बीमारी के इलाज में वायरसों का उपयोग

वैसे तो बैक्टीरिया जनित रोगों के इलाज में वायरसों के उपयोग का विचार कई दशकों पहले उभरा था और कुछ चिकित्सकों ने इस पर हाथ भी आज़माए थे किंतु एंटीबायोटिक दवाइयों की आसान उपलब्धता के चलते यह विचार उपेक्षित ही रहा। यह आम जानकारी है कि वायरस स्वयं कई बीमारियां पैदा करते हैं। तो यह सवाल अस्वाभाविक नहीं है कि फिर इनका उपयोग बैक्टीरिया से लड़ने में कैसे होगा।

बरसों पहले यह पता चल चुका था कि कई वायरस बैक्टीरिया को संक्रमित करके उन्हें मार डालते हैं। ऐसे वायरसों को बैक्टीरिया-भक्षी वायरस या बैक्टीरियोफेज कहते हैं। इसके आधार पर यह सोचा गया था कि यदि आपके पास सही बैक्टीरिया-भक्षी है तो आप बैक्टीरिया संक्रमण से निपट सकते हैं। प्रत्येक बैक्टीरिया के लिए विशिष्ट भक्षी होता है। अत: सबसे पहले तो आपको भक्षी की खोज करना होती है। ये प्रकृति में हर जगह पाए जाते हैं किंतु सही भक्षी की खोज करना आसान नहीं होता। इसके बाद समस्या यह आती थी कि एक भक्षी सारे मरीज़ों के लिए कारगर नहीं होता था। और सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि एक बार एकत्रित करने के बाद इन वायरसों को सहेजना पड़ता था। इन सब मामलों में एंटीबायोटिक कहीं ज़्यादा सुविधानक थे। इसलिए वायरस उपचार की बात चली नहीं।

मगर आज बड़े पैमाने पर बैक्टीरिया एंटीबायोटिक दवाइयों के प्रतिरोधी हो चले हैं। दुनिया भर में यह चिंता व्याप्त है कि एंटीबायोटिक के खिलाफ बढ़ते प्रतिरोध के चलते कहीं हम उस युग में न लौट जाएं जब एंटीबायोटिक थे ही नहीं। यदि वैसा हुआ तो आधुनिक चिकित्सा तथा शल्य चिकित्सा खतरे में पड़ जाएगी। इस माहौल में एक बार फिर वायरस चिकित्सा की चर्चा शुरू हुई है।

हाल ही में कुछ अस्पतालों में वायरस-उपचार के सफल उपयोग के समाचार मिले हैं। टेक्नॉलॉजी के स्तर पर भी हम काफी आगे बढ़े हैं। भक्षी वायरसों को पहचानना, एकत्रित करना और सहेजना अब ज़्यादा आसान हो गया है। अत: वायरस-उपचार अनुसंधान में तेज़ी आई है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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दृष्टिबाधितों की सेवा में विज्ञान – नवनीत कुमार गुप्ता

दृष्टिबाधितों को जीवन में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। दुनिया के लगभग चार करोड़ नेत्रहीनों में से डेढ़ करोड़ भारत में रहते हैं। दृष्टिहीन होने का तात्पर्य सामान्यतया देख सकने में पूरी तरह असमर्थता है। हालांकि दृष्टिहीनता में देख सकने की क्षमता के विभिन्न स्तर और कभी-कभी भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में शामिल होते हैं।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में ऐसे कार्य हो रहे हैं जो दृष्टिबाधितों के जीवन के लिए सहायक साबित हो रहे हैं। यहां दो ऐसी ही प्रौद्योगिकियों की चर्चा की जा रही है।

डॉटबुक

आधुनिक समय में दृष्टिबाधितों के समक्ष एक बड़ी चुनौती कंप्यूटर या लैपटॉप तथा उनके ज़रिए इंटरनेट जैसी सुविधाओं का इस्तेमाल करना है। दृष्टिबाधितों को ये सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए आई.आई.टी., दिल्ली ने कुछ अन्य संस्थाओं की मदद से भारत का पहला ब्रोल लैपटॉप (डॉटबुक) आरम्भ किया है। इस उपकरण में उभरे हुए डॉट के रूप में ब्रोल लिपि है।

दृष्टिबाधितों के सशक्तिकरण के लिए उनमें स्वयं सीखने की क्षमता विकसित करना आवश्यक है, जिसमें ब्रोल लिपि काफी मददगार है। डॉटबुक पढ़ने, लिखने, सुनने, ब्रााउज़ करने तथा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त आंकड़ों का संपादन करने में सक्षम है। इसे लैपटॉप, कंप्यूटर, वेब, मोबाइल के तार, वाईफाई तथा ब्लूटूथ के साथ भी जोड़ा जा सकता है। डॉटबुक स्कूलों, कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों में लोगों को आवश्यक सामग्रियां उपलब्ध कराएगा। डॉटबुक  के द्वारा स्कूली छात्रों को डिजिटल रूप में नोट्स उपलब्ध होंगे। ब्रोल लिपि के ऑनलाइन रुाोेतों के द्वारा पुस्तकें भी डाउनलोड की जा सकती हैं।

टीम ने देश भर के 10 से अधिक स्थलों पर विभिन्न संगठनों के 200 उपयोगकर्ताओं के साथ इसका अध्ययन किया है। इसने ऐसे लोगों के लिए दुनिया के साथ आसान संचार का रास्ता खोल दिया है, जो ब्रोल लिपि में लिख-पढ़ सकते हैं।

दिव्य नयन

चंडीगढ़ स्थित सीएसआईआर के केंद्रीय वैज्ञानिक उपकरण संगठन द्वारा दिव्य नयन नामक एक उपकरण विकसित किया गया है जिसकी मदद से दृष्टिहीन व्यक्ति भी पढ़ सकेंगे। दिव्य नयन यानी हैंड-हेल्ड स्टेप स्कैनिंग डिवाइस (एचएचएसएस)। यह ‘बोलने वाली आंखों’ की तरह काम करता है।

एचएचएसएस एक हस्तधारित उपकरण है जिसमें कोई भी गतिशील पुर्जा नहीं है, जिससे यह काफी हल्का होता है और उपयोग के लिए आसान हो जाता है। यह किसी पुस्तक के आकार का एक फील्ड व्यू प्रदान करता है।

यह उपकरण स्टैंड अलोन, पोर्टेबल और पूरी तरह से तार रहित है और आईओटी सक्षम है। वर्तमान में यह हिंदी और अंग्रेज़ी में उपलब्ध है, लेकिन अन्य भारतीय और विदेशी भाषाओं के लिए भी अनुकूल है। इस उपकरण में 32 जीबी का इंटरनल स्टोरेज है, यह वायरलेस कम्युनिकेशन फीचर से सुसज्जित है। विभिन्न संस्थानों और गैर सरकारी संगठनों में दिव्य नयन का सफल परीक्षण आयोजित किया गया है। (स्रोत फीचर्स)

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खेती के बाद शामिल हुए नए अक्षर

बातचीत में हम ‘फ’ और ‘व’ अक्षरों का आसानी से उच्चारण कर लेते हैं। लेकिन एक समय था जब इन अक्षरों का उच्चारण करना इतना आसान न था, बल्कि ये अक्षर तो भाषा में शामिल भी नहीं थे। हाल ही में नेचर इंडिया में प्रकाशित एक अध्ययन कहता है कि मानवों में ‘फ’ और ‘व’ बोलने की क्षमता, खेती के फैलने और मानवों द्वारा पका हुआ भोजन खाने की संस्कृति की बदौलत विकसित हुई है।

1985 में अमेरिकी भाषा विज्ञानी चार्ल्स हॉकेट ने इस ओर ध्यान दिलाया था कि हज़ारों वर्ष पहले शिकारियों की भाषा में दंतोष्ठ्य ध्वनियां शामिल नहीं थीं। उनका अनुमान था कि इन अक्षरों की कमी के लिए आंशिक रूप से उनका आहार ज़िम्मेदार था। उनके अनुसार खुरदरा और रेशेदार भोजन चबाने से जबड़ों पर ज़ोर पड़ता है जिसके कारण दाढ़ें घिस जाती हैं। इसके फलस्वरूप निचला जबड़ा बड़ा हो जाता है। इस तरह धीरे-धीरे ऊपरी और निचला जबड़ा और दांत एक सीध में आ जाते हैं। दांतों की इस तरह की जमावट के कारण ऊपरी जबड़ा नीचे वाले होंठ को छू नहीं पाता। दंतोष्ठ्य ध्वनियों के उच्चारण के लिए ऐसा होना ज़रूरी है।

डैमियल ब्लैसी और स्टीवन मोरान और उनके साथियों ने अपने अध्ययन में चार्ल्स हॉकेट के इस विचार को जांचा। अध्ययन के अनुसार मानव द्वारा मुलायम (पका हुआ) भोजन खाने से जबड़ों पर कम दबाव पड़ा। कम दबाव पड़ने के कारण उनका ऊपरी जबड़ा निचले जबड़े की सीध में न होकर निचले जबड़े को थोड़ा ढंकने लगा। जिसके कारण इन ध्वनियों को बोलने में आसानी होने लगी और भाषा में नए शब्द जुड़े।

अध्ययनकर्ताओं ने हॉकेट के विचार को जांचने के लिए कंप्यूटर मॉडलिंग की मदद ली। इसकी मदद से उन्होंने यह दिखाया कि ऊपरी और निचले दांतों के ठीक एक के ऊपर एक होने की तुलना में जब ऊपरी और निचले दांत ओवरलैप (ऊपरी जबड़ा निचले जबड़े को ढंक लेता है) होते हैं तो दंतोष्ठ्य (फ और व) ध्वनि के उच्चारण में 29 प्रतिशत कम ज़ोर लगता है। इसके बाद उन्होंने दुनिया की कई भाषाओं की जांच की। उन्होंने पाया कि कृषि आधारित सभ्यताओं की भाषा की तुलना में शिकारियों के भाषा कोश में सिर्फ एक चौथाई दंतोष्ठ्य अक्षर थे। इसके बाद उन्होंने भाषाओं के बीच के सम्बंध को देखा और पाया कि दंतोष्ठ्य ध्वनियां तेज़ी से फैलती हैं। इसी कारण ये अक्षर अधिकांश भाषाओं में मिल जाते हैं।

इस अध्ययन के नतीजे इस बात की ओर भी इशारा करते हैं कि जीवन शैली में बदलाव हमें कई तरह से प्रभावित कर सकते हैं, ये हमारी भाषा को भी प्रभावित कर सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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विज्ञान कांग्रेस: भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी का वक्तव्य

जालंधर में आयोजित विज्ञान कांग्रेस में कई वक्ताओं ने दावे किए कि सारा आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान प्राचीन भारत में पहले से ही उपलब्ध था। प्रस्तुत है भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी द्वारा ऐसे अपुष्ट, मनगढ़ंत दावों पर सवाल उठाता और वैज्ञानिक दष्टिकोण की मांग करता वक्तव्य।

हाल ही में जालंधर में आयोजित विज्ञान कांग्रेस के दौरान आंध्र प्रदेश विश्वविद्यालय के कुलपति और कई अन्य लोगों द्वारा इन-विट्रो निषेचन (परखनली शिशु), स्टेम कोशिकाओं के ज्ञान और सापेक्षता एवं गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत पर टिप्पणियों ने वैज्ञानिक समुदाय को चौंका दिया है।

भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (INSA), जो लगभग 1000 प्रख्यात वैज्ञानिकों और प्रौद्योगिकीविदों का एक निकाय है, स्पष्ट रूप से इस तरह के किसी भी दावे को अस्वीकार और रद्द करती है। यह बयान वैज्ञानिक प्रमाण और सत्यापन योग्य डैटा की तार्किक व्याख्या पर आधारित नहीं हैं। आईएनएसए कई अन्य ऐसे दावों को भी रद्द करता है जो मज़बूत प्रमाणों और तर्कों से रहित हैं, तथा बिना किसी वैज्ञानिक अनुसंधान के किए गए हैं। विज्ञान तथ्यों पर भरोसा करता है और उसी के आधार पर उन्नति करता है। आईएनएसए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए सत्यापन योग्य सबूतों के तार्किक तरीके से उपयोग की वकालत करता है। हाल ही में जारी किए गए वक्तव्य किसी भी वैज्ञानिक गहनता से दूर हैं और उन्हें सख्ती के साथ त्यागने और नज़रअंदाज़ करने की आवश्यकता है। काव्यात्मक कल्पनाओं को सुदूर अतीत की वैज्ञानिक प्रगति का द्योतक मानना निश्चित रूप से अस्वीकार्य है।

एक वैज्ञानिक निकाय के रूप में, आईएनएसए को भारत की वास्तुकला, खगोल विज्ञान, आयुर्वेद, रसायन विज्ञान, गणित, धातुकर्म और इसी तरह के अन्य क्षेत्रों में विज्ञान व प्रौद्योगिकी उपलब्धियों की समृद्ध परंपरा पर गर्व है। आईएनएसए विज्ञान के इतिहास में अनुसंधान को प्रोत्साहित करता है और इस विषय में गंभीर शोध परियोजनाओं का समर्थन भी करता है। यहां तक कि इस विषय की एक लोकप्रिय शोध पत्रिका भी प्रकाशित करता है। अच्छी तरह से शोध की गई कई किताबें भी इन उपलब्धियों पर प्रकाशित हुई हैं। ये किताबें सभी के लिए मुक्त रूप से उपलब्ध हैं।

आईएनएसए ने इस तरह के किसी भी अपुष्ट विचार का समर्थन न तो किया है, न आज करता है और न ही आगे कभी करेगा चाहे वे भारतीय विज्ञान कांग्रेस जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर प्रस्तुत हों या किसी भी स्तर की प्रशासनिक प्रतिष्ठा रखने वाले व्यक्तियों द्वारा प्रस्तावित किए जाएं। मीडिया में तात्कालिक प्रचार के प्रलोभन के बावजूद, कल्पना और तथ्यों को अलग-अलग रखना ज़रूरी है।

आईएनएसए, सभी स्तरों पर सावधानी बरतने का आग्रह करता है और यह सुझाव देता है कि सार्वजनिक रूप से इस तरह के बयान देने से पहले जांच की वैज्ञानिक प्रक्रिया सुनिश्चित की जानी चाहिए। इस तरह का परिश्रम जनता और छात्र समुदाय की सेवा होगी और इससे वैज्ञानिक स्वभाव को बढ़ावा और विकास प्रक्रिया को गति मिलेगी।

अपनी बात को दोहराते हुए, प्राचीन साहित्य को तथ्यों/प्रमाणों के तौर पर प्रस्तुत करने को अकादमी अनैतिक मानती है क्योंकि इन्हें किसी वैज्ञानिक विश्लेषण के अधीन नहीं किया जा सकता है। ऐसी प्रथाएं स्पष्ट रूप से अवांछनीय हैं। साहित्य के साथ-साथ विज्ञान में भी कल्पना का महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन इसके साथ भ्रम पैदा करना बिलकुल अवैज्ञानिक है। (स्रोत फीचर्स)

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जुड़वां बच्चों के संसार में एक विचित्रता – सुशील जोशी

म तौर पर माना जाता है कि जुड़वां बच्चे हूबहू एक समान होते हैं। जुड़वां बच्चों की थीम पर बनी हिंदी फिल्मों ने इस धारणा को काफी बल दिया है। लेकिन तथ्य यह है कि दुनिया भर में जितने जुड़वां बच्चे पैदा होते हैं उनमें से मात्र लगभग 10 प्रतिशत ही ऐसे ‘फिल्मी’ जुड़वां होते हैं। आम तौर पर जुड़वां बच्चे दो प्रकार के होते हैं – समान और असमान। इन दोनों के निर्माण के तरीके में अंतर है। तकनीकी भाषा में इन्हें एकयुग्मज (समान) और द्वियुग्मज (असमान) जुड़वां कहते हैं। हाल ही में एक रिपोर्ट आई है कि ऐसे जुड़वां बच्चों का जन्म हुआ है जो न तो पूरी तरह समान हैं न पूरी तरह असमान; ये आंशिक रूप से समान हैं। इस बात को समझने के लिए पहले जुड़वां बच्चों की बात को समझना आवश्यक है।

द्वियुग्मज जुड़वां बच्चे दो अलग-अलग अंडाणुओं के दो अलग-अलग शुक्राणुओं के साथ मेल के द्वारा विकसित होते हैं। स्त्री शरीर में सामान्य व्यवस्था यह है कि प्रति माह दो में से किसी एक अंडाशय में से अंडाणु मुक्त होता है। इस अंडाणु के किसी शुक्राणु से मिलन (निषेचन) के फलस्वरूप युग्मज यानी ज़ायगोट बनता है। यही ज़ायगोट विकसित होकर भ्रूण तथा शिशु का रूप लेता है। कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि एक ही समय पर दोनों अंडाशयों में से एक-एक अंडाणु मुक्त हो जाता है। यदि इन दोनों का निषेचन हो जाए तो दो ज़ायगोट बन जाते हैं। दोनों ज़ायगोट बच्चादानी में जुड़ सकते हैं और आगे विकास जारी रख सकते हैं। चूंकि ये दोनों अलग-अलग अंडाणुओं और अलग-अलग शुक्राणुओं के निषेचन से बने हैं इसलिए इनमें उतनी ही समानता होती है जितनी किन्हीं भी दो भाई-बहनों के बीच होती है। अंतर सिर्फ यह होता है कि ये दोनों एक साथ एक ही समय पर गर्भाशय में पलते हैं। इनमें दोनों लड़के, दोनों लड़कियां या एक लड़का और एक लड़की भी हो सकते हैं।

दूसरी ओर, एकयुग्मज जुड़वां (यानी समान जुड़वां) एक ही अंडाणु के एक ही शुक्राणु द्वारा निषेचन से पैदा होते हैं। इनमें जो ज़ायगोट बनता है वह निषेचन के बाद दो भागों में बंट जाता है और दोनों से शिशुओं का विकास होता है। इनमें आनुवंशिक सामग्री एक ही होती है और इसलिए ये हूबहू एक जैसे होते हैं। एकयुग्मज जुड़वां या तो दोनों लड़के होते हैं या दोनों लड़कियां।

जिन कोशिकाओं से शुक्राणु और अंडाणु बनते हैं उनमें प्रत्येक गुणसूत्र की दो-दो प्रतियां पाई जाती हैं। शुक्राणु/अंडाणु बनते समय इनमें से एक ही प्रति उनमें जाती है। इस प्रकार से शुक्राणु/अंडाणु में प्रत्येक गुणसूत्र की एक प्रति होती है। निषेचन के समय हरेक गुणसूत्र की एक प्रति शुक्राणु से और एक प्रति अंडाणु से आती है। इस प्रकार से बच्चे अपने माता या पिता से 50-50 प्रतिशत आनुवंशिक सामग्री प्राप्त करते हैं।

लेकिन यह बात आम तौर पर ज्ञात नहीं है कि इनके अलावा एक तीसरे किस्म के जुड़वां बच्चे भी होते हैं जिन्हें अर्ध-समान जुड़वां या सेमी-आइडेंटिकल ट्विन्स कहते हैं। ये बहुत बिरले होते हैं और यह भी पता नहीं है कि दुनिया में ऐसे आंशिक-समान जुड़वां कितने हैं – रिकॉर्ड में तो मात्र 1 था। हाल ही में दी न्यू इंग्लैण्ड जर्नल ऑफ मेडिसिन में ऐसे ही अर्ध-समान जुड़वां के जन्म की रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। इनका जन्म जनवरी 2014 में ऑस्ट्रेलिया में हुआ था। रिपोर्ट में बताया गया है कि इनमें मां से मिलने वाले तो सारे जीन्स एक जैसे हैं मगर पिता से आए तीन-चौथाई जीन्स ही एक-दूसरे से मेल खाते हैं।

उक्त शोधपत्र के प्रमुख लेखक इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एंड बायोमेडिकल इनोवेशन के माइकेल गैबेट ने बताया है कि ऐसे अर्ध-समान जुड़वां पहली बार 2007 में यूएस में जन्म के बाद पहचाने गए थे। इस बार जो जुड़वां पहचाने गए हैं उन्हें सबसे पहले गर्भ में ही सोनोग्राफी की मदद से पहचाना गया था। पहली सोनोग्राफी में पता चला था कि वे समान जुड़वां हैं। मगर कुछ समय बाद यह देखकर डॉक्टरों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा कि ये दो बच्चे एक लड़का और एक लड़की थे। समान जुड़वां या तो दोनों लड़के होते हैं या दोनों लड़की।

इसके बाद डॉक्टरों ने उनके गर्भजल की जांच की। दोनों बच्चे अलग-अलग गर्भजल थैलियों में बढ़ रहे थे। इस जांच में पता चला कि इन जुड़वां में मां के 100 प्रतिशत जीन्स एक समान थे किंतु पिता के मात्र 78 प्रतिशत जीन्स ही समान थे।

तो ये अर्ध-समान जुड़वां कैसे बने? गैबेट ने इसे समझाने के लिए एक परिकल्पना प्रस्तुत की है। उनके मुताबिक संभवत: हुआ यह है कि एक अंडाणु को दो शुक्राणुओं ने निषेचित किया। प्रत्येक शुक्राणु में गुणसूत्र का अपना-अपना सेट होता है। यानी अंडाणु के गुणसूत्र दो शुक्राणुओं के गुणसूत्रों से मिल गए। एक बार निषेचन हो जाने के बाद अंडाणु अभेद्य हो जाता है – एक शुक्राणु के अंडाणु में प्रवेश के बाद दूसरे शुक्राणु अंदर नहीं पहुंच सकते। यानी संयोगवश ये दो शुक्राणु एक ही समय पर अंडाणु से टकराए होंगे और दोनों को प्रवेश मिल गया होगा। तो अंदर गुणसूत्रों के तीन सेट हो गए होंगे। ये तीन कोशिकाओं में बंटे होंगे – एक में अंडाणु और प्रथम शुक्राणु के गुणसूत्र, दूसरी में अंडाणु और दूसरे शुक्राणु के गुणसूत्र तथा तीसरी में दोनों शुक्राणुओं के गुणसूत्र। संतान के विकास के लिए माता-पिता दोनों के गुणसूत्र होना ज़रूरी है। लिहाज़ा तीसरी कोशिका की मृत्यु हो गई होगी। शेष दो कोशिकाएं आपस में मिल गई होंगी और फिर दो में विभाजित होकर दो शिशु विकसित हुए होंगे।

एक परिकल्पना यह भी प्रस्तुत की गई है कि पहले कोई अनिषेचित अंडाणु दो में बंट जाता है और ये दोनों भाग आपस में जुड़े रह जाते हैं। इन दोनों का ही निषेचन हो सकता है। इन दोनों अंडाणुओं का निषेचन अलग-अलग शुक्राणुओं से हो जाता है और निषेचन के बाद ये आपस में मिल जाते हैं। कुछ समय विकास के बाद यह मिला-जुला अंडा फिर से दो में विभाजित होकर दो शिशुओं को जन्म देता है। इस तरह से इन दोनों में मां के तो सारे गुणसूत्र एक जैसे होंगे मगर पिता के दो शुक्राणुओं से प्राप्त मिले-जुले गुणसूत्र होंगे।

इन जुड़वां में कुछ और भी विचित्रताएं हैं। जैसे दोनों में नर व मादा दोनों लिगों के गुणसूत्र हैं। मनुष्य में कुल 23 जोड़ी गुणसूत्र होते हैं। इनमें से 22 जोड़ियों में तो दोनों गुणसूत्र एक-दूसरे के पूरक होते हैं मगर 23वीं जोड़ी के गुणसूत्र भिन्न-भिन्न होते हैं। इन्हें एक्स और वाय गुणसूत्र कहते हैं। 23वीं जोड़ी के दोनों गुणसूत्र एक्स हों तो लड़की बनती है और यदि 23वीं जोड़ी में एक एक्स तथा दूसरा वाय गुणसूत्र हो तो लड़का बनता है। ऑस्ट्रेलियाई जुड़वां में दोनों की कुछ कोशिकाओं में एक्स-एक्स जोड़ी है जबकि कुछ कोशिकाओं में एक्स-वाय जोड़ी है। विभिन्न कोशिकाओं में इस तरह से नर व मादा गुणसूत्र जोड़ियों का पाया जाना कई समस्याओं को जन्म देता है। जब डॉक्टरों ने जुड़वां में से लड़की के अंडाशय की जांच की तो पाया कि उसमें कुछ ऐसे परिवर्तन हुए हैं जो कैंसर को जन्म दे सकते हैं। ऐहतियात के तौर पर उसके अंडाशय हटा दिए हैं। अच्छी खबर यह है कि ये दो जुड़वां बच्चे अब साढ़े चार साल के हो चुके हैं और सामान्य ढंग से विकसित हो रहे हैं। (स्रोत फीचर्स)

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जीसस का तथाकथित कफन फर्जी है

पिछली सदियों में कई बार कई लोगों ने दावा किया है कि उन्हें जीसस क्राइस्ट का कफन मिला है। इनमें से सबसे मशहूर ट्यूरिन का कफन है जो 1578 से इटली के ट्यूरिन शहर में सेंट जॉन दी बैप्टिस्ट के कैथेड्रल में रखा है। हाल ही में वैज्ञानिकों ने इसका फॉरेंसिक अध्ययन करके बताया है कि यह कफन फर्जी है।

ट्यूरिन का कफन 13वीं सदी में प्रकट हुआ था। यह 14 फुट लंबा एक कपड़ा है जिस पर सूली पर चढ़े एक व्यक्ति की छवि नज़र आती है। वैसे तो वैज्ञानिक कई बार यह जता चुके हैं कि यह कफन वास्तविक नहीं है। वैज्ञानिक यह भी स्पष्ट कर चुके हैं कि यह ‘कफन’ चौदहवीं सदी में निर्मित किया गया था। एक बार फिर प्रयोगों के ज़रिए इस कफन को प्रामाणिक साबित करने की कोशिश की गई है।

यह प्रयोग ट्यूरिन श्राउड सेंटर ऑफ कोलेरेडो के वैज्ञानिकों ने किया है। उन्होंने कुछ वालंटियर्स को सूली पर बांधा और उन्हें रक्त से तरबतर कर दिया। यह एक मायने में मूल घटना को पुनर्निर्मित करने का प्रयास था। शोधकर्ताओं ने अपने प्रयोग के सारांश में बताया है कि उन्होंने कफन पर उभरी तस्वीर की मदद से यह पता लगाया कि सूली पर चढ़ाने की क्रिया को किस तरह अंजाम दिया गया होगा। वालंटियर्स का चुनाव भी तस्वीर में नज़र आने वाले व्यक्ति के डील-डौल के हिसाब से किया गया था। पूरे प्रयोग में पेशेवर चिकित्साकर्मी भी शामिल थे ताकि वालंटियर्स की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और आंकड़ों के विश्लेषण में मदद मिले।

इस अध्ययन ने पूर्व में किए गए एक अध्ययन के निष्कर्षों को चुनौती दी है। जर्नल ऑफ फॉरेंसिक साइंसेज़ में 2018 में प्रकाशित उस शोध पत्र के लेखकों ने माना था कि व्यक्ति को सूली पर चढ़ाते समय उसके हाथों को सिर के ऊपर क्रॉस करके रखा जाता था। इसे इतिहासकारों ने गलत बताया था। उस अध्ययन को करने वाले वैज्ञानिक मौटियो बोरिनी का कहना है कि नया अध्ययन चर्चा के योग्य है क्योंकि कम से कम हम भौतिक चीज़ों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। वैसे बोरिनी के मुताबिक ऐतिहासिक दस्तावेज़ और कार्बन डेटिंग से स्पष्ट हो चुका है कि यह कफन मध्य युग में कभी तैयार किया गया था।

कोलेरेडो सेंटर का अध्ययन जॉन जैकसन के नेतृत्व में किया गया है। जैकसन एक भौतिक शास्त्री हैं और 1978 में कफन से जुड़े एक वैज्ञानिक सर्वेक्षण में शामिल थे। 1981 में प्रकाशित अध्ययन की रिपोर्ट में कहा गया था कि कफन पर दढ़ियल व्यक्ति की तस्वीर एक वास्तविक व्यक्ति की है जिसे सूली पर चढ़ाया गया था। जैकसन का यहां तक कहना था कि कफन पर जो निशान हैं वे ऐसे व्यक्ति द्वारा छोड़े गए हैं जो गायब हो गया था और जिसके शरीर से शक्तिशाली विकिरण निकलता था।

लेकिन लगता है कि कफन की प्रामाणिकता का मामला ले-देकर आस्था पर टिका है। लेकिन अन्य वैज्ञानिक सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि आस्था अलग चीज़ हैं और प्रामाणिकता अलग बात है। (स्रोत फीचर्स)

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क्या कोई जीव नींद के बिना जीवित रह सकता है?

म अगर एक रात भी ठीक से नींद न ले सकें तो अगले दिन काम करने में काफी संघर्ष करना पड़ता है। लंबे समय तक ठीक से नींद न आए तो ह्मदय रोग और स्ट्रोक से लेकर वज़न बढ़ने और मधुमेह जैसे नकारात्मक प्रभाव दिखने लगते हैं। जानवर भी ऊंघते हैं। इससे तो लगता है कि सभी जानवरों के लिए नींद का कुछ महत्व है।

सवाल यह है कि नींद की भूमिका क्या है? क्या नींद मस्तिष्क को क्षति की मरम्मत और सूचना को सहेजने का अवसर देती है? क्या यह शरीर में ऊर्जा विनियमन के लिए आवश्यक है? वैज्ञानिकों ने नींद की कई व्याख्याएं की हैं लेकिन एक सटीक उत्तर का इंतज़ार आज भी है।

1890 के दशक में रूस की एक चिकित्सक मैरी डी मेनासीना नींद की एक गुत्थी से परेशान थीं। उनका ख्याल था कि जब हम जीवन को भरपूर जीना चाहते हैं तो क्यों अपने जीवन का एक-तिहाई भाग सोकर गुज़ार देते हैं। इस रहस्य को जानने के लिए उन्होंने जानवरों में पहला निद्रा-वंचना प्रयोग किया। मेनासीना ने पिल्लों को लगातार जगाए रखा और यह पाया कि नींद की कमी के कारण कुछ दिनों में उन पिल्लों की मृत्यु हो गई। बाद के दशकों में, अन्य जीवों जैसे कृंतकों और तिलचट्टों पर यह प्रयोग किया गया और परिणाम ऐसे ही रहे। लेकिन इन प्रयोगों में मौत का कारण और नींद से इसका सम्बंध अभी भी अज्ञात है।

नींद का अभाव जानलेवा होता है लेकिन कुछ प्राणी बहुत कम नींद लेकर भी जीवित रह सकते हैं। साइंस एडवांसेस पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में फल मक्खियों के सोने-जागने पर नज़र रखी गई थी। इम्पीरियल कॉलेज लंदन में सिस्टम्स जीव विज्ञानी जियोर्जियो गिलेस्ट्रो के अनुसार उनके इस प्रयोग में कुछ मक्खियां शायद ही कभी सोई होंगी।

गिलेस्ट्रो और उनके सहयोगियों ने पाया कि 6 प्रतिशत मादा मक्खियां दिन में 72 मिनट से कम समय तक सोती थीं, जबकि अन्य मादाओं की औसत नींद 300 मिनट थी। एक मादा तो एक दिन में औसतन मात्र 4 मिनट सोती थी। आगे शोधकर्ताओं ने मक्खियों के सोने का समय 96 प्रतिशत कम कर दिया। लेकिन ये मक्खियां, पिल्लों की तरह असमय मृत्यु का शिकार नहीं हुर्इं। वे अन्य मक्खियों के बराबर जीवित रहीं। गिलेस्ट्रो व कई अन्य वैज्ञानिक सोचने लगे हैं कि शायद नींद उतनी ज़रूरी नहीं है, जितना पहले सोचा जाता था।

2016 के एक अध्ययन में, रैटनबोर्ग और उनके सहयोगियों ने गैलापागोस द्वीप समूह में फ्रिगेट बर्ड्स (फ्रेगेटा माइनर) के मस्तिष्क में विद्युत गतिविधि के मापन के आधार पर दिखाया था कि समुद्र पर उड़ान भरते समय पक्षियों के मस्तिष्क का एक गोलार्ध सो जाता है। और कभी-कभी एक साथ दोनों गोलार्ध भी सो जाते हैं। अध्ययन में पाया गया कि उड़ान भरने के दौरान फ्रिगेट बर्ड्स औसतन प्रति दिन केवल 42 मिनट सोए, जबकि आम तौर पर ज़मीन पर वे 12 घंटे से अधिक सोते हैं। उड़ते समय नींद अन्य पक्षी प्रजातियों के बीच भी आम बात हो सकती है। हालांकि वैज्ञानिकों के पास इसके लिए कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है लेकिन सामान्य स्विफ्ट (एपस एपस) बिना रुके 10 महीने तक उड़ सकती है।

कुल मिलाकर अभी तक तो यही लगता है कि बिलकुल भी न सोने वाला कोई जीव नहीं है। चाहे थोड़ी-सी ही सही, मगर जैव विकास के इतिहास में नींद का बने रहने दर्शाता है कि इसकी कुछ अहम भूमिका है और न्यूनतम नींद अनिवार्य है। (स्रोत फीचर्स)

 नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बेकार है छुट्टियों की लंबी नींद

फ्ते भर की व्यस्त दिनचर्या के कारण लोगों को पूरी नींद नहीं मिल पाती है। नींद की कमी से डायबिटीज़ और दिल की बीमारी जैसी कई स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होती हैं। अक्सर लोग सप्ताह के अंत में देर तक सोकर हफ्ते भर की नींद की कसर पूरी करते हैं। लेकिन क्या सेहत पर पड़े असर की भरपाई एक-दो रोज़ की भरपूर नींद लेने से हो पाती है?

करंट बायोलॉजी में प्रकाशित एक शोध के मुताबिक सिर्फ छुट्टियों में देर तक सोना या भरपूर नींद लेना, नींद की कमी के कारण सेहत पर पड़े नकारात्मक प्रभाव की भरपाई नहीं करते।

युनिवर्सिटी ऑफ कोलोरेडो बोल्डर के केनेथ राइट और उनके साथियों ने छुट्टियों में देर तक सोने वाले लोगों पर स्वास्थ्य सम्बंधी अध्ययन किया। उन्होंने यह जानने की कोशिश की कि रोज़ाना की नींद की कमी के कारण सेहत पर पड़े नकारात्मक प्रभाव की भरपाई छुट्टियों में देर तक सोने से होती है या नहीं?

इस अध्ययन में उन्होंने युवाओं के तीन समूह बनाए। प्रत्येक समूह में 14 युवा प्रतिभागी थे। पहले समूह (समूह क) के प्रतिभागियों को हर दिन सिर्फ 5 घंटे की नींद लेनी थी। दूसरे समूह (समूह ख) में प्रतिभागियों को रोज़ तो सिर्फ 5 घंटे सोना था लेकिन उन्हें यह छूट थी कि वे छुट्टी के दिन भरपूर नींद ले सकते हैं। जबकि तीसरे समूह (समूह ग) को हर रोज़ भरपूर नींद (लगभग 9 घंटे) लेने को कहा गया। यह सिलसिला 9 दिन तक चला।

उन्होंने पाया की रोज़ाना नींद की कमी वाले समूह क के प्रतिभागियों ने भरपूर नींद वाले समूह ग की तुलना में ज़्यादा खाया, उनका वज़न भी बढ़ गया और वे इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील दिखे। इसके बाद समूह ख (जो रोज़ाना कम सोए थे मगर छुट्टी के दिन भरपूर सो सकते थे) के प्रतिभागियों के स्वास्थ्य की जांच की तो शोधकर्ताओं ने पाया इस समूह के स्वास्थ्य पर पड़े असर पहले समूह जैसे ही हैं। यानी सप्ताह की नींद की भरपाई सप्ताहांत में ज़्यादा सोकर नहीं हो पाई थी। सेहतमंद रहने के लिए रोज़ाना भरपूर नींद ज़रूरी है। (स्रोत फीचर्स)

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पुरातात्विक कब्र में मिले पैर बांधने के प्रमाण

वैसे तो चीन में लड़कियों-महिलाओं के पैर बांधकर रखने की प्रथा कम से कम 1000 साल पुरानी है और इसके विवरण ऐतिहासिक दस्तावेज़ों तथा कुछ जीवित भुक्तभोगी महिलाओं के बयानों में मिलते हैं। मगर अब शोधकर्ताओं ने एक प्राचीन कब्र के कंकालों में इस प्रथा के प्रमाण देखे हैं। इन कंकालों ने प्रथा पर नई रोशनी डाली है।

मिशिगन विश्वविद्यालय की एलिज़ाबेथ बर्जर और उनके साथियों को हाल ही में चीन के शांक्सी प्रांत में यांगुआनज़ाई स्थल की खुदाई के दौरान मिले एक कब्रिस्तान में मिले कंकालों के अध्ययन के आधार पर पैर बांधने की प्रथा को ज़्यादा गहराई में देखने का अवसर मिला है। यह कब्रिस्तान मिंग राजवंश के काल (1368-1644) का है। बर्जर का कहना है कि इन कंकालों का अवलोकन करते हुए उन्हें पैरों की विचित्र रचना का आभास हुआ। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ पैलियोपैथॉलॉजी में प्रकाशित शोध पत्र में बर्जर और उनके साथियों ने बताया है कि आठ में से चार अभिजात्य महिलाओं के कंकालों पर पैर बांधने के चिंह मिले।

शोधकर्ताओं का विचार है कि पैर बांधने की प्रथा अपने शुरुआती रूप में दक्षिणी सोन्ग राजवंश (1127-1279) के समय शुरू हुई थी। शुरू-शुरू में इस प्रथा का उद्देश्य पैर को संकरा बनाना था। इसका हड्डियों पर कोई गंभीर असर नहीं होता था। पैर बांधने की ज़्यादा सख्त प्रथा मिंग राजवंश (1368-1644) के काल में शुरू हुई जिसमें पैर की मेहराब को छोटा-से-छोटा रखने का प्रयास होता था। पहले कुलीन वर्ग तक सीमित यह प्रथा धीरे-धीरे अन्य तबकों में प्रचलित हो गई।

पैरों को बांधना काफी कम उम्र में शुरू कर दिया जाता था। इसके तहत एक तंग पट्टी पैर पर बांधी जाती थी ताकि पैर एक विशेष आकार में मुड़े रहें। सत्रहवीं सदी में पैर बांधने की दो प्रथाएं प्रचलन में रहीं – दक्षिणी और उत्तरी। दक्षिणी शैली में उंगलियां सीधी रहती थीं किंतु उत्तरी शैली में अंगूठे को छोड़कर शेष सारी उंगलियों को तलवे के नीचे मोड़कर रखा जाता था। ऐसी पैर बंधी महिलाएं जीवन भर कई स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करती थीं। इतिहासकारों और अर्थशास्त्रियों ने क्विंग राजवंश के काल में कुलीन वर्ग की महिलाओं में इस प्रथा की उत्पत्ति और इसे प्रभावित करने वाले कारकों पर कई शोध पत्र लिखे हैं। मगर इस बाबत बहुत कम कहा गया है कि स्वयं महिलाएं इस बारे में क्या सोचती थीं। वह जानना तो अब संभव नहीं है किंतु बर्जर ने अपने शोध पत्र में कहा है कि पुरातत्ववेत्ता इतना तो स्पष्ट कर ही सकते हैं कि महिलाओं पर इसके शारीरिक असर क्या होते थे। (स्रोत फीचर्स)

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4000 वर्ष पूर्व भी बोर्ड गेम खेला जाता था

हाल ही में पुरातत्ववोत्ताओं को अज़रबैजान स्थित एक शैलाश्रय (रॉक शेल्टर) के फर्श पर छोटे-छोटे छेदों के पैटर्न दिखाई दिए। अनुमान है कि यह प्राचीन बोर्ड खेलों में सबसे पुराना खेल था जिसे आज से लगभग 4 हज़ार साल पहले खानाबदोश चरवाहे खेला करते थे।

अमेरिकन म्यूज़ियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के शोधकर्ता वाल्टर क्राइस्ट ने एक प्राचीन खेल 58 होल्स की तलाश में अज़रबैजान स्थित नेशनल पार्क की प्राचीन गुफाओं का दौरा किया। यह खेल हाउंड्स और जैकाल के नाम से भी जाना जाता है।

ब्रिटिश पुरातत्ववेत्ता हॉवर्ड कार्टर ने भी ईसा पूर्व 18वीं सदी के मिस्र के फरोआ अमेनेमहाट के मकबरे में जानवरों आकृति के टुकड़ों के साथ एक गेम सेट पाया। लाइव साइंस की रिपोर्ट के अनुसार अज़रबैजान के शैलाश्रय में पाए गए गोलाकार गड्ढों का विशिष्ट पैटर्न भी इसी खेल से मिलता जुलता है। हालांकि अज़रबैजान में मिले पैटर्न फरोआ के मकबरे से भी पुराने हैं।  

आसपास चट्टानों पर बने चित्रों को देखते हुए अनुमान है कि यह शैलाश्रय 4000 वर्ष पुराना है जब अज़रबैजान के इस इलाके में खानाबदोश चरवाहे रहा करते थे। इसी समय यह खेल मध्य पूर्व के इलाकों के साथ-साथ मिस्र और मेसोपोटेमिया में भी काफी प्रचलित था।        

पुरातत्ववेत्ता को इन गड्ढों के बारे में जानकारी तो थी लेकिन वे यह नहीं जानते थे कि इसे बोर्ड गेम के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। क्राइस्ट के अनुसार प्रत्येक गड्ढे को एक विशिष्ट पैटर्न में काटा गया था जो उसके उपयोग को दर्शाता है। उनका ऐसा भी मानना है कि यह खेल लगभग 1500 वर्षों तक ठीक उसी अंदाज़ में खेला जाता रहा जैसा शुरुआत में खेला जाता था।

हालांकि 58 होल्स के नियम के बारे में जानकारी तो नहीं है लेकिन आधुनिक समय के बैकगैमन की तरह खेला जाता होगा जिसमे कुछ बीज या पत्थरों का उपयोग किया जाता है जो एक निर्धारित लक्ष्य तक पहुंचने के लिए बोर्ड के चारों ओर चक्कर लगाते हैं।

इस खेल में बीच में दो पंक्तियां होती हैं और चारों ओर आर्क के आकार में गड्ढे बने रहते हैं। इसमें 5वें, 10वें, 15वें और 20वें गड्ढे को किसी तरह से चिन्हित किया होता है। आखिर में शीर्ष पर बना गड्ढा दूसरे गड्ढों की तुलना में थोड़ा बड़ा होता है जिसको आम तौर पर खेल का लक्ष्य या अंत समझा जाता है।

संभावना है कि बोर्ड में गोटियों की चाल को नियंत्रित करने के लिए पांसों का उपयोग किया जाता होगा, लेकिन पूरे सेट में किसी तरह का कोई पांसा नहीं मिला है।

इस खेल को आधुनिक बैकगैमन के समान बताने के विचार को क्राइस्ट ने खारिज करते हुए कहा कि बैकगैमन बाद के रोमन गेम टैबुला से लिया गया है। 58 होल्स का खेल काफी पुराना है, लेकिन इसको सबसे पुराना खेल कहना सही नहीं है।

क्राइस्ट के अनुसार इतने व्यापक स्तर पर इस खेल का खेला जाना सांस्कृतिक बाधाओं को पार करने की क्षमता दर्शाता है। यह परस्पर संवाद में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता होगा। इस खेल ने एक भाषा का भी काम किया होगा जिसमें खेल के ज़रिए आपस में संवाद होता होगा। (स्रोत फीचर्स)

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