कभी-कभी ऐसा
होता है कि हम करने कुछ जाते हैं और करके कुछ और आते हैं। हाल ही में ऐसा ही कुछ
नीदरलैंड्स के डॉक्टरों के साथ हुआ। प्रोस्टेट कैंसर में रेडिएशन द्वारा उपचार के
दुष्प्रभाव का अध्ययन करने वाले इन डॉक्टरों ने एक नया अंग खोज निकाला है।
नीदरलैंड्स कैंसर इंस्टिट्यूट के रेडियो ऑन्कोलॉजी संकाय के
डॉक्टरों ने हाल ही में एक जोड़ी नई लार ग्रंथियों की खोज का दावा किया है।
चिकित्सा क्षेत्र में स्कैन सम्बंधी तकनीकों में लगातार उन्नति के चलते यह खोज
संभव हुई। रेडियोलॉजिस्ट वूटर वी. वोगल एवं सर्जन मैथियास एस. वेलस्टर और उनके
साथियों ने लार ग्रंथियों के इस नए जोड़े को नाक एवं गले के बीच नासाग्रसनी के पास
स्थित पाया है। इन्हें ट्यूबेरियल लार ग्रंथि नाम दिया गया है।
सिर एवं गले के कैंसर में रेडिएशन उपचार के लार ग्रंथियों
पर प्रभाव के अध्ययन के दौरान इन ग्रंथियों की उपस्थिति की पुष्टि की गई। इस खोज
का विवरण जर्नल ऑफ रेडियोथेरेपी में प्रकाशित हुआ है। इससे यह संभावना बढ़
जाती है कि हमारे शरीर के अंदर कई और अंग होंगे जिनकी जानकारी हमें नहीं है।
लगभग चार सेंटीमीटर लंबी इन लार ग्रंथियों से म्यूकस का स्राव
होता है। नासाग्रसनी व उसके आसपास के हिस्से का चिकनापन बनाए रखने, निगलने व खाने में इन
ग्रंथियों की भूमिका है। यह बहुत महत्वपूर्ण खोज है क्योंकि इससे कैंसर के मरीज़ों
के जीवन की गुणवत्ताा बढ़ाई जा सकती है।
हमारे मुंह में तीन जोड़ी बड़ी एवं हज़ारों छोटी लार ग्रंथियां
हैं। लार में लगभग 98 प्रतिशत पानी, कुछ एंज़ाइम्स, इलेक्ट्रोलाइट आदि पाए जाते हैं। किसी व्यक्ति की लार
ग्रंथियों के रेडिएशन से क्षतिग्रस्त होने पर मुंह में लार बनने की प्रक्रिया मंद
पड़ जाती है। अत: मुंह सूख-सा जाता है। स्वाद अनुभव करने,
पाचन,
निगलने एवं बोलने की प्रक्रिया प्रभावित
होती है एवं मुंह में संक्रमण की संभावना भी बढ़ जाती है।
शोधकर्ताओं ने सिर एवं गले के कैंसर के 723 मरीज़ों में रेडिएशन के प्रभावों का अध्ययन करने पर पाया कि ट्यूबेरियल लार ग्रंथियां क्षतिग्रस्त होने से मरीज़ों में मुंह सूख जाना, भोजन निगलने व बात करने में दिक्कत होना जैसे ही दुष्प्रभाव नज़र आते हैं। 100 मरीज़ों के स्कैन एवं दो शवों के विच्छेदन से इन अंगों की उपस्थिति की पुष्टि की गई है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://cdn.the-scientist.com/assets/articleNo/68068/aImg/40055/salivary-thumb-l.png
पृथ्वी
पर जीवन के शुरुआती रूप की चर्चा करते हुए अमेरिका का स्मिथसोनियन संस्थान बताता
है कि ऑक्सीजन रहित और मीथेन की अधिकता वाला वातावरण जंतुओं के जीवन के लिए
उपयुक्त नहीं था। फिर भी इस वातावरण में ऐसे सूक्ष्मजीव रह सकते थे जो सूर्य के
प्रकाश का सामना कर, इसकी मदद से जीवित
रहने के लिए ऊर्जा उत्पन्न करने में सक्षम थे।
पृथ्वी
पर ऐसा वातावरण आज से लगभग 3.4 अरब साल पहले और पृथ्वी के अस्तित्व में आने के लगभग एक अरब
साल बाद था। अपने भोजन बनाने की प्रक्रिया में सूक्ष्मजीवों ने ऑक्सीजन नामक गैसीय
गौण उत्पाद बनाया। इस ‘महान
ऑक्सीकरण घटना’ की
बदौलत इसके लगभग 2 अरब
साल बाद ऑक्सीजन पृथ्वी की सतह का एक महत्वपूर्ण घटक बन गई और पृथ्वी जीवों के
जीवन के अनुकूल हो गई।
इस
ऑक्सीजन का बाहरी ऊर्जा के रूप में उपयोग करके जंतु कोशिकाएं अपने शारीरिक विकास
और संख्या वृद्धि के लिए भोजन बना सकती हैं। लेकिन इसके लिए उनकी शारीरिक रचना और
जीव विज्ञान में तबदीली की ज़रूरत थी (बहु-कोशिकता के उद्भव और उसकी ज़रूरत पर एक उत्कृष्ट सारांश टी. केवेलियर-स्मिथ द्वारा रॉयल
सोसायटी बी में प्रकाशित किया गया है, इसे
आप इस लिंक पर पढ़ सकते हैं: https://doi.org/10.1098/rstb.2015.0476)। वे यह भी बताते है
कि क्यों एक एक-कोशिकीय
जीव (कोएनोफ्लैजिलेट) का उपयोग मनुष्य
जैसे बहु-कोशिकीय
जीवों के जैव विकास और विविधीकरण का अध्ययन करने के लिए एक मॉडल के रूप में किया
जा सकता है। कोएनोफ्लैजिलेट जंतुओं के ऐसे सबसे करीबी जीवित रिश्तेदार हैं जो लगभग
एक अरब साल पहले अस्तित्व में आए थे। कोएनोफ्लैजिलेट जंतुओं के सबसे करीबी
रिश्तेदार माने जाते हैं। इनके अंडाकार शरीर पर एक चाबुक जैसा उपांग (कशाभ) होता है जिसके आधार
पर एक कीप जैसी कॉलर होती है। इसलिए इन्हें कीप-कशाभिक भी कहते हैं। ये अकेले भी रहते हैं
और कॉलोनियों में भी।
पिछले
कुछ समय में हुए जीनोम अनुक्रमण के प्रयासों की बदौलत यह पता चला है कि
कोएनोफ्लैजिलेट में भी कुछ ऐसी प्रक्रियाएं होती हैं जिनके बारे में अब तक ऐसा
लगता था कि ये सिर्फ बहुकोशिकीय जीवों में ही होती हैं। इनमें कोशिकाओं के बीच
संदेशों का आदान-प्रदान,
कोशिका से कोशिका के चिपकने की प्रवृत्ति वगैरह शामिल हैं।
त्रुटि–सुधार
समय
के साथ जंतु कोशिकाएं क्रियाशील ऑक्सीजन मूलक (आरओएस) नामक अणु अधिक मात्रा में बनाने के लिए
विकसित हुर्इं, ये अणु कई आवश्यक
कोशिकीय गतिविधियों के लिए ज़रूरी होते हैं लेकिन इनका उच्च स्तर विषाक्तता पैदा
करता है। आरओएस प्रतिरक्षा, तनाव प्रतिक्रिया और
परिवर्धन जैसी प्रक्रियाओं में संकेतक अणु की एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इसके अलावा अधिक जटिलता के लिए ज़रूरी होता है कि जंतु के जीनोम के आकार में भी
पर्याप्त वृद्धि हो। इसके साथ कोशिका में सभी कार्यों में भी वृद्धि होती है,
जैसे डीएनए (विभिन्न अंगों की कोशिकाओं में मौजूद आनुवंशिक सामग्री), उसको
संदेशवाहक आरएनए (mRNA) के
रूप में लिप्यांतरित करना, और फिर tRNA की मदद से इन्हें कोशिकाओं में विशिष्ट प्रोटीन बनाने वाले
अमीनो एसिड अनुक्रम में बदलना। tRNA की इस बढ़ी हुई
संख्या (किसी
सामान्य सूक्ष्मजीव में लगभग 50 से लेकर जंतुओं में सैकड़ों) का मतलब यह हुआ इन्हें कम से कम गलतियों के
साथ सावधानीपूर्वक चुना जाना ज़रूरी है।
यदि
प्रोटीन के स्तर पर आनुवंशिक कोड की गलत व्याख्या हो जाए तो यह गलती कार्यात्मक
विकार और रोगों को जन्म देगी। (उदाहरण के लिए, सही
अमीनो एसिड के स्थान पर, एक ‘गलत’ अमीनो एसिड आ जाने
से प्रोटीन की आकृति, आकार या घुलनशीलता
बदल सकती है जिसके कारण लायनस पौलिंग के शब्दों में ‘आणविक रोग’ हो सकते हैं। यदि हीमोग्लोबिन में एक एमिनो
एसिड बदल जाए तो एनीमिया हो सकता है। और यदि आंख के लेंस के प्रोटीन में एक गलत
एमीनो एसिड आ जाए तो मोतियाबिंद हो सकता है।) गलत अमीनो एसिड वाला प्रोटीन बनने से रोकने
के लिए कोशिकाओं में ऐसे एंज़ाइम होते हैं जो गलत अमीनो एसिड को हटाने में मदद करते
हैं। हैदराबाद स्थित सेंटर फॉर सेल्यूलर एंड मॉलीक्यूलर बायोलॉजी के राजन
शंकरनारायणन और उनके साथियों का हालिया शोध, जंतु
कोशिकाओं में एंज़ाइम की मदद से प्रूफ-रीडिंग के इसी पहलू पर केंद्रित है। यह शोध ईलाइफ पत्रिका के 28 मई,
2020 के
अंक में प्रकाशित हुआ है। (जीनोमिक नवाचार ATD
जीव जगत में बहु–कोशिकता
में होने वाले गलत रूपांतरणों को कम करता है, DOI: https: //
doi. org / 10.7554 / eLife.58118)।
इस
शोध के दिलचस्प शीर्षक ने मुझे डॉ. शंकरनारायणन से बात करने को उकसाया। उन्होंने मुझे जो
समझाया वही यहां बता रहा हूं। उनके समूह को ATD
नामक एक ऐसा जंतु विशिष्ट प्रूफ-रीडिंग एंज़ाइम मिला था जो थ्रेओनिन (T) नामक एमिनो एसिड के
वाहक tRNA से (गलत) एमिनो एसिड एलेनिन (A) को
हटा देता है। इस तरह सही प्रोटीन संश्लेषण बहाल होता है और कोशिका सामान्य तरीके
से कार्य करती रहती है। वे आगे बताते हैं कि जंतु कोशिकाओं में ThrRS नामक एक अन्य एंज़ाइम भी होता है जो ATD की तरह ही कार्य करता है, लेकिन
कोशिकाओं में उच्च आरओएस स्तर होने पर यह एंजाइम अपनी क्षमता खो देता है। जबकि ATD एंज़ाइम कोशिकाओं में आरओएस का उच्च स्तर होने पर भी सक्रिय
बना रहता है।
शोधकर्ताओं
द्वारा प्रयोगशाला में, मानव गुर्दे की
कोशिकाओं और चूहों के भ्रूणीय स्टेम कोशिकाओं पर इन परिणामों की पुष्टि की गई थी।
नई जीनोम एडिटिंग तकनीक, CRISPR-Cas9,
का उपयोग करके कोशिकाओं से यह जीन हटाया गया,
जिससे समूचा प्रोटीन गलत संश्लेषित हुआ और परिणामस्वरूप
कोशिका की मृत्यु हो गई। और खास बात यह रही कि वे उपरोक्त परिघटना के पीछे के
आणविक कारण को भी पहचान सके।
वे
बताते हैं कि वास्तव में कि ATD रहित कोशिकाओं में
थ्रेओनिन के स्थान पर कई जगह एलेनिन रख कर प्रोटीन बनाने की गलती हुई थी। शोधकर्ता
अब आरओएस के उच्च स्तर वाले ऊतकों, जैसे वृषण और अंडाशय
में ATD की विशिष्ट भूमिका की जांच करना चाहते
हैं। शोधकर्ता बताते हैं कि जंतुओं में प्रोटीन के गलत संश्लेषण की समस्या के लिए
ज़िम्मेदार tRNA के विशेष समूह की बढ़ी हुई संख्या से एक
संभावना यह बनती है कि इनमें प्रोटीन संश्लेषण के अलावा अन्य कोई कार्य करने
क्षमता भी विकसित हो सकती है। जैसे एपिजेनेटिक्स, प्रोग्राम्ड
सेल डेथ (एपोप्टोसिस) और प्रजनन क्षमता
भी। इनका विस्तार से परीक्षण करना उपयोगी हो सकता है।
विकास
को आकार देना
अंत
में एक सवाल यह उठता है कि क्या कोएनोफ्लैजिलेट जंतु मॉडल में प्रूफ-रीडर ATD मौजूद होता है और क्या यह इसी तरह काम करता है?
इसका जवाब हां है, जैसा
कि कुंचा और उनके साथी लिखते हैं: ‘एटीडी एक ऐसा एंज़ाइम है जो केवल जंतुओं में पाया जाता है। … आगे के अध्ययन में
यह पता चला है कि ATD की उत्पत्ति लगभग 90 करोड़ साल पहले,
कोएनोफ्लैजिलेट्स और जंतुओं के विकास के अलग-अलग दिशा में आगे
बढ़ने के पहले, हुई थी। इससे लगता है
कि इस एंज़ाइम ने जंतुओं के विकास को आकार देने में मदद की होगी।’ दूसरे शब्दों में
कहें तो, ये स्पंज सरीखे एक-कोशिकीय जीव पृथ्वी
के सभी जंतुओं के पूर्वज हैं, जिनमें हम मनुष्य भी
शामिल हैं। कितना सादगीभरा विचार है!
तो पेड़-पौधों के बारे में क्या कहेंगे? वह एक अलग कहानी है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://th.thgim.com/sci-tech/science/ejt2gk/article31989721.ece/ALTERNATES/FREE_960/05TH-SCIEVOLUTIONjpg
जब
हम स्वच्छता की बात करते हैं तो यही कहा जाता है कि हाथों की उंगलियों,
नाखूनों व हाथों की लकीरों में सूक्ष्मजीव होते हैं।
स्वच्छता का पैमाना मात्र इन सूक्ष्मजीवों से छुटकारा पाने का होता है। लोगों को
लगता है कि सभी सूक्ष्मजीव रोग फैलाते हैं। लेकिन यह पूरी तौर पर सही नहीं है।
हमारे आसपास और हमारे शरीर के अंदर व त्वचा पर कईं सूक्ष्मजीव ऐसे होते हैं जो
हमारे लिए बेहद ज़रूरी है। बल्कि यह कहा जाए कि हमारी अच्छी सेहत के लिए इनका साथ
होना ज़रूरी है, तो गलत न होगा।
हमारे
शरीर में बड़ी तादाद में सूक्ष्मजीव बसते हैं। एक अनुमान के मुताबिक इन
सूक्ष्मजीवों की संख्या हमारे शरीर की कुल कोशिकाओं से सवा गुना अधिक है। यह
दिलचस्प है कि हमारे शरीर में कुल कोशिकाओं में से आधी से ज़्यादा बैक्टीरिया
कोशिकाएं हैं।
यह
देखा गया है कि 500 से
अधिक प्रजातियों के बैक्टीरिया हमारी आंत में पाए जाते हैं। सोचा जा सकता है कि
विविधता केवल बाहरी वातावरण में ही नहीं, हमारी
आहार नाल में भी है। विभिन्न प्रजातियों के सूक्ष्मजीव जो हमारी आंत में पाए जाते
हैं उनके समूह को माइक्रोबायोम कहा जाता है। दिलचस्प यह भी है कि हम जिस भोजन का
सेवन करते हैं वह भी हमारी आहार नाल के माइक्रोबायोम को प्रभावित करता है।
विकास
के दौरान सूक्ष्मजीवों ने सहभोजी रिश्ता कायम किया। बिना सूक्ष्मजीवों के मानव का
अस्तित्व संकट में हो सकता है। इस कहानी में जीवाणुओं ने भी अहम भूमिका अदा की। बायफिडोबैक्टीरिया
इनमें से एक है।
जन्म
के बाद शिशु जब मां का दूध पीता है तो उसे पचाने वाले बायफिडोबैक्टीरिया
आहार नाल में पनपने लगते हैं। ये शर्कराओं को पचाने का लाभदायक काम करते हैं जो
शरीर की वृद्धि में सहायक होता है। जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं,
कुछ बैक्टीरिया भोजन में वनस्पति रेशों को पचाने में भूमिका
अदा करते हैं जो हमारी आंत के लिए अहम होते हैं। रेशे हमें अधिक वज़नी होने से
बचाते हैं। साथ ही मधुमेह, दिल की बीमारी व कैंसर
के खतरों से भी बचाते हैं।
आहार
नाल का माइक्रोबायोम रोगों से लड़ने की क्षमता को बढ़ाता है। इतना ही नहीं,
नए अध्ययनों में यह बात भी सामने आई है कि आहार नाल का
माइक्रोबायोम केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को भी नियंत्रित करता है।
जन्म
के पूर्व शिशु की आहार नाल सूक्ष्मजीवों से रहित होती है। सामान्य प्रसव के दौरान
शिशु योनि मार्ग से गुज़रते हुए सूक्ष्मजीवों के संपर्क में आता है और मुंह के
रास्ते ये उसकी आंत में प्रवेश कर जाते हैं। हालिया शोध बताते हैं कि सिज़ेरियन
प्रसव से जन्मे शिशुओं की आहार नाल में सूक्ष्मजीव विविधता सामान्य जन्म लेने वाले
शिशुओं से कम होती है। जो बच्चे सामान्य प्रसव (योनि मार्ग से प्रसव) से जन्म लेते हैं उन शिशुओं की आंत में लैक्टोबेसिलस,
प्रेवोटेला, बायफिडोबैक्टीरियम,
बैक्टेरॉइड्स और एटोपोबियम
पाए जाते हैं। ये सूक्ष्मजीव सिज़ेरियन प्रसव से जन्मे शिशुओं में नहीं पाए जाते।
सिज़ेरियन प्रसव से जन्मे शिशुओं में मुख्य रूप से क्लॉस्ट्रीडियम डिफिसाइल,
ई.कोली व स्ट्रोप्टोकोकाई जैसे बैक्टीरिया
पाए जाते हैं। जैसे-जैसे
शिशु बड़ा होने लगता है उसकी आहार नाल के माइक्रोबायोम की विविधता बढ़ती जाती है। यह
देखा गया है कि जिनकी आहार नाल में माइक्रोबायोम की विविधता अधिक होती है,
वे अधिक स्वस्थ रहते हैं।
बायफिडोबैक्टीरियम
अचल किस्म के ग्राम-पाज़िटिव
बैक्टीरिया हैं, जिनमें अनॉक्सी श्वसन
होता है। सन 1900 के
दौरान हेनरी टिसियर ने नजवात शिशु के मल में बायफिडोबैक्टीरिया देखा था। इसके ठीक
बाद टिसियर के साथी मेचनीकोव का ध्यान टिसियर द्वारा खोजे गए बैक्टीरिया की ओर
गया। मेचनीकोव तब किण्वित दूध पर काम कर रहे थे। मेचनीकोव पहले व्यक्ति थे
जिन्होंने बताया कि दही, छांछ जैसी चीज़ें
हमारी सेहत के लिए काफी फायदेमंद हैं। मेचनीकोव ने किण्वित दूध को प्रोबायोटिक
कहा। इसका अर्थ है ऐसे खाद्य पदार्थ जिसमें कुछ सूक्ष्मजीव होते हैं जो हमारे शरीर
को भोजन पचाने में मदद करते हैं, तंत्रिका तंत्र को
मजबूत करते हैं और हमें तंदुरुस्त व दीर्घायु बनाते हैं। इसी शोध के लिए मेचनीकोव
को 1908 में
नोबल पुरस्कार मिला था।
स्तनपान
करने वाले शिशुओं में बायफिडोबैक्टीरिया की किण्वक व अम्लीय प्रकृति और
मानव पोषण और पेट के स्वास्थ्य के बीच लाभदायक सम्बंध को काफी पहले पहचान लिया गया
था और यह प्रचारित भी खूब हो रहा था। प्रोबायाटिक आहार का जितना महत्व आज है उतना
ही तब भी हुआ करता था। हालांकि बायफिडोबैक्टीरिया के साथ ही अन्य स्ट्रेप्टोकोकस,
एंटरोकोकस, यीस्ट
और अन्य सूक्ष्मजीवों ने भी प्रोबायोटिक के इस्तेमाल की ओर ध्यान खींचा। इसके बाद
इस पर व्यापक अध्ययन हुए। न केवल मनुष्यों में बल्कि इसके बेहतर प्रभावों को पालतू
पशुओं में भी पहचाना गया और प्रोबायोटिक संस्कृति को अपनाया जाने लगा।
नेशनल
इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (एनआईएच) द्वारा 2007 में ह्यूमन
माइक्रोबायोम प्रोजेक्ट (एचएमपी) की स्थापना मानव
कल्याण के लिए माइक्रोबायोम के प्रभाव का अध्ययन करने और विशेषज्ञता को बढ़ावा देने
के मकसद से की गई थी ताकि विशिष्ट बीमारियों में इनकी भूमिका को रेखांकित किया जा
सके। परियोजना के पहले चरण में सूक्ष्मजीवों के प्रकार (बैक्टीरिया, फफूंद
और वायरस) के
संदर्भ में डैटाबेस तैयार किया गया जो शरीर के पांच विशिष्ट हिस्सों पर केंद्रित
था – त्वचा,
मुखगुहा, श्वसन मार्ग,
आहार नाल व मूत्र-जनन मार्ग। परियोजना का लक्ष्य यह समझना था
कि शरीर को नुकसान पहुंचाने वाले सूक्ष्मजीवों की जेनेटिक संरचना में बदलाव करके
इन्हें कैसे लाभदायक सूक्ष्मजीवों में बदला जा सकता है।
उल्लेखनीय
है कि इस परियोजना को भारत में भी प्रारंभ किया जा चुका है। भारतीय लोगों के शरीर
के विभिन्न अंगों जैसे त्वचा, लार,
रक्त व मल में सूक्ष्मजीवों के वास का अध्ययन किया जा रहा
है। यह देशव्यापी अध्ययन है जिसमें केंद्र सरकार ने 150 करोड़ रुपए का निवेश किया है। इस अध्ययन में
भारत की 32 जनजातियों
को भी शामिल किया गया है।
इस
परियोजना में सूक्ष्मजीव संसार का विश्लेषण करने के लिए मानव जीनोम परियोजना
द्वारा विकसित डीएनए सिक्वेंसिंग का इस्तेमाल किया गया है।
दरअसल, मानव एक जीव ही नहीं है बल्कि वह एक पारिस्थितिकी तंत्र भी है। इसमें इन सारे सूक्ष्मजीवों के जीनोम मौजूद हैं जिसे माइक्रोबायोम कहते हैं। ऐसे अनेक काम हैं जो हमारे जीनोम में अंकित नहीं है। इन कार्यों को हम माइक्रोबायोम की मदद से करते हैं। हर सूक्ष्मजीव अपना-अपना काम करता है और पूरे इकोसिस्टम में योगदान देता है। वैसे यह दिलचस्प है कि जो सूक्ष्मजीव हमारी आहार नाल में बसते हैं वे हमारे जीनोम से कुछ जीनों का इस्तेमाल अपनी कार्यप्रणाली के लिए करते हैं। दरअसल, सूक्ष्मजीवों व मानव के बीच का यह रिश्ता साझेदारी व सहयोग का है। दोनों पक्ष एक-दूसरे को लाभ पहुंचाते हैं। जैसे हमारे द्वारा जिस कार्बोहाइड्रेट का पाचन नहीं हो पाता है उन्हें ये सूक्ष्मजीव पचाते हैं या विटामीन बी का संश्लेषण हमारी आंत के बैक्टीरिया ही करते हैं। और आंत में जिस भोजन का पाचन होता है उसका फायदा ये सूक्ष्मजीव भी उठाते हैं।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.holganix.com/hubfs/Microbes-small.jpg
वर्षा
ऋतु में प्रकृति सजीव हो उठती है। कीट-पतंगे, मकडि़यां और नाना
प्रकार के जीव जंतु दिखाई पड़ने लगते हैं। मेंढकों का भी यह प्रजनन काल होता है।
नर मेंढक ज़ोर-ज़ोर
से टर्रा कर मादा को आमंत्रित करते हैं। और मादा भी उनके प्रणय निवेदन को स्वीकार
कर खिंची चली आती है।प्रजनन के दौरान मादा मेंढक पानी में अंडे देती है और नर अपने
शुक्राणु उनपर छिड़क देता है। अंडों से टैडपोल बनता है और उसके बाद मेंढक। संरचना
और स्वभाव में टैडपोल मेंढक से काफी भिन्न होते हैं। टैडपोल पानी में रहते हैं,
गलफड़ों से श्वसन करते हैं, शाकाहारी
होते हैं और काई कुतर कर खाते हैं। इनकी आंत बहुत लंबी होती है और तैरने के लिए
इनमें पूंछ भी होती है। दूसरी ओर, मेंढक पानी और ज़मीन
दोनों जगह रहते हैं। त्वचा और फेफड़ों से श्वसन करते हैं। मांसाहारी होते हैं,
छोटे-मोटे जीव जंतुओं का शिकार करते हैं। इनकी आंत भी छोटी होती
है, पूंछ नहीं होती लेकिन चलने और तैरने के लिए
इनके पास बढि़या अनुकूलित टांगें होती हैं।
जब
टैडपोल से वयस्क मेंढक बनता है तो उसकी पूंछ और गलफड़े कहां चले जाते हैं?
ये टूट कर गिरते नहीं बल्कि अवशोषित कर लिए जाते हैं।
टैडपोल
से मेंढक बनने जैसा ही कुछ-कुछ तितली के जीवन में भी घटता है। इनके अंडों से कैटरपिलर (इल्ली) निकलते हैं।
कैटरपिलर खूब फूल-पत्तियां
खाते हैं। उसके बाद वे एक प्यूपा (शंखी) में बदल जाते हैं। और फिर एक दिन प्यूपा में से तितली
निकलती है। तितली कैटरपिलर से बिल्कुल अलग होती है। जहां लंबे कैटरपिलर में चलने
के लिए अनेक टांगों जैसी रचनाएं होती हैं, पत्तियों
को कुतर-कुतर
कर खाने के लिए मज़बूत जबड़े होते हैं वहीं तितलियों में फूल का रस पीने के लिए
लंबी स्ट्रॉ के समान सूंड (प्रोबोसिस) नाम की नली होती है, चलने
के लिए 3 जोड़ी
टांगें और उड़ने के लिए पंख होते हैं।
टैडपोल
और कैटरपिलर दोनों में ही अनेक अंग वयस्क होने पर बदल जाते हैं। पुराने अंग नष्ट
होकर अवशोषित हो जाते हैं और नए अंगों का निर्माण होता है। अर्थात प्रत्येक प्राणी
में विकास के दौरान अनेक पुरानी और टूटी-फूटी कोशिकाएं बेकार हो जाने पर निर्धारित
कार्यक्रम के अनुसार नष्ट हो जाती हैं। कोशिका के नष्ट होने की इस प्रक्रिया को
एपोप्टोसिस या तयशुदा कोशिका मृत्यु (प्रोग्राम्ड सेल डेथ) कहते हैं।
हमारे
शरीर की प्रत्येक कोशिका की निश्चित आयु होती है। जैसे रक्त में पाई जाने वाली लाल
रक्त कोशिकाएं मात्र 120 दिन
जीवित रहती हैं। इनकी भरपाई के लिए कोशिका विभाजन द्वारा निरंतर नई कोशिकाएं बनती
रहती हैं।
प्राय: कोशिकाओं की मृत्यु
चोट, संक्रमण, विकिरण
या रसायनों आदि के कारण होती हैं। यह आत्मघात नहीं है। इसे नेक्रोसिस कहते हैं।
इसमें कोशिकाएं स्वेच्छा से नहीं मरतीं, उनकी
हत्या होती है। किन्तु एपोप्टोसिस आंतरिक या बाह्य कारणों से,
शरीर के हित में स्वैच्छिक आत्म बलिदान है,
मृत्यु का वरण है। शरीर के रोगों से और दर्द से बचाने का
तरीका है।
नेक्रोसिस
और एपोप्टोसिस में कोशिकाएं भिन्न प्रकार से नष्ट होती हैं। कोशिका मृत्यु के
दोनों प्रकार नेक्रोसिस और एपोप्टोसिस की विधियों में भिन्नता आसानी से पहचानी जा
सकती है।
नेक्रोसिस
के प्रारंभ में प्राय: कोशिकाओं
में सूजन आ जाती है और सूजन के सभी लक्षण परिलक्षित होते हैं। दर्द महसूस होता है।
कोशिकाएं फूल जाती है और उनका ढांचा और उनकी अखंडता नष्ट हो जाती है। कोशिकांग फूल
कर फूटने लगते हैं। यह सब अव्यवस्थित ढंग से होता है।
एपोप्टोसिस
में कोशिकाएं फूलने के बजाए सूखने और सिकुड़ने लगती हैं,
छोटी हो जाती हैं। कोशिका झिल्ली की बाहरी सतह पर बुलबुलों
के समान रचनाएं (ब्लेब) बनने लगती हैं।
कोशिका द्रव्य और केन्द्रक सिकुड़ने लगते हैं। क्रोमेटिन यानी डीएनए और प्रोटीन
नष्ट होने लगते हैं और अन्तत: कोशिका छोटे-छोटे पैकेट्स में टूट जाती हैं जिन्हें भक्षी कोशिकाएं (फेगोसाइट्स) अपने अंदर लेकर नष्ट
कर देते हैं।
कोशिकाएं
आत्मघात क्यों करती हैं? शरीर की वृद्धि के
लिए जिस प्रकार कोशिका विभाजन आवश्यक है उसी प्रकार स्थान बनाने के लिए आत्मघात भी
आवश्यक है। कुछ कोशिकाएं विशेष कार्य के लिए बनती हैं। कार्य की समाप्ति पर ये
अनावश्यक और शरीर पर अवांछित बोझ हो जाती हैं। जैसे मेंढक की पूंछ,
गलफड़े और लंबी आंत।
इसी
प्रकार नए अंगों के निर्माण में भी आत्मघात महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए मानव
भ्रूण में हाथ-पैर
चप्पू जैसे होते हैं। उंगलियों के बीच में जाल होने के कारण उंगलियां पकड़ के लिए
स्वतंत्र नहीं होती। अंगूठा भी उंगलियों से जुड़ा होता है और पकड़ने लायक नहीं
होता। आत्मघात से ही कार्यशील उंगलियां निर्मित होती हैं। शरीर की वे कोशिकाएं जो
संक्रमित हो जाती हैं उन्हें भी आत्मघात के द्वारा संक्रमण को बढ़ने से रोक कर
पूरे शरीर को संक्रामक रोग से बचा लिया जाता है।
कैंसर
का एपोप्टोसिस से गहरा नाता है। वायरस कैंसर कोशिकाओं को आत्मघात नहीं करने देता
अन्यथा वायरसयुक्त कोशिकाएं आत्मघात करके शरीर को कैंसर जैसे घातक रोगों से बचा
सकती हैं। अंग प्रत्यारोपण में आत्मघात की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि किसी
प्रकार से प्रतिरक्षा कोशिकाएं आत्मघात से नष्ट हो जाएं तो प्रत्यारोपित अंगों को
शरीर स्वीकार कर लेता है।
आत्मघात
के अध्ययन में सिनोरैब्डाइटिस एलेगेंस नामक कृमि को मॉडल जीव के रूप में प्रयुक्त
कर बहुत से रहस्यों पर से पर्दा उठाने में मदद मिली है।
सन 2002 में चिकित्सा/कार्यिकी का नोबेल
पुरस्कार तीन वैज्ञानिकों को मिला था। इन्होंने भ्रूणीय विकास के दौरान अंगों के
निर्माण तथा कोशिका आत्मघात में आनुवंशिक नियंत्रण की भूमिका को समझाने के लिए
मौलिक खोज की थी। छोटी आयु, भरपूर प्रजनन क्षमता,
पारदर्शी शरीर एवं आसानी से प्रयोगशाला में कल्चर हो जाने
की सुविधाओं के कारण वैज्ञानिकों ने सिनोरैब्डाइटिस एलेगेंस कृमि का चुनाव किया
था। उन्होंने पाया कि कृमि के 1090 में से 131 कोशिकाएं नियत समय पर कोशिका आत्मघात से मर जाती है।
उन्होंने
यह भी बताया कि भ्रूण से कृमि बनने की प्रक्रिया के दौरान कुछ कोशिकाएं कोशिका
आत्मघात से गुजरती हैं क्योंकि उनका कार्य कृमि शरीर में खत्म हो चुका होता है।
उन्होंने कोशिका आत्मघात की प्रक्रिया के लिए जि़म्मेदार जीन भी खोज निकाला।
आत्मघात के लिए जि़म्मेदार जीन में म्यूटेशन होने से मरने की बजाय कोशिकाएं विभाजन
करने लगती हैं। उन्होंने यह भी बताया कि ये जीन मानव में भी पाए जाते हैं।
जब टैडपोल या कैटरपिलर को क्रमश: मेंढक और तितली (यानी वयस्क) में बदलने का समय आ जाता है तो उनकी अनेक कोशिकाओं को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ता है। टैडपोल के परिवर्धन में थायरॉइड हार्मोन की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। थायरॉइड हार्मोन वहां पर जुड़ जाता है जहां कोशिका के केन्द्रक में थायरॉइड ग्राही हो। थायरॉइड हार्मोन के जुड़ते ही कोशिका आत्मघात करने वाले जीन को अभिव्यवित करने लगती है। इसके साथ ही आत्मघात के आंतरिक एवं बाहरी रास्ते भी खुल जाते हैं।(स्रोत फीचर्स)
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साल 1688 में एक आयरिश
दार्शनिक विलियम मोलेनो ने अपने सहयोगी जॉन लॉके से एक सवाल पूछा था: कोई जन्मजात
दृष्टिहीन व्यक्ति जिसने मात्र स्पर्श से चीज़ों को पहचानना सीखा है,
यदि आगे चलकर उसमें देखने की क्षमता आ जाए,
तो क्या वह सिर्फ देखकर चीज़ों को पहचान पाएगा?
उनका यह सवाल मोलेनो समस्या के नाम से जाना जाता है। सवाल
मूलत: यह
है कि क्या मनुष्य में आकृतियां पहचानने की क्षमता जन्मजात होती है या क्या वे
देखकर, स्पर्श से और अन्य
इंद्रियों के माध्यम से इसे सीखते या अर्जित करते हैं?
यदि दूसरा विकल्प सही है, तो
इसमें बहुत समय लगना चाहिए।
कुछ
वर्ष पूर्व इस गुत्थी को सुलझाने के एक प्रयास में कुछ ऐसे बच्चे शामिल किए गए थे
जो जन्म से अंधे थे लेकिन बाद में उनकी दृष्टि बहाल हो गई थी। ये बच्चे तत्काल तो
देखकर आकृतियां नहीं पहचान पाए थे लेकिन बहुत समय भी नहीं लगा था। लेकिन कुछ तो
सीखना पड़ा था। यानी परिणाम अस्पष्ट थे। हाल ही में लंदन स्थित क्वीन मैरी
युनिवर्सिटी के लार्स चिटका और उनके साथियों ने इस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश एक
बार फिर से की है।
प्रयोग
भंवरों पर किया गया। अपने अध्ययन में उन्होंने पहले भंवरों को उजाले में गोले और
घन में अंतर सीखने का प्रशिक्षण दिया – उजाले में, दो बंद पेट्री डिश
में गोले और घन आकृतियां रखी गर्इं और उनमें से किसी एक को चुनने पर शकर का इनाम
दिया गया। गोले और घन बंद पेट्री डिश में रखे थे इसलिए भंवरे उन्हें देख तो सकते
थे लेकिन छू नहीं सकते थे। देखा गया कि भंवरे उस आकृति के साथ ज़्यादा समय बिताते
हैं, जिसका सम्बंध शकर रूपी इनाम से है;
यानी वे उस आकृति को पहचानते हैं।
इसके
बाद उन्होंने यही जांच अंधेरे में की। यानी भंवरे वस्तुओं को छू तो सकते थे लेकिन
देख नहीं सकते थे। शोधकर्ताओं ने पाया कि जिस आकृति के लिए भंवरों को शकर का
पुरस्कार मिला था, उस आकृति के साथ
भंवरों ने अधिक समय बिताया।
इसके
बाद शोधकर्ताओं ने यही अध्ययन उल्टी तरह से किया – पहले उन्हें अंधेरे में प्रशिक्षित किया और
उजाले में जांच की। इसमें भी, दोनों ही स्थितियों
में जहां उन्हें वस्तु छूकर पहचानना था या देखकर, जिस
आकृति के लिए भंवरों को शकर दी गई थी उस आकृति के पास अधिक वक्त बिताया।
कीटों
में दृश्य पैटर्न को पहचानने की क्षमता का काफी अध्ययन हुआ है। शोधकर्ताओं को यह
तो पहले से पता था कि कीट फूलों और मनुष्य के चेहरों के पेचीदा रंग-विन्यास को पहचान
सकते हैं। लेकिन विन्यास पहचान के लिए ज़रूरी नहीं है कि मस्तिष्क में उस विन्यास
का कोई चित्र बने। तो सवाल यह था कि क्या हमारे मस्तिष्क के समान कीटों के
मस्तिष्क में भी वस्तु का कोई चित्रण बनता है।
लेकिन
शोधकर्ताओं का मत है कि उनके अध्ययन में ये कीट एक किस्म की संवेदना से प्राप्त
सूचना को किसी अन्य किस्म की संवेदना में तबदील करके वस्तु का चित्रण कर पाए। इसके
आधार पर उनका कहना है कि इन भंवरों ने मोलेनो के सवाल का जवाब दे दिया है। अर्थात
एक किस्म की संवेदना से निर्मित चित्र दूसरे किस्म की संवेदना द्वारा इस्तेमाल
किया जा सकता है।
अलबत्ता, अन्य वैज्ञानिक इस प्रयोग की वास्तविक दुनिया में वैधता के बारे में शंकित हैं। जैसे भंवरे फूलों को पहचानने के लिए दृष्टि और गंध दोनों संकेतों पर निर्भर होते हैं। इसलिए ऐसे अध्ययन करना होंगे जो भंवरों की प्राकृतिक स्थिति से मेल खाएं। (स्रोत फीचर्स)
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मनुष्यों
में अनुभवों, जानकारियों और
आंकड़ों के आधार पर निर्णय लेने की क्षमता होती है। हाल के एक अध्ययन में सामने आया
है कि न्यूज़ीलैंड में पाए जाने वाले किआ तोते भी ऐसा कर सकते हैं। वानरों के अलावा
किसी अन्य प्रजाति में पहली बार इस तरह का संज्ञान देखा गया है।
जैतूनी
भूरे रंग के ये तोते अपनी हरकतों के लिए बदनाम हैं। अतीत में ये चोंच का छुरी की
तरह उपयोग कर भेड़ों की चमड़ी को भेदते हुए उनकी रीढ़ की हड्डी के इर्द-गिर्द जमा वसा तक
पहुंच जाते थे। आजकल ये खाने के सामान के लिए लोगों के पिट्ठू बैग को चीर देते हैं,
और कार के वाइपर निकाल देते हैं।
यह
देखने के लिए कि क्या किआ तोतों की शैतानी के साथ बुद्धिमत्ता जुड़ी है,
युनिवर्सिटी ऑफ ऑकलैंड की मनोविज्ञानी एमालिया बास्टोस और
उनके साथियों ने न्यूज़ीलैंड के क्राइस्टचर्च के पास स्थित अभयारण्य के छह किआ
तोतों का अध्ययन किया। पहले तो शोधकर्ताओं ने तोतों को यह सिखाया कि काले रंग का
टोकन चुनने पर हमेशा स्वादिष्ट भोजन मिलता है जबकि नारंगी टोकन से कभी भोजन नहीं
मिलता। फिर उनके सामने पारदर्शी मर्तबानों में काले और नारंगी रंग के टोकन रखे गए।
जब शोधकर्ताओं ने बंद मुट्ठी में मर्तबान से टोकन निकाले तब किआ तोते ने अधिकतर उन
हाथों को चुना जिन्होंने उस मर्तबान से टोकन निकाले थे जिनमें नारंगी टोकन की
तुलना में काले टोकन अधिक थे। ऐसा उन्होंने तब भी किया जब मर्तबानों में काले और
नारंगी टोकन के बीच अंतर बहुत कम था (63 काले और 57 नारंगी)।
अगले
परीक्षण में शोधकर्ताओं ने किआ तोतों के सामने दो पारदर्शी मर्तबान में दोनों
रंगों के टोकन बराबर संख्या में रखे। लेकिन मर्तबानों को एक शीट की मदद से ऊपरी व
निचले दो हिस्सों में बांटा गया था। हालांकि दोनों मर्तबानों में काले व नारंगी
टोकन बराबर संख्या में थे लेकिन एक में ऊपर वाले खंड में ज़्यादा काले टोकन थे।
शोधकर्ता मात्र ऊपर वाले खंड में हाथ डाल सकता था। इस स्थिति में किआ ने उन हाथों
को चुना जिन्होंने उस मर्तबान से टोकन निकाले जिसके ऊपरी हिस्से में काले टोकन
अधिक थे। इसके बाद किए गए अंतिम परीक्षण में भी किआ तोते ने उस शोधकर्ता के हाथ से
टोकन लेना ज़्यादा पसंद किया जिसने काले टोकन अधिक बार निकाले थे।
इन
परीक्षणों के आधार पर नेचर कम्युनिकेशन पत्रिका में शोधकर्ताओं का कहना है
कि किआ तोतों में आंकड़ों के आधार पर अनुमान लगाने की क्षमता होती है। इससे लगता है
कि मनुष्यों की तरह किआ में भी कई किस्म की सूचनाओं को एकीकृत करने की बौद्धिक
क्षमता होती है। गौरतलब है कि पक्षियों और मनुष्यों के साझे पूर्वज लगभग 31 करोड़ वर्ष पूर्व थे,
और दोनों की मस्तिष्क की संरचना भी काफी अलग है। एक मत यह
रहा है कि इस तरह की बुद्धि के लिए भाषा की ज़रूरत होती है।
अलबत्ता, हार्वड युनिवर्सिटी की तोता संज्ञान विशेषज्ञ आइरीन पेपरबर्ग को लगता है कि किआ ने सहज ज्ञान का प्रदर्शन किया है ना कि सांख्यिकीय समझ का। लेकिन उन्हें यह भी लगता है यदि किआ में सांख्यिकीय अनुमान लगाने की क्षमता होती है तो इस तरह की क्षमता से लैस जानवर भोजन की मात्रा की उपलब्धता और प्रजनन-साथियों की संख्या का अंदाज़ा लगा पाएंगे जो फायदेमंद होगा। (स्रोत फीचर्स)
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हो सकता है कि कुत्ते 10 तक
गिनती ना कर पाएं लेकिन बायोलॉजी लेटर्स में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक कुत्तों
को इसका अंदाज़ा होता है कि उनकी प्लेट में कितनी हड्डियां हैं। इस अध्ययन के
मुताबिक हम मनुष्यों की तरह कुत्तों में भी मात्रा (या संख्या) की समझ जन्मजात होती
है।
किसी समूह में वस्तुओं की
संख्या का मोटा-मोटा अनुमान एक नज़र में लगाने की क्षमता मनुष्यों में होती है।
पहले हुए कई अध्ययन यह दर्शा चुके थे कि बंदरों, मछलियों, मधुमक्खियों और कुत्तों में भी ‘लगभग संख्या’ का अनुमान लगाने की क्षमता होती
है। लेकिन इनमें से कई अध्ययन प्रशिक्षित जानवरों के साथ किए गए थे जिनका इसी
दक्षता के लिए बार-बार परीक्षण हुआ था और परीक्षण के दौरान पारितोषिक मिल चुके थे।
तो सवाल यह उठा कि क्या मनुष्यों की तरह कुत्तों में भी यह क्षमता जन्मजात होती है?
इसी सवाल का जवाब खोजने के लिए
एमरी युनिवर्सिटी के तंत्रिका विज्ञानी ग्रेगरी बन्र्स और उनके साथियों ने अलग-अलग
नस्ल के 11 अप्रशिक्षित कुत्तों के साथ यह अध्ययन किया, जैसे बॉर्डर कॉलीस, पिटबुल और लेब्रोडॉर गोल्डन रिट्रीवर। अपने अध्ययन में वे
देखना चाहते थे कि क्या मस्तिष्क में संख्या के एहसास से जुड़ी कोई सक्रियता नज़र
आती है।
यह जांचने के लिए उन्होंने
फंक्शनल मैग्नेटिक रेसोनेंस इमेजिंग (ढग्ङक्ष्) की मदद से कुत्तों के मस्तिष्क को
स्कैन किया। उन्होंने कुत्तों को ढग्ङक्ष् स्कैनर में उनकी मर्जी से प्रवेश कराया
और उनका सिर एक ब्लॉक पर स्थिर किया। फिर कुत्तों को एक काले पर्दे पर हल्के भूरे
रंग के छोटे और बड़े बिंदुओं के कुछ समूह दिखाए। तस्वीरें 300 मिलीसेंकड प्रति
तस्वीर की रफ्तार से बदल रही थी। शोधकर्ताओं का अनुमान था कि मनुष्य या अन्य
प्राइमेट की तरह यदि कुत्तों के मस्तिष्क में भी संख्याओं के लिए एक निश्चित
हिस्सा है तो समान संख्या में बिंदु (4 छोटे बिंदु के बाद 4 बड़े बिंदु) की तुलना
में असमान संख्या (जैसे 3 छोटे बिंदु के बाद 10 बड़े बिंदु) आने पर मस्तिष्क के इस
हिस्से में कुछ गतिविधि दिखनी चाहिए।
अध्ययन में 11 में से 8
कुत्तों के मस्तिष्क में अपेक्षित गतिविधि दिखी। आश्चर्य की बात यह रही कि हर
कुत्ते के मस्तिष्क के थोड़े अलग हिस्से में गतिविधि दिखी। यह शायद अलग-अलग नस्ल के
कुत्तों के बीच का फर्क हो।
वेस्टर्न युनिवर्सिटी की
क्रिस्टा मेकफर्सन का कहना है कि ये नतीजे ‘लगभग संख्या प्रणाली’ की हमारी समझ का समर्थन
करते हैं। पूर्व में हुए अध्ययन में इन बातों को कुत्तों के व्यवहार के आधार पर
दर्शाया गया था। इसलिए यह अध्ययन कुत्तों में संज्ञान को समझने की दृष्टि से
महत्वपूर्ण है। वे आगे कहती हैं, चूंकि अध्ययन दर्शाता है कि कुत्ते वस्तु की संख्याओं की ओर अधिक ध्यान देते
हैं इसलिए यह कुत्तों का प्रशिक्षण करने वालों के लिए दिलचस्प साबित हो सकता है।
वे कुत्तों को पुरस्कार स्वरूप एक बड़ी चीज़ देने की बजाय अधिक संख्या में चीज़ें दे
सकते हैं।
बन्र्स का कहना है कि कुत्तों और मनुष्यों के बीच जैव विकास के विशाल अंतर को देखते हुए ये नतीजे इस बात का पुख्ता साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं कि अधिकतर स्तनधारियों में गिनने की क्षमता जन्मजात होती है। (स्रोत फीचर्स)
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वैज्ञानिक काफी लंबे समय से यह तो जानते हैं कि कई शुरुआती डायनासौर, जो आज के पक्षियों के पूर्वज हैं, पंखों से ढंके हुए थे। पंखों का यह आवरण गर्मी प्रदान करने के अलावा प्रजनन साथियों को आकर्षित करने में भी उपयोगी था। लेकिन अभी तक यह नहीं पता था कि कब और कैसे इन पंखों का इस्तेमाल उड़ने के लिए किया जाने लगा।
अब पंख वाले डायनासौर के पंख के जीवाश्म के आणविक विश्लेषण से पता चला है कि पंख में प्रयुक्त प्रमुख प्रोटीन किस तरह समय के साथ हल्के और अधिक लचीले हुए जिसके चलते डायनासौर उड़ने में सक्षम हुए और अंतत: पक्षियों में विकसित हुए।
ज़मीन पर चलने वाले सभी रीढ़धारी जीवों में किरेटिन नाम का एक प्रोटीन होता है जो नाखूनों से लेकर चोंच, पंख, शल्क वगैरह बनाता है। मनुष्यों और अन्य स्तनधारियों में, अल्फा किरेटिन 10 नैनोमीटर चौड़ा तंतु बनाता है जिससे बाल, त्वचा और नाखून बनते हैं। मगरमच्छों, कछुओं, छिपकलियों और पक्षियों में बीटा किरेटिन और भी पतला व अधिक कठोर तंतु बनाता है जिससे पंजे, चोंच और पंख बनते हैं।
वैज्ञानिकों ने पिछले एक दशक में दर्जनों जीवित पक्षियों, मगरमच्छों, कछुओं और अन्य रेंगने वाले जीवों के जीनोम की मदद से समय के साथ उनके बीटा किरेटिन में बदलाव के आधार पर एक वंशवृक्ष तैयार किया है। उनके अनुसार आधुनिक पक्षियों ने अधिकांश अल्फा किरेटिन तो गंवा दिया, लेकिन उनके पंखों में बीटा किरेटिन अधिक लचीला हो गया। इनमें ग्लाइसिन और टायरोसिन अमीनो एसिड्स की एक लड़ी का अभाव होता है जो पंजे और चोंच को कठोर बनाती है। इससे पता चला कि उड़ान के लिए ये दोनों परिवर्तन आवश्यक हैं।
इन दोनों परिवर्तनों को एक साथ देखने के लिए शोधकर्ताओं ने चीन और मंगोलिया के असाधारण जीवाश्मों में अल्फा और बीटा किरेटिन का विश्लेषण किया। पुराजीव वैज्ञानिक पान यानहोंग और मैरी श्वाइट्ज़र ने 16 से 7.5 करोड़ वर्ष पूर्व की पांच प्रजातियों किरेटिन का विश्लेषण किया।
उन्होंने प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ में बताया है कि 16 करोड़ साल पहले के एक कौए के आकार के एनचीओर्निस डायनासौर के पंखों में कुछ मात्रा में आधुनिक पक्षियों के समान अभावग्रस्त बीटा किरेटिन पाया गया। लेकिन सबसे प्राचीन ज्ञात पक्षी आर्कियोप्टेरिक्स से 10 करोड़ वर्ष पूर्व के डायनासौर में अधिक अल्फा किरेटिन पाया गया, जो आज के पक्षियों के पंखों में कमोबेश अनुपस्थित है।
इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि एनचीओर्निस के पंख उड़ान भरने के लिए सक्षम तो नहीं थे लेकिन उड़ान की ओर विकास में एक मध्यवर्ती चरण को दर्शाते हैं।
इसी प्रकार 13 करोड़ वर्ष पुराने एक छोटे उड़ानहीन डायनासौर शुवुइया से प्राप्त पंखों से पता चलता है कि आधुनिक पक्षियों की तरह, इसमें अल्फा किरेटिन की कमी तो थी लेकिन एनचीओर्निस के विपरीत, इसके पंख अधिक कठोर बीटा किरेटिन से बने थे।
आधुनिक आनुवंशिक सबूतों के आधार पर यह कह पाना संभव है कि विकास के दौरान, कुछ डायनासौर के जीनोम में अल्फा किरेटिन जीन की कई प्रतिलिपियां बन गई। फिर इन ढेर सारी प्रतियों में काट-छांट के चलते ये बीटा किरेटिन के ग्लायसीन व टायरोसीन रहित लचीले किरेटिन का निर्माण करने लगे। इस दोहरे परिवर्तन ने डायनासौर को उड़ने में सक्षम बनाया और इसी के फलस्वरूप पक्षी विकसित हुए। (स्रोत फीचर्स)
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सन 2014 में एडिनबरा विश्वविद्यालय के सूक्ष्मजीव वैज्ञानिक चार्ल्स कॉकेल और उनके कुछ साथियों ने मिलकर एक प्रयोग इस उम्मीद के साथ शुरू किया था कि वह 2514 तक (यानी 500 साल तक) चलेगा। वैसे तो लंबे-लंबे वैज्ञानिक प्रयोगों का लंबा इतिहास रहा है मगर कॉकेल और साथियों का यह प्रयोग अत्यंत महत्वाकांक्षी है।
प्रयोग वैसे तो काफी आसान है। सादे कांच के 800 कैप्सूल्स हैं और प्रत्येक में या तो क्रूकॉक्सीडोप्सिस या बैसिलस सब्टिलिस नामक बैक्टीरिया के नमूने रखे गए हैं। कांच के इन कैप्सूल्स को अच्छी तरह सील कर दिया गया है। इनमें से आधे कैप्सूल्स पर सीसे का आवरण है ताकि ये डीएनए को क्षति पहुंचाने वाले विकिरण से सुरक्षित रहें। कैप्सूल्स का एक पूरा सेट लंदन प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय में बैक-अप के तौर पर रखा गया है।
प्रयोग का मकसद यह देखना है कि बैक्टीरिया शुष्क परिस्थिति में कितने समय तक जीवनक्षम बने रहते हैं। प्रयोग की शुरुआत एक आकस्मिक अवलोकन के आधार पर हुई थी। कॉकेल ने एक तश्तरी में बैक्टीरिया क्रूकॉक्सीडॉप्सिस रखा था और फिर वे उसे भूल गए थे। 10 वर्षों बाद जब उन्होंने उस तश्तरी पर ध्यान दिया तो पता चला कि बैक्टीरिया जीवनक्षम थे। इससे पहले भी कुछ वैज्ञानिकों ने मांस के 118 वर्ष पुराने डिब्बों में से सही सलामत बैक्टीरिया प्राप्त किए थे और एक शोध का परिणाम था कि एंबर और लवण के क्रिस्टल में कुछ बैक्टीरिया लाखों वर्षों बाद भी जीवनक्षम पाए गए थे, हालांकि इसे लेकर विवाद है।
उक्त अवलोकन ने कॉकेल के मन में यह जिज्ञासा पैदा कर दी कि आखिर बैक्टीरिया कितने वर्षों तक जीवनक्षम बने रहते हैं। इसी जिज्ञासा से प्रेरित होकर उन्होंने इस आधी सहस्त्राब्दी के प्रयोग की कल्पना की। ज़ाहिर है, यह प्रयोग पूरा होने से बहुत पहले मूल शोधकर्ता तो सिधार चुके होंगे। इसलिए उन्होंने हर पच्चीस वर्षों में इसके अवलोकन की व्यवस्था की है। व्यवस्था यह है कि पहले 24 वर्षों तक हर दूसरे साल और उसके बाद 475 वर्षों तक हर पच्चीस साल में एक बार कुछ वैज्ञानिक विश्वविद्यालय आएंगे और दोनों तरह के एक-एक कैप्सूल को खोलेंगे और उसमें रखे गए बैक्टीरिया को पनपाने की कोशिश करेंगे। उन्होंने इसके लिए निर्देश लिखकर एक यूएसबी स्टिक में डालकर रख दिए हैं। मगर टेक्नॉलॉजी की प्रगति को देखते हुए उन्हें लगा कि शायद यूएसबी स्टिक जल्दी ही पुरानी पड़ जाएगी। इसलिए कागज़ पर भी निर्देश रख छोड़े हैं, और एक निर्देश यह दिया है कि जो भी वैज्ञानिक यह काम करे वह इन निर्देशों की एक नवीन प्रतिलिपि बनाकर रख दे, क्योंकि 500 सालों में कागज़ की हालत पता नहीं क्या हो जाएगी।
शोधकर्ताओं ने यह भी विचार किया है कि शायद उस समय तक विश्वविद्यालय जैसी संस्था रहे ना रहे, वैज्ञानिक कार्य के लिए फंडिंग उपलब्ध रहे ना रहे। तो उन्होंने इस प्रयोग को जारी रखने के लिए एक ट्रस्ट बना दिया है। हम-आप तो इस प्रयोग के परिणाम जानने को यहां नहीं रहेंगे मगर उम्मीद की जानी चाहिए कि यह प्रयोग नियमित रूप से पूरा होगा और कुछ रोचक निष्कर्ष (लगभग) 20 पीढ़ी बाद के वैज्ञानिकों को मिलेंगे। (स्रोत फीचर्स)
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अनेक सिरों वाला एक जीव प्रयोगशाला में बनाया गया है। इसे दशानन की तर्ज़ पर अनेकानन कह सकते हैं। दरअसल हायड्रा एक जलीय जीव है जिसमें पुनर्जनन का अनोखा गुण होता है। इसके शरीर का छोटा से टुकड़ा भी बच जाए तो यह पूरा शरीर बनाने की क्षमता रखता है। वैसे हायड्रा का शरीर काफी सरल होता है – एक बेलनाकार धड़ और उस पर स्पर्शकों से घिरा सिर।
शोधकर्ता इसकी जेनेटिक संरचना में एक फेरबदल करके ऐसा हायड्रा बना सकते हैं जिसके पूरे शरीर पर सिर ही सिर होंगे। यूनानी दंतकथा में ऐसे अनेकानन हायड्रा का ज़िक्र भी आता है। मगर अब समझ में आया है कि प्राकृतिक रूप से ऐसा क्यों नहीं होता। क्या चीज़ है जो ऐसे अनेक सिर वाले हायड्रा को बनने से रोकती है। यह समझ कैंसर अनुसंधान में काफी उपयोगी साबित हो सकती है।
हायड्रा सरल जीव अवश्य है किंतु शरीर को फिर से विकसित कर लेना कोई हंसी–खेल नहीं है। हर बार पुनर्जनन के दौरान हायड्रा को पूरी प्रक्रिया को नियंत्रित करना पड़ता है ताकि हर बार एक ही सिर बने। शोधकर्ता यह तो पहले से जानते थे कि एक जीन (Wnt3) होता है जो सिर के विकास का संदेश देता है। उन्हें यह भी पता था कि इस जीन के लिए कोई आणविक अंकुश भी होना चाहिए अन्यथा हायड्रा के पूरे शरीर पर सिर उगेंगे। शोधकर्ताओं को यह भी पता था कि बीटा–कैटिनीन/टीसीएफ नामक एक ग्राही और जीन एक्टिवेटर होता है जो सिर के विकास की प्रक्रिया को शुरू करवाता है।
मगर उन्हें यह पता नहीं था कि इस प्रक्रिया को बंद करने वाला स्विच कौन–सा है। जेनेवा विश्वविद्यालय के जेनेटिक्स व जैव विकास की प्रोफेसर ब्रिगिटे गैलियॉट और उनके साथी इसी स्विच की खोज में थे। पहले उन्होंने हायड्रा के निकट सम्बंधी प्लेनेरियन्स (चपटा कृमि) पर ध्यान दिया। ये कृमि भी पुनर्जनन करते हैं। उन्होंने पाया कि 440 जीन्स ऐसे हैं जो बीटा–कैटिनीन/टीसीएफ से संकेत मिलने पर अवरुद्ध हो जाते हैं। इसके आधार पर उन्होंने हायड्रा में छानबीन की। देखा गया कि इनमें से 124 जीन्स हायड्रा में भी पाए जाते हैं।
इन 124 में से भी उन्हें पांच जीन्स ऐसे मिले जो हायड्रा के बेलनाकार शरीर के ऊपरी हिस्से में सक्रिय होते हैं और निचले हिस्से में सबसे कम सक्रिय होते हैं। इसका मतलब है कि ये सिर के विकास से सम्बंधित हैं। अब गैलियॉट और उनके साथियों ने यह देखने की कोशिश की कि कौन–से जीन्स पुनर्जनन की प्रक्रिया के दौरान अधिक सक्रिय होते हैं। इस तरह से तीन जीन्स बचे: Wnt3, Wnt5और Sp5।
इनमें से पहले दो जीन्स (Wnt3, Wnt5) के बारे में तो पता था कि ये सिर के विकास की प्रक्रिया को शुरू करवाते हैं। इसलिए उन्होंने तीसरे जीन (Sp5) पर ध्यान केंद्रित किया। रोचक बात यह पता चली कि बीटा–कैटिनीन/टीसीएफ से प्राप्त संकेत से Sp5 की सक्रियता बढ़ती है किंतु वह Wnt3 की क्रिया को दबाकर बीटा–कैटिनीन/टीसीएफ संकेत को बंद कर देता है। यानी यही (Sp5) वह अंकुश है जो सिर के विकास की प्रक्रिया को रोकता है। इसकी जांच के लिए उन्होंने ऐसे हायड्रा तैयार किए जिनमें Sp5 अभिव्यक्त नहीं होता। और इन हायड्रा ने पुनर्जनन में कई सिरों का विकास किया। कुल मिलाकर पूरी प्रक्रिया अभिव्यक्ति और उसके दमन के नाज़ुक संतुलन पर टिकी है। गौरतलब बात है कि Wnt3 मात्र हायड्रा या चपटे कृमियों तक सीमित नहीं है। यह इंसानों में भी पाया जाता है और यहां भी यह विकास में भूमिका निभाता है। इसके अलावा यही जीन कैंसर के विकास में भी भूमिका निभाता (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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