विज्ञान प्रकृति के रहस्यों को परत-दर-परत सुलझाने का उद्यम है। महान जीवविज्ञानी चार्ल्स डार्विन ने विकासवाद का सिद्धांत देकर दुनिया को चौंका दिया था। वनस्पति जगत को लेकर भी उनकी अंतर्दृष्टि और सूक्ष्म अवलोकन क्षमता बेजोड़ थी। वर्ष 1875 में, डार्विन ने एक पौधे सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम (Saxifraga candelabrum) को देखकर यह अनुमान लगाया था कि वह मांसाहारी (carnivorous) हो सकता है। पूरे डेढ़ सौ साल तक यह महज़ एक परिकल्पना बनी रही, क्योंकि इसे साबित करने के लिए कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं था। अंतत: अगस्त, 2026 में प्रकाशित एक अभूतपूर्व शोध ने वे प्रमाण उपलब्ध करा दिए हैं। चीन के हेंगडुआन पर्वत और किंगहाई-तिब्बत पठार की बर्फीली ऊंचाइयों पर पाए जाने वाले पौधे सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम को अब आधिकारिक तौर पर एक मांसाहारी पौधे की मान्यता मिल गई है।
सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम कोई सामान्य पौधा नहीं है। इसका आवास स्थान समुद्र तल से हज़ारों मीटर ऊपर, अत्यधिक ठंडे और दुर्गम अल्पाइन क्षेत्रों में है। इन बर्फीले और पथरीले इलाकों की मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्वों, विशेषकर नाइट्रोजन और फास्फोरस की भारी कमी होती है। अत्यधिक ठंड के कारण मृत जीवों और वनस्पतियों का अपघटन बहुत धीमी गति से होता है, जिससे मिट्टी उपजाऊ नहीं बन पाती। ऐसे कठोर वातावरण में जीवित रहने के लिए पौधों को कुछ असाधारण रणनीतियां अपनानी पड़ती हैं। अपनी नाइट्रोजन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए प्रकृति ने इस पौधे को एक गुप्त हथियार दिया है – कीटों का शिकार करने की क्षमता (insect eating capacity)। यह पारिस्थितिक अनुकूलन (ecological adaptation) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहां विपरीत परिस्थितियां किसी जीव को एक पूरी तरह से नई जीवनशैली अपनाने के लिए विवश कर देती हैं।
चार्ल्स डार्विन (charles darwin) ने अपने अध्ययन के दौरान सैक्सीफ्रेगा वंश के पौधों की पत्तियों और तनों पर मौजूद छोटे-छोटे ग्रंथिल रोमों को बेहद करीब से देखा था। उन्होंने पाया कि इन रोमों से चिपचिपा तरल पदार्थ स्रावित होता है, जिसमें छोटे-छोटे कीड़े अक्सर फंस जाते हैं। डार्विन को पूरा विश्वास था कि यह पौधा इन कीटों को केवल फंसाता ही नहीं है, बल्कि उन्हें पचाकर अपना भोजन भी बनाता है। हालांकि, उस समय विज्ञान इतना उन्नत नहीं था कि आणविक या रासायनिक स्तर पर इस प्रक्रिया को प्रमाणित किया जा सके। इसके अलावा, इस पौधे का निवास स्थान इतना दुर्गम है कि वहां जाकर लंबे समय तक इसका प्राकृतिक अवस्था में अध्ययन करना किसी भी वैज्ञानिक के लिए एक बड़ी चुनौती थी। यही कारण है कि डार्विन का यह विचार दशकों तक केवल परिकल्पना ही रहा और इसे मुख्यधारा के कीटभक्षी पौधों (insect eating plants) में शामिल नहीं किया गया।
हाल ही में प्रतिष्ठित शोध पत्रिका नेचर कम्युनिकेशंस में चीनी शोधकर्ताओं के एक दल ने अपना विस्तृत अध्ययन प्रकाशित किया है। उन्होंने सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम को मांसाहारी साबित करने के लिए आधुनिक विज्ञान की सबसे उन्नत तकनीकों का सहारा लिया। वनस्पति विज्ञान के कड़े नियमों के अनुसार, किसी पौधे को केवल कीट फंसाने के आधार पर मांसाहारी नहीं कहा जा सकता। इसके लिए यह साबित करना अनिवार्य होता है कि पौधा शिकार को आकर्षित करता है, उसे फंसाता है, उसे पचाने के लिए विशेष एंज़ाइम (special enzyme) निकालता है और अंतत: उस शिकार से प्राप्त पोषक तत्वों को अपने भीतर अवशोषित करता है। शोध दल ने सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम को इन सभी मापदंडों की वैज्ञानिक कसौटी पर परखा।
शोध की शुरुआत व्यापक मैदानी अध्ययन से हुई। दल ने प्राकृतिक आवास में मौजूद सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम के पौधों का सावधानीपूर्वक निरीक्षण किया। उन्होंने पाया कि पौधे के चिपचिपे ग्रंथिल रोम (sticky pore glands) शिकार को पकड़ने में बेहद कुशल हैं। औसतन एक परिपक्व पौधे पर इकहत्तर छोटे कीट फंसे हुए मिले। यह इस बात का पहला संकेत था कि पौधा सक्रिय रूप से शिकार कर रहा है और ये कीट केवल संयोगवश नहीं फंसे थे।
दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण कदम यह पता लगाना था कि क्या पौधा इन फंसे हुए कीटों को वास्तव में पचा रहा है। इसके लिए शोधकर्ताओं ने फ्लोरेसेंस टैगिंग (flouroscence tagging) नामक एक विशेष प्रकाश-आधारित तकनीक का उपयोग किया। इस आधुनिक तकनीक के माध्यम से उन्होंने पौधे के ग्रंथिल रोमों में फॉस्फेटेस एंज़ाइम की गतिविधि का पता लगाया। फॉस्फेटेस वह प्रमुख पादप एंज़ाइम है जो शिकार के शरीर को गलाकर उसमें से आवश्यक पोषक तत्वों को अलग करने का काम करता है। यह एक बहुत बड़ी सफलता थी, क्योंकि इससे साबित हो गया कि पौधा कीटों को केवल पकड़ने के लिए चिपचिपा पदार्थ नहीं छोड़ता, बल्कि एक रासायनिक प्रक्रिया के तहत उन्हें पचाता (digest) भी है।
अंतिम और सबसे निर्णायक प्रमाण यह साबित करना था कि पौधे ने कीटों के शरीर से निकले पोषक तत्वों को वास्तव में सोख लिया है। इसके लिए वैज्ञानिकों ने समस्थानिक ट्रेसिंग तकनीक (isotope tracing technique) का प्रयोग किया। उन्होंने प्रयोगशाला में फल मक्खियों को नाइट्रोजन के एक समस्थानिक (परमाणु भार 15 वाले आइसोटॉप) युक्त यौगिक से पोषित किया। नाइट्रोजन के दो स्थिर समस्थानिक होते हैं – एक का परमाणु भार 14 (उपस्थिति 99.26 प्रतिशत) और दूसरे का परमाणु भार 15 (उपस्थिति 0.38 प्रतिशत) होते हैं। इसके बाद इन मक्खियों को पौधे के ग्रंथिल रोमों पर रख दिया गया। कुछ दिनों बाद जब पौधे के ऊतकों का रासायनिक विश्लेषण किया गया तो वही नाइट्रोजन-15 समस्थानिक पौधे की पत्तियों और तनों के भीतर मौजूद पाया गया। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण था कि पौधे ने शिकार को पचाने के बाद उसके पोषक तत्वों को सफलतापूर्वक अवशोषित (Absorb) कर लिया है।
इन शारीरिक प्रमाणों के अलावा, शोधकर्ताओं ने पौधे का संपूर्ण जीनोम विश्लेषण भी किया। उन्होंने पाया कि सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम के डीएनए में शिकार को आकर्षित करने, उसे पचाने और पोषक तत्वों को सोखने वाले वे सभी जीन सक्रिय (active genes) हैं, जो दुनिया के अन्य जाने-माने मांसाहारी पौधों में पाए जाते हैं।
विकासवाद के नज़रिए से यह बहुत महत्वपूर्ण खोज है। यह अभिसारी विकास का एक शानदार उदाहरण है, जहां बिल्कुल अलग-अलग वंश के पौधे समान पर्यावरणीय चुनौतियों (environmental stress) का सामना करने के लिए स्वतंत्र रूप से एक जैसी विशेषताएं विकसित कर लेते हैं।
यह शोध न सिर्फ वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में एक मील का पत्थर है, बल्कि महान वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन की दूरदृष्टि (vision) को भी एक भव्य श्रद्धांजलि है। जो बात डार्विन ने अपनी सूक्ष्म अवलोकन क्षमता के आधार पर कही थी, उसे आधुनिक प्रयोगशालाओं और उन्नत तकनीकों ने सही साबित कर दिया है। सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम की यह कहानी हमें बताती है कि प्रकृति जीवन को बचाए रखने के लिए किस हद तक जा सकती है, और वैज्ञानिक जिज्ञासा अंतत: हर गहरे रहस्य को उजागर कर देती है। (स्रोत फीचर्स)
कल्पना कीजिए एक ऐसे बगीचे की जिसमें फूल बेरंग हों, चिड़िया की चहचहाहट न हो, भंवरों का गुंजन और रंगीन तितलियां गायब हों; सब फीका-फीका, सूना-सूना सा हो। ऐसा सचमुच हुआ तो जीवनचक्र ही थम जाएगा। प्रकृति की यह छटा कोई चुटकियों में घटी घटना नहीं, बल्कि करोड़ों सालों की बेजोड़ साझेदारी (coordination) का नतीजा है। चिड़िया, मधुमक्खियां, भंवरे, तितलियां, ये छोटे-छोटे जीव केवल सुंदरता नहीं बढ़ाते, बल्कि इनका अनदेखा श्रम हमारी प्रकृति को सहेजे हुए है।
वास्तव में, करोड़ों साल पहले धरती पर जीवन बिल्कुल भी आज जैसा नहीं था, बल्कि यह ऐसा दौर था जब फूल और कीट धरती पर प्रकट ही नहीं हुए थे। किंतु कुछ बैक्टीरिया और शैवाल ने धरती की कायापलट कर दी। ये वे जीव थे जिन्होंने सबसे पहले प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) की प्रक्रिया शुरू की। इसके व्यापक असर हुए, क्योंकि इस प्रक्रिया के एक गौण उत्पाद के तौर पर ऑक्सीजन बनकर वातावरण में फैली। कुछ जीव इस बढ़ी हुई ऑक्सीजन को झेल नहीं पाए और मारे गए, वहीं कुछ जीवों के लिए यह वरदान साबित हुई और वे फैलते गए। उन्हीं प्रकाश संश्लेषी जीवों की बुनियाद पर वर्तमान के पेड़-पौधे विकसित हुए हैं। प्रकृति के इस अनोखे रूप को समझने के लिए इतिहास को टटोलना ज़रूरी है।
युगों पहले, प्राचीन पौधे समंदर के भीतर ही अपना जीवन जीते थे। ऐसे पौधों को ‘गोताखोर’ की संज्ञा दी जा सकती है। जैव विकास की नज़र से देखें, तो लगभग 45-48 करोड़ साल पहले, कीटों का विकास महासागर में रहने वाले क्रस्टेशियन जीवों (crustaceans) से हुआ और लगभग उसी समय पौधे भी पहली बार समंदर से भूमि पर आ बसे। हालांकि शुरुआती कीटों के पंख नहीं थे; वे उड़ नहीं सकते थे। लेकिन समय के साथ विकसित होते-होते वे पृथ्वी पर उड़ने वाले सबसे पहले जीव हुए। वहीं शुरुआती भूमिगत पौधों में बिना फूलवालों का ही दबदबा था; फर्न (टेरिडोफाइटा) (pteridophyta) और अनावृतबीजी (जिम्नोस्पर्म) (gymnosperm) जैसे शंकुधारी वृक्ष, और साइकैड। ऐसे पौधों के विकास के साथ यह पहली बार हुआ कि नर और मादा लिंग अलग-अलग हो गए। इनमें नर की जनन कोशिकाओं के मादा जनन कोशिकाओं से मिलन के बाद ही अगली पीढ़ी की शुरुआत होती थी।
अब एक दिक्कत पेश आई। पेड़-पौधे खुद चलकर आपस में जनन कोशिकाओं का आदान-प्रदान तो कर नहीं सकते; ज़ाहिर है उन्हें इस मिलन को संभव बनाने के लिए किसी बाहरी कर्ता यानी बिचौलिए की ज़रूरत पड़ी। शुरुआती पेड़-पौधे इस ‘सेवा’ के लिए केवल हवा के भरोसे थे। अनावृतबीजी पौधे हज़ारों हल्के-उड़ने वाले पराग कण बनाते थे, करोड़ों में से कोई एक पराग कण संयोगवश मादा तक पहुंच पाता था। मादा भाग तक पहुंचते ही वहां उपस्थित खास चिपचिपा जाल पराग कण (pollen grain) को जल्दी से पकड़ लेता था। इस चरण को परागण (pollination) कहते हैं।
पेड़–पौधों की वंशवृद्धि
वैसे तो अधिकांश पौधे अलैंगिक प्रजनन (asexual reproduction) के ज़रिए भी वंश बढ़ा सकते हैं। इसका एक प्रकार है – कायिक प्रजनन (vegetative propagation)। इसमें पौधे के छोटे भाग (तना, पत्ती या जड़) से पूर्ण नवीन पौधे का विकास हो जाता है और नवीन पौधा आनुवंशिक रूप से पहले पौधे के समान (क्लोन) होता है। ग्राफ्टिंग, बडिंग, कटिंग, लेयरिंग, जैसी विधियां इसी के अलग-अलग रूप हैं।
दूसरी ओर, लैंगिक प्रजनन (Sexual reproduction) नर व मादा युग्मकों के मिलन पर निर्भर होता है। लेकिन हमने देखा कि इसके लिए परागण ज़रूरी होता है। परागण के बाद सफल निषेचन (फर्टिलाइज़ेशन) होने पर फल और बीज बनने की प्रक्रिया (Seed) आगे बढ़ती है। ज़ाहिर है, परागण न हो तो बीज नहीं बनेंगे। इस विधि में दो अलग-अलग पौधों के आनुवंशिक पदार्थों के मिलने से आनुवंशिक विविधता में वृद्धि होती है। दूसरी ओर, कुछ नुकसान भी होते हैं; जैसे परिपक्व होने और फलने में लंबा समय लगना, साथ ही पौधों में ज़रूरत से ज़्यादा व अनावश्यक परिवर्तन भी देखने को मिल सकते हैं। सबसे बड़ी समस्या है पराग कणों को वर्तिकाग्र तक पहुंचाना। यह काफी जोखिम भरी प्रक्रिया होती है। फिर भी अधिकांश पेड़-पौधे इसी का सहारा लेते हैं। क्यों?
परागण: कुदरती कूरियर सेवा
फूल का नर जननांग ‘पुंकेसर’ होता है और उसमें भी जिस हिस्से में पराग कण बनते हैं ‘परागकोश’ कहलाता है। मादा जननांग ‘स्त्रीकेसर’ कहलाता है और उसमें इन पराग कणों को ग्रहण करने वाले हिस्से को ‘वर्तिकाग्र’ कहते हैं। देखा जाए तो फूलों के तीन प्रकार हैं – नर, मादा और द्विलिंगी (एक ही फूल में नर व मादा दोनों जननांग पाए जाते हैं)। वैसे ही पौधे भी दो प्रकार के होते हैं – एकलिंगी पौधे (नर पौधे – केवल नर फूल खिलते हैं; मादा पौधे – केवल मादा फूल खिलते हैं) और द्विलिंगी पौधे (एक ही पौधे पर नर व मादा फूल अलग-अलग खिलते हैं)।
परागण दो प्रकार से होता है – स्व-परागण और पर-परागण। यदि किसी फूल के पराग कण उसी फूल या उसी पौधे के किसी दूसरे फूल के वर्तिकाग्र पर गिरते हैं, तो इसे ‘स्व-परागण’ (self pollination) कहते हैं। दूसरी ओर, जब किसी फूल के पराग कण उसी प्रजाति के किसी दूसरे पौधे के फूल के वर्तिकाग्र पर पहुंचते हैं, उसे ‘पर-परागण’ (cross pollination) कहते हैं।
देखा गया है कि पौधे स्व-परागण से बचते हैं और पर-परागण को प्राथमिकता देते हैं। कारण, अंतःजनन हानि (Inbreeding depression) से बचाव और आनुवंशिक विविधता के फैलाव के लिए। अंतःप्रजनन से कमज़ोर, कम उपजाऊ, और मौसम, कीट व रोगों के प्रति संवेदनशील संतानें पैदा होती हैं। वहीं, पर-परागण से आनुवंशिक जानकारी का फैलाव होता है; पौधों की विविधता बढ़ती है, जिससे अनुकूलन क्षमता विकसित होती है।
चूंकि पौधे खुद चल नहीं सकते तो पर-परागण कुछ बिचौलियों (medium) के ज़रिए किया जाता है। ये माध्यम अजैविक भी हो सकते हैं और जैविक भी। अजैविक (abiotic) परागण में जल द्वारा एवं हवा द्वारा परागण आते हैं। जबकि जैविक (biotic) के अंतर्गत कीटों, जंतु या पक्षी द्वारा परागण शामिल है। जैविक बिचौलियों को ‘परागणकर्ता’ (pollinators) कहते हैं।
हमने देखा कि शुरुआती वनस्पतियां तो परागण के लिए हवा-पानी पर ही निर्भर थीं। फिर कुछ 28-30 करोड़ साल पहले, छोटे जीवों यानी कीटों का पौधों के जीवन में आगमन हुआ। हालांकि शुरू में कीट पौधों के पास केवल पराग खाने (pollen eaters) आते थे, क्योंकि पराग कीटों के लिए पौष्टिक भोजन था। यानी इस दौर तक पौधों और कीटों के बीच एक रिश्ता बन चुका था, लेकिन एकतरफा। माना जाता है कि आगे चलकर यही कीट एक और काम करने लगे – पौधों के पराग कणों का परिवहन – और जाने-अनजाने में परागण में मददगार हो गए।
जीवाश्म साक्ष्य में कमी के कारण ऐसी शुरुआती कीट प्रजातियों का पता नहीं लगाया जा सका है। फिर भी, कुछ साक्ष्य के मुताबिक वैज्ञानिकों का मानना है कि फूलदार पौधों के विकास से पहले भृंग अनावृतबीजी पौधों के पराग का भोजन करते थे और परागण भी कर देते थे। समय के साथ जब फूलदार पौधे (flowering plants) विकसित हुए तो उन्होंने भी भृंग (beetles) को अपनी पीढ़ी बढ़ाने की योजना में शामिल किया। यहां से पौधों और कीटों के बीच इस खास जुगलबंदी की शुरुआत हुई।
फूलदार पौधे और कीटों का सह–विकास
लगभग 14-16 करोड़ साल पहले फूलदार पौधे विकसित हुए। वैकासिक आंकड़ों के अनुसार, बहुत कम समय में फूलदार पौधों की आबादी तेज़ी से बढ़ी। कीटों द्वारा परागण ही इसका खास कारण माना जा सकता है। इस समय तक पौधे और कीट सम्बंध बना ही चुके थे और वे साथ-साथ विकसित भी हो रहे थे। लेकिन शुरुआती फूलदार पौधे के पास कीटों को आकर्षित करने का केवल एक ही तरीका था – पराग। फूलदार पौधे भरपूर मात्रा में पराग बनाते थे, जो कीटों के लिए भोजन और साथ ही पौधों के वंश बढ़ाने का माध्यम था। परिणाम यह हुआ कि पराग-भक्षी कीटों द्वारा परागण के जरिए आनुवंशिक जानकारी (genetic information) दूर-दूर तक फैली। लगता है कीट परागित पौधों को प्राचीन वायु परागित पौधों के मुकाबले अपनी आबादी बढ़ाने में अच्छा-खासा फायदा हुआ।
फिर क्या था परागणकर्ताओं को लुभाने के लिए फूलदार पौधे भी आपसी होड़ में लगे रहे। पौधों और कीटों में ऐसे बदलाव होने लगे कि वे एक-दूसरे के अनुकूल (adopt) हो जाएं। दोनों में ही समय के साथ नए-नए तरीके विकसित होते गए। पौधे कीटों-जंतुओं को आकर्षित (attract) करने की तरकीब लगाने में जुट गए।
इनमें एक प्रमुख तरीका था कीटों के लिए भोजन का उपहार। और यह उपहार सिर्फ पराग के रूप में नहीं बल्कि मकरंद के रूप में भी सामने आया। कीटों को लुभाने के लिए फूलों में चटख रंगों, गंध वगैरह का विकास हुआ। पौधों में ऐसी युक्तियां भी विकसित हुई कि मकरंद (nectar) के इस उपहार तक पहुंचने के लिए कीट को पराग कणों से संपर्क करना पड़े। पौधों में विकसित हुए कुछ खास बदलावों के साथ-साथ परागणकर्ताओं (कीट, पक्षी और अन्य) में भी पुरस्कार पाने के लिए खास बदलाव होते गए।
पौधों और कीटों के बदलाव
विविध बनावट के फूल: पौधों में फूलों के अलग-अलग आकार विकसित हुए। जैसे, मक्खियों के बैठने के लिए चौड़े-चपटे फूल, हमिंगबर्ड के लिए घंटीनुमा-गहरे फूल आए।
साज–सज्जा: परागणकर्ता को आकर्षित करने के लिए पौधों में चटक-चमकीले रंगों वाले फूल विकसित हुए। जैसे, पीले, नीले, बैंगनी (मक्खियों-तितलियों के लिए) और लाल-नारंगी (पक्षियों के लिए)।
मकरंद ग्रंथि व पथदर्शी: मधुर मकरंद का विकास संभवत: पौधों में कीटों को आकर्षित करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण नवाचार था। साथ ही, मीठी-कस्तूरी, फलों जैसी सुगंध, और फूलों की पंखुड़ियों पर पराबैंगनी चिन्हों का विकास। इससे कीटों को मकरंद तक पहुंचने में आसानी हुई।
चिपकू पराग: खास चिपकू पराग कणों का विकास, जो कीटों के शरीर या पंखों पर आसानी से चिपक जाते हैं। जैसे, गुलाब, सूरजमुखी, गुड़हल, खीरा, टमाटर, कद्दू वगैरह के पराग।
कीटों से तालमेल: कुछ पौधों में पराग को नियंत्रित तरीके से खास समय पर छोड़ने का तंत्र विकसित हुआ। यानी वे उसी समय पराग छोड़ने लगे जब परागण करने वाले कीट सक्रिय रहते थे। जैसे, रात-रानी, हरसिंगार या धतूरे के फूल शाम या रात में खिलते हैं जब पतंगे सक्रिय रहते हैं।
परागणकर्ताओं की निरंतरता: कई परागणकर्ता एक ही प्रकार के पौधे के प्रति निष्ठा दर्शाने लगे। समय के साथ वे एक ही प्रजाति के पौधे का परागण करने लगे। जैसे, अंजीर-ततैया (Pleistodontes imperialis) केवल अंजीर के फूलों का परागण करती है, मोनार्क तितली (Danaus plexippus) केवल मिल्कवीड पौधों पर अपना जीवन बिताती है।
गुंजन परागण : कुछ पौधों के फूल; जैसे टमाटर, बैंगन, कीवी फ्रूट में पराग कण खास संरचनाओं में कैद हो गए। अब पराग पाने के लिए मधुमक्खियां और भौंरे पंखों की मांसपेशियों को कंपन (गुंजन) करके एक खास ‘फ्रीक्वेंसी’ पर थपथपाने लगे, जिससे पराग झड़ कर बाहर निकल आते हैं।
यौन अनुकरण: कुछ ऑर्किड पौधे मादा कीटों की बनावट जैसे फूल विकसित कर नर कीटों को धोखा देते हैं, ताकि वे मादा सदृश फूल की ओर आकर्षित हों और परागण हो जाए।
जैसा कि पता है कई फूल द्विलिंगी (hermaphrodite) होते हैं। यानी उनमें पराग कण भी बनते हैं और स्त्रीकेसर भी होता है। लेकिन प्राय: देखा गया है कि इस हेतु विशेष युक्तियां विकसित हुई हैं कि एक फूल के पराग कण उसी फूल के वर्तिकाग्र पर न पहुंच पाएं और यदि पहुंच जाएं तो निषेचन न हो पाए। समय के साथ पौधों में स्व-परागण से बचने के लिए कई युक्तियां विकसित हुईं। जैसे, स्त्रीकेसर द्वारा अपने ही पराग कण को पहचान लेना और खारिज कर निषेचन की प्रक्रिया न होने देना (स्व-असंगतता)(self-incompatibility); पुंकेसर और स्त्रीकेसर की अलग-अलग जमावट (हर्कोगैमी)(herkogamy); एक पौधे पर केवल नर या केवल मादा फूल का होना; द्विलिंगी पौधों में नर और मादा फूलों का एक साथ परिपक्व न होना (डायकोगैमी)(dichogamy)। इन सभी बदलावों से स्व-परागण असंभव हो जाता है।
क्रमिक विकास को ध्यान में रखते हुए पौधों और कीटों में जीवन को संजोने के लिए बदलाव होते रहे हैं, तो आने वाले समय में और भी खास और अद्भुत बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
हाल में हुए एक अध्ययन में बताया गया है कि बिच्छूमक्खी (Panorpa communis) में शंकुधारी वृक्षों की परागण सेवा के लिए मुखांग (mouthparts) विकसित हुए थे, लेकिन जैसे ही दूसरे परागणकर्ता विकसित होने लगे तो समय के साथ बिच्छूमक्खी की भूमिका समाप्त होती गई।
परागणकर्ताओं में भी प्रमुख मधुमक्खियां (Apis) और उनकी जंगली प्रजातियां हैं – ये परागण और वैश्विक उत्पादन (अन्न, फल-सब्जियां, फूल) में लगभग 80 प्रतिशत हिस्सेदार हैं। लेकिन केवल मधुमक्खियों (bees) की हिस्सेदारी से पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) को मज़बूती नहीं मिलती। जंगली परागणकर्ता भी अहम योगदान देते हैं। इसलिए परागणकर्ताओं की विविधता ज़रूरी है। जंगली कीटों द्वारा परागण होने पर फसलों की आनुवंशिक विविधता बढ़ती है एवं अंतःप्रजनन की समस्या और इससे होने वाले प्रभावों में कमी होती है।
वर्तमान परिस्थिति और चुनौतियां
वर्तमान में, पुष्पीय पौधों की लगभग साढ़े तीन लाख से ज़्यादा प्रजातियां ज्ञात हैं, जिनमें फल, फूल, सब्ज़ियां, वृक्ष-लताएं और अनाज वाले पौधे शामिल हैं। फूलदार पौधों की वंशवृद्धि (reproduction) के लिए कीटों की मौजूदगी ज़रूरी है। लेकिन विकास की होड़ में हम इन छोटे साथियों को भूल गए हैं जिन्होंने करोड़ों सालों से हमारी धरती को रंग-बिरंगा और हरा-भरा बनाए रखा।
बढ़ती आबादी, शहरीकरण और कृषि क्षेत्र में बढ़ोतरी के कारण जंगली फूलों, कीटों और पक्षियों के आवास में कमी होना चिंताजनक है। साथ ही रसायन व मशीन आधारित खेती कीटों की संख्या में कमी का कारण है। कृत्रिम परागण जैसी तकनीक भी इन छोटे जीवों के लिए खतरा है। दूसरी ओर, बड़े पैमाने पर मधुमक्खी पालन (bee keeping) के दौरान ज़्यादा आबादी में मधुमक्खियों का प्रजनन और उनके स्थानांतरण के कारण जंगली एवं पालतू कीटों में घातक रोग फैलने की संभावना रहती है।
परागण व परागणकर्ता हमारी खाद्य सुरक्षा (food security) के साथ पृथ्वी की जैव विविधता (biodiversity) के लिए भी अनिवार्य हैं। ज़्यादा से ज़्यादा फूलों वाले पेड़-पौधे लगाने से न केवल इन छोटे जीवों को घर मिलेगा, हमें आनंद भी मिलेगा।
अंत में एक बात कहना मुनासिब है। यह स्पष्ट है कि कायिक प्रजनन के मुकाबले लैंगिक प्रजनन काफी जोखिम भरा है और लैंगिक प्रजनन में भी स्व-परागण की अपेक्षा पर-परागण में खतरे ज़्यादा है। फिर भी पेड़-पौधों ने कायिक की बजाय लैंगिक और स्व-परागण की बजाय पर-परागण को तरजीह दी। क्यों? वैज्ञानिकों के लिए यह एक गुत्थी है। इनसे मिलने वाले लाभ ज़ाहिर हैं, लेकिन यह अनुत्तरित है कि इन प्रक्रियाओं की शुरुआत क्यों व कैसे हुई। वैज्ञानिकों ने अटकलें लगाई हैं लेकिन सर्वसम्मत उत्तर अभी नहीं मिला है। (स्रोत फीचर्स)
विशाल हाथियों (Elephant) को जंगल का रक्षक माना जाता है। वे विभिन्न जंगली वनस्पतियों को खाते और कुचलते हैं जिससे बनी खाद और उनके द्वारा फैलाए गए बीज जंगल की विविधता (Biodiversity) बनाए रखते हैं। लेकिन क्या हो अगर हाथी दुनिया से हमेशा के लिए गायब हो जाएं?
हाल ही में अफ्रीका के मैदानों में हुए एक अध्ययन में यह चौंकाने वाली बात सामने आई है कि हाथियों के गायब होने से एक और प्रजाति पृथ्वी से दुगनी तेज़ी से गायब हो जाएगी – वो हैं गुबरैले।
छोटे से दिखने वाले गुबरैले (Dung Beetels) प्रकृति का एक बहुत ज़रूरी काम संभालते हैं। ये छोटे जीव इतने ताकतवर हैं कि अपने से 1140 गुना वज़नी चीज़ों को ढकेल या खींच सकते हैं। ये बड़े जानवरों का गोबर/विष्ठा खाकर, उसे गेंद जैसे आकार में बदलकर ज़मीन के अंदर दबा देते हैं। इससे मिट्टी का उपजाऊपन (Fertility) बेहतर होता है, बीजों का फैलाव होता है और गंदगी साफ होने से बीमारी फैलाने वाली मक्खियों से बचाव होता है।
दरअसल, पर्यावरण चक्र में कुछ ऐसी खास प्रजातियां हैं जो पारिस्थितिकी तंत्र को ज़िंदा रखने के लिए बहुत ज़रूरी हैं। ऐसी मुख्य प्रजातियों को विज्ञान में ‘की-स्टोन प्रजाति’ (Key stone species) कहा जाता है। इनकी कमी या विलुप्ति के कारण पर्यावरण पर गहरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। हालांकि ऐसी प्रजातियों का संरक्षण करके बुरे प्रभावों को कम किया जा सकता है, लेकिन दिक्कत यह है कि ऐसी की-स्टोन प्रजातियों की असली भूमिका उनके चले जाने के बाद ही समझ आती है।
ऐसा ही कुछ केन्या में वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन के दौरान देखा। इसे ‘कैफेटेरिया प्रयोग’ (Cafeteria Experiment) नाम दिया। इस प्रयोग में उन्होंने 9 अलग-अलग स्तनधारी जीवों के ताज़ा गोबर/लीद के प्रति 100 से अधिक गुबरैला प्रजातियों की पसंद को मापा। उन्होंने हर प्रकार की लीद/गोबर पर आने वाले गुबरैलों की गिनती और पहचान की। वैसे तो गुबरैले सभी जीवों की विष्ठा खा लेते थे, लेकिन उन्होंने देखा कि गुबरैलों को हाथियों की लीद ज़्यादा पसंद थी। प्रयोग से शोधकर्ताओं को इस खाद्य संजाल की मुख्य कड़ियों को समझने में आसानी हुई।
इसी कड़ी में, पिछले कुछ अध्ययनों को आगे बढ़ाते हुए गिज्समैन और उनकी टीम ने कंप्यूटर पर एक मॉडल बनाकर देखा कि यदि हाथी जैसे बड़े स्तनधारी जीव दुनिया से गायब हो जाएं तो उसके क्या असर देखने को मिलेंगे। नतीजे काफी भयानक थे; अगर हाथी न रहे, तो गुबरैले आम अनुमान से दुगनी तेज़ी से गायब होने लगेंगे।
इस मॉडल को यथार्थ में परखने के लिए बागड़ बंद इलाके बनाए गए, ताकि हाथी और जिराफ जैसे बड़े जीवों को वहां जाने से रोका जा सके। परिणाम यह हुआ कि कुछ ही समय में उन बागड़बंद इलाकों में गुबरैलों की संख्या में भारी गिरावट देखने को मिली। परिणामस्वरूप वहां ना तो नए पौधे उगे और ना ही दूसरे जीवों का गोबर/लीद साफ हुई।
वर्तमान स्थिति यह है कि अफ्रीका के जंगलों (Afican Forest’s) और मैदानों को काटकर वहां गाय, भैंस, भेड़ जैसे पशुओं का पालन किया जा रहा है। हालांकि गुबरैले उनका भी गोबर खा सकते हैं। लेकिन इस अध्ययन के आधार पर वैज्ञानिकों का कहना है कि ये पालतू जानवर हाथी, जिराफ जैसे बड़े जीवों की जगह नहीं ले सकते। मवेशियों का गोबर प्रकृति को हाथियों की लीद जितना पोषण नहीं दे सकता। साथ ही, मवेशियों को पेट के कीड़े मारने की दवाइयां (जैसे आइवरमेक्टिन) (Ivermectin) दी जाती हैं, जिससे उनका गोबर खाने वाले गुबरैलों पर भी बुरा असर हो रहा है।
दूसरी ओर बढ़ते तापमान और सूखे के कारण भी ये कीट अपनी सहन-क्षमता की आखिरी सीमा तक आ पहुंचे हैं। यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि समय से साथ यदि विशाल स्तनधारी (Mammals) प्रजातियां विलुप्त हो जाती हैं तो एक ऐसा समय आएगा जब यह विविध और लचीला खाद्य संजाल इतना सपाट हो जाएगा कि भावी पर्यावरणीय परिवर्तनों को झेलने की क्षमता ही खो देगा।
वैसे तो किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र के खाद्य संजाल (Food Web) में अक्सर यह पता लगाना बहुत मुश्किल होता है कि कौन-सा जीव किस पर निर्भर है। लेकिन अब कंप्यूटर मॉडल्स और eDNA (एंवायरमेंटल डीएनए) जैसी तकनीकों से पानी, मिट्टी, या हवा में छूटे जीवों के छोटे-से अंश से ही प्रजातियों के आपसी सम्बंधों और पूरे खाद्य संजाल का आसानी से पता लगाया जा सकता है। इससे आने वाले समय में जीवों की अहमियत और उनकी अनुपस्थिति से होने वाले परिणामों का अनुमान लगाने में मदद मिलेगी, ताकि समय रहते बेज़ुबान जीवों को विलुप्ति (Extinction) से बचाया जा सके।(स्रोत फीचर्स)
प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) की अथाह गहराइयों में एक रहस्यमयी दुनिया छिपी हुई है। मैरियाना ट्रेंच (Mariana Trench) पृथ्वी के महासागरों की सबसे गहरी जगह है। यहां गहराई लगभग 11,000 मीटर तक है। इतनी गहराई पर दाब (pressure) बहुत अधिक, ठंड (temperature) अकल्पनीय और अंधकार (darkness) भी घटाटोप होता है। ये परिस्थितियां इस जगह को पृथ्वी की सबसे प्रतिकूल और दूभर परिस्थितियों में शुमार करती हैं। लेकिन हाल ही में किए गए अध्ययनों से पता चला है कि इन परिस्थितियों में भी जीवन (deep-sea life) की हैरतअंगेज़ विविधता मौजूद है। यह विविधता गहरे समुद्र की पारिस्थितिकी (deep ocean ecosystem) के बारे में हमारी वर्तमान समझ को ललकारती है।
हाल ही में, चीन के वैज्ञानिकों ने फेंडोज़े पनडुब्बी (Fendouzhe Submarine) के ज़रिए मैरियाना ट्रेंच की गहराइयों में गोता लगाया है। जैसे-जैसे वे नीचे उतरे, उन्होंने अंधकार में दीप्ति बिखेरने वाले जीव (bioluminescent organisms) देखे; जो हरी, पीली और नारंगी चमक बिखेर रहे थे। समुद्र के पेंदे (ocean floor) पर पहुंचने पर टीम ने जब रोशनी चालू की, तो उन्हें एक विस्मयकारी नीली दुनिया दिखाई दी, जहां प्लवकों (plankton) की भरमार थी।
यह खोज मैरियाना ट्रेंच पर्यावरण और पारिस्थितिकी अनुसंधान (MEER – Mariana Trench Ecology and Environment Research) परियोजना का हिस्सा है, जिसके तहत किए गए अध्ययन सेल पत्रिका (cell journal) में प्रकाशित हुए हैं। इस शोध की सबसे चौंकाने वाली खोज 7000 से अधिक नए सूक्ष्मजीवों (new microbes, deep-sea bacteria) की पहचान है, जिनमें से 89 प्रतिशत विज्ञान के लिए पूरी तरह नए हैं। ये सूक्ष्मजीव हैडल ज़ोन (hadal zone – 6000 से 11,000 मीटर की गहराई) की कठोर परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए विकसित हैं।
गौरतलब है कि कुछ सूक्ष्मजीवों (microorganisms) के जीनोम (genome sequencing)बहुत कुशल होते हैं, जो सीमित कार्यों के लिए अनुकूलित होते हैं। जबकि कुछ अन्य के जीन (genes) अधिक जटिल होते हैं, जिससे वे बदलते पर्यावरण के अनुसार खुद को ढाल सकते हैं। हैरानी की बात यह है कि इनमें से कुछ सूक्ष्मजीव कार्बन मोनोऑक्साइड (carbon monoxide metabolism) जैसी गैसों को अपना भोजन बनाते हैं। यह क्षमता उन्हें पोषक तत्वों की कमी (nutrient-poor environment) वाले समुद्री वातावरण में जीवित रहने में मदद करती है।
आगे के इस अध्ययन में एम्फिपॉड्स (amphipods – छोटे झींगे जैसे जीव) पर ध्यान दिया गया, जो समुद्री खाइयों (deep-sea trench) में बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। वैज्ञानिकों (scientists) ने पाया कि ये जीव गहरे समुद्र में रहने वाले बैक्टीरिया (deep sea symbiotic bacteria) के साथ सहजीवी सम्बंध रखते हैं। उनकी आंतों में सायक्रोमोनास (Psychromonas bacteria) नामक बैक्टीरिया काफी संख्या में मिले, जो ट्राइमेथिइलएमाइन एन-ऑक्साइड (TMAO – Trimethylamine N-oxide) नामक एक यौगिक का निर्माण करने में मदद करते हैं। TMAO गहरे समुद्र के अत्यधिक दाब (extreme pressure adaptation)से जीवों की रक्षा करने में अहम भूमिका निभाता है।
शोध के तीसरे चरण में यह समझने की कोशिश की गई कि गहरे समुद्र की मछलियां (deep-sea fish) अत्यधिक दाब और ठंडे तापमान में कैसे जीवित रहती हैं। जेनेटिक विश्लेषण (genetic analysis) से पता चला कि 3000 मीटर से अधिक गहराई में रहने वाली मछलियों में एक विशेष जेनेटिक परिवर्तन (genetic mutation) होता है, जो उनकी कोशिकाओं को अधिक कुशलता से प्रोटीन बनाने (protein synthesis) में मदद करता है। यह अनुकूलन उन्हें समुद्री दाब से बचने में सहायता करता है।
शोध से यह भी पता चला कि विभिन्न जीवों ने गहरे समुद्र में कब शरण (deep-sea migration) ली होगी। मसलन, ईल मछलियां (eel fish) शायद लगभग 10 करोड़ साल (100 million years ago) पहले गहरे समुद्र में चली गई होंगी जिसकी वजह से वे डायनासौर विलुप्ति (dinosaur extinction) वाली घटना से बच गई होंगी। इसी तरह स्नेलफिश (Snailfish) लगभग 2 करोड़ साल पहले (20 million years ago) समुद्र की गहरी खाइयों में पहुंच गई होगीं। यह वह समय था जब पृथ्वी पर टेक्टोनिक हलचल (tectonic activity) सबसे अधिक थी यानी धरती के भूखंड तेज़ी से इधर-उधर भटक रहे थे।
ये निष्कर्ष इस बात को नुमाया करते हैं कि गहरा समुद्र (deep sea) लंबे समय से जलवायु परिवर्तन और ऑक्सीजन के उतार-चढ़ाव के दौरान कई जीवों को पनाह देता रहा है।
इन रोमांचक खोजों के साथ-साथ वैज्ञानिकों ने गहरे समुद्र में कुछ चिंताजनक चीज़ें (deep-sea pollution) भी देखीं; उन्हें मैरियाना ट्रेंच (Mariana Trench)और याप ट्रेंच (Yap Trench) में प्लास्टिक बैग(plastic pollution), बीयर की बोतलें (beer bottles), सोडा कैन (soda can) और एक टोकरी (basket) भी मिली है। यह दर्शाता है कि मानव गतिविधियों का असर (human activities impact) दूरस्थ और दुगर्म क्षेत्रों तक पहुंच चुका है।
हालांकि, वैज्ञानिकों ने पाया कि कुछ बैक्टीरिया (bacteria) इन प्रदूषकों (pollutants) का इस्तेमाल ऊर्जा स्रोत (energy source) के रूप में करने में सक्षम हैं। इससे लगता है कि भविष्य में समुद्री बैक्टीरिया (marine bacteria) पर्यावरण प्रदूषण को कम करने में मदद कर सकते हैं।
बहरहाल, समुद्र की अधिकांश गहराइयां अब भी अनदेखी हैं। संभव है कि वहां भी असंख्य अनजाने जीव (undiscovered species) हैं। MEER की योजना आगे भी ऐसे अध्ययन जारी रखने की है। (स्रोतफीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.zcaho64/card-type9/_20250306_on_marianatrench-1741811731603.jpg
जब हम जैव विविधता (Biodiversity) के बारे में सोचते हैं, तो हमारे दिमाग में हरे-भरे जंगल, रंगीन मूंगा चट्टानें (Coral reefs) और विभिन्न प्रकार के पौधे व जीव आते हैं। वैज्ञानिक अब एक और छिपे हुए खतरे की ओर इशारा कर रहे हैं – प्रजातियों के भीतर जेनेटिक विविधता (Genetic diversity) में गिरावट।
नेचर पत्रिका (nature Journal) में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, जिस तरह विश्व में प्रजातियों की संख्या घट रही है, वैसे ही कई प्रजातियों के भीतर जेनेटिक विविधता भी कम हो रही है। इसका सीधा असर उनकी जलवायु परिवर्तन(Climate change) से निपटने, बीमारियों से लड़ने और पर्यावरणीय चुनौतियों (Environmental challenges) से बचने की क्षमता पर पड़ता है। यानी, जो प्रजातियां आज स्थिर दिख रही हैं, वे शायद हमारी सोच से कहीं अधिक खतरे में हो सकती हैं।
गौरतलब है कि जेनेटिक विविधता प्रकृति की सुरक्षा व्यवस्था की तरह काम करती है। यदि किसी प्रजाति में विविध जेनेटिक लक्षण (Genetic traits) होते हैं, तो प्रजाति के कुछ सदस्य नए खतरों – जैसे बढ़ते तापमान या नई बीमारियों से बचने में सक्षम हो सकते हैं। लेकिन शहरीकरण(Urbanisation), प्राकृतवासों का विनाश (habitat destruction) और जलवायु परिवर्तन (climate change) जैसी मानवीय गतिविधियों के कारण जब जीवों की आबादी घटती है, तो उनके भीतर की जेनेटिक विविधता भी कम हो जाती है। इसे ‘मौन विलुप्ति’ (silent extinction) कहा जाता है। यानी एक धीमी और अदृश्य प्रक्रिया जो कई प्रजातियों के दीर्घकालिक अस्तित्व के लिए खतरा बन रही है।
इस शोध में वैज्ञानिकों ने पक्षी(birds), स्तनधारियों(mammals), मछलियों(Fish) और पौधों सहित 628 प्रजातियों पर किए गए 882 अध्ययनों का विश्लेषण किया। परिणाम चौंकाने वाले थे।
दो-तिहाई प्रजातियों में आनुवंशिक विविधता घट रही है। इसमें पहले से ही संकटग्रस्त काकेपो (न्यूज़ीलैंड का दुर्लभ उड़ानहीन तोता)(kakaepo) जैसे जीव तो शामिल हैं ही, गौरैया(sparrow) और ब्लैक-टेल प्रेयरी डॉग जैसी आम प्रजातियां भी प्रभावित हो रही हैं।
पारिस्थितिक तंत्र की बहाली (ecosystem restoration) या नाशी जीवों के नियंत्रण (pest control) जैसे कुछ संरक्षण प्रयासों का जेनेटिक विविधता के संरक्षण पर खास असर नहीं हुआ है। दूसरी ओर, प्राकृतवासों का विस्तार(habitat expansion), अलग-थलग आबादियों को फिर से जोड़ना और छोटी होती आबादी में नए जीवों को शामिल करना जेनेटिक विविधता बनाए रखने में सहायक साबित हुए हैं।
अब तक संरक्षण (conservation) के प्रयास मुख्य रूप से प्रजातियों को विलुप्त होने से बचाने पर केंद्रित रहे हैं। लेकिन 2022 में संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता संधि (UN Biodiversity treaty) ने जेनेटिक विविधता की रक्षा के महत्व को भी स्वीकार किया है। वैज्ञानिकों ने इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम सुझाए हैं। जैसे प्राकृतवासों की सुरक्षा (Habitat Protection) और विस्तार जिसके अंतर्गत बड़े और आपस में जुड़े प्राकृतिक क्षेत्रों को संरक्षित करना आवश्यक है, ताकि प्रजातियां स्वस्थ और जेनेटिक रूप से विविध बनी रहें। इसी प्रकार से, संकटग्रस्त आबादियों में नए सदस्यों को शामिल करना जेनेटिक विविधता को बनाए रखने में मदद कर सकता है।
एक सुझाव यह भी है कि डीएनए विश्लेषण (DNA Analysis) और अन्य तकनीकों का उपयोग करके जेनेटिक विविधता पर नज़र रखी जानी चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा संरक्षण प्रयास जेनेटिक क्षति (genetic loss) को पूरी तरह रोकने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। डीएनए निगरानी (DNA Monitoring) जटिल और महंगी हो सकती है। लिहाज़ा इसके विकल्पों पर काम हो रहा है, जैसे आबादी के फैलाव के आधार पर जेनेटिक विविधता का अनुमान लगाना। अध्ययनों में पाया गया है कि 58 प्रतिशत से अधिक प्रजातियों की आबादी इतनी सिमट चुकी है कि वे दीर्घकालिक जेनेटिक विविधता बनाए नहीं रख सकतीं।
इस स्थिति को देखते हुए तत्काल कार्रवाई (immediate action) की आवश्यकता है। विशेषज्ञों के अनुसार केवल प्राकृतवासों की सुरक्षा पर्याप्त नहीं है बल्कि प्रजातियों के जेनेटिक भविष्य (genetic future) को भी सुरक्षित करना अनिवार्य है।
यदि संरक्षण प्रयासों में जेनेटिक विविधता को प्राथमिकता दी जाए, तो हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि प्रजातियां न केवल आज जीवित रहें, बल्कि आने वाली पीढ़ियों (future generations) के लिए भी सशक्त और जीवनक्षम बनी रहें। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.zo96oy1/full/_20250129_snow_geneticdiversityvert_00143528copy-1738180946367.jpg
माइक्रोप्लास्टिक एक बड़ी पर्यावरणीय समस्या बन गए हैं। प्लास्टिक के ये सूक्ष्म कण समुद्री जीवों के शरीर में पहुंच कर उनके ऊतकों को नष्ट कर सकते हैं और उनकी जान के लिए खतरा हो सकते हैं। ये कण इतने छोटे होते हैं कि पर्यावरण से इनको हटाना मुश्किल होता है।
अब, प्लायमाउथ मरीन लेबोरेटरी की पारिस्थितिकी विज्ञानी पेनलोप लिंडिकी को एक ऐसे समुद्री जीव – नीले घोंघे (मायटिलस एडुलिस) – के बारे में पता चला है जो न सिर्फ माइक्रोप्लास्टिक्स से अप्रभावित रहते हैं बल्कि उन्हें पर्यावरण से हटाने में मदद कर सकते हैं। काली-नीली खोल वाली ये सीपियां भोजन के साथ माइक्रोप्लास्टिक भी निगल लेती हैं और अपनी विष्ठा के साथ इसे शरीर से बाहर निकाल देती हैं।
शोधकर्ता जानते थे कि नीली सीपियां ठहरे हुए पानी में से माइक्रोप्लास्टिक्स को छान सकती हैं। लिहाज़ा वे कुदरती परिस्थितियों में इस बात को जांचना चाह रहे थे।
उन्होंने सीपियों को एक स्टील की टंकी में रखा और उसमें माइक्रोप्लास्टिक युक्त पानी में भर दिया। जैसी कि उम्मीद थी सीपियों ने टंकी का लगभग दो-तिहाई माइक्रोप्लास्टिक्स निगला और उसे अपने मल के साथ त्याग दिया।
यही परीक्षण उन्होंने वास्तविक परिस्थितियों में भी दोहराया। उन्होंने तकरीबन 300 सीपियों को टोकरियों में भरकर पास के समंदर में डाल दिया। विष्ठा इकट्ठा करने के लिए उन्होंने हर टोकरी के नीचे एक जाली लगाई।
जर्नल ऑफ हेज़ार्डस मटेरियल्स में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार इस व्यवस्था में सीपियों ने प्रतिदिन लगभग 240 माइक्रोप्लास्टिक कण फिल्टर किए। प्रयोगशाला का काम बताता है कि पानी में अत्यधिक माइक्रोप्लास्टिक्स होने पर सीपियां प्रति घंटे लगभग एक लाख कण तक हटा सकती हैं। माइक्रोप्लास्टिक युक्त विष्ठा समुद्री जल में गहराई में बैठ जाती है जहां ये समुद्री जीवन के लिए कम हानिकारक होती हैं। और तली में बैठे प्लास्टिक कणों को उठाना आसान हो जाता है।
लेकिन इकट्ठा करने के बाद इसके निस्तारण की समस्या उभरती है। शोधकर्ता यह संभावना तलाशना चाहती हैं कि क्या माइक्रोप्लास्टिक युक्त विष्ठा से उपयोगी बायोफिल्म बनाई जा सकती है?
लेकिन उल्लखेनीय प्रभाव देखने के लिए बहुत अधिक संख्या में नीली सीपियों की ज़रूरत होगी। सिर्फ न्यू जर्सी खाड़ी के पानी को ‘माइक्रोप्लास्टि रहित’ बनाने के लिए हर रोज़ करीबन 20 लाख से अधिक नीली सीपियों को लगातार 24 घंटे प्रति फिल्टर करने का काम करना पड़ेगा।
बहरहाल यह समाधान बड़े पैमाने पर कुछ माइक्रोप्लास्टिक्स कम करने में तो मदद करेगा लेकिन मूल समस्या को पूरी तरह हल नहीं करेगा। इतनी सीपियां छोड़ने के अपने पारिस्थितिक असर भी होंगे। इसके अलावा, ये सीपियां एक विशेष आकार के कणों का उपभोग करती हैं। इसलिए शोधकर्ताओं का भी ज़ोर है कि वास्तविक समाधान तो प्लास्टिक उपयोग को कम करना ही है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.adj0274/abs/_20230530_on_mussels_plastic.jpg
जैव विविधता को बचाने के लिए 1960 के दशक से ही संरक्षणवादी
एक मानक समाधान देते आए हैं – प्राकृतिक क्षेत्रों को मानव दखल से बचाया जाए।
लेकिन हाल ही में हुआ अध्ययन संरक्षणवादियों के इस मिथक को तोड़ता है और पिछले
12,000 सालों के दौरान मनुष्यों द्वारा भूमि उपयोग के विश्लेषण के आधार पर बताता
है कि मनुष्यों ने नहीं बल्कि संसाधनों के अति दोहन ने जैव विविधता को खतरे में
डाला है। अध्ययन के अनुसार 12,000 साल पूर्व भी भूस्थल का मात्र एक चौथाई हिस्सा
मनुष्यों से अछूता था जबकि वर्तमान में 19 प्रतिशत है। हज़ारों वर्षों से स्थानीय
या देशज लोगों और उनकी कई पारंपरिक प्रथाओं ने जैव विविधता का संरक्षण करने के
साथ-साथ उसे बढ़ाने में मदद की है।
यह जानने के लिए कि इन्सानों ने जैव विविधता को कैसे प्रभावित किया है, दुनिया भर के विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं के दल ने एक मॉडल तैयार कर अतीत
के भूमि उपयोग का अंदाज़ा लगाया। मॉडल में उन्होंने वर्तमान भूमि उपयोग के पैटर्न
को चित्रित किया – जिसमें उन्होंने जंगली इलाके, कृषि
भूमि,
शहर और खदानों को दर्शाया। फिर इसमें उन्होंने पूर्व और वर्तमान
की जनसंख्या के आंकड़े भी शामिल किए। पिछले 12,000 वर्षों के दौरान 60 विभिन्न
समयों पर मनुष्यों द्वारा भूमि उपयोग किस तरह का था, यह पता
लगाने के लिए उन्होंने मॉडल में पुरातात्विक डैटा भी जोड़ा। इन जानकारियों के साथ
उन्होंने रीढ़धारी जीवों की विविधता, विलुप्तप्राय प्रजातियां और
संरक्षित क्षेत्र और सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त देशज निवासी क्षेत्र सम्बंधी
वर्तमान आंकड़े रखकर विश्लेषण किया।
प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस में
शोधकर्ता बताते हैं कि 12,000 साल पहले पृथ्वी का लगभग एक-चौथाई हिस्सा ही मनुष्यों
से अछूता था,
यानी अधिकतर उन जगहों पर मनुष्यों का दखल था जिन्हें
संरक्षणवादी आज ‘प्राकृतिक’, ‘अछूता’ या ‘जंगली’ भूमि कहते
हैं। दस हज़ार साल पहले तक 27 प्रतिशत भूमि मनुष्यों से अछूती थी, और अब 19 प्रतिशत भूमि मनुष्यों से अछूती है। उन्होंने यह भी पाया कि प्राचीन
मनुष्यों ने जैव विविधता हॉट-स्पॉट को संरक्षित करने में ही नहीं बल्कि इन
हॉट-स्पॉट को बनाने में भी भूमिका निभाई है।
यह अध्ययन इस धारणा को तोड़ता है कि प्रकृति मनुष्यों से मुक्त होनी चाहिए।
अध्ययन में देखा गया कि विगत 12,000 वर्षों तक भूमि उपयोग काफी हद तक स्थिर रहा था, लेकिन 1800 से 1950 के दौरान इसमें तेज़ी से परिवर्तन हुए। जैसे सघन कृषि होने
लगी,
शहरीकरण बढ़ा, बड़े पैमाने पर खनन कार्य हुए, और वनों की अंधाधुंध कटाई होने लगी।
मानव विज्ञानियों और पुरातत्वविदों का कहना है कि हमारे लिए ये नतीजे कोई
आश्चर्य की बात नहीं है। यह तो हम पहले से ही जानते हैं कि जंगल जलाकर खेती जैसे
कार्य कर मनुष्य सदियों से भूमि प्रबंधन कर रहे हैं। देशज निवासियों के अधिकारों
के संरक्षण अभियान, सर्वाइवल इंटरनेशनल, के प्रमुख फियोर लोंगो इन नतीजों पर सहमति जताते हुए कहते हैं कि यह अध्ययन
हमारी उस बात की पुष्टि करता है जो हम वर्षों से कहते आए हैं – जंगलों को निर्जन
रखे जाने की धारणा एक औपनिवेशिक और नस्लवादी मिथक है जिसके पीछे कोई वैज्ञानिक
आधार नहीं है,
और इस धारणा का उपयोग अन्य लोग अक्सर इन भूमियों को हड़पने
के लिए करते हैं।
लेकिन मानव विज्ञानी कहते हैं कि हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हर मूल निवासी या स्थानीय समूह जैव विविधता कायम नहीं रखता। जैसे कुछ प्राचीन लोगों के कारण ही मैमथ और प्रशांत द्वीप के उड़ान रहित पक्षी विलुप्त हो गए। लेकिन यह बात भी उतनी ही सच है कि अन्य लोगों की तुलना में स्थानीय लोग प्रकृति का बहुत अच्छे से ख्याल रखते हैं और संरक्षक की भूमिका निभाते हैं। यदि स्थानीय लोगों की प्रथाएं जैव विविधता के लिए सकारात्मक या हितकारी हैं, तो विलुप्त होती प्रजातियों को बचाने के लिए हमें उन लोगों को जंगलों से बेदखल करने की ज़रूरत नहीं है। बल्कि हमें उनकी भूमि को संरक्षित करने के लिए इन लोगों को सशक्त बनाना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_image_-1280w__no_aspect/public/Wildlands_1280x720.jpg?itok=3Vw7Y9fE
लगभग 10 करोड़ साल पहले आधुनिक समय के मोरक्को में विशालकाय
उड़ने वाले सरीसृप, टेरोसौर, रहा
करते थे। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि बड़े जबड़े और जिराफ जैसी सुराहीदार गर्दन
वाले टेरोसौर का भोजन मछली, छोटे स्तनधारी और शिशु
डायनासौर होते थे। लेकिन यह एक पहेली थी कि उनकी गर्दन अपने भारी-भरकम शिकार का
वज़न उठाते चटकती क्यों नहीं थी। अब, एक नए अध्ययन में पता चला है
कि उनकी हड्डियों के अंदर स्पोकनुमा जटिल संरचना होती थी जो गर्दन को मज़बूती और
स्थिरता प्रदान करती थी।
मोरक्को और अल्जीरिया की सीमा के पास जीवाश्मों से समृद्ध स्थल केम केम
क्यारियों में लगभग 10 करोड़ वर्ष पुराना टेरोसौर का एक जीवाश्म मिला था, जो काफी अच्छी तरह संरक्षित था। इसे अज़दारचिड टेरोसौर नाम दिया गया। ये
टेरोसौर पृथ्वी पर रहे विशालकाय उड़ने वाले जीवों में से थे। इनके पंख 8 मीटर लंबे
और गर्दन 1.5 मीटर लंबी थी। वैज्ञानिकों के बीच हमेशा यह सवाल रहा कि इतनी
असामान्य शरीरिक रचना के साथ टेरोसौर किस तरह शिकार करते होंगे, चलते और उड़ते होंगे?
युनिवर्सिटी ऑफ पोर्ट्समाउथ के जीवाश्म विज्ञानी निज़ार इब्रााहिम और उनके साथियों ने अज़दारचिड टेरोसौर की रीढ़ की हड्डी की आंतरिक संरचना का अध्ययन किया। एक्स-रे कम्प्यूटेड टोमोग्राफी और 3-डी मॉडलिंग करने पर उन्होंने पाया कि उनकी रीढ़ की हड्डी में दर्जनों एक-एक मिलीमीटर मोटी कीलनुमा रचनाएं (ट्रेबिकुले) थीं। इन कीलों की जमावट एक-दूसरे को क्रॉस करते हुए इस तरह थी जिस तरह साइकिल के पहिए के स्पोक होते हैं। और ये रचनाएं रीढ़ की हड्डी में केंद्रीय नलिका को घेरे हुए थीं।
गणितीय मॉडलिंग कर शोधकर्ताओं ने जांचा कि क्या वास्तव में ये स्पोकनुमा
रचनाएं हड्डियों को अतिरिक्त सहारा देती होंगी। iScience पत्रिका में शोधकर्ता बताते
हैं कि कम से कम 50 ट्रेबिकुले रीढ़ की हड्डी की वज़न सहन करने की क्षमता को
दुगना कर देते हैं। शोधकर्ता यह भी बताते हैं कि उक्त टेरोसौर की गर्दन 9 से 11
किलोग्राम तक का वज़न उठा सकती थी।
शिकार को पकड़ने और उठाने में सहायता करने के अलावा ये स्पोकनुमा रचनाएं
टेरोसौर की गर्दन को उड़ान के दौरान पड़ने वाले तेज़ हवाओं के थपेड़ों का सामना करने
और प्रतिद्वंदी नर साथी के प्रहार झेलने में भी मदद करती थीं।
वैज्ञानिकों का यह अनुमान तो था कि अज़दारचिड टेरोसौर बड़े शिकार पकड़ सकते थे
लेकिन हड्डी की आंतरिक संरचना की जानकारी का उपयोग कर इस परिकल्पना की पुष्टि पहली
बार की गई है। अन्य शोधकर्ताओं का सुझाव है कि अन्य टेरोसौर की गर्दन की हड्डियों
का अध्ययन करके इन नतीजों की पुष्टि की जानी चाहिए।
उक्त शोधकर्ता भी यही करना चाहते हैं लेकिन दिक्कत यह है कि टेरोसौर की हड्डियों के भलीभांति सुरक्षित जीवाश्म दुर्लभ हैं। बहरहाल, शोधकर्ताओं का इरादा है कि महामारी खत्म होने के बाद जीवाश्मों से समृद्ध स्थलों पर ऐसे जीवाश्म तलाश करेंगे। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_image_-1280w__no_aspect/public/pterosaurs_cross-section_1280x720.jpg?itok=KzDnCr4h https://scitechdaily.com/images/Spoked-Vertebra-Structure-scaled.jpg
अर्जेंटीना के आइबेरा नेशनल पार्क में पिद्दी के आकार के
पक्षियों की दो लगभग समान प्रजातियां साथ-साथ रहती हैं, एक ही
तरह के बीज खाती हैं और एक ही तरह के स्थानों पर घोंसले बनाती हैं। वैसे तो ये
प्रजातियां आपस में सफलतापूर्वक प्रजनन कर सकती हैं। लेकिन हाल ही में शोधकर्ताओं
ने पाया है कि ये प्रजातियां पीढ़ियों से आपस में प्रजनन नहीं कर रही हैं। और यह
रुकावट कुछ मामूली से परिवर्तनों की वजह से है – पंखों के रंग और गीत में अंतर। यह
अध्ययन आनुवंशिक रूप से काफी हद तक समान दो भिन्न प्रजातियों के बनने में व्यवहार
की महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है।
आम तौर पर,
नई प्रजातियां तब बनती हैं जब किसी प्रजाति की आबादी या
समूह के कुछ सदस्य नदी, पर्वत श्रेणी या अन्य किसी भौतिक बाधा के
चलते शेष समूह से अलग-थलग हो जाते हैं। समय के साथ, इन
दोनों समूह की आनुवंशिकी में, और उनके लक्षणों और व्यवहारों
में बदलाव हो जाते हैं। यदि दोनों समूह में अलगाव लंबे समय तक बना रहे तो फिर ये
समूह आपस में प्रजनन करने में सक्षम नहीं होते।
लेकिन जैसा कि कैपुचिनो बीज चुगने वाले पक्षियों की इन दो प्रजातियों के मामले
में देखा गया है,
कभी-कभी कोई भौतिक बाधा आए बिना भी, एक साथ
रहते हुए एक प्रजाति दो भिन्न प्रजातियों में बंट सकती है।
कॉर्नेल विश्वविद्यालय के वैकासिक जीव विज्ञानी लियोनार्डो कैंपगना ने लगभग 20
साल पहले स्पोरोफिला कुल के दक्षिणी कैपुचिनो बीजभक्षी पक्षियों का अध्ययन शुरू
किया था। अपने अध्ययन में वे जानना चाहते थे कि कैसे ये पक्षी 10 लाख सालों से भी
कम समय में एक से 10 प्रजातियों में बंट गए। वर्ष 2017 में कैंपगना और उनके
साथियों ने बताया था कि कैपुचिनो बीजभक्षी की 10 प्रजातियों के बीच सबसे बड़ा
आनुवंशिक अंतर उनके मेलेनिन रंजक बनाने वाले जीन्स में होता है, जिससे लगता है कि नई प्रजाति के बनने में उनके पंखों के रंग की भूमिका
महत्वपूर्ण हो सकती है।
इस अध्ययन में कैंपगना और कोलोरेडो विश्वविद्यालय की शीला टरबेक ने आइबेरा
कैपुचिनो बीजभक्षी (स्पोरोफिला आइबेरैंसिस) और पीले पेट वाले कैपुचिनो
बीजभक्षी (एस. हायपोक्सेंथा) पर ध्यान केंद्रित किया। इन दोनों प्रजातियों
की मादाएं एकदम समान दिखती हैं। और दोनों ही प्रजातियां आइबेरा राष्ट्रीय उद्यान
के एक ही हिस्से में रहती हैं, प्रजनन करती हैं, दाने चुगती हैं। इस तरह दोनों प्रजातियों के बीच आपस में संपर्क करने और
संभवत: परस्पर प्रजनन करने के लिए पर्याप्त मौका है। दोनों प्रजातियों में जो
मुख्य अंतर है वह यह है कि आइबेरा प्रजाति के नर के पेट का रंग रेतीला और गले का
रंग काला होता है, जबकि एस. हायपोक्सेंथा प्रजाति के
नर के पेट और गले का रंग लालिमा लिया पीला होता है। और दोनों प्रजाति के गीत में
थोड़ा अंतर होता है।
यह देखने के लिए कि क्या वास्तव में दोनों प्रजातियां जंगल में एक-दूसरे के
साथ प्रजनन नहीं करतीं, शोधकर्ताओं ने दोनों प्रजातियों के 126
पक्षियों पर पहचान चिन्ह लगाए। और इस तरह इन प्रजातियों के वयस्कों और 80 नवजातों
की गतिविधियों पर नज़र रखी। हरेक पक्षी के डीएनए का नमूना भी लिया। आनुवंशिक
विश्लेषण में पता चला कि वास्तव में ये दोनों प्रजातियां आपस में प्रजनन नहीं करती
हैं। इससे ऐसा लगता है कि मादाएं अपने प्रजनन-साथी के चयन में किसी एक पंख या पेट
के रंग और गीत को वरीयता देती हैं। और मादा के इस चयन या पसंद ने ही पक्षियों को
दो अलग-अलग प्रजातियों में बांटा है।
दो प्रजातियों की एक जैसी लगने वाली मादाओं का अध्ययन करके यह पता लगाना
मुश्किल है कि वे साथी का चयन किस आधार पर करती हैं। लेकिन कुछ पक्षियों पर हुए
अध्ययनों में पाया गया है कि साथी चयन में मादा जिन लक्षणों को वरीयता देती हैं, उन लक्षणों का उपयोग नर अपने प्रतिद्वंद्वियों की पहचान करने में करते हैं।
अक्सर,
एक प्रजाति के नर को अन्य प्रजाति के नर की उपस्थिति से कोई
फर्क नहीं पड़ता,
लेकिन अपनी ही प्रजाति या अपने जैसे दिखने वाले नर के साथ
उनमें साथी के लिए प्रतिस्पर्धा होती है।
यह जांचने के लिए शोधकर्ताओं ने दोनों प्रजातियों के नर की तरह दिखने वाले
रंगीन मॉडल बनाए। फिर इन मॉडल नरों को दोनों प्रजातियों के वास्तविक नरों को
दिखाया और इन मॉडल के प्रति उनकी प्रतिक्रिया देखी। मॉडल दिखाते समय उन्होंने
दोनों प्रजातियों में से कभी किसी एक प्रजाति के पक्षीगीत की रिकॉर्डिंग बजाई तो
कभी दूसरी की। साइंस पत्रिका में प्रकाशित नतीजे बताते हैं कि नरों ने उन
मॉडल नरों पर सबसे अधिक प्रतिक्रिया दी जिनके पक्षीगीत और पेट का रंग, दोनों उनकी अपनी प्रजाति के नर से मेल खाता था। ज़ाहिर है नर पक्षियों ने मॉडल
नरों को मादा साथी के लिए प्रतिस्पर्धी के रूप में देखा।
दोनों प्रजातियों का आनुवंशिक विश्लेषण करने पर पाया गया कि उनके केवल तीन जीन
क्षेत्र में कुल 12 जीन अलग थे जो उन्हें एक-दूसरे से अलग बनाते हैं। इनमें पंखों
के रंग का जीन भी शामिल है। ये छोटे-छोटे आनुवंशिक और पेट के रंग के परिवर्तन कुछ
मादाओं की पसंद बने, जिससे आगे जाकर दोनों प्रजातियां अलग हो
गर्इं।
वैसे एक संभावना यह भी है कि आइबेरा और पीले पेट वाली कैपुचिनो बीजभक्षी
प्रजातियां पूर्व में कभी किन्हीं अलग-अलग स्थानों पर विकसित हुई होंगी और केवल
बाद में उनका आवास एक हो गया होगा।
देखा गया है कैपुचिनो बीजभक्षी की अन्य प्रजातियों के बीच अतीत में आपस में प्रजनन हुआ था इसलिए एक संभावना यह भी है कि अभी जो जीन संस्करण आइबेरा प्रजाति को अलग बनाता है वह उसमें पहले से मौजूद रहा हो उसके नए संयोजनों और फेरबदल से नई प्रजाति बन गई हो। ऐसे में किसी नए जीन के विकास की ज़रूरत नहीं पड़ी होगी और इसलिए इतनी जल्दी नई प्रजाति बन गई। पक्षी विज्ञानी लंबे समय से जानते हैं कि पक्षीगीत और पंखों का रंग प्रजातियों को अलग रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अब यह अध्ययन दिखाता है कि ये चीज़ें जीनोमिक स्तर पर किस तरह दिखती हैं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.youtube.com/watch?v=-IMBpCKAwDU&t=1s
हाल ही में केरल के वायनाड़ ज़िले के पश्चिमी घाट इलाके में वैज्ञानिकों को मेंढक की नई प्रजाति मिली है। इन मेंढकों के पेट नारंगी रंग के हैं। और शरीर के दोनों तरफ हल्के नीले सितारों जैसे धब्बे हैं और उंगलियां तिकोनी हैं। शोघकर्ताओं ने नेचर इंडिया पत्रिका में बताया है कि इन मेंढकों को छुपने में महारत हासिल है। ज़रा-सा भी खटका या सरसराहट होने पर ये उछल कर पत्ते या घास के बीच छुप जाते हैं।
चूंकि इनके शरीर पर सितारानुमा धब्बे हैं और ये कुरुचियाना जनजाति बहुल वायनाड़ ज़िले में मिले हैं, इसलिए शोधकर्ताओं ने इन मेंढकों को एस्ट्रोबेट्रेकस कुरुचियाना नाम दिया है।
मेंढक की यह प्रजाति सबसे पहले 2010 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के एस.पी. विजयकुमार ने पहचानी थी। बारीकी से अध्ययन करने पर पता चला कि ये पश्चिमी घाट के अन्य मेंढकों की तरह नहीं है। इसके बाद उन्होंने युनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा के डेविड ब्लैकबर्न और जॉर्ज वाशिंगटन युनिवर्सिटी के एलेक्स पायरॉन की मदद से मेंढक की हड्डियों और जीन का विश्लेषण किया। हड्डियों की जांच में उन्होंने पाया कि यह मेंढ़क निक्टिबेट्रेकिडी कुल का है। इस कुल के मेंढकों की लगभग 30 प्रजातियां भारत और श्रीलंका में पाई जाती हैं। और जेनेटिक विश्लेषण से लगता है कि ये मेंढक 6-7 करोड़ वर्ष पूर्व अपनी करीबी प्रजातियों से अलग विकसित होने शुरू हुए थे।
यह वह समय था जब भारत अफ्रीका और मैडागास्कर से अलग होकर उत्तर की ओर सरकते हुए एशिया से टकराया था और हिमालय बना था। भारत के लंबे समय तक किसी अन्य स्थान से जुड़ाव न होने के कारण यहां नई प्रजातियों का विकास हुआ, और उन प्रजातियों को भी संरक्षण मिला जो अन्य जगह किन्हीं कारणों से लुप्त हो गर्इं।
इस नई प्रजाति के सामने आने से एक बार फिर पश्चिमी घाट जैव विविधता के हॉटस्पॉट के रूप में सामने आया है, खास तौर से उभयचर जीवों के मामले में। इस व अन्य प्रजातियों की खोज से पश्चिमी घाट के मेंढकों की विविधता के पैटर्न को समझने में मदद मिल सकती है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : http://blogs.discovermagazine.com/d-brief/files/2017/02/Image-1-1.jpg