भारत डोगरा

किसी भी देश में विज्ञान व तकनीकी का विकास केवल बड़ी व प्रतिष्ठित प्रयोगशालाओं में निर्धारित नहीं होता है, इसके साथ यह भी आवश्यक है कि आम लोगों में, जनसाधारण में जो वैज्ञानिक सोच व प्रतिभा छिपी है, उसे भलीभांति खिलने के अवसर मिलें व इसके आधार पर जनजीवन में सुधार के अवसर विकसित हों।
इस तरह ग्रासरूट पर विज्ञान व तकनीकी का जो विकास है, उसका एक बहुत उपयोगी उदाहरण हमारे देश में मंगल टर्बाइन के रूप में सामने आया है। किसानों का खर्च कम करने की बात हो, जीवाश्म ईंधन पर खेती की निर्भरता कम करके जलवायु परिवर्तन को थामने में योगदान की बात हो या गांवों की आत्म-निर्भरता बढ़ाने की महात्मा गांधी की सोच, सभी दृष्टियों से मंगल टर्बाइन बहुत उपयोगी है।
भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा नियुक्त मैथानी समिति ने मंगल टर्बाइन के व्यापक प्रसार की सिफारिश की है। इसके बावजूद मंगल टर्बाइन का उचित प्रसार नहीं किया गया है। इसके आविष्कारक मंगल सिंह अब वृद्ध हो गए हैं, 79 वर्ष की आयु के हैं। अत: यह और ज़रूरी हो गया है कि अब उनकी सेवाओं का उचित उपयोग कर मंगल टर्बाइन के द्रुत प्रसार में और देरी न की जाए।
हमारे देश में लाखों किसान बहते नदी-नालों से अपने खेत की सिंचाई करने के लिए डीज़ल पंप से पानी उठाते हैं। अनेक गांवों में पेयजल के लिए या अन्य उपयोग के लिए भी इस तरह पानी उठाया जाता है। इस डीज़ल पर किसानों का बहुत पैसा खर्च होता है; प्रदूषण होता है, सो अलग। ललितपुर ज़िले (उत्तर प्रदेश) के एक किसान व ग्रामीण वैज्ञानिक मंगल सिंह ने किसानों की इस समस्या को समझा व मंगल टर्बाइन बना कर ऐसी व्यवस्था संभव की कि बिना डीज़ल व बिजली के ही पानी उठाकर प्यासे खेतों तक पहुंचाया जा सके।
अपने इस पेटेंट प्राप्त आविष्कार के बारे में मंगल सिंह स्वयं बताते हैं, “मंगल टर्बाइन गांव में ही बनने वाली एक ऐसी मशीन है, ऐसी ग्रामीण तकनीकी है, जो जलधारा के प्रवाह से चलती है। इसमें आवश्यकता के अनुरूप छोटा-बड़ा व्हील बनाते हैं और उसे एक गियर बॉक्स से जोड़ते हैं जो उसके चक्कर बढ़ा देता है। लिहाज़ा इंजन मोटर की भांति तेज़ स्पीड से चक्कर लगाने लगता है। गियर बॉक्स की आउटपुट शाफ्ट दोनों तरफ निकली होती है जिससे क्लॉकवाइज़ या एंटी-क्लॉकवाइज़ कोई एक या दोनों भी एक साथ पंप चला सकते हैं। गियर बाॅक्स की शाफ्ट के दूसरे सिरे पर घिरनी लगाकर कुट्टी मशीन, आटा चक्की, गन्ना पिराई या कोई भी अन्य कार्य कर सकते हैं या जनरेटर जोड़ कर बिजली बना सकते हैं। आम तौर पर ग्रामीण इलाकों में जहां किसान नदी-नालों से डीज़ल या बिजली पंपों से सिंचाई करते हैं वहां मंगल टर्बाइन द्वारा बिना इंजन, बिना मोटर, बिना डीज़ल, बिना बिजली के सिंचाई कर सकते हैं। पाइपों के द्वारा पानी कहीं भी ले जा सकते हैं। पीने के लिए भी पानी पंप कर सकते हैं।
मंगल टर्बाइन का उपयोग यदि उन सभी स्थानों पर किया जाए जो इसके अनुकूल हैं तो इससे सालाना करोड़ों लीटर डीज़ल की बचत हो सकती है, और किसान का खर्च भी बहुत कम हो सकता है। साथ ही ग्रीनहाऊस गैसों का उत्सर्जन बहुत कम होगा।
मंगल टर्बाइन को सिंचाई व कुटीर उद्योगों के लिए वरदान बताते हुए आई.आई.टी. दिल्ली व विज्ञान शिक्षा केंद्र के एक अध्ययन में बताया गया है कि पूरी तकनीक ऐसी है जो गांव स्तर पर अपनाई जा सकती है व इससे गांवों में बड़े पैमाने पर रोज़गार सृजन भी होगा।
यदि एक मंगल टर्बाइन दिन में 11 घंटे चले तो (25 एच.पी. डीज़ल पंप की 4 लीटर प्रति घंटे की खपत के आधार पर) दिन में 44 लीटर डीज़ल की बचत हो सकती है। यदि वर्ष में 190 दिन सिंचाई हो तो एक मंगल टर्बाइन से वर्ष में 8360 लीटर डीज़ल की बचत होती है। यदि एक मंगल टर्बाइन 15 वर्ष तक कार्य करे तो अपने जीवन काल में एक मंगल टर्बाइन से 1,25,400 लीटर डीज़ल की बचत होती है। डॉ. जय शंकर सिंह के अनुमान के अनुसार यह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग 335 टन कमी के बराबर है।
ग्रीनहाऊस गैस के उत्सर्जन में कमी विश्व का पर्यावरण बचाने के लिए तो ज़रूरी है ही, साथ ही इसमें उल्लेखनीय सफलता प्राप्त करने पर देश अधिक अंतर्राष्ट्रीय सहायता का हकदार भी बनता है। इस तरह मंगल टर्बाइन के सभी उचित व अनुकूल स्थानों पर विभिन्न सावधानियों के साथ उपयोग होने से किसानों, सरकार, पर्यावरण सभी का लाभ है।
देश के अनेक जाने-माने विशेषज्ञों व अघिकारियों ने मौके पर जाकर मंगल टर्बाइन का अध्ययन किया है और इस आविष्कार की प्रशंसा करते हुए इसकी व्यापक संभावनाओं की ओर ध्यान दिलाया है। मध्यप्रदेश सरकार के पूर्व प्रमुख सचिव बी. के. साहा ने लिखा है कि स्टॉप डैम के खर्च को जोड़ लिया जाए तो भी मंगल टर्बाइन की व्यवस्था छोटी नदियों से जल उठाने की अन्य व्यवस्थाओं से कहीं अधिक सस्ती है। मंगल टर्बाइन से डीज़ल व बिजली की बचत होती है तथा यह पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्व उप महानिदेशक डॉ. टी. पी. ओझा ने लिखा है कि मंगल टर्बाइन में बड़ी संभावनाएं निहित हैं। भारत सरकार में ग्रामीण विकास विभाग के पूर्व सचिव बी. के. सिन्हा ने कई बार मंगल टर्बाइन व इसके आविष्कारक की प्रशंसा करते हुए राष्ट्रीय हित में इन्हें प्रोत्साहित करने को कहा है। राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक जाने-माने विद्वानों व संस्थानों ने मंगल टर्बाइन की उपयोगिता व संभावनाओं को स्वीकार किया है। इसके बावजूद इसका उचित प्रचार नहीं हो सका। दरअसल, सरकार को मंगल सिंह जैसे प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करना चाहिए एवं अनुकूल अवसर देना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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