चुकी थी।

ज़ेब्रा फिश – एक मॉडल जीव

2001 में ज़ेब्रा फिश के जीनोम के अनुक्रमण से पता चला कि मानव जीनोम से इसकी समानता 70 प्रतिशत है। फिर, क्रिस्पर-कास-9 (CRISPER CAS-9) जैसी जेनेटिक इंजीनियरिंग तकनीक की प्रगति के साथ मानव रोगों की मॉडलिंग और दवा की खोज में ज़ेब्रा फिश एक महत्वपूर्ण मॉडल के रूप में स्थापित हो गई। इसके श्रेष्ठ प्रायोगिक मॉडल होने में निम्नलिखित लक्षणों का बड़ा योगदान है:

– आकार में बहुत छोटी है, बड़े समूहों में रहना पसंद करती हैं। अतः चूहों की तुलना में इन्हें पालने में कम जगह लगती है और रख-रखाव भी सस्ता है।

– लगभग हर 10 दिन में प्रजनन करती है। एक बार में 50 से 300 तक अंडे देती है। वैज्ञानिक प्रयोगों में परिणामों की सटीकता जांचने के लिए उन्हें कई बार दोहराया जाता है। इसलिए ऐसा जीव जो बार-बार बड़ी संख्या में संतान पैदा कर सके, प्रयोगों के लिए उपयोगी होता है।

– ज़ेब्रा फिश में बाह्य निषेचन (Outer fertilization) होता है, भ्रूण भी बाहर विकसित होते हैं। इनमें इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन अर्थात शरीर से बाहर परखनली में निषेचन कराया जा सकता है।

– एक कोशिका अवस्था वाले निषेचित अंडों में डीएनए या आरएनए आसानी से डाले जा सकते हैं। इस तरह नॉक-आउट या ट्रांसजेनिक/नॉक-इन (Knock out/ transgenic knock-in) ज़ेब्रा फिश किस्में प्राप्त की जा सकती हैं।

– ज़ेब्रा फिश के भ्रूण पारदर्शी होते हैं। इसके चलते निषेचित अंडे से पूर्ण विकसित शिशु मछली बनते समय आंतरिक परिवर्तनों को आसानी से देखा जा सकता है। चूहे व अन्य बड़े जंतुओं में यह संभव नहीं होता।

– भ्रूण के पारदर्शी होने के कारण उन्हें फ्लोरेसेंट (florescent) रूप से चिन्हित कर उनके ऊतकों को भी देखा जा सकता है।

एक खास बात यह है कि एक मॉडल जंतु के रूप में ज़ेब्रा फिश का उपयोग मुख्यत: जीन्स के कार्यों और विकास सम्बंधी रोगों के संदर्भ में किया गया है। इसके अलावा, इसका उपयोग कैंसर विज्ञान, विकास सम्बंधी विकारों के अध्ययन और औषधि विकास सम्बंधी अनुसंधान में भी हुआ है। इसकी एक खूबी यह है कि इसे कोई दवा देना आसान है – गलफड़ों में पानी के ज़रिए।

नॉक–आउट, नॉक–इन

अक्सर किसी बीमारी का कारण जानने के लिए मरीज़ के डीएनए का अनुक्रमण (DNA Sequencing) किया जाता है ताकि यह पता लगाया जा सके कि किस जीन में हुए उत्परिवर्तन अर्थात म्यूटेशन (Mutation) संभावित रूप से उस रोग का कारण हो सकते हैं। इस तरह के विश्लेषण से यह पता चलता है कि क्या किसी जीन के कामकाज में बदलाव आया है जो लक्षणों का कारण हो सकता है। फिर, ज़ेब्रा फिश में उसी जीन में उत्परिवर्तन करवाया जाता है या उसे निष्क्रिय कर दिया जाता है। और इन परिवर्तित मछलियों में वैसे ही लक्षणों की जांच की जाती है।

जब ज़ेब्रा फिश में किसी समकक्ष जीन में उत्परिवर्तन के ज़रिए उसे ठप कर दिया जाता है, तो कहते हैं कि उस जीन को नॉक-आउट कर दिया गया है। उदाहरण के लिए, यदि रोगी को मांसपेशियों से सम्बंधित बीमारी है तो ज़ेब्रा फिश में जीन में परिवर्तन (नॉक-आउट) के बाद मांसपेशियों के तंतुओं की संरचना में आई असामान्यता की जांच आसानी से सूक्ष्मदर्शी से की जा सकती है।

इसी प्रकार से यदि रोग के लक्षण गर्भाशय में विकास के दौरान शुरू हुए हों तो नाक-इन या नाक-आउट ज़ेब्रा फिश के भ्रूणों में जीन की अभिव्यक्ति में परिवर्तन के असर की जांच आसानी से की जा सकती है। नॉक-इन तब कहते हैं जब ज़ेब्रा फिश में किसी जीन को जोड़ा जाए और यह देखा जाए कि इसका क्या असर होता है।

कुछ मानव रोगों के उदाहरण 

मांसपेशीय विकार

ड्यूशेन मस्क्यूलर डिस्ट्रॉफी (डीएमडी) मांसपेशियों का एक रोग है जो अधिकतर पुरुषों को प्रभावित करता है। इसमें मांसपेशियों की कमज़ोरी बचपन में ही प्रकट होने लगती है और क्रमिक रूप से बढ़ती जाती है।

ऐसा अंदाज़ा था कि डिस्ट्रॉफिन (dystrophin) नामक जीन में उत्परिवर्तन ही डीएमडी के लिए ज़िम्मेदार है। डिस्ट्रॉफिन जीन की पहचान 1986 में लू कुन्केल ने की थी। उन्होंने बताया था कि यह एक्स गुणसूत्र पर स्थित होता है और डीएमडी में इसकी भूमिका है। 1987 में इस जीन के द्वारा बनाए जाने वाले प्रोटीन (डिस्ट्रॉफिन) की पहचान हुई। डिस्ट्रॉफिन प्रोटीन मांसपेशियों की रक्षा करता है, यदि यह प्रोटीन न हो तो मांसपेशियां क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और उनका स्थान वसा और सख्त ऊतक लेने लगते हैं।

ज़ेब्रा फिश में डिस्ट्रॉफिन जीन के नॉक-आउट प्रयोगों से पता चला कि इसके असर मानव रोग डीएमडी से काफी मिलते-जुलते हैं। डीएमडी से पीड़ित रोगियों में डिस्ट्रॉफिन में उत्परिवर्तन पाए गए हैं। मनुष्यों और ज़ेब्रा फिश दोनों में, डिस्ट्रॉफिन की कमी से धीरे-धीरे मांसपेशियों के तंतु नष्ट हो जाते हैं।

उम्मीद है कि ज़ेब्रा फिश पर हो रहे अनुसंधान मांसपेशियों के विकार, खास तौर से डीएमडी के लिए विभिन्न औषधियों की जांच-पड़ताल में मददगार होंगे।

कैंसर व मेलेनोमा

मेलेनोमा त्वचा कैंसर का एक प्रकार है। वैसे तो यह एक तिल के रूप में शुरू होता है लेकिन समय से सर्जरी करके न हटाया जाए तो जानलेवा भी हो सकता है। यह मुख्य रूप से त्वचा की मेलेनोसाइट (melenocyte) कोशिकाओं को प्रभावित करता है और यूवी प्रकाश या टैनिंग बेड के उपयोग से शुरू होता है।

ज़ेब्रा फिश को मानव मेलेनोमा का सफल मॉडल भी बनाया गया है। मानव मेलेनोमा में सबसे आम तौर पर पहचाना जाने वाला उत्परिवर्तन जीन BRAF में एक एकल अमीनो एसिड परिवर्तन (V600E) है। BRAF V600E उत्परिवर्तन एक अर्जित उत्परिवर्तन है। इस उत्परिवर्तित जीन द्वारा बनाए गए BRAF प्रोटीन में पोज़ीशन 600 पर वैलीन नामक अमीनो एसिड का स्थान ग्लूटेमिक एसिड ले लेता है। इस परिवर्तन की वजह से यह प्रोटीन निरंतर सक्रिय रहता है और कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से विभाजित होकर ट्यूमर तथा कैंसर का कारण बन जाती हैं।

चूंकि कैंसर कई जेनेटिक परिवर्तनों के संयोजन से होते हैं, इसलिए इस नॉक-इन ज़ेब्रा फिश लाइन का उपयोग अन्य संभावित कैंसर पैदा करने वाले उत्परिवर्तनों की जांच के लिए किया गया था। जब BRAF नॉक-इन ज़ेब्रा फिश में SETDB1 नामक एक अन्य सामान्य रूप से देखे जाने वाले मेलेनोमा उत्परिवर्तन को जोड़ा गया, तो तेज़ी से मेलेनोमा विकसित हुआ।

हृदय रोग

हृदय रोगों के क्षेत्र में भी ज़ेब्रा फिश मॉडल बहुत उपयोगी साबित हो रहे हैं। ज़ेब्रा फिश का हृदय हमारे समान चार प्रकोष्ठ वाला नहीं बल्कि दो प्रकोष्ठ का होता है। लेकिन हृदय का शुरुआती विकास लगभग वैसा ही होता है जैसा अन्य एम्नियॉटिक जंतुओं में (एम्नियोटिक जंतु उन्हें कहते हैं जिनमें भ्रूण के विकास के दौरान उसके आसपास एक विशेष झिल्ली (एम्नियॉन) बनती है। इस झिल्ली से बनी एम्नियोटिक थैली (amniotic sac) की बदौलत ही इन जंतुओं के भ्रूण का विकास पानी से बाहर शुष्क वातावरण में भी हो पाता है।चूहों के विपरीत, ज़ेब्रा फिश को भ्रूण अवस्था में जीवित रहने के लिए एक कार्यात्मक हृदय प्रणाली की आवश्यकता नहीं होती है। कारण यह है कि इतने छोटे जंतु को ज़रूरी ऑक्सीजन सीधे विसरण के ज़रिए मिल जाती है। इसलिए, शोधकर्ता गंभीर हृदय विकृतियों वाली ज़ेब्रा फिश में ऐसे शारीरिक अंतरों का अवलोकन कर पाते हैं जिनका अध्ययन चूहों में नहीं किया जा सकता है। 

वैसे कशेरुकी जंतुओं में मायोसाइट एनहांसर फैक्टर (हृदय कोशिकाओं को उन्नत बनाने वाले कारक) के चार रूप पाए जाते हैं Mef2A, Mef2B, Mef2C और Mef2D। जहां इनसे बनाए जाने वाले प्रोटीन्स हृदय के विकास में भूमिका निभाते हैं, वहीं यह भी देखा गया है कि इनमें से Mef2C प्रमुख है।

अब बात आती है ज़ेब्रा फिश की। एक तो हम देख चुके हैं कि ज़ेब्रा फिश कई दिनों तक हृदय के बगैर भी जी पाती हैं। दूसरा, पता चला है कि ज़ेब्रा फिश में जैव-विकास के किसी चरण में Mef2C जीन दो भागों में बंट गया था – Mef2ca और Mef2cb।

2012 के एक शोध से पता चला है कि ज़ेब्रा फिश में Mef2ca और Mef2cb पहले और दूसरे हृदय क्षेत्र दोनों की कोशिकाओं के विभेदन के लिए आवश्यक हैं। Mef2ca और Mef2cb कोशिकीय विभेदन के महत्वपूर्ण नियामक हैं। इस प्रयोग में, शोधकर्ताओं ने यह जांच की कि जब ज़ेब्रा फिश भ्रूण में Mef2ca और Mef2cb दोनों प्रोटीनों की हानि हो जाए तो क्या होता है। पाया गया कि जिन भ्रूणों में Mef2ca और Mef2cb दोनों प्रोटीन की कमी होती है, उनमें हृदय में मांसपेशीय कोशिका विभेदन में दोष होते हैं। हालांकि, आश्चर्यजनक रूप से, Mef2ca या Mef2cb जीन में से किसी एक की कमी हृदय के कार्य को प्रभावित नहीं करती है। इस प्रयोग से स्पष्ट हुआ कि Mef2 गतिविधि सभी हृदय कोशिका विभेदन के लिए आवश्यक है।

विष विज्ञान

एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने डेन्यूब नदी के पानी के विभिन्न नमूनों में ज़ेब्रा फिश रखीं और भ्रूण की असामान्यताओं के विकास का अवलोकन किया। पता चला कि सभी 22 नमूने कुछ हद तक मृत्यु का कारण बन सकते थे। चूंकि शोधकर्ता ज़ेब्रा फिश भ्रूणों के विकास का अवलोकन कर सकते थे, इसलिए उन्होंने इन भ्रूणों में आंखों की विकृतियां, असामान्य रंजक और बहुत कम या न के बराबर रक्त संचार देखा। ज़ेब्रा फिश की मदद से शोधकर्ताओं ने पानी में मौजूद विषैले पदार्थों की पहचान भी की। ज़ेब्रा फिश के भ्रूणों को कृत्रिम रूप से तैयार किए गए एक मिश्रण में डाला गया। कुल मिलाकर उद्देश्य यह पता लगाना था कि क्या ज़ेब्रा फिश का उपयोग पानी की समग्र गुणवत्ता का आकलन करने में किया जा सकता है।

इसी प्रकार के प्रयोग कई अन्य नदियों/तालाबों में किए गए हैं। जैसे मुंबई महानगर की मीठी नदी के पानी का ज़ेब्रा फिश भ्रूणों पर असर 2023 में एन्वायर्मेंटल मॉनीटरिंग एंड असेसमेंट पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। इस अध्ययन के लिए मीठी नदी से 10 स्थानों से पानी के नमूने लिए गए थे। इन सभी नमूनों में ज़ेब्रा फिश भ्रूण विषाक्तता परीक्षण किया गया। प्रयोग में पता चला कि सामान्य पानी में रखे गए भ्रूणों और विभिन्न स्थलों के पानी में रखे गए भ्रूणों के बीच मृत्यु दर, अंडे में कोग्यूलेशन, पेरिकार्डियल एडीमा (pericardial edima), योक थैली के एडीमा, पूंछ की ऐंठन और कंकाल (skeleton) सम्बंधी विकारों की दृष्टि से काफी अंतर रहा। एक तो इस अध्ययन से स्पष्ट हुआ की मीठी नदी का पानी जलीय जीवों के लिए घातक है। साथ ही पानी की गुणवत्ता को परखने के लिए ज़ेब्रा फिश की उपयोगिता भी प्रमाणित हुई।

टॉक्सिकोलॉजी साइंसेस में प्रकाशित एक समीक्षा पर्चे में विष वैज्ञानिक अध्ययनों में ज़ेब्रा फिश के महत्व को रेखांकित किया गया है। इसका उपयोग आणविक स्तर से लेकर पूरे जीव की सेहत और व्यवहार पर असर के अध्ययन तक में किया जा रहा है। दरअसल, समीक्षा पर्चे में कहा गया है कि ज़ेब्रा फिश कांच के उपकरणों (in-vitro) में किए जाने वाले अध्ययनों और उच्चतर जीवों पर असर के बीच एक सेतु बन गया है।

विकास/परिवर्धन की विकृतियां

ज़ेब्रा फिश पर किए गए प्रयोगों से पता चला है कि एक उत्परिवर्ती (हेडलेस) में T-cell factor-3 में उत्परिवर्तन हुआ था जिसके चलते उसके सिर के विकास में गड़बड़ियां पैदा हुईं। इन प्रयोगों से यह स्थापित हुआ कि हेडलेस उत्परिवर्ती Wnt संकेतन मार्ग से नियंत्रित जीन्स का दमन करता है। ये जीन्स कोशिकाओं की संख्यावृद्धि, उनके विभेदन और स्टेम कोशिका (stem cells) अवस्था बनाए रखने का नियंत्रण करते हैं।

इसी प्रकार से ज़ेब्रा फिश ने तंत्रिकाओं की पहचान करने और मस्तिष्क की बनावट (आर्किटेक्चर) को समझने में भी योगदान दिया है। इसमें शुरुआती तंत्रिका प्लेट अवस्था में तंत्रिकाओं के निर्माण से लेकर वयस्क मस्तिष्क के विकास तक की अवस्थाओं को देखा जा सका है।

मानसिक विकार

ज़ेब्रा फिश अत्यंत सामाजिक प्राणी हैं जो झुंड में रहते हैं। लिहाज़ा, इनका उपयोग मानसिक विकारों के व्यवहारगत परीक्षणों में संभव है। चिओल-ही किम व उनके साथियों ने ज़ेब्रा फिश में मानसिक विकारों से सम्बंधित एक जीन समूह की खोज की है। इस जीन परिवार को सैमडोरी (सैम) नाम दिया गया है। पांच जीन्स के इस समूह में से sam2 मस्तिष्क के हैबेन्यूलर न्यूक्लिआई में अभिव्यक्त होता है। इसका सम्बंध बौद्धिक अक्षमता और ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से देखा गया है।        sam2 नॉक-आउट से चूहों व ज़ेब्रा फिश दोनों में भावनात्मक प्रतिक्रिया (जैसे डर और दुश्चिंता) में गड़बड़ी देखी गई जो दुश्चिंता सम्बंधी विकारों और ऑटिज़्म में भी दिखती है।

वायरस संक्रमणों का अध्ययन

हाल के वर्षों में ज़ेब्रा फिश वायरस संक्रमणों की तहकीकात के लिए भी एक मॉडल बनकर उभरा है। ज़ेब्रा फिश पर किए गए प्रयोगों से वायरस की रोगजनन क्रियाविधि, मेज़बान की प्रतिक्रिया तथा संभावित उपचारों की दिशा में मदद मिली है। खास तौर से ज़ेब्रा फिश मॉडल्स से वायरस संख्यावृद्धि, टिशू ट्रॉपिज़्म (tissue tropism) (यानी कोई वायरस किन ऊतकों को संक्रमित करेगा), और प्रतिक्षा तंत्र को चकमा देने की विभिन्न वायरसों की रणनीतियों को उजागर करने में मदद मिली है। इनमें चिकनगुनिया वायरस, डेंगू वायरस, हर्पीस सिम्प्लेक्स वायरस टाइप-1 और इंफ्लुएंज़ा-ए वायरस शामिल हैं।

इसके अलावा कई वायरसों जैसे, सार्स-सीओवी-2, ज़िका वायरस और डेंगू वायरस के खिलाफ विकसित एंटी-वायरल (anti-viral) पदार्थों तथा प्राकृतिक एजेंट्स की प्रभाविता की जांच करने में भी मदद मिली है।

खास तौर से ज़ेब्रा फिश भ्रूणों की पारदर्शिता तथा जेनेटिक तहकीकात की सरलता के चलते वायरस के प्रसार और प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का अध्ययन करना सुगम हुआ है।

ज़ेब्रा फिश की सीमाएं

ज़ेब्रा फिश को एक मॉडल के रूप में इस्तेमाल करने की कुछ सीमाएं भी है। जैसे ज़ेब्रा फिश में ऐसी इंसानी बीमारियों का अध्ययन नहीं किया जा सकता जो ऐसे जीन्स की वजह से होती हैं जो ज़ेब्रा फिश में नहीं पाए जाते। जैसे ज़ेब्रा फिश और मनुष्यों के पैंक्रियास की रचना तो एक सी है लेकिन उनके बीच जेनेटिक अंतर हैं। इस वजह से मोटापे जैसे कई चयापचय रोगों (metabolic diseases) का अध्ययन नहीं हो पाता। इसके अलावा, ज़ेब्रा फिश की मदद से उन अंगों से सम्बंधित अध्ययन भी नहीं किए जा सकते जो ज़ेब्रा फिश में नहीं पाए जाते – जैसे प्रोस्टेट ग्रंथि (prostrate gland), स्तन ग्रंथियां या फेफड़े।

ज़ेब्रा फिश और मनुष्यों के बीच एक बड़ा अंतर यह है कि जहां मनुष्य व अन्य स्तनधारी समतापी होते हैं वहीं ज़ेब्रा फिश (अन्य मछलियों व सरिसृपों के समान) विषमतापी होते हैं यानी इनके शरीर का तापमान आसपास के वातावरण के हिसाब से घटता-बढ़ता रहता है। प्रयोगशालाओं में ज़ेब्रा फिश को कृत्रिम रूप से 28 डिग्री सेल्सियस तापमान रखा जाता है। इसलिए इन पर किए गए प्रयोगों के परिणाम शायद मनुष्यों पर लागू न हो पाएं।

ज़ेब्रा फिश सांस लेने का काम गलफड़ों (gills) से करती है जबकि मनुष्य इसके लिए फेफड़ों का इस्तेमाल करते हैं। इसके चलते ज़ेब्रा फिश में हृदय और गलफड़ों के बीच परिवहन तंत्र नहीं पाया जाता। इसी वजह से कई बीमारियों का अध्ययन ज़ेब्रा फिश मॉडल में नहीं किया जा सकता – जैसे श्वसन रोग, हार्ट अटैक।

कृन्तकों (rodents) के विपरीत ज़ेब्रा फिश और अन्य मछलियां, अंतःप्रजनन (inbreeding) को सहन नहीं कर पातीं और अंतःप्रजनन से तेज़ी से प्रजनन क्षमता खो देती हैं। अंत:प्रजनन इसलिए करवाया जाता है ताकि जेनेटिक संरचना कई पीढ़ियों तक बनी रहे।

ज़ेब्रा फिश पानी में रहती हैं। इनके भ्रूणों के थ्री-डी विश्लेषण (3-D analysis) के दौरान प्रकाश के अपवर्तन की वजह से छवियां ठीक से नहीं बन पातीं। दूसरी दिक्कत यह आती है कि ये भ्रूण हिलते-डुलते रहते हैं।

आम तौर पर किसी दवा का असर जांचने के लिए वह दवा पानी में घोल दी जाती है और भ्रूण उसे गलफड़ों के ज़रिए ग्रहण कर लेते हैं। लेकिन पानी में अघुलनशील दवाइयां इस तरह से देना कठिन होता है।

प्रतिरक्षा के संदर्भ में भी ज़ेब्रा फिश में कुछ महत्वपूर्ण अंतर दिखते हैं।

हालांकि ज़ेब्रा फिश कई वैज्ञानिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं, फिर भी उनकी पूरी क्षमता का उपयोग करने के लिए अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। पिछले कुछ वर्षों में, उच्च-थ्रूपुट तकनीक ने रसायनों और दवाओं की जांच में विषाक्तता परीक्षणों में ज़ेब्रा फिश भ्रूणों के उपयोग की संभावना को बढ़ा दिया है।

प्रयोगशालाओं में ज़ेब्रा फिश उन अनुसंधान क्षेत्रों की पूर्ति कर सकती हैं जिनमें चूहे के मॉडल असफल हुए हैं। शायद अगले कुछ वर्षों में, विज्ञान की अगली बड़ी खोज का श्रेय ज़ेब्रा फिश को दिया जाएगा (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://cdn.britannica.com/96/219196-050-9DD604F0/Zebra-Fish-Danio-Zebrafish.jpg

चींटियां संक्रमण से कैसे बचाव करती हैं

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

चींटियों को स्व-प्रेरण से काम करने, भविष्य की तैयारी और दूर की सोच रखने, और मिल-जुलकर काम करने को प्राथमिकता देने जैसे कई सकारात्मक गुणों (Quality Traits) से जोड़ा जाता है। चींटियों (Ants) की कई प्रजातियां सामाजिक (Social) होती हैं और समूह में रहती हैं। हालांकि, समूह में रहने के फायदे तो होते हैं, लेकिन साथ-साथ इसके कुछ नुकसान भी हैं।

सामाजिक समूहों में रहने के कारण मनुष्यों को भी मौसमी संक्रमणों (Seasonal Outbreaks), जैसे इंफ्लूएंज़ा जैसी बीमारियों का सामना करना पड़ता है। संक्रमण के प्रभावों से निपटने के लिए अनुशासन (Discipline) और कुछ मूल नियमों (Rules) का पालन करना हम सीख गए हैं। आम तौर पर बीमारी या संक्रमण के लक्षण (Symptoms) पता चलते ही हम काम/ऑफिस से छुट्टी लेकर थोड़े दिनों के लिए सामाजिक दूरी (Social Distance) बना लेते हैं। सामाजिक दूरी से संपर्क के दायरे को कम करके संक्रमण फैलने से रोका जा सकता है। सामाजिक दूरी बनाने की यह प्रक्रिया सामूहिक अनुशासन (Social Discipline) पर निर्भर है और ऐसे ही गुणों के लिए चींटियां भी मशहूर हैं।

सवाल है कि ये चींटियां बस्तियों Colonies) में रहते हुए रोगजनकों से कैसे निपटती हैं? कुछ चींटी प्रजातियों (Ant species) में यह देखा गया है कि कुछ सदस्य साथी चींटियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ाने के लिए मेटाप्ल्यूरल ग्रंथि (Metaplural Gland) से निकलने वाले एक संक्रमण रोधी तरल पदार्थ को लार्वा, साथी चींटियों और खुद के शरीर पर पोत लेते हैं। गौरतलब है कि यह ग्रंथि सिर्फ चींटियों में पाई जाती है और उनके वक्ष के पिछले भाग में स्थित होती है। इस लेप से बस्ती को एक तरह की सामाजिक सुरक्षा (Sicial Immunity) मिलती है और सदस्य कुछ हद तक संक्रमण से महफूज़ रहते हैं। 

इसके अलावा भी चींटियों में सुरक्षा के कुछ और अजीबोगरीब उपाय देखे गए हैं। स्विट्ज़रलैंड के लॉज़ेन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने प्रयोग के दौरान एक काली श्रमिक चींटी (Black ant) का पैर घायल कर दिया। फिर उसे बस्ती में छोड़कर अन्य साथी चींटियों के व्यवहार पर ध्यान दिया। उन्होंने देखा कि साथी चींटियों ने घायल चींटी के पैर को शरीर से जोड़ने वाले हिस्से पर बार-बार काटकर घायल पैर को शरीर से ही अलग कर दिया। इससे लगता है कि चींटियों ने घायल चींटी का अंग-विच्छेदन (Amputation) करके बीमारी की रोकथाम की। क्योंकि चोटग्रस्त पैर कीटाणुओं को न्यौता देता, जिससे दूसरे साथियों में भी संक्रमण (Infection) फैलने का खतरा पैदा हो सकता था। 

एक अपेक्षाकृत हालिया अध्ययन में महामारी के दौरान चींटियों की बस्ती की प्रतिक्रिया को देखा गया। इसमें बगीचों में पाई जाने वाली चींटी (Lasius niger) पर अध्ययन किया। यह भारतीय चींटियों जैसी है जो आम तौर पर हमारे आसपास दिखती हैं। ये ज़मीन के नीचे जटिल बांबियां (Complex Colonies) बनाती हैं, जिसमें एक मुख्य प्रवेश द्वार, एक केंद्रीय हिस्सा – जिसमें रानी चींटी, अंडे और लार्वा रहते हैं। साथ ही कुछ छोटे-छोटे कक्ष होते हैं जो भोजन व कचरा इकट्ठा करने के लिए और अन्य चींटियों के उपयोग के लिए होते हैं। बस्ती के सभी हिस्से सुरंगों (Tunnels) के ज़रिए आपस में जुड़े होते हैं। चींटियों के बीच काम का स्पष्ट विभाजन होता है – कुछ श्रमिक चींटियां अंडे और लार्वा की देखभाल करती हैं और अन्य चींटियां भोजन का बंदोबस्त (Forager Ants) करती हैं।

प्रयोगों के दौरान एक रानी चींटी और करीब 200 श्रमिक चींटियों के समूह ने एक नई बस्ती बनाई। प्रयोग के लिए उस बस्ती की सभी चींटियों पर छोटे क्यूआर कोड लगाए गए थे ताकि वीडियो कैमरों से निगरानी की जा सके। बस्ती की बनावट पर नज़र रखने के लिए वैज्ञानिकों ने माइक्रो-सीटी स्कैन का इस्तेमाल किया। उसके एक दिन बाद वैज्ञानिकों ने ऐसी 20 श्रमिक चींटियों को बस्ती में छोड़ा जिनका संपर्क रोगजनक फफूंद से करवाया गया था।

कुछ दिनों तक निगरानी करने के बाद वैज्ञानिकों ने गौर किया कि अन्य चींटियों के मुकाबले संक्रमित चींटियां ज़्यादा बार बस्ती से बाहर गईं और उन्होंने बस्ती से बाहर ज़्यादा समय बिताया। ये संक्रमित चींटियों द्वारा खुद को अलग-थलग रखने का व्यवहार था। बस्ती की बनावट भी बदल चुकी थी, प्रवेश द्वार आम बस्ती की तुलना में ज़्यादा दूर-दूर थे। बस्ती के कामकाज में फुर्ती आ गई थी, और ज़्यादा ध्यान लंबी सुरंगें बनाने पर दिया जाने लगा था। विभिन्न कक्षों के बीच जुड़ाव भी कम कर दिया गया था।

इन सभी बदलावों की वजह से चींटियों के अलग-थलग समूहों के बीच आपसी संपर्क सीमित हो गया था। खाना जुटाने वाली चींटियों का बस्ती के सबसे मुख्य सदस्यों (रानी व रानी की सहायक चींटियों) से संपर्क बहुत कम संपर्क हो गया था और वे स्वस्थ (Healthy) रहीं।  

बचाव की ये रणनीतियां जानी-पहचानी लगती हैं ना। हम भी इसी तरह महामारी या अन्य संक्रमणों से बचने के लिए क्वारंटाइन (Quarentine), दूसरों से मिलते समय मास्क पहनना, बार-बार हाथ धोना जैसे कुछ उपाय अपनाते हैं। लगता है कि इन चींटियों ने भी संक्रमण से बचने के लिए सामाजिक दूरी के अपने उपाय विकसित कर लिए हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://th-i.thgim.com/public/sci-tech/science/l1tx9a/article71088285.ece/alternates/LANDSCAPE_1200/Black_Garden_Ant_tending_Citrus_Mealybug_16063538972.jpg