नीट घोटाला और स्वास्थ्य-सेवा क्षेत्र का अधोपतन

डॉ. अनंत फड़के

स वर्ष मेडिकल कॉलेजों में स्नातक (MBBS) और स्नातकोत्तर (PG) प्रवेश के लिए होने वाली नीट परीक्षा (NEET Examination) व्यवस्था पूरी तरह विफल साबित हुई। इसके विरोध में दिल्ली में जंतर-मंतर पर और अन्य शहरों में हुए जेन-ज़ी आंदोलनों और अन्य दबावों के चलते इस परीक्षा प्रणाली को रद्द किया जाएगा या इसमें सुधार किए जाएंगे। लेकिन केवल इतना करने से प्रवेश-प्रक्रिया में फैला भ्रष्टाचार और अव्यवस्था समाप्त नहीं होगी। इसके लिए स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण, कॉर्पोरेटीकरण, चिकित्सा शिक्षा के निजीकरण और महंगे निजी कोचिंग संस्थानों (private coaching centres) के बढ़ते प्रभाव जैसे मूल कारणों को समाप्त करना होगा। आइए संक्षेप में समझें कि यह स्थिति क्यों है।

सरकारी अस्पतालों की जगह निजी अस्पतालों का विस्तार

1980 तक सबसे आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं मुख्य रूप से शहरों के छोटे-बड़े सरकारी अस्पतालों और कुछ बड़े चैरिटेबल (परमार्थ) अस्पतालों में उपलब्ध थीं। यहां इलाज के लिए मुख्यतः गरीब और मध्यम वर्ग (poor & middle class) के लोग आते थे, लेकिन समाज के अन्य वर्ग भी इन अस्पतालों में इलाज करवाते थे।

पिछले 40–45 वर्षों में नई और अत्याधुनिक चिकित्सा तकनीकों के आने से स्वास्थ्य सेवाओं का स्वरूप बदल गया। सही समय पर बीमारी की पहचान और इलाज पहले की तुलना में अधिक आसान हो गया। लेकिन इसका लाभ सभी लोगों तक पहुंचाने के लिए सरकार को पुराने सरकारी अस्पतालों का आधुनिकीकरण करना चाहिए था और पर्याप्त संख्या में नए सरकारी अस्पताल भी खोलने चाहिए थे। साथ ही, ईमानदारी से काम करने वाले चैरिटेबल अस्पतालों (cheritable hospitals) को भी ऐसी सुविधाएं विकसित करने के लिए सरकारी सहायता (subsidy) मिलनी चाहिए थी। लेकिन 1980 के बाद सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र में भी निजीकरण (privatization) की नीति अपनाई और धीरे-धीरे अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हटना शुरू कर दिया।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 1980 से ही सिफारिश की है कि सरकार का स्वास्थ्य पर कुल खर्च सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 5 प्रतिशत होना चाहिए। लेकिन भारत में केंद्र और राज्य सरकारों का संयुक्त स्वास्थ्य खर्च बढ़ने की बजाय 2014 के बाद GDP के लगभग 1.3 प्रतिशत पर ही स्थिर रहा। 2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के अनुसार 2025 तक सरकारी स्वास्थ्य खर्च को GDP के 2.5 प्रतिशत तक पहुंचाया जाना था और इसमें केंद्र सरकार का हिस्सा 1 प्रतिशत होना था। लेकिन पिछले पांच वर्षों में केंद्र सरकार का स्वास्थ्य खर्च GDP के 0.3 प्रतिशत से भी कम रहा है।

कॉर्पोरेट स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार

सरकार को सभी स्तरों पर आधुनिक चिकित्सा तकनीक के लिए पर्याप्त निवेश करना चाहिए था। लेकिन 1990 के बाद यह निवेश मुख्य रूप से बड़ी कॉर्पोरेट कम्पनियों (corporate companies) ने किया है। पहले भी दवा उद्योग में कॉर्पोरेट निवेश था। बाद में आधुनिक पैथॉलॉजी लैब, रक्त जांच केंद्र, स्कैन सेंटर और बड़े कॉर्पोरेट अस्पताल भी तेज़ी से बढ़ने लगे। कई ऐसे अस्पताल, जो केवल नाम के लिए चैरिटेबल थे लेकिन वास्तव में लाभ कमाने के उद्देश्य से चलते थे, उनमें भी कानूनी रास्ते निकालकर कॉर्पोरेट कम्पनियों ने निवेश किया। 1991 से 2024 के बीच स्वास्थ्य क्षेत्र में कॉर्पोरेट निवेश लगभग ₹500 करोड़ से बढ़कर ₹50,000 करोड़ तक पहुंच गया।

कई विकसित देशों और वियतनाम जैसे देशों में यह नियम है कि डॉक्टर वैज्ञानिक दिशानिर्देशों के अनुसार ही यह तय करेंगे कि कौन-सी जांच या प्रक्रिया वास्तव में आवश्यक है। लेकिन भारत में ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है। इसलिए बहुत कम विशेषज्ञ इन वैज्ञानिक दिशानिर्देशों का पालन करते हैं। 1980 के बाद मरीज़ों को किसी विशेष लैब में भेजने के बदले डॉक्टरों को कमीशन (कट) (commision) मिलने की प्रथा भी बढ़ी। परिणाम यह हुआ कि वास्तव में ज़रूरत हो या न हो, अधिक से अधिक जांच और प्रक्रियाएं करवाकर अधिक लाभ कमाना कई निजी अस्पतालों का मुख्य उद्देश्य बन गया। ऐसे मुनाफा-केंद्रित (profit-centred) अस्पतालों में काम करने वाले विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या लगातार बढ़ती गई। उनके साथ काम करके कमाई करने वाले अन्य विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या भी बढ़ती गई।

मुनाफाकेंद्रित निजी मेडिकल कॉलेजों की बढ़ोतरी

ऐसे डॉक्टर तैयार करने के लिए, जो बाद में कॉर्पोरेट अस्पतालों (corporate hospitals) में काम करें, हर साल 10-20 लाख रुपए फीस लेने वाले निजी मेडिकल कॉलेजों की संख्या लगातार बढ़ती गई। इसका समर्थन यह कहकर किया जाता है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिश के अनुसार हर 1000 लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए, और केवल सरकारी मेडिकल कॉलेजों के माध्यम से इतने डॉक्टर तैयार करना संभव नहीं है। इसलिए निजी मेडिकल कॉलेजों को बढ़ावा देना ज़रूरी बताया जाता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि इन निजी कॉलेजों (private college) से पढ़कर निकलने वाले अधिकांश डॉक्टर उन गरीब ग्रामीण या शहरी इलाकों में काम करने नहीं जाते, जहां डॉक्टरों की सबसे अधिक कमी है। कई विद्यार्थी कोचिंग पर 3-5 लाख खर्च करते हैं, और फिर निजी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस और पीजी करने में 2-5 करोड़ तक खर्च हो सकता है। इतना खर्च करने के बाद कई डॉक्टर मुख्यतः शहरों के अमीर लोगों का इलाज करते हैं और कॉर्पोरेट अस्पतालों की मुनाफाखोरी का हिस्सा बन जाते हैं।

अनावश्यक जांच और इलाज का खर्च केवल अमीर लोग ही उठा सकते हैं। लेकिन उनके लिए भी यह अनुचित है और कभी-कभी स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है। गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए तो यह खर्च भारी कर्ज़ का कारण बन सकता है।

निजी मेडिकल शिक्षा का तेज़ी से विस्तार

इस लाभ कमाने वाली व्यवस्था में शामिल होने की इच्छा रखने वाले डॉक्टरों की संख्या लगातार बढ़ती गई। 1980 में देश में लगभग 110 एलोपैथिक मेडिकल कॉलेज (allopathic medical college) थे। इनमें हर वर्ष लगभग 10,000 विद्यार्थी प्रवेश लेते थे। इनमें से केवल 10 प्रतिशत विद्यार्थी निजी मेडिकल कॉलेजों में पढ़ते थे। पीजी शिक्षा में हर वर्ष लगभग 3–4 हज़ार डॉक्टर प्रवेश लेते थे और उनमें से केवल 5 प्रतिशत निजी मेडिकल कॉलेजों में जाते थे। लेकिन 2025–26 तक देश में लगभग 800 एलोपैथिक मेडिकल कॉलेज हो गए और उनमें लगभग सवा लाख विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया। इनमें से लगभग 50 प्रतिशत विद्यार्थी निजी मेडिकल कॉलेजों में पढ़ रहे हैं और हर साल 10–20 लाख फीस दे रहे हैं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सरकार ने पर्याप्त संख्या में सरकारी मेडिकल कॉलेज नहीं खोले। इस कारण केवल योग्यता और मेहनत के आधार पर अच्छे मेडिकल करियर (medical carrer) का अवसर पर्याप्त नहीं बढ़ पाया।

इसी तरह, 2025–26 में पीजी मेडिकल शिक्षा में लगभग 75 से 80 हज़ार डॉक्टरों ने प्रवेश लिया, जिनमें लगभग आधे निजी मेडिकल कॉलेजों में गए।

नीट परीक्षा और कोचिंग उद्योग

मेडिकल प्रवेश की प्रतिस्पर्धा (competition) लगातार बढ़ती गई। राष्ट्रीय स्तर पर एक समान प्रवेश प्रक्रिया बनाने के लिए 2016 में नीट परीक्षा शुरू की गई। पहले वर्ष इस परीक्षा में लगभग आठ लाख विद्यार्थी बैठे थे। 2025 तक यह संख्या बढ़कर 22 लाख हो गई। इतनी बड़ी संख्या और इतनी कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण महंगे निजी कोचिंग संस्थानों का तेज़ी से विस्तार हुआ। 2025 तक यह नया कोचिंग उद्योग लगभग 25,000 करोड़ का हो गया। ऑनलाइन कोचिंग के लिए 15–20 हज़ार तक फीस ली जाती है, जबकि अच्छे कोचिंग संस्थानों (coaching institutes) की फीस लगभग एक लाख या उससे अधिक होती है। यह धारणा बनने लगी कि जितनी अधिक फीस, सफलता की संभावना उतनी अधिक। कुछ संस्थान ‘निश्चित चयन’ कराने का दावा करते हैं और उनके लिए विद्यार्थी 3–5 लाख तक खर्च करते हैं। यदि इनमें से कुछ विद्यार्थियों को ज़्यादा पैसे देकर प्रश्नपत्र लीक होने का लाभ भी मिलता हो, तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

केवल नीट में सुधार से समस्या हल नहीं होगी

नीट परीक्षा में हुए घोटाले ने यह स्पष्ट कर दिया कि अखिल भारतीय प्रवेश प्रणाली (all india admission system)की अपनी सीमाएं और गंभीर जोखिम हैं। इस विरोध के कारण वर्तमान व्यवस्था में सुधार होना चाहिए या आवश्यकता हो तो नई प्रवेश प्रणाली बनानी चाहिए। लेकिन केवल इससे प्रवेश प्रक्रिया में फैला भ्रष्टाचार (corruption) समाप्त नहीं होगा। असल में यह प्रतियोगिता ऐसे पेशे में प्रवेश पाने की है जहां बहुत अधिक पैसा और प्रतिष्ठा मिलती है। इसलिए निजी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश पाने की होड़ लगातार बढ़ रही है। भले ही बहुत से विद्यार्थियों को यह बात पूरी तरह समझ में न आती हो, लेकिन वर्तमान व्यवस्था की यही वास्तविकता है। इसलिए समस्या की जड़ पर प्रहार करना आवश्यक है।

क्या किया जाए?

1. सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में बड़े पैमाने पर निवेश (high investement) किया जाए। केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा स्वास्थ्य पर खर्च में बड़ी वृद्धि की जाए। सरकारी अस्पतालों का विस्तार हो, उनमें आधुनिक तकनीकें उपलब्ध हों और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था जनता के लिए पारदर्शी तथा जवाबदेह रहे। साथ ही, ईमानदारी से काम करने वाले चैरिटेबल अस्पतालों को भी सुविधाएं विकसित करने के लिए सरकारी सहायता मिले।

2. सरकारी मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाई जाए। पर्याप्त नए सरकारी मेडिकल कॉलेज खोले जाएं। साथ ही, निजी मेडिकल कॉलेजों को भी सरकारी कॉलेजों के बराबर ही फीस लेने की अनुमति हो। यदि इससे कई निजी मेडिकल कॉलेज बंद भी हो जाएं, तो इससे जनता का नुकसान नहीं होगा। बल्कि मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं (medical entrance exam) के अत्यधिक महत्व और उनमें होने वाले भ्रष्टाचार को कम करने में मदद मिलेगी।

3. निजी स्वास्थ्य सेवाओं को वैज्ञानिक नियमों के अनुसार चलाया जाए। निजी अस्पतालों में इलाज केवल वैज्ञानिक चिकित्सा दिशानिर्देशों (scientific medical guidelines) के अनुसार ही किया जाए और मरीज़ों से केवल निर्धारित तथा पारदर्शी दरों पर ही शुल्क लिया जाए। यदि निजी स्वास्थ्य सेवाओं में मुनाफाखोरी, मरीजों का आर्थिक शोषण और अनावश्यक जांच तथा इलाज के माध्यम से कमाई पर रोक लगाई जाए, तो कॉर्पोरेट अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टर बनने की वर्तमान अंधी दौड़ और अत्यधिक व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा भी आपो-आप कम हो जाएगी।

कुल मिलाकर, केवल मेडिकल प्रवेश परीक्षा में हुए भ्रष्टाचार पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। उसके पीछे मौजूद मूल कारणों – स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण, चिकित्सा शिक्षा के निजीकरण, सरकारी निवेश की कमी और कॉर्पोरेट मुनाफाखोरी (corporate profit making) – को भी दूर करना आवश्यक है। ऐसा होने पर ही प्रवेश प्रक्रिया में ईमानदारी आएगी और चिकित्सा व्यवस्था अधिक न्यायपूर्ण तथा जनहितैषी (public friendly) बन सकेगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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