शनि के उपग्रह पर ड्रोन भेजने की तैयारी में नासा – प्रदीप

बीते चार-पांच दशकों में शनि का सबसे बड़ा चंद्रमा टाइटन आकर्षण का केंद्र रहा है। टाइटन पृथ्वी के अलावा सौरमंडल का इकलौता ऐसा पिंड है, जिसकी सतह पर नहरों, सागरों आदि की उपस्थिति के ठोस प्रमाण मिले हैं। विज्ञानियों का मानना है कि एक समय हमारी पृथ्वी टाइटन की तरह ही थी। टाइटन के वायुमंडल में बादलों की मौजूदगी और तड़ित की घटनाएं पृथ्वी जैसे मौसम का वायदा करती हैं। इसलिए वहां सूक्ष्मजीवी जीवन की मौजूदगी की पूरी संभावना है।

पृथ्वी से बाहर जीवन की मौजूदगी की जिज्ञासा में दुनिया भर की स्पेस एजेंसियां लंबे समय से टाइटन की ओर टकटकी लगाए बैठी हैं। इसी क्रम में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा टाइटन पर जीवन की संभावनाओं की पड़ताल के लिए ड्रैगनफ्लाई नामक ड्रोन भेजने की तैयारी में है। मिशन ड्रैगनफ्लाई को 2027 में लांच किया जाना है और 2034 में इसके टाइटन पर पहुंचने की उम्मीद है।

हाल ही में कॉर्नेल युनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की एक टीम ने टाइटन पर ड्रैगनफ्लाई की लैंडिंग साइट निर्धारित करने के लिए कैसिनी मिशन द्वारा ली गई तस्वीरों का विश्लेषण किया है ताकि ड्रैगनफ्लाई की लैंडिंग के लिए एक आदर्श स्थान चुना जा सके। अंतत: सेल्क क्रेटर के पास के साग्रीला टीले को चुना गया है।

दी प्लेनेटरी साइंस जर्नल में प्रकाशित शोधपत्र के प्रधान लेखक ली बोनेफाय का कहना है कि ड्रैगनफ्लाई टाइटन की विषुवत रेखा के सूखे इलाके में उतरेगा जहां बहुत ही ठंडे और घने वायुमंडल वाले हाइड्रोकार्बन का संसार है। कई बार वहां तरल मीथेन की बारिश होती है। लेकिन कई जगह धरती के रेगिस्तानों जैसी हैं, जहां रेत के टीले हैं, छोटे पहाड़ हैं और इम्पैक्ट क्रेटर भी हैं। अभी तक बहुत सारी जानकारियां (जैसे सेल्क क्रेटर का आकार और ऊंचाई) अनुमान ही हैं इसलिए इस सम्बंध में 2034 से पहले ज़्यादा से ज़्यादा सटीक जानकारी जुटाने की ज़रूरत है।

तकरीबन 85 करोड़ डॉलर के इस मिशन के तहत ड्रोन की मदद से टाइटन की सतह से नमूने एकत्रित कर उसकी संरचना समझने की कोशिश होगी। नासा को कैसिनी मिशन के दौरान ऐसे संकेत मिले थे कि टाइटन पर कुछ ऐसे कार्बनिक पदार्थ मौजूद हैं, जिन्हें जीवन के लिए ज़रूरी माना जाता है। तरल पानी की मौजूदगी का भी दावा किया गया था। ड्रैगनफ्लाई छोटी-छोटी उड़ानें भरेगा और विभिन्न स्थानों पर उतर कर वहां से नमूने इकट्ठा करेगा। इसकी उड़ानें आठ किलोमीटर तक की होंगी और यह कुल 175 किलोमीटर की उड़ान भरेगा। यह दूरी मंगल पर समस्त रोवरों द्वारा मिलकर तय की गई दूरी से दोगुनी होगी। उम्मीद है कि ड्रैगनफ्लाई टाइटन के सघन वायुमंडल को भेदकर उसकी बहुतेरी गुत्थियों से पर्दा उठाने में मददगार साबित होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चीन ने बनाई विश्व की सबसे बड़ी सौर दूरबीन

हाल ही में चीन ने तिब्बती पठार पर विश्व की सबसे विशाल सौर दूरबीन स्थापित की है। डाओचेंग सोलर रेडियो टेलिस्कोप (डीएसआरटी) नामक यह दूरबीन 300 से अधिक तश्तरी के आकार के एंटीनाओं का समूह है जो 3 किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है। इसको स्थापित करने का कार्य 13 नवंबर को पूरा हुआ और इसका परीक्षण जून में शुरू किया जाएगा। इस वेधशाला से सौर विस्फोटों का अध्ययन करने और पृथ्वी पर इनके प्रभावों को समझने में मदद मिलेगी। आने वाले कुछ वर्षों में सूर्य अत्यधिक सक्रिय चरण में प्रवेश कर रहा है, ऐसे में डीएसआरटी द्वारा एकत्र रेडियो-आवृत्ति डैटा अन्य आवृत्ति बैंड में काम कर रही दूरबीनों के डैटा का पूरक होगा।

पिछले कुछ वर्षों में सौर अध्ययन के क्षेत्र में काफी महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। 2018 में नासा द्वारा पार्कर सोलर प्रोब और 2020 में युरोपियन स्पेस एजेंसी द्वारा सोलर ऑर्बाइटर प्रक्षेपित किए गए थे। चीन ने भी पिछले दो वर्षों में अंतरिक्ष सौर वेधशाला सहित सूर्य का अध्ययन करने वाले चार उपग्रहों का प्रक्षेपण किया है। ये उपग्रह पराबैंगनी और एक्स-रे आवृत्तियों पर सूर्य का अध्ययन कर रहे हैं। चीन स्थित वेधशालाएं सौर गतिविधियों से सम्बंधित महत्वपूर्ण डैटा प्रदान करेंगी जो अन्य टाइम ज़ोन की दूरबीनों द्वारा देख पाना संभव नहीं है।

डीएसआईटी जैसी रेडियो दूरबीन सूर्य के ऊपरी वायुमंडल (कोरोना या आभामंडल) में होने वाली गतिविधियों (जैसे सौर लपटों और सूर्य से पदार्थों का फेंका जाना यानी कोरोनल मास इजेक्शन, सीएमई) का अध्ययन करने में काफी उपयोगी होंगी। आम तौर पर सूर्य के चुम्बकीय क्षेत्र में परिवर्तन होने पर सौर लपटों या सीएमई जैसे विशाल विस्फोट होते हैं। सीएमई के दौरान उत्सर्जित उच्च-ऊर्जा कण कृत्रिम उपग्रहों को नुकसान पहुंचाते हैं और पॉवर ग्रिड को तहस-नहस कर सकते हैं। इस वर्ष फरवरी में एक कमज़ोर सीएमई ने स्पेसएक्स द्वारा प्रक्षेपित 40 स्टारलिंक संचार उपग्रहों को नष्ट कर दिया था। अंतरिक्ष में उपग्रहों की बढ़ती संख्या के चलते अंतरिक्ष मौसम के बेहतर पूर्वानुमान की भी आवश्यकता है।

अंतरिक्ष मौसम का अनुमान लगाना काफी चुनौतीपूर्ण है। डीएसआरटी के प्रमुख इंजीनियर जिनग्ये यान के अनुसार डीएसआरटी सूर्य की डिस्क से कम से कम 36 गुना अधिक क्षेत्र में नज़र रख सकता है। यह सीएमई को ट्रैक करने और अंतरिक्ष में उच्च-ऊर्जा कणों के प्रसार की प्रक्रिया को समझने में काफी उपयोगी होगा। इससे प्राप्त जानकारी की मदद से वैज्ञानिक सीएमई उत्सर्जन और इसके पृथ्वी तक पहुंचने का अनुमान लगा सकते हैं।

यान के अनुसार डीएसआरटी से प्राप्त डैटा अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्ताओं को भी उपलब्ध कराया जाएगा। इसके अलावा, भविष्य में डीएसआरटी का उपयोग रात के समय में पल्सर अनुसंधान वगैरह हेतु करने की भी योजना है। इसके अलावा चीन ने तिब्बती पठार में सिनचुआन पर एक नई दूरबीन स्थापित करने की भी योजना बनाई है जिसके 2026 तक पूरी होने की उम्मीद है। (स्रोत फीचर्स)

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चंद्रमा और पृथ्वी का लगभग एक-सा अतीत

चंद्रमा की सतह छोटे-बड़े हज़ारों गड्ढों (क्रेटर) से अटी पड़ी है, जो क्षुदग्रहों की टक्कर के कारण बने हैं। पृथ्वी पर हुई उल्कापिंड की ज़ोरदार टक्कर तो विख्यात है, जिसके कारण किसी समय पृथ्वी पर राज करने वाले डायनासौर पृथ्वी से खत्म हो गए थे। अब, साइंस एडवांसेस पत्रिका में प्रकाशित हालिया अध्ययन बताता है कि लाखों साल पहले चंद्रमा और पृथ्वी पर उल्कापिंडों की बौछार लगभग एक समय पर हुई थी। यह शोध खगोलविदों को आंतरिक सौर मंडल को बेहतर ढंग से समझने में मदद कर सकता है और यह अनुमान लगाने में मदद कर सकता है कि भविष्य में विनाशकारी टक्कर लगभग कब होगी?

ऑस्ट्रेलिया की कर्टिन युनिवर्सिटी के स्पेस साइंस एंड टेक्नॉलॉजी सेंटर के शोधकर्ता चीन के चांग’ई-5 चंद्र मिशन द्वारा पृथ्वी पर लाई गई चंद्रमा की मिट्टी में मिले सूक्ष्म कांच के मनकों का अध्ययन करके इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं।

उन्होंने विभिन्न तकनीकों और सांख्यिकीय मॉडलिंग और भूगर्भीय सर्वेक्षणों के आधार पर यह भी अनुमान लगाया कि चंद्रमा पर कांच के ये सूक्ष्म मनके कैसे बने और कब। उन्होंने पाया कि ये मनके उल्का पिंडों की टक्कर के कारण उत्पन्न हुई तीव्र गर्मी और दबाव के कारण बने थे। तो यदि शोधकर्ता यह पता कर लेते हैं कि इन मनकों की उम्र क्या है तो इससे चंद्रमा पर हुई उल्का पिंडों की बौछार का समय भी निर्धारित किया जा सकता है।

जब ऐसा किया गया तो पता चला कि चंद्रमा और पृथ्वी पर क्षुद्रग्रहों के टकराने का समय और आवृत्ति लगभग एक समान है। चंद्रमा पर पाए गए कुछ मनके लगभग 6.6 करोड़ साल पहले बने थे, यानी चंद्रमा की सतह पर टक्कर 6.6 करोड़ वर्ष पहले हुई थी। और लगभग इसी समय डायनासौर को खत्म कर देने वाला उल्कापिंड, चिक्सुलब इंपेक्टर, मेक्सिको के युकाटन प्रायद्वीप के पास पृथ्वी से टकराया था। यह टक्कर इतनी भीषण थी कि इसके कारण पृथ्वी का लगभग तीन-चौथाई जीवन खत्म हो गया था।

करीब 70,000 कि.मी. प्रति घंटे की रफ्तार से टकराए 10 कि.मी. चौड़े इस उल्कापिंड ने पृथ्वी में 150 कि.मी. चौड़ा और 19 कि.मी. गहरा गड्ढा बना दिया था। टक्कर से उपजी भूकंपनीयता के अलावा पृथ्वी पर धूल का गुबार छा गया था जिसने सूर्य का प्रकाश रोक दिया था। फलस्वरूप जीवन के विकास ने नया मोड़ लिया था।

टीम अब चांग’ई-5 द्वारा लाई गई मिट्टी के नमूनों की तुलना चंद्रमा से लाई गई मिट्टी के अन्य नमूनों और चंद्रमा की सतह पर बने गड्ढों की उम्र के साथ करना चाहती है ताकि चंद्रमा पर हुई अन्य टक्करों के बारे में समझ सकें, और इसकी मदद से पृथ्वी पर होने वाली क्षुद्रग्रह टक्कर से जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को समझ सकें। (स्रोत फीचर्स)

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सौर मंडल से बाहर के ग्रह में कार्बन डाईऑक्साइड

जेम्स वेब दूरबीन की मदद से सौर मंडल से बाहर के एक ग्रह के वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड के साक्ष्य मिले हैं। शनि के आकार का यह ग्रह पृथ्वी से 700 प्रकाश वर्ष दूर है। यह पहली बार है कि किसी बाह्य ग्रह में इस गैस के साक्ष्य मिले हैं। किसी ग्रह पर कार्बन डाईऑक्साइड की उपस्थिति से उस ग्रह की उत्पत्ति के महत्वपूर्ण सुराग मिलते हैं। खगोलविदों का विश्वास है कि जल्द ही जेम्स वेब दूरबीन से मीथेन और अमोनिया जैसी गैसों की पहचान भी की जा सकेगी जो किसी ग्रह पर जीवन की उपस्थिति का अंदाज़ देंगी।

वेब दूरबीन अवरक्त तरंगों के प्रति संवेदनशील है जिन्हें पृथ्वी का वायुमंडल अवरुद्ध करता है। जब कोई ग्रह कक्षा में चक्कर लगाते हुए अपने तारे के सामने से गुज़रता है तो तारे का प्रकाश ग्रह के वायुमंडल से होकर गुज़रता है। वायुमंडल से गुज़रने के दौरान प्रकाश में जो परिवर्तन होते हैं वे ग्रह के वायुमंडल के संघटन का सुराग देते हैं क्योंकि वायुमंडल में उपस्थित गैसें विभिन्न तरंग लंबाई के प्रकाश का अवशोषण करती हैं। हमारी रुचि की अधिकांश गैसें अवरक्त प्रकाश का अवशोषण करती हैं।          

हालिया अध्ययन के लिए खगोलविदों ने वैस्प-39बी नामक गैसीय गर्म विशाल ग्रह को चुना जो हर 4 दिनों में अपने तारे की परिक्रमा करता है। इस ग्रह के अवशोषण स्पेक्ट्रम में वेब टीम ने कार्बन डाईऑक्साइड गैस की यकीनी उपस्थिति देखी। वैसे इसी डैटा से कार्बन डाईऑक्साइड के अलावा एक और गैस का पता चला है लेकिन अभी तक टीम ने इसके बारे में कोई जानकारी नहीं दी है। जल्द ही परिणाम नेचर पत्रिका में प्रकाशित किए जाएंगे जिसमें इस ग्रह पर उपस्थित सभी रसायनों की जानकारी होगी।   

किसी भी ग्रह पर कार्बन डाईऑक्साइड की उपस्थिति से उस ग्रह की ‘धात्विकता’ का पता चलता है। ‘धात्विकता’ का अर्थ है कि किसी ग्रह पर हाइड्रोजन व हीलियम तथा अन्य तत्वों का अनुपात क्या है। गौरतलब है कि बिग बैंग के बाद ब्रह्मांड में हाइड्रोजन और हीलियम का निर्माण हुआ था। आगे चलकर इन दो तत्वों से अधिक भारी तत्वों का निर्माण तारों में हुआ। शोधकर्ताओं के अनुसार भारी तत्वों ने विशाल ग्रहों के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब किसी नए तारे के इर्द-गिर्द सामग्री के डिस्क से ग्रह का निर्माण होता है तब भारी तत्व ठोस पत्थरों और चट्टानों को जोड़कर कोर का निर्माण करते हैं जो अंततः अपने स्वयं के गुरुत्वाकर्षण से गैसों को अपनी ओर खींचते हैं और एक विशाल ग्रह का रूप ले लेते हैं।         

वैस्प-39बी से मिले कार्बन डाईऑक्साइड के साक्ष्यों से वेब टीम का अनुमान है कि इस ग्रह की धात्विकता लगभग शनि ग्रह के समान है। उम्मीद है कि वेब दूरबीन कई आश्चर्यजनक परिणाम देगी। शायद हमें कोई ऐसा ग्रह मिल जाए जो जीवन के योग्य हो। (स्रोत फीचर्स)

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चांद पर दोबारा उतरने की कवायद – प्रदीप

आर्टेमिस मिशन के ज़रिए नासा इंसानों को एक बार फिर चांद पर उतारने की योजना बना रहा है। हाल ही में अपोलो-11 चंद्र लैंडिंग की 53वीं वर्षगांठ के अवसर पर नासा के एक्सप्लोरेशन सिस्टम डेवलपमेंट मिशन निदेशालय के सह-प्रशासक जिम फ्री ने बताया है कि आर्टेमिस-I मेगा मून रॉकेट जल्द ही लांच किया जा सकता है। आर्टेमिस-I एक मानव रहित मिशन होगा। यह मिशन आर्टेमिस कार्यक्रम के प्रारंभिक परीक्षण के तौर पर चांद पर जाएगा और फिर वापस धरती पर लौट आएगा। आर्टेमिस मिशन के ज़रिए नासा 2025 तक इंसानों को एक बार फिर चांद पर उतारने के अपने लक्ष्य को पूरा करना चाहता है। इस मिशन के तहत एक महिला भी चांद पर जाएगी, जो चांद पर जाने वाली विश्व की पहली महिला बनेगी।

आर्टेमिस मिशन अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत करेगा। नासा का कहना है कि भले ही यह मिशन चांद से शुरू होगा पर यह निकट भविष्य के मंगल अभियानों के लिए भी वरदान सिद्ध होगा क्योंकि चांद पर जाना, मंगल पर पहुंचने से पहले आने वाला एक बेहद अहम पड़ाव है। दरअसल, नासा चांद को मंगल पर जाने के लिए एक लांच पैड की तरह इस्तेमाल करना चाहता है।

रणनीतिक और सामरिक महत्व के चलते चांद पर जाने की होड़ एक नए सिरे से शुरू हो चुकी है। जो भी देश चांद पर सबसे पहले कब्जा करेगा उसका अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में दबदबा बढ़ेगा। चंद्रमा की दुर्लभ खनिज संपदा, खासकर हीलियम-3, ने भी इसे सबका चहेता बना दिया है। अमेरिका के अलावा रूस, जापान, दक्षिण कोरिया और भारत भी 2022-23 में अपने चंद्र अन्वेषण यान भेजने वाले हैं। यही नहीं, कई निजी कंपनियां चांद पर सामान व उपकरण पहुंचाने और प्रयोगों को गति देने के उद्देश्य से सरकारी अंतरिक्ष एजेंसियों के ठेके हासिल करने की कतार में खड़ी हैं।

भारत के चंद्रयान-2 मिशन के विफल होने के बाद, भारत 2023 की पहली तिमाही में चंद्रयान-3 मिशन के तहत दोबारा लैंडर और रोवर चांद पर भेजने की योजना बना रहा है। चंद्रयान-2 मिशन के सबक के आधार पर चंद्रयान-3 मिशन की तैयारी की गई है। चंद्रयान-2 के दौरान लांच किए गए ऑर्बाइटर का उपयोग भी किया जाएगा।

चांद पर जाने की तैयारी में विभिन्न देशों की सरकारी और निजी स्पेस एजेंसियां पूरे दमखम के साथ जुटी हैं। दक्षिणी कोरिया अगले महीने अपना पहला ‘कोरिया पाथफाइंडर ल्यूनर ऑर्बाइटर मिशन’ भेजेगा। यह ऑर्बाइटर चंद्रमा की भौगोलिक और रासायनिक संरचना का अध्ययन करेगा। इसी साल रूस भी अपने लैंडर लूना-25 को चांद की सतह पर उतारने की तैयारियों में जुटा हुआ है। गौरतलब है कि पिछले 45 वर्षों में यह चांद की ओर रूस का पहला मिशन होगा। इनके अलावा जापान भी अगले साल अप्रैल में चांद पर अपना स्मार्ट लैंडर उतारने की तैयारी कर रहा है। दुनिया भर के देशों में चांद को लेकर एक होड़-सी लगी दिखती है। (स्रोत फीचर्स)

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आकाशगंगा का सबसे सटीक नक्शा तैयार – प्रदीप

म अपनी कोरी आंखों से जितने भी ग्रहों, तारों एवं तारासमूहों को देख सकते हैं, वे सभी एक अत्यंत विराट योजना के सदस्य हैं, जो आकाश में उत्तर से दक्षिण तक फैला हुई नदी के समान प्रवहमान प्रतीत होती है। यह ‘आकाशगंगा’ है। हमारा सूर्य और उसका परिवार यानी सौरमंडल जिस निहारिका के सदस्य हैं उसका नाम आकाशगंगा है।

आकाशगंगा में 100 अरब से भी ज़्यादा तारे हैं। हमारा सूर्य आकाशगंगा के केंद्र से लगभग 27,000 प्रकाश वर्ष दूर एक किनारे पर स्थित है। इसलिए पृथ्वी से देखने पर आकाशगंगा तारों के एक सघन पट्टे के रूप में दिखाई देती है। चूंकि हम आकाशगंगा के भीतर ही स्थित हैं, इसलिए हम इसकी आकृति का सटीक अनुमान नहीं लगा पाए हैं। हम आकाशगंगा के 90 प्रतिशत हिस्से को नहीं देख सकते। इसके बारे में हम जो कुछ भी जानते हैं, वह ब्रह्मांड की हज़ारों अन्य निहारिकाओं की संरचना के अध्ययन और अप्रत्यक्ष खगोलीय प्रेक्षणों पर आधारित है।

हाल ही में युरोपीय स्पेस एजेंसी ने गेइया मिशन के अंतर्गत आकाशगंगा का अब तक का सबसे बड़ा और सबसे सटीक त्रि-आयामी नक्शा जारी किया है। यह नक्शा खगोल विज्ञानियों को आकाशगंगा के अरबों तारों, ग्रहों, क्षुद्रग्रहों, उल्काओं आदि की सटीक स्थिति तो बताएगा ही, साथ ही इससे इन खगोलीय पिंडों की आगे की गति को भी ट्रैक करने में मदद मिलेगी। यह हमें हमारी निहारिका के अतीत के बारे में बता सकता है; जैसे कि कौन से तारे अन्य निहारिकाओं से आए होंगे और अतीत में हमारी अपनी निहारिका (आकाशगंगा) में विलीन हो गए होंगे। गेइया मिशन ने आकाशगंगा में कम से कम दो अरब खगोलीय पिंडों की पहचान की है और आकाशगंगा के बाहर लगभग 29 लाख नई निहारिकाओं की शिनाख्त की है। इसकी मदद से खगोल विज्ञानी लगभग 3.30 करोड़ तारों की गति निर्धारित कर पाए हैं और यह पता लगा पाए हैं कि वे हमारे सौरमंडल के नज़दीक आ रहे हैं या उससे दूर भाग रहे हैं। इसके अलावा 1,56,000 क्षुद्र ग्रहों की सटीक कक्षाएं भी निर्धारित की गई हैं।

विज्ञानियों ने आकाशगंगा को सर्पिल निहारिका (स्पाइरल गैलेक्सी) की श्रेणी में रखा है। अधिकांश पाठ्य पुस्तकों और विज्ञान की लोकप्रिय पुस्तकों में आकाशगंगा को एक सपाट तश्तरीनुमा सर्पिल संरचना के रूप में दिखाया जाता है। लेकिन गेइया मिशन के नए थ्री-डी नक्शे ने इसके समतल या सपाट होने सम्बंधी धारणा को चुनौती दी है। नए डैटा के मुताबिक आकाशगंगा ऊपर और नीचे के घुमावदार किनारों के साथ काफी विकृत है। सपाट तश्तरीनुमा आकृति बनाने की बजाय आकाशगंगा के तारे एक ऐसी तश्तरी बनाते हैं जो किनारों पर मुड़ जाती है, कुछ-कुछ अंग्रेजी के अक्षर ‘एस’ (S) की तरह।

गेइया मिशन के अंतर्गत प्राप्त डैटा को खगोल विज्ञानी बेहद सटीक मान रहे हैं क्योंकि गेइया टेलीस्कोप को अब तक की सबसे व्यापक कवरेज रेंज हासिल है। इतनी रेंज किसी भी टेलीस्कोप के पास नहीं है। यह आकाशगंगा को दिक् और वेग के छह आयामों में खंगालने में सक्षम है। तारों की स्थिति, गति और तेजस्विता को मापने के अलावा, गेइया ने अन्य पिंडों की एक विशाल शृंखला पर डैटा इकट्ठा किया है। गेइया के डैटा के बिना सभी तारे एक जैसी टिमटिमाती रोशनी भर हैं, इसके डैटा की बदौलत यह पता चलता है कि इनमें कितनी विविधता है। (स्रोत फीचर्स)

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भारत का पहला तरल दर्पण टेलीस्कोप

हाल ही में भारत में एक अनोखा टेलीस्कोप तैयार किया गया है जिसमें ठोस दर्पण के बजाय घूर्णन करता तरल पारा उपयोग किया गया है। हालांकि इस तरह के टेलीस्कोप पहले भी बनाए जा चुके हैं लेकिन खगोल विज्ञान को समर्पित 4-मीटर चौड़ा इंटरनेशनल लिक्विड मिरर टेलीस्कोप (आईएलएमटी) पहली बार तैयार किया गया है। इसे हिमालय में 2450-मीटर ऊंचाई पर नैनीताल के समीप स्थित देवस्थल वेधशाला में स्थापित किया गया है।

गौरतलब है कि लगभग 15 करोड़ रुपए की लागत का यह टेलीस्कोप बेल्जियम, कनाडा और भारत द्वारा संयुक्त रूप से तैयार किया गया है। यह कांच वाले टेलीस्कोप की तुलना में बहुत सस्ता है। इसी टेलीस्कोप के नज़दीक बेल्जियम की एक कंपनी द्वारा 3.6 मीटर चौड़ा स्टीयरेबल देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप (डीओटी) भी स्थापित किया गया है जिसकी लागत लगभग 140 करोड़ रुपए है। खगोलविदों के अनुसार तरल दर्पण चंद्रमा पर एक विशाल टेलीस्कोप स्थापित करने के लिए सबसे बेहतरीन तकनीक है जिससे दूरस्थ ब्रह्मांड को देखा जा सकेगा।        

इस प्रकार के टेलीस्कोप में एक कटोरे के आकार के उपकरण में पारे को घुमाया जाता है। इस प्रक्रिया में गुरुत्वाकर्षण और अपकेंद्री बल का मिला-जुला असर तरल को एक पारंपरिक टेलीस्कोप दर्पण के समान आदर्श परावलय आकार में परिवर्तित कर देता है। इसमें कांच का दर्पण बनाने, उसकी सतह को घिसकर परावलय आकार देने और एल्युमिनियम की परावर्तक परत बनाने का खर्च भी नहीं होता है।

आईएलएमटी की कल्पना 1990 के दशक के अंत में की गई थी। हालांकि भारत में इस टेलीस्कोप के पुर्जे 2012 में लाए गए थे लेकिन निर्माण में काफी विलंब हुआ। इस दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि उनके पास पर्याप्त पारा भी नहीं है। फिर कोविड-19 महामारी ने यात्रा करना मुश्किल कर दिया। आखिरकार इस वर्ष अप्रैल में टीम ने 50 लीटर पारे को सेट करके 3.5 मि.मी. परावलय परत का निर्माण किया।

सीधे ऊपर की ओर देखने पर यह घूमता आईना लगभग चंद्रमा जितने चौड़े आकाश का दर्शन कराएगा और पृथ्वी के घूर्णन के चलते सुबह से शाम तक पूरे आकाश पर बारीकी से नज़र रखी जा सकेगी। इसके द्वारा बनाई गई छवियां लंबी धारियों के रूप में दिखाई देंगी जिनके अलग-अलग पिक्सेल को जोड़कर एक लंबे एक्सपोज़र से प्राप्त छवि का निर्माण किया जा सकेगा।

यह टेलीस्कोप रात-दर-रात आकाश की एक ही पट्टी को दिखाएगा, ऐसे में कई रातों के एक्सपोज़र को एक साथ जोड़कर धुंधली वस्तुओं की स्पष्ट छवियां प्राप्त की जा सकती हैं।

वैकल्पिक रूप से, रात-दर-रात हो रहे परिवर्तनों को भी देखा जा सकता है। इसमें सुपरनोवा, क्वाज़र और दूरस्थ निहारिकाओं में उपस्थित ब्लैक होल वगैरह पर भी नज़र रखी जा सकेगी। हालांकि खगोल शास्त्रियों की अधिक रुचि गुरुत्वाकर्षण लेंस की खोज करना है जिसमें गुरुत्वाकर्षण के कारण एक या अनेक निहारिका समूह प्रकाश को विकृत कर देते हैं। आईएलएमटी की मदद से किसी खगोलीय वस्तु की चमक के आधार पर निहारिका-लेंसों के द्रव्यमान और ब्रह्मांड के फैलाव की दर पता लगाई जा सकती है। एक अनुमान के अनुसार आईएलएमटी की आकाशीय पट्टी में 50 ऐसे गुरुत्व लेंस दिखाई दे सकते हैं।         

वैसे तो कई और पारंपरिक सर्वेक्षण टेलीस्कोप आकाश का अध्ययन कर रहे हैं लेकिन परिवर्तनों को देखने के लिए प्रत्येक रात एक ही पैच पर लौटना उनके लिए संभव नहीं है। ऐसे में डीओटी और आईएलएमटी की समन्वित शक्ति से किसी भी खगोलीय वस्तु की जांच करना अब मुश्किल नहीं है।

यदि आईएलएमटी तकनीक सफल होती है तो इसे और अधिक विकसित कर चंद्रमा पर स्थापित किया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार चंद्रमा पर पृथ्वी की तुलना में गुरुत्वाकर्षण बल कम है और वहां वातावरण भी नहीं है इसलिए भविष्य के टेलीस्कोप स्थापित करने के लिए वह उचित स्थान है।

गौरतलब है कि पृथ्वी पर कोरियोलिस प्रभाव के कारण 8 मीटर से बड़े दर्पणों में पारे की गति प्रभावित हो सकती है जबकि चंद्रमा के घूर्णन की गति कम होती है जिससे अधिक बड़े दर्पणों को स्थापित करने में कोई समस्या नहीं होगी। लेकिन इतना वज़न चंद्रमा पर ले जाना मुश्किल है। और वहां रात के समय पारा जम जाएगा और दिन में वाष्पित होता रहेगा। लेकिन हलके पिघले हुए लवण का हिमांक बिंदु कम होता है जो चंद्रमा के वातावरण में भी काम कर सकता है। इसे चांदी के वर्क की मदद से परावर्तक बनाया जा सकता है।    

2000 के दशक में नासा और कैनेडियन स्पेस एजेंसी ने लूनर तरल दर्पण का अध्ययन शुरू किया था जो किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सका। लेकिन हाल ही में चंद्रमा में बढ़ती रुचि के चलते इस तकनीक पर फिर से अध्ययन किया जा सकता है। 2020 में 100-मीटर तरल दर्पण का प्रस्ताव रखा गया था जो चंद्रमा के किसी एक ध्रुव से आकाश के एक टुकड़े पर कई वर्षों तक नज़र रखेगा और निहारिकाओं के बारे में उपयोग जानकारी उपलब्ध कराएगा। (स्रोत फीचर्स)

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सबसे दूर स्थित मंदाकिनी की खोज – प्रदीप

ब्रह्मांड की गुत्थियों को सुलझाने में जुटे खगोल शास्त्रियों की एक अंतर्राष्ट्रीय टीम ने हाल ही में अब तक की सबसे दूर स्थित मंदाकिनी को खोजने का दावा किया है। धरती से तकरीबन 13.5 अरब प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित इस मंदाकिनी को खोजकर्ताओं ने एचडी1 नाम दिया है। यह अब तक खोजी गई सबसे दूर स्थित मंदाकिनी जीएन-ज़ेड11 से भी 10 करोड़ प्रकाश वर्ष ज़्यादा दूर है। इस खोज के नतीजे दी एस्ट्रोफिज़िकल जर्नल में प्रकाशित किए गए हैं।

इस मंदाकिनी से हम तक पहुंचने वाला प्रकाश तब निकला था जब ब्रह्मांड महज 30 करोड़ साल पुराना था। यह 13.8 अरब वर्ष पहले हुए बिग बैंग के बाद अस्तित्व में आने वाली शुरुआती मंदाकिनियों में से एक है जो ब्रह्मांड की उत्पत्ति व विकास को लेकर हमारी मौजूदा समझ को भी बदल सकती है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक एचडी1 मंदाकिनी इतनी पुरानी और दूर है कि इसमें सिर्फ धूल और गैस के गुबार ही दिखाई देते हैं। शुरुआती ब्रह्मांड में चारों ओर धूल और गैस ही बिखरी हुई थी। बिग बैंग के कुछ करोड़ सालों के बाद ही ब्रह्मांड की शुरुआती मंदाकिनियां बनी थीं। ये मंदाकिनियां आकार-प्रकार में हमारी मंदाकिनी (आकाशगंगा) से हज़ारों गुना ज़्यादा विशाल थीं। इन शुरुआती मंदाकिनियों का मूल काम आज की मंदाकिनियों के निर्माण का था। इसलिए आज ब्रह्मांड में मौजूद समस्त मंदाकिनियां इन्हीं शुरुआती मंदाकिनियों से बनी हुई हैं और हमारी आकाशगंगा भी संभवत: इन्हीं से बनी हुई हो।

हारवर्ड एंड स्मिथसोनियन सेंटर फॉर एस्ट्रोफिज़िक्स के वरिष्ठ खगोल-भौतिकविद फैबियो पैकूची के मुताबिक एचडी1 पराबैंगनी प्रकाश में बेहद चमकीली दिखाई देती है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि वहां कुछ ऊर्जावान प्रक्रियाएं हो रही हैं या फिर अरबों साल पहले हो चुकी हैं।

शुरू में खगोलशास्त्रियों को लगा कि एचडी1 बेहद अधिक रफ्तार से तारों का निर्माण कर रही स्टारबर्स्ट मंदाकिनी है। गणना करने पर पता चला कि एचडी1 हर साल 100 से ज़्यादा तारों का निर्माण कर रही थी। यह सामान्य स्टारबर्स्ट मंदाकिनियों की तुलना में भी 10 गुना अधिक है। तब खगोल शास्त्रियों की टीम को संदेह हुआ कि एचडी1 रोज़ाना सामान्य रूप से तारों का निर्माण नहीं कर रही है। एचडी1 से हम तक आने वाला प्रकाश भी दुविधा में डालने वाला है।

खगोल शास्त्रियों की टीम ने इस खोज को लेकर दो संभावनाएं प्रस्तुत की हैं। पहला यह कि संभवत: एचडी1 आश्चर्यजनक दर से तारों का निर्माण कर रही है और हो सकता है कि ये ब्रह्मांड के उन शुरुआती तारों में से हो, जिन्हें अब तक नहीं देखा गया था। दूसरा यह कि एचडी1 के अंदर सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 10 करोड़ गुना बड़ा अतिविशाल ब्लैक होल हो सकता है। लेकिन, अगर इस मंदाकिनी में ब्लैक होल हुआ तो यह ब्रह्मांड के उन मॉडल्स के लिए चुनौती वाली जानकारी होगी जो ब्लैक होल के निर्माण और विकास की व्याख्या करते हैं। क्योंकि उनकी व्याख्या के उलट इस अतिविशाल ब्लैक होल का निर्माण व विकास ब्रह्मांड के विकास के इतिहास में बहुत ही जल्दी हो गया होगा। बिग बैंग के तुरंत बाद इतने विशाल ब्लैक होल का बनना ब्रह्मांड सम्बंधी हमारे वर्तमान मॉडल के लिए एक चुनौती है।

हालांकि अगर हम यह मान लें कि एचडी1 ब्रह्मांड में बनने वाले शुरुआती तारों या ‘पॉपुलेशन 3’ के वर्ग का है तो इसके गुणों को ज़्यादा आसानी से समझाया जा सकता है। ब्रह्मांड में बनने वाले तारों की पहली आबादी वर्तमान तारों की तुलना में अधिक विशाल, अधिक चमकदार और गर्म थी। वास्तव में पॉपुलेशन 3 के तारे सामान्य तारों की तुलना में अधिक प्रकाश उत्पन्न करने में सक्षम होते हैं। हो सकता है कि इसी वजह से एचडी1 पराबैंगनी प्रकाश में ज़्यादा तेज़ी से चमक रही हो।

पैकूची के अनुसार इतनी दूर स्थित स्रोत की प्रकृति के सवालों का सही जवाब देना चुनौतीपूर्ण काम है। यहां तक कि अत्यधिक चमकीले पिंड क्वासर्स का प्रकाश भी इतनी लंबी यात्रा के बाद इतना धुंधला हो जाता है कि हमारी शक्तिशाली दूरबीनों को भी उस पकड़ने में बहुत कठिनाई होती है। शुरुआती ब्रह्मांड के पिंडों की पड़ताल करना बहुत ही मुश्किल काम है।

एचडी1 को सुबारू दूरबीन, विस्टा दूरबीन, यूके इन्फ्रारेड दूरबीन और स्पिट्ज़र अंतरिक्ष दूरबीन का इस्‍तेमाल करके लगभग 1200 घंटे के अवलोकनों के बाद खोजा गया। खगोल शास्त्रियों का कहना है कि सात लाख खगोलीय पिंडों के बीच में एचडी1 की खोज करना बहुत चुनौतीपूर्ण काम था। जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरबीन का इस्तेमाल करते हुए खगोलशास्त्रियों की टीम जल्दी ही एक बार फिर से धरती से दूरी की पुष्टि करने के लिए एचडी1 का अवलोकन करेगी। अगर मौजूदा गणना सही साबित होती है, तो एचडी1 अब तक रिकॉर्ड की गई सबसे दूर स्थित और सबसे पुरानी मंदाकिनी होगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चिंता का सबब बना अंतरिक्ष में फैला कचरा – प्रदीप

बीते दिनों गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कई इलाकों में आसमान से आग के गोले गिरते दिखाई दिए थे। कई जगह पर ठोस रूप में इन्हें धरती पर गिरते हुए भी देखा गया। इस तरह की आसमानी घटनाओं के संदर्भ में वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अंतरिक्ष का कचरा या मलबा हो सकता है। अगर यह मलबा ज़्यादा बड़े आकार का होता और किसी आवासीय क्षेत्र में गिरता तो जानमाल को भी भारी नुकसान पहुंचा सकता था।

दरअसल अंतरिक्ष में एकत्रित हो रहा मलबा भविष्य में धरती पर रह रहे लोगों के साथ-साथ यहां सक्रिय तमाम उपग्रहों, अंतरिक्ष यात्रियों और अंतरिक्ष स्टेशनों के लिए भी बेहद घातक साबित हो सकता है। इतना ही नहीं, इससे हमारी संचार व्यवस्था के भी प्रभावित होने की आशंका पैदा हो सकती है। ऐसे में जिस तरह से आज आधुनिक तकनीक आधारित तमाम गैजेट्स हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन गए हैं, उससे अलग तरह के नुकसान की आशंका भी हो सकती है।

यदि हम अंतरिक्ष में मौजूद तमाम मानव जनित पदार्थों की बात करें तो एक अनुमान के मुताबिक छोटे-बड़े मिलाकर लगभग 17 करोड़ पुराने रॉकेट और बेकार हो चुके उपग्रहों के टुकड़े आठ किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से पृथ्वी की कक्षा में चक्कर लगा रहे हैं। आपस में टक्कर होने से ये और भी छोटे टुकड़ों में बंट रहे हैं जिससे इनकी संख्या में दिनों-दिन बढ़ोतरी हो रही है।

ब्रिटिश खगोल विज्ञानी रिचर्ड क्राउटडर के अनुसार इस सम्बंध में सबसे बड़ी समस्या यह है कि पृथ्वी से लगभग 36 हज़ार किलोमीटर ऊपर की भू-स्थैतिक कक्षा में अंतरिक्ष कचरे के जमघट और आपसी टक्कर के परिणामस्वरूप दुनिया की संचार व्यवस्था भी चौपट हो सकती है। इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अंतरिक्ष में आठ किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से चक्कर काट रहे सिक्के के आकार की किसी वस्तु से किसी दूसरे सिक्के के आकार वाली वस्तु की टकराहट होती है तो उससे वैसा ही प्रभाव होगा जैसा धरती पर लगभग सौ किलोमीटर की रफ्तार से चल रही दो बसों की टक्कर से होता है। अंतरिक्ष में तैरते कचरे से टकराने पर अंतरिक्ष यान और सक्रिय उपग्रह नष्ट हो सकते हैं। इसके साथ ही, धरती पर इंटरनेट, जीपीएस, टेलीविज़न प्रसारण जैसी अनेक आवश्यक सेवाएं भी बाधित हो सकती हैं।

अंतरिक्ष में मानवीय दखल का इतिहास कोई बहुत पुराना नहीं है। महज छह दशक पहले ही पहली बार इंसान ने अंतरिक्ष में अपनी उपस्थिति दर्ज थी। उल्लेखनीय है कि अक्टूबर 1957 में तत्कालीन सोवियत संघ द्वारा अंतरिक्ष में भेजे गए पहले मानव निर्मित सेटेलाइट स्पुतनिक-1 के बाद से हज़ारों रॉकेट, सेटेलाइट, स्पेस प्रोब और टेलीस्कोप अंतरिक्ष में भेजे गए हैं। लिहाज़ा समय के साथ अंतरिक्ष में कचरा बढने की रफ्तार भी बढ़ती गई। यह कुछ-कुछ वैसा ही है, जैसे पृथ्वी के कई पहाड़ों पर अत्यधिक पर्वतारोहण की वजह से तरह-तरह के कूड़े-करकट के अंबार लगे हैं। अंतरिक्ष में पृथ्वी की कक्षा में कबाड़ की एक चादर फैल गई है। एक अनुमान के अनुसार पिछले 25 वर्षों में अंतरिक्ष में कचरे की मात्रा दुगनी से भी ज़्यादा हो गई है।

अंतरिक्ष का कचरा मानव जाति और इस पृथ्वी के समस्त जीव जगत के लिए घातक है। अगर ये अनियंत्रित लाखों डिग्री सेल्सियस ताप पर दहकते टुकड़े घनी बस्तियों पर गिरते हैं तो जानमाल की बड़ी हानि हो सकती है। वर्ष 2001 में कोलंबिया स्पेस शटल की दुर्घटना में भारतीय मूल की कल्पना चावला समेत सात अन्य अंतरिक्ष यात्रियों की जानें चली गई थीं। इस दुर्घटना के अलग-अलग कारण बताए जाते हैं, लेकिन कुछ रिपोर्टों में यह आशंका जताई गई थी कि अंतरिक्ष में भटकते एक टुकड़े से टकराने की वजह से यह भीषण त्रासदी हुई थी।

जिस तरह से सभी देश अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों को अंजाम दे रहे हैं, उसके चलते तो अंतरिक्ष में भीड़ और भी बढ़ेगी और इससे दुर्घटनाओं की आशंका भी बढ़ेगी। तो फिर इस समस्या का समाधान क्या है? इसके जवाब में वैज्ञानिक कहते हैं कि अंतरिक्ष से कचरे को एकत्रित करके वापस धरती पर लाना ही इस समस्या का एकमात्र समाधान है। दूसरे शब्दों में, अंतरिक्ष में भी धरती की ही तरह स्वच्छता अभियान चलाने की आवश्यकता है। परंतु यह काम इतना आसान भी नहीं है। ऐसे में सभी देश यदि चाहें तो कम से कम इतना तो अवश्य किया जा सकता है कि जो भी देश अंतरिक्ष में जितना कचरा पैदा कर रहा है, वह उसे वापस लाने का खर्च वहन करे। इससे अंतरिक्ष में पैदा होने वाले कचरे पर लगाम लगाई जा सकती है हालांकि इस काम की तकनीकी समस्याएं फिर भी रहेंगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चांद की बर्फ प्राचीन चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा संरक्षित है

चंद्रमा के ध्रुवों पर उपस्थित बर्फ वैज्ञानिकों के लिए कौतूहल का विषय होने के साथ आगामी मानव अभियानों के लिए एक संभावित संसाधन भी है। हाल ही में चंद्रमा जैसे शुष्क स्थान पर लंबे समय से बर्फ के उपस्थित होने का कारण का पता लगाया गया है। शोधकर्ताओं के अनुसार कुछ ध्रुवीय क्रेटर प्राचीन चुम्बकीय क्षेत्र के कारण संरक्षित हैं।       

गौरतलब है कि चंद्रमा का अपने अक्ष पर झुकाव पृथ्वी के 23.4 डिग्री की तुलना में मात्र 1.5 डिग्री है। कम झुकाव के कारण सूर्य आसमान में बहुत ऊपर नहीं उठता और सूर्य की किरणें इन क्रेटर्स के अंदर पहुंच नहीं पातीं। यहां तापमान शून्य से 250 डिग्री सेल्सियस से भी कम रहता है। यहां कुछ गड्ढों में पानी और बर्फ के साक्ष्य मिले हैं। 2018 में भारत के चंद्रयान-1 ने भी ध्रुवीय बर्फ के साक्ष्य प्रदान किए थे।     

चंद्रमा पर बर्फ के अस्तित्व की व्याख्या एक चुनौती रही है। हालांकि वहां सूर्य की रोशनी तो नहीं पहुंच सकती लेकिन सौर हवाएं तो पहुंच सकती हैं जो बर्फ को अणु-अणु-दर नष्ट कर सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इन सौर हवाओं के चलते बर्फ को कुछ लाख वर्षों में पूरी तरह नष्ट हो जाना चाहिए था।

लिहाज़ा, युनिवर्सिटी ऑफ एरिज़ोना के ग्रह वैज्ञानिक लोन हुड और उनके सहयोगियों ने बर्फ के बचे रहने का कारण समझने का प्रयास किया। ल्यूनर एंड प्लेनेटरी साइंस कांफ्रेंस में हुड ने बताया कि चंद्रमा के सुदूर अतीत की चुम्बकीय विसंगतियां कई ध्रुवीय क्रेटर की रक्षा कर रही हैं। ये विसंगतियां सौर हवा को विक्षेपित करने की क्षमता रखती हैं और सूर्य की किरणों से ओझल क्रेटर्स में बर्फ को सुरक्षित रखने में भूमिका निभाती हैं।     

गौरतलब है 1971 और 1972 के अपोलो 15 और 16 मिशनों के बाद से ही असामान्य चुम्बकीय शक्ति वाले क्षेत्रों को मापा गया था। हालांकि, स्पष्ट रूप से तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन संभावना है कि इनकी उत्पत्ति 4 अरब वर्ष पूर्व हुई होगी जब चंद्रमा पर चुम्बकीय क्षेत्र उपस्थित था और लौह से भरपूर क्षुद्रग्रह इसकी सतह से टकराए होंगे। इन टक्करों के नतीजे में पिघला हुआ पदार्थ स्थायी रूप से चुम्बकित हो गया होगा।

हुड ने 2007 से 2009 के बीच चंद्रमा की परिक्रमा करने वाले एक जापानी अंतरिक्ष यान कागुया के डैटा का उपयोग करके दक्षिण ध्रुव का विस्तार से अध्ययन किया। उन्हें स्थायी रूप से ओझल कम से कम दो क्रेटर मिले जो इन विसंगतियों से प्रभावित थे। हालांकि चुम्बकीय क्षेत्र अत्यंत कमज़ोर है लेकिन सौर हवाओं को विक्षेपित करने के लिए पर्याप्त हो सकता है।

निकट भविष्य में चंद्रमा पर कई अभियान पहुंचने की अपेक्षा है। नासा मनुष्यों को भी भेजने की योजना बना रहा है। चंद्रमा की बर्फ के अध्ययन से पता चलेगा कि चांद पर पानी कैसे पहुंचा था और पृथ्वी पर पानी की उपस्थिति की गुत्थी भी सुलझ सकती है।    

चुम्बकीय क्षेत्र के सुरक्षात्मक प्रभाव की पुष्टि करने के लिए और डैटा ज़रूरी है। इसके लिए हुड चंद्रमा की सतह पर सौर पवन उपकरण लगाना चाहते हैं ताकि क्रेटर के किनारों से गुज़रने वाले आवेशित कणों का मापन किया जा सके। (स्रोत फीचर्स) 

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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