लगभग 5000 साल पहले स्पेन के टैरागोना की एक गुफा में किसी ने चुपके से एक वृद्ध व्यक्ति के सिर पर पीछे से एक भोथरे हथियार से वार किया था, संभवतः उसकी मृत्यु वहीं हो गई थी। पुरातात्विक रिकॉर्ड में ऐसे कई हमले दर्ज हैं, फिर भी शोधकर्ताओं को यह पता करने में मशक्कत करनी पड़ती है कि वास्तव में क्या हुआ था। अब एक नए अध्ययन की बदौलत शोधकर्ता यह सब जानने के बहुत करीब पहुंच गए हैं।
नवीन अध्ययन में वैज्ञानिकों ने अनेक नकली खोपड़ियां पर अलग-अलग हथियारों से वार किया और उनका अवलोकन किया। शुरुआत उन्होंने पुराने समय के दो औज़ारों, कुल्हाड़ी और बसूला, से की। बसूला हथौड़ा और कुल्हाड़ी का मिला-जुला सा औज़ार है। दोनों नवपाषाण युग (10,000 से 4500 ईसा पूर्व तक) के लोकप्रिय औज़ार थे, इसी समय मानव संपर्क बढ़ा था और हिंसा भी। शोधकर्ताओं ने पॉलीयुरेथेन और रबर ‘त्वचा’ से कृत्रिम खोपड़ी बनाई और मस्तिष्क के नरम ऊतक के एहसास के लिए उसमें जिलेटिन से भर दिया। फिर, उन पर जानलेवा वार करने के काम को अंजाम दिया!
जर्नल ऑफ आर्कियोलॉजिकल साइंस में प्रकाशित इस रिपोर्ट के खूनी परिणाम दर्शाते हैं कि दोनों हथियारों ने अलग-अलग तरह के फ्रैक्चर पैटर्न दिए। उदाहरण के लिए, कुल्हाड़ी के वार ने बसूले की तुलना में अधिक सममित, अंडाकार फ्रैक्चर बनाया। फ्रैक्चर ने हमलावर और पीड़ित के बीच डील-डौल के अंतर के भी संकेत दिए; उदाहरण के लिए ‘मस्तिष्क’ तक भेदने वाला वार संकेत देता है कि हमलावर कद में मृतक से ऊंचा था। तो इससे लगता है कि वैज्ञानिकों ने इस प्राचीन स्पेनिश व्यक्ति की मृत्यु के रहस्य को सुलझा लिया है: ऐसा लगता है कि उसे किसी बसूले से मारा गया था। (स्रोत फीचर्स)
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यूएसए में बंदूक सम्बंधी हिंसा का स्तर काफी अधिक है। वहां बंदूक नियंत्रण की नीतियों के कई अध्ययन भी हुए हैं। हाल ही में ऐसे 150 अध्ययनों के विश्लेषण का निष्कर्ष है कि बच्चों को बंदूक जैसे आग्नेयास्त्रों से दूर रखना बंदूकी हिंसा की रोकथाम में काफी कारगर है जबकि उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए छिपाकर हथियार रखने की अनुमति देना हिंसा को बढ़ावा देता है।
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि यूएस में निजी मिल्कियत में बंदूकों की संख्या 26.5 करोड़ से 39.3 करोड़ के बीच है। और हर साल 45,000 से ज़्यादा अमरीकी लोग बंदूक द्वारा जानबूझकर या गैर-इरादतन हिंसा के कारण जान गंवाते हैं। इनमें से लगभग आधे मामले खुदकुशी के होते हैं। इस हिंसा के पैटर्न को समझने के लिए 18 अलग-अलग क्षेत्रों की बंदूक नियंत्रण नीति पर किए गए 152 अध्ययनों की समीक्षा की गई और विभिन्न नीतियों के परिणामों को देखा गया – जैसे घाव तथा मृत्यु, मास शूटिंग, और बंदूक का सुरक्षा के लिए उपयोग वगैरह।
यूएस के कुछ प्रांतों में नीति है – स्टैण्ड-योर-ग्राउण्ड। इसका मतलब होता है कि यदि किसी को पर्याप्त यकीन है कि उसे कतिपय अपराध के खिलाफ स्वयं की रक्षा करना ज़रूरी है, तो वह जानलेवा शक्ति का उपयोग कर सकता है। अध्ययन में पाया गया कि यह नीति बंदूकी हत्याओं की उच्च दर से मेल खाती है। छिपाकर आग्नेयास्त्र रखने की अनुमति देने वाले कानून भी बंदूक-सम्बंधी हिंसा में वृद्धि से जुड़े पाए गए।
ये निष्कर्ष 2020 की रैण्ड कॉर्पोरेशन की रिपोर्ट से काफी अलग हैं जिसका निष्कर्ष था कि छिपाकर रखे जाने वाले हथियार सम्बंधी कानूनों और मौतों के बीच सम्बंध स्पष्ट नहीं है। रैण्ड के व्यवहार-वैज्ञानिक एण्ड्र्यू मोरेल का मत है कि यह निष्कर्ष कानून व नीति निर्माताओं के लिए चुनौती भी है क्योंकि जिन प्रांतों में प्रतिबंधात्मक कानूनों को अदालतों में असंवैधानिक करार दिया गया था वहां आग्नेयास्त्र से होने वाली हत्याओं और कुल हत्याओं में वृद्धि होने की आशंका है। या ये प्रांत हथियार लेकर घूमने सम्बंधी इन समस्याओं का कोई और उपाय निकालेंगे। जैसे ये प्रांत कुछ बंदूक-मुक्त क्षेत्र घोषित कर सकते हैं।
शोधकर्ताओं को इस बात के प्रमाण मिले हैं कि बच्चों की आग्नेयास्त्रों तक पहुंच रोकने वाले कानून – जिन्हें सेफ स्टोरेज कानून भी कहा जाता है – युवाओं में बंदूकों से होने वाली क्षति को कम करते हैं। इन कानूनों के तहत यह शर्त होती है कि बंदूकों को तालों में बंद करके, या गोलियां निकालकर, और गोलियों से अलग रखा जाए। ऐसे कानूनों से युवा लोगों में खुदकुशी व हत्याएं कम होती हैं।
यह निष्कर्ष खास तौर से युवाओं में खुदकुशी की घटनाएं रोकने के लिहाज़ से महत्वपूर्ण है क्योंकि खुदकुशी के अधिकांश मामलों में बंदूक का उपयोग देखा गया है। कारण यह बताया जाता है कि खुदकुशी करने का आवेग क्षणिक होता है और उस समय यदि बंदूक आसपास न हो तो बात टल सकती है। अन्यथा व्यक्ति को दूसरा मौका नहीं मिलता।
अलबत्ता, रिपोर्ट इस बारे में कोई निश्चयात्मक दावा नहीं करती कि मास शूटिंग और कानून का कोई सम्बंध है। लेकिन इस अध्ययन से एक बात साफ हुई है कि बंदूक की उपलब्धता और सुगमता का सम्बंध हिंसा से है। रैण्ड कॉर्पोरेशन इस हिंसा के अन्य पहलुओं पर भी अध्ययन करना चाहता है ताकि बंदूक संस्कृति पर लगाम लगाई जा सके। (स्रोत फीचर्स)
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कैलेंडर का निर्माण लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं ने किया है। कारण स्पष्ट है कि दिन और वर्ष का ठीक-ठाक हिसाब-किताब रखना कृषि, पशुपालन, यात्राओं वगैरह की दृष्टि से अति-महत्वपूर्ण रहा है। इसी सिलसिले में वैज्ञानिकों को यह पता चला है कि प्राचीन माया सभ्यता में कैलेंडर का निर्माण कम से कम 3000 साल पहले किया गया था।
वैज्ञानिकों को इस बात के प्रमाण मिले हैं कि माया लोगों का एक समूह (माया किचे) लगभग 1100 ईसा पूर्व से समय का हिसाब-किताब रखता आया है। कैलेंडर को वे लोग चोल्किज (यानी दिनों का क्रम) कहते थे और उनका वर्ष 260 दिनों का होता था। यह माया सभ्यता के मेक्सिको व मध्य अमेरिकी इलाके में ही मिला है। प्रमाण बताते हैं कि समय की गणना 13 संख्याओं और 20 प्रतीकों के आधार पर की जाती थी और ये एक निश्चित क्रम में आते थे (जैसे इस कालगणना में 6 जनवरी 2023 ‘6 रैबिट’ होगा)। अब यह ज्ञात हो चुका है कि कैलेंडर के दिन तारों, इमारतों के स्थापत्य और कुदरती लैंडमार्क्स के संरेखन से मेल खाते थे।
ऐसा माना जा रहा है कि इस तरह की कालगणना से खेती-बाड़ी, धार्मिक अनुष्ठानों, राजनीति वगैरह में मार्गदर्शन मिलता होगा। वैसे माया लोग एक अन्य कैलेंडर (हाब) का उपयोग भी करते थे जिसमें वर्ष 365 दिन का था और यह सौर चक्र से जुड़ा था।
पूर्व में इस कैलेंडर का प्रमाण एक भित्ती चित्र (म्यूरल) के रूप में मिला था। यह म्यूरल ग्वाटेमाला में मिला था और इसका समय करीब 300 ईसा पूर्व निर्धारित हुआ था। लेकिन दिक्कत यह है कि ऐसे लिखित रिकॉर्ड मुश्किल से मिलते हैं क्योंकि माया लोग जिन सामग्रियों का उपयोग करते थे वे विघटनशील हुआ करती थीं।
इसी रिकॉर्ड को पूरा करने की दृष्टि से स्लोवेनिया के इंस्टीट्यूट ऑफ एंथ्रोपोलॉजिकल एंड स्पेशियल स्टडीज़ के इवान स्प्राक ने लिडार नामक एक तकनीक का सहारा लिया जिसकी मदद से घने जंगलों में ओझल प्राचीन संरचनाओं को उजागर किया जा सकता है।
इससे 2 वर्ष पहले एरिज़ोना विश्वविद्यालय के ताकेशी इनोमाटा ने मेक्सिको खाड़ी के तट का लिडार सर्वेक्षण किया था जिसमें लगभग 500 प्राचीन खंडहरों का पता चला था। स्प्राक और इनोमाटा ने मिलकर इनमें से 415 संकुलों का अध्ययन यह जानने के लिए किया कि किस तरह से इनकी सीध सूर्य, चंद्रमा, शुक्र व अन्य आकाशीय पिंडों से बैठती है।
पता चला कि अधिकांश संकुल पूर्व-पश्चिम सीध में थे और 90 प्रतिशत संकुलों में ऐसे स्थापत्य सम्बंधी लक्षण थे जो विशिष्ट तारीखों पर सूर्योदय की सीध में होते थे। अधिकांशत: इस तरह के सूर्योदय वर्तमान कैलेंडर के 11 फरवरी और 29 अक्टूबर के थे। और इनके बीच 265 दिनों का अंतर है। इन संकुलों में सबसे प्राचीन करीब 1100 ईसा पूर्व का है। इससे लगता है कि 265 दिन के वर्ष वाला कैलेंडर कम से कम इतना पुराना तो है।
अन्य स्मारकों में ऐसे सूर्योदयों के बीच अंतर 130 दिनों का है जो आधी कैलेंडर अवधि के बराबर है। कुछ स्मारकों में सूर्योदयों के बीच 13 या 20 दिन के गुणज का अंतर है। इससे पता चलता है कि कैलेंडर प्रणाली में 13 संख्याओं और 20 प्रतीकों का उपयोग होता था और ये दो अयनांतों तथा दो विषुव (समपातों) से मेल खाते थे। कुछ संकुलों का मिलान शुक्र और चंद्र के चक्र से भी देखा गया। वैसे, कई संकुलों में ऐसा कोई तालमेल नज़र नहीं आया।
अलबत्ता, ऐसा माना जा रहा है कि इतने बड़े नमूने के आधार पर निकाले गए निष्कर्ष काफी सटीक हैं। एक बात यह भी कही गई है कि इस अध्ययन में कैलेंडर का जो सबसे पुराना प्रमाण मिला है वह उस समय का है जब ये लोग शिकारी-संग्रहकर्ता जीवन शैली से निकलकर खेती की शुरुआत कर रहे थे। (स्रोत फीचर्स)
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अगर आप सोचते हैं कि निएंडरथल मानव कच्चा मांस और फल-बेरियां ही खाते थे, तो हालिया अध्ययन आपको फिर से सोचने को मजबूर कर सकता है। उत्तरी इराक की एक गुफा में विश्व के सबसे प्राचीन पके हुए भोजन के जले हुए अवशेष मिले हैं, जिनके विश्लेषण से लगता है कि निएंडरथल मानव खाने के शौकीन थे।
लीवरपूल जॉन मूर्स युनिवर्सिटी के सांस्कृतिक जीवाश्म विज्ञानी क्रिस हंट का कहना है कि ये नतीजे निएंडरथल मानवों में खाना पकाने के जटिल कार्य और खाद्य संस्कृति का पहला ठोस संकेत हैं।
दरअसल शोधकर्ता बगदाद से आठ सौ किलोमीटर उत्तर में निएंडरथल खुदाई स्थल की एक गुफा शनिदार गुफा की खुदाई कर रहे थे। खुदाई में उन्हें गुफा में बने एक चूल्हे में जले हुए भोजन के अवशेष मिले, जो अब तक पाए गए पके भोजन के अवशेष में से सबसे प्राचीन (लगभग 70,000 साल पुराने) थे।
शोधकर्ताओं ने पास की गुफाओं से इकट्ठा किए गए बीजों से इन व्यंजनों में से एक व्यंजन को प्रयोगशाला में बनाने की कोशिश की। यह रोटी जैसी, पिज़्ज़ा के बेस सरीखी चपटी थी जो वास्तव में बहुत स्वादिष्ट थी।
टीम ने दक्षिणी यूनान में फ्रैंचथी गुफा, जिनमें लगभग 12,000 साल पहले आधुनिक मनुष्य रहते थे, से मिले प्राचीन जले हुए भोजन के अवशेषों का भी स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से विश्लेषण किया।
दोनों जानकारियों को साथ में देखने से पता चलता है कि पाषाणयुगीन आहार में विविधता थी और प्रागैतिहासिक पाक कला काफी जटिल थी, जिसमें खाना पकाने के लिए कई चरण की तैयारियां शामिल होती थीं।
शोधकर्ताओं को पहली बार दोनों स्थलों पर निएंडरथल और शुरुआती आधुनिक मनुष्यों (होमो सेपिएन्स) द्वारा दाल भिगोने और दलहन दलने के साक्ष्य मिले हैं।
शोधकर्ताओं को भोजन में अलग-अलग तरह के बीजों को मिलाकर बनाने के प्रमाण भी मिले हैं। उनका कहना है कि ये लोग कुछ खास पौधों के ज़ायके को प्राथमिकता देते थे।
एंटीक्विटी में प्रकाशित यह शोध बताता है कि शुरुआती आधुनिक मनुष्य और निएंडरथल दोनों ही मांस के अलावा वनस्पतियां भी खाते थे। जंगली फलों और घास को अक्सर मसूर की दाल और जंगली सरसों के साथ पकाया जाता था। और चूंकि निएंडरथल लोगों के पास बर्तन नहीं थे इसलिए अनुमान है कि वे बीजों को किसी जानवर की खाल में बांधकर भिगोते होंगे।
हालांकि, ऐसा लगता है कि आधुनिक रसोइयों के विपरीत निएंडरथल बीजों का बाहरी आवरण नहीं हटाते थे। छिलका हटाने से कड़वापन खत्म हो जाता है। लगता है कि वे कड़वेपन को कम तो करना चाहते थे लेकिन दालों के प्राकृतिक स्वाद को खत्म भी नहीं करना चाहते थे।
अनुमान है कि वे स्थानीय पत्थरों की मदद से बीजों को कूटते या दलते होंगे इसलिए दालों में थोड़ी किरकिरी आ जाती होगी। और शायद इसलिए निएंडरथल मनुयों के दांत इतनी खराब स्थिति में थे। (स्रोत फीचर्स)
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जब आधुनिक मनुष्य पहली बार अफ्रीका से निकलकर दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत के उष्णकटिबंधीय द्वीपों में गए तो उनका सामना नए लोगों और नए रोगजनकों से हुआ। लेकिन जब उन्होंने स्थानीय लोगों, डेनिसोवन्स, के साथ संतानोत्पत्ति की तो उनकी संतानों में कुछ प्रतिरक्षा जीन स्थानांतरित हुए जिन्होंने उन्हें स्थानीय बीमारियों से बचने में मदद की। अब एक नया अध्ययन बताता है कि इनमें से कुछ जीन्स आज भी पपुआ न्यू गिनी के निवासियों के जीनोम में मौजूद हैं।
वैज्ञानिक यह तो भली-भांति जानते थे कि पपुआ न्यू गिनी और मेलानेशिया में रहने वाले लोगों को 5 प्रतिशत तक डीएनए डेनिसोवन लोगों से विरासत में मिले हैं। डेनीसोवन लोग लगभग दो लाख साल पहले एशिया में आए थे और ये निएंडरथल मनुष्य के सम्बंधी थे। वैज्ञानिकों को लगता है कि इन जीन्स ने अतीत में आधुनिक मनुष्यों को स्थानीय बीमारियों से लड़ने में मदद करके फायदा पहुंचाया होगा। लेकिन सवाल था कि ये डीएनए अब भी कैसे मनुष्यों के डील-डौल, कार्यिकी वगैरह में बदलाव लाते हैं। और चूंकि पपुआ न्यू गिनी और मेलानेशिया के वर्तमान लोगों के डीएनए का विश्लेषण बहुत कम हुआ है इसलिए इस सवाल का जवाब मुश्किल था।
इस अध्ययन में युनिवर्सिटी ऑफ मेलबर्न की आइरीन गेलेगो रोमेरो और उनके साथियों ने एक अन्य अध्ययन का डैटा उपयोग करके इस मुश्किल को दूर किया है। उस अध्ययन में पपुआ न्यू गिनी के 56 लोगों के आनुवंशिक डैटा का विश्लेषण किया गया था। इन लोगों के जीनोम की तुलना डेनिसोवन और निएंडरथल डीएनए के साथ करने पर देखा गया कि डेनिसोवन लोगों से पपुआ लोगों को 82,000 ऐसे जीन संस्करण मिले थे जो जेनेटिक कोड में सिर्फ एक क्षार में बदलाव से पैदा होते हैं।
इसके बाद शोधकर्ताओं ने आगे का अध्ययन प्रतिरक्षा से सम्बंधित जीन संस्करणों पर केंद्रित किया जो अपने निकट उपस्थित जीन के प्रोटीन का उत्पादन बढ़ा सकते थे, या इसका कार्य ठप या धीमा कर सकते थे। यह नियंत्रण विशिष्ट रोगजनकों के प्रति प्रतिरक्षा प्रणाली को अनुकूलित होने या ढलने में मदद कर सकता है।
शोधकर्ताओं को पपुआ न्यू गिनी के लोगों में कई ऐसे डेनिसोवन जीन संस्करण मिले जो उन जीन्स के पास स्थित थे जो फ्लू और चिकनगुनिया जैसे रोगजनकों के प्रति मानव प्रतिरक्षा को प्रभावित करते हैं। इसके बाद उन्होंने विशेष रूप से दो जीन्स, OAS2 और OAS3, द्वारा उत्पादित प्रोटीन की अभिव्यक्ति से जुड़े आठ डेनिसोवन जीन संस्करण के कार्य का परीक्षण किया।
देखा गया कि इनमें से दो डेनिसोवन जीन संस्करण ने प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा साइटोकाइन्स का उत्पादन कम कर दिया था जिससे शोथ (सूजन) कम हो गई थी। इस तरह शोथ प्रतिक्रिया को शांत करने से पपुआ लोगों को इस क्षेत्र के नए संक्रमणों से निपटने में मदद मिली होगी।
प्लॉस जेनेटिक्स पत्रिका में शोधकर्ता बताते हैं कि इन प्रयोगों से पता चलता है कि डेनिसोवन जीन संस्करण प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया में छोटे-मोटे बदलाव कर इसे पर्यावरण के प्रति अनुकूलित बना सकते हैं। शोधकर्ता बताते हैं कि उष्णकटिबंधीय इलाकों में, जहां संक्रमण का अधिक खतरा होता है, वहां प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को पूरी तरह हटाना तो उचित नहीं होगा लेकिन उसकी उग्रता को कम करना कारगर हो सकता है।
ये नतीजे वर्तमान युरोपीय लोगों में निएंडरथल जीन संस्करण की भूमिका पर हुए एक अन्य अध्ययन के नतीजों से मेल खाते हैं। दोनों ही अध्ययन दर्शाते हैं कि कैसे किसी क्षेत्र में नए आने वाले मनुष्यों का प्राचीन मनुष्यों के साथ मेल-मिलाप उनमें लाभकारी जीन प्राप्त होने का एक त्वरित तरीका प्रदान करता है। अध्ययन बताता है कि इस तरह जीन का लेन-देन मनुष्यों को प्रतिरक्षा चुनौतियों के प्रति अनुकूलित होने का एक महत्वपूर्ण ज़रिया था।
उम्मीद है कि आगे के अध्ययनों में यह पता चल सकेगा कि क्या डेनिसोवन जीन संस्करण पपुआ लोगों को किसी विशिष्ट रोग से बचने या उबरने में बेहतर मदद करते हैं?
सार रूप में, हज़ारों सालों पहले दो अलग तरह के मनुष्यों का मेल-मिलाप अब भी वर्तमान मनुष्यों के जीवन को प्रभावित कर रहा है। (स्रोत फीचर्स)
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हाल ही में शोधकर्ताओं को दक्षिण साइबेरिया की चारजिस्काया गुफा में निएंडरथल परिवार के साक्ष्य मिले हैं। इस परिवार में एक पिता, उसकी किशोर बेटी और दो अन्य दूर के सम्बंधियों की पहचान की गई है। इसके साथ ही गुफा से 7 अन्य व्यक्तियों की भी पहचान की गई है जो एक अन्य कबीले के बताए गए हैं। इनमें से भी दो शायद कज़िन्स हैं। गौरतलब है कि निएंडरथल (होमो निएडरथलेंसिस) पुरामानव थे जो लगभग 40 हज़ार वर्ष पूर्व तक धरती पर विद्यमान थे। गुफा के नज़दीक के एक अन्य स्थल से दो और परिवारों की पहचान के साथ यह निएंडरथल प्रजाति का अब तक का सबसे बड़ा जीनोम भंडार है।
अल्ताई पहाड़ों की तलहट और चार्याश नदी के तट पर स्थित चारजिस्काया गुफा मशहूर डेनिसोवा गुफा से 100 किलोमीटर पश्चिम में है। वास्तव में डेनिसोवा गुफा एक पुरातात्विक खज़ाना है जिसमें मनुष्य, निएंडरथल और डेनिसोवा और कम से कम एक निएंडरथल-डेनिसोवा संकर के लोग 3 लाख वर्षों के अंतराल में अलग-अलग समय में साथ रहे हैं। अलबत्ता, चारजिस्काया में अब तक मात्र निएंडरथल अवशेष ही मिले हैं।
गौरतलब है कि 2020 में चारजिस्काया की एक निएंडरथल स्त्री के जीनोम अनुक्रम से पता चला था कि वह डेनिसोवा गुफा में रहने वाली आबादी से काफी अलग थी। गुफा में रहने वाले लोगों का अधिक गहराई से अध्ययन करने के लिए मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक लौरिट्स स्कोव और बेंजामिन पीटर के नेतृत्व में एक टीम ने चारजिस्काया और इसके नज़दीक ओक्लाडनिकोव गुफा से 17 अन्य पुरा-मानव अवशेषों से डीएनए प्राप्त किए।
इस अध्ययन के आधार पर शोधकर्ताओं का मत है कि चारजिस्काया के निवासी उनसे हज़ारों साल पहले डेनिसोवा गुफा में रहने वालों की अपेक्षा युरोप में रहने वाले निएंडरथल से ज़्यादा निकटता से सम्बंधित थे।
चारजिस्काया अवशेषों से प्राप्त जीनोम की तुलना करने पर स्कोव को काफी आश्चर्य हुआ। उन्होंने पाया कि एक वयस्क पुरुष और एक किशोरी का डीएनए 50 प्रतिशत एक-सा है। यह स्थिति तभी संभव है जब उनका सम्बंध भाई-बहन का हो या फिर पिता-पुत्री का। इस सम्बंध को समझने के लिए शोधकर्ताओं ने माइटोकॉण्ड्रिया के डीएनए की जांच की। माइटोकॉण्ड्रिया का डीएनए व्यक्ति को अपनी मां से मिलता है। इसका मतलब है कि माइटोकॉण्ड्रिया का डीएनए भाई-भाई, भाई-बहन, मां-बेटी में तो एक समान होगा लेकिन पिता और उसकी संतान में नहीं। इस तुलना से समझ में आया कि ये दोनों पिता-पुत्री थे।
इसके बाद और अधिक आनुवंशिक सामग्री की जांच करने पर शोधकर्ताओं को परिवार के अधिक सदस्यों का पता चला। उनको पिता में दो प्रकार के माइटोकॉण्ड्रिया डीएनए प्राप्त हुए। इस विशेषता को हेटरोप्लाज़्मी कहा जाता है। यह विशेषता गुफा के दो अन्य व्यस्क पुरुषों में भी देखने को मिली जो संकेत देता है कि ये सब एक ही मातृ वंश से थे। गौरतलब है कि हेटरोप्लाज़्मी कुछ पीढ़ियों बाद गायब हो जाती है इसलिए यह कहना उचित होगा कि ये तीनों एक ही समय में उपस्थित रहे होंगे। टीम ने निएंडरथल परिवार के अन्य सदस्यों में एक पुरुष और एक महिला की भी पहचान की और लगता है कि ये संभवत: कज़िन्स थे।
इतनी अधिक मात्रा में निएंडरथल जीनोम से शोधकर्ताओं को निएंडरथल जीवन के कई पहलुओं को देखने का मौका मिला। चारजिस्काया से प्राप्त निएंडरथल के जीनोम में डीएनए की मातृ और पितृ प्रतियों में विविधता काफी कम थी। इससे संकेत मिलता है कि प्रजनन में संलग्न वयस्कों की आबादी काफी छोटी थी। शोधकर्ताओं ने इसी तरह का पैटर्न पहाड़ी गोरिल्ला और अन्य संकटग्रस्त प्रजातियों में भी देखा है जो आम तौर पर छोटे समूहों में रहते हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि Y-गुणसूत्र (जो नर से मिलता है) की तुलना में माइटोकॉण्ड्रियल डीएनए (जो मादा से मिलता है) में विविधता बहुत अधिक थी। इसकी एक व्याख्या यह हो सकती है कि विभिन्न निएंडरथल समुदायों से महिलाओं का निरंतर आना-जाना रहा था। टीम के मॉडल से पता चलता है कि आनुवंशिक विविधता का पैटर्न दर्शाता है कि समुदाय की आधे से ज़्यादा महिलाओं का जन्म कहीं और हुआ होगा।
स्पेन स्थित नेचुरल साइंस म्यूज़ियम के निर्देशक चार्ल्स लालुएज़ा फॉक्स का विचार है कि यह सामाजिक संरचना विभिन्न निएंडरथल आबादियों में आम रही होगी। एक दशक पूर्व उनकी टीम ने स्पेन की एक गुफा में 12 निएंडरथल के विश्लेषण में पाया था कि महिलाओं के माइटोकॉण्ड्रियल डीएनए में पुरुषों की अपेक्षा अधिक विविधता थी जो दर्शाता है कि महिलाएं अक्सर अपने समुदायों को छोड़ दिया करती थीं।
चारजिस्काया गुफा में निएंडरथल अवशेषों के अलावा बाइसन और घोड़े के अवशेष भी मिले हैं। स्कोव के अनुसार यह स्थल इन जानवरों के मौसमी प्रवास के दौरान शिकार कैंप के रूप में काम करती थी। इस दौरान समुदायों को मेल-मिलाप के अवसर मिला करते होंगे।
अचरज की बात यह है कि जीवाश्म अवशेषों में मिले डीएनए के विश्लेषण से इतने गहरे निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। और अभी इस गुफा का केवल एक-चौथाई से भी कम हिस्सा टटोला गया है। उम्मीद है कि भविष्य के अध्ययन हमारी समझ में और इजाफा करेंगे। (स्रोत फीचर्स)
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नींद हमारे जीवन का अहम हिस्सा है। नींद ठीक से न हो तो दिन भर सुस्ती रहती है। लेकिन नींद और इससे जुड़े विकार चिकित्सा अध्ययनों में सबसे उपेक्षित रहे हैं। स्नातक स्तर की पढ़ाई में इस विषय पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है, नींद अनुसंधान के क्षेत्र में वित्त या अनुदान की भी कमी है। इस उपेक्षा का कारण नींद सम्बंधी विकारों की विविधता है – जैसे स्लीप एप्निया (जो कान, नाक व गला विशेषज्ञ या हृदय रोग विशेषज्ञ के दायरे में आते हैं), या रेस्टलेस लेग सिंड्रोम (न्यूरोलॉजिस्ट या प्राथमिक चिकित्सक)। इसके कारणों की समझ में कमी और उपचार का अभाव भी इस समस्या को उपेक्षित बनाए रखते हैं।
हालांकि, अब परिस्थितियां बदलने लगी हैं। और इस बदलाव में कुछ योगदान दैनिक शारीरिक लय के आनुवंशिक आधार पर काम करने वाले नोबेल पुरस्कार विजेताओं माइकल रॉसबैश, जेफरी हॉल और माइकल यंग का रहा है। उनके काम की बदौलत आज हम यह जानते हैं कि मनुष्यों में एक आंतरिक आणविक घड़ी होती है – यह समय का हिसाब रखने वाले जीन और सम्बंधित प्रोटीन के एक नेटवर्क के रूप में होती है। ये जीन बाइपोलर डिसऑर्डर, अवसाद (डिप्रेशन) और अन्य मूड डिसऑर्डर से भी सम्बंधित हैं। कुछ निद्रा विकार पार्किंसंस रोग, लेवी बॉडी डिमेंशिया और मल्टीपल सिस्टम एट्रोफी के संकेतक के रूप में पाए गए हैं। इसके अलावा, पोर्टेबल निगरानी उपकरणों के विकास ने चिकित्सकों को सहज माहौल में, यहां तक कि घर में भी, नींद का निरीक्षण करने में सक्षम बनाया है। और, नार्कोलेप्सी की कार्यिकीय व्याख्या ने अनिद्रा की समस्या के लिए नई दवाओं का विकास संभव किया है। नार्कोलेप्सी उन न्यूरॉन्स की क्षति के कारण होती है जो जागृत अवस्था को उकसाने वाले ऑरेक्सिन नामक न्यूरोपैप्टाइड का स्राव करते हैं।
इसी कड़ी में, दी लैंसेट और दी लैंसेट न्यूरोलॉजी में चार शोध समीक्षाएं प्रकाशित हुई हैं जो विभिन्न निद्रा विकारों और नींद के मानवविज्ञान की व्यवस्थित तरीके से पड़ताल करती हैं। ये चार समीक्षाएं नींद के बारे में चार मुख्य बातें बताती हैं।
पहली, कि नींद सम्बंधी विकार एक आम स्वास्थ्य समस्या होने के बावजूद इन्हें बहुत कम तरजीह मिली है। नींद सम्बंधी विकार पीड़ित और उसके साथ सोने वालों के लिए बड़ी परेशानी का सबब बनते हैं, और जन-स्वास्थ्य और आर्थिक खुशहाली पर दूरगामी प्रभाव डालते हैं। उदाहरण के लिए, एक तिहाई वयस्क अनिद्रा की समस्या के शिकार होते हैं। दिन के अधिकतर समय उनींदापन उत्पादकता और कार्यस्थल पर सुरक्षा में कमी ला सकता है। इसके चलते बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और एक तिहाई तक सड़क हादसे नींद की कमी के कारण होते हैं।
दूसरी, कि प्रभावी उपचारों की कमी है। अनिद्रा के लिए तो आसानी से दवाएं लिख दी जाती हैं जैसे बेंजोडायज़ेपाइन्स और तथाकथित ज़ेड-औषधियां यानी ज़ोपिक्लोन, एस्ज़ोपिक्लोन और ज़ेलेप्लॉन। हालांकि अनिद्रा के उपचार के लिए गैर-औषधीय तरीकों, जैसे संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी प्रथम उपचार माने जाते हैं, लेकिन ये उपचार हर जगह उपलब्ध नहीं होते हैं। और, बातचीत आधारित उपचार से दवा पर आश्रित होने का खतरा भी नहीं होता – लंबे समय तक नींद की दवाएं लेने से इनकी लत लगना आम बात है। स्लीप हाइजीन (यानी समयानुसार सोना-जागना, शांत-अंधेरी जगह पर सोना, सोते समय मोबाइल वगैरह दूर रखना आदि) इस संदर्भ में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है।
तीसरी, अस्पताल और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सकों को उच्च रक्तचाप, मधुमेह और हृदय रोग जैसी चिकित्सा में नींद की जीर्ण समस्या के प्रभाव पता होना चाहिए। अपर्याप्त और अत्यधिक नींद दोनों ही स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डालती हैं, ये अस्वस्थता और मृत्यु दर को बढ़ाती हैं। इसलिए किसी भी बीमारी का उपचार करते समय चिकित्सक को व्यक्ति की नींद की गुणवत्ता के बारे में भी पूछ लेना चाहिए।
और चौथी, अपर्याप्त नींद और नींद सम्बंधी विकारों की संख्या बढ़ने की अत्यधिक संभावना है। उदाहरण के लिए, मानवशास्त्रीय अध्ययनों से पता चला है कि अनिद्रा पूरी तरह से आधुनिक जीवन से जुड़ी हुई समस्या है (औद्योगिक समाज में 10-30 प्रतिशत लोग अनिद्रा का शिकार होते हैं, जबकि नामीबिया और बोलीविया में रहने वाले शिकारी-संग्रहकर्ता समुदाय की महज़ दो प्रतिशत आबादी अनिद्रा की शिकार है)। मनोसामाजिक तनाव, मदिरापान, धूम्रपान और व्यायाम में कमी नींद में बाधा डालते हैं। इसके अलावा, सोने के समय शयनकक्ष में तकनीकी उपकरणों का उपयोग या उनकी मौजूदगी, खास कर युवा वर्ग में स्मार्ट फोन का बढ़ता उपयोग नीली रोशनी से संपर्क बढ़ाता है जो, सोने और जागने की लय सम्बंधी विकारों के संभावित कारणों में से एक माना जाता है।
नींद हमारे जीवन का एक तिहाई हिस्सा है लेकिन चिकित्सकों, स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों और नीति निर्माताओं द्वारा इस पर बहुत कम ध्यान दिया गया है। उक्त शृंखला अच्छी नींद के महत्व को भलीभांति उजागर करती हैं। (स्रोत फीचर्स)
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कई भोज्य पदार्थों को हम बंद आंखों से सूंघ कर भी पहचान जाते हैं। हमारे शरीर से भी लगातार नाना प्रकार की गंध निकलती हैं। जब मादा मच्छर किसी मनुष्य की तलाश में होती है तो वह मनुष्य के शरीर से निकलने वाली गंध के एक अनोखे मिश्रण को सूंघती हैं। गंध मच्छरों के स्पर्शक (एंटीना) में उपस्थित ग्राहियों को उत्तेजित करती है और मच्छर हमें अंधेरे में भी खोज लेते हैं। यदि मच्छरों में गंध के ग्राही ही न रहें तो क्या मच्छर इंसानों की गंध को नहीं सूंघ पाएंगे? तब क्या हमें मच्छरों और उनसे होने वाले रोगों से निजात मिल पाएगी?
हाल ही में वैज्ञानिकों ने मच्छरों पर ऐसे ही कुछ प्रयोग किए। उन्होंने मच्छरों के जीनोम (डीएनए) में से गंध संवेदी ग्राहियों के लिए ज़िम्मेदार पूरे जीन समूह को ही निकाल दिया। किंतु अनुमान के विपरीत पाया गया कि गंध संवेदी ग्राहियों के अभाव के बावजूद मच्छर हमें ढूंढकर काटने का तरीका ढूंढ लेते हैं। मानव शरीर की गर्मी भी उन्हें आकर्षित करती है।
अधिकांश जंतुओं के घ्राण (गंध संवेदना) तंत्र की एक तंत्रिका कोशिका केवल एक प्रकार की गंध का पता लगा सकती हैं। लेकिन एडीज एजिप्टी मच्छरों की केवल एक तंत्रिका कोशिका भी अनेक गंधों का पता लगा सकती है। इसका मतलब है कि यदि मच्छर की कोई तंत्रिका कोशिका मनुष्य-गंध का पता लगाने की क्षमता खो देती है, तब भी मच्छर मानव की अन्य गंधों को पहचानने की क्षमता से उन्हें खोज सकते हैं। हाल ही में शोधकर्ताओं के एक दल ने 18 अगस्त को सेल नामक शोध पत्रिका में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया है कि यदि मच्छर में मानव गंध का पता लगाने वाले कुछ जीन काम करना बंद भी कर दें तो भी मच्छर हमें सूंघ सकते हैं। अतः ज़रूरत हमें किसी ऐसी गंध की है जिसे मच्छर सूंघना पसंद नहीं करते हैं।
प्रभावी विकर्षक (रेपलेंट) मच्छरों को डेंगू और ज़ीका जैसे रोग पैदा करने वाले विषाणुओं को प्रसारित करने से रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण उपाय है। किसी भी अन्य जंतु की तुलना में मच्छर इंसानी मौतों के लिए सर्वाधिक ज़िम्मेदार हैं। जितना बेहतर हम मच्छरों को समझेंगे उतना ही बेहतर उनसे बचने के उपाय खोज सकेंगे।
मच्छर जैसे कीट अपने स्पर्शक और मुखांगों से सूंघते हैं। वे अपनी घ्राण तंत्रिका की कोशिकाओं में स्थित तीन प्रकार के सेंसर का उपयोग करके सांस से निकलने वाली कार्बन डाईऑक्साइड तथा अन्य रसायनों से मनुष्य का पता लगा लेते हैं।
पूर्व के शोधकर्ताओं ने सोचा था कि मच्छर के गंध ग्राही को अवरुद्ध करने से उनके मस्तिष्क को भेजे जाने वाले गंध संदेश बाधित हो जाएंगे और मच्छर मानव को गंध से नहीं खोज पाएंगे। लेकिन आश्चर्य की बात है कि ग्राही से वंचित मच्छर फिर भी लोगों को सूंघ सकते हैं और काटते हैं।
यह जानने के लिए रॉकफेलर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एडीज़ इजिप्टी नामक मच्छर की तंत्रिका कोशिकाओं में फ्लोरोसेंट लेबल जोड़े ताकि गंध को पहचानने की क्रियाविधि को समझा जा सके। हैरान करने वाली बात यह थी कि एक-एक घ्राण तंत्रिका कोशिका में कई प्रकार के सेंसर होते हैं और वे संवेदी केंद्रों के समान कार्य कर रहे थे।
वैज्ञानिकों ने मनुष्यों में पाए जाने वाले तथा मच्छरों को आकर्षित करने वाले विभिन्न रसायनों (ऑक्टेनॉल, ट्राइथाइल अमीन) के उपयोग से तंत्रिका कोशिका में विद्युत संकेत उत्पन्न किए जो एक-दूसरे से भिन्न थे।
यह स्पष्ट नहीं है कि लोगों की गंध का पता लगाने के लिए क्यों मच्छर अतिरिक्त तरीकों का उपयोग करते हैं। कुछ वैज्ञानिकों का विचार है कि प्रत्येक व्यक्ति की गंध दूसरे से अलग होती है। शायद इसलिए मानव की गंध को भांपने के लिए मच्छरों में यह तरीका विकसित हुआ है। (स्रोत फीचर्स)
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1976 में की गई खुदाई में शांग राजवंश के एक चीनी सेनापति फू हाओ के तीन हज़ार साल पुराने मकबरे से 1.5 टन से अधिक कांसा निकला था। खुदाई में प्राप्त वस्तुओं की तादाद से पता चलता है कि तत्कालीन चीन में कांस्य उत्पादन बड़े पैमाने पर होता था। और दिलचस्प बात यह रही है कि कांसे की कई पुरातात्विक वस्तुओं में काफी मात्रा में सीसा (लेड) पाया गया है। यह एक रहस्य रहा है कि कांसे में इतना सीसा क्यों है।
हाल ही में शोधकर्ताओं ने 2300 साल पुराने एक ग्रंथ में वर्णित कांस्य वस्तुएं बनाने के नुस्खे को नए ढंग से समझने की कोशिश की है। उनका निष्कर्ष है कि चीन के प्राचीन ढलाईघरों में कांसे की वस्तुएं बनाने के लिए पहले से तैयार मिश्र धातुओं का उपयोग किया जाता था। इससे पता चलता है कि – चीन का कांस्य उद्योग अनुमान से अधिक जटिल था।
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के पुरातत्वविद और अध्ययन के लेखक मार्क पोलार्ड बताते हैं कि किसी समय चीन प्रति वर्ष सैकड़ों टन कांसे का उत्पादन करता था।
वैसे दशकों से पुरातत्वविद काओगोंग जी नामक प्राचीन ग्रंथ को समझने की कोशिश करते आए हैं। काओगोंग जी 2500 साल पुराना एक तकनीकी विश्वकोश सरीखा ग्रंथ है। इसमें गाड़ी बनाने, वाद्ययंत्र बनाने से लेकर शहर बनाने तक के निर्देश-नियम दिए गए हैं। इसमें कांसे की वस्तुओं जैसे कुल्हाड़ी, तलवार और अनुष्ठानों में उपयोग होने वाले पात्रों को ढालने की भी छह विधियां बताई गई हैं। ये तरीके दो प्रमुख पदार्थों पर आधारित हैं: शिन और शाय। पूर्व विश्लेषणों में वैज्ञानिकों ने बताया था कि शिन और शाय कांसे के घटक (तांबा और टिन) हैं। लेकिन फिर भारी मात्रा में सीसा कहां से आया?
तो वास्तव में शिन और शाय क्या होंगे, इसे बेहतर समझने के लिए शोधकर्ताओं ने प्राचीन कांस्य सिक्कों के रासायनिक विश्लेषणों को फिर से देखा। उनके अनुसार इनमें से अधिकांश सिक्के संभवत: दो खास मिश्र धातुओं को मिलाकर बनाए गए थे – पहली तांबा, टिन व सीसा की मिश्र धातु, और दूसरी तांबा व सीसा की मिश्र धातु।
एंटीक्विटी में प्रकाशित में नतीजों के अनुसार शिन और शाय तांबा और टिन नहीं इन दो मिश्र धातुओं के द्योतक हैं। ऐसा लगता है कि मिश्र धातुओं की सिल्लियां किसी अन्य जगह तैयार होती थीं, फिर इन्हें ढलाईघर पहुंचाया जाता था। इन सिल्लियों का उपयोग प्राचीन चीन में धातुओं के उत्पादन, परिवहन और आपूर्ति के जटिल नेटवर्क का अंदाज़ा देता है। संभवत: यह नेटवर्क अनुमान से कहीं बड़ा था।
कुछ वैज्ञानिकों को लगता है कि इस बात के कोई ठोस प्रमाण नहीं हैं कि शिन और शाय शुद्ध तांबा और टिन नहीं बल्कि पहले से तैयार मिश्र धातु हैं। हो सकता है कि काओगोंग जी वास्तविक निर्माताओं द्वारा नहीं, बल्कि प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा लिखा गया था। तो हो सकता है कि उन्होंने प्रमुख सामग्री – तांबा और टिन – का ही उल्लेख किया हो, अन्य का नहीं।
बहरहाल कांस्य वस्तुओं के निर्माण की तकनीक से उनसे जुड़ी सभ्यताओं को समझने में मदद मिलती है। (स्रोत फीचर्स)
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जब कैलोरी बर्न करने की बात आती है तो लोगों का ध्यान सरपट सैर, साइकिल चलाना या ऐसे ही व्यायामों की ओर जाता है, चबाने का तो विचार तक नहीं आता। अब, एक नवीन अध्ययन बताता है कि दिन भर में हमारे द्वारा खर्च की जाने वाली कुल ऊर्जा में से लगभग 3 प्रतिशत ऊर्जा तो चबाने की क्रिया में खर्च होती है। कुछ सख्त या रेशेदार चीज़ चबाएं तो थोड़ी और अधिक ऊर्जा खर्च होगी। हालांकि यह ऊर्जा चलने या पाचन में खर्च होने वाली ऊर्जा से बहुत कम है, लेकिन अनुमान है कि इसकी भूमिका हमारे पूर्वजों के चेहरे को नया आकार देने में रही।
ऐसा माना जाता रहा है कि हमारे जबड़ों की साइज़ और दांतों का आकार चबाने को अधिक कुशल बनाने के लिए विकसित हुआ था। जैसे-जैसे हमारे होमिनिड पूर्वज आसानी से चबाने वाले भोजन का सेवन करने लगे और भोजन को काटने-पीसने और पकाने लगे तो जबड़ों और दांतों का आकार भी छोटा होता गया। लेकिन यह जाने बिना कि हम दिनभर में चबाने में कितनी ऊर्जा खर्च करते हैं, यह बता पाना मुश्किल है कि क्या वाकई ऊर्जा की बचत ने इन परिवर्तनों में भूमिका निभाई थी।
यह जानने के लिए मैनचेस्टर विश्वविद्यालय की जैविक मानव विज्ञानी एडम वैन केस्टरेन और उनके दल ने 21 प्रतिभागियों द्वारा खर्च की गई ऑक्सीजन और उत्पन्न कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा का मापन किया। इसके लिए प्रतिभागियों को एक हेलमेट जैसा यंत्र पहनाया गया था। फिर उन्हें 15 मिनट तक चबाने के लिए चुइंगम दी। यह चुइंगम स्वादहीन, गंधहीन और कैलोरी-रहित थी। ऐसा करना ज़रूरी था अन्यथा पाचन तंत्र सक्रिय होकर ऊर्जा की खपत करने लगता।
चबाते समय प्रतिभागियों द्वारा प्रश्वासित वायु में कार्बन डाईऑक्साइड का स्तर बढ़ा हुआ पाया गया। यह दर्शाता है कि चबाने पर शरीर ने अधिक कार्य किया। जब चुइंगम नर्म थी तब प्रतिभागियों का चयापचय औसतन 10 प्रतिशत बढ़ा। सख्त चुइंगम के साथ चयापचय में 15 प्रतिशत तक वृद्धि देखी गई। यह प्रतिभागियों द्वारा दिन भर में खर्च की गई कुल ऊर्जा का 1 प्रतिशत से भी कम है लेकिन मापन-योग्य है। ये नतीजे साइंस एडवांसेस पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं।
शोधकर्ताओं के मुताबिक इससे पता चलता है कि खाना पकाना और औज़ारों का इस्तेमाल शुरू होने से पहले आदिम मनुष्य चबाने में बहुत अधिक समय बिताते होंगे। यदि प्राचीन मनुष्य दिन भर में वर्तमान गोरिल्ला और ओरांगुटान जितना भी चबाते होंगे तो शोधकर्ताओं का अनुमान है कि वे दिन भर में खर्च हुई कुल ऊर्जा का कम से कम 2.5 प्रतिशत चबाने में खर्च करते होंगे।
ये नतीजे इस विचार का समर्थन करते हैं कि चबाने में सुगमता आने से वैकासिक लाभ मिला। चबाने में लगने वाली ऊर्जा की बचत का उपयोग आराम, मरम्मत और वृद्धि जैसी अन्य चीज़ों पर हुआ होगा।
चबाने में मनुष्यों द्वारा खर्च होने वाली ऊर्जा गणना से अन्य होमिनिड्स के विकास के बारे में भी एक झलक मिल सकती है। मसलन 20 लाख से 40 लाख साल पूर्व रहने वाले ऑस्ट्रेलोपिथेकस के दांत आधुनिक मनुष्यों की तुलना में चार गुना बड़े थे और उनके जबड़े विशाल थे। वे चबाने में अधिक ऊर्जा लगाते होंगे।
अन्य शोधकर्ता इस बात से सहमत नहीं है कि सिर्फ ऊर्जा की बचत ने जबड़ों और दांत के विकास का रुख बदला। इसमें अधिक महत्वपूर्ण भूमिका अन्य कारकों की हो सकती है, जैसे ऐसे आकार के जबड़े विकसित होना जो दांतों के टूटने या घिसने की संभावना कम करते हों। प्राकृतिक चयन में संभवत: ऊर्जा दक्षता की तुलना में दांतों की सलामती को अधिक तरजीह मिली होगी, क्योंकि दांतों के बिना भोजन खाना मुश्किल है, और ऊर्जा मिलना भी। (स्रोत फीचर्स)
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