डिजिटल विकास: पानी, ऊर्जा और पर्यावरण का सवाल

कुमार सिद्धार्थ

पिछली शताब्दी पर नज़र डालें तो औद्योगिक विकास (industrial revolution) की पहचान विशाल कारखानों, ऊंची चिमनियों, इस्पात संयंत्रों और मशीनों की गूंज से होती थी। ये किसी देश की आर्थिक शक्ति और औद्योगिक प्रगति के प्रतीक माने जाते थे। लेकिन इक्कीसवीं सदी में विकास का चेहरा बदल चुका है। आज विशाल, शांत और अत्याधुनिक इमारतें नई अर्थव्यवस्था की धुरी बन रही हैं। इनमें न मशीनों का शोर सुनाई देता है, न धुएं के गुबार उठते हैं, फिर भी दुनिया की लगभग हर डिजिटल गतिविधि की नींव इन्हीं पर टिकी है। इन्हीं नई आधुनिक इमारतों को हम डैटा सेंटर (data centre) के नाम से जानते हैं।

आज मोबाइल से किया गया भुगतान, किसी विद्यार्थी की ऑनलाइन कक्षा, अस्पताल का डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड, किसान के मोबाइल पर पहुंचा मौसम का पूर्वानुमान, सोशल मीडिया पर साझा की गई तस्वीर या कोई भी संवाद, इनमें से कोई भी गतिविधि डैटा सेंटरों के बिना संभव नहीं है। हर डिजिटल क्रिया (digital action) अंतत: किसी न किसी डैटा सेंटर तक पहुंचती है, जहां सूचनाएं संग्रहित होती हैं, उनका विश्लेषण होता है और वे कुछ ही क्षणों में हमारे पास वापस लौट आती हैं।

यही वज‍ह है कि डिजिटल दुनिया जितनी आभासी और अदृश्य दिखाई देती है, उसकी बुनियाद उतनी ही ठोस और वास्तविक है। यह केवल इंटरनेट या सॉफ्टवेयर का संसार नहीं, बल्कि विशाल डैटा सेंटरों, लाखों सर्वरों, निरंतर बिजली आपूर्ति, उच्च क्षमता वाले संचार नेटवर्क और बड़ी मात्रा में ऊर्जा तथा जल जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित विशाल भौतिक अधोसंरचना (giant physical infrastructure) है।

पिछले कुछ वर्षों में कृत्रिम बुद्धि (एआई) (AI) ने इस पूरी व्यवस्था को नई गति दी है। चैटबॉट, भाषा अनुवाद, चित्र निर्माण, वीडियो विश्लेषण, चिकित्सा अनुसंधान और वैज्ञानिक गणनाओं जैसे कार्यों के लिए पहले से कहीं अधिक कंप्यूटिंग क्षमता की आवश्यकता पड़ रही है। इस वजह‍ से दुनिया भर में नए डैटा सेंटर्स के निर्माण की होड़ शुरू हो गई है।

अंतर्राष्ट्रीय शोध के अनुसार वर्तमान में विश्व में लगभग 11,800 डैटा सेंटर संचालित हैं। भारत में भी इनकी संख्या तेज़ी से बढ़ रही है और वह एशिया के प्रमुख डैटा सेंटर बाज़ारों में शामिल हो चुका है। डिजिटल इंडिया, यूपीआई, क्लाउड सेवाओं, ई-कॉमर्स, ऑनलाइन शिक्षा और सरकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने इस विस्तार को और गति दी है। इसमें कोई संदेह नहीं कि डैटा सेंटर आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए उतने ही आवश्यक हैं, जितने कभी सड़कें, रेलमार्ग और बिजलीघर थे। वे निवेश आकर्षित करते हैं, रोज़गार सृजित करते हैं और डिजिटल सेवाओं (digital services) की विश्वसनीयता सुनिश्चित करते हैं।

लेकिन हर ‘विकास’ अपने साथ कुछ अनदेखे प्रश्न भी लेकर आता है। लंबे समय तक डैटा सेंटरों की चर्चा केवल उनकी बिजली खपत तक सीमित रही। अब वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और नीति-निर्माताओं का ध्यान एक ऐसे प्राकृतिक संसाधन की ओर जा रहा है, जिसकी चर्चा अक्सर छूट जाती है, वह है जल।

डिजिटल दुनिया: अदृश्य प्यास

हमारा डैटा ‘क्लाउड’ (cloud) में सुरक्षित होता है। क्लाउड कोई काल्पनिक स्थान नहीं, बल्कि हज़ारों सर्वरों से भरे विशाल डैटा सेंटरों का नेटवर्क है। हर ई-मेल, हर डिजिटल भुगतान, हर वीडियो, हर ऑनलाइन खोज और हर एआई अनुरोध इन्हीं सर्वरों (servers) पर संसाधित होता है।

ये सर्वर दिन-रात लगातार काम करते हैं। जितनी अधिक गणनाएं होती हैं, उतनी ही अधिक गर्मी उत्पन्न होती है। यदि यह तापमान नियंत्रित न किया जाए तो सर्वर की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है, उपकरण क्षतिग्रस्त हो सकते हैं और डिजिटल सेवाएं बाधित हो सकती हैं, यहां तक कि ठप भी हो सकती हैं। इसलिए शीतलन (कूलिंग) (cooling) डैटा सेंटर की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

बड़े डैटा सेंटरों में सर्वरों को सुरक्षित तापमान पर बनाए रखने के लिए पानी आधारित कूलिंग टॉवर, चिलर और वाष्पीकरण आधारित शीतलन प्रणालियों का उपयोग किया जाता है। पानी गर्मी को तेज़ी से अवशोषित (absorb) करता है, इसलिए यह बड़े डैटा सेंटरों के लिए प्रभावी शीतलक (coolent) माना जाता है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि डिजिटल सुविधाओं की बढ़ती मांग के साथ पानी की मांग भी बढ़ने लगती है।

यही वह प्रश्न है, जिसने पूरी दुनिया में नई बहस शुरू कर दी है। क्या एआई और डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार ऐसे समय में हो रहा है, जब दुनिया पहले से ही जल संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से जूझ रही है? और यदि हां, तो क्या भविष्य का डिजिटल विकास जल सुरक्षा के साथ संतुलन (balance) बनाकर आगे बढ़ सकेगा?

इन सवालों के उत्तर केवल तकनीकी नहीं, बल्कि पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक भी हैं। आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि डिजिटल प्रगति (digital progress) वास्तव में टिकाऊ विकास का आधार बनती है या प्राकृतिक संसाधनों (natural resources) पर एक नया दबाव।

कितने प्यासे हैं डैटा सेंटर

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार लगभग 100 मेगावॉट क्षमता वाला एक हाइपरस्केल डैटा सेंटर (hyperscale data centre) केवल शीतलन के लिए प्रतिदिन लगभग 20 लाख लीटर तक पानी उपयोग कर सकता है। यह मात्रा कई छोटे कस्बों की दैनिक जल आवश्यकता के बराबर है। पानी का उपयोग केवल शीतलन टॉवरों में ही नहीं होता, बल्कि आर्द्रता नियंत्रण और अन्य सहायक प्रणालियों में भी किया जाता है।

भारत में ऊर्जा, पर्यावरण एवं जलवायु पर कार्य करने वाली संस्था काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) का अनुमान है कि वर्ष 2024 में देश के डैटा सेंटरों ने लगभग 150 अरब लीटर पानी का उपयोग किया था। यदि वर्तमान विस्तार की गति बनी रही, तो 2030 तक यह खपत दुगनी से अधिक हो सकती है। यह अनुमान केवल उद्योग के आकार का नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की नीति सम्बंधी चुनौती का भी संकेत देता है।

हालांकि यह भी समझना आवश्यक है कि सभी डैटा सेंटर समान मात्रा में पानी उपयोग नहीं करते। कुछ आधुनिक केंद्र कम जल-आधारित या लगभग जल-रहित शीतलन तकनीकों की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि पुराने केंद्र अपेक्षाकृत अधिक पानी पर निर्भर हैं। इसलिए भविष्य की दिशा केवल डैटा सेंटरों की संख्या से नहीं, बल्कि उनकी जल-दक्षता (water-use efficiency) से भी तय होगी।

एआई ने क्यों बढ़ाई चुनौती?

एआई ने डैटा सेंटरों की भूमिका को पूरी तरह बदल दिया है। पहले अधिकांश डैटा सेंटर ई-मेल, वेबसाइट, क्लाउड स्टोरेज और सामान्य इंटरनेट सेवाओं के लिए बनाए जाते थे। अब उन्हें लार्ड लैंग्वेज मॉडल (large language model), मशीन लर्निंग, वीडियो विश्लेषण, वैज्ञानिक अनुसंधान और जटिल गणनाओं का भार भी उठाना पड़ रहा है।

एआई आधारित प्रोसेसर पारंपरिक सर्वरों (traditional servers) की तुलना में कहीं अधिक ऊर्जा का उपयोग करते हैं और अधिक गर्मी उत्पन्न करते हैं। जिसके कारण शीतलन प्रणालियों पर दबाव बढ़ता है। आज डैटा सेंटरों की योजना केवल बिजली उपलब्धता के आधार पर नहीं बनाई जा रही, बल्कि स्थानीय तापमान, जल उपलब्धता और जलवायु जोखिम को भी ध्यान में रखा जा रहा है।

एआई ने नई विडंबना पैदा कर दी है। एक ओर, यह जलवायु परिवर्तन, मौसम पूर्वानुमान, कृषि, स्वास्थ्य एवं आपदा प्रबंधन जैसी समस्याओं के समाधान में मदद कर सकता है। वहीं, यदि इसकी आधारभूत अधोसंरचना संसाधनों का बेतहाशा उपयोग करेगी तो वही तकनीक पर्यावरणीय दबाव भी बढ़ा सकती है।

दोहरी चुनौती

भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं (digital economy) में से एक है। सरकार डैटा सेंटर, एआई और सेमीकंडक्टर (semiconductor) जैसे क्षेत्रों को प्रोत्साहन दे रही है। दूसरी ओर, देश के अनेक हिस्से पहले से ही जल संकट का सामना कर रहे हैं। अनियमित मानसून, घटता भूजल, बढ़ते तापमान और तेज़ी से बढ़ते शहर जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डाल रहे हैं।

यही कारण है कि भारत के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर, डिजिटल अधोसंरचना का विस्तार आवश्यक है। दूसरी ओर, यह सुनिश्चित करना भी उतना ही ज़रूरी है कि यह विस्तार स्थानीय जल संसाधनों की कीमत पर न हो। यदि भविष्य के डैटा सेंटर ऐसे क्षेत्रों में स्थापित होते हैं जहां पहले से ही पेयजल संकट है, तो उद्योग और स्थानीय समुदायों के बीच संसाधनों को लेकर तनाव उत्पन्न हो सकता है। इसलिए अब डैटा सेंटरों की योजना को केवल निवेश और रोज़गार के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि जल सुरक्षा (water savings), शहरी नियोजन और जलवायु अनुकूलन (climate adoptations) के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है।

दुनिया क्या सीख रही है?

दुनिया की बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियां इस चुनौती को स्वीकार कर चुकी हैं। माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और अन्य कंपनियां ऐसे डैटा सेंटर विकसित कर रही हैं जिनमें कम पानी का उपयोग हो, उपचारित अपशिष्ट जल (waste water) का अधिकतम इस्तेमाल किया जाए और वर्षा जल संचयन (rainwater harvesting) को अनिवार्य बनाया जाए। माइक्रोसॉफ्ट का दावा है कि उसने पिछले दो दशकों में अपने डैटा सेंटरों की वॉटर यूज़ इफेक्टिवनेस में लगभग 90 प्रतिशत सुधार किया है।

युरोप और अमेरिका के कई क्षेत्रों में अब नए डैटा सेंटरों की स्वीकृति देते समय केवल बिजली की उपलब्धता नहीं देखी जाती, बल्कि यह भी आकलन किया जाता है कि उनका स्थानीय जल संसाधनों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। इससे स्पष्ट है कि भविष्य में डैटा सेंटरों की सफलता केवल उनकी कंप्यूटिंग क्षमता (computing capacity) से नहीं, बल्कि उनकी ऊर्जा और जल दक्षता से भी आंकी जाएगी।

भारत के पास मौका है कि वह डैटा सेंटर उद्योग को ऐसी दिशा दे, जो डिजिटल विकास और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित करे। इसके लिए डैटा सेंटरों की स्थापना की प्रक्रिया में जल उपलब्धता और जल प्रभाव आकलन को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। जिस प्रकार बड़ी परियोजनाओं के लिए पर्यावरण प्रभाव आकलन आवश्यक होता है, उसी प्रकार बड़े डैटा सेंटरों के लिए स्थानीय जल संसाधनों पर पड़ने वाले प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन भी अनिवार्य रूप से निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा होना चाहिए।

जल ही नहीं, ऊर्जा भी अहम

यह भी गौरतलब है कि डैटा सेंटरों पर चर्चा अक्सर पानी तक सीमित रह जाती है, जबकि उनका ऊर्जा उपयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण है। एआई के विस्तार के साथ दुनिया भर में बिजली की मांग तेज़ी से बढ़ रही है। यदि यह ऊर्जा कोयले और अन्य जीवाश्म ईंधनों से प्राप्त होगी, तो निश्चित रूप से कार्बन उत्सर्जन (carbon emission) बढ़ेगा और जलवायु परिवर्तन की चुनौती और गंभीर होगी।

इसलिए भविष्य का टिकाऊ डैटा सेंटर वह होगा, जो कम पानी ही नहीं बल्कि स्वच्छ ऊर्जा का भी उपयोग करे। सौर व पवन ऊर्जा, ऊर्जा-कुशल सर्वर, उन्नत चिप प्रौद्योगिकी तथा स्मार्ट कूलिंग सिस्टम (smart cooling system) इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। डिजिटल संरचना का भविष्य केवल अधिक शक्तिशाली कंप्यूटरों में नहीं, बल्कि संसाधन-दक्ष प्रणालियों (resource efficient systems) में निहित है।

विकास की नई कसौटी

इक्कीसवीं सदी का विकास केवल तकनीकी विस्तार का नाम नहीं है। वह इस बात की भी परीक्षा है कि हम प्राकृतिक संसाधनों (natural resources) का उपयोग कितनी ज़िम्मेदारी से करते हैं। यदि डिजिटल विकास की कीमत सूखते भूजल, बढ़ते जल संघर्ष और पर्यावरणीय असंतुलन के रूप में चुकानी पड़े, तो वह विकास लंबे समय तक टिकाऊ नहीं रह सकता। इसलिए अब विकास का नया सूत्र केवल डिजिटल फर्स्ट नहीं, बल्कि डिजिटल एंड मोस्ट सस्टेनेबल (digiital & most sustainable) होना चाहिए।

डिजिटल भारत का सपना केवल तेज़ इंटरनेट, विशाल डैटा सेंटरों और अत्याधुनिक एआई से पूरा नहीं होगा। उसकी सफलता इस बात से भी तय होगी कि इन तकनीकों के विकास में पानी, ऊर्जा और पर्यावरण का कितना नुकसान या सम्मान किया जाता है। यदि आज दूरदर्शी नीतियां अपनाई जाती हैं, तो भारत डिजिटल प्रगति और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के बीच एक संतुलित मॉडल (balanced model) प्रस्तुत कर सकता है। ज़ाहिर है, यही भविष्य की टिकाऊ अर्थव्यवस्था की वास्तविक पहचान होगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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