
जंतु संग्रहालयों के प्रबंधकों के सामने एक बड़ी समस्या यह होती है कि उन्हें प्रदर्शन के लिए मिले कंकालों की सफाई करना होती है क्योंकि इन कंकालों पर मांस चिपका होता है। फिलहाल कई संग्रहालयों (museums) में कंकालों पर से मांस साफ करने के लिए विभिन्न रसायनों या एंज़ाइमों का इस्तेमाल किया जाता है। ये तरीके महंगे होने के अलावा पर्यावरण के लिए हानिकारक भी हो सकते हैं, और कई बार कंकाल को क्षति पहुंचाते हैं।
कुछ संग्रहालयों में इस काम के लिए डर्मेस्टिड भृंग (dermestid beetle) छोड़ दिए जाते हैं ताकि वे कंकालों पर चिपका मांस चट कर जाएं। लेकिन इन भृंगों के समूहों को कैद करके रखना होता है क्योंकि इनमें जीवन चक्र की विभिन्न अवस्थाओं के कीट होते हैं। यदि वयस्क कीट कंकाल पर अपने अंडे छोड़ दें या खुद कैद से निकल भागें तो वे अन्य नमूनों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
अब इस मामले में कृमि उनकी मदद करने वाले हैं। स्टुटगार्ड के स्टेट म्यूज़ियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के निलूफर अलाई कहकी विचार कर रही थीं कि ऐसे कौन-से अन्य कीट हो सकते हैं जो इस काम में मदद कर सकें। उनकी टीम के दिमाग में सुपरकृमियों (superworms) का विचार कौंधा।
सुपरकृमि वास्तव में कीट नहीं हैं बल्कि भृंग (Zophobas atratus) की इल्लियां हैं। ये आसानी से मिल जाते हैं क्योंकि इनका उपयोग पालतू सरिसृपों, उभयचरों, मछलियों और पक्षियों के भोजन के लिए किया जाता है। खास बात यह है कि जब ये बड़े-बड़े समूहों में होते हैं तो प्यूपा में परिवर्तित नहीं होते। अर्थात इनमें से वयस्क कीट नहीं बनते यानी इनके भाग निकलने की संभावना भी नहीं होती। शोधकर्ताओं ने इस विचार को परखा।
उन्होंने अलग-अलग साइज़ और प्रजातियों के विभिन्न मृत जानवरों (dead animals) पर इन्हें छुट्टा छोड़ दिया। पहले तो उन्होंने प्रत्येक मृत जानवर की चमड़ी हटाई और उसके सारे अंग निकल दिए। बड़े जानवरों के ऊतकों को मुलायम करने के लिए उन्हें उबाला गया। इसके बाद इन शवों को एक डिब्बे में रखकर सैकड़ों इल्लियां (सुपरकृमि) डाल दिए गए।
इल्लियों के झुंड ने छोटे जानवरों का मांस तो घंटों में साफ कर दिया, पर बड़े जानवरों के लिए उन्हें एक-दो दिन लगे। और तो और, बड़े जानवरों की सफाई (skeleton cleaning) के लिए हर आठ घंटे में नई और भूखी इल्लियां डालनी पड़ी। यदि इल्लियों की संख्या बहुत ज़्यादा रही तो उन्होंने छोटे जानवरों की हड्डियां भी चबा डालीं। हां, बड़े जानवरों की हड्डियां सलामत रहीं। कई सारे प्रयोगों के बाद टीम का निष्कर्ष है कि जानवर के प्रति ग्राम शव के लिए 10-15 ग्राम इल्लियां उपयुक्त होती हैं।
वैसे कई संग्रहालय प्रबंधकों का कहना है कि सुपरकृमियों को पालना भोजन वगैरह की दृष्टि से थोड़ा मुश्किल होगा। इसके अलावा इनके नए कीट तैयार करने के लिए (worm rearing) इल्लियों को झुंड से अलग करके रखना होगा। दूसरी ओर, कहकी का मत है कि इन्हें साधारण परिस्थितियों में रखा जा सकता है जबकि डर्मेस्टिड कीटों के लिए संग्रहालय में एक अलग प्रयोगशाला ही बनानी पड़ती है। तो अब कई संग्रहालयों में इनके उपयोग को परखने की बारी है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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