ओरांगुटान अतीत के बारे में बात करते हैं

ह तो जानी-मानी बात है कि कई स्तनधारी व पक्षी किसी शिकारी या खतरे को देखकर चेतावनी की आवाज़ें निकालते हैं जिससे अन्य जानवरों और पक्षियों को सिर पर मंडराते खतरे की सूचना मिल जाती है और वे खुद को सुरक्षित कर लेते हैं। मगर ओरांगुटान में एक नई क्षमता की खोज हुई है।

ओरांगुटान एक विकसित बंदर है जो जीव वैज्ञानिकों के अनुसार वनमानुषों की श्रेणी में आता है। वैज्ञानिक यह तो जानते थे कि जब ओरांगुटान किसी शिकारी को देखते हैं तो वे चुंबन जैसी आवाज़ निकालते हैं। इससे शेर या अन्य शिकारी को यह सूचना मिल जाती है ओरांगुटान ने उन्हें देख लिया है। साथ ही अन्य ओरांगुटान को पता चल जाता है कि खतरा आसपास ही है।

सेन्ट एंड्रयूज़ विश्वविद्यालय के एक पोस्ट-डॉक्टरल छात्र एड्रियानो राइस ई लेमीरा ओरांगुटान की इन्हीं चेतावनी पुकारों का अध्ययन सुमात्रा के घने केटांबे जंगल में कर रहे थे। उन्होंने एक आसान-सा प्रयोग किया। एक वैज्ञानिक को बाघ जैसी धारियों, धब्बेदार या सपाट पोशाक पहनकर किसी चौपाए की तरह चलकर एक पेड़ के नीचे से गुज़रना था। इस पेड़ पर 5-20 मीटर की ऊंचाई पर मादा ओरांगुटानें बैठी हुई थीं। जब पता चल जाता कि उसे देख लिया गया है तो वह वैज्ञानिक 2 मिनट और वहां रुकता और फिर गायब हो जाता था। इतनी देर में ओरांगुटान को चेतावनी की पुकार उत्पन्न कर देना चाहिए थी।

पहला परीक्षण एक उम्रदराज़ मादा ओरांगुटान के साथ किया गया। उसके पास एक 9-वर्षीय पिल्ला भी था। मगर इस परीक्षण में ओरांगुटान ने कोई आवाज़ नहीं की। वह जो कुछ भी कर रही थी, उसे रोककर अपने बच्चे को उठाया, टट्टी की (जो बेचैनी का एक लक्षण है) और पेड़ पर और ऊपर चली गई। पूरे दौरान वह एकदम खामोश रही। लेमीरा और उनके सहायक बैठे-बैठे इन्तज़ार करते रहे। पूरे 20 मिनट बाद उसने पुकार लगाई। और एक बार चीखकर चुप नहीं हुई, पूरे एक घंटे तक चीखती रही।

बहरहाल, औसतन ओरांगुटान को चेतावनी पुकार लगाने में 7 मिनट का विलंब हुआ। ऐसा नहीं था वे सहम गए थे। वे बचाव की शेष क्रियाएं भलीभांति करते रहे – बच्चों को समेटा, पेड़ पर ऊपर चढ़े वगैरह। लेमीरा का ख्याल है कि ये मादाएं खामोश रहीं ताकि उनके बच्चे सुरक्षित रहें क्योंकि उन्हें लगता है कि शिकारी से सबसे ज़्यादा खतरा बच्चों के लिए होता है। जब शिकारी नज़रों से ओझल हो गया और वहां से चला गया तभी उन्होंने आवाज़ लगाई। लेमीरा का मत है कि चेतावनी पुकार को वास्तविक खतरा टल जाने के बाद निकालना अतीत के बारे में बताने जैसा है। उनके मुताबिक यह भाषा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है कि आप अतीत और भविष्य के बारे में बोलते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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ज़िद से नहीं, जज़्बे से बचेंगे एशियाई शेर -जाहिद खान

गुजरात के गिर अभयारण्य में पिछले दिनों एक के बाद एक 23 शेरों की रहस्यमय ढ़ंग से हुई मौत ने वन्य प्राणियों के चाहने वालों को हिलाकर रख दिया है। समझ में नहीं आ रहा है कि क्यों ये शेर एक के बाद एक मर रहे हैं। मरने वाले ज़्यादातर शेर अमरेली ज़िले के गिर फॉरेस्ट नेशनल पार्क के पूर्वी हिस्से डालखानिया रेंज के हैं।

इन शेरों की मौत पर पहले तो राज्य का वन महकमा चुप्पी साधे रहा। लेकिन जब खबर मीडिया के ज़रिए पूरे देश में फैली, तब वन महकमे के आला अफसर नींद से जागे और उन्होंने स्पष्टीकरण देना ज़रूरी समझा। स्पष्टीकरण भी ऐसा जिस पर शायद ही किसी को यकीन हो। प्रदेश के प्रधान मुख्य वन संरक्षक का दावा है कि डालखानिया रेंज में बाहरी शेरों के घुसने से हुई वर्चस्व की लड़ाई में इन शेरों की मौत हुई है। सवाल उठाया जा सकता है कि इतने बड़े जंगल के केवल एक ही हिस्से में इतने बड़े पैमाने पर लड़ाइयां क्यों हो रही है?

इस बीच मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंच गया है। शीर्ष अदालत ने हाल ही में सुनवाई करते हुए गुजरात सरकार को इस पूरे मामले की जांच करने का आदेश दिया है। 

जिस तरह से इन शेरों की मौत हुई है, उससे यह शंका जताई जा रही है कि कहीं इन शेरों की मौत केनाइन डिस्टेंपर वायरस (सीडीवी) और विनेशिया प्रोटोज़ोआ वायरस से तो नहीं हुई है। सीडीवी वायरस वही खतरनाक वायरस है जिससे प्रभावित होकर तंजानिया (अफ्रीका) के सेरेंगेटी रिज़र्व फॉरेस्ट में साल 1994 के दौरान एक हज़ार शेर मर गए थे। इस बारे में तमाम वन्य जीव विशेषज्ञ 2011 से लगातार गुजरात के वन महकमे को आगाह कर रहे हैं। पर राज्य के वन महकमे ने इससे निपटने के लिए कोई माकूल बंदोबस्त नहीं किए। यदि वायरस फैला तो गिर में और भी शेरों को नुकसान पहुंच सकता है; सिंहों की यह दुर्लभ प्रजाति विलुप्त तक हो सकती है।

दुनिया भर में एशियाई शेरों का अंतिम रहवास माने जाने वाले गिर के जंगलों में फिलहाल शेरों की संख्या तकरीबन 600 होगी। साल 2015 में हुई पांच वर्षीय सिंहगणना के मुताबिक यहां शेरों की कुल संख्या 523 थी। सौराष्ट्र क्षेत्र के चार ज़िलों गिर सोमनाथ, भावनगर, जूनागढ़ और अमरेली के 1800 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैले गिर के जंगलों की आबोहवा एशियाई शेरों को खूब रास आती है। एक समय एशियाई शेर पूरे भारत और एशिया के दीगर देशों में भी पाए जाते थे, लेकिन धीरेधीरे इनकी आबादी घटती गई। आज ये सिर्फ गुजरात के पांच वन स्थलों गिर राष्ट्रीय उद्यान, गिर वन्यजीव अभयारण्य, गिरनार वन्यजीव अभयारण्य, मटियाला अभयारण्य और पनिया अभयारण्य में सीमित रह गए हैं। इस बात को भारत सरकार ने गंभीरता से लिया और साल 1965 में गिर वन क्षेत्र को संरक्षित घोषित कर दिया। इन जंगलों का 259 वर्ग कि.मी. क्षेत्र राष्ट्रीय उद्यान घोषित है जबकि बाकी क्षेत्र संरक्षित अभयारण्य है।

डब्ल्यू.डब्ल्यू.एफ. की एक रिपोर्ट के मुताबिक बीसवीं सदी बाघों के लिए अति खतरनाक रही। वही हालात अब भी जारी हैं। संगठन का कहना है कि बीती सदी में इंडोनेशिया में बाघों की तीन उप प्रजातियां (बाली, कैस्पेन और जावा) पूरी तरह लुप्त हो गर्इं।

वन्य जीवों के लिए खतरे के मामले में पूरी दुनिया में हालात एक समान हैं। दक्षिणी चीनी बाघ प्रजाति भी तेज़ी से विलुप्त होने की ओर बढ़ रही है। संगठन का कहना है कि सरकारी और गैरसरकारी संरक्षण प्रयासों के बावजूद विपरीत परिस्थितियां निरीह प्राणियों की जान ले रही हैं। बाघों और शेरों की जान कई बार अभयारण्यों में बाढ़ का पानी भर जाने से चली जाती है, तो कई बार सुरक्षित स्थानों की ओर भागने के प्रयास में वे वाहनों से कुचले जाते हैं या शिकारियों का निशाना बन जाते हैं।

भारतीय वन्यजीव संस्थान ने आज से तीस साल पहले एक अध्ययन में बताया था कि एशियाई शेरों में अंत:जननके चलते आनुवंशिक बीमारी हो सकती है। अगर ऐसा हुआ, तो इन शेरों की मौत हो जाएगी और उसके चलते एशिया से शेरों का अस्तित्व भी खत्म हो सकता है। बीमारी से आहिस्ताआहिस्ता लेकिन कम समय में ये सभी शेर मारे जा सकते हैं। इसी आशंका के चलते वन्यजीव संस्थान ने सरकार को इन शेरों में से कुछ शेरों को किसी दूसरे जंगल में स्थानांतरित करने की योजना बनाकर दी थी। संस्थान का मानना था कि अंत:जनन के चलते अगर एक जगह किसी बीमारी से शेरों की नस्ल नष्ट हो जाती है, तो दूसरी जगह के शेर अपनी नस्ल और अस्तित्व को बचा लेंगे। गुजरात के एक जीव विज्ञानी रवि चेल्लम ने भी 1993 में कहा था कि दुर्लभ प्रजाति के इन शेरों को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें किसी और जगह पर भी बसाना ज़रूरी है।

बहरहाल डब्ल्यू.डब्ल्यू.एफ. की सलाह और एशियाई शेरों पर हुए शोधों के आधार पर भारतीय वन्यजीव संस्थान ने साल 1993-94 में पूरे देश में सर्वेक्षण के बाद कुछ शेरों को मध्य प्रदेश के कूनोपालपुर अभयारण्य में शिफ्ट करने की योजना बनाई। इन शेरों के पुनर्वास के लिए तत्कालीन केंद्र सरकार और भारतीय वन्यजीव संस्थान के सहयोग से मध्य प्रदेश में 1996-97 से एक कार्य योजना प्रारंभ की गई। लेकिन गुजरात सरकार अपने शेर ना देने पर अड़ गई। गुजरात सरकार की दलील है कि कूनोपालपुर का पारिस्थितिकी तंत्र एशियाई शेर के अनुकूल नहीं है और यदि वहां शेर स्थानांतरित किए गए, तो मर जाएंगे। यह आशंका पूरी तरह से निराधार है। कूनोपालपुर अभयारण्य में शेरों की इस प्रजाति के लिए हर तरह का माकूल माहौल है। साल 1981 में स्थापित कूनोपालपुर वनमंडल 1245 वर्ग कि.मी. में फैला हुआ है। इसमें से 344 वर्ग कि.मी. अभयारण्य का क्षेत्र है। इसके अलावा 900 वर्ग कि.मी. क्षेत्र अभयारण्य के बफर ज़ोन में आता है।

गुजरात सरकार की हठधर्मिता का ही नतीजा था कि मध्य प्रदेश सरकार को आखिरकार अदालत का रुख करना पड़ा। इस मामले में राज्य सरकार ने साल 2009 में एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की। जिसमें उसने एशियाई शेरों को कूनोपालपुर अभयारण्य लाने की मांग की। उच्चतम न्यायालय में चली लंबी सुनवाई के बाद फैसला आखिरकार मध्य प्रदेश सरकार के हक में हुआ। अप्रैल, 2013 में अदालत ने गुजरात सरकार की तमाम दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि इस प्रजाति के अस्तित्व पर खतरा है और इनके लिए दूसरे घर की ज़रूरत है। लिहाज़ा एशियाई शेरों को गुजरात से मध्य प्रदेश लाकर बसाया जाए। अदालत ने इस काम के लिए सम्बंधित वन्यजीव अधिकारियों को छह महीने का समय दिया था। लेकिन अफसोस, सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद भी गुजरात सरकार ने अपनी जिद नहीं छोड़ी और मध्य प्रदेश को शेर देने से साफ इंकार कर दिया। इस मामले में गुजरात सरकार ने शीर्ष अदालत में पुनरीक्षण याचिका दायर कर रखी है। दूसरी ओर, हकीकत यह है कि पिछले ढाई साल में 200 से ज़्यादा शेरों की मौत हो चुकी है। इनमें कई मौतें अप्राकृतिक हैं। सरकार का यह दावा पूरी तरह से खोखला निकला है कि गिर के जंगलों में शेर पूरी तरह से महफूज़ है। दुर्लभ एशियाई शेर भारत और दुनिया भर में बचे रहें, इसके लिए समन्वित प्रयास बेहद ज़रूरी हैं। एशियाई शेर ज़िद से नहीं, बल्कि जज़्बे से बचेंगे। जज़्बा यह होना चाहिए कि किसी भी हाल में हमें जंगल के इस बादशाह को बचाना है। गुजरात सरकार अपनी ज़िद छोड़े और इन शेरों में से कुछ शेर तुरंत कूनोपालपुर को स्थानांतरित करे, तभी जाकर शेरों की यह दुर्लभ प्रजाति हमारे देश में बची रहेगी।(स्रोत फीचर्स)

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खतरे में है ओरांगुटान की नई प्रजाति – डॉ. विपुल कीर्ति शर्मा

रांगुटान हमारे करीबी रिश्तेदार हैं क्योंकि इनका जीनोम और मानव जीनोम 96.4 प्रतिशत समान है। ये अपने खास लाल फर के लिए पहचाने जाते हैं तथा पेड़ों पर रहने वाले सबसे बड़े स्तनधारी हैं। ये लंबी तथा शक्तिशाली भुजाओं से एक से दूसरे पेड़ पर छलांग लगाते हैं और इस दौरान हाथ और पैरों से मज़बूत पकड़ बनाए रखते हैं।

ब्रुनेई, इंडोनेशिया, मलेशिया तथा सिंगापुर में बोली जाने वाली मलय भाषा में ओरांगुटान का मतलब होता है जंगल का मानव। ये निचले भूभाग के जंगलों में अकेले रहना पसंद करते हैं। लीची, मैंगोस और अंजीर जैसे जंगली फल इनकी खुराक हैं। रात होने के पूर्व ये वृक्ष की शाखाओं का घोंसला बनाकर सोते हैं। 90 कि.ग्रा. के भारी भरकम नर ओरांगुटान को उनके गालों के गद्दे (फ्लेंज) तथा ज़ोरदार लंबी आवाज लगाने के लिए गले की थैली से आसानी से पहचाना जा सकता है।

ब्रुनेई तथा सुमात्रा में पाए जाने वाले ओरांगुटान व्यवहार तथा दिखने में कुछ भिन्न होते हैं। सुमात्रा के ओरांगुटान के परिवार में सदस्यों का एकदूसरे से जुड़ाव ज़्यादा होता है तथा चेहरे के बाल लंबे होते हैं। ब्रुनेई के ओरांगुटान पेड़ों को छोड़कर बेझिझक ज़मीन पर भी आ जाते हैं। हाल ही के वर्षों में दोनों प्रजातियों की आबादी में बेहद ज़्यादा गिरावट देखी गई है। एक शताब्दी पूर्व ही ब्रुनेई तथा सुमात्रा में इनकी संख्या 2,30,000 थी। अब ब्रुनेई में कुल जमा 1,04,700 तथा सुमात्रा में लगभग 7500 ओरांगुटान बचे हैं और इन्हें क्रमश: संकटग्रस्त व लुप्तप्राय श्रेणियों में रखा गया है। 2017 में तपानुली ओरांगुटान के नाम की नई प्रजाति उत्तरी सुमात्रा से खोजी गई है जिनकी संख्या केवल 800 है। यह वनमानुषों में सबसे कम है। नई प्रजाति सुमात्रा के बटांग तोरू के परिस्थितिक तंत्र में 1225 वर्ग कि.मी. के ऊंचाई पर स्थित घने जंगलों में पेड़ों पर मिलती है। ऐसा अनुमान है कि लगभग 10-20 हज़ार साल पहले ही बाकी ओरांगुटान प्रजातियों से अलग होकर तपानुली ओरांगुटान प्रजाति अस्तित्व में आई है। इनके आवास का क्षेत्रफल छोटा, बिखरा हुआ तथा संरक्षण से वंचित रहा है। इनके आवास क्षेत्र के अधिकांश हिस्से कृषि, सड़क या रेल मार्ग, शिकार, पनबिजली परियोजनाओं तथा बाढ़ के कारण सिकुड़ गए हैं।

यद्यपि इक्कीसवीं सदी में वनमानुष की नई प्रजाति खोजना उत्साहजनक है परंतु इनको संरक्षित करने की कार्रवाई तुरंत की जानी चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि नई खोजी गई प्रजाति हमारे सामने ही विलुप्त हो जाए। (स्रोत फीचर्स)

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सबसे बड़ा जीव 770 हैक्टर बड़ा है

1980 के दशक के अंत में, शोधकर्ताओं ने मिशिगन के ऊपरी प्रायद्वीप पर एक विशालकाय फफूंद की खोज की थी। आर्मिलेरिया गैलिका नामक यह फफूंद आकार में किसी मॉल के बराबर थी और 37 हैक्टर क्षेत्र में फैली थी। इसे दुनिया का सबसे बड़ा जीव माना गया। लेकिन हाल में वैज्ञानिकों ने एक और आर्मिलेरिया गैलिका फफूंद खोजी है जो पिछली खोज से लगभग चार गुना बड़ी और उससे दुगनी उम्र की है। यह फफूंद हनी मशरूम को जन्म देती है।

अन्य फफूंद की तरह आर्मिलेरिया पतले भूमिगत धागों के रूप में पनपती है। लेकिन अधिकांश फफूंद के विपरीत, ये धागे जूते के फीतों जैसी मोटीमोटी रस्सियां बना लेते हैं जो मृत या कमज़ोर लकड़ी का उपभोग करते हुए काफी दूरी तक फैलते जाते हैं। विशाल भूमिगत नेटवर्क का पता लगाने के लिए वैज्ञानिकों ने दूर तक फैले 245 ऐसे रेशों के नमूनों का जेनेटिक विश्लेषण किया।  बायोआरकाईव में प्रकाशित पर्चे के अनुसार इस जांच में पाया गया कि ये दूरदूर फैले रेशे एक ही फफूंद के हिस्से थे। इसके तेज़ी से बढ़ने के आधार पर अनुमान लगाया गया कि यह फफूंद कम से कम 2500 वर्ष पुरानी है।

शोधकर्ताओं ने 15 समान रूप से वितरित नमूनों के जीनोम को अनुक्रमित करके देखा कि हनी मशरूम में समय के साथ बदलाव कैसे होता है। उन्हें जीनोम के 10 करोड़ क्षारों में से केवल 163 आनुवंशिक परिवर्तन देखने को मिले जो काफी धीमी गति है। उत्परिवर्तन की दर से यह पता लगाया जाता है कि एक जीव कितनी तेज़ी से विकसित हो सकता है। शोधकर्ता उत्परिवर्तन की इतनी धीमी दर को लेकर असमंजस में हैं और अभी यह नहीं कह सकते कि उत्परिवर्तनों पर अंकुश कैसे लगाया जा रहा है। वैसे उन्हें लगता है कि एक भलीभांति विकसित डीएनए मरम्मत की व्यवस्था या फिर भूमिगत रहते हुए सूरज की रोशनी से दूर रहना उत्परिवर्तन की धीमी दर का एक कारण हो सकता है।

यह अब दुनिया का सबसे पुराना और सबसे बड़ा जीव है जिसकी उम्र 8000 वर्ष से भी अधिक है और यह 770 हैक्टर के लंबेचौड़े क्षेत्र में फैला है। (स्रोत फीचर्स)

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