ये शैल चित्र क्या इंसानी खून से बनाए गए हैं?

म तौर पर प्राचीन समय के शैल चित्र ऐसी चट्टानों पर मिलते हैं जो थोड़ी गुफानुमा या ढंकी हुई हों। प्राचीन लोगों ने जब खुली चट्टान या खड़ी-चट्टानों पर चित्रकारी की भी है तो उनका मौसम-पानी की मार के कारण सलामत बचा रहना मुश्किल रहा है। लेकिन अब शैल चित्रों (Rock paintings) का ऐसा समूह मिला है जो खड़ी चट्टान के खुले पहलू पर होने के बाद भी सदियों से सही-सलामत है।

चीन की ज़ुओजियांग नदी घाटी (Zuojiang River Valley) की सपाट, खड़ी चट्टानों पर बने शैल चित्र हवा-पानी की सीधी मार पड़ने के बावजूद आज भी एकदम नुमाया और अक्षुण्ण हैं। ये रंग चट्टानों से इतनी मज़बूती से चिपके हैं कि यदि वे उखड़ते हैं, तो रंग के साथ चूना-पत्थर की परत भी साथ झड़ जाती है। ये शैल-चित्र ज़ुओजियांग नदी के साथ-साथ 260 किलोमीटर लंबाई में फैली चूना-पत्थर (कार्स्ट लाइमस्टोन) की खड़ी चट्टानों पर करीब 80 पुरातात्विक स्थलों पर मिलते हैं। ये स्थल ज़ुओजियांग हुआशान रॉक आर्ट कल्चरल लैंडस्केप (Zuojiang rock art cultural landscape) नाम से जाने जाते हैं।

ये चित्र लगभग 2000 साल से अधिक पुराने हैं। इन्हें लोयुए संस्कृति के लोगों ने पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी ईसवीं के बीच लगभग लगभग 700 साल की अवधि में बनाया था। लोयुए समाज (luoyue) दक्षिणी चीन में रहने वाला एक मातृसत्तात्मक समाज (matrilineal society) था। ये लोग प्राय: शिकारी, मछुआरे और संग्राहक थे।

लोयुए संस्कृति के लोगों ने कमोबेश इन चित्रों में दोनों हाथ ऊपर किए हुए उकड़ू बैठी मुद्रा में नग्न पुरुषों की टोली, पंखों का ताज पहने एक विशालकाय व्यक्ति, आसपास कुछ जानवर और प्राचीन रस्मों में बजने वाले ढोल और घंटियां गेरुआ लाल रंग में बनाए हैं। साथ ही, गर्भवती महिलाओं और प्रसव का चित्रण मिलता है।

काफी समय से वैज्ञानिक इस बात से हैरान थे यह मुक्ताकाश शैल चित्र दीर्घा मौसम की इतनी कड़ी मार कैसे झेल पाई, जबकि अन्य स्थलों पर इसके सैकड़ों साल बाद बने शैल चित्र मिट चुके हैं या धुंधले पड़ चुके हैं।

इस हैरानी ने ही शेडोंग युनिवर्सिटी की रसायनशास्त्री मेंग वू और उनके साथियों को चट्टानों के तीन स्थलों पर चित्रों के झड़े हुए टुकड़ों का अवरक्त प्रकाश (Infrared spectroscopy) और इलेक्ट्रॉन बीम से विश्लेषण करने को उकसाया। अवरक्त प्रकाश की मदद से उन्होंने इन चित्रों के रंगों में इस्तेमाल घटकों की आणविक स्तर पर पहचान की। और अत्यंत सूक्ष्म स्तर इसके कण-गठन (टेक्स्चर) का पता लगाने के लिए इलेक्ट्रॉन बीम का इस्तेमाल किया।

पता चला कि रंग बनाने के लिए लोयुए कलाकारों ने पहले अत्यधिक तपाए गए चूना-पत्थर (कैल्शियम कार्बोनेट) और जानवरों की हड्डियों से एक गाढ़ा पेस्ट बनाया। इस पेस्ट में उन्होंने पानी और खून मिलाकर एक चिकना और पतला घोल तैयार किया। इस घोल में मौजूद बुझा हुआ चूना, कैल्शियम फॉस्फेट (calcium phosphate) और खून के प्रोटीन रंग को बांधे रखने का काम करते थे। लाल रंग के लिए उन्होंने स्थानीय लाल मिट्टी में मौजूद आयरन ऑक्साइड (iron oxide) का इस्तेमाल किया।

इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (electron microscopy) में उन्हें चित्रों की अलग-अलग परतें दिखाई दीं, जिससे पता चला कि चट्टान पर चित्रकारी दो चरणों में की गई थी। पहले चरण में चट्टान की सतह पर प्राइमर (primer) के तौर पर रक्त-युक्त घोल लगाया गया था और फिर इस अध-सूखे अस्तर पर लाल मिट्टी का रंग चढ़ाया गया था। जैसे ही बुझा हुआ चूना हवा की कार्बन डाईऑक्साइड के साथ क्रिया करता था, रक्त-प्रोटीन कैल्शियम कार्बोनेट के ‘जैव-खनिजीकरण’ (biomineralization) को बढ़ावा देते थे, जिससे रंग चट्टान की सतह के साथ मज़बूती से जुड़ जाता था।

जब शोध दल ने रक्त का विश्लेषण किया, तो उन्हें उसमें जानवरों के साथ-साथ मानव रक्त के प्रोटीन (human blood protein) भी मिले। वू बताती है कि वे नमूनों में मानव रक्त के निशान मिलने से भौंचक्की रह गई थीं। वे सोचने लगीं कि क्या ये कलाकार चित्रकारी के लिए खुद अपने शरीर पर घाव करते थे? क्या लोगों की बलि दी जाती थी? लेकिन तभी उन्हें एक बात सूझी – उस समय उनके पीरियड्स चल रहे थे। उन्होंने सोचा कि शायद खून कम हिंसक तरीके से इकट्ठा किया गया होगा, जैसे माहवारी या प्रसव का।

वू की टीम ने खून की और भी बारीकी से जांच की, तो उन्हें उसमें दो प्रोटीन – प्रोलैक्टिन-इंड्यूसिबल प्रोटीन (protein inducible protein) और लैक्टोफेरिन (lactoferin) – की थोड़ी मात्रा मिली। ये दोनों प्रोटीन रक्त में गर्भावस्था के आखिरी समय में बढ़ जाते हैं। चूंकि लोयुए लोग मातृवंशीय परंपरा को मानते थे, और भित्ति-चित्रों में गर्भवती महिलाओं और बच्चे के जन्म चित्रित किए गए हैं, इसलिए शोधकर्ताओं का अनुमान है कि प्रसव के दौरान निकलने वाले खून को प्रजनन क्षमता (fertility) से जुड़े अनुष्ठानों के लिए इकट्ठा किया जाता होगा। वैसे भी, चित्रकारी के लिए हर वर्ग मीटर पर खून की बस चंद मिलीलीटर मात्रा की ही ज़रूरत रहती होगी।

अन्य शोधकर्ता कहते हैं वैसे तो अध्ययन बहुत सावधानी से और विस्तार से किया गया है। फिर भी, इस बात के पर्याप्त सबूत नहीं हैं कि वह खून गर्भवती महिलाओं (pregnant females) का ही था। ऐसा इसलिए, क्योंकि इंसानी खून के संकेत बहुत हल्के थे, और इनमें 2000 सालों तक चट्टान की सतह पर मौसम की मार झेलने के कोई रासायनिक संकेत नहीं मिले हैं। इसलिए इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि शायद ये रसायन नमूनों की जांच के दौरान के दौरान मिल गए होंगे।

पूरे दावे के साथ कुछ भी कहना मुश्किल है क्योंकि हम इतिहास में वापिस जाकर लोयुए लोगों से बात करके कुछ पक्का नहीं कर सकते। लेकिन इतना तो कहा जा सकता है कि प्राचीन लोग न सिर्फ चित्रकारी करके अपनी संस्कृति की जानकारी दर्ज कर रहे थे, बल्कि वे कुशल बायोकेमिकल इंजीनियर (skilled biochemical engineers) थे। यह अध्ययन विस्तार से जर्नल ऑफ आर्कियोलॉजिकल साइंस के आगामी किसी अंक में प्रकाशित होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://www.science.org/do/10.1126/science.zism0p5/full/_20260807_on_hushan_art_lede.jpg

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