सुदर्शन सोलंकी

मध्य प्रदेश के डिंडौरी वन मंडल (dindori forest department) से प्राप्त हालिया रिपोर्टों ने एक बार फिर वन पारिस्थितिकीविदों और कीट वैज्ञानिकों का ध्यान मध्य भारत के मूल्यवान साल (सरई) वनों (sal forests) की ओर आकर्षित किया है। यह संकट साल (Shorea robusta) के वृक्षों पर एक कीट के आक्रमण के चलते पैदा हुआ है। यह कीट है ‘साल बोरर’ या ‘साल का घुन’ जिसे वैज्ञानिक शब्दावली में हॉप्लोसेरामबिक्स स्पिनिकॉर्निस (Hoplocerambyx spinicornis) कहा जाता है। वन विभाग द्वारा स्थानीय समुदायों की मदद से इस कीट को नियंत्रित करने के लिए चलाया जा रहा अभियान, वन पारिस्थितिकी तंत्र (forest ecosystem) को संतुलित करने का एक सुविचारित वानिकी प्रयास है।
प्रकोप के कारक
यह समझना आवश्यक है कि साल बोरर कोई बाहरी या आक्रामक विदेशी प्रजाति नहीं है। यह साल के वनों का एक मूल और प्राकृतिक बाशिंदा है। सामान्य परिस्थितियों में यह एक ‘द्वितीयक कीट’ (secondary pest) की भूमिका निभाता है, अर्थात यह केवल मृत, गिरे हुए या पहले से कमज़ोर पेड़ों पर ही आक्रमण करता है। इस रूप में यह वनों में अपघटन की प्राकृतिक प्रक्रिया को गति देने में सहायक होता है।
परंतु, कुछ विशेष परिस्थितियों में इसकी जनसंख्या अनियंत्रित होकर ‘महामारी’ (epidemic) का रूप ले लेती है, जैसे
आर्द्रता और मानसून: इस कीट का जीवन चक्र पूरी तरह वर्षा ऋतु से संचालित होता है। मानसून की पहली बौछार के साथ ही इसके प्यूपा (pupa) से वयस्क बीटल बाहर आते हैं। यदि जून-जुलाई की अवधि में लगातार उच्च आर्द्रता (>80%) और मध्यम तापमान बना रहे, तो इनके अंडों और लार्वा के जीवित रहने की दर काफी बढ़ जाती है।
दुर्बल वृक्षों की उपलब्धता: चक्रवात, तेज़ आंधी या अन्य कारणों से यदि वनों में क्षतिग्रस्त या कमजोर पेड़ बड़ी संख्या में मौजूद हों, तो इस कीट को प्रजनन के लिए प्रचुर मात्रा में मेज़बान मिल जाते हैं।
शुद्ध वन और जैव–विविधता की कमी: साल के सघन और शुद्ध वन (जहां केवल एक ही प्रजाति के वृक्ष हों) इस कीट के प्रसार को एक निर्बाध गलियारा प्रदान करते हैं।
वृक्षों पर प्रभाव
वयस्क मादा बीटल पेड़ की छाल के नीचे या उसकी दरारों में सैकड़ों अंडे देती है। अंडों से निकलने वाले लार्वा पेड़ के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से कैंबियम और सैपवुड (cambium & sapwood) को अपना भोजन बनाते हैं। सैपवुड वृक्ष की वह संवहनी परत है जो जड़ों से जल और आवश्यक पोषक तत्वों को पत्तियों तक पहुंचाती है।
लार्वा जब तने के भीतर लंबी, टेढ़ी-मेढ़ी सुरंगें बनाते हैं, तो वृक्ष का पोषण तंत्र पूरी तरह अवरुद्ध हो जाता है। पेड़ के तने से रिसने वाला राल और पेड़ के निचला भाग के आसपास एकत्र होने वाला लकड़ी का महीन बुरादा एक संकेत होता है कि वृक्ष का आंतरिक तंत्र पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है और वह सूखने की कगार पर है।
भौगोलिक संवेदनशीलता और ऐतिहासिक संदर्भ
भारत में साल के वन देश के कुल जंगल का एक बड़ा हिस्सा हैं, जो न केवल जैव-विविधता बल्कि जनजातीय अर्थव्यवस्था की भी रीढ़ हैं। साल बोरर (sal borer) का प्रकोप मुख्य रूप से दो बड़े क्षेत्रों में देखा जाता है:
सेंट्रल इंडियन बेल्ट: मध्य प्रदेश (मंडला, डिंडौरी, कान्हा, बांधवगढ़) और छत्तीसगढ़ (बस्तर व सरगुजा)।
सब–हिमालयन बेल्ट: उत्तराखंड (तराई क्षेत्र), उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा और झारखंड (सारंडा के घने वन)।
वर्ष 1997-98 में अविभाजित मध्य प्रदेश के जंगलों में इसका अत्यधिक गंभीर प्रकोप देखा गया था, जिसके कारण वन विज्ञानियों के परामर्श पर वन पारिस्थितिकी को बचाने के लिए आधिकारिक तौर पर लगभग 10 लाख से अधिक संक्रमित पेड़ों को काटना पड़ा था।
क्या पूर्ण उन्मूलन सुरक्षित है?
पारिस्थितिकी विज्ञान के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, किसी भी प्राकृतिक कीट का पूरी तरह से उन्मूलन करना वन खाद्य-जाल के संतुलन को बिगाड़ सकता है। साल बोरर वन खाद्य-जाल की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसके लार्वा और वयस्क कीट कई वन्य पक्षियों (जैसे कठफोड़वा), चमगादड़ों और परभक्षी कीटों का प्राथमिक भोजन हैं। अतः, इस कीट के पूर्ण विनाश की नहीं, बल्कि इसकी जनसंख्या को एक निश्चित स्तर से नीचे रखने और इसके वैज्ञानिक प्रबंधन की ज़रूरत है।
एकीकृत कीट प्रबंधन
घने जंगलों में रासायनिक कीटनाशकों का छिड़काव पूरी तरह अव्यावहारिक और पर्यावरण के लिए हानिकारक है। इसके लिए देहरादून स्थित भारतीय वन अनुसंधान संस्थान ‘एकीकृत कीट प्रबंधन’ (integrated-pest management) की सिफारिश करता है।
इस संदर्भ में डिंडौरी में वर्तमान में अपनाई जा रही ‘ट्रैप-ट्री’ (trap-tree) विधि पूरी तरह वैज्ञानिक है। मानसून के दौरान साल के कुछ चुनिंदा गिरे या कटे हुए पेड़ों की छाल को कूटकर ‘ट्रैप’ बनाया जाता है। इस छाल से निकलने वाले वाष्पशील यौगिक (जैसे अल्फा पाइनीन) हवा में फैलते हैं। इनकी गंध से आकर्षित होकर वयस्क बीटल भारी संख्या में वहां एकत्र हो जाते हैं, जिन्हें सुबह के समय सुप्तावस्था (inactive stage) में पकड़कर नष्ट कर दिया जाता है।
एक अन्य तरीका है सिल्विकल्चरल हाइजीन (silvicultural hygiene) जिसमें मानसून से पहले जंगलों में से गिरे हुए और मृत पेड़ों के अवशेषों को हटा दिया जाता है ताकि कीटों को प्रारंभिक प्रजनन स्थल न मिल सके।
जैविक नियंत्रण भी कारगर हो सकता है। इसमें वनों में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले परभक्षी बीटल्स (जैसे Alaus प्रजाति) और एंटोमोपैथोजेनिक फफूंद (जैसे Beauveria bassiana) को बढ़ावा दिया जाता है, जो साल बोरर की आबादी को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित रखते हैं।
डिंडौरी का वर्तमान संकट हमें यह सीख देता है कि वन प्रबंधन में निरंतर निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का होना कितना अनिवार्य है। साल बोरर का यह प्रकोप वन पारिस्थितिकी तंत्र में आए किसी असंतुलन का संकेतक है। इसका दीर्घकालिक समाधान केवल तात्कालिक तौर पर कीड़ों को पकड़ने में नहीं, बल्कि मिश्रित वनों (mixed forests) को बढ़ावा देने और वन पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने में निहित है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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