
अनुकूल समय की प्रतीक्षा में बीजों का कई दिनों, महीनों या वर्षों तक निष्क्रिय पड़े रहना किसी चमत्कार से कम नहीं है। इसे बीज की सुप्तावस्था कहते हैं। बाहर से पूरी तरह से निर्जीव और शांत प्रतीत होने वाला छोटा-सा बीज, अपने भीतर जीवन की एक असीम संभावना को समेटे रहता है। वनस्पति विज्ञान के नज़रिए से, सुप्तावस्था कोई निष्क्रिय अवस्था नहीं है, बल्कि यह पौधे की उत्तरजीविता की रणनीति है। यह वह तंत्र है जो बीज को यह तय करने की क्षमता देता है कि उसे कब अंकुरित होना है और कब अपनी ऊर्जा को बचाकर सुप्त पड़े रहना है।
जैव विकास के लंबे सफर में पौधों में यह प्रणाली इसलिए विकसित हुई है ताकि उनके बीज प्रतिकूल मौसम में अंकुरित होकर नष्ट न हो जाएं। नमी, तापमान और प्रकाश की आदर्श स्थितियां मिलने तक बीज सुप्तावस्था में रहते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि बीज को यह कैसे पता चलता है कि बाहर का मौसम अंकुरण के लिए सुरक्षित है या नहीं? इसी गूढ़ प्रश्न का उत्तर अब वैज्ञानिकों ने एक ‘जैविक स्विच’ के रूप में खोज निकाला है।
आधुनिक कृषि के सामने बीजों, खासकर गेहूं के बीजों, का समय से पहले (पौधे पर लगे-लगे ही) अंकुरित होना एक अत्यंत गंभीर चुनौती बन चुका है। इस समस्या को ‘प्री-हार्वेस्ट स्प्राउटिंग’ कहा जाता है। कल्पना कीजिए कि गेहूं की फसल खेत में पूरी तरह से पककर कटाई के लिए तैयार है, लेकिन तभी अचानक बेमौसम बारिश हो जाती है या वातावरण में नमी का स्तर अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में, अगर बीजों का सुप्तावस्था तंत्र कमज़ोर है, तो वे बालियों में ही अंकुरित होने लगते हैं। इस अवांछित अंकुरण के कारण अनाज के भीतर मौजूद स्टार्च टूटने लगता है और महत्वपूर्ण एंज़ाइम सक्रिय हो जाते हैं, जिससे गेहूं की गुणवत्ता, उसका पोषण मूल्य और उसके पकाने सम्बंधी गुण पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं। वैश्विक स्तर पर, प्री-हार्वेस्ट स्प्राउटिंग के कारण केवल गेहूं की फसल में हर साल अरबों डॉलर तक का नुकसान होता है।
इस समस्या के मुकम्मल समाधान की दिशा में वनस्पति विज्ञानियों और आनुवंशिकी विशेषज्ञों ने एक युगांतरकारी खोज की है। वैज्ञानिकों ने गेहूं (ट्रिटिकम एस्टिवम) के जीनोम में TaNAC018-7D नामक एक विशेष जीन की पहचान की है। यह जीन एक प्रतिलेखन कारक के रूप में कार्य करता है। प्रतिलेखन कारक वे विशेष प्रोटीन होते हैं जो डीएनए से जुड़कर यह नियंत्रित करते हैं कि कौन सा जीन ‘चालू’ होगा और कौन सा ‘बंद’। TaNAC018-7D एक मास्टर कंट्रोलर या जैविक स्विच की तरह काम करता है, जिसका मुख्य काम बीज के भीतर सुप्तावस्था (डॉरमेंसी) के स्तर को निर्देशित करना है। यह जीन ही अंततः निर्धारित करता है कि बारिश की कुछ बूंदों के संपर्क में आने के बाद बीज को तुरंत अंकुरित हो जाना चाहिए या अभी प्रतीक्षा करनी चाहिए।
इस जैविक स्विच की कार्यप्रणाली को गहराई से समझने के लिए, हमें बीजों के भीतर चल रही अभिक्रियाओं को समझना होगा। बीजों के अंकुरण और सुप्तावस्था के बीच का पूरा संतुलन मुख्य रूप से दो हार्मोन्स – एब्सिसिक एसिड (ABA) और जिबरेलिक एसिड (GA) – के बीच की रस्साकशी है। एब्सिसिक एसिड सुप्तावस्था का रक्षक है, यह बीज को सुप्त बनाए रखता है और अंकुरण को रोकता है। दूसरी ओर, जिबरेलिक एसिड अंकुरण को उकसाता है, यह सुप्तावस्था को तोड़कर बीज के भीतर मौजूद भ्रूण को वृद्धि करने का संकेत देता है। एक स्वस्थ और सुरक्षित बीज में, परिपक्वता के दौरान ABA का स्तर बहुत अधिक होता है और GA का स्तर नगण्य होता है। जब बीज पानी सोखता है तो ABA का स्तर तेज़ी से गिरता है और GA का स्तर बढ़ता है, जिससे अंकुरण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
यहीं पर TaNAC018-7D जीन भूमिका निभाता है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि यह प्रतिलेखन कारक सीधे तौर पर उन जीन्स की अभिव्यक्ति को नियंत्रित करता है जो ABA के निर्माण और संकेतन के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। जब बीज बालियों में पक रहे होते हैं, तब TaNAC018-7D सक्रिय होकर यह सुनिश्चित करता है कि बीज के भीतर ABA का एक पर्याप्त और सुरक्षित स्तर बना रहे। इसके साथ ही, यह उन एंज़ाइमों की गतिविधि को भी धीमा कर देता है जो ABA को नष्ट कर सकते हैं। इस प्रकार, यह जीन बीजों की सुप्तावस्था को इतना मज़बूत बना देता है कि फसल कटाई के समय यदि अचानक बेमौसम बारिश हो भी जाए, तो बीजों के भीतर मौजूद ABA का कवच तुरंत न टूटे। इस तरह, बीज बालियों में अंकुरित होने से बच जाते हैं।
इस महत्वपूर्ण जीन की खोज की वैज्ञानिक यात्रा अपने आप में जीन मानचित्रण और आणविक जीवविज्ञान का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। गेहूं का जीनोम अत्यंत विशाल और जटिल होता है (यह मानव जीनोम से भी कई गुना बड़ा है), इसलिए इसमें से एक विशिष्ट प्रतिलेखन कारक को ढूंढना भूसे के ढेर में सूई खोजने जैसा था। वैज्ञानिकों ने गेहूं की ऐसी किस्मों का विस्तृत आनुवंशिक अध्ययन किया जो प्री-हार्वेस्ट स्प्राउटिंग के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी थीं, और उनकी तुलना उन किस्मों से की जो आसानी से अंकुरित हो जाती थीं। उन्नत तकनीकों का उपयोग करके, वे अंततः गुणसूत्र 7D पर उस सटीक स्थान तक पहुंचने में सफल रहे जहां TaNAC018-7D जीन स्थित है।
जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का चक्र अनियमित हो गया है। कभी अत्यधिक सूखा पड़ता है तो कभी फसल कटाई के समय भारी बारिश और ओलावृष्टि हो जाती है। भारतीय उपमहाद्वीप में भी हमने पिछले कुछ वर्षों में देखा है कि मार्च-अप्रैल के महीनों में, जब गेहूं व रबी की अन्य फसलें कटाई के लिए तैयार होती हैं, पश्चिमी विक्षोभ के कारण अचानक बारिश हो जाती है। ऐसी अनियमित मौसमी घटनाओं से निपटने के लिए हमें ऐसी फसलों की आवश्यकता है जो पर्यावरण के इन झटकों को सह सकें। TaNAC018-7D जीन हमें वह वैज्ञानिक औज़ार देता है जिससे हम ऐसी ‘क्लाइमेट-स्मार्ट’ फसलें विकसित कर सकते हैं।
इस खोज का सबसे बड़ा व्यावहारिक लाभ भविष्य की कृषि व्यवस्था को मिलेगा। पारंपरिक पादप प्रजनन तकनीकों की मदद से, कृषि वैज्ञानिक अब इस विशिष्ट जीन वाले गेहूं के पौधों का चयन कर सकते हैं और उन्हें उच्च उपज वाली लेकिन संवेदनशील किस्मों के साथ क्रॉस करा सकते हैं। क्रिस्पर-कास-9 जैसी आधुनिक जीन संपादन तकनीक का उपयोग करके, वैज्ञानिक सीधे तौर पर गेहूं की मौजूदा व्यावसायिक किस्मों में TaNAC018-7D जीन की अभिव्यक्ति को समायोजित कर सकते हैं। अर्थात हम ऐसे बीज डिज़ाइन कर सकते हैं जिनकी सुप्तावस्था कटाई के समय तक महफूज़ रहे, लेकिन जब किसान उन्हें अगले मौसम में बोने के लिए मिट्टी में डालें, तो वे आसानी से और समान रूप से अंकुरित हो जाएं। (स्रोत फीचर्स)
Picture credit – https://phys.org/news/2014-11-seed-dormancy-property-germination-million.html ( dormancy in seeds)