कोविड के स्रोत की जांच अभी भी जारी

विगत 9 फरवरी को वुहान में आयोजित पत्रकार वार्ता में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) की टीम ने कोरोनावायरस की उत्पत्ति पर महीने भर की जांच के अपने निष्कर्ष प्रस्तुत किए हैं। अपनी रिपोर्ट में शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला से वायरस के गलती से लीक होने के विवादास्पद सिद्धांत को निरस्त कर दिया है। उनका अनुमान है कि सार्स-कोव-2 ने किसी जीव से मनुष्यों में प्रवेश किया है। यह अन्य शोधकर्ताओं के निष्कर्षों से मेल खाता है। टीम ने अपनी रिपोर्ट में चीन सरकार और मीडिया द्वारा प्रचारित दो अन्य परिकल्पनाएं भी प्रस्तुत की हैं: यह वायरस या इसका कोई पूर्वज चीन के बाहर किसी जीव से आया और एक बार लोगों में फैलने पर यह फ्रोज़न वन्य जीवों और अन्य कोल्ड पैकेज्ड सामान में भी फैल गया।

अलबत्ता, रिपोर्ट पर अन्य शोधकर्ताओं की प्रतिक्रिया मिली-जुली रही है। वाशिंगटन स्थित जॉर्जटाउन युनिवर्सिटी की वायरोलॉजिस्ट एंजेला रैसमुसेन के अनुसार वायरस उत्पत्ति सम्बंधी निष्कर्ष दो सप्ताह में दे पाना संभव नहीं है। हालांकि ये निष्कर्ष चीन सरकार के सहयोग से एक लंबी जांच का आधार तो बनाते ही हैं। कुछ शोधकर्ताओं के अनुसार चीनी और अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिकों की इस टीम ने गंभीर सवाल उठाए हैं और व्यापक रूप से डैटा का भी अध्ययन किया है। आने वाले समय में अधिक विस्तृत रिपोर्ट की उम्मीद की जा सकती है।

लेकिन कुछ अन्य वैज्ञानिकों के अनुसार यह जांच कोई नई जानकारी प्रदान नहीं करती। इस रिपोर्ट में वायरस के किसी जंतु के माध्यम से फैलने के प्रचलित नज़रिए की ही बात कही गई है। इसके अलावा रिपोर्ट में चीनी सरकार द्वारा प्रचारित दो परिकल्पनाओं पर ज़ोर दिया गया है। साथ ही चीन में ‘कोल्ड फूड चेन’ के माध्यम से शुरुआती संक्रमण फैलने का विचार भी सीमित साक्ष्यों पर आधारित है। हालांकि, वैज्ञानिकों का मानना है कि टीम के पास अभी भी ऐसी जानकारी हो सकती है जिसे सार्वजनिक नहीं किया गया है। इस विषय में डबल्यूएचओ टीम के सदस्य और मेडिकल वायरोलॉजिस्ट डोमिनिक डायर का अनुमान है कि कोरोनावायरस का संक्रमण चीनी बाज़ारों में दूषित मछली और मांस के कारण फैला है जिसकी अधिक जानकारी लिखित रिपोर्ट में प्रस्तुत की जाएगी।

डबल्यूएचओ ने वायरस के प्रयोगशाला से लीक होने के विचार पर भी अध्ययन किया है। इस बारे में अध्ययन के प्रमुख और खाद्य-सुरक्षा एवं ज़ूनोसिस विशेषज्ञ पीटर बेन एम्बरेक ने इस संभावना को खारिज किया है। क्योंकि वैज्ञानिकों के पास दिसंबर 2019 के पहले इस वायरस की कोई जानकारी नहीं थी इसलिए प्रयोगशाला से लीक होने का विचार बेतुका है। इसके साथ ही टीम को प्रयोगशाला में किसी प्रकार की दुर्घटना के भी कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं। हालांकि टीम ने प्रयोगशाला की फॉरेंसिक जांच नहीं की है।                      

कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार यह निष्कर्ष वुहान में हुई घटनाओं को तो ठीक तरह से प्रस्तुत करते हैं लेकिन महामारी के बढ़ने और इसके राजनीतिकरण होने की वजह से प्रयोगशाला से वायरस के लीक होने और प्राकृतिक उत्पत्ति के सिद्धांतों के बीच टकराव अधिक गहरा हो गया है और टीम इसे सुलझाने में नाकाम रही है।

गौरतलब है कि टीम द्वारा अधिकांश जांच वुहान में वायरस के फैलने के शुरुआती दिनों पर केंद्रित है और रिपोर्ट में शहर के शुरुआती संक्रमण के समय को चित्रित करने का प्रयास किया गया है। टीम ने वर्ष 2019 की दूसरी छमाही में वुहान शहर और हुबेई प्रांत के स्वास्थ्य रिकॉर्ड का अध्ययन किया है। इसमें इन्फ्लुएंज़ा जैसी बीमारियों के असामान्य उतार-चढ़ावों पर ध्यान दिया गया है और यह देखा गया कि वहां खांसी-जुकाम की औषधियों की बिक्री में किस तरह के बदलाव आए थे। विशेष रूप से निमोनिया से सम्बंधित मौतों की तलाश की गई है। इसके अलावा टीम ने सार्स-कोव-2 वायरल आरएनए का पता लगाने के लिए 4500 रोगियों के नमूनों की जांच की और वायरस के विरुद्ध एंटीबॉडी के लिए रक्त के नमूनों का विश्लेषण किया। इन सभी जांचों में शोधकर्ताओं को वायरस के दिसंबर 2019 के पहले फैलने के कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं।

फिर भी डायर का मानना है कि संक्रमण के स्पष्ट संकेतों की कमी का मतलब यह नहीं कि वायरस समुदाय में पहले ही फैल नहीं चुका था। देखा जाए तो टीम का विश्लेषण सीमित डैटा और एक ऐसी निगरानी प्रणाली पर आधारित था जो किसी नए वायरस के फैलाव को पकड़ पाने के लिए तैयार नहीं की गई थी। वायरस के फैलाव का सही तरह से आकलन करने के लिए शोधकर्ताओं को न केवल स्वास्थ्य केंद्रों में, बल्कि समुदाय स्तर पर अध्ययन करना होगा।

इसके अलावा टीम ने इस वायरस के पीछे एक जंतु को ज़िम्मेदार तो ठहराया है लेकिन संभावित जंतुओं की पहचान नहीं कर पाई है। चीनी शोधकर्ताओं ने देश के कई घरेलू, पालतू और जंगली जीवों का परीक्षण किया था लेकिन ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिल पाया था कि इन प्रजातियों में वायरस मौजूद है। लेकिन यदि इस महामारी को प्राकृतिक संचरण की घटना मानते हैं तो भविष्य में भी जीवों से मनुष्यों में वायरस संचरण की घटनाओं की संभावना बनी रहेगी।

टीम ने कहा है कि वुहान और आसपास के क्षेत्रों में जांच जारी रखना चाहिए। इसमें विशेष रूप से शुरुआती मामलों को ट्रैक करने का प्रयास करना चाहिए ताकि महामारी की शुरुआत का पता लगाने में मदद मिले। टीम के मुताबिक, ज़रूरत इस बात की है कि वुहान प्रांत और अन्य क्षेत्रों में ब्लड बैंक से पुराने नमूनों का विशेषण किया जाए जिनमें संक्रमण का पता लगाने के लिए एंटीबॉडी परीक्षण भी शामिल हों। इसके साथ ही फ्रोज़न वन्य जीवों की संभावित भूमिका का पता लगाने के लिए और अधिक अध्ययन करने की ज़रूरत है। जंतु स्रोत की संभावना का पता लगाने के लिए भी व्यापक परीक्षण करना होंगे।

हाल ही में जापान, कंबोडिया और थाईलैंड के चमगादड़ों में सार्स-कोव-2 से सम्बंधित कोरोनावायरस के मिलने की खबर है। ऐसे में डबल्यूएचओ की टीम ने चीन के बाहर वायरस उत्पत्ति की खोज करने की भी सिफारिश की है। इस विषय पर नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार जून 2020 में थाईलैंड की गुफाओं में पाए जाने वाले हॉर्सशू चमगादड़ में नया कोरोनावायरस मिला है जिसे RaTG203 नाम दिया गया है। इस वायरस का 91.5 प्रतिशत जीनोम सार्स-कोव-2 से मेल खाता है। इसी तरह के नज़दीक से सम्बंधित अन्य वायरसों का पता चला है। इससे यह कहा जा सकता है कि दक्षिण-पूर्वी एशिया में इस महामारी वायरस के करीबी सम्बंधी अभी भी उपस्थित है।

इसके अलावा शोधकर्ताओं ने कंबोडिया और जापान में संग्रहित फ्रोज़न चमगादड़ों के नमूनों में सार्स-कोव-2 से सम्बंधित कई अन्य कोरोनावायरस की पहचान की है। सार्स-कोव-2 का सबसे करीबी सम्बंधी RaTG13 चीन में पाया गया है। इसका लगभग 96 प्रतिशत जीनोम सार्स-कोव-2 से मेल खाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि चीन में किए गए अध्ययन जितना पैसा और मेहनत दक्षिण-पूर्वी एशिया में लगाए जाएं तो वायरस का और अधिक गहराई से पता लगाया जा सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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दूसरों के सपनों में ताक-झांक की कोशिश

र्ष 2010 में क्रिस्टोफर नोलन द्वारा निर्देशित एक फिल्म आई थी इंसेप्शन। इसमें लियोनार्डो डीकैप्रियो दूसरों के सपनों में जाकर, उनसे बातचीत कर उनसे खुफिया जानकारी उगलवाते दिखते हैं। और यह फिल्मी कल्पना अब हकीकत बनने की ओर कदम बढ़ाती दिखती है।

शोधकर्ताओं ने पहली बार सवालों के माध्यम से सपना देखने वाले उन लोगों के साथ सपनों में संवाद साधा है जिन्हें ये पता होता है कि वे सपना देख रहे हैं। ऐसे लोगों को ल्यूसिड ड्रीमर कहते हैं। चार अलग-अलग प्रयोगशालाओं में 36 प्रतिभागियों पर किए गए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि लोग सोते समय बाहरी परिवेश से संकेत ग्रहण कर सकते हैं और उन पर प्रतिक्रिया दे सकते हैं।

यह अध्ययन नींद की मूलभूत परिभाषा को भी चुनौती देता है, जो कहती है कि नींद एक ऐसी अवस्था है जिसमें मस्तिष्क का बाहरी परिवेश से संपर्क नहीं रहता और नींद में मस्तिष्क अपने आस-पास के परिवेश से अनभिज्ञ रहता है।

ल्यूसिड ड्रीमिंग एक ऐसी अवस्था है जिसमें सपने में व्यक्ति को एहसास होता है कि वह सपना देख रहा है, और अपने सपनों पर उसका कुछ हद तक नियंत्रण भी होता है। ल्यूसिड ड्रीमिंग का उल्लेख सबसे पहले चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में ग्रीक दार्शनिक अरस्तू के लेखन में मिलता है। और 1970 के बाद से वैज्ञानिक इस पर अध्ययन करते रहे हैं। देखा गया है कि प्रत्येक दो में से एक व्यक्ति को कम से कम एक बार तो ल्यूसिड ड्रीमिंग का अनुभव होता है, और लगभग 10 प्रतिशत लोगों को महीने में एक या उससे अधिक बार ल्यूसिड ड्रीमिंग अनुभव होता है। हालांकि ल्यूसिड ड्रीमिंग दुर्लभ है लेकिन प्रशिक्षण देकर इसके अनुभव को बढ़ाया जा सकता है।

पूर्व में कुछ अध्ययनों में रोशनी, बिजली के झटकों और ध्वनियों के माध्यम से लोगों के सपनों में प्रवेश कर उनसे संवाद करने की कोशिश की गई थी, लेकिन उनमें संपर्क करने पर लोगों की तरफ से बहुत कम प्रतिक्रिया मिली थी, और उनसे जटिल जानकारियां या सूचनाएं भी नहीं हासिल हो सकी थीं।

फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड और संयुक्त राज्य अमेरिका स्थित चार प्रयोगशालाओं के दल ने पूर्व में हुए इन अध्ययनों को आगे बढ़ाने की सोची, जिसमें उन्होंने सवालों-संकेतों की मदद से सपनों में लोगों से दो-तरफा संवाद स्थापित किया। इसके लिए उन्होंने 36 प्रतिभागी चुने। इनमें से कुछ प्रतिभागियों को पहले ही ल्यूसिड ड्रीमिंग का अनुभव था, और कुछ को नहीं लेकिन उन्हें हफ्ते में कम से कम एक सपना याद रहता था।

शोधकर्ताओं ने सभी प्रतिभागियों को ल्यूसिड ड्रीमिंग से परिचित कराया और ध्वनियों, रोशनियों या उंगली की थाप के माध्यम प्रतिभागियों को सपना देखने के एहसास से वाकिफ होने के लिए प्रशिक्षित किया।

अध्ययन में अलग-अलग समय पर नींद के सत्र रखे गए थे। कुछ सत्र रात के थे और तो कुछ सत्र अल-सुबह रखे गए थे। प्रतिभागियों के साथ सपनों में संवाद करने के लिए चारों प्रयोगशालाओं ने अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल किया। प्रतिभागियों को कहा गया कि जब उन्हें एहसास हो जाए कि वे सपनों में प्रवेश कर गए हैं तो तय संकेतों (जैसे आंखो को बार्इं ओर तीन बार घुमाकर, चेहरा घुमाकर) के माध्यम से इसका संकेत दे दें।

प्रतिभागियों के नींद में पहुंचने पर वैज्ञानिकों ने उनके मस्तिष्क की गतिविधि, आंखों की गति और चेहरे की मांसपेशियों के संकुचन की निगरानी ईईजी हेलमेट की मदद से की। नींद के कुल 57 सत्रों में से, छह लोगों ने 15 बार यह संकेत दिए कि वे सपनों में प्रवेश कर गए हैं। इसके बाद शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों से कुछ सवाल किए जिनके जवाब या तो हां या ना में दिए जा सकते थे, या गणित के कुछ सवाल पूछे, जैसे आठ में से छह गए तो कितने बचे। इनका जवाब प्रतिभागियों को कुछ तय संकेतों के माध्यम से देना था – जैसे मुस्कराकर या त्यौरियां चढ़ा कर, या गणित का सवाल हल करने पर आए जवाब के बराबर संख्या में आंखों को हिलाकर वगैरह।

शोधकर्ताओं ने कुल 158 सवाल पूछे। करंट बायोलॉजी में प्रकाशित निष्कर्ष बताते हैं कि शोधकर्ताओं को 18.6 प्रतिशत सही जवाब मिले। 3.2 प्रतिशत सवालों के गलत जवाब मिले; 17.7 प्रतिशत जवाब स्पष्ट नहीं थे और 60.8 प्रतिशत सवालों के कोई जवाब नहीं मिले। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह संख्या दर्शाती है कि मुश्किल ही सही, लेकिन नींद में किसी व्यक्ति से संपर्क साधा जा सकता है, और दो-तरफा संवाद किया जा सकता है।

प्रतिभागियों के जागने के बाद उनसे उनके सपनों का वर्णन भी पूछा गया। कुछ प्रतिभागियों को पूछे गए सवाल उनके सपनों के हिस्से के रूप में याद रहे थे। एक प्रतिभागी को लगा था कि सपने में सवाल कोई कार रेडियो पूछ रहा है, तो एक अन्य प्रतिभागी को सवाल किसी सूत्रधार की आवाज़ में सुनाई पड़ा।

शोधकर्ताओं का कहना है कि यह प्रयोग सपनों का अध्ययन करने का एक बेहतर तरीका प्रदान करता है। अब तक सपनों के बारे में जानने का आधार सपना देखने वाले द्वारा दिए गए विवरण थे, जिनमें गड़बड़ की उम्मीद रहती थी। उम्मीद है कि भविष्य में इस तकनीक से सदमे, अवसाद से गुज़र रहे लोगों के सपनों को प्रभावित कर इस स्थिति से उबरने में उनकी मदद की जा सकेगी। इसके अलावा सपनों में ‘संवाद’ कर लोगों की समस्याओं को हल करने, नए कौशल सीखने या किसी रचनात्मक विचार को लाने में भी मदद मिल सकेगी। वैसे यह तकनीक व्यक्ति द्वारा दिए गए विवरण की पूरक ही है। (स्रोत फीचर्स)

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गर्माती दुनिया में अलग-अलग जंतुओं पर प्रभाव

न्नीसवीं सदी की शुरुआत में, जोसेफ ग्रिनेल और उनके दल ने कैलिफोर्निया के जंगलों, पहाड़ों और रेगिस्तानों का और वहां के जंतुओं का बारीकी से सर्वेक्षण किया था। कैलिफोर्निया तट से उन्होंने पॉकेट चूहों को पकड़ा और गिद्धों की उड़ान पर नज़र रखी; मोजेव रेगिस्तान में अमेरिकी छोटे बाज़ (खेरमुतिया) को कीटों पर झपट्टा मारते देखा और चट्टानों के बीच छिपे हुए कैक्टस चूहों को पकड़ा। इसके अलावा भी उन्होंने वहां से कई नमूने-जानकारी एकत्रित कीं, विस्तृत नोट्स बनाए, तस्वीरें खीचीं और इन जगहों का नक्शा तैयार किया। इस तरह उनके द्वारा एकत्रित “ग्रिनेल-युग” का फील्ड डैटा काफी विस्तृत है।

और अब, आधुनिक सर्वेक्षणों के डैटा की तुलना ग्रिनेल-युग के डैटा से करके पारिस्थितिकीविदों ने बताया है कि जलवायु परिवर्तन सभी जीवों को समान रूप से प्रभावित नहीं कर रहा है। वैज्ञानिक मानते आए हैं कि तापमान में वृद्धि पक्षियों और स्तनधारियों को एक जैसा प्रभावित करती है क्योंकि दोनों को ही शरीर का तापमान बनाए रखना होता है। लेकिन लगता है कि ऐसा नहीं है।

पिछली एक शताब्दी में मोजेव के तापमान में लगभग दो डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है जिसके कारण वहां के पक्षियों की कुल संख्या और उनकी प्रजातियों की संख्या में नाटकीय कमी आई है। लेकिन इन्हीं हालात में छोटे स्तनधारी जीव (जैसे पॉकेट चूहे) अपने आपको बनाए रखने में सफल रहे हैं। शोधकर्ताओं ने साइंस पत्रिका में बताया है कि ये चूहे निशाचर जीवन शैली और गर्मी से बचाव के लिए सुरंगों में रहने की आदत के कारण मुश्किल परिस्थितियों में भी जीवित रह पाए हैं।

ग्रिनेल ने जिन जीवों का अध्ययन किया था, वे अब तुलनात्मक रूप से गर्म और शुष्क जलवायु में रहने को मजबूर हैं। पूर्व में प्रोसिडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ में प्रकाशित इन स्थलों के पुनर्सर्वेक्षण में पता चला था कि प्रत्येक स्थान पर रेगिस्तानी पक्षियों (जैसे अमरीकी छोटे बाज़ या पहाड़ी बटेर) की लगभग 40 प्रतिशत प्रजातियां विलुप्त हो गर्इं हैं। और अधिकतर स्थानों पर शेष प्रजातियों की सदस्य संख्या भी बहुत कम रह गई है। लेकिन आयोवा स्टेट युनिवर्सिटी के फिज़ियोलॉजिकल इकॉलॉजिस्ट एरिक रिडेल का अध्ययन चूहों, माइस, चिपमंक्स और अन्य छोटे स्तनधारियों के संदर्भ में थोड़ी आशा जगाता है।

उन्होंने अपने अध्ययन में पाया है कि ग्रिनेल के सर्वेक्षण के बाद से अब स्तनधारियों की तीन प्रजातियों के जीवों संख्या में कमी आई है, 27 प्रजातियां स्थिर है, और चार प्रजातियों की संख्या में वृद्धि हुई है। यह जानने के लिए कि बदलती जलवायु में पक्षी इतने अधिक असुरक्षित क्यों हैं, रिडेल ने रेगिस्तानी पक्षियों की 50 प्रजातियों और 24 विभिन्न छोटे स्तनधारी जीवों के संग्रहालय में रखे नमूनों के फर और पिच्छों में ऊष्मा स्थानांतरण और प्रकाश अवशोषण को मापा। फिर, इस तरह प्राप्त डैटा और सम्बंधित प्रजातियों के व्यवहार और आवास का डैटा उन्होंने एक कंप्यूटर प्रोग्राम में डाला, जो यह बताता था कि कोई जानवर कितनी गर्मी सहन कर सकता है, और विभिन्न तापमान वाली परिस्थितियों में कोई जानवर खुद को कितना ठंडा रख सकता है। जैसे पक्षी रक्त नलिकाओं को फैला कर, पैरों या मुंह के ज़रिए पानी को वाष्पित कर अपने शरीर का तापमान नियंत्रित रखते हैं। पक्षियों में खुद को ठंडा बनाए रखने की लागत स्तनधारियों की तुलना में तीन गुना अधिक होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अधिकांश छोटे स्तनधारी दिन के सबसे गर्म समय में ज़मीन के नीचे सुरंगों या बिलों में वक्त बिताते हैं। इस तरह के व्यवहार से वुडरैट जैसे स्तनधारी जीव को भी जलवायु परिवर्तन का सामना करने में मदद मिली है, जबकि वुडरैट रेगिस्तान में जीने के लिए अनुकूलित भी नहीं हैं। केवल वे स्तनधारी जो बहुत गहरे की बजाय ज़मीन में थोड़ा ऊपर ही अपना बिल बनाते हैं, वे ही बढ़ते तापमान का सामना करने में असफल हैं, जैसे कैक्टस माउस।

इसके विपरीत कई पक्षी, जैसे अमरीकी छोटा बाज़ और प्रैयरी बाज़ पर बढ़ते तापमान का बुरा असर है। यह मॉडल स्पष्ट करता है कि क्यों पक्षी और स्तनधारी जलवायु परिवर्तन पर अलग-अलग प्रतिक्रिया देते हैं।

परिणाम सुझाते हैं कि जलवायु परिवर्तन का रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र पर भी उसी तरह का खतरा है जैसा कि तेज़ी से गर्म होते आर्कटिक के पारिस्थितिकी तंत्र पर है।

भविष्य में स्तनधारियों को भी खतरा हो सकता है। मिट्टी की पतली परत केवल दो प्रतिशत रेगिस्तान में है, जिसके अधिक शुष्क होने की संभावना है। इसलिए अब विविध सूक्ष्म आवास वाले क्षेत्रों को संरक्षित करना चाहिए। ऐसे मॉडल संरक्षण की योजना बनाने में मदद कर सकते हैं। जो प्रजातियां जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से लड़ने में सक्षम हैं उनके संरक्षण की बजाय विलुप्त होती प्रजातियों को संरक्षित कर धन और समय दोनों की बचत होगी। (स्रोत फीचर्स)

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महामारी में वैज्ञानिक मांओं ने अधिक चुनौतियां झेलीं

मार्च 2020 में मिशिगन विश्वविद्यालय की कैंसर विज्ञानी रेशमा जग्सी ने कोविड-19 महामारी के महिला वैज्ञानिकों के काम पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव के बारे में पूर्वानुमान लगाते हुए एक राय लिखी थी। डैटा न होने के कारण संपादकों ने इस राय को प्रकाशित करने से मना कर दिया था। लेकिन इसके बाद से कई टिप्पणीकार यही बात दोहराते आए हैं। अब अध्ययन से प्राप्त प्रमाणों से स्पष्ट हो गया है कि कोविड-19 महामारी में पहले से व्याप्त असमानताएं और बढ़ गर्इं हैं, इस दौर ने महिला वैज्ञानिकों के लिए नई चुनौतियां खड़ी की हैं। खासकर जिन महिला वैज्ञानिकों के बच्चे हैं उन्होंने अपना अनुसंधान कार्य करते रहने के लिए अतिरिक्त संघर्ष किया है।

कुछ विषयों में किए गए अध्ययन के डैटा से पता चलता है कि कोरोना महामारी के शुरुआती महीनों में भेजे गए प्रीप्रिंट्स, पांडुलिपियों, और प्रकाशित शोधपत्रों में महिला लेखकों की संख्या में कमी आई है। 20,000 शोधकर्ताओं पर वैश्विक स्तर पर किए गए सर्वेक्षण में पाया गया है कि इस दौरान पिता-वैज्ञानिकों की तुलना में माता-वैज्ञानिकों के अनुसंधान कार्यों के घंटों में 33 प्रतिशत अधिक की कमी आई है। मई 2020 से जुलाई 2020 तक हुए सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि माता-वैज्ञानिकों ने पिता-वैज्ञानिकों की तुलना में अधिक घरेलू दायित्व निभाए और बच्चों की देखभाल करने में अधिक समय बिताया।

लेकिन इस दौरान थोड़ी सकारात्मक बातें भी दिखीं। एक फंडिंग एजेंसी ने महामारी के दौरान बढ़ी लैंगिक असमानता को पहचाना और उसमें सुधार के प्रयास किए। दरअसल, फरवरी 2020 में केनेडियन स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान ने कोविड-19 सम्बंधी शोध कार्यों के लिए अनुदान की पेशकश की थी, जिसमें एजेंसी ने शोधकर्ताओं को प्रस्ताव भेजने के लिए महज़ 8 दिन की मोहलत दी थी। यह कनाडा में तालाबंदी के पहले की बात है। लेकिन उन्होंने देखा कि प्राप्त प्रस्तावों में से केवल 29 प्रतिशत प्रस्ताव ही महिला शोधकर्ताओं द्वारा भेजे गए थे, यह संख्या पूर्व में भेजे जाने वाले प्रस्तावों की संख्या से लगभग सात प्रतिशत कम थी।

संख्या में इतना अंतर देखने के बाद संस्थान के इंस्टीट्यूट ऑफ जेंडर एंड हेल्थ की निदेशक कारा तेनेनबॉम को लगा कि हमने कहीं कुछ गलती कर दी है। इसीलिए जब संस्थान ने दो महीने बाद कोविड-19 शोध कार्यों के लिए दोबारा प्रस्ताव मंगाए तो उन्होंने प्रस्ताव भेजने की समय सीमा को 8 दिन से बढ़ाकर 19 दिन कर दी और दस्तावेज़ी कार्रवाइयां भी कम कर दीं। प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ में के अनुसार दूसरे दौर में महिलाओं द्वारा भेजे गए प्रस्तावों की संख्या बढ़कर 39 प्रतिशत हो गई थी।

संस्थान द्वारा मांगे गए प्रस्तावों के संदर्भ में लावल युनिवर्सिटी की स्वास्थ्य शोधकर्ता होली विटमैन अपना अनुभव बताती हैं, “जब पहली बार मैंने प्रस्ताव भेजने की समय सीमा महज़ 8 दिन देखी तो मैंने सोचा कि दो बच्चों और अपनी स्वास्थ्य स्थिति के साथ इतने कम समय में अनुदान के लिए देर रात तक बैठकर प्रस्ताव लिखना और भेजना संभव नहीं है। लेकिन जब अनुदान के लिए दोबारा प्रस्ताव मांगे गए तो प्रस्ताव लिखने के लिए पर्याप्त समय था, जिसमें अंतत: मुझे अनुदान मिला भी।”

महामारी के दौर में अधिकांश शोधकर्ताओं के शोध कार्य के घंटों में कमी आई। ताज़ा अध्ययन बताते हैं कि पालक-शोधकर्ताओं, खासकर माता-शोधकर्ताओं के काम के घंटों में बहुत कमी आई है। पिता की तुलना में माताओं ने बच्चे की देखभाल और गृहकार्य करने में अधिक समय बिताया। इस संदर्भ में सान्ता क्लारा युनिवर्सिटी की रॉबिन नेल्सन बताती हैं कि पिछले साल की तुलना में कोरोनाकाल में उनके काम के घंटे घटकर आधे हो गए हैं क्योंकि उनके दो बच्चे अब घर पर होते हैं। कुछ शोधकर्ता अन्य की तुलना में अधिक बाधाओं में काम कर रहे हैं। इसलिए हमें अब अनुदान की प्रक्रिया, समय सीमा, नीतियों आदि पर सवाल उठाने चाहिए।

बोस्टन विश्वविद्यालय के इकॉलॉजिस्ट रॉबिन्सन फुलवाइलर का कहना है कि विश्वविद्यालयों और फंडिंग एजेंसियों को वैज्ञानिकों को यह बताने का भी विकल्प देना चाहिए कि कोविड-19 ने उनके काम में किस तरह की बाधा डाली या प्रभावित किया। इसके अलावा नियोक्ताओं को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी शोधकर्ताओं को ठीक-ठाक झूलाघर जैसी सुविधाएं मिलें। फुलवाइलर और अन्य माता-वैज्ञानिकों ने प्लॉस बायोलॉजी में इस तरह की व कई अन्य सिफारिशें की हैं। कोरोनाकाल में और स्पष्ट होती असमानता को अब दूर करने के प्रयास करने का वक्त है। (स्रोत फीचर्स)

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गर्भनाल में मिला माइक्रोप्लास्टिक – डॉ. विपुल कीर्ति शर्मा

माइक्रोप्लास्टिक प्लास्टिक के पांच मिलीमीटर से छोटे कण होते हैं। ये व्यावसायिक प्लास्टिक उत्पादन के दौरान और बड़े प्लास्टिक के टूटने से उत्पन्न होते हैं। रोज़मर्रा के जीवन में प्लास्टिक के अधिक इस्तेमाल के कारण माइक्रोप्लास्टिक ने पूरी पृथ्वी को अपनी चपेट में ले लिया है। प्रदूषक के रूप में माइक्रोप्लास्टिक पर्यावरण, मानव और पशु स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक हो सकता है।

हाल ही में वैज्ञानिकों ने गर्भवती महिलाओं के गर्भनाल में माइक्रोप्लास्टिक्स पाया है। यह बेहद चिंता का विषय है। नए शोध में गर्भनाल के नमूनों में अनेक प्रकार के सिंथेटिक पदार्थ भी पाए गए हैं। इटली में हुए एक अध्ययन में महिलाओं की प्रसूति में कोई जटिलता  नहीं पता चली है और इसलिए छोटे प्लास्टिक के कणों का शरीर पर प्रभाव निश्चित तौर पर अभी तक ज्ञात नहीं हो पाया है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि प्लास्टिक के रसायन गर्भस्थ शिशु की प्रतिरक्षा प्रणाली को नुकसान अवश्य पहुंचा सकते हैं।

रोम के फेटबेनफ्रेटेली के प्रसूति और स्त्री रोग विभाग के शोध प्रमुख एंटोनियो रागुसा तब आश्चर्यचकित हो गए जब उन्होंने बच्चों के जन्म के बाद माताओं द्वारा दान में दिए गए छह में से चार गर्भनाल में 12 माइक्रोप्लास्टिक टुकड़े पाए। अनुमान है कि माओं के शरीर में माइक्रोप्लास्टिक भोजन या सांस के साथ प्रवेश कर गए होंगे। अध्ययन के लिए प्रत्येक गर्भनाल से केवल तीन प्रतिशत ऊतक का नमूना लिया गया था, और उसमें भी इतनी अधिक मात्रा में माइक्रोप्लास्टिक टुकड़ों का मिलना बेहद गंभीर मामला है। शोध पत्र में कहा गया है कि सभी प्लास्टिक के कण रंगीन थे। तीन नमूनों को पॉलीप्रोपायलीन के रूप में पहचाना गया, जबकि अन्य नौ अन्य नमूनों के केवल रंग की पहचान ही संभव हो पाई।

एनवायरनमेंट इंटरनेशनल नामक जर्नल में प्रकाशित एक शोध में शोधकर्ताओं ने बताया है कि पिछली सदी में ही प्लास्टिक का वैश्विक उत्पादन प्रति वर्ष 32 करोड़ टन तक पहुंच गया था। उत्पादन में हुई 40 प्रतिशत की वृद्धि का उपयोग एकल-उपयोग पैकेजिंग के रूप में किया जाता है। उपयोग हो जाने पर इसे कचरे के रूप में फेंक दिया जाता है।

गर्भनाल गर्भस्थ शिशु से अपशिष्ट पदार्थ को निकालने के साथ-साथ बच्चे को ऑक्सीजन और पोषण भी प्रदान करता है। 10 माइक्रॉन (0.01 मि.मी.) के माइक्रोप्लास्टिक रक्त प्रवाह में पहुंचकर मां से गर्भस्थ शिशु में भी पहुंच जाते हैं। शरीर में पहुंचते ही ये माइक्रोप्लास्टिक्स शिशु के शरीर में प्रतिरक्षा तंत्र को सक्रिय करके प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया उत्तेजित करते हैं। माइक्रोप्लास्टिक्स पर्यावरणीय प्रदूषकों और प्लास्टिक योजक सहित अन्य रसायनों के वाहक के रूप में भी कार्य कर सकता है, जिससे शरीर को अत्यधिक हानि होती है। माइक्रोप्लास्टिक्स गर्भनाल के भ्रूण और मातृ दोनों हिस्सों में पाए गए थे। ये कण शिशुओं के शरीर में प्रवेश कर गए होंगे, हालांकि वैज्ञानिक शिशु के अंदर इनका पता लगाने में असमर्थ थे। भ्रूण पर माइक्रोप्लास्टिक्स के संभावित प्रभाव में भ्रूण की सामान्य वृद्धि कम हो जाना है। वैज्ञानिकों ने कहा है कि अध्ययन में शामिल दो अन्य महिलाओं के गर्भनाल में माइक्रोप्लास्टिक कणों का न पाया जाना बेहतर आहार, शरीर की कार्यिकी या बेहतर जीवन शैली का परिणाम हो सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या टीके की दूसरी खुराक में देरी सुरक्षित है?

सार्स-कोव-2 महामारी को नियंत्रित करने के प्रयासों में एक बड़ी समस्या टीकों की कमी और उसका वितरण है। ऐसे में कुछ वैज्ञानिकों ने दूसरी खुराक को स्थगित करने का सुझाव दिया है ताकि अधिक से अधिक लोगों को पहली खुराक मिल सके। अमेरिका में अधिकृत फाइज़र टीके की दो खुराकों के बीच 21 दिन और मॉडर्ना के लिए 28 दिन की अवधि तय की गई थी। अब सेंटर फॉर डिसीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन ने 42 दिन के अंतराल के निर्देश दिए हैं। ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी-एस्ट्राज़ेनेका द्वारा निर्मित टीके की दो खुराकों के बीच 12 सप्ताह के अंतराल का सुझाव दिया गया है और दावा है कि यह शायद बेहतर होगा। तो टीके की एक खुराक के बाद आप कितने सुरक्षित हैं और यदि दूसरी खुराक न मिले तो क्या होगा? ऐसे ही कुछ सवालों पर चर्चा।             

दो खुराक क्यों ज़रूरी?

वास्तव में टीकों को प्रतिरक्षा स्मृति बनाने की दृष्टि से तैयार किया जाता है। इसकी मदद से हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को हमलावर वायरसों की पहचान करने और उनसे बचाव करने की क्षमता मिलती है, भले ही प्रणाली ने पहले कभी इनका सामना न किया हो। अधिकांश कोविड टीके नए कोरोनावायरस स्पाइक प्रोटीन की प्रतियों के माध्यम से प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया विकसित करते हैं। दो खुराक देने का मतलब अधिक सुरक्षा प्रदान करना है। ड्यूक ह्यूमन वैक्सीन इंस्टिट्यूट के मुख्य परिचालन अधिकारी थॉमस डेनी के अनुसार पहली खुराक प्रतिरक्षात्मक स्मृति शुरू करती है, तो दूसरी खुराक इसे और ठोस बनाती है। उदाहरण के लिए फाइज़र टीके की एक खुराक से लाक्षणिक संक्रमण के जोखिम में लगभग 50 प्रतिशत की कमी आ सकती है जबकि मॉडर्ना टीके की एक खुराक से यह जोखिम 80 प्रतिशत कम हो जाता है। दोनों खुराकें मिलने पर दोनों टीकों के द्वारा जोखिम लगभग 95 प्रतिशत कम हो जाता है।      

42 दिन के अंतर अनुमति क्यों?

सीडीसी के अनुसार दो खुराकों के बीच 42 दिनों तक की अनुमति का निर्णय इस फीडबैक के आधार पर लिया गया है कि तारीखों का लचीलापन लोगों के लिए मददगार है। जहां यूके में दो खुराकों के बीच की अवधि को बढ़ाने का उद्देश्य अधिक लोगों का टीकाकरण करना है, वहीं सीडीसी का मानना है कि इससे दूसरी खुराक की जटिलता कम होगी। गौरतलब है कि अमेरिका में टीकाकरण देर से शुरू हुआ है और पहली खुराक मिलने के दो महीने बाद मात्र 3 प्रतिशत लोगों को ही दूसरी खुराक मिल पाई है। टीका निर्माता मांग को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं, ऐसे में पूरा टीकाकरण करने में कुछ समझौते तो करने ही होंगे। वैज्ञानिकों के अनुसार पर्याप्त मात्रा में टीके उपलब्ध होने पर अलग रणनीति अपनाई जा सकती है लेकिन फिलहाल उपलब्ध संसाधनों से ही काम चलाना होगा।           

42 दिनों तक आप कितने सुरक्षित हैं

फाइज़र और मॉडर्ना के परीक्षण के आकड़ों के अनुसार लोगों में पहली खुराक के लगभग 14 दिनों बाद सुरक्षा देखी गई है। इस दौरान टीकाकृत लोगों में मरीज़ों की संख्या में कमी और गैर-टीकाकृत लोगों में मरीज़ों की संख्या में वृद्धि देखी जा सकती है। देखा जाए तो दोनों ही टीकों की पहली खुराक कोविड के मामलों को रोकने में 50 प्रतिशत (फाइज़र) और 80 प्रतिशत (मॉडर्ना) प्रभावी थे। परीक्षण किए गए अधिकांश लोगों को दूसरी खुराक 21 या 28 दिन में मिली थी। बहुत थोड़े से लोगों (0.5 प्रतिशत) को 42 दिन इंतज़ार करना पड़ा। इतनी छोटी संख्या के आधार पर कोई निष्कर्ष निकालना कठिन है।    

क्या आंशिक प्रतिरक्षा अधिक खतरनाक वायरस पैदा करेगी?

चूंकि महामारी की शुरुआत में इस वायरस के विरुद्ध किसी तरह की प्रतिरक्षा नहीं थी इसलिए नए कोरोनावायरस के विकसित होने की संभावना बहुत कम थी। लेकिन वर्तमान में लाखों लोगों के संक्रमित होने और एंटीबॉडी विकसित होने से उत्परिवर्तित वायरसों के विकास की संभावना काफी बढ़ गई है। रॉकफेलर युनिवर्सिटी के रेट्रोवायरोलॉजिस्ट पॉल बीनियाज़ के अनुसार टीके किसी भी तरह लगाए जाएं, एंटीबॉडी के जवाब में वायरस विकसित होता ही है।

जिस तरह से एंटीबायोटिक दवाओं का पूरा कोर्स न करने पर एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी बैक्टीरिया विकसित होने लगते हैं, उसी तरह ठीक से टीकाकरण न होने पर आपका शरीर एंटीबॉडी-प्रतिरोधी वायरस के लिए स्वर्ग बन जाता है। लेकिन कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार नए-नए वायरसों के पैदा होने की गति सिर्फ प्रतिरक्षा प्रणाली के मज़बूत या कमज़ोर होने पर नहीं, बल्कि जनसंख्या में उपस्थित वायरस की कुल संख्या पर भी निर्भर करती है। बड़े स्तर पर टीकाकरण के बिना नए संस्करणों की संख्या बढ़ने का खतरा है।   

क्या पहली और दूसरी खुराक के बीच लंबा अंतराल टीके को अधिक प्रभावी बना सकता है?

ऐसी संभावना से इन्कार तो नहीं किया जा सकता। देखा जाए तो सभी कोविड टीके एक समान नहीं हैं और खुराक देने का तरीका भी विशिष्ट डिज़ाइन पर निर्भर करता है। कुछ टीके mRNA टीके अस्थिर आनुवंशिक सामग्री पर आधारित होते हैं, कुछ स्थिर डीएनए पर तो कुछ अन्य प्रोटीन अंशों पर निर्भर होते हैं। इनको छोटी वसा की बूंदों या फिर निष्क्रिय चिम्पैंज़ी वायरस के साथ दिया जाता है।

ऐसी भिन्नताओं को देखते हुए डीएनए आधारित ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राज़ेनेका टीके की दो खुराकों के बीच 12 सप्ताह के अंतराल के बाद भी प्रभाविता बनी रही। यह mRNA आधारित मॉडर्ना और फाइज़र की अनुशंसित अवधि की तुलना में लगभग तीन से चार गुना अधिक है। उम्मीद है कि समय के साथ-साथ शोधकर्ता टीके की खुराक देने की ऐसी योजना बना पाएंगे जो नैदानिक परीक्षणों के दौरान निर्धारित खुराक योजना से भिन्न होगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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फूलों की गंध खुद के लिए हानिकारक

ई फूलों में मीठी-मीठी गंध होती है जो परागणकर्ताओं को आकर्षित करती है और पौधे को अपनी अगली पीढ़ी तैयार करने में मदद करती है। लेकिन ये सुगंधित अणु यदि फूल की कोशिकाओं में जमा हो जाएं तो हानिकारक भी हो सकते हैं। इसलिए फूलों को ऐसी कुछ व्यवस्था करनी होती है कि यह गंध बाहर उड़ती रहे। हाल में नेचर केमिकल बायोलॉजी में प्रकाशित एक शोध पत्र में इस व्यवस्था का खाका प्रस्तुत हुआ है। सारे प्रयोग पेटुनिया के फूलों पर किए गए थे।

फूलों में गंध कुछ वाष्पशील कार्बनिक पदार्थों के कारण होती है। कोशिका में पैदा होने के बाद ये अणु कोशिका द्रव्य में से होते हुए कोशिका की झिल्ली और उसके आसपास मौजूद कोशिका भित्ती तक पहुंचते हैं। यहां से ये कोशिका के बाहर उपस्थित एक मोमी परत क्यूटिकल में पहुंच जाते हैं जहां से ये बाहर हवा में फैलकर सुगंध फैलाते हैं। ऐसा माना जाता था कि इन वाष्पशील अणुओं की यह यात्रा विसरण नामक क्रिया की बदौलत सम्पन्न होती है जिसमें अणु अधिक सांद्रता से कम सांद्रता की ओर बढ़ते हैं। लेकिन फिर 2015 में कंप्यूटर अनुकृति से पता चला कि यदि यह यात्रा सिर्फ विसरण के दम पर चले तो ये कार्बनिक अणु बहुत तेज़ी से कोशिका के बाहर नहीं निकल पाएंगे और अंदर बने रहे तो नुकसान करेंगे।

2017 में पर्ड्यू विश्वविद्यालय की जैव रसायनविद नतालिया डुडरेवा और उनके साथियों ने इस संतुलन को बनाए रखने की तकनीक का खुलासा किया था। उन्होंने पाया कि जब फूल खिलते हैं और गंध तीक्ष्ण हो जाती है, तो PhABCG1 नामक एक प्रोटीन की मात्रा बढ़ने लगती है। यदि इस प्रोटीन के जीन की अभिव्यक्ति कम हो जाए तो गंध-अणुओं का बाहर निकलना भी कम हो जाता है। ये अणु कोशिका में जमा होने लगते हैं और कोशिका की झिल्ली का क्षय होने लगता है। इसके आधार पर डुडरेवा का निष्कर्ष था कि गंध-अणुओं को झिल्ली के पार पहुंचाने का काम PhABCG1 करता है।

फिर डुडरेवा की टीम नो यह पता लगाया कि ये गंध-अणु फूल की पंखुड़ी में कहां अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। पता चला कि इनमें से अधिकांश (लगभग 50 प्रतिशत) पंखुड़ियों की क्यूटिकल में जमा होते हैं। जब शोधकर्ताओं ने किसी प्रकार से मोम में से पार पहुंचाने वाले प्रोटीन PhABCG12 की मात्रा कम कर दी तो फूल की क्यूटिकल की मोटाई कम हो गई। और इसके साथ ही गंध-अणुओं का उत्सर्जन भी कम हो गया, उत्पादन भी गिर गया और क्यूटिकल में इन अणुओं का जमावड़ा भी कम हो गया। जब यह प्रयोग एक ऐसे रसायन के साथ दोहराया गया जो क्यूटिकल की मोटाई को कम करता है, तो भी ऐसे ही असर देखे गए।

यह बात थोड़ी विचित्र जान पड़ती है कि क्यूटिकल की मोटाई कम होने से गंध-अणुओं का उत्सर्जन कम हो जाता है क्योंकि सामान्य तौर पर हम मानते हैं कि जितनी पतली रुकावट होगी उत्सर्जन उतना अधिक होना चाहिए। जब और अधिक विश्लेषण किया गया तो पता चला कि यदि क्यूटिकल बहुत पतली हो तो वाष्पशील कार्बनिक अणु कोशिका में जमा होने लगते हैं और नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसा होने पर कोशिका किसी प्रकार से वाष्पशील कार्बनिक अणुओं का उत्पादन कम कर देती है। यानी क्यूटिकल इन फूलों की गंध में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। (स्रोत फीचर्स)

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त्वरित डैटा ट्रांसमिशन – संजय गोस्वामी

वैज्ञानिकों ने ऐसा सिस्टम तैयार किया है जो 5G मोबाइल नेटवर्क्स की तुलना में 10 गुना ज़्यादा रफ्तार से डैटा ट्रांसमिट कर सकता है। इससे न सिर्फ डाउनलोड स्पीड बढ़ेगी बल्कि इन-फ्लाइट नेटवर्क कनेक्शंस की स्पीड भी बढ़ेगी। जापान की हिरोशिमा युनिवर्सिटी और नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ इन्फर्मेशन एंड कम्यूनिकेशंस टेक्नॉलजी ने टेराहर्ट्ज़ (THz) ट्रांसमिटर बनाने की जानकारी दी है। यह सिंगल चैनल पर 300 गीगाहर्ट्ज़ बैंड का इस्तेमाल करते हुए एक सेकंड में 100 गीगाबिट्स के रेट पर डिजिटल डैटा ट्रांसमिट करता है। THz बैंड नया है और भविष्य में अल्ट्राहाई-स्पीड वायरलेस कम्यूनिकेशंस में इस्तेमाल होगा। रिसर्च ग्रुप का बनाया एक ट्रांसमिटर 290 GHz से 315 GHz फ्रिक्वेंसी रेंज पर 105 गीगाबिट्स प्रति सेकंड की स्पीड से ट्रांसमिशन कर सकता है। (स्रोत फीचर्स)

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संयुक्त अरब अमीरात का अल-अमल मंगल पर पहुंचा

विगत 9 फरवरी को संयुक्त अरब अमीरात का अल-अमल (यानी उम्मीद) ऑर्बाइटर मंगल पर पहुंच गया। किसी अरब राष्ट्र द्वारा किसी अन्य ग्रह पर भेजा गया यह पहला यान है। अल-अमल मंगल की कक्षा में चक्कर काटते हुए वहां के वायुमंडल और जलवायु का अध्ययन करेगा। यदि सभी प्रणालियां ठीक से काम करती रहीं तो यूएसए, सोवियत संघ, युरोप और भारत के बाद संयुक्त अरब अमीरात मंगल पर यान भेजने वाले देशों में शरीक हो जाएगा जबकि अमीरात ने अंतरिक्ष एजेंसी वर्ष 2014 में ही शुरू की है।

ऑर्बाइटर को कक्षा में प्रवेश कराने के लिए अंतरिक्ष यान के प्रक्षेपक 30 मिनट के लिए सक्रिय होंगे जो यान की रफ्तार को 1,21,000 किलोमीटर प्रति घंटे से कम करके 18,000 किलोमीटर प्रति घंटे पर लाएंगे, ताकि ऑर्बाइटर मंगल ग्रह के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में पहुंच जाए। अगले कुछ महीनों में अल-अमल धीरे-धीरे मंगल की कक्षा में एक अण्डाकार पथ अपना लेगा। इस तरह ऑर्बाइटर कभी मंगल की सतह से दूर (43,000 किलोमीटर) तो कभी पास (20,000 किलोमीटर) होगा। अब तक अन्य मिशन के ऑर्बाइटर मंगल की सतह के बहुत करीब स्थापित किए गए हैं जिस कारण वे एक बार में छोटे स्थान को देख पाते हैं। लेकिन अल-अमल ऑर्बाइटर एक ही स्थान पर विभिन्न समयों पर नज़र रख सकेगा।

मंगल ग्रह के वायुमंडल की पड़ताल करने के लिए इस ऑर्बाइटर में तीन उपकरण हैं। इनमें से दो उपकरण हैं इंफ्रारेड स्पेक्ट्रोमीटर और अल्ट्रावायलेट स्पेक्ट्रोमीटर। और तीसरा उपकरण, इमेजिंग कैमरा, मंगल की रंगीन तस्वीरें लेगा। इस तरह ऑर्बाइटर से एकत्र डैटा से पता चलेगा कि मंगल पर चलने वाली आंधियों की शुरुआत कैसे होती है और वे प्रचण्ड रूप कैसे लेती हैं। इसके अलावा यह जानने में भी मदद मिलेगी कि अंतरिक्ष के मौसम में होने वाले बदलावों, जैसे सौर तूफान के प्रति मंगल ग्रह का वायुमंडल किस तरह प्रतिक्रिया देता  है। यह भी पता चलेगा कि कैसे हाइड्रोजन और ऑक्सीजन गैसें निचले वायुमंडल से निकलकर अंतरिक्ष में पलायन कर जाती हैं। इसी प्रक्रिया से मंगल का पानी उड़ गया और अतीत की जीवन-क्षमता को प्रभावित किया।

न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के खगोल वैज्ञानिक दिमित्र अत्री कहते हैं कि मंगल पर भेजे गए पिछले प्रोब, जैसे नासा का मावेन, भी अच्छे थे लेकिन वे एक समय में एक छोटे क्षेत्र का ही डैटा जुटाते थे। अल-अमल विहंगम अवलोकन करेगा।

संयुक्त अरब अमीरात को अपने मंगल मिशन से उम्मीद है कि यह इस क्षेत्र के युवाओं को विज्ञान को करियर के रूप में अपनाने को प्रेरित करेगा।

इसी बीच, चीन का पहला मंगल यान तियानवेन-1 भी अपने ऑर्बाइटर, लैंडर और रोवर के साथ 10 फरवरी को मंगल ग्रह पर पहुंच गया। 18 फरवरी को नासा का परसेवरेंस रोवर जेज़ेरो क्रेटर के ठीक ऊपर था। (स्रोत फीचर्स)

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क्या टीकों का मिला-जुला उपयोग हो?

फिलहाल 9 टीके हैं जो कोविड-19 की गंभीर बीमारी और मृत्यु की रोकथाम में असरदार पाए गए हैं। लेकिन टीकों की आपूर्ति में कमी को देखते हुए वैज्ञानिक इस सवाल पर विचार और परीक्षण कर रहे हैं कि क्या दो खुराक देने के लिए टीकों का मिला-जुला उपयोग किया जा सकता है। यानी पहली खुराक किसी टीके की दी जाए और बूस्टर किसी अन्य टीके का? यदि ऐसे कुछ सम्मिश्रण कारगर रहते हैं तो आपूर्ति की समस्या से कुछ हद तक निपटा जा सकेगा। यह भी सोचा जा रहा है कि क्या दो अलग-अलग टीकों के मिले-जुले उपयोग से बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।

ऐसे मिश्रित उपयोग का एक परीक्षण चालू भी हो चुका है। इसमें यह देखा जा रहा है कि रूस के गामेलाया संस्थान द्वारा विकसित स्पूतनिक-5 का उपयोग एस्ट्राज़ेनेका-ऑक्सफोर्ड द्वारा बनाए गए टीके के बूस्टर डोज़ के साथ किया जा सकता है। इसी प्रकार के अन्य परीक्षण में एस्ट्राज़ेनेका-ऑक्सफोर्ड टीके और फाइज़र-बायोएनटेक द्वारा बनाए गए टीके के मिले-जुले उपयोग पर काम चल रहा है। ये दो टीके अलग-अलग टेक्नॉलॉजी का उपयोग करते हैं। कुछ अन्य परीक्षण अभी विचार के स्तर पर हैं। अलबत्ता, इन परीक्षणों के परिणाम आने तक सावधानी बरतना ज़रूरी है।

अतीत में भी टीकों के मिले-जुले उपयोग के प्रयास हो चुके हैं। जैसे एड्स के संदर्भ में दो टीकों का इस्तेमाल करके ज़्यादा शक्तिशाली प्रतिरक्षा प्राप्त करने के प्रयास असफल रहे थे। ऐसा ही परीक्षण एबोला के टीकों को लेकर भी किया गया था। कुछ मामलों में स्थिति बिगड़ भी गई थी। कोविड-19 के टीकों के मिले-जुले उपयोग की कुछ समस्याएं भी हैं। जैसे हो सकता है कि दो में से एक टीके को मंज़ूरी मिल चुकी हो लेकिन दूसरे को न मिली हो। एक समस्या यह भी हो सकती है कि दो टीके अलग-अलग टेक्नॉलॉजी पर आधारित हों – जैसे एक एमआरएनए पर आधारित हो और दूसरा प्रोटीन पर आधारित हो।

अलबत्ता, टीकों के ऐसे मिश्रित उपयोग का एक फायदा भी है। हरेक टीका प्रतिरक्षा तंत्र के किसी एक भाग को सक्रिय करता है। तो संभव है कि दो अलग-अलग टीकों का उपयोग करके हम दो अलग-अलग भागों को सक्रिय करके बेहतर सुरक्षा हासिल कर पाएं।

जैसे स्पूतनिक-5 टीके में दो अलग-अलग एडीनोवायरस (Ad26, Ad5) का उपयोग सम्बंधित जीन को शरीर में पहुंचाने के लिए किया गया है। दूसरी ओर, एस्ट्राज़ेनेका टीके में प्रमुख खुराक और बूस्टर दोनों में चिम्पैंज़ी एडीनोवायरस (ChAd) का ही उपयोग हुआ है। इसका परिणाम यह हो सकता है कि एक खुराक से उत्पन्न प्रतिरक्षा को दूसरी खुराक स्थगित कर दे। ऐसे में स्पूतनिक और एस्ट्राज़ेनेका के मिले-जुले उपयोग से यह समस्या नहीं आएगी। यह फायदा कई अन्य मिश्रणों में भी संभव है। वैसे सबसे बड़ी बात तो यह है कि ऐसा संभव हुआ तो आपूर्ति की समस्या से निपटा जा सकेगा। (स्रोत फीचर्स)

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