टीके से जुड़े झूठे प्रचार को रोकने की पहल

हाल ही में ट्विटर ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्म से ऐसे अकाउंट्स को निलंबित या बंद कर दिया है जो नियमित रूप से कोविड-19 टीकों से जुड़ी भ्रामक जानकारी फैला रहे थे। इसी तरह की एक पहल के तहत अमेरिकी वैज्ञानिकों ने कोविड-19 टीके के बारे में भ्रामक जानकारियों के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है।

कुछ सर्वेक्षणों से पता चला है भ्रामक खबरों के परिणामस्वरूप अमेरिका की 20 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या टीकाकरण के विरोध में है। शोधकर्ता सोशल मीडिया पर टीके से सम्बंधित गलत सूचनाओं को ट्रैक करने और भ्रामक सूचनाओं, राजनैतिक बयानबाज़ी और जन नीतियों से टीकाकरण पर पड़ने वाले प्रभावों का डैटा एकत्र कर रहे हैं। इन भ्रामक सूचनाओं में षड्यंत्र सिद्धांत काफी प्रचलित है जिसके अनुसार महामारी को समाज पर नियंत्रण या अस्पतालों का मुनाफा बढ़ाने के लिए बनाया-फैलाया गया है। यहां तक कहा जा रहा है कि टीका लगवाना जोखिम से भरा और अनावश्यक है।

इस संदर्भ में वायरेलिटी प्रोजेक्ट नामक समूह ट्विटर और फेसबुक जैसे प्लेटफार्म द्वारा टीकों से जुड़ी गलत जानकारियों से निपटने के प्रयासों में तथा जन स्वास्थ्य एजेंसियों और सोशल-मीडिया कंपनियों के साथ मिलकर नियमों का उल्लंघन करने वालों की पहचान करने में मदद कर रहा है।

स्टैनफोर्ड इंटरनेट ऑब्ज़र्वेटरी की अनुसंधान प्रबंधक रिनी डीरेस्टा के अनुसार शोधकर्ताओं ने टीकाकरण के संदर्भ में भ्रामक प्रचार के चलते सार्वजनिक नुकसान की आशंका के कारण इस पर ध्यान केंद्रित किया गया है। हालांकि, सोशल मीडिया कंपनियां सभी मामलों में तो सच-झूठ की पहरेदार नहीं बन सकती लेकिन नुकसान की संभावना को देखते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ संतुलन अनिवार्य है।

फरवरी में ट्विटर, फेसबुक (इंस्टाग्राम समेत) ने झूठे दावों को हटाने के प्रयासों को विस्तार दिया है। दोनों ही कंपनियों ने घोषणा की है कि झूठी खबरें फैलाने वाली पोस्ट और ट्वीट को हटाया जाएगा और बार-बार नीतियों का उल्लंघन करने वालों के अकाउंट्स बंद भी कर दिए जाएंगे।

यह देखा गया है कि वेब पर गलत जानकारी अपेक्षाकृत थोड़े-से लोगों (सुपरस्प्रेडर्स) द्वारा फैलाई जाती है। इनमें अक्सर पक्षपाती मीडिया, सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर और राजनीतिक हस्तियां शामिल होती हैं।  

गौरतलब है कि कोविड-19 के बारे में लोगों की सोच का अनुमान लगाने के लिए बोस्टन स्थित नार्थवेस्टर्न युनिवर्सिटी, मेसाचुसेट्स के राजनीति वैज्ञानिक डेविड लेज़र के नेतृत्व में अमेरिका के सभी 50 राज्यों में प्रति माह 25,000 से अधिक लोगों का सर्वेक्षण किया जा रहा है और साथ ही ट्विटर का उपयोग करने वाले 16 लाख लोगों की जानकारी भी एकत्रित की जा रही है। 

फरवरी में लगभग 21 प्रतिशत लोगों ने टीकाकरण करवाने से इनकार किया। स्वास्थ्य कर्मियों में यह आंकड़ा लगभग 24 प्रतिशत था। देखा गया कि इस फैसले के पीछे शिक्षा का स्तर एक मुख्य कारक रहा। टीम यह समझने का प्रयास कर रही है कि स्वास्थ्य सम्बंधी गलत जानकारी का सामना करने में कौन-सी चीज़ें प्रभावी हो सकती हैं। लगता है कि डॉक्टर और वैज्ञानिकों को सबसे भरोसेमंद माना जाता है जबकि पक्षपातपूर्ण राजनीतिक नेताओं के संदेशों पर विश्वास की संभावना कम होती है। ऐसे में डॉक्टर की सकारात्मक सलाह लोगों की पसंद को प्रभावित कर सकती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जॉनसन एंड जॉनसन टीके पर अस्थायी रोक

मेरिका में जे-एंड-जे टीके लगाने के बाद क्लॉटिंग के 6 मामले सामने आने के बाद यूएस सेंटर फॉर डिसीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन और खाद्य व औषधि प्रशासन ने जॉनसन एंड जॉनसन (जे-एंड-जे) द्वारा निर्मित कोविड-19 टीके के उपयोग पर रोक लगाने की सिफारिश की है। इससे पूर्व युरोप में भी एस्ट्राज़ेनेका टीका प्राप्त लोगों में ऐसे मामले सामने आए थे और टीकाकरण के प्रयासों को काफी नुकसान हुआ था।

एफडीए कमिश्नर जेनेट वुडकॉक के अनुसार ये घटनाएं काफी बिरली हैं। टीकाकरण को रोकने के पीछे का कारण वास्तव में स्वास्थ्य प्रणाली को ऐसे मामलों की पहचान करके उपयुक्त इलाज के लिए तैयार करना है। इस बीच जे-एंड-जे ने युरोप में अपने टीके को लंबित रखा है। युरोपियन मेडिसिंस एजेंसी (ईएमए) अमेरिका में टीकाकृत लोगों में क्लॉटिंग के चार मामलों की जांच कर रही है। ड्यूक युनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के रुधिर रोग विशेषज्ञ गौतमी अरेपल्ली के अनुसार क्लॉटिंग के देखे गए मामले काफी असामान्य हैं। इन मामलों में व्यक्ति के दिमाग की नसों में क्लॉटिंग और प्लेटलेट की कमी देखी गई है। ऐसे में टीके पर अस्थायी रूप से रोक लगाना उचित ही है।     

हालांकि, छह सप्ताह पूर्व युरोप में एस्ट्राज़ेनेका टीके, वैक्सज़ेवरिया, के सम्बंध में इसी तरह की समस्या आने पर ईएमए ने इसके उपयोग पर रोक लगाने का कोई सुझाव नहीं दिया। फिर भी कई अन्य देशों ने कुछ समय के लिए इस पर रोक लगा दी है। कुछ देशों में वृद्ध समूह में इसका उपयोग जारी रखा गया क्योंकि उनमें कोविड-19 का खतरा कहीं ज़्यादा है। कम प्लेटलेट के साथ असामान्य क्लॉटिंग के मामले फाइज़र और मॉडर्ना द्वारा निर्मित संदेशवाहक आरएनए आधारित टीकों में नहीं देखे गए हैं।

वैक्सज़ेवरिया और जे-एंड-जे टीके दोनों ही संशोधित एडेनोवायरस पर आधारित हैं। इसलिए शोधकर्ता इस तकनीक के दुष्प्रभावों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। वैसे एडेनोवायरस आधारित अन्य टीकों (रूस के स्पुतनिक वी और चीन के कैनसाइनो बायोलॉजिक्स) में इस तरह के कोई मामले सामने नहीं आए हैं। वैसे इन टीकों पर उपलब्ध डैटा कुछ सीमित है और यह भी स्पष्ट नहीं है कि इन क्षेत्रों के नियामकों ने ऐसे मामलों को खोजने के प्रयास किए भी हैं या नहीं। समस्या की जड़ तक पहुंचने के प्रयास जारी हैं।

इस मामले में एफडीए से जुड़े पीटर माक्र्स इस परेशानी से सम्बंधित रोगियों के उचित इलाज का सुझाव देते हैं। खास तौर से क्लॉटिंग की समस्या के लिए हेपरिन के उपयोग से बचने की सलाह दी जा रही है क्योंकि टीका जनित क्लॉटिंग में हेपरिन का उपयोग समस्या को और गंभीर बना सकता है।    

अमेरिकी एजेंसियों द्वारा टीकाकरण पर रोक के कारण वैश्विक टीकाकरण की चिंताएं बढ़ गई हैं। अपेक्षाकृत आसान परिवहन और भंडारण तथा कम लागत के चलते वैक्सज़ेवरिया और जे-एंड-जे टीके कम और मध्यम आय वाले देशों के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। और तो और, जे-एंड-जे टीके की एक ही खुराक पर्याप्त होती है। इनके अभाव में कई देशों को कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है। वैसे वुडकॉक के अनुसार निलंबन थोड़े समय के लिए ही रहेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पृथ्वी का विशालतम जीव – डॉ. किशोर पंवार, भरत नागेश

पने तरह-तरह के जीव-जंतु देखे होंगे या इनके बारे में सुना होगा – अति सूक्ष्म जीवाणु से लेकर विशालकाय नीली व्हेल तक। पर यहां जिस जीव की बात करेंगे, आपने शायद ही कभी उसके बारे में सुना होगा। यदि हम आपसे प्रश्न करें कि इस पृथ्वी का सबसे बड़े जीव कौन है, तो आपकी जानकारी के अनुसार इसका उत्तर जिराफ, हाथी या ब्लू व्हेल या फिर सिकोया पेड़ होगा।

ब्लू व्हेल समुद्र में पाई जाती है जिसकी लंबाई लगभग 30 मीटर तथा वज़न 173 टन तक हो सकता है। यह संसार का सबसे बड़ा स्तनधारी जीव है। इसी तरह सिकोया पेड़ है जो उत्तरी अमेरिका में पाया जाता है, इसकी लंबाई लगभग 115 मीटर तथा चौड़ाई 10 मीटर तक हो सकती है। यह संसार का सबसे लंबा पेड़ है। लेकिन आश्चर्य की बात है कि ये दोनों ही पृथ्वी के विशालतम जीवों में से नहीं है। तो फिर कौन है?

आपके मन में यह सवाल भी आ रहा होगा कि विशालतम जीव का निर्धारण कैसे किया जाता है? इसके निर्धारण को लेकर वैज्ञानिक समुदाय में कुछ मतभेद हैं फिर भी कुछ पहलुओं के आधार पर इसका निर्धारण संभव है। जैसे, किसी जीव का परिमाप, क्षेत्रफल, लंबाई, ऊंचाई। यहां तक कि जीनोम के आकार के द्वारा भी इसका निर्धारण किया जा सकता है। चींटियों और मधुमक्खियों जैसे कुछ जीव साथ मिलकर सुपरऑर्गेनिज़्म का निर्माण करते हैं। लेकिन ये एकल जीव नहीं हैं। दी ग्रेट बैरियर रीफ दुनिया की सबसे बड़ी संरचना है जो 2000 किलोमीटर तक फैली है लेकिन इसमें कई प्रजातियों के जीव हैं।

वज़न के हिसाब से इस पृथ्वी का सबसे बड़ा ज्ञात जीव है – पंडो। शुद्ध वज़न के मामले में पंडो सबसे ऊपर है। पंडो का लैटिन भाषा में मतलब ‘I Spread’  (यानी मैं फैलता हूं) है। इसे ट्रेम्बलिंग जाएंट (कंपायमान दैत्य) या एस्पेन के नाम से भी जाना जाता है। पंडो संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिण मध्य ऊटा में कोलेरैडो पठार के पश्चिम छोर पर फिशलेक राष्ट्रीय उद्यान में है। लेकिन आप यदि इस जीव के बारे में पढ़े बिना इसे खोजने जाएंगे तो ढूंढना थोड़ा मुश्किल होगा क्योंकि यह एक पेड़ है। एक पेड़ को ढूंढना इतना मुश्किल क्यों है? तो आपको बता दें कि यह पेड़ देखने में एक जंगल के समान ही है। लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से पंडो एक पेड़ है जिसके क्लोनों के समुदाय 5 किलोमीटर तक फैले हो सकते हैं। आनुवंशिक शोधकर्ताओं द्वारा इसे एकल जीव के रूप में चिंहित किया गया है। यह लगभग 108 एकड़ में फैला है जिसका वजन लगभग 6000 टन (60,00,000 कि.ग्रा.) हो सकता है। यह सबसे बड़े विशालकाय सिकोया पेड़ से लगभग 5 गुना अधिक और लगभग पूरी तरह से विकसित 45 ब्लू व्हेल के बराबर है।

पंडो (Populus tremuloids) की पहचान 1976 में जेरी केम्परमैन और बर्टन बार्न्स ने की थी। माइकल ग्रांट, जेफरी लिटन और कोलेरैडो विश्वविद्यालय के यिन लिनहार्ट ने 1992 में क्लोन्स की फिर से जांच की और इसे पंडो नाम दिया। साथ ही वज़न के लिहाज़ से दुनिया का सबसे बड़ा जीव होने का दावा किया। ऐसा माना जाता है कि पंडो की शुरुआत एक बीज से हुई थी। यह लगभग 14,000 साल या उससे भी पहले की बात है। हालांकि इसकी उम्र का सही-सही अनुमान लगा पाना कठिन है। कुछ जगह इसकी उम्र  50,000-60,000 वर्ष भी बताई गई है। पंडो आनुवंशिक रूप से नर है जिसमें एक अलग जड़ तंत्र होता है जो आपस में जुड़ा हुआ होता है। वैज्ञानिक नहीं जानते कि क्लोन में बड़े पैमाने पर पेड़ कैसे जुड़े हैं। एक बार पौधे जब एक निश्चित उम्र तक पहुंच जाते हैं, तो वे अपने जड़ तंत्र को अलग कर सकते हैं। ऊटा विश्वविद्यालय की कैरन मॉक बताती हैं कि साझा आनुवंशिकी के कारण, अलग होने वाले पेड़ों में अभी भी एक जैसे गुणधर्म हैं। जैसे कि कलियों का एक समय में खिलना और पत्तियों का विशेष परिस्थिति होने पर एक ही समय में मुड़ना।

इसका जड़ तंत्र कई हज़ार साल पुराना माना जाता है। सभी क्लोन जड़ों की एक साझा प्रणाली के ज़रिए एक पेड़ द्वारा एकत्रित ऊर्जा या पानी को इस जड़ तंत्र के द्वारा सभी पेड़ साझा करते हैं। पंडो में अपने जड़ तंत्र के माध्यम से अलैंगिक रूप से आनुवंशिक रूप से समान संतानें उत्पन्न करने की अद्भुत क्षमता है।

पंडो देखने में खूबसूरत होता है। इसके सभी क्लोन लगभग समान ऊंचाई के हैं। शरद ऋतु में पंडो अपने पीले-सुनहरे रंग के लिए जाने जाते हैं। ऊटा ने 2014 में पंडो को अपने राज्य का अधिकारिक पेड़ बनाया। इसकी छाल सफेद-भूरे रंग की होती है जिसमें मोटे काले आड़े निशान और गांठें होती हैं। ये निशान एल्क (एक प्रकार का बारहसिंहा) द्वारा बनाए गए संकेत हैं जो दांतों द्वारा एस्पेन की छाल को छीलने से बने हैं। पंडो की पत्तियां गोल होती हैं और तनों पर विशिष्ट तरीके से जुड़ी हुई होती हैं। जब हवा इन पत्तियों को छूकर गुज़रती है तो वे विशिष्ट तरीके से हिलती-डुलती हैं।

लेकिन इस ग्रह का विशालतम जीव आज मरने की कगार पर है। इसके कुछ कारण ज्ञात हैं तो कुछ अज्ञात। रोग, जलवायु परिवर्तन और जंगल में लगी आग ने पंडो पर बहुत ही बुरा प्रभाव डाला है। परंतु गिरावट का मूल कारण बहुत ही आश्चर्यजनक है। बहुत सारे शाकाहारी जानवर (खच्चर, हिरण, एल्क) पंडो के बीच घूमते रहते हैं। परन्तु इनकी बढ़ती जनसंख्या सबसे बड़ा खतरा बन गई है। इन जानवरों ने नई निकल रही कोपलों तथा युवा तनों को तेज़ी से खाना प्रारंभ कर दिया है, जिसके कारण नए क्लोनों की संख्या घट रही है। पंडो पर शोध करने वाले रॉजर्स कहते हैं कि पुराने पेड़ के लगभग 47,000 तने लगभग 70 प्रतिशत मृत हैं या तेज़ी से अपने अंत के करीब हैं। अमेरिकी वन सेवा के निकोलस मास्टो कहते हैं कि पंडो के नए तने खच्चर, हिरण एवं एल्क के लिए स्वादिष्ट भोजन हैं। पंडो के पास अपना सुरक्षा तंत्र भी है – यदि पंडो खुद को खतरे में पाता है तो वह अपने रसायनों को बदल सकता है और अधिक अंकुरण कर सकता है। विपरीत परिस्थितियों में एस्पेन एक रसायन का उत्पादन करने में सक्षम होते हैं जो हिरणों के लिए अपने तनों के स्वाद को खराब करते हैं जो चराई के खिलाफ एक सुरक्षा है। शाकाहारी जानवरों से पंडो की सुरक्षा के लिए 2013 में अमरीकी वन विभाग के सहयोग से तथा संरक्षण प्रेमियों के एक गैर-मुनाफा संगठन की मदद से पंडो की 108 एकड़ जगह को तार से घेरा गया है। वैज्ञानिक आशावादी थे, पर कुछ कशमकश में थे कि शाकाहारी जानवरों के आक्रमण से बचाव के बाद पंडो के नए अंकुरों तथा युवा क्लोनों का क्या होगा? क्या पंडो नए क्लोनों को तेज़ी बनाने में सक्षम होंगे या फिर इनके मरने के और भी कारण है। खुशी की बात यह है कि फेंसिंग के कुछ साल बाद नए क्लोनों की कोपलें सुरक्षित हैं और युवा क्लोन तेज़ी से बढ़ रहे है। आशा है कि पृथ्वी का यह विशालतम जीव सुरक्षित रहेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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ब्रह्मांड में जीवन की उत्पत्ति कब हुई थी?

हाविस्फोट (बिग बैंग) के लगभग 1.5 करोड़ वर्ष बाद ब्रह्मांड धीरे-धीरे ठंडा होना शुरू हुआ। इस दौरान विद्युत-चुंबकीय विकिरण सामान्य तापमान पर आने लगा था। अमेरिकी भौतिक विज्ञानी एवी लोएब इस दौर को प्रारंभिक ब्रह्मांड का जीवन-योग्य युग कहते हैं। लोएब के अनुसार यदि हम उस दौर में रहते होते तो हमें गर्मी के लिए सूर्य की आवश्यकता नहीं होती बल्कि ब्रह्मांडीय पृष्ठभूमि विकिरण से प्राप्त गर्मी ही हमारे लिए पर्याप्त होती।

तो क्या यह माना जाए कि जीवन की शुरुआत इतनी जल्दी हुई थी। बिग बैंग घटना के बाद, पहले 20 मिनट की गर्म और सघन परिस्थितियों में केवल हाइड्रोजन और हीलियम के साथ मामूली मात्रा (10 अरब परमाणुओं में एक) में लीथियम भी उपस्थित था। अपेक्षाकृत भारी तत्व नगण्य थे।

जीवन के लिए तो पानी और कार्बनिक यौगिकों का होना आवश्यक है। इनके अस्तित्व में आने के लिए लगभग 5 करोड़ वर्ष और इंतज़ार करना पड़ा जब शुरुआती तारों में हाइड्रोजन और हीलियम के संलयन से ऑक्सीजन और कार्बन का निर्माण हुआ। यानी जीवन की शुरुआत के लिए प्रारंभिक अड़चन उपयुक्त तापमान नहीं बल्कि आवश्यक तत्वों की उपलब्धता भी थी।     

शुरुआत में भारी तत्वों की सीमित मात्रा को देखते हुए, जीवन की शुरुआत कितनी जल्दी हुई होगी? गौरतलब है कि ब्रह्मांड के अधिकांश तारे सूर्य से भी अरबों वर्ष पहले उपस्थित थे। तारों के निर्माण के इतिहास के आधार पर लोएब और उनके सहयोगियों का अनुमान है कि सूर्य जैसे तारों के आसपास जीवन की शुरुआत हाल के कुछ अरब वर्षों के दौरान हुई थी। अलबत्ता, भविष्य में बौने तारों (हमारे निकटतम पड़ोसी प्रॉक्सिमा सेंटॉरी जैसे) की परिक्रमा करने वाले ग्रहों में जीवन की शुरुआत होती रह सकती है। ये सूर्य की तुलना में सैकड़ों गुना अधिक समय तक जीवित रहेंगे। अंतत: शायद हमें प्रॉक्सिमा सेंटॉरी बी जैसे तारों के आसपास रहने योग्य ग्रहों पर जाकर बस जाना होगा जो कई खरब वर्षों तक जीवित रहने वाले हैं।

हमारी वर्तमान जानकारी के अनुसार पानी एकमात्र ऐसा पदार्थ है जो जीवन को सहारा दे सकता है। लेकिन इसके बारे में हमें अधिक जानकारी नहीं है। क्या शुरुआती ब्रह्मांड में कोई अन्य तरल पदार्थ मौजूद थे? मनस्वी लिंगम के साथ किए गए एक अध्ययन में लोएब बताते हैं कि शुरुआती तारों के निर्माण के समय अमोनिया, मिथेनॉल और हाइड्रोजन सल्फाइड तरल अवस्था में उपस्थित थे जबकि इथेन और प्रोपेन कुछ समय बाद तरल अवस्था में उपस्थित रहे। हालांकि जीवन की शुरुआत में इन पदार्थों की उपयुक्तता के बारे में तो अभी कोई जानकारी नहीं है लेकिन इनका प्रायोगिक अध्ययन किया जा सकता है। यदि भविष्य में हम संश्लेषित जीवन विकसित करने में सफल होते हैं तो हम यह भी खोज कर सकते हैं कि क्या जीवन पानी के अलावा अन्य तरल पदार्थों में भी उभर सकता है।

ब्रह्मांड में जीवन की शुरुआत का पता लगाने का एक तरीका यह हो सकता है कि क्या यह सबसे पुराने तारों के आसपास के ग्रहों पर शुरू हुआ था। ऐसे तारों पर हीलियम से अधिक भारी तत्वों की कमी होने की उम्मीद की जा सकती है जिन्हें खगोलविज्ञानी ‘धातु’ कहते हैं (यह परिभाषा आम रासायनिक परिभाषा से थोड़ी अलग है और इसमें ऑक्सीजन को धातु कहा जाता है)। धातु की कमी वाले तारे आकाशगंगा की परिधि में खोजे गए हैं और ये ब्रह्मांड के शुरुआती तारे माने गए हैं। इन तारों में अक्सर प्रचुर मात्रा में कार्बन दिखता है और इन्हें ‘कार्बन प्रचुर धातु विहीन’ (सीईएमपी) तारे कहा जाता है। लोएब का मत है कि सीईएमपी के आसपास के ग्रह ज़्यादातर कार्बन से बने होते हैं जिससे उनकी सतह पर प्रारंभिक जीवन का आधार मिल सकता है।

लिहाज़ा हम ऐसे ग्रहों की खोज कर सकते हैं जो सीईएमपी तारों के आसपास हैं और अपने वायुमंडलीय संघटन में जीवन की उपस्थिति के कुछ साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। हम इन तारों की उम्र के आधार पर यह अनुमान लगा पाएंगे कि ब्रह्मांड में जीवन की शुरुआत कितनी पहले हुई होगी।

इसके साथ ही हम अंतर-तारकीय तकनीकी उपकरणों की उम्र का भी अनुमान लगा सकते हैं जो पृथ्वी के नज़दीक चक्कर लगाते हुए दिखें या चंद्रमा से टकरा गए हों।

इसमें एक पूरक रणनीति अंतरिक्ष में प्रारंभिक दौर की सभ्यताओं के तकनीकी संकेतों की खोज करना भी हो सकती है। संचार संकेतों को भी खोजा जा सकता है लेकिन ऐसे संकेतों को यात्रा करने में अरबों वर्षों का समय लगता है और कोई भी सभ्यता इतनी धीमी गति से सूचनाओं के आदान-प्रदान में रुचि नहीं रखेगी। जीवन के संकेत हमेशा के लिए बने नहीं रहते हैं। खैर, अंतरिक्ष में जीवन जब मिलेगा, तब मिलेगा लेकिन तब तक हमें प्रकृति से मिले हुए अस्थायी उपहारों का जश्न मनाना चाहिए, लुत्फ उठाना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

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मधुमक्खियों में दूर तक संवाद

बेशक मधुमक्खियां हमारी तरह बोल नहीं सकतीं लेकिन हाल ही में शोधकर्ताओं ने पाया है कि उनमें भी लंबी दूरी का और बड़े पैमाने पर संवाद होता है। मधुमक्खियां आपस में मिलकर रसायनों की गंध के माध्यम से दूर-दूर मौजूद अपने अन्य साथियों को रानी मधुमक्खी की स्थिति के बारे में जानकारी देती हैं।

मधुमक्खियां फेरोमोन नामक रसायनों की मदद से आपस में संवाद करती हैं, जिसे वे अपने एंटीना के माध्यम से पहचानती हैं। रानी मधुमक्खी फेरोमोन्स जारी करके श्रमिक मधुमक्खियों को अपने पास बुलाती है। लेकिन फेरोमोन्स हवा में सीमित दूरी तक ही पहुंचते हैं। तो रानी का संदेश दूर के श्रमिकों तक कैसे पहुंचता है?

रानी मधुमक्खी के आसपास मंडराने वाली श्रमिक मधुमक्खियां भी नेसानोव नामक फेरोमोन जारी कर अन्यत्र मौजूद अपने साथियों को बुला सकती हैं। नेसानोव की गंध छोड़ने के लिए वे अपने पेट को थोड़ा ऊंचा उठाती हैं ताकि फेरोमोन स्रावित करने वाली ग्रंथियां हवा के संपर्क में आ जाएं। फिर अपने पंखों को फड़फड़ाकर वे गंध को पीछे की ओर भेजती हैं।

इस प्रक्रिया का खुलासा करने के लिए कोलेरैडो विश्वविद्यालय के कंप्यूटर विज्ञानी डियू माय गुयेन और उनके साथियों ने अध्ययन के लिए आम तौर पर पाई जाने वाली मधुमक्खियों (एपिस मेलिफेरा) की एक कॉलोनी को चुना। अध्ययन के लिए उन्होंने पिज़्ज़ा के डिब्बे के आकार का समतल क्षेत्र तैयार किया जिसकी छत पारदर्शी थी। इसमें मधुमक्खियां सिर्फ चल सकती थीं, उड़ नहीं सकती थीं। इसके एक कोने पर उन्होंने रानी मधुमक्खी को कैद कर दिया और दूसरी तरफ से श्रमिक मधुमक्खियों को छोड़ा और उनकी गतिविधियां कैमरे में रिकॉर्ड की। फिर कृत्रिम बुद्धि सॉफ्टवेयर की मदद से नेसानोव फेरोमोन जारी करने वाली मधुमक्खियों को ट्रैक किया।

शोधकर्ताओं ने पाया कि किसी श्रमिक मधुमक्खी द्वारा रानी की स्थिति पता कर लेने के बाद उन्होंने रानी मधुमक्खी के पास से एक-दूसरे को एक-समान दूरी पर व्यवस्थित रूप से कतारबद्ध करना शुरू कर दिया था, हरेक मधुमक्खी अपने पंख फड़फड़ा कर अपने पड़ोसी मधुमक्खी तक नेसानोव पहुंचाकर उसे ठीक से कतार में लगवा रही थी। प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ में शोधकर्ता बताते हैं कि इस तरह के सामूहिक संवाद का अवलोकन पहली बार मधुमक्खियों में किया गया है। यह संवाद मधुमक्खियों को रानी मधुमक्खी तक वापस पहुंचने में मदद करता है – जो एक अकेली मधुमक्खी द्वारा संभव नहीं है। देखा गया है कि मधुमक्खियां गंध की इस  शृंखला के द्वारा एक-दूसरे के बीच लगभग 6 सेंटीमीटर की दूरी रखती हैं। इससे लगता है कि किसी मधुमक्खी को फेरोमोन की एक निश्चित मात्रा प्राप्त होते ही वह अपना सारा काम छोड़कर खुद फेरोमोन स्रावित करने लगती है।

अन्य शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अध्ययन समतल स्थान में किया गया है जबकि वास्तव में मधुमक्खियां आगे-पीछे, ऊपर-नीचे कहीं भी हो सकती हैं। और तो और, अक्सर हवा और बारिश जैसे कारक उन्हें प्रभावित करते हैं, जो उनके संचार को और अधिक जटिल बनाते हैं। हालांकि सरलीकृत मॉडल से यह पता चलता है कि मधुमक्खियां कैसे खुद व्यवस्थित होती हैं, झुंड बनाती हैं। बहरहाल मधुमक्खियों के प्राकृतिक झुंडों का निरीक्षण करके देखना चाहिए कि क्या वास्तव में वे ऐसा करती हैं। (स्रोत फीचर्स)

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वन्यजीवों से कोरोनावायरस फैलने की अधिक संभावना

कोविड महामारी के स्रोत का पता लगाने के प्रयास लगातार जारी हैं। हाल ही में सीएनएन द्वारा प्रसारित साक्षात्कार में एक प्रमुख वैज्ञानिक सेंटर फॉर डिसीज़ कंट्रोल के पूर्व निदेशक और वायरोलॉजिस्ट रॉबर्ट रेडफील्ड ने बिना किसी प्रमाण के दावा किया कि सार्स-कोव-2 वुहान की प्रयोगशाला से निकला है। साथ ही उन्होंने कहा कि यह मात्र एक निजी राय है। इसके दो दिन बाद कुछ अन्य लोगों (डबल्यूएचओ और चीन सरकार की टीम) ने वायरस के वन्यजीवों से फैलने की बात कही जिसकी शुरुआत चमगादड़ों से हुई है। इसमें भी कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं दिया गया।

गौरतलब है कि वुहान की प्रयोगशाला में किसी को भी ऐसा कोरोनावायरस नहीं मिला है जिसे बदलकर ज़्यादा फैलने वाला बनाया गया हो और फिर उसने बदलते-बदलते सार्स-कोव-2 जैसा रूप लेकर वहां किसी कर्मचारी को संक्रमित कर दिया हो। इसी तरह किसी को जंगली जीवों में कोरोनावायरस के प्रमाण भी नहीं मिले हैं जो एक से दूसरे जंतु में आगे बढ़ते-बढ़ते उत्परिवर्तित होकर सार्स-कोव-2 के समान हो गया हो और फिर मनुष्यों में प्रवेश कर गया हो।

अभी तक ये दोनों ही विचार प्रमाण-विहीन हैं और दोनों ही संभव हैं।

फिर भी इन दोनों विचारों के सही होने की संभावना बराबर नहीं है। देखा जाए तो प्रयोगशाला से वायरस के निकलने की कोई एक या शायद कुछ मुट्ठी भर घटनाएं हो सकती हैं जबकि वन्यजीवों से वायरस के फैलने के अनेकों अवसर होंगे।

रेडफील्ड की अटकल है कि किसी भी वायरस के लिए इतने कम समय में जीवों से मनुष्यों में प्रवेश करने की कुशलता हासिल करना बिना प्रयोगशाला के संभव नहीं है। लेकिन एक बार में इतनी बड़ी छलांग बहुत बड़ी बात होगी। स्वयं रेडफील्ड ने कहा है कि यह वायरस हमारी जानकारी में आने के कई महीनों पहले से प्रसारित हो रहा था। यानी मनुष्यों तक पहुंचने से पहले एक लंबी अवधि रही होगी जो इस वायरस के वन्यजीवों से फैलने का संकेत देती है।

वन्यजीवों से वायरस के फैलने का विचार इस बात पर टिका है कि चीन में करोड़ों चमगादड़ हैं और उनका मनुष्यों समेत अन्य जीवों से खूब संपर्क होता है। अत:, वायरस के मनुष्यों में प्रवेश करने के कई मौके हो सकते हैं। मूल रूप में तो यह वायरस मनुष्यों में खुद की प्रतिलिपि तैयार करने में अक्षम होता है। लेकिन मनुष्यों को संक्रमित करने के पहले इसे विकसित होने के लाखों मौके मिले होंगे। गौरतलब है कि चमगादड़ अक्सर कई जीवों जैसे पैंगोलिन, बैजर, सूअर, एवं अन्य के संपर्क में आते हैं जिससे ये मौकापरस्त वायरस इन प्रजातियों को आसानी से संक्रमित कर देते हैं। चमगादड़ कॉलोनियों में रहते हैं इसलिए विभिन्न प्रकार के कोरोनावायरस के मिश्रण की संभावना होती है और उन्हें अपने जींस को पुनर्मिश्रित करने का पूरा मौका मिलता है। यहां तक कि एक अकेले चमगादड़ में भी विभिन्न कोरोनावायरस देखे गए हैं।

इन वायरसों को मेज़बानों के बीच छलांग लगाने के लिए कई महीनों का समय मिलता है। इसी दौरान वे उत्परिवर्तित भी होते रहते हैं। एक बार मनुष्यों में प्रवेश करने पर उन वायरस संस्करणों को वरीयता मिलती है जो मानव कोशिकाओं को संक्रमित करके अपनी प्रतिलिपियां बनाने की क्षमता रखते हैं। जल्द ही वे कोशिकाओं को इस स्तर तक संक्रमित कर देते हैं कि लोग बीमार होने लगते हैं। तब जाकर एक नई बीमारी प्रकट होती है। यह वही अवधि होती है जिसे रेडफील्ड ने माना है कि वायरस प्रसारित होता रहा है।

वास्तव में हम कोरोनावायरस के विकास में यह घटनाक्रम देख भी रहे हैं। इसमें काफी तेज़ी से उत्परिवर्तन हो रहे हैं (E484K और 501Y जैसे) जो वायरस को और अधिक संक्रामक बनाते हैं। युनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के वायरोलॉजिस्ट एडम लौरिंग के अनुसार ये परिवर्तन प्राकृतिक रूप से हो रहे हैं। जिसका कारण यह है कि वायरस को लाखों संक्रमित व्यक्तियों में उत्परिवर्तन के लाखों अवसर मिल रहे हैं।

तो किसे सही माना जाए? रेडफील्ड की प्रयोगशाला से रिसाव की परिकल्पना को जो मात्र एक संयोग पर निर्भर है? या फिर वन्यजीवों से प्रसारित होने की परिकल्पना को जिसे लाखों अवसर मिल रहे हैं? हालांकि दोनों ही संभव हैं लेकिन एक की संभावना अधिक मालूम होती है। इसीलिए, अधिकांश वैज्ञानिकों को वन्यजीवों के माध्यम से इस वायरस के फैलने के आशंका अधिक विश्वसनीय लगती है।

वायरस की उत्पत्ति का सवाल महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे किसी महामारी के शुरू होने की जानकारी मिल सकती है ताकि भविष्य में इस तरह की स्थितियों को रोका जा सके। आज भी कई रोग पैदा करने वाले वायरस हमारे बीच मौजूद हैं जो महामारी का रूप ले सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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स्वयं से बातें करना: लाभ-हानि

ई बार हम स्वयं से बातें करते हैं – या तो मन-ही-मन में या बोलकर। कुछ लोग ऐसा नियमित रूप से करते हैं तो कई अन्य ऐसा करके काफी अच्छा महसूस करते हैं। लेकिन क्या खुद से बात करना सामान्य है?

स्वयं से बात करने का काफी अध्ययन हुआ है। कई लोग इसे एक मानसिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में देखते हैं लेकिन ऐसे सेल्फ-टॉक या सेल्फ-डायरेक्टेड टॉक (स्वगत संभाषण) को मनोवैज्ञानिक सामान्य और कुछ परिस्थितियों में फायदेमंद भी मानते हैं।

इस व्यवहार के व्यवस्थित अध्ययन की शुरुआत 1880 के दशक में हुई थी। वैज्ञानिकों की विशेष दिलचस्पी यह जानने की थी कि लोग स्वयं से क्या बात करते हैं, क्यों और किस उद्देश्य से करते हैं। शोधकर्ताओं ने सेल्फ-टॉक को आंतरिक मतों या धारणाओं की मौखिक अभिव्यक्ति के रूप में परिभाषित किया है।

बच्चे अक्सर ऐसा करते हैं, और यह उनके भाषा के विकास, किसी कार्य में सक्रियता और प्रदर्शन को सुधारने का एक तरीका है। यह माता-पिता के लिए चिंता का कारण नहीं होना चाहिए। और तो और, वयस्क अवस्था में भी यह व्यवहार कोई समस्या नहीं है। यह फायदेमंद भी हो सकता है बशर्ते कि कोई व्यक्ति मतिभ्रम जैसी मानसिक समस्या का अनुभव न करने लगे।

किसी कार्य के दौरान सेल्फ-टॉक से उस काम में नियंत्रण, एकाग्रता और प्रदर्शन में सुधार होता है और साथ ही समस्या-समाधान के कौशल में भी बढ़ोतरी होती है। वर्ष 2012 में किए गए एक अध्ययन में देखा गया कि कैसे सेल्फ-टॉक किसी वस्तु की तलाश के कार्य को प्रभावित करता है। इस अध्ययन में पता चला कि जब हम किसी गुम वस्तु या सुपर मार्केट में किसी विशेष उत्पाद की तलाश करते हैं तब सेल्फ-टॉक मददगार होता है। खेलकूद में भी सेल्फ-टॉक काफी फायदेमंद साबित होता है। सब कुछ इस बात पर भी निर्भर करता है सेल्फ-टॉक किस प्रकार का है:

1. सकारात्मक: इससे व्यक्ति को सकारात्मक सोच के लिए प्रोत्साहन और शक्ति मिलती है। इससे चिंता में कमी और एकाग्रता एवं ध्यान में सुधार हो सकता है।

2. नकारात्मक: आलोचनात्मक और हतोत्साहित करने वाला संवाद होता है।

3. तटस्थ: यह न तो सकारात्मक होता है, न नकारात्मक। यह निर्देशात्मक होता है, न कि किसी विशेष विश्वास या भावना को प्रोत्साहित करने के लिए।

लेकिन मुख्य सवाल है कि सेल्फ-टॉक से लोगों को क्या फायदा होता है। शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि सेल्फ-टॉक से लोगों को भावनाओं को नियमित और संसाधित करने में मदद मिलती है। जैसे, क्रोध और घबराहट की स्थिति में सेल्फ-टॉक से भावनाओं को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। इसके अलावा 2014 में किए गए अध्ययन से पता चला है कि दुश्चिंता से ग्रस्त लोगों के लिए सेल्फ-टॉक काफी फायदेमंद होता है। तनावपूर्ण घटनाओं के बाद सेल्फ-टॉक से चिंता में भी कमी होती है।

यदि सेल्फ-टॉक जीवन में खलल डालने लगे तो उसे कम करने के उपाय भी हैं। जैसे व्यक्ति सेल्फ-टॉक को एक डायरी में लिखने की आदत डाल ले तो इस आदत को नियंत्रित किया जा सकता है। वैसे स्वयं की आलोचना और नकारात्मक सेल्फ-टॉक से मानसिक स्वास्थ्य के प्रभावित होने की आशंका भी होती है। कभी कभी सेल्फ-टॉक के साथ मतिभ्रम होना शीज़ोफ्रेनिया का द्योतक होता है। ऐसी परिस्थितियों में मनोचिकित्सक से परामर्श करना बेहतर होगा। कुल मिलाकर, स्वयं से बात करना एक सामान्य व्यवहार है जो किसी मानसिक समस्या का लक्षण नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

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अंतरिक्ष स्टेशन पर मिले उपयोगी बैक्टीरिया

पिछले 20 वर्षों से अंतरिक्ष यात्रियों का घर – अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (आईएसएस) – कुछ अनोखे बैक्टीरिया का मेज़बान भी बन गया है। स्पेस स्टेशन पर पाए गए चार बैक्टीरिया स्ट्रेन में से तीन के बारे में पूर्व में कोई जानकारी नहीं थी। फ्रंटियर्स इन माइक्रोबायोलॉजी जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार इन बैक्टीरिया स्ट्रेन्स का उपयोग भविष्य में लंबी अंतरिक्ष उड़ानों के दौरान पौधे उगाने के लिए किया जा सकता है।

गौरतलब है कि कई वर्षों से पृथ्वी से पूरी तरह से अलग होने से स्पेस स्टेशन एक अनूठा पर्यावरण है। ऐसे में यह जानने के लिए तरह-तरह के प्रयोग किए गए हैं कि यहां कौन-से बैक्टीरिया मौजूद हैं। पिछले 6 वर्षों में स्पेस स्टेशन के 8 विशिष्ट स्थानों पर निरंतर सूक्ष्मजीवों और बैक्टीरिया की वृद्धि की जांच की जा रही है। इन स्थानों में वह स्थान भी शामिल है जहां सैकड़ों वैज्ञानिक प्रयोग किए जाते हैं, पौधों की खेती का प्रकोष्ठ भी शामिल है और वह जगह भी जहां क्रू-सदस्य भोजन और अन्य अवसरों पर साथ आते हैं। इस तरह सैकड़ों नमूने पृथ्वी पर विश्लेषण के लिए आए हैं और कई हज़ार अभी कतार में हैं।

पृथक किए गए बैक्टीरिया के चारों स्ट्रेन मिथाइलोबैक्टीरिएसी कुल से हैं। मिथाइलोबैक्टीरियम प्रजातियां विशेष रूप से पौधों की वृद्धि में और रोगजनकों से लड़ने में सहायक होती हैं। हालांकि इन चार में से एक (मिथाइलोरुब्रम रोडेशिएनम) पहले से ज्ञात था जबकि छड़ आकार के तीन अन्य बैक्टीरिया अज्ञात थे। इनके आनुवंशिक विश्लेषण में वैज्ञानिकों ने पाया कि ये बैक्टीरिया प्रजातियां मिथाइलोबैक्टीरियम इंडीकम के निकट सम्बंधी हैं। अब इनमें से एक बैक्टीरिया का नाम भारतीय जैव-विविधता वैज्ञानिक मुहम्मद अजमल खान के सम्मान में मिथाइलोबैक्टीरियम अजमाली रखा गया है।

इस बैक्टीरिया के संभावित अनुप्रयोगों को समझने के लिए नासा जेट प्रपल्शन लेबोरेटरी के वैज्ञानिक कस्तूरी वेंकटेश्वरन और नितीश कुमार ने इस शोध पर काम किया है। वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि यह नया स्ट्रेन पौधों की वृद्धि में उपयोगी हो सकता है। न्यूनतम संसाधनों वाले क्षेत्रों में यह जीवाणु मुश्किल परिस्थितियों में भी पौधे के बढ़ने में सहायक होगा। पत्तेदार सब्ज़ियों और मूली को तो सफलतापूर्वक अंतरिक्ष स्टेशन पर उगाया गया है लेकिन फसलों को उगाने में थोड़ी कठिनाई होती है। ऐसे में मिथाइलोबैक्टीरियम इस संदर्भ में उपयोगी हो सकता है।

अभी इस बैक्टीरिया के सही उपयोग को समझने के लिए समय और कई प्रयोगों की ज़रूरत है। आईएसएस पर मिले ये तीन स्ट्रेन अलग-अलग समय पर और अलग-अलग स्थानों से लिए गए थे इसलिए आईएसएस में इनके टिकाऊपन और पारिस्थितिक महत्व का अध्ययन करना होगा। मंगल पर मानव को भेजा जाए, उससे पहले इस तरह के अध्ययन महत्वपूर्ण और ज़रूरी हैं। (स्रोत फीचर्स)

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क्या ऑक्टोपस सपने देखते हैं?

क्टोपस सपने देखते हैं या नहीं, यह तो अभी पता नहीं चल पाया है लेकिन वैज्ञानिक इस गुत्थी को सुलझाने की ओर बढ़े हैं। आईसाइंस (iScience) में प्रकाशित हालिया अध्ययन बताता है कि मनुष्यों की तरह ऑक्टोपस भी नींद की दो अवस्थाओं का अनुभव करते हैं -सक्रिय नींद और शांत नींद। लेकिन मनुष्यों और ऑक्टोपस, दोनों में इस दो अवस्था वाली नींद का विकास स्वतंत्र रूप से हुआ होगा, क्योंकि ये दोनों जैव-विकास में लगभग 50 करोड़ वर्ष पूर्व अलग-अलग हो चुके थे।

फेडरल युनिवर्सिटी ऑफ रियो ग्रांड डो नोर्टे के सिडार्टा रिबेलियो और उनके साथियों ने इस अध्ययन में ऑक्टोपस इंसुलेरिस (Octopus insularis) प्रजाति के चार ऑक्टोपस का प्रयोगशाला के टैंक में सोते समय वीडियो बनाया। यह जांचने के लिए कि ऑक्टोपस सो रहे हैं या जाग रहे हैं, शोधकर्ताओं ने ऑक्टोपस को टैंक के बाहर से स्क्रीन पर जीवित केकड़ों का वीडियो दिखाया या रबर के हथौड़े से टैंक की दीवार पर हल्के से ठोंका और देखा कि क्या ऑक्टोपस में प्रतिक्रिया स्वरूप कोई हलचल हुई। देखा गया कि ‘शांत’ नींद के दौरान ऑक्टोपस की त्वचा की रंगत पीली थी, पुतलियां सिकुड़ गर्इं थी, वे शांत थे और उनके चूषक व भुजाओं के छोर हल्के-हल्के हिल रहे थे। लेकिन ‘सक्रिय नींद’ के दौरान उनकी त्वचा गहरे रंग की और कसी हुई थी, उन्होंने अपनी आंखें घुमाई और मांसपेशीय ऐंठन ने उनके चूषकों और शरीर को सिकोड़ दिया था।

ऑक्टोपस में लगभग 40 सेकंड लंबी सक्रिय नींद सामान्यत: एक लंबी शांत नींद के बाद आती है। हर 30-40 मिनट की शांत नींद के बाद उनमें सक्रिय नींद देखी गई। ऑक्टोपस में नींद की ये दो अवस्थाएं स्तनधारियों की नींद की दो प्रमुख अवस्थाओं के समान दिखती हैं। पहली, तीव्र नेत्र गति (या रेपिड आई मूवमेंट, REM) नींद। इस अवस्था में आंखें तेज़ी से घूमती हैं और सपने आते हैं। और दूसरी है ‘मंद-तरंग’ नींद। इस अवस्था में पूरे मस्तिष्क में विद्युत गतिविधि एक समान लय में चलती हैं। नींद की यह अवस्था मस्तिष्क में स्मृतियों को सहेजने और फालतू जानकारी हटाने में अहम मानी जाती है।

फिर भी, शोधकर्ता मनुष्यों और ऑक्टोपस की नींद में समानता देखने मे सावधानी बरत रहे हैं क्योंकि ऑक्टोपस और स्तनधारियों के मस्तिष्क की बनावट बहुत अलग-अलग है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि मनुष्यों में सपने आम तौर पर REM नींद के दौरान आते हैं, लेकिन ऑक्टोपस से तो यह नहीं पूछा जा सकता कि क्या वे सपने देख रहे हैं। फिर भी शोधकर्ताओं का अनुमान है कि जागते हुए जब वे कोई नई बात सीखते हैं तब उनकी त्वचा की रंगत और विभिन्न अवस्थाओं में सोते हुए त्वचा की रंगत की तुलना करके पता लगाया जा सकता है कि वे सपने देख रहे हैं या नहीं। यदि सपने नहीं भी देखते, तो भी यह तो माना जा सकता है कि वे इस दौरान कुछ तो अनुभव करते हैं। ऑक्टोपस कठिन चुनौतियां हल करने के लिए जाने जाते हैं – मर्तबान का ढक्कन हटाना या छद्मावरण बनाना। तो उनमें इस बात की जांच की जा सकती है कि नींद (या नींद में कमी) उनकी सीखने की क्षमता को कैसे प्रभावित करती है, जो उनकी स्मृतियों को ठीक से सहेजने में नींद की भूमिका स्पष्ट करेगी।

उनके मस्तिष्क में चलने वाली हलचल को इलेक्ट्रोड की मदद से मापा जाना चाहिए लेकिन यह मुश्किल होगा, क्योंकि वे शरीर पर लगी हर चीज़ को निकाल फेंकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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कीटनाशकों के बदलते उपयोग का जीवों पर प्रभाव

रपतवार व फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीट किसानों को अपने दुश्मन लगते हैं। इनका सफाया करने के लिए वे रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग करते हैं। लेकिन ये रसायन सिर्फ दुश्मनों का सफाया नहीं करते बल्कि वे मधुमक्खियों, मछलियों और क्रस्टेशियन जैसे निर्दोष जीवों को भी नुकसान पहुंचाते हैं।

हाल ही में एक विशाल अध्ययन ने हाल के दशकों में अमेरिका के किसानों द्वारा कीटनाशकों के उपयोग में हुए बदलाव के चलते ऐसे प्रभावों में हुए परिवर्तनों का विश्लेषण किया है। देखा गया कि कीटनाशकों के उपयोग में आए बदलाव से पक्षियों और स्तनधारियों की स्थिति बेहतर रही, जबकि इससे परागणकर्ता जीव व जलीय अकशेरुकी जीव बहुत बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।

खरपतवारों में खरपतवारनाशकों के खिलाफ प्रतिरोध विकसित हो जाने से किसानों द्वारा इन रसायनों का उपयोग बढ़ा और इसके चलते भूमि पर उगने वाले पौधों में भी विषाक्तता का प्रभाव बहुत बढ़ गया।

पिछले कुछ दशकों में संयुक्त राज्य अमेरिका में कीटनाशकों के उपयोग की मात्रा में लगभग 40 प्रतिशत की कमी आई है। लेकिन इसके साथ अधिक शक्तिशाली और विषाक्त रसायनों का उपयोग बढ़ा है। उदाहरण के लिए पायरेथ्रॉइड्स अत्यधिक प्रभावी कीटनाशक समूह है। इनकी बहुत कम मात्रा भी अत्यधिक ज़हरीली होती है और ये तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करते हैं। पूर्व में उपयोग किए जाने वाले कीटनाशक (जैसे ऑर्गेनोफॉस्फेट या कार्बेमेट) एक हैक्टर में कई किलोग्राम लगते थे, लेकिन पायरेथ्रॉइड्स की महज़ 6 ग्राम मात्रा पर्याप्त होती है।

पारिस्थितिकी-विषाक्तता विज्ञानी रॉल्फ शुल्ज़ और उनके साथियों ने वर्ष 1992 से 2016 तक स्वयं किसानों द्वारा कीटनाशकों के उपयोग के बारे में दी गई जानकारी के अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण डैटा से शुरुआत की। फिर उन्होंने उपयोग किए गए सभी यौगिकों (381 रसायनों) के लिए अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (ईपीए) द्वारा निर्धारित विषाक्तता के स्तर (जितनी मात्रा में कोई पदार्थ या रसायन वनस्पतियों या वन्यजीवों को नुकसान पहुंचा सकता है) और खेतों में उपयोग किए गए प्रत्येक कीटनाशक की मात्रा की तुलना की और कुल प्रयुक्त विषाक्तता पता की।

साइंस पत्रिका में प्रकाशित नतीजों के अनुसार संभवत: पुराने कीटनाशकों के उपयोग में आई कमी के कारण 1992 से 2016 तक पक्षियों और स्तनधारियों के लिए कुल विषाक्तता में 95 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है। मछलियों के लिए विषाक्तता स्तर में एक-तिहाई की कमी आई है। मछलियों के लिए विषाक्तता में होने वाली कमी का प्रतिशत कम दिखता है क्योंकि मछलियां पायरेथ्रॉइड्स के प्रति अधिक संवेदनशील हैं और खेतों में इनका उपयोग बढ़ा है। लेकिन पायरेथ्रॉइड्स की वजह से जलीय अकशेरुकी जीवों (जैसे प्लवक और कीट-लार्वा) के लिए विषाक्तता दुगनी हो गई है। इसके अलावा निओनिकोटिनॉइड्स कीटनाशक ने मधुमक्खियों और भौंरों जैसे परागणकर्ताओं के लिए विषाक्तता का जोखिम दुगना कर दिया है। इसी तरह के नतीजे एक छोटे अध्ययन में भी देखने को मिले थे, जिसके अनुसार इस बदलाव से कशेरुकी जीव कम प्रभावित हुए लेकिन अकशेरुकी जीवों को बहुत क्षति पहुंची है।

कुछ कीटनाशकों और प्रजातियों के लिए वास्तविक प्रभाव का अनुमान लगाना मुश्किल है, क्योंकि पौधों और जीवों को सिर्फ रसायन ही प्रभावित नहीं करते बल्कि मौसम या वर्ष का समय जैसे कई अन्य कारक भी होते हैं। यह देखने के लिए कि सिर्फ कीटनाशकों ने जलीय क्रस्टेशियन और कीटों को किस तरह प्रभावित किया, शोधकर्ताओं ने संयुक्त राज्य अमेरिका की 231 झीलों और नदियों का विषाक्तता सम्बंधी डैटा खंगाला। जब इसकी तुलना उन्होंने उन क्षेत्रों के आसपास उपयोग किए गए कीटनाशकों की मात्रा के साथ की तो उन्होंने पाया कि इनके बीच काफी सम्बंध है।

जीवों के अलावा विषाक्तता से पौधे भी प्रभावित हुए हैं। 2004 के बाद से थलीय पौधों में खरपतवारनाशी रसायनों के कारण आई कुल विषाक्तता दुगनी हुई है। इस विषाक्तता को बढ़ाने में सबसे अधिक योगदान ग्लायफोसेट नामक खरपतवारनाशी का है। कुछ खरपतवारों ने ग्लायफोसेट के खिलाफ प्रतिरोध विकसित कर लिया, और किसान उनके सफाए के लिए अधिकाधिक मात्रा में ग्लायफोसेट का छिड़काव करने लगे। इससे मेड़ों पर उगने वाले पौधों और उन पर आश्रित जीवों के लिए खतरा बढ़ गया।

कीटनाशकों का उपयोग कम करने के लिए मक्का की एक किस्म को जेनेटिक रूप से परिवर्तित करके उसमें कीटनाशक रसायन बीटी जोड़ा गया था। इसके चलते विषाक्त रसायनों का उपयोग कम होना था लेकिन देखा गया कि पिछले एक दशक में बीटी मक्का और सामान्य मक्का दोनों में डाली गई विषाक्तता में प्रति वर्ष 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।

शुल्ज़ को उम्मीद है कि ये नतीजे नीति निर्माताओं और अन्य लोगों को कीट और खरपतवार नियंत्रण की जटिलता पर और जंगली प्रजातियों को बेवजह होने वाली क्षति को कम करने के लिए सोचने में मदद करेंगे। अमेरिका में कीटनाशक के उपयोग के पैटर्न और विषाक्तता सम्बंधी डैटा से बाकी दुनिया को सबक लेना चाहिए, जहां कीट नियंत्रण के लिए पर्यावरण हितैषी तरीकों की बजाय कीटनाशकों का उपयोग किया जा रहा है।

कीटनाशक उपयोग सम्बंधी फैसले इस पर भी निर्भर करते हैं कि किसी समाज या समुदाय के लिए कौन-सी प्रजातियां महत्व रखती हैं। जैसे युरोपीय संघ में नियामकों ने नियोनिकोटिनॉइड्स के उपयोग को प्रतिबंधित कर दिया ताकि परागणकर्ताओं को नुकसान न हो। लेकिन संभवत: अब किसान अन्य कीटनाशकों का उपयोग करेंगे जो अन्य प्रजातियों को जोखिम में डाल सकता है, या पैदावार घट जाएगी और खाद्यान्न की कीमतें आसमान छूएंगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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