भाग 2 – अनुसंधान
डॉ. सुशील जोशी

लेख के इस भाग में हम ई. कोली की खूबियों और उस पर हुए अनुसंधानों के बारे में विस्तार से बात करेंगें।
मॉडल जीव के रूप में खूबियां
एशरीशिया कोली छड़ आकार का बैक्टीरिया है जो लगभग 2 से 5 माइक्रोमीटर लंबा और 0.5 से 1 माइक्रोमीटर चौड़ा होता है। यह इतना बड़ा होता है कि प्रकाश सूक्ष्मदर्शी से अवलोकन किया जा सके। एक मॉडल जीव के रूप में ई. कोली में कई विशेषताएं हैं। यह तेज़ी से संख्या-वृद्धि करता है, इसमें जेनेटिक फेरबदल के लिए कई आणविक तकनीकें हैं। एक खास बात यह है कि ई. कोली प्रमुखत: अलैंगिक रूप से अपनी प्रतिलिपियां बनाता है – अर्थात किसी एक बैक्टीरिया के जीनोम में किए गए परिवर्तन कई पीढ़ियों तक बने रहते हैं और इनके असर का अध्ययन लगातार किया जा सकता है।
इन्हीं सब खूबियों के चलते ई. कोली का उपयोग करके आणविक जीव विज्ञान और आणविक आनुवांशिकी के क्षेत्र में कई प्रमुख खोजें की गई हैं। इनमें जेनेटिक कोड को समझना, डीएनए के प्रतिलिपिकरण की प्रक्रिया की समझ, जीन नियमन की ऑपेरॉन प्रणाली की खोज, और जेनेटिक रूप से परिवर्तित जीव बनाना शामिल हैं।
ई. कोली का जीनोम
ई. कोली के कई स्ट्रेन (प्रभेद) होते हैं जो आनुवंशिक रूप से थोड़े-थोड़े भिन्न समूह के द्योतक हैं। इनकी रोगजनक क्षमता अलग-अलग होती है। कुछ स्ट्रेन हैं जो गंभीर संक्रमण पैदा करते हैं – जैसे O157:H7 स्ट्रेन। जबकि कुछ अन्य स्ट्रेन रोगजनक नहीं होते। उनकी यह विविधता उनके जीनोम में नज़र आती है। प्रयोगों से पता चला है कि ई. कोली के K-12 स्ट्रेन (जिसे प्रयोगशाला में पाला जाता है और रोगजनक नहीं है) और O157:H7 तथा CFT073 स्ट्रेन (ये दोनों स्ट्रेन रोगजनक हैं) के जीनोम्स के बीच मात्र 39 प्रतिशत समानता है।
ई. कोली के सारे स्ट्रेन्स के जीनोम में कुल मिलाकर 16,000 जीन्स होते हैं जिसे पैन-जीनोम (pan-genome) कहते हैं लेकिन इस पैन-जीनोम का एक अंश ही किसी स्ट्रेन विशेष में पाया जाता है – लगभग 20 प्रतिशत। यानी शेष 80 प्रतिशत जीनोम परिवर्तनशील होता है। ये जीन्स बाहर से हासिल किए जा सकते हैं और ये ई. कोली को चयापचय में काफी लचीलापन देते हैं। परिवर्तनशील जीनोम में नए-नए घटक शामिल करने की इस खूबी के चलते ई. कोली एक बढ़िया मॉडल बन सका है। 1997 में ई. कोली उन पहले-पहले जीवों में से था जिनके पूरे जीनोम के डीएनए अनुक्रम का खुलासा हो गया था।
फेज ग्रुप
आणविक जीव विज्ञान के विकास की शुरुआत मैक्स डेलब्रुक (Max Delbrück) और साल्वेडोर ई. लुरिया (Salvador E. Luria) द्वारा 1940 में ‘फेज ग्रुप’ के गठन के साथ मानी जा सकती है, जिसमें आगे चलकर अल्फ्रेड डी. हर्शे (Alfred D. Hershey) भी जुड़ गए थे। इसी के साथ ई. कोली और उसे संक्रमित करने वाले वायरस (बैक्टीरियोफेज) आणविक जीव विज्ञान अध्ययन की बुनियादी सामग्री बन गए।
मज़ेदार बात यह है कि डेलब्रुक एक क्वांटम भौतिक शास्त्री थे। वे जर्मनी से यू.एस. पहुंचे थे और एमरी हिल्स के साथ बैक्टीरियोफेज पर काम करने लगे थे। 1939 में इन दोनों ने मिलकर बैक्टीरियोफेज (फेज) की संख्या वृद्धि का एक संख्यात्मक पर्चा प्रस्तुत किया था। दूसरी ओर, लुरिया एक इतालवी डॉक्टर थे और वे भी यू.एस. पहुंचकर डेलब्रुक के साथ काम करने लगे।
ई. कोली से प्रमुख खोजें
बैक्टीरिया में वायरस प्रतिरोध
डेलब्रुक और लुरिया ने बैक्टीरिया में वायरस-प्रतिरोध पर काम करना तय किया। वे जानना चाहते थे कि बैक्टीरिया में वायरस के विरुद्ध प्रतिरोध क्या बेतरतीब उत्परिवर्तनों में से चयन के ज़रिए होता है या क्या यह वायरस से संपर्क से जनित अनुकूलन का परिणाम होता है। इसके लिए उन्होंने ई. कोली-बी स्ट्रेन पर प्रयोग किए। उन्होंने कुछ बैक्टीरिया को अलग-अलग संवर्धन नलिका (कल्चर ट्यूब) में पनपाया। कुछ समय बाद इन अलग-अलग कल्चर्स में से बराबर-बराबर आयतन लिए और उन्हें टी-1 नामक फेज से युक्त पैट्रीप्लेट्स में डाल दिया। यह माना गया था कि यदि वायरस के खिलाफ प्रतिरोध संपर्क के बाद पैदा होता है तो सारी प्लेट्स में लगभग बराबर-बराबर प्रतिरोधी बैक्टीरिया मिलने चाहिए। प्रयोग में देखा गया कि विभिन्न प्लेट्स में प्रतिरोधी बैक्टीरिया की औसत संख्या में बहुत अंतर हैं। निष्कर्ष यह था कि बैक्टीरिया में प्रतिरोध बेतरतीब उत्परिवर्तनों की वजह से पैदा होता है और यह वायरस की उपस्थिति से स्वतंत्र है। इस प्रयोग को आधुनिक बैक्टीरियल जेनेटिक्स की शुरुआत माना जाता है। इस प्रयोग में उत्परिवर्तन की दर का निर्धारण भी किया जा सका था।
जैव विकास का लंबा प्रयोग
रिचर्ड लेंस्की (Richard Lenski) ने 1988 में ई. कोली के साथ जैव विकास का एक प्रयोग शुरू किया था। इस प्रयोग में उन्होंने ई. कोली की 12 समांतर आबादियों की 80,000 पीढ़ियों का अवलोकन किया था। इस प्रयोग में ई. कोली की 12 अलग-अलग आबादियों को ग्लूकोज़-सीमित पोषक माध्यम में पनपने दिया गया था और ग्लूकोज़ की सांद्रता प्रतिदिन कम-ज़्यादा की जाती थी। हर 500वीं पीढ़ी के बाद बैक्टीरिया के नमूने शून्य से 80 डिग्री नीचे तापमान पर फ्रीज़ कर दिए जाते थे ताकि बाद में प्रत्येक पीढ़ी की तुलना उससे पहले वाली पीढ़ी से की जा सके।
प्रयोग से पता चला कि बैक्टीरिया तेज़ी से अपनी फिटनेस (वृद्धि दर) में सुधार करते हैं लेकिन समय के साथ सुधार की दर घटती जाती है। लगभग 30,000 पीढ़ियों (करीब 15 वर्ष) के बाद एक आबादी में साइट्रेट को ऑक्सीजनयुक्त पर्यावरण में पचाने की क्षमता आ गई थी।
बैक्टीरिया जीन्स का पुनर्संयोजन
इसी दौरान हर्शे भी इस ‘फेज ग्रुप’ में शामिल हो गए। वे पहले ही ई. कोली को संक्रमित करने वाले वायरसों पर शोध कर दर्शा चुके थे कि जब एक ही कोशिका में एक से अधिक वायरस हों, तो उनके बीच जेनेटिक पुनर्संयोजन हो जाता है। इसके लिए उन्होंने एक ही ई. कोली कोशिका को वायरस के दो प्रभेदों से संक्रमित किया। इनसे जो वायरस संतति प्राप्त हुई उनमें मूल वायरस जैसी जेनेटिक संरचना वाले वायरस तो थे ही, साथ में कुछ ऐसे वायरस भी थे जिनमें जीन्स का लेन-देन हो चुका था।
आनुवंशिकी पदार्थ की पहचान
बहरहाल, हर्शे को शोहरत मिली मार्था चेज़ (Martha Chase) के साथ किए गए प्रयोगों से। हर्शे और चेज़ ने टी-2 फेज के डीएनए को रेडियोसक्रिय फॉस्फेट (32P) से चिन्हित कर दिया, और उन्हें ई. कोली कोशिकाओं को संक्रमित करने दिया। गौरतलब है कि फॉस्फोरस डीएनए में ही पाया जाता है, प्रोटीन में नहीं। इन संक्रमित कोशिकाओं से फेज का प्रोटीन आवरण हटा दिया और फिर संक्रमित कोशिकाओं तथा वायरस के आवरणों को अलग-अलग कर लिया। देखा गया कि रेडियोसक्रियता सिर्फ नीचे बैठी बैक्टीरिया कोशिकाओं में थी जबकि ऊपर के द्रव (जिसमें प्रोटीन आवरण थे) में नहीं थी। यानी डीएनए ही बैक्टीरिया कोशिका में प्रवेश कर गया था।
इसी तरह के एक अन्य प्रयोग में उन्होंने फेज को रेडियोसक्रिय सल्फेट से चिन्हित कर दिया, चूंकि सल्फर प्रोटीन में पाया जाता है, डीएनए में नहीं। अलग-अलग करने पर रोडियोसक्रियता सिर्फ प्रोटीन आवरण में मिली, संक्रमित बैक्टीरिया में नहीं।

इन परिणामों से हर्शे और चेज़ ने निष्कर्ष निकाला कि आनुवंशिक पदार्थ डीएनए है, प्रोटीन नहीं। यह प्रयोग आनुवंशिकी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि आनुवंशिक जानकारी का वहन डीएनए करता है, प्रोटीन नहीं।
डेलब्रुक, लुरिया और चेज़ को प्रतिलिपिकरण तथा वायरस की जेनेटिक संरचना सम्बंधी खोजों के लिए 1969 में नोबेल से नवाज़ा गया था।
इसके बाद ग्रुप ने तय किया कि वे कई अन्य टी-फेज पर काम करेंगे जो ई. कोली के बी स्ट्रेन के विरुद्ध सक्रिय होते हैं। इनमें से एक फेज (टी-4) का शानदार उपयोग सीमोर बेंज़र (Seymour Benzer) ने किया। यहां बताना लाज़मी है कि बेंज़र ने अपना करियर एक सॉलिड स्टेट भौतिक शास्त्री के रूप में शुरू किया था लेकिन इर्विन श्रोडिंगर (Erwin Schrodinger) की प्रभावशाली पुस्तक व्हाट इज़ लाइफ? (What Is Life?) से प्रभावित होकर वे टी-4 के एक खास प्रकार (rII) की ओर मुड़ गए। प्रयोगों से उन्होंने साबित किया कि न्यूक्लियोटाइड्स की एक न्यूनतम लंबाई ही जेनेटिक इकाई होती है, जिसे उन्होंने सिस्ट्रॉन नाम दिया था।
जेनेटिक लेन–देन
द्वितीय विश्व युद्ध की रुकावट के बाद शोध परिणामों का आदान-प्रदान फिर शुरू हुआ। एक तो डेलब्रुक और हर्शे ने फेज वायरसों में जेनेटिक पुनर्संयोजन की अपनी खोज प्रस्तुत की और इसी के साथ जोशुआ लेडरबर्ग ने ई. कोली (स्ट्रेन के-12) पर अपने प्रयोगों के आधार पर दर्शाया कि बैक्टीरिया के बीच लैंगिक पुनर्संयोजन होता है। आगे बैक्टीरियल जेनेटिक्स पर लगभग सारा अनुसंधान इसी स्ट्रेन पर हुआ। यह खोज इस मायने में महत्वपूर्ण थी कि इससे पता चला था बैक्टीरिया में परस्पर जेनेटिक सूचना का लेन-देन हो सकता है जो उन्हें नए गुणधर्म प्रदान कर सकता है। यह खोज बैक्टीरिया में एंटीबायोटिक्स के खिलाफ प्रतिरोध के तेज़ी से प्रसार को समझने में मददगार है।
लेडरबर्ग ने ही गुणसूत्र के बाहर जेनेटिक कणों (प्लास्मिड) की खोज की थी। यह खोज उन्होंने अपनी पत्नी एस्थर मिरियम लेडरबर्ग, एन.डी. ज़िन्डर और एम.एल. मोर्स के साथ की थी। इसके बाद उन्होंने बैक्टीरिया के बीच जेनेटिक लेन-देन की एक नवीन विधि की खोज की थी जो बैक्टीरिया को संक्रमित करने वाले वायरसों (बैक्टीरियोफेज) के ज़रिए संपन्न होती है। यह खोज आगे चलकर जेनेटिक पुनर्संयोजन का आधार बनी।
जेनेटिक पुनर्संयोजन/हस्तांतरण
लेडरबर्ग और टैटम ने काफी परिष्कृत प्रयोगों की मदद से ई. कोली में जेनेटिक हस्तांतरण की खोज की थी (1946)। पुनर्संयोजन सम्बंधी प्रयोगों के लिए लेडरबर्ग ने टेटम द्वारा विकसित पोषण बाधित दोहरे उत्परिवर्तियों का उपयोग किया था। अलबत्ता, उस समय वे नहीं जानते थे कि यह ई. कोली स्ट्रेन (k-12) उन बिरले स्ट्रेन्स में से है जिनमें एफ-प्लास्मिड पाया जाता है। एफ-प्लास्मिड को फर्टिलिटी फैक्टर भी कहते हैं और यह बैक्टीरिया के संयुग्मन में भूमिका निभाता है। प्लास्मिड की खोज का श्रेय भी ई. कोली की मदद से लेडरबर्ग को ही जाता है। उनके समूह ने यह भी बताया था कि प्लास्मिड ही नर व मादा बैक्टीरिया के बीच जेनेटिक गुणधर्मों के हस्तांतरण का साधन होता है। आम तौर पर यह जानकारी है कि कोशिकाओं में जेनेटिक जानकारी गुणसूत्रों में सहेजी होती है। लेडरबर्ग व अन्य ने स्पष्ट किया था कि बैक्टीरिया व कुछ अन्य जीवों में गुणसूत्र से अलग जेनेटिक सामग्री वृत्ताकार अणुओं के रूप में पाई जाती है, जिन्हें प्लास्मिड कहते हैं।
शोधकर्ताओं ने प्रयोग के लिए ई. कोली के ऐसे स्ट्रेन्स चुने थे जो उत्परिवर्तनों के कारण कतिपय ज़रूरी वृद्धि कारक बनाने में अक्षम थे। इन दोनों स्ट्रेन्स को एक ऐसे माध्यम में रखा गया जिसमें बैक्टीरिया वृद्धि के कुछ विशिष्ट पोषक तत्व नहीं थे। यानी ये दोनों ही अलग-अलग पोषक तत्वों की कमी के कारण उस माध्यम में नहीं पनप सकते थे।
तर्क था कि यदि ये स्ट्रेन्स जेनेटिक पदार्थों का लेन-देन नहीं करेंगें, तो दोनों ही पनप नहीं पाएंगे। लेकिन यदि जेनेटिक पदार्थ का लेन-देन हो जाता है तो दोनों स्ट्रेन्स में से कुछ बैक्टीरिया तो पनपेंगे। इस माध्यम को बैक्टीरिया वृद्धि के लिए सही तापमान वगैरह दिया, कुछ समय बाद देखा गया कि इस अभावग्रस्त माध्यम में भी बैक्टीरिया की कुछ कॉलोनियां विकसित हो गईं। यानी कुछ बैक्टीरिया ने दूसरे स्ट्रेन से जेनेटिक सामग्री प्राप्त कर ली थी। अर्थात उनके बीच जेनेटिक पुनर्संयोजन हुआ था।
लेकिन इस प्रयोग से यह स्पष्ट नहीं हो पाया था कि क्या इस तरह के लेन-देन के लिए बैक्टीरिया का संपर्क में आना ज़रूरी है। वह प्रमाण बर्नार्ड डेविस ने एक सुंदर प्रयोग से मिला।
बर्नार्ड डेविस का U-tube प्रयोग
उन्होंने एक U आकार की नली ली जिसमें पेंदे पर एक फिल्टर लगा था। फिल्टर ऐसा था कि उसमें से पोषक माध्यम के पदार्थ तो आ-जा सकते थे लेकिन बैक्टीरिया की कोशिकाएं नहीं। दोनों तरफ की नलियों में संवर्धन माध्यम भर दिया गया और दोनों तरफ अलग-अलग स्ट्रेन के बैक्टीरिया (जिनकी पोषक तत्वों की ज़रूरतें अलग-अलग थीं) डाले गए। एक पंप की मदद से नली के एक हिस्से से दूसरे में लगातार पोषक माध्यम की आवाजाही चलती रही।
कुछ समय बाद जब इन बैक्टीरिया को एक पेट्रीप्लेट में डाला गया, जहां ऐसा पोषक माध्यम था जिसमें किसी विशेष पोषक पदार्थ की कमी थी, ऐसी स्थिति में एक भी कॉलोनी विकसित नहीं हुई। यानी जेनेटिक लेन-देन नहीं हुआ था। इस प्रयोग के आधार पर डेविस यह दिखा पाए कि जेनेटिक लेन-देन के लिए बैक्टीरिया कोशिकाओं का सीधे संपर्क ज़रूरी है।
इस खोज का बैक्टीरियल जेनेटिक्स में तो खासा असर रहा ही, इसने आगे चलकर क्षैतिज जेनेटिक स्थानांतरण (horizontal genetic transfer) को समझने का रास्ता भी खोला। यानी बैक्टीरिया आपस में जेनेटिक सूचना का आदान-प्रदान कर सकते हैं। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि जेनेटिक सूचनाओं में फेरबदल मात्र लैंगिक प्रजनन या उत्परिवर्तनों के द्वारा नहीं होता।
लेडरबर्ग ने ई. कोली पर प्रयोगों के आधार पर बैक्टीरिया के बीच जेनेटिक हस्तांतरण की एक नवीन विधि भी खोजी थी, जो बैक्टीरियोफेज के मार्फत होती है। इसे उन्होंने ट्रांसडक्शन की संज्ञा दी थी। 1958 में लेडरबर्ग, जॉर्ज बीडल और ई. टेटम को संयुक्त रूप से नोबेल से सम्मानित किया गया था। लेडरबर्ग को यह पुरस्कार बैक्टीरिया में जेनेटिक सामग्री के संगठन तथा पुनर्संयोजन सम्बंधी खोज के लिए दिया गया था, जो ई. कोली पर हुए प्रयोगों से संभव हुई थीं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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