दुनिया जलवायु परिवर्तन (climate change) के चलते आज भीषण सूखे, बाढ़, बारिश, अत्यधिक ठंड एवं गर्मी से जूझ रही है। लेकिन अब जलवायु परिवर्तन के चलते नेपाल के भोटकेशी और त्रिशूली में विनाशकारी बाढ़ से जो तबाही हुई है, उसकी आपूर्ति के लिए नेपाल ने मानवीय मदद और दान लेने की बजाय अंतर्राष्ट्रीय मंचों से ‘जलवायु मुआवजा’ (climate compensation) और न्याय देने की मांग उठाना शुरू कर दी है। नेपाल की यह मांग न्यायसंगत है क्योंकि कुल वैश्विक कार्बन डाईऑक्साइड (जलवायु परिवर्तन का प्रमुख उत्तरदायी) उत्सर्जन में नेपाल की भागीदारी मात्र 0.05 प्रतिशत है। यदि सभी प्रकार की ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को जोड़ लिया जाए, तब भी यह हिस्सेदारी केवल 0.08 प्रतिशत की होती है। अतएव नेपाल का कहना है कि विकसित या विकासशील देशों द्वारा तात्कालिक राहत सामग्री भेजना पर्याप्त नहीं है, इस त्रासदी के लिए ज़िम्मेदार ग्रीनहाउस गैसों के बड़े उत्सर्जक देशों को आर्थिक मुआवज़ा देना होगा। साफ है नेपाल अब जलवायु न्याय और कानूनी मुआवज़े की मांग को प्राथमिकता दे रहा है।
नेपाल का तर्क है कि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन (global carbon emission) में उसकी भागीदारी न्यूनतम है, लेकिन उसे हिमखंड पिघलने के सबसे गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है। नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र के ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ (loss and damage fund) से 5 अरब डॉलर की तत्काल जलवायु राहत देने की मांग की है। संयुक्त राष्ट्र के इस कोश से जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली क्षति की पूर्ति का प्रावधान है। यह एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक बदलाव का संकेत है। नेपाल ने विश्व समुदाय के सामने बेबाकी से यह बात कही है। इस मांग को रखते हुए नेपाल ने दो टूक शब्दों में यह भी कहा है कि औद्योगिक कार्बन उत्सर्जक देशों में चीन, अमेरिका और भारत इस त्रासदी के लिए उत्तरदायी हैं। इन्हीं के उद्योगों से जो कार्बन उत्सर्जन हो रहा है, उसके प्रभाव से हिमालय के हिमखंड (himalyan glaciers) दुनिया के बाकी हिमखंडों की तुलना में तीन गुना तेज़ी से पिघल रहे हैं।
नेपाल ने चीन से इस बात पर भी नाराज़गी जताई है कि उसने 26 अगस्त को तिब्बत में हिमखंड टूटने (glacier break) की जानकारी समय रहते नहीं दी। इस कारण नेपाल को अपने लोगों को बचाने का समय नहीं मिल पाया।
धरती पर रहने वाले जीवन पर करीब तीन दशक से जलवायु परिवर्तन के वर्तमान और भविष्य में होने वाले संकटों की तलवार लटकी हुई है। इस संकट से निपटने के उपाय तलाशने की दृष्टि से प्रतिवर्ष जलवायु सम्मेलन (climate summit) होता है। परिचर्चाओं और वाद-विवाद से निकले निष्कर्ष चेताते रहे हैं कि कोयला, तेल और गैस अर्थात जीवाश्म ईंधन इस संकट के दोषी हैं। अतएव इनका उपयोग धीरे-धीरे खत्म करना होगा। लेकिन सहमति बनती नहीं है। विकासशील देश इस बात को लेकर असहमत रहते हैं कि समझौते में जो शर्तें दर्ज रहती हैं, एक तो वे पूरी तरह स्पष्ट नहीं होती, दूसरे उन्हें अमीर देशों की आर्थिक मदद के बिना पूरा करना आसान नहीं होता। इस सम्मेलन का एक ही प्रमुख लक्ष्य था कि दुनिया उस रास्ते पर लौटे, जिससे वैश्विक तापमान वृद्धि को औद्योगिक विश्व के पहले के तापमान से 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जा सके। 100 से ज़्यादा देश 2030 तक दुनिया की नवीनीकरणीय ऊर्जा को बढ़ाकर तीन गुना करने पर सहमत भी हैं। इसके अंतर्गत अक्षय ऊर्जा के प्रमुख स्रोत सूर्य, पवन और पानी से बिजली बनाने के उपाय सुझाए गए हैं। इस सिलसिले में प्रेरणा के रूप में ऊरुग्वे जैसे देश का उदाहरण दिया जाता है, जो अपनी ज़रूरत की 98 फीसदी ऊर्जा इन्हीं स्रोतों से प्राप्त करता है। लेकिन यह एक अपवाद है; हकीकत यह है कि यूक्रेन और रूस तथा इस्राइल और हमास और अमेरिका व ईरान के बीच चलते भीषण युद्ध के कारण कोयले जैसे जीवाश्म ईंधन से ऊर्जा उत्पादन बढ़ा है और बिजली उत्पादन के जिन कोयला संयंत्रों को बंद कर दिया गया था, उनका उपयोग फिर से शुरू हो गया है।
दुनिया में चीन सबसे ज़्यादा (30-33 प्रतिशत) कार्बन उत्सर्जित करता है। इसके बाद अमेरिका की भागीदारी करीब 11 से 14 प्रतिशत और भारत की हिस्सेदारी 7 से 8 फीसदी है। 2015 में हुए ऐतिहासिक पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते (Paris agreement) को तब बड़ा झटका लगा था, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे खारिज कर दिया था। तब ये आशंकाएं उठी थीं कि वैश्विक समस्याओं पर अब आगे कोई सहमति शायद नहीं बन पाएगी। फिलहाल तो यह कहना भी मुश्किल है कि नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र के ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ से 5 अरब डॉलर की जो मांग की है वह उसे मिल ही जाएगी।
अपने औद्योगिक हितों (industrial profits) की चिंता और अमेरिका प्रथम की अवधारणा वाले डोनाल्ड ट्रंप और उनका अमेरिका मानने लगा है कि जलवायु परिवर्तन और बढ़ता वैश्विक तापमान एक खोखली शंका है। वहां देश की जीडीपी दर और आर्थिक संपन्नता घटने की बात भी कही जा रही है। साफ है कि अमेरिका के लिए स्वहित सर्वोपरि है। लेकिन अमेरिका आगे आकर निजी और संयुक्त राष्ट्र के स्तर पर नेपाल की मदद हेतु कोई पहल करे, तभी अन्य देश नेपाल की मदद के लिए आगे आएंगे। (स्रोत फीचर्स)
प्रकृति में ततैया (wasp) की भूमिका केवल डंक मारने वाले कीट की नहीं है। वह परागण में योगदान देने के साथ-साथ प्राकृतिक शिकारी के रूप में कई दूसरे कीटों की संख्या नियंत्रित करने वाले कीट के रूप में भी महत्वपूर्ण है। हाल ही में ब्रिटेन में हुए एक अध्ययन से पता चला कि वर्ष 2025 में ततैयों की संख्या असामान्य रूप से अधिक रही थी, जबकि 2026 की गर्मियों में कई इलाकों में वे बहुत कम दिखाई दीं। वैज्ञानिकों की चिंता है कि मौसम में बढ़ती अनिश्चितताएं इस प्राकृतिक उतार-चढ़ाव को और तेज़ तथा अप्रत्याशित बना सकती हैं।
सवाल यह है कि अगर बदलते मौसम के कारण ततैयों की संख्या और उनके जीवन-चक्र में बदलाव आ रहा है, तो क्या इसका असर केवल ततैयों पर पड़ेगा या पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) पर?
अपने देश में ततैयों की विविधता काफी बड़ी (diverse) है। वर्ष 2020 में प्रकाशित भारत में Vespidae परिवार की विस्तृत सूची के अनुसार देश में ततैया परिवार की 288 प्रजातियां, 60 वंश और पांच उपकुल दर्ज किए गए थे। ये प्रजातियां देश के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में पाई जाती हैं।
ततैयों की वास्तविक विविधता इससे भी अधिक हो सकती है, क्योंकि देश के कई हिस्सों में इन पर पर्याप्त अध्ययन नहीं हुआ है। वर्ष 2023 में भारतीय उपमहाद्वीप की ततैयों पर प्रकाशित एक समीक्षा में ततैयों की कम से कम 104 प्रजातियां दर्ज की गई थीं। शोधकर्ताओं ने यह भी रेखांकित किया कि इनकी जैविकी और पारिस्थितिकी के बारे में उपलब्ध जानकारी अभी सीमित (limited knowledge) है।
मौसम से जुड़ा जीवन–चक्र
सामाजिक ततैयों (social wasps) की कॉलोनी की शुरुआत आम तौर पर एक रानी से होती है। मौसम अनुकूल होने पर रानी सुरक्षित जगह तलाशती है, घोंसला बनाती है और शुरुआती कामगारों को जन्म देती है। इसके बाद कामगारों की संख्या बढ़ती जाती है और कॉलोनी विकसित होती है।
मौसम में बदलाव का असर शुरुआती चरण पर पड़ सकता है। तापमान, बारिश, नमी और भोजन की उपलब्धता जैसी परिस्थितियां यह तय कर सकती हैं कि कितनी रानियां सफलतापूर्वक कॉलोनी स्थापित (colony establishment) कर पाएंगी।
वसंत, गर्मी और मानसून का चक्र कई क्षेत्रों में अलग-अलग है। हिमालय, पूर्वोत्तर, पश्चिमी घाट, मध्य भारत और शुष्क पश्चिमी भारत में ततैयों के लिए परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। लेकिन इससे एक महत्वपूर्ण शोध प्रश्न जरूर निकलता है क्या भारत में भी मौसम की बढ़ती अनिश्चितता ततैयों के प्राकृतिक जीवन चक्र (natural life cycle) को प्रभावित कर रही है या करेगी?
पूर्वोत्तर से पश्चिमी घाट तक
हाल के शोध इस बात का संकेत देते हैं कि ततैयों की विविधता और उनका पर्यावरण (diversity & environment relation) से सम्बंध कितना व्यापक है। वर्ष 2026 में प्रकाशित तवांग, अरुणाचल प्रदेश के एक अध्ययन में 19 प्रजातियां दर्ज की गईं। इसी अध्ययन में अरुणाचल प्रदेश में Vespidae की 73 प्रजातियों और 27 वंशों की सूची तैयार की गई।
पश्चिमी घाट के गोवा क्षेत्र में किए गए एक अध्ययन में वर्ष 2019 के दौरान 231 ततैया नमूनों की पहचान की गई, जो 19 प्रजातियों, 12 वंशों और Vespidae के चार उपपरिवारों से संबंधित थे। वन क्षेत्र में 19 प्रजातियां मिलीं, जबकि कृषि क्षेत्र में 13 प्रजातियां दर्ज हुईं।
असम में गुवाहाटी विश्वविद्यालय परिसर में वर्ष 2022-23 के दौरान किए गए अध्ययन में ततैया और मधुमक्खियों की 23 प्रजातियां दर्ज की गईं। यहां ततैयों की संख्या में मौसमी बदलाव (weather influence) देखा गया और मानसून के महीनों में उनकी उपस्थिति सर्वाधिक रही।
ये आंकड़े बताते हैं कि ततैयों की आबादी मौसम और आवास के साथ बदलती है और अलग-अलग पारिस्थितिक क्षेत्रों (ecosystem areas) में इनका अध्ययन ज़रूरी है।
ततैया हमारी दुश्मन नहीं
ततैया को आम तौर पर मधुमक्खी के मुकाबले कम पसंद किया जाता है। मधुमक्खी से शहद मिलता है, वह परागण (pollination) करती है और कृषि के लिए उपयोगी मानी जाती है। ततैया को अक्सर केवल उसके डंक और उसके घोंसले से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन यह तस्वीर अधूरी है।
कई ततैया प्रजातियां दूसरे कीटों का शिकार करती हैं। वे मक्खियों, इल्लियों (कैटरपिलर्स) और दूसरे छोटे कीटों को पकड़कर अपनी संतानों को खिलाती हैं। इस तरह वे प्राकृतिक कीट नियंत्रण (biological insect control) में अहम भूमिका निभाती हैं।
कुछ ततैया परागण में भी योगदान देती हैं। हाल के वर्षों में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हुए अध्ययनों ने यह दिखाया है कि गैर-मधुमक्खी परागणकर्ताओं को लंबे समय तक अपेक्षाकृत कम महत्व दिया गया है।
मधुमक्खी से अलग है ततैया
ततैया को अक्सर मधुमक्खी समझ लिया जाता है, जबकि दोनों में महत्वपूर्ण अंतर हैं। मधुमक्खियां मुख्यतः फूलों के रस और पराग पर निर्भर रहती हैं और परागण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसके विपरीत, ततैयों की कई प्रजातियां दूसरे कीटों का शिकार करती हैं (parasitoids)। मधुमक्खियों का शरीर अपेक्षाकृत रोएंदार होता है, जबकि ततैयों का शरीर चिकना और पतला दिखाई देता है। कई ततैया बार-बार डंक मार सकती हैं, जबकि कामगार शहद मधुमक्खी आमतौर पर डंक मारने के बाद मर जाती है।
कीट नियंत्रण
ततैयों की भूमिका को केवल जैव विविधता के नज़रिए से देखना उपयुक्त नहीं है। कृषि में प्राकृतिक कीट नियंत्रण का महत्व तेज़ी से बढ़ रहा है।
अगर कुछ ततैया प्रजातियां खेतों में फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों का शिकार करती हैं, तो उनकी मौजूदगी किसानों के लिए एक प्राकृतिक (इकॉलॉजिकल) सेवा है। दूसरी ओर, अत्यधिक कीटनाशक इस्तेमाल, आवास का नुकसान और बदलता मौसम इनकी संख्या को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए कीट नियंत्रण की ऐसी रणनीति ज़रूरी है जिसमें ‘हानिकारक कीट’ और ‘उपयोगी शिकारी कीट’ के बीच अंतर किया जाए। हर ततैया को नष्ट कर देना कीट नियंत्रण नहीं है। कई बार यह प्राकृतिक नियंत्रण की एक महत्वपूर्ण कड़ी (chains of natural control) को खत्म करना भी साबित हो सकता है।
जलवायु परिवर्तन: असली खतरा
जलवायु परिवर्तन का अर्थ केवल औसत तापमान का बढ़ना नहीं है। मौसम के समय और तीव्रता में बदलाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है। बहुत गर्म दिन, अचानक बारिश, लंबे सूखे, असामान्य ठंड या मानसून के आने-जाने में बदलाव ये सभी उन कीटों के जीवन-चक्र को प्रभावित कर सकते हैं जिनकी गतिविधियां मौसम से गहराई से जुड़ी हैं (weather dependent life-cycle)।
ततैयों के मामले में शुरुआती मौसम विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है। अगर रानियां (queen wasp) ऐसे समय में बाहर निकलती हैं जब भोजन उपलब्ध नहीं है या अत्यधिक गर्मी और बारिश के कारण घोंसला बनाना मुश्किल है, तो उस वर्ष कॉलोनियों की संख्या प्रभावित हो सकती है।
दूसरी ओर, अनुकूल मौसम बड़े पैमाने पर कॉलोनियों के विकास को बढ़ावा दे सकता है।
शोध की कमी चिंता का विषय
भारत में ततैयों की प्रजातियों की सूची तैयार करने का काम हुआ है, लेकिन उनकी आबादी में दीर्घकालीन बदलावों (long term changes) को दर्ज करने वाले व्यवस्थित अध्ययन बहुत कम हैं। इसलिए ततैयों की निगरानी को जैव विविधता की व्यापक निगरानी का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
स्कूलों, विश्वविद्यालयों, कृषि संस्थानों और विज्ञान कार्यक्रमों के माध्यम से भी ऐसे आंकड़े जुटाए जा सकते हैं। लोग अपने आसपास दिखाई देने वाली ततैयों की प्रजातियों, संख्या, मौसम और स्थान की जानकारी दर्ज कर सकते हैं। इस तरह कई वर्षों में तैयार हुआ आंकड़ा (data) महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
सवाल सिर्फ ततैयों का नहीं जलवायु परिवर्तन के दौर में प्रकृति के संकेत (nature’s calamatous signals) अक्सर बहुत सूक्ष्म होते हैं। किसी पक्षी का समय से पहले लौटना, किसी पेड़ का असमय फूलना, तितलियों की संख्या में बदलाव या किसी कीट का अचानक कम दिखाई देना, ये सभी बड़े बदलावों की शुरुआती सूचनाएं हो सकते हैं। ततैया भी ऐसा ही एक संकेत हो सकती है। (स्रोत फीचर्स)
हम सबने मनुष्य की सहूलियत के लिए बड़े से लेकर छोटे शहरों को तेज़ी से क्रॉन्कीट के जंगलों (concrete forests) में तब्दील होते देखा है। पहले तो शहरों के और फिर शहरों के आसपास के खेतों और जंगलों में नैसर्गिक रूप से लगे पेड़ों की धड़ल्ले से कटाई हुई और उनकी जगह इमारतों और इंफ्रास्ट्रक्चर ने ले ली।
जब गर्माती दुनिया और बदलती जलवायु की समस्या ने पैर पसारे तो वनीकरण, वृक्षारोपण और शहरी हरितीकरण (green cities) के प्रयास शुरू हुए। शहरों को हरा-भरा करने के एक प्रयास में शहरों में सड़कों के किनारे, बाग-बगीचों में लगाने के लिए ऐसे पेड़-पौधे चुन लिए जाते हैं जो तेज़ी से बड़े हो सकें; इससे शहर में जल्द हरियाली दिखने लगती है। लेकिन इस तरह के पेड़ों के चुनाव के अपने जोखिम हैं। वनीकरण और हरितीकरण के लिए कुछ पेड़-पौधों को चुनने से जैव-विविधता में कमी का जोखिम तो है ही, लेकिन एक हालिया अध्ययन बताता है कि ये पेड़-पौधे वायु प्रदूषण बढ़ाने में एक बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।
पेड़ की वायु प्रदूषण में भूमिका, यह बात सुनकर हैरत हो सकती है। लेकिन कुछ पेड़ों से प्रकाश संश्लेषण के समय उत्सर्जित होने वाले वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) (Volatile organic compounds) और वायुमंडल में मौजूद नाइट्रोजन ऑक्साइड्स की अभिक्रिया से ओज़ोन बनती है। वायुमंडल की निचली परतों में ओज़ोन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है। इससे श्वास नली में सूजन, दमा और फेफड़ों सम्बंधी समस्याएं हो सकती हैं।
यहां गौरतलब बात यह है कि पेड़ों से उत्सर्जित VOC खुद वायु प्रदूषण (air pollution) में योगदान नहीं देते हैं, बल्कि जब ये मनुष्य की गतिविधियों के चलते उत्सर्जित होने वाले नाइट्रोजन ऑक्साइड्स (NOx) से अभिक्रिया करते हैं, तब वे हानिकारक ओज़ोन बनाते हैं। एक और गौरतलब बात यह है कि VOCs महज़ वनस्पतियों द्वारा उत्सर्जित नहीं होते, मनुष्य द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली तमाम खुशबूदार चीज़ों, जीवाश्म ईंधनों, रसायन उद्योग वगैरह भी VOC उत्सर्जन का कारण हैं।
चीन की जिनान युनिवर्सिटी के वायुमंडल रसायन विज्ञानी बिन युआन ओज़ोन प्रदूषण (ozone pollution) पर मानवीय गतिविधियों के असर समझने की कोशिश रहे थे, तभी कुछ आंकड़ों ने उन्हें चौंकाया – उन्होंने पाया कि शहरी पेड़-पौधे ओज़ोन उत्सर्जन में पूर्व-अनुमानित स्तर से कहीं ज़्यादा योगदान दे रहे थे। इन आंकड़ों ने उन्हें आगे अध्ययन को उकसाया।
यह तो मालूम था कि कई वनस्पति प्रजातियां VOCs उत्सर्जित करती हैं, और कुछ प्रजातियां अन्य की तुलना में ज़्यादा VOCs उत्सर्जित करती हैं। इन प्रजातियों में वीपिंग विलो (Salix babylonica) और पॉपलर (Populus वंश) के पेड़ शामिल हैं। ये पेड़ आजकल शहरों को जल्दी हरा-भरा बनाने के लिए लगाए जा रहे हैं, खासकर चीन के शहरों में। भारत के शहरी बगीचों और सड़कों के किनारे भी आजकल वीपिंग विलो (weeping willow) काफी दिखाई देते हैं, और पॉपलर के पेड़ व्यावसायिक दृष्टि से शहरों के बाहर काफी लगाए जा रहे हैं। ये पेड़ बड़ी मात्रा में आइसोप्रीन (isoprene) नामक यौगिक का उत्सर्जन करते हैं जो एक प्रकार का VOC है और प्रकाश संश्लेषण के उप-उत्पाद के रूप में बनता है।
शोधकर्ताओं ने अपना अध्ययन चीन के बीज़िंग शहर पर केंद्रित किया। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने बीजिंग शहर की हवा के नमूने लिए, साथ ही शहर के आसपास के निगरानी केंद्रों से ओज़ोन सम्बंधी डैटा लिया। उन्होंने पाया कि मई 2021 से जुलाई 2021 के बीच बीजिंग में कुल VOC उत्सर्जन में पेड़-पौधों का योगदान लगभग 10 प्रतिशत था, बाकी हिस्सा मानवीय गतिविधियों (Human practices) से आया था।
उन्होंने 24 अन्य बड़े शहरों में लगाए गए पेड़ों की प्रजातियों का भी अध्ययन किया ताकि उनके द्वारा होने वाले संभावित आइसोप्रीन उत्सर्जन (emissions) का अंदाज़ मिल सके। पाया गया कि बीजिंग में लगभग 35 प्रतिशत पेड़ ऐसे हैं जो आइसोप्रीन उत्सर्जन करते हैं। और तो और सिडनी, मेलबर्न समेत ज़्यादातर शहरों में आइसोप्रीन का उत्सर्जन बीजिंग से भी ज़्यादा है। मसलन सिडनी में लगभग 65 प्रतिशत पेड़ आइसोप्रीन उत्सर्जन करने वाले हैं।
चूंकि VOC सीधे ओज़ोन नहीं बनाते हैं, इसलिए शहर के ओज़ोन प्रदूषण में पेड़-पौधों के योगदान का आकलन करने के लिए उन्होंने एक तरीका अपनाया। उन्होंने देखा कि वातावरण में VOCs कितनी तेज़ी से हाइड्रॉक्सिल मूलकों के साथ अभिक्रिया करते हैं। दरअसल, हाइड्रॉक्सिल VOCs के साथ अभिक्रिया करके पेरोक्सी रेडिकल (peroxy radicle) बनाते हैं, जो हवा में मौजूद नाइट्रोजन ऑक्साइड के साथ अभिक्रिया करके ऐसे यौगिक बनाते हैं जो सूर्य के प्रकाश में ओज़ोन में बदल जाते हैं। पाया गया कि ओज़ोन बनाने वाले रसायन में 52 प्रतिशत हिस्सा पेड़-पौधों का था, आइसोप्रीन मुख्य योगदानकर्ता था।
हालांकि मानवीय गतिविधियों से होने वाला कुल VOC उत्सर्जन पेड़-पौधों से होने वाले उत्सर्जन से ज़्यादा था, लेकिन ओज़ोन बनने में उनका योगदान पेड़-पौधों की तुलना में कम था।
यह तो जानी-मानी बात है कि तापमान बढ़ने के साथ VOCs और ओज़ोन का उत्पादन बढ़ता है। पाया गया कि 35 डिग्री सेल्सियस पर VOCs के साथ हाइड्रॉक्सिल की अभिक्रिया दर 20 डिग्री सेल्सियस की तुलना में सात गुना ज़्यादा थी।
शोधकर्ताओं ने बीजिंग के शहरी गर्म टापू प्रभाव (शहरी इलाकों का आसपास के इलाकों की तुलना में ज़्यादा गर्म होना) पर भी विचार किया। अनुमान है कि गर्मियों में दिन के समय, जब अधिकतम तापमान 32 डिग्री सेल्सियस होता है, तब शहर में 0.8 डिग्री सेल्सियस की अधिकता आइसोप्रीन उत्सर्जन को 12 प्रतिशत तक बढ़ा सकती है। यानी गर्माती पृथ्वी (global warming) शहरी पेड़-पौधों से होने वाले VOC उत्सर्जन को और भी बढ़ा सकती है।
यहां सचेत रहने वाली कुछ बातें हैं। एक यह कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वातावरण में VOC उत्सर्जन का एक बड़ा हिस्सा मानवीय गतिविधियों के कारण पहुंचता है, जिसे थामने की ज़रूरत है। साथ ही साथ NOx उत्सर्जन को कम करने की भी ज़रूरत है क्योंकि VOC और इनकी आपसी अभिक्रिया से ही ओज़ोन बनती है – NOx के बिना VOCs ओज़ोन प्रदूषण में योगदान नहीं दे सकते।
दूसरा यह कि साइंस एडवांसेज़ में प्रकाशित अध्ययन के इन नतीजों का मतलब यह नहीं है कि हमें पेड़ नहीं लगाने चाहिए। पेड़ों के कई फायदे हैं, जिन्हें यहां गिनाने की ज़रूरत नहीं लगती। ज़रूरत है कि शहरों का हरितीकरण करते समय शहरों और जलवायु के अनुकूल (climate adaptive trees) पेड़-पौधे चुने जाएं।
वैसे भारत के संदर्भ में भी VOC उत्सर्जक पेड़ों के असर को मापना दिलचस्प होगा क्योंकि यहां के शहरों में भी वीपिंग विलो अब काफी देखने को मिलते हैं, और पॉपलर के पेड़ों को उनके व्यवसायिक उपयोग के लिए शहरों के बाहर लगाया जा रहा है। (स्रोत फीचर्स)
रोशनी को प्रगति और विकास का प्रतीक माना गया है। लेकिन अंधकार पर विजय पाने की इस होड़ की एक भारी पारिस्थितिक और स्वास्थ्य सम्बंधी कीमत चुकानी पड़ रही है। आज प्रकाश प्रदूषण (light pollution) एक ऐसे संकट के रूप में उभर चुका है, जिसे फिलहाल भारत सहित दुनिया भर में प्रदूषण की श्रेणी में गंभीरता से स्वीकार नहीं किया जाता।
भारतीय शहरों की स्थिति
क्लाइमेट स्टार्टअप प्राणा एयर और उपग्रह अध्ययनों के अनुसार, दुनिया की 80 प्रतिशत आबादी और भारत की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी हर रात कृत्रिम रूप से आलोकित आकाश (illuminated sky) तले जीवनयापन कर रही है। 2014 से 2022 के बीच दुनिया में रात के समय कृत्रिम रोशनी लगभग 16 प्रतिशत बढ़ी है।
भारत के महानगरों में रात का प्राकृतिक अंधेरा लगभग गायब हो चुका है। सामान्य प्राकृतिक रात की तुलना में:
– नई दिल्ली में रातें 61 गुना ज़्यादा चमकीली हो चुकी हैं।
– बेंगलुरु में 59 गुना, मुंबई में 52 गुना और इंदौर में 42 गुना अधिक चमक दर्ज की गई है।
– प्रयागराज में कुंभ मेले के दौरान यह चकाचौंध 91 गुना तक पहुंच गई थी, जो देश में सर्वोच्च स्तर है।
एलईडी का विरोधाभास
भारत में प्रकाश प्रदूषण के तेज़ी से बढ़ने की मुख्य वजह ऊर्जा-दक्ष तकनीकों (energy efficient technology) का अनियंत्रित उपयोग है। ‘उजाला योजना’ के तहत देश भर में 36 करोड़ से अधिक एलईडी बल्ब वितरित किए गए और पिछले एक दशक में स्थानीय निकायों द्वारा 1.34 करोड़ से ज़्यादा नई सड़क बत्तियां (स्ट्रीट लाइटें) लगाई गईं।
हालांकि सोडियम वैपर लाइट (sodium vapour light) की तुलना में एलईडी 8 गुना अधिक रोशनी देती है और बिजली बचाती है, लेकिन रोशनी का उपयोग बेहद सस्ता होने के कारण आवश्यकता से अधिक लाइटिंग की जाने लगी है। अर्थशास्त्र में इसे ‘जेवन्स विरोधाभास’ (Jevons Paradox) कहते हैं। जेवन्स विरोधाभास एक आर्थिक अवधारणा है। यह बताता है कि जब कोई उपकरण किसी संसाधन के उपयोग को अधिक कुशल बनाता है, तो उस संसाधन की कुल खपत कम होने की बजाय बढ़ जाती है। बेहतर दक्षता के कारण संसाधन का उपयोग सस्ता हो जाता है, जिससे समग्र मांग में भारी वृद्धि होती है। इसके अलावा, देश में मौजूद 35 करोड़ से अधिक वाहनों की हेडलाइट्स ने रातों के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया है।
जैव–विविधता पर प्रहार
पृथ्वी पर जीवन का विकास 3.8 अरब वर्षों से 24 घंटे के प्रकाश-अंधकार चक्र (Circadian Rhythm) के तहत हुआ है। यदि यह गड़बड़ता है तो स्वभाविक है कि इसके असर भी होंगे।
प्रवासी पक्षियों पर असर: वर्ष 2024 में नवी मुंबई के नेरुल स्थित डीपीएस फ्लेमिंगो लेक में लगाई गई अत्यधिक चकाचौंध वाली एलईडी लाइटों (high voltage LED’s) के कारण हज़ारों किलोमीटर दूर से आए प्रवासी पक्षी दिशा भ्रमित हो गए और आसपास की इमारतों से टकराकर मर गए।
कीटों और परागण का नुकसान: रात्रिचर कीट (पतंगे, जुगनू) तेज़ रोशनी में भटककर अपनी ऊर्जा खो देते हैं। जर्नल ऑफ एप्लाइड इकोलॉजी के अनुसार, एलईडी लाइट वाले क्षेत्रों में कीटों के लार्वा की आबादी में 52 प्रतिशत तक की कमी आई है, जिससे फसलों का प्राकृतिक परागण ठप हो रहा है।
मानव स्वास्थ्य
अंधेरा होते ही मस्तिष्क की पीनियल ग्रंथि मेलाटोनिन नामक हार्मोन (melatonin hormone) का स्राव करती है, जो गहरी नींद के लिए ज़रूरी है। इसके अलावा यह प्रतिरक्षा प्रणाली को मज़बूत करने और कैंसर कोशिकाओं को रोकने में भी भूमिका निभाता है। रात में एलईडी व स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी (तरंग दैर्घ्य 450–480 नैनोमीटर) मेलाटोनिन का बनना रोक देती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की कैंसर अनुसंधान एजेंसी (IARC) ने अत्यधिक रात्रि प्रकाश और नाइट-शिफ्ट वर्क को ‘संभावित कैंसरकारी’ (Group 2A) में वर्गीकृत किया है। यह वर्गीकरण शरीर की जैविक घड़ी में बाधा, मेलाटोनिन हार्मोन के कम उत्पादन और पशुओं पर किए गए शोध के आधार पर तय किया गया है।
भारत में नीतिगत शून्य
दुनिया के कई देशों ने इसे कानूनी रूप से नियंत्रित करना शुरू कर दिया है। चेक गणराज्य में स्ट्रीट लाइटों को ज़मीन पर फोकस न करके आसमान में रोशनी फैलाने पर 3 लाख रुपये से अधिक का जुर्माना है और सफेद प्रकाश वाली लाइटों (3000K) पर प्रतिबंध है। दरअसल, 3000K यानी 3000 केल्विन तापमान पर कोई ब्लैक बॉडी ऐसा ही प्रकाश पैदा करती है। हैलोजन लैम्प (hallogen lamp) की रोशनी इस तरह की होती है।
फ्रांस में रात 1 बजे के बाद दुकानों/दफ्तरों की बाहरी लाइटें बंद करना अनिवार्य है। जर्मनी में रिहाइशी इलाकों में रात 10 बजे के बाद तेज़ रोशनी प्रतिबंधित है।
भारत की स्थिति: वरिष्ठ पर्यावरणविदों के अनुसार, भारत में वायु, जल या ध्वनि प्रदूषण की तरह प्रकाश प्रदूषण के नियंत्रण के लिए कोई विशिष्ट कानून या राष्ट्रीय नीति नहीं है।
समाधान
प्रकाश प्रदूषण का समाधान बेहद आसान है – रोशनी की दिशा सही करना और बेवजह की चकाचौंध को बंद करना। इसके लिए सिर्फ इतना करना होगा:
– डाउन-शिल्डेड लाइटें (down shielded lights) लगाई जाएं ताकि रोशनी केवल ज़मीन पर पड़े।
– वार्म सीसीटी (<2200K) वाली पीली रोशनी का उपयोग बढ़े।
– लद्दाख के हानले डार्क स्काई रिजर्व जैसी पहलों को बढ़ावा दिया जाए।
प्राकृतिक अंधेरा (natural darkness) कोई अभाव नहीं, बल्कि हमारी पारिस्थितिकी का एक अमूल्य संसाधन (invaluable resource) है। यदि हमने समय रहते रोशनी के इस अतिरेक को नियंत्रित नहीं किया, तो हम न केवल आसमान के तारों को देखने से वंचित हो जाएंगे, बल्कि अपनी सेहत और जैव-विविधता की भी अपूरणीय क्षति कर बैठेंगे। (स्रोत फीचर्स)
पिछली शताब्दी पर नज़र डालें तो औद्योगिक विकास (industrial revolution) की पहचान विशाल कारखानों, ऊंची चिमनियों, इस्पात संयंत्रों और मशीनों की गूंज से होती थी। ये किसी देश की आर्थिक शक्ति और औद्योगिक प्रगति के प्रतीक माने जाते थे। लेकिन इक्कीसवीं सदी में विकास का चेहरा बदल चुका है। आज विशाल, शांत और अत्याधुनिक इमारतें नई अर्थव्यवस्था की धुरी बन रही हैं। इनमें न मशीनों का शोर सुनाई देता है, न धुएं के गुबार उठते हैं, फिर भी दुनिया की लगभग हर डिजिटल गतिविधि की नींव इन्हीं पर टिकी है। इन्हीं नई आधुनिक इमारतों को हम डैटा सेंटर (data centre) के नाम से जानते हैं।
आज मोबाइल से किया गया भुगतान, किसी विद्यार्थी की ऑनलाइन कक्षा, अस्पताल का डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड, किसान के मोबाइल पर पहुंचा मौसम का पूर्वानुमान, सोशल मीडिया पर साझा की गई तस्वीर या कोई भी संवाद, इनमें से कोई भी गतिविधि डैटा सेंटरों के बिना संभव नहीं है। हर डिजिटल क्रिया (digital action) अंतत: किसी न किसी डैटा सेंटर तक पहुंचती है, जहां सूचनाएं संग्रहित होती हैं, उनका विश्लेषण होता है और वे कुछ ही क्षणों में हमारे पास वापस लौट आती हैं।
यही वजह है कि डिजिटल दुनिया जितनी आभासी और अदृश्य दिखाई देती है, उसकी बुनियाद उतनी ही ठोस और वास्तविक है। यह केवल इंटरनेट या सॉफ्टवेयर का संसार नहीं, बल्कि विशाल डैटा सेंटरों, लाखों सर्वरों, निरंतर बिजली आपूर्ति, उच्च क्षमता वाले संचार नेटवर्क और बड़ी मात्रा में ऊर्जा तथा जल जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित विशाल भौतिक अधोसंरचना (giant physical infrastructure) है।
पिछले कुछ वर्षों में कृत्रिम बुद्धि (एआई) (AI) ने इस पूरी व्यवस्था को नई गति दी है। चैटबॉट, भाषा अनुवाद, चित्र निर्माण, वीडियो विश्लेषण, चिकित्सा अनुसंधान और वैज्ञानिक गणनाओं जैसे कार्यों के लिए पहले से कहीं अधिक कंप्यूटिंग क्षमता की आवश्यकता पड़ रही है। इस वजह से दुनिया भर में नए डैटा सेंटर्स के निर्माण की होड़ शुरू हो गई है।
अंतर्राष्ट्रीय शोध के अनुसार वर्तमान में विश्व में लगभग 11,800 डैटा सेंटर संचालित हैं। भारत में भी इनकी संख्या तेज़ी से बढ़ रही है और वह एशिया के प्रमुख डैटा सेंटर बाज़ारों में शामिल हो चुका है। डिजिटल इंडिया, यूपीआई, क्लाउड सेवाओं, ई-कॉमर्स, ऑनलाइन शिक्षा और सरकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने इस विस्तार को और गति दी है। इसमें कोई संदेह नहीं कि डैटा सेंटर आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए उतने ही आवश्यक हैं, जितने कभी सड़कें, रेलमार्ग और बिजलीघर थे। वे निवेश आकर्षित करते हैं, रोज़गार सृजित करते हैं और डिजिटल सेवाओं (digital services) की विश्वसनीयता सुनिश्चित करते हैं।
लेकिन हर ‘विकास’ अपने साथ कुछ अनदेखे प्रश्न भी लेकर आता है। लंबे समय तक डैटा सेंटरों की चर्चा केवल उनकी बिजली खपत तक सीमित रही। अब वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और नीति-निर्माताओं का ध्यान एक ऐसे प्राकृतिक संसाधन की ओर जा रहा है, जिसकी चर्चा अक्सर छूट जाती है, वह है जल।
डिजिटल दुनिया: अदृश्य प्यास
हमारा डैटा ‘क्लाउड’ (cloud) में सुरक्षित होता है। क्लाउड कोई काल्पनिक स्थान नहीं, बल्कि हज़ारों सर्वरों से भरे विशाल डैटा सेंटरों का नेटवर्क है। हर ई-मेल, हर डिजिटल भुगतान, हर वीडियो, हर ऑनलाइन खोज और हर एआई अनुरोध इन्हीं सर्वरों (servers) पर संसाधित होता है।
ये सर्वर दिन-रात लगातार काम करते हैं। जितनी अधिक गणनाएं होती हैं, उतनी ही अधिक गर्मी उत्पन्न होती है। यदि यह तापमान नियंत्रित न किया जाए तो सर्वर की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है, उपकरण क्षतिग्रस्त हो सकते हैं और डिजिटल सेवाएं बाधित हो सकती हैं, यहां तक कि ठप भी हो सकती हैं। इसलिए शीतलन (कूलिंग) (cooling) डैटा सेंटर की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
बड़े डैटा सेंटरों में सर्वरों को सुरक्षित तापमान पर बनाए रखने के लिए पानी आधारित कूलिंग टॉवर, चिलर और वाष्पीकरण आधारित शीतलन प्रणालियों का उपयोग किया जाता है। पानी गर्मी को तेज़ी से अवशोषित (absorb) करता है, इसलिए यह बड़े डैटा सेंटरों के लिए प्रभावी शीतलक (coolent) माना जाता है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि डिजिटल सुविधाओं की बढ़ती मांग के साथ पानी की मांग भी बढ़ने लगती है।
यही वह प्रश्न है, जिसने पूरी दुनिया में नई बहस शुरू कर दी है। क्या एआई और डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार ऐसे समय में हो रहा है, जब दुनिया पहले से ही जल संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से जूझ रही है? और यदि हां, तो क्या भविष्य का डिजिटल विकास जल सुरक्षा के साथ संतुलन (balance) बनाकर आगे बढ़ सकेगा?
इन सवालों के उत्तर केवल तकनीकी नहीं, बल्कि पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक भी हैं। आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि डिजिटल प्रगति (digital progress) वास्तव में टिकाऊ विकास का आधार बनती है या प्राकृतिक संसाधनों (natural resources) पर एक नया दबाव।
कितने प्यासे हैं डैटा सेंटर
अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार लगभग 100 मेगावॉट क्षमता वाला एक हाइपरस्केल डैटा सेंटर (hyperscale data centre) केवल शीतलन के लिए प्रतिदिन लगभग 20 लाख लीटर तक पानी उपयोग कर सकता है। यह मात्रा कई छोटे कस्बों की दैनिक जल आवश्यकता के बराबर है। पानी का उपयोग केवल शीतलन टॉवरों में ही नहीं होता, बल्कि आर्द्रता नियंत्रण और अन्य सहायक प्रणालियों में भी किया जाता है।
भारत में ऊर्जा, पर्यावरण एवं जलवायु पर कार्य करने वाली संस्था काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) का अनुमान है कि वर्ष 2024 में देश के डैटा सेंटरों ने लगभग 150 अरब लीटर पानी का उपयोग किया था। यदि वर्तमान विस्तार की गति बनी रही, तो 2030 तक यह खपत दुगनी से अधिक हो सकती है। यह अनुमान केवल उद्योग के आकार का नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की नीति सम्बंधी चुनौती का भी संकेत देता है।
हालांकि यह भी समझना आवश्यक है कि सभी डैटा सेंटर समान मात्रा में पानी उपयोग नहीं करते। कुछ आधुनिक केंद्र कम जल-आधारित या लगभग जल-रहित शीतलन तकनीकों की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि पुराने केंद्र अपेक्षाकृत अधिक पानी पर निर्भर हैं। इसलिए भविष्य की दिशा केवल डैटा सेंटरों की संख्या से नहीं, बल्कि उनकी जल-दक्षता (water-use efficiency) से भी तय होगी।
एआई ने क्यों बढ़ाई चुनौती?
एआई ने डैटा सेंटरों की भूमिका को पूरी तरह बदल दिया है। पहले अधिकांश डैटा सेंटर ई-मेल, वेबसाइट, क्लाउड स्टोरेज और सामान्य इंटरनेट सेवाओं के लिए बनाए जाते थे। अब उन्हें लार्ड लैंग्वेज मॉडल (large language model), मशीन लर्निंग, वीडियो विश्लेषण, वैज्ञानिक अनुसंधान और जटिल गणनाओं का भार भी उठाना पड़ रहा है।
एआई आधारित प्रोसेसर पारंपरिक सर्वरों (traditional servers) की तुलना में कहीं अधिक ऊर्जा का उपयोग करते हैं और अधिक गर्मी उत्पन्न करते हैं। जिसके कारण शीतलन प्रणालियों पर दबाव बढ़ता है। आज डैटा सेंटरों की योजना केवल बिजली उपलब्धता के आधार पर नहीं बनाई जा रही, बल्कि स्थानीय तापमान, जल उपलब्धता और जलवायु जोखिम को भी ध्यान में रखा जा रहा है।
एआई ने नई विडंबना पैदा कर दी है। एक ओर, यह जलवायु परिवर्तन, मौसम पूर्वानुमान, कृषि, स्वास्थ्य एवं आपदा प्रबंधन जैसी समस्याओं के समाधान में मदद कर सकता है। वहीं, यदि इसकी आधारभूत अधोसंरचना संसाधनों का बेतहाशा उपयोग करेगी तो वही तकनीक पर्यावरणीय दबाव भी बढ़ा सकती है।
दोहरी चुनौती
भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं (digital economy) में से एक है। सरकार डैटा सेंटर, एआई और सेमीकंडक्टर (semiconductor) जैसे क्षेत्रों को प्रोत्साहन दे रही है। दूसरी ओर, देश के अनेक हिस्से पहले से ही जल संकट का सामना कर रहे हैं। अनियमित मानसून, घटता भूजल, बढ़ते तापमान और तेज़ी से बढ़ते शहर जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डाल रहे हैं।
यही कारण है कि भारत के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर, डिजिटल अधोसंरचना का विस्तार आवश्यक है। दूसरी ओर, यह सुनिश्चित करना भी उतना ही ज़रूरी है कि यह विस्तार स्थानीय जल संसाधनों की कीमत पर न हो। यदि भविष्य के डैटा सेंटर ऐसे क्षेत्रों में स्थापित होते हैं जहां पहले से ही पेयजल संकट है, तो उद्योग और स्थानीय समुदायों के बीच संसाधनों को लेकर तनाव उत्पन्न हो सकता है। इसलिए अब डैटा सेंटरों की योजना को केवल निवेश और रोज़गार के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि जल सुरक्षा (water savings), शहरी नियोजन और जलवायु अनुकूलन (climate adoptations) के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है।
दुनिया क्या सीख रही है?
दुनिया की बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियां इस चुनौती को स्वीकार कर चुकी हैं। माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और अन्य कंपनियां ऐसे डैटा सेंटर विकसित कर रही हैं जिनमें कम पानी का उपयोग हो, उपचारित अपशिष्ट जल (waste water) का अधिकतम इस्तेमाल किया जाए और वर्षा जल संचयन (rainwater harvesting) को अनिवार्य बनाया जाए। माइक्रोसॉफ्ट का दावा है कि उसने पिछले दो दशकों में अपने डैटा सेंटरों की वॉटर यूज़ इफेक्टिवनेस में लगभग 90 प्रतिशत सुधार किया है।
युरोप और अमेरिका के कई क्षेत्रों में अब नए डैटा सेंटरों की स्वीकृति देते समय केवल बिजली की उपलब्धता नहीं देखी जाती, बल्कि यह भी आकलन किया जाता है कि उनका स्थानीय जल संसाधनों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। इससे स्पष्ट है कि भविष्य में डैटा सेंटरों की सफलता केवल उनकी कंप्यूटिंग क्षमता (computing capacity) से नहीं, बल्कि उनकी ऊर्जा और जल दक्षता से भी आंकी जाएगी।
भारत के पास मौका है कि वह डैटा सेंटर उद्योग को ऐसी दिशा दे, जो डिजिटल विकास और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित करे। इसके लिए डैटा सेंटरों की स्थापना की प्रक्रिया में जल उपलब्धता और जल प्रभाव आकलन को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। जिस प्रकार बड़ी परियोजनाओं के लिए पर्यावरण प्रभाव आकलन आवश्यक होता है, उसी प्रकार बड़े डैटा सेंटरों के लिए स्थानीय जल संसाधनों पर पड़ने वाले प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन भी अनिवार्य रूप से निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा होना चाहिए।
जल ही नहीं, ऊर्जा भी अहम
यह भी गौरतलब है कि डैटा सेंटरों पर चर्चा अक्सर पानी तक सीमित रह जाती है, जबकि उनका ऊर्जा उपयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण है। एआई के विस्तार के साथ दुनिया भर में बिजली की मांग तेज़ी से बढ़ रही है। यदि यह ऊर्जा कोयले और अन्य जीवाश्म ईंधनों से प्राप्त होगी, तो निश्चित रूप से कार्बन उत्सर्जन (carbon emission) बढ़ेगा और जलवायु परिवर्तन की चुनौती और गंभीर होगी।
इसलिए भविष्य का टिकाऊ डैटा सेंटर वह होगा, जो कम पानी ही नहीं बल्कि स्वच्छ ऊर्जा का भी उपयोग करे। सौर व पवन ऊर्जा, ऊर्जा-कुशल सर्वर, उन्नत चिप प्रौद्योगिकी तथा स्मार्ट कूलिंग सिस्टम (smart cooling system) इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। डिजिटल संरचना का भविष्य केवल अधिक शक्तिशाली कंप्यूटरों में नहीं, बल्कि संसाधन-दक्ष प्रणालियों (resource efficient systems) में निहित है।
विकास की नई कसौटी
इक्कीसवीं सदी का विकास केवल तकनीकी विस्तार का नाम नहीं है। वह इस बात की भी परीक्षा है कि हम प्राकृतिक संसाधनों (natural resources) का उपयोग कितनी ज़िम्मेदारी से करते हैं। यदि डिजिटल विकास की कीमत सूखते भूजल, बढ़ते जल संघर्ष और पर्यावरणीय असंतुलन के रूप में चुकानी पड़े, तो वह विकास लंबे समय तक टिकाऊ नहीं रह सकता। इसलिए अब विकास का नया सूत्र केवल डिजिटल फर्स्ट नहीं, बल्कि डिजिटल एंड मोस्ट सस्टेनेबल (digital & most sustainable) होना चाहिए।
डिजिटल भारत का सपना केवल तेज़ इंटरनेट, विशाल डैटा सेंटरों और अत्याधुनिक एआई से पूरा नहीं होगा। उसकी सफलता इस बात से भी तय होगी कि इन तकनीकों के विकास में पानी, ऊर्जा और पर्यावरण का कितना नुकसान या सम्मान किया जाता है। यदि आज दूरदर्शी नीतियां अपनाई जाती हैं, तो भारत डिजिटल प्रगति और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के बीच एक संतुलित मॉडल (balanced model) प्रस्तुत कर सकता है। ज़ाहिर है, यही भविष्य की टिकाऊ अर्थव्यवस्था की वास्तविक पहचान होगी। (स्रोत फीचर्स)
गर्मियों में चलने वाली भीषण ग्रीष्म लरहों के बाद जब आसमान में घने काले ‘क्युमुलोनिम्बस बादल’ (cumulonimbus clouds) घुमड़ते हैं, तो वे केवल बारिश का संदेश नहीं लाते। दरअसल, ये बादल हवा में तैरते हुए एक बिजली संयंत्र की तरह काम करते हैं। इन बादलों से अचानक कड़कती बिजली प्रकृति की सबसे शक्तिशाली ताकतों में से एक है।
आधुनिक मौसम विज्ञान और पर्यावरण वैज्ञानिकों के नए अनुसंधानों ने बताया है कि आसमान से बरसने वाली बिजली का सीधा सम्बंध धरती के बढ़ते तापमान से जुड़ चुका है।
बादलों का ‘पावर बैंक‘ और तड़ित का विज्ञान
भौतिक विज्ञान के सिद्धांतों के अनुसार, बादल सिर्फ पानी की बूंदों के समूह नहीं हैं, बल्कि वे हवा में तैरते हुए विशालकाय प्राकृतिक संधारित्र (natural capacitor) की तरह हैं। जब तेज़ गर्मी के कारण नमी से भरी गर्म हवा तेज़ी से ऊपर की ओर उठती है तो वायुमंडल के ऊपरी हिस्सों में अत्यधिक ठंड के कारण यह नमी बर्फ के छोटे-छोटे कणों में बदलने लगती है।
हवा के इस तेज़ ऊर्ध्वाधर बहाव के दौरान, कुछ कण बड़े होने लगते हैं और वज़न बढ़ने के कारण वे नीचे गिरने लगते हैं। दूसरी ओर, बारीक हिम कण (snow crystals) हवा के साथ ऊपर उठते रहते हैं। जब नीचे गिरते और ऊपर उठते ये बर्फ के कण आपस में टकराते हैं, तो उनके बीच घर्षण के कारण स्थिर विद्युत पैदा होती है। कुल मिलाकर परिणाम यह होता है कि बादलों का ऊपरी हिस्सा धनावेशित (positively charged) और निचला हिस्सा ऋणावेशित (negatively charged) हो जाता है। जब इन दोनों विपरीत आवेशों के बीच का विद्युत क्षेत्र वायु की अवरोधक क्षमता को तोड़ देता है, तो बादलों के भीतर ही बिजली (lightening) कौंधने लगती है।
लेकिन जब बादलों का यह भारी-भरकम ऋणावेश धरती की तरफ लपकता है, तो इसे ‘क्लाउड-टू-ग्राउंड’ लाइटनिंग (cloud-to-ground lightening) यानी ज़मीन पर बिजली गिरना कहा जाता है। पल भर के लिए गिरने वाली इस एक कड़क में करीब 10 करोड़ से 100 करोड़ वोल्ट का क्षणिक वोल्टेज और हज़ारों एम्पीयर (ampere) का करंट हो सकता है। इस दौरान पैदा होने वाला तापमान सूर्य की दृश्य सतह से भी पांच गुना ज़्यादा (लगभग 30,000 डिग्री सेल्सियस) होता है, जो आसपास की हवा को अचानक फैलाता है। हवा के इसी तीव्र और तात्कालिक फैलाव से उत्पन्न होने वाली शॉक वेव (shock wave) हमें भयानक गड़गड़ाहट के रूप में सुनाई देती है।
कैटाटुम्बो: जहां कभी शांत नहीं होता आसमान
अगर हमें प्रकृति के इस अद्भुत बिजलीघर को करीब से समझना है, तो वेनेज़ुएला में कैटाटुम्बो नदी (catatumbo river) और मैराकैबो झील (maracaibo lake) के संगम पर जाना होगा। यहां के संगम पर प्रकृति का एक ऐसा अनूठा नज़ारा दिखता है, जो गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज है।
इस अनोखे क्षेत्र में साल के 365 दिनों में से लगभग 300 रातों को लगातार बिजली कड़कती है। एंडीज़ पर्वतों (andes mountains) से आने वाली बर्फीली हवाएं जब मैराकैबो बेसिन (meracabo basin) की अत्यधिक गर्म और नम हवाओं से टकराती हैं, तो यह पूरा इलाका एक कड़कड़ाते अखाड़े में बदल जाता है। यहां एक मिनट में दर्जनों बार बिजली कौंधती है, जिससे रातें भी दिन की तरह उजली हो जाती हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि यह प्रक्रिया पृथ्वी के पर्यावरण के लिए एक वरदान है, क्योंकि इस उच्च-स्तरीय बिजली से उत्पन्न नाइट्रोजन ऑक्साइड्स (nitrogen oxides) वर्षा जल के साथ मिलकर मिट्टी में पहुंचते हैं, जिससे प्राकृतिक नाइट्रोजन स्थिरीकरण होता है और पौधे इसे पोषक तत्व के रूप में ग्रहण करते हैं। कहते हैं कि इतनी बिजली कड़कने से ओज़ोन (ozone) भी बनती है लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि क्या यह धरती के ओज़ोन कवच को सुदृढ़ करती है।
ग्लोबल वॉर्मिंग: बारूद के ढेर पर मौसम
चिंताजनक बात यह है कि जो प्रक्रिया पृथ्वी के वायुमंडलीय संतुलन के लिए ज़रूरी थी, वह अब मानवीय हस्तक्षेप के कारण एक घातक आपदा बनती जा रही है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) और दुनिया भर के जलवायु वैज्ञानिकों के हालिया अनुसंधानों ने एक गंभीर चेतावनी दी है। जैसे-जैसे कार्बन उत्सर्जन बढ़ रहा है, वायुमंडल में गर्मी और नमी सोखने की क्षमता अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है। वायुमंडल में अधिक ऊष्मा का सीधा सा मतलब है बादलों के भीतर हवा का और तेज़ बहाव और कणों का अधिक आक्रामक घर्षण। वैज्ञानिक गणना के अनुसार, यदि पृथ्वी के औसत तापमान में केवल 1 डिग्री सेल्सियस की भी वृद्धि होती है, तो आकाशीय बिजली गिरने की घटनाओं में सीधे 12 प्रतिशत का इज़ाफा हो जाता है। इसके अतिरिक्त शहरों का बढ़ता प्रदूषण और हवा में तैरते धूल के सूक्ष्म कण बादलों के भीतर चार्जिंग की इस प्रक्रिया को बढ़ावा देते हैं। यही कारण है कि हाल के वर्षों में ‘मल्टीपल लाइटनिंग स्ट्रोक्स’ (Multiple Lightening strokes) (एक साथ कई बार बिजली गिरना) की घटनाएं तेज़ी से बढ़ी हैं।
‘साइड फ्लैश‘ का खतरा और ग्रामीण भारत का संकट
चक्रवात, बाढ़ या भारी बारिश जैसी आपदाएं दूर से आती दिखाई देती हैं, जिससे जान-माल को सुरक्षित करने का कुछ वक्त मिल जाता है। लेकिन आकाशीय बिजली एक ‘अदृश्य और तात्कालिक आपदा’ (invisible and emergency disaster) है, जो पलक झपकते ही सब कुछ खत्म कर देती है। भारत में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि देश में प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली कुल मौतों में से लगभग 40 प्रतिशत अकेले बिजली गिरने से होती हैं, जो बाढ़ और भूकंप से भी ज़्यादा हैं।
इसका एक सामाजिक-आर्थिक पहलू भी है। इससे प्रभावित होने वाले 90 प्रतिशत लोग ग्रामीण क्षेत्रों के किसान, चरवाहे और खेत मज़दूर होते हैं। अक्सर खेतों में काम करते समय जब अचानक बारिश शुरू होती है, तो बचाव के लिए किसी ऊंचे पेड़ के नीचे खड़े हो जाते हैं। लेकिन कई बार बिजली आसपास के क्षेत्र को भी प्रभावित करती हैं। इसे ‘साइड फ्लैश’ कहते हैं। बिजली गिरती तो सीधे पेड़ पर है लेकिन पेड़ की उच्च विद्युत प्रतिरोधकता (high electrical resistivity) के कारण वह हवा या ज़मीन के रास्ते पास खड़े इंसानों के शरीर में डिस्चार्ज हो जाती है। जिससे पल भर में कार्डिएक अरेस्ट (cardiac arrest) हो जाता है।
सुरक्षा के उपाय
बिजली कड़के तब तुरंत किसी पक्के मकान या बंद कार के अंदर चले जाएं। और अंतिम गर्जना के बाद भी कम से कम 30 मिनट तक अंदर ही रहें।
तकनीक का सहारा: भारत सरकार का ‘दामिनी ऐप’ सैटेलाइट डैटा के ज़रिए 20 से 40 किलोमीटर के दायरे में बिजली गिरने से आधा घंटा पहले सटीक अलर्ट दे देता है। सुरक्षा के लिए इस डिजिटल सुरक्षा कवच को हर किसान तक पहुंचाना आवश्यक है।
तड़ित चालक: बहुमंज़िला इमारतों, ग्रामीण स्कूलों और पंचायत भवनों पर बेंजामिन फ्रैंकलिन द्वारा आविष्कृत तड़ित चालक (Lightening rod) लगाना अनिवार्य होना चाहिए, जो आसमानी बिजली को सुरक्षित रूप से ज़मीन के अंदर भेज देता है।
आसमान में बिजली का कौंधना प्रकृति की एक आवश्यक और खूबसूरत वैज्ञानिक प्रणाली है। लेकिन मानवीय गतिविधियों के कारण बढ़ता वैश्विक तापमान बादलों को अधिक आक्रामक और हिंसक बना रहा है। यदि हमने आज भी अपने कार्बन उत्सर्जन (carbon emission) पर लगाम नहीं लगाई, तो आने वाले दिनों में बादलों की यह गड़गड़ाहट हमारी तबाही का संगीत बन जाएगी। प्रकृति के इस बढ़ते गुस्से का मुकाबला अंधविश्वास या डर से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, जागरूकता और पर्यावरण संरक्षण से ही किया जा सकता है। (स्रोत फीचर्स)
जलवायु परिवर्तन और जैव-विविधता संकट की चर्चा जब भी होती है, आम तौर पर गर्माती धरती, ग्लेशियरों के पिघलने, दावानल, सूखे और बाढ़ जैसे विषय प्रमुखता से सामने आते हैं। किंतु प्रकृति में कुछ संकट ऐसे भी होते हैं जो अचानक नहीं आते, बल्कि वर्षों तक धीरे-धीरे विकसित होते हैं और जब तक उनके परिणाम स्पष्ट दिखाई देते हैं, तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है। ओक (बलूत) वृक्षों (Oak trees) के सामने खड़ा संकट ऐसी ही एक धीमी लेकिन गंभीर पर्यावरणीय चुनौती है। हाल ही में ब्रिटेन में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट (एक्शन ओक द्वारा किया गया स्टेट ऑफ दी यूके ओक्स) ने इस संकट को नए सिरे से वैश्विक विमर्श के केंद्र में ला दिया है।
एशिया, युरोप और उत्तरी अमेरिका के कई क्षेत्रों में पाई जाने वाली यह महत्वपूर्ण वृक्ष प्रजाति वहां अलग-अलग प्रकार के दबावों का सामना कर रही है। भारत के हिमालयी क्षेत्रों में भी बलूत वनों का ह्रास पर्यावरणविदों के लिए चिंता का अहम सबब बना हुआ है।
ओक वृक्ष फैगेसी कुल के क्वेरकस वंश (Genus Quercus) के सदस्य हैं। विश्व भर में इनकी 500 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। युरोप, उत्तरी अमेरिका और एशिया के समशीतोष्ण क्षेत्रों (Temperate zones) में इनका व्यापक फैलाव है। भारत में मुख्यतः हिमालयी क्षेत्रों (Himalayan areas) में इनकी अनेक प्रजातियां मिलती हैं, जिनमें बांज (Quercus leucotrichophora), तिलौंज या मोरू (Quercus floribunda) और खरसू (Quercus semecarpifolia) प्रमुख हैं।
ओक वृक्ष अत्यंत दीर्घायु होते हैं। कुछ वृक्ष 300 से 500 वर्ष तक जीवित रह सकते हैं, जबकि कई प्राचीन ओक वृक्षों की आयु इससे भी अधिक दर्ज की गई है। अपनी विशाल छत्राकार संरचना, गहरी जड़ों और लंबे जीवन के कारण इन्हें अनेक पारिस्थितिक तंत्रों की आधारशिला (Foundations of Ecosystem) माना जाता है।
पारिस्थितिक प्रहरी
ओक वृक्षों का महत्व केवल उनकी विशालता या सुंदरता तक सीमित नहीं है। इन्हें जैव विविधता का संरक्षक (Guardians of Biodiversity) माना जाता है। ब्रिटेन में किए गए अध्ययनों के अनुसार, एक ओक वृक्ष प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से 2300 से अधिक जीव प्रजातियों को आश्रय देता है। इनमें पक्षी, कीट, कवक, काई, स्तनधारी समेत कई सूक्ष्मजीव शामिल हैं।
भारत के हिमालयी क्षेत्रों में भी ओक वन पारिस्थितिकी की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इन्हें ‘जल संरक्षक वृक्ष’ (Water conserving trees) कहा जाता है क्योंकि इनकी गहरी जड़ें वर्षा जल को भूमि में संरक्षित करती हैं और झरनों, नालों तथा नदियों के प्रवाह को बनाए रखने में मदद करती हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि जिन क्षेत्रों में ओक वन सुरक्षित हैं, वहां जलस्रोत अपेक्षाकृत अधिक स्थायी बने रहते हैं।
इसके अलावा, ओक वृक्ष कार्बन अवशोषण (carbon sequestration) में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक परिपक्व ओक वृक्ष अपने जीवनकाल में बड़ी मात्रा में कार्बन संग्रहित कर सकता है, जिससे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायता मिलती है।
एशिया में स्थिति
भारत में ओक मुख्यतः उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-काश्मीर, सिक्किम और पूर्वोत्तर राज्यों के पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं। किंतु पिछले कुछ दशकों में इन वनों का क्षेत्रफल और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हुए हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार ओक वनों के क्षरण के पीछे कई कारण हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि और वर्षा चक्र में बदलाव से इनके प्राकृत वास प्रभावित हो रहे हैं। कई क्षेत्रों में ओक वनों की जगह चीड़ (पाइन) के जंगल फैल रहे हैं। चीड़ (Pine trees) अपेक्षाकृत कम जैव विविधता को सहारा देते हैं और जंगल की आग के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।
इसके अतिरिक्त ईंधन, चारे और लकड़ी के लिए अत्यधिक दोहन, अनियंत्रित चराई, सड़क निर्माण और शहरी विस्तार भी ओक वनों पर दबाव बढ़ा रहे हैं। कई अध्ययनों में यह तथ्य सामने आया है कि पुराने वृक्ष तो अभी भी मौजूद हैं, लेकिन नए पौधों का प्राकृतिक पुनर्जनन लगातार घट रहा है। यह स्थिति भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी है।
नेपाल, भूटान और चीन के पर्वतीय क्षेत्रों में भी ओक वनों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव दर्ज किए जा रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि तापमान बढ़ने के कारण कई ओक प्रजातियां ऊंचाई की ओर खिसक रही हैं, जिससे उनकी पारिस्थितिक सीमाएं बदल रही हैं।
ब्रिटेन में ओक वृक्ष केवल प्राकृतिक धरोहर (natural heritage) नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा हैं। इस देश में लगभग 17 करोड़ ओक वृक्ष मौजूद हैं और लगभग 50 हज़ार प्राचीन ओक वृक्षों का रिकॉर्ड है।
शोध रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन के ओक वृक्ष कई खतरों का एक साथ सामना कर रहे हैं। इनमें जलवायु परिवर्तन, सूखा, रोग, कीट आक्रमण, हिरणों द्वारा अत्यधिक चराई, ग्रे गिलहरियों द्वारा छाल को नुकसान पहुंचाना तथा विकास परियोजनाओं के कारण वन क्षेत्रों का विनाश शामिल हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या किसी एक कारण से नहीं है, बल्कि अनेक दबावों के मिले-जुले प्रभाव की है। यही कारण है कि इसे “धीमी गति से बढ़ती पारिस्थितिक आपदा” कहा जा रहा है।
ब्रिटेन में वर्तमान समय का सबसे गंभीर संकट एक्यूट ओक डिक्लाइन (Acute Oak Decline) नामक बीमारी है। यह बैक्टीरिया और एक विशेष बीटल के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न होती है। सूखा और पर्यावरणीय तनाव (Drought and environmental stress) इस बीमारी को और घातक बना देते हैं। इस रोग से प्रभावित वृक्षों की छाल पर दरारें पड़ जाती हैं और उनसे गहरे रंग का तरल पदार्थ रिसने लगता है। चिंताजनक तथ्य यह है कि ऐसा होने पर सैकड़ों वर्षों तक जीवित रहने वाले वृक्ष केवल तीन से छह वर्षों के भीतर नष्ट हो सकते हैं। वर्ष 2023 तक इसके लगभग 394 प्रभावित क्षेत्रों की पहचान की जा चुकी थी।
इसके अलावा ओक पावडरी माइल्ड्यू, ओक प्रोसेशनरी मॉथ, नॉपर गॉल वास्प तथा ओक लेस बग जैसे कीट और रोग भी वृक्षों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। वैश्विक व्यापार (Global trade) और जलवायु परिवर्तन (climate change) के कारण इन खतरों का प्रसार तेज हो रहा है।
संकट केवल वृक्षों का नहीं
यदि ओक वृक्षों की संख्या में गिरावट जारी रही तो इसका प्रभाव केवल वनों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे हज़ारों जीव प्रजातियों का आवास प्रभावित होगा, कार्बन भंडारण क्षमता घटेगी, जल चक्र पर असर पड़ेगा और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो सकता है। एक अनुमान के मुताबिक ब्रिटेन में ओक वृक्ष लगभग 3.1 करोड़ टन कार्बन संग्रहित करते हैं। ऐसे में इनका क्षरण जलवायु संकट को और गंभीर बना सकता है।
एक वैश्विक चेतावनी
ओक का संकट किसी एक देश की समस्या नहीं है। यह पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है कि जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता ह्रास और मानवीय दबाव मिलकर किस प्रकार प्रकृति की सबसे मज़बूत दिखने वाली प्रजातियों को भी कमज़ोर कर सकते हैं।
समय रहते उपयुक्त कदम न उठाए गए, तो ओक के साथ-साथ उनसे जुड़े हज़ारों जीवों और पारिस्थितिक तंत्रों का भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है। यह केवल एक वृक्ष की गाथा नहीं, बल्कि पृथ्वी की पारिस्थितिक सुरक्षा और मानव सभ्यता के भविष्य से जुड़ा प्रश्न भी है।
संरक्षण
ओक वृक्षों का संरक्षण केवल वन विभागों या वैज्ञानिकों का दायित्व नहीं है। इसके लिए बहुस्तरीय प्रयासों की आवश्यकता है। रोगों और कीटों की निगरानी, वैज्ञानिक शोध, प्राकृतिक पुनर्जनन को बढ़ावा, नियंत्रित चराई और विकास परियोजनाओं में पर्यावरणीय संवेदनशीलता (environmental sensitivity) आवश्यक है।
भारत में सामुदायिक वन प्रबंधन (community forest management) और पारंपरिक संरक्षण प्रणालियां इनके संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी से ओक वनों के संरक्षण के कई उदाहरण सामने आए हैं। इनमें हिमालयी क्षेत्रों में पवित्र वन (sacrad forest) जैसी परंपराएं ओक संरक्षण के लिए एक अच्छा उदाहरण बन सकती हैं। (स्रोत फीचर्स)
फरवरी 2026 के पहले सप्ताह में मैंने छत्तीसगढ़ के रायगढ़ ज़िले के धरमजयगढ़ ब्लॉक के दूरदराज़ आदिवासी गांवों में कुछ समय बिताया था। उन दिनों मैंने जो देखा, जो अनुभव किया, उसने सार्वजनिक स्वास्थ्य सम्बंधी कार्यों के प्रति मेरे नज़रिए को किसी व्याख्यान या पाठ्यपुस्तक से कहीं ज़्यादा प्रभावित किया। मैंने जो देखा, अनुभव किया उसने सार्वजनिक स्वास्थ्य को एक नए नज़रिए से देखने-समझने में मेरी मदद की।
मैं सिद्धांतों यानी स्वास्थ्य के संदर्भ में सामाजिक निर्धारक, गरीबी, भौगोलिक स्थिति और शिक्षा आदि के संयुक्त प्रभाव का अच्छे से अध्ययन करके इस क्षेत्र में गया था। मैंने इसकी रूपरेखा तैयार की थी, इसके चित्र बनाए थे और भोपाल में अपने विश्वविद्यालय की कक्षाओं में इन ढांचों की रूपरेखा पर चर्चा भी की थी। लेकिन, इस मैदानी अध्ययन के बाद मुझे यह समझ में आया कि हर आंकड़े के पीछे एक उलझी हुई, सख्त और किसी भी रूपरेखा की तुलना में कहीं अधिक जटिल ज़िंदगी होती है।
ये कोई अनोखी जगहें नहीं हैं। ये साधारण गांव हैं। यहां अभी भी बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंच पाई हैं – जैसे, अच्छी सड़कें, मोबाइल सिग्नल, आसान पहुंच वाले अस्पताल और सुचारू संस्थाएं – जो हमें आसानी से उपलब्ध हैं और उन्हें हम उतना महत्व नहीं देते। दूरी हमेशा किलोमीटर में नहीं नापी जाती। कभी-कभी इसे ‘कितने वर्षों से उपेक्षित है’ के रूप में नापा जाता है, इसे हर महत्त्वपूर्ण सूची में हमेशा अंतिम स्थान पर रहने की संग्रहित तकलीफ के रूप में भी नापा जाता है।
हम अक्सर ‘समुदाय–आधारित तरीकों’ के बारे में बातें करते हैं। लेकिन इन शब्दों का असली मतलब आपको तभी समझ आता है, जब आप अपना लैपटॉप छोड़कर, पक्की सड़कों पर चलना छोड़कर, घने जंगल से होते हुए किसी ऐसे गांव तक पहुंचते हैं, जहां पिछले मॉनसून के बाद से अब तक कोई एम्बुलेंस नहीं पहुंची है।
ओंगना गांव में एक मां के साथ हुई त्रासदी
ओंगना गांव में लगभग 1200 लोग रहते हैं। इनमें बिरहोर (हाशिए का एक जनजातीय समूह), ओरांव और कंवर समुदाय के लोग शामिल हैं। यहां तीन आंगनवाड़ी केंद्र हैं। जिनमें तीन से छह वर्ष की आयु के कुल 59 बच्चे पंजीकृत हैं। मेरे चारों दौरों के दौरान तीनों केंद्रों पर मुझे पांच या छह बच्चे ही मिले। यह पंजीकृत संख्या का मुश्किल से दस प्रतिशत था।
यहां की व्यवस्था इस अनुपस्थिति की आदी हो चुकी है। इस अनुपस्थिति के लिए हमेशा एक जैसी ही सफाई दी जाती है: आदिवासी परिवार अपने बच्चों को खेतों में, जंगलों में, या जहां दिन में काम पर जाते हैं, वहां अपने साथ ले जाते हैं। यह एक स्थापित तथ्य-सा बन गया है और इसे बिना किसी जांच के कार्यक्रम सम्बंधी रिपोर्टों में मान लिया जाता है। कोई नहीं पूछता कि ऐसे (आंगनवाडी) केंद्र के होने का मतलब क्या है, जहां रजिस्टर में खानापूर्ति कर दी जाती है किंतु बच्चे होते ही नहीं। इसे लेकर कोई भी इतना चिंतित नहीं है कि इसके कारणों का पता लगाए।
स्थानीय आशा कार्यकर्ताओं को ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण दिवस (VHSND) की तैयारी में मदद करते हुए मेरी मुलाकात एक महिला से हुई। वह 31 साल की थी, चार महीने की गर्भवती थी और वह सातवीं बार गर्भवती थी। इससे पहले के छह बच्चों में से चार जीवित थे। उसने प्रसव-पूर्व देखभाल के लिए पंजीकरण नहीं कराया था। उसका अपना आधार कार्ड भी खो गया था। ऐसा होने पर भारत में प्रशासनिक कामों में बड़ी अड़चनें आती हैं। आधार कार्ड होने से लगभग हर सरकारी लाभ को प्राप्त करना आसन हो जाता है – जैसे पोषण सहायता, नगद हस्तांतरण और अस्पताल में प्रसव सुविधा या प्रसव के दौरान मिलने वाली अन्य सुविधाएं। आधार कार्ड विहीन व्यक्ति व्यवस्था की नज़रों में ओझल हो जाते हैं, भले ही व्यवस्था उनसे चंद सौ मीटर दूरी पर ही क्यों न हो।
मितानिन (छत्तीसगढ़ में आशा कार्यकर्ता को मितानिन कहते हैं) और पड़ोसियों से बात करके मैंने उस महिला की स्थिति को बेहतर ढंग से समझने की कोशिश की। वह और उसका पति शराब की लत से जूझ रहे थे। गरीबी और शराब पीने की लत इस कदर आपस में गुंथी हुई थी कि यह कहना मुश्किल था कि किस वजह से कौन सी समस्या पैदा हुई। इन समुदायों में नशे की लत के बारे में नैतिक दृष्टिकोण के अलावा शायद ही कभी किसी अन्य दृष्टिकोण से चर्चा की गई होगी। ओंगना में यह समस्या हर जगह देखने को मिलेगी और बीते सालों में यहां यह आम हो गई है। ये सभी चीज़ें दैनिक जीवन में इस तरह से घुलमिल गई हैं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेपों का इनसे कुछ लेना-देना ही नहीं रह गया है।
फिर यह भी पता चला, जिसके लिए मैं तैयार नहीं था, कि उसका छठा बच्चा, जो कि मात्र 9 महीने का था, पानी की टंकी में डूबकर मर गया था। क्योंकि, उसकी मां नशे की हालत में उस बच्चे को पानी पिलाने की कोशिश कर रही थी। उसके हाथों से छूटकर बच्चा टंकी में गिर गया था और उसे घंटों बाद इसका पता चला था, जब उसके बड़े बेटे ने टंकी की ओर इशारा करके पूछा कि बच्चा हिल क्यों नहीं रहा है।
मैं झूठ नहीं कहूंगा, पहले तो मैंने भी उसे नैतिक आधार पर तौला (जज किया)। यह मेरे जैसे एक ऐसे व्यक्ति की सहज प्रतिक्रिया होगी जो रोकथाम, ज़िम्मेदारी निभाने और इससे अलग क्या किया जा सकता है सोचने के लिए प्रशिक्षित किया गया है। इसलिए, मेरे अंदर भी यह प्रवृत्ति सहज रूप से तुरंत आई और मुझे यह उचित भी लगी। मुझे यह समझने में अधिक समय लगा कि मेरे सामने वास्तव में क्या चल रहा है: मेरे सामने एक ऐसी महिला थी जो ऐसी दिल दहला देने वाली परिस्थितियों में जीवित बची हुई थी, जिसकी हममें से अधिकतर लोग कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। वह बिना किसी सहारे के, बिना किसी समझदार साथी के और बिना किसी समर्थन के, अपने शरीर में सातवां बच्चा पाल रही थी। वह एक ऐसी महिला थी जो पहले ही अपने दो बच्चे खो चुकी थी।
अगली सुबह जब वह स्वास्थ्य केंद्र पर नहीं आई, तो मैं एक पुरुष मितानिन प्रशिक्षक के साथ उसके घर गया। जब हम वहां पहुंचे, तो उसका पति दिन शुरू होने से पहले ही नशे में धुत था। वह एक टूटी हुई लकड़ी से उस महिला को पीटने की धमकी दे रहा था। उसने कहा कि उसकी पत्नी ने VHSND में जाने से इनकार कर दिया है। उसकी नशे की हालत में, हमारे पास सच्चाई जानने का कोई तरीका नहीं था। हालांकि, हम उसे शांत कराने में कामयाब रहे। मैं उस महिला को स्वास्थ्य केंद्र ले गया, जहां ग्रामीण स्वास्थ्य आयोजक (RHO, छत्तीसगढ़ में सहायक नर्स दाई/बहुउद्देशीय कार्यकर्ताओं का पदनाम) ने उसकी गर्भावस्था का पंजीकरण किया और आवश्यक जांचें कीं। इस सब में लगभग दो घंटे लगे। हमारे इस प्रयास ने उसे यह समझने में मदद की कि स्वास्थ्य केंद्र की देख-रेख में हुई गर्भावस्था और पहले की उन गर्भावस्थाओं के बीच क्या अंतर है जो बिना किसी स्वास्थ्य केंद्र की देख-रेख के हुई थीं।
पीछे मुड़कर देखता हूं तो सबसे ज़्यादा यही बात चौंकाती है कि यह सब लगभग न होने की कगार पर था – अगर उसका नाम मितानिन की सूची में न होता, अगर हमने उसकी गैरहाज़िरी पर ध्यान न दिया होता, अगर मैं अपने शुरुआती फैसले को ही आखिरी मान लेता और सोच लेता कि यह परिवार हमारी पहुंच से बाहर है।
हस्तक्षेप छोटा-सा था, लेकिन उसके लिए कितने ‘अगर-मगर’ पार करने पड़े थे।
प्राय: सार्वजनिक स्वास्थ्य का काम ऐसे ही परिवारों तक पहुंचना तो होता है, जिन्हें समाज पहले ही छोड़ चुका होता है, जिनकी कोई आवाज़ नहीं होती, जिनकी मुश्किलें किसी की नज़र में नहीं आतीं; और तो और, जिनका अस्तित्व तक जैसे किसी के लिए मायने नहीं रखता।
भौगोलिक परिस्थितियां
कनकुला धरमजयगढ़ से लगभग 28 किलोमीटर दूर है। यहां मोबाइल नेटवर्क नहीं आता है। यहां जाने वाली सड़क, सड़क कहने लायक भी नहीं है। कच्चा, पगडंडी सरीखा रास्ता घने जंगलों, सूखी नदी और धंसती रेत से होकर जाता है। इस इलाके में मोटरसाइकिल का जाना भी मुश्किल है। इस गांव में 61 परिवार हैं और आबादी 217 है। मानसून के दौरान, यह क्षेत्र स्वास्थ्य व्यवस्था के नक्शे से पूरी तरह गायब हो जाता है, क्योंकि, सारे रास्ते डूब जाते हैं और कोई भी स्वास्थ्य कार्यकर्ता हफ्तों तक यहां नहीं पहुंच पाता।
मैंने स्वास्थ्य सुविधाओं में बाधा पैदा करने वाली भौगोलिक कटाव की परिस्थितियों के बारे में पढ़ा था। लेकिन, मैंने कनकुला में इसे अलग तरह से समझा। कटाव सिर्फ दूरी से नहीं होता – वह उन तमाम चीज़ों के मिले-जुले असर से होता है जो वहां तक कभी पहुंच ही नहीं पाईं: हर वह संदेश/सूचना जो कभी पहुंची नहीं, हर वह कोशिश जो पहुंच योग्य इलाके की सीमा से आगे न बढ़ सकी, हर वह योजना जो सड़क के पास रहने वालों को ध्यान में रखकर बनाई गई है।
जब लोगों को टीकाकरण के लिए प्रेरित करने के लिए मैं आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के साथ घर-घर गया तो पाया कि हर बार आंगनवाड़ी कार्यकर्ता दरवाज़ा खटखटाती, अंदर से “नहीं” का जवाब सुनकर आगे बढ़ जातीं। ना तो लोग ही अपने ‘न’ के जवाब का कोई स्पष्टीकरण देते और ना ही आंगनवाड़ी कार्यकर्ता उन्हें समझाने का प्रयास करती। जब मैंने पूछा कि वे आगे क्यों बढ़ जाती हैं, तो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने सीधे कहा: “वे नहीं आएंगे।” उनकी आवाज़ में कोई कड़वाहट नहीं थी। बस एक निराशा थी – वह निराशा जो वर्षों तक वही दरवाज़े बार-बार खटखटाने और वही जवाब पाने के बाद पैदा होती है। उन्होंने यह विश्वास करना बंद कर दिया था कि कभी कोई दरवाज़ा खुलेगा। और, मैं इसके लिए उन्हें दोष नहीं दे सकता था।
मैंने खुद परिवारों से बात करने की अनुमति मांगी। मैंने पाया कि उनके मना करने का कारण बहुत सीधा और तर्कसंगत था। उनका कहना था कि “इंजेक्शन लगने के बाद बच्चों को बुखार आ जाता है। हम टीकाकरण नहीं करवाना चाहते।”
यह अज्ञानता नहीं थी। बल्कि, गांववासियों का एक अनुभवजन्य सत्य था। इन परिवारों ने बच्चों को टीके लगवाने के बाद हल्का बुखार आते देखा था। किसी ने उन्हें यह नहीं समझाया था कि वास्तव में टीका लगने के बाद बुखार आना सही है, यही होना चाहिए। बुखार एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो रही होती है, वह अभ्यास कर रही होती है, सुरक्षा के लिए तैयार हो रही होती है। इस सही जानकारी के अभाव में, उन्होंने अपना स्वयं का स्पष्टीकरण गढ़ लिया था और वह सुसंगत था। यह बात एक मां से दूसरी मां तक फैल गई और पूरे गांव ने इस पर बात को एक प्रामाणिक सत्य के रूप में स्वीकार कर लिया। यह बात गांव के लोगों के लिए एक अनुभवजन्य सत्य की तरह विश्वसनीय और निर्विवादित थी। आप इसे केवल उनका ‘भ्रम’ कहकर खारिज नहीं कर सकते। यह ऐसी बात थी, जिस पर समुदाय के लोगों ने अपने पास उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर सोच-समझ कर अपनी यह धारणा बनाई थी।
यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के संदर्भ में सामाजिक रचनावाद (social constructivism) का एक अच्छा उदाहरण है। बीमारी, उपचार और शरीर के बारे में हमारी मान्यताएं निर्वात में नहीं बनती हैं। वे साझा अनुभव, सामुदायिक चर्चा और पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक-दूसरे को सुनाई जाने वाली कहानियों के ज़रिए बनती हैं। कनकुला में, ‘टीके से बुखार आता है’ की धारणा कोई गलतफहमी नहीं थी; यह सामाजिक रूप से निर्मित सत्य था, जो इस गांव में पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई गई कहानियों के आधार पर पुष्ट हुआ था। इसका कारण था कि यहां कोई भी बाहरी स्वास्थ्य सूचना कभी भी भरोसेमंद ढंग से लोगों के पास नहीं पहुंची थी। यह बात समझ लें तो आपके काम करने का तरीका बदल जाएगा। आप उन्हें गलत साबित करने के लिए उनके पास नहीं जाएंगे। बल्कि, आप उन्हें सुनने और समझने के लिए उनके पास जाएंगे – यह समझने के लिए कि लोगों ने जो देखा है, उसके आधार पर उन्हें वह बात क्यों सही लगी। फिर, जो समझ पहले से मौजूद है, उसके समांतर कुछ नया निर्माण करने के उद्देश्य से उनके बीच जाएंगे। सामुदायिक ज्ञान को अज्ञानता कहकर उसे खारिज करने से वह गायब नहीं हो जाता। यह बस संवाद का दरवाज़ा बंद करता है।
मैंने पहले पुरुषों के साथ समय बिताया। मैंने उन्हें सुना और बातचीत के माध्यम से उनके साथ एक सहजता स्थापित की। इस मेल-जोल को बढ़ाने की दिशा में, मैंने उनसे उन विषयों पर भी हंसी-मज़ाक किया जो स्वास्थ्य से नहीं जुड़े थे। फिर, मैंने उन्हें समझाया कि टीका कैसे काम करता है। मैंने उन्हें बुखार आने के कारणों के बारे में समझाया। जिसका परिणाम यह हुआ कि सुबह जंगल जाने की योजना बना रहे तीन परिवार टीकाकरण करवाने के लिए आ गए।
बाद में, पुरुष RHO ने मुझे बताया कि ये परिवार वर्षों से टीकाकरण के दिन भाग जाते थे। किसी शत्रुता या हठधर्मी विरोध के कारण नहीं। बल्कि, इसलिए कि कभी किसी ने उन्हें इतने इत्मीनान और ईमानदारी से, टीकाकरण का फायदा नहीं समझाया था।
इन समुदायों और पूरे स्वास्थ्य तंत्र के बीच दूरी केवल भौगोलिक दूरी नहीं है। यह दूरी बरसों तक उन्हें नज़रअंदाज़ करने, सूचनाओं से वंचित रखने से पैदा हुई है। यह दूरी उन संस्थाओं ने पैदा की है जिन तक पहुंच पाना कभी आसान नहीं रहा और उन योजनाओं ने भी पैदा की जो इन्हें ध्यान में रखकर कभी बनाई ही नहीं गईं। इस दूरी को पाटना निरंतर चलने वाली, चमक–दमक से रहित प्रक्रिया है। यह अक्सर रिपोर्टों में दर्ज़ नहीं होती, न ही इससे सुर्खियां बनती हैं। लेकिन मेरा मानना है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की असली ज़मीन यहीं है। इस पर चर्चा घर के दरवाज़े पर, पहाड़ी पर, सूखी नदी के किनारे होती है और उन जगहों पर होती है जहां सड़क नहीं पहुंचती।
ज़मीनी स्तर पर कार्य
गरीबी, भौगोलिक स्थिति, साक्षरता, अवसर जैसे सामाजिक निर्धारकों पर कक्षाओं में होने वाली चर्चाएं गलत नहीं हैं। लेकिन जब तक कि आप इन्हें किसी खास व्यक्ति के संदर्भ में, किसी खास घर के संदर्भ में और किसी खास सुबह साकार होते नहीं देख लेते तब तक ये अमूर्त सिद्धांत ही बने रहते हैं। जैसे – एक शराबी पति, जिसके हाथ में टूटी हुई लकड़ी का टुकड़ा है। आंगनवाड़ी केंद्र में टूटा और बेकार पड़ा हुआ ग्रोथ मॉनिटरिंग यंत्र (विकास निगरानी उपकरण), जिसके चलते यह मापना मुश्किल हो जाता है कि स्वास्थ्य केंद्र पर आने वाले बच्चे उम्र के हिसाब बढ़ रहे हैं या नहीं। ये कोई अपवाद नहीं हैं। बल्कि, ये काम का अभिन्न हिस्सा हैं।
मैं बार-बार यही बात दोहराता हूं कि कितना कुछ सक्रिय मौजूदगी पर निर्भर करता है – सक्रिय मौजूदगी यानी शारीरिक, धैर्यपूर्ण और बिना चमक-दमक वाली उपस्थिति। कनकुला के परिवारों को किसी अभियान की ज़रूरत नहीं थी। उन्हें बस एक ईमानदार बातचीत की ज़रूरत थी। ओंगना की महिला को किसी नई नीति की ज़रूरत नहीं थी। उसे बस किसी ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत थी जो बिना किसी पूर्वाग्रह के एक आम मंगलवार की सुबह उसके दरवाज़े पर आए और उसे यह बताए कि उसकी गर्भावस्था कितना मायने रखती है, उसके लिए ज़रूरी स्वास्थ्य सम्बंधी प्रयास किए जा रहे हैं।
ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के पास जो ज्ञान होता है, वह किसी डैशबोर्ड (औपचारिक डिजिटल माध्यम) द्वारा नहीं समझा जा सकता है। क्योंकि, ज़मीनी स्तर के स्वास्थ्य कार्यकर्ता ही ये बात जानते हैं कि किन परिवारों ने दरवाज़े पर दी गई दस्तक का जवाब देना बंद कर दिया है और क्यों। वे जानते हैं कि जुलाई में कौन सी सड़कें नदी में डूब जाती हैं। वे जानते हैं कि किसका पति शराब पीता है, कौन-सा बच्चा तीन महीने से नहीं तौला गया है, कौन-सा परिवार मुलाकात का जवाब देगा और किन घरों को अतिरिक्त सहायता की ज़रूरत है। यह ज्ञान कारगर हस्तक्षेप का आधार बनता है, जो वास्तव में काम करता है। जब हम थकान के कारण या किसी अन्य कारण से कार्यकर्ताओं के अनुभवों को नज़रंदाज़ कर देते हैं, तो हम स्वास्थ्य प्रणाली में लंबे समय के अनुभव के साथ अर्जित महत्वपूर्ण जानकारी गंवा देते हैं। जबकि स्वास्थ्य प्रणाली इसी के आधार पर काम करती है।(स्रोत फीचर्स)
यूरोप और चीन एक संयुक्त मिशन शुरू कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य पृथ्वी की चुंबकीय ढाल (Magnetic field) को बेहतर तरीके से समझना है। स्माइल (SMILE) नामक अंतरिक्ष यान (spacecraft) यह अध्ययन करेगा कि सूर्य से आने वाले खतरनाक विकिरण (solar radiation) से पृथ्वी की ,सुरक्षा कैसे होती है। उम्मीद है कि इससे उपग्रहों, संचार व्यवस्था, जीपीएस और बिजली नेटवर्क का बेहतर संचालन संभव हो सकेगा।
पृथ्वी के चारों ओर एक चुंबकीय क्षेत्र (मैग्नेटोस्फीयर) है। यह सूर्य से आने वाले अधिकांश आवेशित कणों को रोक देता है। लेकिन जब सूर्य पर बड़े विस्फोट – जैसे सौर तूफान – होते हैं, तो यह सुरक्षा ढाल प्रभावित हो सकती है और उपग्रहों, जीपीएस (GPS), रेडियो संचार (Radio communication) और बिजली व्यवस्था (Electricity) में गड़बड़ी पैदा हो सकती है।
वैज्ञानिक कई दशकों से अंतरिक्ष यानों की मदद से मैग्नेटोस्फीयर (Magnetosphere) का अध्ययन कर रहे हैं, लेकिन अब तक वे सिर्फ छोटे-छोटे हिस्सों को ही देख पाते थे। SMILE मिशन सूर्य और पृथ्वी के बीच होने वाली पूरी प्रक्रिया की बड़ी तस्वीर दिखाएगा।
यह अंतरिक्ष यान एक दीर्घवृत्ताकार कक्षा में घूमेगा और पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव से लगभग 1,21,000 किलोमीटर दूर तक जाएगा। वहां से इसका एक्स-रे कैमरा मैग्नेटोस्फीयर के उस हिस्से को देखेगा, जो सूर्य की तरफ होता है। सूर्य से आने वाले कण पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल से टकराकर एक्स-रे (X-Ray) उत्सर्जित करते हैं। इस उत्सर्जन के अवलोकन की मदद से समझा जा सकेगा कि पृथ्वी की चुंबकीय ढाल का आकार कैसे बदल रहा है।
उम्मीद है कि इस मिशन से सौर तूफानों की बेहतर समझ और अंतरिक्ष मौसम (space weather) की ज़्यादा सटीक भविष्यवाणी करने में मदद मिलेगी। यह जानकारी उपग्रह (satellite), संचार नेटवर्क और बिजली व्यवस्था जैसी तकनीकी प्रणालियों को सौर तूफानों से होने वाले नुकसान से बचाने में मददगार होगी।
यह मिशन ध्रुवीय ज्योति (ऑरोरा) (aurora) का भी अध्ययन करेगा। ये तब बनती हैं जब सूर्य से आने वाले आवेशित कण मैग्नेटोस्फीयर के ज़रिए ऊपरी वायुमंडल तक पहुंचकर गैस अणुओं (Gseous Atoms) से टकराकर रोशनी पैदा करते हैं। अधिकांश रोशनी अल्ट्रावायलेट (Ultraviolet) होती है, जिसे इंसानी आंखें नहीं देख सकतीं। SMILE का खास कैमरा इन अदृश्य गतिविधियों को देखकर यह समझने में मदद करेगा कि सौर कण पृथ्वी के वायुमंडल (atmosphere) में कैसे प्रवेश करते हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि इन दोनों तरह की जानकारी को साथ मिलाकर यह बेहतर समझा जा सकेगा कि सूर्य की ऊर्जा पृथ्वी के चुंबकीय वातावरण में कैसे यात्रा करती है। इससे अंतरिक्ष मौसम से जुड़े कई सवालों के जवाब मिलने के अलावा, पृथ्वी की चुंबकीय सुरक्षा प्रणाली को बेहतर समझने में और तकनीक पर निर्भर दुनिया को सौर तूफानों (solar storms) के खतरों से बचाव को बेहतर बनाने में भी मदद मिलेगी।
एक और खास बात है कि यह मिशन युरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और चायनीज़ एकेडमी ऑफ साइन्सेज़ का पहला संयुक्त मिशन है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे भविष्य में अंतरिक्ष अनुसंधान में देशों के बीच सहयोग और मज़बूत हो सकता है। (स्रोत फीचर्स)
कहा तो जा रहा है कि इस वर्ष एल नीनो का कहर टूटेगा। पहला सवाल तो यह होता है कि एल नीनो (el nino) किस बला का नाम है। दूसरा सवाल यह उठता है कि इसके होने या न होने से क्या फर्क पड़ता है।
मौसम वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी है कि इस वर्ष एल नीनो पिछले वर्षों के मुकाबले कहीं ज़्यादा दमदार होने वाला है। यदि ऐसा हुआ तो यह अपने साथ दुनिया के कई हिस्सों में बाढ़ (flood), सूखा (drought) तथा इन्तहाई मौसमी हालात (adverse weather conditions) लाएगा। एक संभावना यह भी व्यक्त की जा रही है कि यदि एल नीनो ज़ोरदार रहा तो अगला वर्ष (2027) तापमान के सारे रिकॉर्ड तोड़ देगा।
सुपर एल नीनो भविष्यवाणी का एक आधार यह है कि पिछले कुछ महीनों में कटिबंधीय प्रशांत महासागर (tropical pacific ocean ) का सतही तापमान सामान्य से अधिक रहा है। यह आसन्न एल नीनो का अग्रदूत माना जाता है। लेकिन मौसम वैज्ञानिकों के मन में अभी भी संशय है कि क्या हवाएं और अन्य मौसमी कारक समुद्र की गर्मी को बढ़ाएंगे या वृद्धि को रोक देंगे। यदि वृद्धि तेज़ हुई तो एल नीनो और दमदार हो जाएगा, अन्यथा शायद थोड़ा कमज़ोर हो जाएगा।
यूएस के नेशनल ओशिएनोग्राफी एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) ने चेतावनी दी है कि काफी संभावना है कि इस साल मई से जुलाई के बीच एल नीनो विकसित होगा। साथ ही यह भी कहा है कि इसकी तीव्रता को लेकर अनिश्चितता है।
एल नीनो एक जटिल वैश्विक घटना (complex global phenomena) है जो हर 2 से 7 साल में दोहराई जाती है। पिछला एल नीनो 2023-24 में देखा गया था और इसके कई असर हुए थे। इसी के चलते 2024 रिकॉर्ड में सबसे गर्म साल रहा था।
इस वर्ष मध्य एवं पूर्वी कटिबंधीय प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से अधिक रहा है। (दक्षिणी अमेरिका में औसत से लगभग 1 डिग्री सेल्सियस अधिक।) इसी के आधार पर विभिन्न कंप्यूटर मॉडल्स का अनुमान है कि इस बार का एल नीनो पिछले एल नीनो की अपेक्षा ज़्यादा ज़ोरदार रहेगा।
एनओएए ने 14 मई की रिपोर्ट में कहा था कि 82 प्रतिशत संभावना है कि एल नीनो मई और जुलाई के बीच आ जाएगा और 96 प्रतिशत संभावना इसके दिसंबर में उभरने की है। लेकिन हालिया अवलोकनों के आधार पर एनओएए (NOAA) का मत है कि मात्र 37 प्रतिशत संभावना है कि इस बार का एल नीनो सर्वोच्च तीव्रता की श्रेणी में रहेगा।
युरोपियन सेंटर फॉर मीडियम रेंज वेदर फोरकास्ट का अनुमान (1 मई) है कि नवंबर तक समुद्र के पानी का तापमान औसत से 3 डिग्री सेल्सियस अधिक भी हो सकता है।
एल नीनो की तीव्रता (intensity of el nino) प्रशांत महासागर के एक विशेष क्षेत्र (5° उत्तरी अक्षांश से 5° दक्षिणी अक्षांश और 120° पश्चिमी देशांतर से 170° पश्चिमी देशांतर क्षेत्र) में सतही पानी के तापमान के आधार पर मापी जाती है। (स्रोत फीचर्स)