एक शैवाल का नेत्रबिंदु बना चिकित्सा नोबेल का आधार

दौलतसिंग सिंह तंवर

इस वर्ष का चिकित्सा नोबेल मानव मस्तिष्क को समझने की जिस खोज के लिए मिला है, उसकी शुरुआत किसी प्रयोगशाला में नहीं बल्कि पोखर के एक नन्हे शैवाल से हुई थी। यह पुरस्कार तीन वैज्ञानिकों, कार्ल डाइसरॉथ, पीटर हेगेमान और जॉर्ज नागल को दिया गया। उन्हें ‘प्रकाश से खुलने व बंद होने वाले आयन चैनलों और ऑप्टोजेनेटिक्स से जुड़ी खोजों’ के लिए सम्मानित किया गया है। यह कहानी एक ऐसे एक-कोशिकीय शैवाल से शुरू होती है, जिसे हम सामान्यतः किसी ठहरे हुए पानी में हरे रंग की परत के रूप में देखकर आगे बढ़ जाते हैं; उस शैवाल का नाम है क्लैमायडोमोनास।

समिति ने कहा है कि इस कार्य ने तंत्रिका विज्ञान के एक नए युग की आधारशिला रखी है।

मस्तिष्क की पुरानी पहेली

इस खोज का महत्व समझने के लिए पहले मस्तिष्क की मूल समस्या को समझना होगा। हमारे मस्तिष्क में लगभग 86 अरब तंत्रिका कोशिकाएं (न्यूरॉन्स) होती हैं। हर न्यूरॉन हज़ारों अन्य न्यूरॉन्स से जुड़ा होता है। ये कोशिकाएं विद्युत और रासायनिक संकेतों के सहारे आपस में संवाद करती हैं; हमारा सोचना, याद रखना, डरना, प्रेम करना, चलना और सोना, सब इसी संवाद का परिणाम है।

समस्या यह थी कि इन कोशिकाओं के संवाद को समझा कैसे जाए? वैज्ञानिक पहले इलेक्ट्रोड डालकर मस्तिष्क की विद्युत गतिविधि को मापते थे। इससे यह तो पता चलता था कि कोई गतिविधि हो रही है, लेकिन इलेक्ट्रोड से उद्दीपन देने पर आसपास की सैकड़ों किस्म की कोशिकाएं एक साथ प्रभावित हो जाती थीं। ऐसे में किसी विशिष्ट न्यूरॉन की सक्रियता को देख पाना मुश्किल था।

नोबेल विजेता फ्रांसिस क्रिक ने 1979 में ही इस चुनौती की ओर संकेत किया था कि तंत्रिका विज्ञान की सबसे बड़ी आवश्यकता बाकी सबको अछूता छोड़कर किसी एक विशेष प्रकार की कोशिका को नियंत्रित करने की विधि है। उन्होंने यह अनुमान भी लगाया था कि इसके लिए शायद प्रकाश एक उपयोगी साधन बन सकता है। परंतु उस समय किसी को नहीं पता था कि मस्तिष्क की कोशिकाओं को प्रकाश के प्रति संवेदनशील कैसे बनाया जाए। उत्तर बीस वर्ष से अधिक बाद आया और वह भी पादप और शैवाल विज्ञान की जिज्ञासा से।

एक–कोशिकीय हरित शैवाल

क्लैमायडोमोनास वंश की सबसे प्रसिद्ध प्रजाति क्लैमायडोमोनास राइनहार्टी का उपयोग एक मॉडल जीव के रूप में उपयोग होता रहा है। इस एक-कोशिकीय जीव की लंबाई मनुष्य के बाल की मोटाई की आधे से भी कम होती है। इसकी कोशिका में प्याले के आकार का एक हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) होता है जिसमें क्लरोफिल पाया जाता है। यह जीव अपना भोजन प्रकाश संश्लेषण से बनाता है।

इसके अग्र-भाग में दो चाबुक जैसी पतली पूंछें (कशाभिकाएं – फ्लैजेला) होती हैं जिनकी मदद से यह जीव पानी में तैरता है। इसके जीवन का संघर्ष सीधा है, धूप बहुत कम हो तो भोजन नहीं बनेगा और बहुत तेज़ हो तो क्लोरोफिल को क्षति पहुंचेगी; इसलिए यह जीव प्रकाश की तीव्रता को परखकर कभी उसकी ओर बढ़ता है, तो कभी उससे दूर भागता है। इस व्यवहार को प्रकाशानुवर्तन कहते हैं।

इस काम के लिए क्लैमायडोमोनास की कोशिका में एक छोटा-सा नारंगी-लाल धब्बा (नेत्रबिंदु) होता है, यह हरितलवक के भीतर स्थित कई वर्णकों की परतों से बनी एक संरचना है। नेत्रबिंदु यह पहचानने में मदद करता है कि प्रकाश किस दिशा से आ रहा है।

वैज्ञानिकों के सामने प्रश्न यह था कि यह एक-कोशिकीय जीव प्रकाश को भांपकर अपनी कशाभिकाओं को आदेश कैसे देता है। इस प्रश्न के पीछे कोई चिकित्सकीय लक्ष्य नहीं था। यह तो मूलभूत जिज्ञासा थी।

नेत्रबिंदु का रहस्य और पीटर हेगेमान

1980 के दशक में यह संकेत मिला कि क्लैमायडोमोनास में प्रकाश भांपने वाला अणु रोडॉप्सिन परिवार का कोई प्रोटीन हो सकता है। रोडॉप्सिन ही हमारी आंख के रेटिना में प्रकाश को भांपता है।

उस समय मैक्स प्लांक जैव रसायन संस्थान में कार्यरत जर्मन वैज्ञानिक पीटर हेगेमान और उनके सहयोगियों ने 1990 के दशक के आरंभ में दिखाया कि नेत्रबिंदु पर प्रकाश पड़ने के कुछ ही मिलीसेकंड के भीतर कोशिका में विद्युत धारा उत्पन्न हो जाती है। यह गति असाधारण थी। यदि कोई लंबी रासायनिक शृंखला होती, तो प्रतिक्रिया इतनी त्वरित नहीं होती। यानी प्रकाश-ग्राही प्रोटीन सीधे विद्युत संकेत उत्पन्न कर रहा है।

हेगेमान ने पाया कि नेत्रबिंदु में एक विशेष प्रोटीन है, जो नीले प्रकाश को विद्युत संकेत में बदल देता है। यह विद्युत संकेत जीव को प्रकाश की ओर तैरने के लिए प्रेरित करता है। पर प्रोटीन की सही पहचान, उसके जीन को खोजना, उसे पृथक करना और यह सिद्ध करना कि वही प्रकाश से विद्युत धारा बनाता है, यह सब आसान नहीं था।

जॉर्ज नागल – चैनल–रोडॉप्सिन की खोज

जॉर्ज नागल, उन दिनों फ्रैंकफर्ट के मैक्स प्लांक जैव-भौतिकी संस्थान में कार्यरत थे और आज वुर्त्सबर्ग विश्वविद्यालय से जुड़े हैं। नागल कोशिका झिल्ली में आयनों (सोडियम, पोटैशियम और कैल्शियम जैसे आयनों) के आवागमन के अध्येता थे। जहां हेगेमान शैवाल और प्रकाश-संवेदन के

विशेषज्ञ थे वहीं नागल के पास थी आयन चैनलों के विद्युतीय अध्ययन

की पद्धति पर महारत। इक्कीसवीं सदी के आरंभ में क्लैमायडोमोनास के जीन अनुक्रमों की जानकारी उपलब्ध होने के   साथ उन्होंने ऐसे जीन खोजे जो रोडॉप्सिन से मिलते-जुलते प्रोटीन बनाते थे।

2002 में उन्होंने पहले प्रोटीन चैनल-रोडॉप्सिन-1 का वर्णन किया। अगले वर्ष, 2003 में, दूसरे प्रोटीन, चैनल-रोडॉप्सिन-2, की विशेषताएं सामने आईं। यह प्रोटीन अधिक उपयोगी निकला। जब इस प्रोटीन्स के जीन को मेंढक के अंडाणुओं और मानव भ्रूणीय वृक्क कोशिकाओं में डालकर इन कोशिकाओं पर नीला प्रकाश डाiला गया, तो झिल्ली में विद्युत धारा प्रवाहित होने लगी। प्रकाश हटाते ही धारा रुक गई।

इस खोज की मूल बात यह थी कि यह प्रोटीन दो काम एक साथ करता है। वह प्रकाश का ग्राही भी है और आयन चैनल भी।

इसकी विशेषता यह थी कि इसमें किसी जटिल रासायनिक शृंखला की आवश्यकता नहीं थी। यह एक ही प्रोटीन, एक ही स्विच था। यही कारण है कि इसकी गति इतनी तेज़ थी, क्योंकि तंत्रिका कोशिकाएं भी मिलीसेकंड की गति से काम करती हैं। यह प्रोटीन किसी भी कोशिका को प्रकाश से खोलने की संभावना लेकर आया।

कार्ल डाइसरॉथ – तंत्रिका विज्ञान का प्रवेश

अब तक की खोज वनस्पति विज्ञान और जैव भौतिकी की थी। इसे तंत्रिका विज्ञान और चिकित्सा तक पहुंचाने का श्रेय बहुत हद तक स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में जैव-अभियांत्रिकी और मनोचिकित्सा के प्रोफेसर कार्ल डाइसरॉथ को जाता है। उनको लगता था कि अवसाद, दुश्चिंता और सामाजिक व्यवहार जैसे विकारों के पीछे के तंत्रिका परिपथों को हम कितना कम जानते हैं। मनोचिकित्सा की अधिकांश दवाइयां पूरे मस्तिष्क पर असर डालती हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं होता कि वास्तव में किन कोशिकाओं पर क्या असर होता है।

2000 के दशक के मध्य में डाइसरॉथ और उनके साथियों ने सोचा कि यदि चैनल-रोडॉप्सिन को किसी जीवित जंतु के विशेष न्यूरॉन्स में पहुंचा दिया जाए, तो उन्हीं न्यूरॉनों को प्रकाश से सक्रिय किया जा सकता है। वर्ष 2005 में उनकी प्रयोगशाला ने प्रदर्शित किया कि चूहे के न्यूरॉन्स में चैनल-रोडॉप्सिन-2 को अभिव्यक्त कराने पर नीले प्रकाश की एक चमक से न्यूरॉन मिलीसेकंड की सटीकता से विद्युत आवेग उत्पन्न करने लगते हैं।

इसके बाद के वर्षों में डाइसरॉथ की प्रयोगशाला ने इस तकनीक को बहुत आगे बढ़ाया। उन्होंने ऐसे प्रकाशीय तंतु विकसित किए जिन्हें चूहे के मस्तिष्क में गहराई तक पहुंचाया जा सकता था। उन्होंने चैनल-रोडॉप्सिन के साथ-साथ ऐसे प्रोटीन भी शामिल किए जो प्रकाश पड़ने पर कोशिका को शांत कर देते हैं। इससे वैज्ञानिक अब किसी न्यूरॉन को चालू भी कर सकते थे और बंद भी। इसी पूरी तकनीक को ऑप्टोजेनेटिक्स नाम मिला।

ऑप्टोजेनेटिक्स काम कैसे करता है इसे सरल भाषा में तीन चरणों में समझा जा सकता है।

पहला चरण – चैनल-रोडॉप्सिन का जीन किसी हानिरहित वायरस में रखते हैं और उसे जंतु के मस्तिष्क के किसी निश्चित क्षेत्र में पहुंचाते हैं। वायरस जीन को न्यूरॉन्स के भीतर पहुंचा देता है।

दूसरा चरण – कोशिका का चयन। वैज्ञानिक ऐसी आनुवंशिक युक्तियां लगाते हैं कि चैनल-रोडॉप्सिन केवल चुनिंदा कोशिकाओं में बने, बाकी कोशिकाओं में यह प्रोटीन बनता ही नहीं।

तीसरा चरण – मस्तिष्क में एक बारीक प्रकाशीय तंतु प्रविष्ट कराया जाता है। प्रकाश का स्विच दबाते ही केवल वे विशेष न्यूरॉन सक्रिय होते हैं जिनमें चैनल-रोडॉप्सिन मौजूद है। प्रकाश हटाते ही वे शांत हो जाते हैं।

यानी अब उन कोशिकाओं को सक्रिय करके देखा जा सकता है कि क्या कोई व्यवहार सचमुच उन्हीं से उत्पन्न होता है।

प्रयोगशाला से मिली नई समझ

ऑप्टोजेनेटिक्स ने पिछले डेढ़ दशक में तंत्रिका विज्ञान को बदल दिया। कुछ उदाहरण इसकी व्यापकता दिखाते हैं। स्मृति के अध्ययन में चूहों पर ऐसे प्रयोग हुए जिनमें किसी विशेष याद से जुड़ी कोशिकाओं को चिन्हित किया गया और बाद में प्रकाश डालकर उन्हीं को सक्रिय किया गया। परिणामस्वरूप जंतु ने वह भय-स्मृति पुनः जी ली, जबकि वह उस स्थान पर था ही नहीं। इससे यह धारणा पुष्ट हुई कि स्मृतियां कोशिकाओं के विशिष्ट समूहों में अंकित होती हैं। पार्किंसन रोग के अध्ययन में डाइसरॉथ की प्रयोगशाला ने मस्तिष्क के उन विशेष मार्गों को पहचाना जिनके उद्दीपन से जंतु की गति में सुधार होता है। यह जानकारी कई उपचार विधियों को बेहतर बनाने में उपयोगी रही। 

स्वाभाविक प्रश्न यह है कि क्या यह तकनीक रोगियों के काम आ सकती है। हालांकि इस तकनीक के चिकित्सकीय उपयोग की दिशा में कुछ आरंभिक प्रयास हुए हैं, लेकिन सफर अभी लंबा है। सबसे उल्लेखनीय प्रयास दृष्टि लौटाने से जुड़ा है। कुछ आनुवंशिक रोगों, जैसे रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा में, आंख के रेटिना की प्रकाश-संवेदी कोशिकाएं धीरे-धीरे नष्ट हो जाती हैं और व्यक्ति पूरी तरह दृष्टिहीन हो जाता है। पर रेटिना की भीतरी परतों की कुछ कोशिकाएं फिर भी बची रहती हैं। विचार यह है कि इन बची हुई कोशिकाओं में प्रकाश-संवेदी प्रोटीन का जीन पहुंचाकर उन्हें ही नया प्रकाश-ग्राही बना दिया जाए। 2021 में एक मरीज़ के उपचार की रिपोर्ट आई थी।

चिकित्सा क्षेत्र में सीमाएं

हर नई तकनीक की तरह ऑप्टोजेनेटिक्स की भी सीमाएं हैं; पहली सीमा यह है कि इसमें जीन उपचार की आवश्यकता होती है। मनुष्य की कोशिकाओं में विदेशी जीन पहुंचाना सुरक्षा और नैतिकता, दोनों दृष्टियों से गंभीर विषय है। दूसरी सीमा प्रकाश की पहुंच की है। मस्तिष्क के गहरे हिस्सों तक प्रकाश पहुंचाने के लिए तंतु डालने पड़ते हैं, जो शल्य क्रिया की मांग करते हैं। तीसरी सीमा प्रतिरक्षा तंत्र की प्रतिक्रिया की है, क्योंकि शरीर शैवाल के प्रोटीन को विदेशी मानकर उस पर प्रतिक्रिया कर सकता है। चौथी सीमा यह है कि चूहों में जो परिपथ किसी व्यवहार को नियंत्रित करता दिखता है, वह मनुष्य में भी ठीक उसी तरह काम करे, ऐसा आवश्यक नहीं क्योंकि मानव मस्तिष्क कहीं अधिक जटिल है।

मूलभूत शोध का महत्व

इस पुरस्कार की सबसे बड़ी सीख शायद मूलभूत शोध के महत्व में निहित है। जब हेगेमान एक शैवाल के प्रकाशानुवर्तन का रहस्य खोज रहे थे, तब उनके सामने कोई चिकित्सकीय लक्ष्य नहीं था। कोई यह नहीं कह सकता था कि इससे अंधेपन का इलाज होगा या मस्तिष्क के नक्शे बनेंगे। वे तो केवल यह जानना चाहते थे कि एक नन्हा जीव प्रकाश को कैसे महसूस करता है। विज्ञान का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा है। जीवाणुओं की प्रतिरक्षा प्रणाली पर शोध से जीन संपादन की तकनीक निकली। गर्म पानी के सोतों में रहने वाले जीवाणुओं से वह एंज़ाइम मिला जिस पर आज की डीएनए जांच टिकी है और अब तालाब की एक काई से मस्तिष्क को समझने का नया औज़ार मिला है। कौन जाने, हर प्रजाति के भीतर हज़ारों वर्षों के विकास से तैयार हुए ऐसे अणु और तंत्र हैं, जो शायद भविष्य की किसी चिकित्सा की कुंजी हों। (स्रोत फीचर्स)

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भौतिकी का नोबेल

इस साल का भौतिकी नोबेल पुरस्कार विस्कॉन्सिन-मैडिसन विश्वविद्यालय के फ्रांसिस हाल्ज़ेन को न्यूट्रिनो कणों सम्बंधी शोध कार्य तथा आइसक्यूब न्यूट्रिनो वेधशाला में उनके निर्णायक योगदान व नेतृत्व के लिए दिया गया है।

सामान्य लोगों के लिए न्यूट्रिनो का महत्व स्वत: स्पष्ट नहीं है। दरअसल, न्यूट्रिनो की उपस्थिति का सुझाव सबसे पहले वोल्फगैंग पौली ने 1930 में दिया था। उन्होंने यह सुझाव रेडियोसक्रिय तत्वों के विघटन के वर्णक्रम के एक विशेष पहलू की व्याख्या के लिए दिया था। यह प्रस्ताव कतिपय गणनाओं पर आधारित था, न्यूट्रिनो को एक वास्तविक कण के रूप में खोजना ज़रूरी था। न्यूट्रिनो का पहला प्रायोगिक प्रमाण वर्ष 1956 में सी. कोवान और एफ. राइन्स ने प्रस्तुत किया था। उन्होंने नाभिकीय रिएक्टर का उपयोग एंटी-इलेक्ट्रॉन न्यूट्रिनो के स्रोत के तौर पर किया था। 1995 में राइन्स को अकेले ही ‘न्यूट्रिनो को ताड़ने’ के लिए नोबेल सम्मान दिया गया क्योंकि तब तक कोवान का निधन हो चुका था।

इसके बाद न्यूट्रिनो अनुसंधान के लिए कई नोबेल पुरस्कार दिए जा चुके हैं। राइन्स व कोवान द्वारा खोजे जाने के बाद फौरन यह समझ बन गई थी कि ये कण ब्रह्मांड से सूचनाएं प्राप्त करने के लिए आदर्श हैं। सबसे बड़ी बात तो यह पता चली थी कि न्यूट्रिनो विद्युतीय दृष्टि से उदासीन होते हैं। लिहाज़ा, ये मात्र दुर्बल नाभिकीय अथवा गुरुत्वीय अंतर्क्रिया में शामिल होते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि अपने दूरस्थ ब्रह्मांडीय स्रोत से निकलकर ये पृथ्वी तक बगैर किसी व्यवधान या विचलन के पहुंचते हैं। इस संदर्भ में 2002 में आर. डेविस जूनियर और एम. कोशिबा को ब्रहमांडीय न्यूट्रॉन के डिटेक्शन के लिए नोबेल से नवाज़ा गया था। उन्होंने सूरज से आने वाले और डेढ़ लाख वर्ष पूर्व घटित एक सुपरनोवा से पृथ्वी पर पहुंचने वाले मेगाइलेक्ट्रॉनवोल्ट न्यूट्रिनो का अवलोकन किया था।

फ्रांसिस हाल्ज़ेन का योगदान यह रहा कि उन्होंने यह पहचाना कि दणिक्षी ध्रुव के बर्फ का इस्तेमाल न्यूट्रिनो के अध्ययन हेतु किया जा सकता है। वैसे तो न्यूट्रिनो हर जगह होते हैं लेकिन वे अन्य कणों या बलों से इतनी कम अंतर्क्रिया करते हैं कि उन्हें पकड़ पाना मुश्किल होता है। वे पृथ्वी में से या हमारे शरीर में से होकर गुज़र जाते हैं और हमें पता भी नहीं चलता।

बहुत ही कम ऐसा होता है कि कोई न्यूट्रिनो किसी परमाणु के नाभिक से अंतर्क्रिया करता है। इस क्षण यदि कोई व्यक्ति सही जगह पर सही उपकरणों के साथ मौजूद हो तो इसे भांपा जा सकता है।

यह बात तो वैज्ञानिकों को एक अरसे से पता रही है कि ब्रह्मांड में कुदरती पार्टिकल एक्सलरेटर मौजूद हैं जो हमारे द्वारा निर्मित एक्सलरेटर की तुलना में लाखों गुना अधिक ऊर्जावान कण छोड़ते रहते हैं। लेकिन इन स्रोतों के बारे में हम बहुत कम जान पाए थे। वैसे तो न्यूट्रिनो भी उन्हीं परिवेशों

में उत्पन्न होते हैं, जहां अन्य कण बनते हैं लेकिन ये अपनी ऊर्जा गंवाए बगैर और दिशा बदले बगैर पृथ्वी तक पहुंचते हैं। अर्थात ये उन स्रोतों के सम्बंध में अनोखी जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं।

हाल्ज़ेन ने दक्षिण ध्रुव पर न्यूट्रिनो को ताड़ने व उनका अध्ययन करने का विचार 1988 में पेश किया था। जब कोई न्यूट्रिनो किसी परमाणु नाभिक से अंतर्क्रिया करता है तो प्रकाश की एक चमक पैदा होती है जिसे दक्षिणी ध्रुव के स्वच्छ बर्फ में पकड़ा जा सकता है। दक्षिणी ध्रुव के कई फायदे हैं – जैसे यह तमाम किस्म के व्यवधानों से मुक्त है और भूकंपों के अभाव के चलते भौगोलिक दृष्टि से स्थिर है। हाल्ज़ेन के विचार को कई शोधकर्ताओं का समर्थन मिला और बर्फ में सेंसर्स स्थापित करने का शुरुआती परीक्षण किया गया।

वैसे, अत्यंत ऊर्जावान ब्रह्मांडीय न्यूट्रिनो बहुत दुर्लभ होते हैं, इसलिए पर्याप्त संख्या में न्यूट्रिनो और परमाणु नाभिकों की टक्करों को पकड़ने के लिए भारी मात्रा में बर्फ की ज़रूरत थी। लिहाज़ा, पूरे 1 घन किलोमीटर बर्फ में फैली आइसक्यूब वेधशाला का निर्माण 2011 में पूरा हुआ था। इस बर्फ का वज़न होगा 1 अरब मीट्रिक टन।

इस वेधशाला की मदद से ऐसे न्यूट्रिनो की खोज की गई जो हमारे सौर मंडल के बाहर उत्पन्न हुए थे। हाल्ज़ेन के नेतृत्व में काम कर रही अंतर्राष्ट्रीय टीम ने एक अनोखा उपकरण उपलब्ध कराया है जो खगोल शास्त्रीय अध्ययनों के एक नए युग का आगाज़ करेगा। (स्रोत फीचर्स)

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सांप का भ्रूण कुंडली मारकर क्यों विकसित होता है

अधिकांश सांप अंडे देते हैं, हालांकि कुछ सांप हैं जो बच्चे भी पैदा करते हैं। लेकिन यहां बात करेंगे सांपों के भ्रूण के विकास की एक खूबी की।

देखा गया है कि विकास के दौरान जब सांप के भ्रूण की लंबाई बढ़ती है तो वह सीधा नहीं बढ़ता बल्कि कुंडली मार लेता है। आम तौर पर यह कुंडली क्लॉकवाइस (यानी घड़ी की सुई घूमने की दिशा में) घूमती है। करंट बायोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन में इन दोनों चीज़ों की व्याख्या प्रस्तुत की गई है – कुंडली क्यों बनती है और एक ही दिशा में क्यों घूमती है?

इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने 34 प्रजातियों के सांपों के विकसित होते भ्रूणों का अवलोकन किया। पाया गया कि कुल मिलाकर 65 प्रतिशत भ्रूणों में कुंडली क्लॉकवाइस बनी थी। यह भी देखा गया कि शुरुआती अवस्था में क्लॉकवाइस कुंडली ज़्यादा आम थी।

फिर शोधकर्ताओं ने केप हाउस स्नेक (Boaedon capensis) का ज़्यादा बारीकी से अध्ययन किया। देखा गया कि सारे 146 भ्रूणों में कुंडलियां क्लॉकवाइस थीं। दूसरी ओर, अन्य ऐसी ही गैर-सर्प नलिकाकार प्रजातियों में कुंडलियां क्लॉकवाइस और एंटीक्लॉकवाइस दोनों लगभग बराबर थीं।

सांप के भ्रूण की कुंडलियों के राज़ का खुलासा तब हुआ जब शोधकर्ताओं ने भ्रूण की आंतरिक त्री-विमीय संरचना को देखा। इसके लिए उन्होंने एक्स-रे चित्रण की एक विशेष तकनीक  माइक्रो-सीटी स्कैनिंग का उपयोग किया। पता चला कि सांप के बढ़ते भ्रूण में शरीर की लंबाई तो तेज़ी से बढ़ती है और वह उसकी आहार नाल की वृद्धि को पीछे छोड़ देती है। अब छोटी रह गई आहार नाल बढ़ते शरीर को पीछे खींचती है। इस खींचतान का परिणाम होता है कि शरीर में ऐंठन आ जाती है – वह कुंडली का आकार ग्रहण कर लेता है।

दूसरा सवाल था कि इस कुंडली के घुमाव की दिशा क्लॉकवाइस ही क्यों होती है। इसका सम्बंध भ्रूण में योक थैली की स्थिति से है। सांप के भ्रूण में यह थैली भ्रूण के बाईं ओर स्थित होती है, तो शरीर इसके विपरीत दिशा में घूम जाता है।

यह शोध वैज्ञानिकों के एक अंतर्राष्ट्रीय दल द्वारा किया गया था। शोध पत्र की प्रमुख लेखक ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय के एलेक्ज़ेंड्रा वेबर ने कहा है कि प्रकृति में कई कुंडलियां पाई जाती हैं (जैसे घोंघों की खोल या हमारी अपनी आंत) और यह अध्ययन इन्हें समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। (स्रोत फीचर्स)

रसायन शास्त्र का नोबेल

इस वर्ष का रसायन नोबेल पुरस्कार एक पुरानी गुत्थी को सुलझाने के लिए पैरिस विश्वविद्यालय-दक्षिण के हेनरी बी. कागन और टोकियो विज्ञान विश्वविद्यालय के केन्सो सोई को प्रदान किया गया है।

प्रकृति में पाए जाने वाले कई ऐसे रासायनिक पदार्थ हैं जिनके अणुसूत्र और परमाणुओं की जमावट तो एक जैसी होती है लेकिन उनकी त्रि-विमीय संरचना में अंतर होता है। अमीनो अम्ल, शर्कराएं व कई अन्य अणुओं में यह विशेषता होती है। होता यह है कि त्रिविमीय संरचना में अंतर के कारण ऐसे पदार्थ दो रूपों में पाए जाते हैं जो एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब होते हैं – जैसे हमारे दो हाथ। इन्हें इनेन्शियोमर कहते हैं और ऐसे अणुओं को कायरल कहा जाता है। रसायन शास्त्र में इन्हें D तथा L इनेन्शियोमर के चिंह से सुशोभित किया जाता है।

मज़ेदार बात यह है कि जैविक तंत्रों में बड़े अणुओं के संश्लेषण के दौरान इनमें से एक (या तो D या L) का उपयोग होता है। लिहाज़ा, सजीवों में दोनों इनेन्शियोमर नहीं पाए जाते, कोई एक ही पाया जाता है। जैसे प्राय: अमीनो एसिड के L इनेन्शियोमर तथा शर्कराओं के D इनेन्शियोमर पाए जाते हैं। अब यह तो जानी-मानी बात है कि अमीनो अम्लों की शृंखलाओं से प्रोटीन बनते हैं और शर्कराओं की शृंखलाएं पॉलीसेकराइड बनाती हैं।

वैज्ञानिकों के लिए यह एक पहेली रही है कि सजीवों में ऐसी क्या खास बात है कि उनमें किसी एक ही इनेन्शियोमर का संश्लेषण होता है और वे इसी इनेन्शियोमर का इस्तेमाल प्रोटीन जैसे अणुओं के निर्माण में करते हैं। यानी रसायन शास्त्र की भाषा में हम कहेंगे जैविक तंत्रों में ये अणु होमो-कायरल होते हैं।

लेकिन प्रयोगशाला में हम जब भी अमीनो अम्ल या शर्करा जैसे इन यौगिकों का संश्लेषण करते हैं तो दोनों इनेन्शियोमर बराबर मात्रा में बनते हैं। समस्या यह है कि यदि आप ऐसे यौगिकों का उपयोग जैविक कार्यों के लिए करना चाहते हैं तो आपको एक ही इनेन्शियोमर चाहिए।

यही थी गुत्थी कि सजीवों में कैसे इनेन्शियोमर्स में से एक का ही चुनकर संश्लेषण होता है। हेनरी कागन और केन्सो सोई ने इसी समस्या को सुलझाया है कि होमो-कायरेलिटी कैसे स्वत: प्रकट हो जाती है। उन्होंने इसके लिए अद्भुत रासायनिक अभिक्रियाएं विकसित की हैं।

दरअसल, इस संदर्भ में पहला अहम कदम कागन ने 1986 में उठाया था और एक तरीका खोजा था जिसके द्वारा रासायनिक अभिक्रियाओं के साथ छेड़खानी की जा सकती थी। इसकी मदद से वे कोई एक इनेन्शियोमर शुद्ध रूप में तो नहीं बना सके लेकिन एक इनेन्शियोमर का निर्माण काफी ज़्यादा अनुपात में कर पाए।

अगला कदम केन्सो सोई ने उठाया था और उन्होंने वह अभिक्रिया विकसित कर ली जिसमें होमोकायरल यौगिक बनाने की संभावना थी।

यहां ब्रिस्टल विश्वविद्यालय के सैद्धांतिक भौतिक शास्त्री फ्रेडरिक चार्ल्स फ्रैंक के योगदान का ज़िक्र मुनासिब है।

फ्रैंक ने 1953 में एक गणितीय मॉडल पेश किया था जिससे यह समझने में मदद मिलती थी कि यदि मिश्रण में दो इनेन्शियोमर्स में से एक की भी थोड़ी अतिरिक्त मात्रा हो, तो होमोकायरेलिटी कैसे हासिल की जा सकती है। वैसे उन्होंने यह मॉडल जैविक तंत्रों में होमोकायरेलिटी की व्याख्या के लिए प्रस्तुत किया था लेकिन उसका उपयोग आगे सफलतापूर्वक प्रयोगशाला में भी किया गया।

फ्रैंक के मॉडल का आधार यह था कि ऐसी अभिक्रिया में एक ऐसा यौगिक होगा जो स्वयं के निर्माण का उत्प्रेरक हो (यानी ऑटो-केटालिस्ट हो) और दूसरे इनेन्शियोमर के संश्लेषण का प्रति-उत्प्रेरक (एंटी-कैटालिस्ट) हो। ऐसे स्व-उत्प्रेरण के कई उदाहरण मिलते हैं। ऑटो-कैटालिस्ट वे यौगिक होते हैं, जो किसी अभिक्रिया के दौरान बनते हैं और फिर अपने जैसे यौगिक बनाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

फ्रैंक ने दूसरी शर्त यह रखी थी कि कोई ऐसा उत्प्रेरक होना चाहिए जो किसी एक इनेन्शियोमर  उत्पादन करवाए यानी असममित उत्प्रेरक हो। इस तरह के उत्प्रेरकों पर भी काफी अनुसंधान हुआ है और इस संदर्भ में 2001 तथा 2021 में नोबेल पुरस्कार दिए जा चुके हैं।

तीसरी शर्त प्रति-उत्प्रेरण और स्व-उत्प्रेरण व असममित उत्प्रेरण के एक साथ मिलने की थी।   

अंतत: 2003 में सफलता हाथ लगी। कागन और सोई ने एक ऐसी रासायनिक अभिक्रिया प्रस्तुत की जिसमें दो में से एक इनेन्शियोमर ही बनेगा। यहां उसके विस्तार में जाना तो संभव नहीं है लेकिन साफ है कि यह कदम रसायन शास्त्र की हमारी समझ और जीव विज्ञान और चिकित्सा की दृष्टि से कितना महत्वपूर्ण है। (स्रोत फीचर्स)

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एक पुरातन वायरस मध्ययुगीन ग्रंथ में छिपा मिला

प्राचीन रोम में भेड़ों को एक रोग हुआ करता था – इसमें भेड़ों के शरीर पर फफोले बन जाते थे। यह शीपपॉक्स का एक सामान्य लक्षण है। यह रोग बहुत घातक है और भेड़ों के पूरे के पूरे झुंड का सफाया कर सकता है। इस रोग की उत्पत्ति एक पहेली ही रही है।

अब, साइंस एडवांसेस में प्रकाशित एक अध्ययन में युनिवर्सिटी कॉलेज डबलिन के जेनेटिक विज्ञानी केविन डैली के नेतृत्व में एक शोध समूह ने इस पहेली का आश्चर्यजनक खुलासा किया है। इस रोगजनक का पता मध्य युग की पुस्तकों और कानूनी दस्तावेज़ों की खोजबीन से मिला है। ये पुस्तकें और दस्तावेज़ पार्चमेंट पर लिखे गए थे। गौरतलब है कि पार्चमेंट जानवरों की खाल को विशेष रूप से उपचारित करके बनाया जाता है। एक समय था जब इसका इस्तेमाल कागज़ के तौर पर होता था।

दरअसल, ये शोधकर्ता मध्ययुगीन पांडुलिपियों की उत्पत्ति का अध्ययन कर रहे थे। उन्होंने कुछ पन्नों को इरेज़र से रगड़ा और इस तरह निकले बुरादे में से डीएनए निकाला। गौरतलब है कि डीएनए आनुवंशिक पदार्थ होता है जिसका उपयोग सजीवों के अध्ययन के लिए किया जाता है।

सबसे पहली हैरत की बात तो यह थी कि पार्चमेंट में से डीएनए निकाला जा सका क्योंकि किताबों के पन्ने बनने से पहले गाय, बकरी या भेड़ों की खाल को कई दिनों तक चूने से भरे गड्ढे में रखा जाता है। चूना काफी शक्तिशाली रसायन है। इसके बाद इन खालों को निकालकर खुरचा जाता है और हाथों से ताना जाता है। इसके अलावा, लिखित पांडुलिपियां सदियों पुरानी हैं और उनकी तरह-तरह से उठा-पटक हुई होगी। यानी पार्चमेंट को विघटित होने का पर्याप्त समय मिला है। फिर भी यह अचरज की बात रही कि संग्रहालयों और मठों की अलमारियों में सजी पांडुलिपियों में पर्याप्त साबुत डीएनए था और साथ ही उन वायरसों तथा अन्य रोगजनकों के डीएनए भी मिले जिन्होंने उन जानवरों को संक्रमित किया था। इनमें शीप-पॉक्स के वायरस की एक विलुप्त किस्म का डीएनए भी मिल गया। यानी प्राचीन रोगजनकों का एक नया स्रोत हाथ लगा है।

इसके पीछे एक कारण तो यह है कि एक-एक किताब बनाने के लिए जितने जानवरों की ज़रूरत होती है वह लगभग एक पूरी आबादी के बराबर होती है। कहने का मतलब है कि जब आप उस समय की एक किताब उठाते हैं तो आप भेड़ों या अन्य जानवरों के एक पूरे झुंड को हाथ में ले लेते हैं।

शोधकर्ताओं ने एक काम और किया। 700 ईस्वी से 1450 ईस्वी के बीच की पांडुलिपियों का विश्लेषण करके वे इस नतीजे पर पहुंचे कि इन सब नमूनों का एक साझा पूर्वज था जो भेड़-विशिष्ट बीमारी के वाहक के रूप में करीब पांच हज़ार साल पहले विकसित हुआ था।

आम तौर पर पुस्तकों और पांडुलिपियों को दार्शनिक/साहित्यिक ज्ञान का भंडार माना जाता है। लेकिन इस अध्ययन ने दर्शाया है कि वे जीव वैज्ञानिक सूचना का स्रोत भी हो सकती हैं। (स्रोत फीचर्स)

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