भाग – 1
डॉ. सुशील जोशी

थियोडोर एशरिश ने जब एशरीशिया कोली (ई. कोली)बैक्टीरिया की खोज की थी तब उन्होंने ज़रा भी नहीं सोचा था कि साधारण-सा दिखने वाला यह बैक्टीरिया जीव विज्ञान अनुसंधान में इतने अहम योगदान देगा और कमोबेश आणविक जीव विज्ञान का आगाज़ करने वाला जीव बन जाएगा। तीन भागों में प्रस्तुत इस लेख शृंखला में हम ई. कोली के इन योगदान और यात्रा पर बात करेंगे। तो, चलिए चलते हैं ई. कोली के सफर पर…
सन 1885 में एक जर्मन-ऑस्ट्रियन शिशुरोग विशेषज्ञ, थियोडोर एशरिश (Theodor Escherich) ने नवजात बच्चों की आंतों में से कुछ बैक्टीरिया प्राप्त किए थे। ये बैक्टीरिया ग्राम नेगेटिव थे, थोड़ी चहलकदमी करते थे और सबसे बड़ी बात थी कि ये कई उपलब्ध कृत्रिम पोषक माध्यमों पर भलीभांति वृद्धि करते थे। एशरिश ने इन्हें नाम दिया था बैक्टीरियम कोली कम्यून (Bacterium coli commune)। आगे चलकर 1919 में इसे खोजकर्ता के नाम पर एशरीशिया कोली (Escherichia coli – ई. कोली) नाम मिला।
खोजकर्ता को तनिक भी आभास नहीं था कि सूक्ष्मदर्शी में यह साधारण-सा दिखने वाला बैक्टीरिया जीव विज्ञान अनुसंधान में इतना नाम कमाएगा और कमोबेश आणविक जीव विज्ञान का आगाज़ करने वाला जीव बन जाएगा।
नेचर में प्रकाशित एक समीक्षा पर्चे के अनुसार ई. कोली कम से कम 3,12,000 शोध पत्रों का विषय रहा है। इसी बैक्टीरिया पर अनुसंधान के लिए 12 नोबेल पुरस्कार मिल चुके हैं (अनुसंधान और नोबेल पुरस्कारों की जानकारी अगले पन्ने पर)।
फिर 1907 में रुडोल्फ मैसिनी (Rudolf Massini) ने एक सूक्ष्मजीव का विवरण प्रस्तुत किया – बैक्टीरियम कोली म्यूटेबाइल (Bacterium coli mutabile)। इसे Escherichia coli-mutabile भी कहते हैं और यह ई. कोली का एक उत्परिवर्तित संस्करण है। मैसिनी ने जब इसे प्राप्त किया तो शुरुआत में यह लैक्टोस पाचन में अक्षम (लैक्टोस नेगेटिव) था, लेकिन आगे चलकर इसमें कुछ उभार विकसित हो गए जो लैक्टोस का किण्वन कर सकते थे। यह खोज थी जिसने ई. कोली पर आगे अध्ययन की प्रेरणा दी जिनकी बदौलत आणविक जीव विज्ञान का सूत्रपात हुआ।
1940 के दशक में एम. डेलब्रुक (M. Delbrück) और एस. ई. लूरिया (S. E. Luria) ई. कोली और उसे संक्रमित करने वाले वायरसों (बैक्टीरियोफेज या फेज) पर काम कर रहे थे। उन्होंने पाया कि बैक्टीरिया में उत्परिवर्तन स्वत: स्फूर्त होते हैं। हर्शे (A. D. Hershey) और चेज़ (M. Chase) यह भी दिखा पाए कि वायरस का जो हिस्सा बैक्टीरिया को संक्रमित करता है, वह प्रोटीन नहीं बल्कि डीएनए होता है।
| ग्राम और ग्राम नेगेटिवग्राम अभिरंजन (staining) की एक विधि है, जिसका विकास हांस क्रिश्चियन ग्राम नाम के वैज्ञानिक ने 1884 में किया था। ग्राम नेगेटिव का मतलब होता है कि ये बैक्टीरिया इस विधि से अभिरंजित नहीं होते। |
लगभग इसी समय एस. बेंज़र (Seymour Benzer) ने आनुवंशिकी की कामकाजी इकाई को परिभाषित किया और जे. लेडरबर्ड (J. Lederberg) और ई. टेटम (E. Tatum) ने
यह खोज की कि बैक्टीरिया में लैंगिक पुनर्संयोजन होता है। कुछ वर्षों के बाद लेडरबर्ग ने गुणसूत्रों के बाहर कुछ जेनेटिक कणों (DNA fragments) की खोज की और बैक्टीरियोफेज के ज़रिए जेनेटिक हस्तांतरण का तरीका खोजा। इसे ट्रांसडक्शन कहते हैं।
1949 में पैरिस के पाश्चर इंस्टीट्यूट में ए. ल्वॉफ (A. Lwoff) ने लायसोजेनी की विधि का खुलासा किया। (लायसोजेनी वह प्रक्रिया होती है जिसमें कोई वायरस अपना जीनोम संक्रमित बैक्टीरिया के जीनोम में जोड़ देता है।) इसके बाद जल्दी ही एफ. जेकब (F. Jacob) और ई. वोलमैन (E. Wollman) ने ई. कोली

की लैंगिक प्रक्रिया का खुलासा किया और बैक्टीरिया के गुणसूत्रों की वृत्ताकार संरचना को स्थापित किया।
फिर 1960 के दशक में जे. मोनोड (J. Monod) और एफ. जेकब ने ई. कोली के लैक्टोस तंत्र का विश्लेषण करके जीन नियमन का ऑपेरॉन मॉडल प्रस्तावित किया और मेसेंजर आरएनए (messenger RNA) की अवधारणा प्रस्तुत की।

आगे चलकर ई. कोली तथा उसे संक्रमित करने वाले वायरसों की मदद से पुनर्संयोजित डीएनए (recombinant DNA) तकनीक का विकास हुआ।
ये थे ई. कोली पर हुए अनुसंधानों के कुछ महत्वपूर्ण पड़ाव। लेख के अगले भाग में हम चलेंगे आणविक जीव विज्ञान के एक लंबे सफर पर। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo credit- https://en.wikipedia.org/wiki/Escherichia_coli