एक महिला की कोशिकाओं पर बरसों से शोध – ऋषि राज राय

जकल ज़्यादातर दवाइयां-टीके बनाने, एचआईवी के परीक्षण, कोशिकाओं में संपन्न क्रियाओं व उनसे जुड़े सिद्धांत एवं कई अन्य बीमारियों को समझने के लिए वैज्ञानिक प्रयोगशाला में मानव कोशिकाओं का संवर्धन करते हैं। वैज्ञानिकों को कैंसर जैसी जटिल बीमारी को समझने तथा शोध करने के लिए ऐसी कोशिकाओं की ज़रूरत पड़ती है, जो लगातार समरूपता के साथ विभाजित होती रहें ताकि कृत्रिम परिस्थिति में उन कोशिकाओं की मदद से बीमारियों की उत्पत्ति, बीमारियों की क्रियाविधि और इलाज के विभिन्न तरीके खोजे जा सकें।

वैज्ञानिकों को समरूपी कोशिकाओं की ज़रूरत इसलिए भी पड़ती है क्योंकि उन्हें एक तरह के प्रयोग बार-बार दोहराने पड़ते हैं और अपने नतीजों की तुलना दूसरे वैज्ञानिकों के अवलोकनों के साथ करनी पड़ती है। परंतु 1951 तक वैज्ञानिकों के पास ऐसा कोई कोशिका-वंश नहीं था जो वर्षों तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक जैसी समरूप कोशिकाओं को जन्म दे सके। जो कोशिका-वंश उपलब्ध भी थे या जिन्हें बनाने की कोशिश की गई थी उनकी कोशिकाएं ज़्यादा से ज़्यादा एक-दो दिन में मर जाती थीं और उनका अध्ययन करना मुश्किल होता था।

हेनरीटा लैक्स

फिर संयुक्त राज्य अमरीका के जॉन हॉपकिन्स विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक जॉर्ज गे की प्रयोगशाला में अजीबो-गरीब दिखने वाले ट्यूमर का एक नमूना आया। यह ट्यूमर कुछ हल्के बैंगनी रंग का, जेली जैसा चमकदार था। यह नमूना इसलिए भी कुछ खास था क्योंकि इसकी कुछ कोशिकाएं लगातार विभाजित होते हुए समरूपी कोशिकाओं को जन्म दे रहीं थीं। उन्होंने देखा कि जब कोई पुरानी कोशिका मरती है तो उसके जैसी ही कोशिका की प्रतियां उसकी जगह ले लेती हैं। इससे हुआ यह कि उसी कोशिका की संतानें आज तक मौजूद हैं और उनकी मदद से कई शोध कार्य भी हो रहे हैं।

डॉ. गे की एक प्रयोगशाला सहायक ने इस अमर कोशिका का नाम ‘हेला’ (HeLa) रखा। हेला नाम हेनरीटा लैक्स नामक कैंसर पीड़ित महिला के नाम पर रखा गया था जिनके ट्यूमर से डॉ. गे ने इस कोशिका-वंश की खोज की थी। हेनरीटा लैक्स का जन्म संयुक्त राज्य के वर्जीनिया में हुआ था और वे तम्बाकू के खेत में काम किया करती थीं। हुआ यह कि लैक्स जिस चिकित्सक के यहां इलाज करवा रही थीं, वे डॉ. गे की प्रयोगशाला के लिए कैंसर के ऊतकों के नमूने इकट्ठा कर रहे थे। बरसों से डॉ. गे और उनकी नर्स पत्नी मार्गरेट मानव कोशिकाओं को कृत्रिम रूप से प्रयोगशाला में पनपाने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन बाकी वैज्ञानिकों की तरह इनके द्वारा संवर्धित कोशिकाएं कुछ पीढ़ियों तक विभाजित होने के बाद मर जाती थीं। लैक्स की मौत गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर से हुई थी और उनकी मौत के कुछ ही महीनों बाद डॉ. गे की प्रयोगशाला में उनके शरीर के ट्यूमर कोशिकाओं की मदद से इस अमर कोशिका-वंश को खोजा गया।

अब सवाल यह उठता है कि हेनरीटा लैक्स की ट्यूमर कोशिकाओं में ऐसा क्या खास है जिससे वे मरती नहीं हैं और विभाजित होते हुए लगातार समरूपी कोशिकाओं को जन्म देती रहती हैं? सच कहें तो इसका उत्तर आज भी पूरी तरह पता नहीं है।

होता यह है कि सामान्य कोशिकाएं औसतन पचास बार विभाजन करने के बाद एपोप्टोसिस नामक प्रक्रिया से खुद-ब-खुद खत्म हो जाती हैं। इसी कारण ज़्यादातर कोशिका-वंश भी एक समय के बाद खत्म हो जाते हैं। लेकिन हेला कोशिकाओं के साथ ऐसा नहीं होता, क्योंकि हेला कोशिकाओं में टेलोमरेज़ नामक एंज़ाइम अत्यधिक सक्रिय होता है। इससे कोशिकाएं एपोप्टोसिस की प्रक्रिया से न गुज़रकर लगातार विभाजित होती रहती हैं।

विभाजन से हाल ही में बनी हेला कोशिकाओं का इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से प्राप्त चित्र

डॉ. गे ने अमर कोशिका-वंश ‘हेला’ के कई नमूने दुनिया भर की प्रयोगशालाओं और वैज्ञानिकों के पास भेजे। जल्दी ही दुनिया में असंख्य हेला कोशिकाएं हर हफ्ते बनने और इस्तेमाल होने लगीं।

1950 के दशक में पोलियो की महामारी बुरी तरह फैली हुई थी। जोनास साल्क ने इन्हीं हेला कोशिकाओं का इस्तेमाल कर पोलियो के टीके का परीक्षण किया था। हेला कोशिकाओं को कई तरह की बीमारियों, जैसे चेचक, एचआईवी और इबोला को समझने और उन पर परीक्षण करने के लिए इस्तेमाल में लिया गया है।

ऐसा माना जाता है कि वाल्टर फ्लेमिंग ने 1882 में गुणसूत्रों की खोज की, पर लगभग 70 वर्ष बाद इन्हीं हेला कोशिकाओं की मदद से तीज़ो और लेवान ने उन रासायनिक रंजकों को खोजा जिनसे रंजित होकर गुणसूत्र दिखने लगते हैं और फिर उन्होंने मानव कोशिकाओं में गुणसूत्रों की सही संख्या की गिनती की। हेला कोशिकाएं पहली कोशिकाएं थीं जिन्हें क्लोन किया गया। इन कोशिकाओं को अंतरिक्ष में भी ले जाया गया है। टेलोमरेज़ जैसे एंज़ाइम जिसके कारण कैंसर कोशिकाएं एपोप्टोसिस से बचकर लगातार विभाजित होती रहती हैं, उसकी खोज भी हेला कोशिकाओं की मदद से ही की गई।

एक और गजब की बात है कि जिस गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर से हेनरीटा लैक्स की मौत हुई थी, उसके कारक ह्यूमन पैपिलोमा वायरस का भी पता हेला कोशिकाओं की मदद से चला था और आज तो इस वायरस से बचने के लिए टीका भी उपलब्ध है।

हेला कोशिकाओं के कारण असंख्य नई खोजें हुई हैं। वैज्ञानिकों ने हेनरीटा लैक्स की कोशिकाओं की मदद से कई शोध किए, इलाज ढूंढे, आविष्कार किए। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि इसकी जानकारी उनके परिवार को नहीं थी। दशकों बाद ही उनके परिवार को पता चला कि लैक्स की कोशिकाओं ने मानव इतिहास पर इतना बड़ा असर डाला है। यह उपेक्षा हेला कोशिकाओं के साथ काम करने वाले वैज्ञानिकों के ऊपर नैतिक प्रश्न भी उठाती है।

खैर कुछ भी हो, हेनरीटा लैक्स की कोशिकाओं के कारण करोड़ों लोगों के जीवन पर बड़ा ही सकारात्मक प्रभाव पड़ा, कई जानें बचीं और आगे भी बचती रहेंगी और इसके लिए पूरी मानवता हेनरीटा लैक्स और डॉ. जॉर्ज गे की कृतज्ञ रहेगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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प्रतिरक्षा व्यवस्था और शरीर की हिफाज़त – 1 – विनीता बाल और सत्यजीत रथ

क्यों चाहिए प्रतिरक्षा व्यवस्था

इम्यूनिटी यानी प्रतिरक्षा व्यवस्था पिछले दिनों काफी चर्चित रही है। विनीता बाल और सत्यजीत रथ के आलेखों की एक शृंखला वर्ष 1997 में रेज़ोनेंस में प्रकाशित हुई थी और प्रतिरक्षा के समझने में काफी मददगार है। यहां प्रस्तुत है पहला आलेख।

ई मायनों में प्रतिरक्षा तंत्र बाकी तंत्रों से अलग है। एक खासियत तो यह है कि यह कोई ऐसा तंत्र नहीं है जो कुछ सुपरिभाषित अंगों के साथ शरीर में विशिष्ट स्थान पर स्थित हो। दूसरी खासियत यह है कि आदर्श स्थिति में यह विश्राम की अवस्था में रहता है और तभी सक्रिय होता है जब इसे उकसाया जाए। तीसरी खासियत यह है कि काम शुरू करने से पहले इसकी कोशिकाओं को परिपक्व होने के चरण से गुज़रना पड़ता है। चौथा अंतर यह है कि (प्रजनन तंत्र के अलावा) यह एकमात्र ऐसा तंत्र है जिसकी कोशिकाएं अपने डीएनए (जेनेटिक सामग्री) को पुर्नव्यवस्थित करती हैं और कभी-कभी तो डीएनए के हिस्से गंवा भी देती हैं। यह उनके विकास और परिपक्व होने की प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है।

सवाल यह है कि प्रतिरक्षा तंत्र ऐसा विचित्र व्यवहार क्यों करता है। इस सवाल का जवाब इस आधार पर दिया जा सकता है कि प्रतिरक्षा तंत्र के सामने किस तरह की चुनौतियां होती हैं। तो पहला सवाल आता है कि प्रतिरक्षा तंत्र की ज़रूरत क्या है।

इसका जवाब पाने के लिए एक बहु-कोशिकीय जीव पर विचार करते हैं। ऐसे बहु-कोशिकीय जीव को अपनी कोशिकाओं को साथ-साथ रखना होता है और कोशिकाओं के अलग-अलग समूहों से अलग-अलग कार्य करवाने होते हैं। इस श्रम विभाजन का मतलब यह होता है कि शरीर की हर कोशिका सारे काम नहीं कर सकती। कुछ कोशिकाएं तो इतनी विशिष्ट हो जाती हैं कि वे शायद स्वतंत्र इकाई के रूप में जीवित भी न रह सकें। अर्थात ऐसी कोशिकाओं के कई समूहों को जीवन की अनिवार्य चीज़ें बनी-बनाई मुहैया करवानी होंगी। इसके लिए शरीर को सख्ती से नियंत्रित आंतरिक पर्यावरण बनाकर रखना होगा जो पोषण की दृष्टि से समृद्ध हो।

ऐसा पर्यावरण तमाम बाहरी जीवों को आमंत्रण है कि वे आएं और दावत उड़ाएं। यदि ऐसे मेज़बान जीव को अपनी अखंडता बनाए रखनी है तो उसे इन मुफ्तखोरों से निपटना होगा।

दरअसल, यह भी हो सकता है कि स्वयं मेज़बान की कोशिकाएं जीव के नियंत्रण को धता बताकर एक स्वतंत्र जीवनशैली अपना लें और इस पौष्टिक आंतरिक पर्यावरण का बेजा फायदा उठाकर मौज-मस्ती करने लगें। इन कोशिकाओं को हम कैंसर कोशिकाएं कहते हैं। इन शरारती कोशिकाओं से भी निपटना पड़ता है।

दूसरे शब्दों में, बहु-कोशिकीय जीवन के लिए ज़रूरी है कि तमाम किस्म के घुसपैठियों के खिलाफ कुछ-ना-कुछ सुरक्षा व्यवस्था हो।

लेकिन प्रयोगों की बदौलत यह स्पष्ट हुआ है कि प्रतिरक्षा तंत्र का मुख्य काम संक्रमणों से हिफाज़त करना है। यानी इसका विकास ऐसे संक्रमणों के प्रकार और प्रकृति से निर्धारित हुआ होगा।

तो प्रतिरक्षा तंत्र की उन विशेषताओं की व्याख्या कैसे की जाए, जिनकी चर्चा हमने शुरू में की थी। सबसे पहली बात तो यह है कि घुसपैठ बाहर से होने वाली है, इसलिए शरीर को पता नहीं होता कि उसकी सुरक्षा में कहां सेंध लगेगी। इसलिए प्रतिरक्षा व्यवस्था के घटक शरीर में हर जगह उपस्थित होने चाहिए ताकि घुसपैठ को प्रवेश के बिंदु पर ही पकड़ा जा सके। इसका मतलब है कि प्रतिरक्षा तंत्र तभी उपयोगी होगा जब वह पूरे शरीर में फैला हो। अत: यह कोई अचरज की बात नहीं है कि यह व्यवस्था कुछ सुपरिभाषित अंगों में कैद नहीं है। अलबत्ता, यह अपने कामकाज (जैसे विकास) के लिए कतिपय अंगों का उपयोग करती है।

इसी प्रकार से, यदि प्रतिरक्षा तंत्र का प्रमुख काम संक्रमणों से निपटने का है, तो पर्यावरण में कोई परजीवी न हो, तो इस तंत्र के पास कोई काम नहीं होगा। वास्तविक दुनिया में भी इसके पास लगातार काम नहीं होगा। जब संक्रमण होगा तब उसका आव्हान किया जाएगा। अर्थात ‘सामान्यत:’ प्रतिरक्षा तंत्र कुछ नहीं करेगा, बस बैठकर निगरानी करता रहेगा।

प्रतिरक्षा तंत्र संक्रमण से कैसे निपटता है?

पहली बात है कि संक्रमण से ‘निपटने’ के दो हिस्से होने चाहिए – पहचान और कार्रवाई। पहले घुसपैठिए को पहचानना होगा और फिर उसके बारे में कुछ करना होगा। इसे करने का सबसे आसान तरीका यह होगा कि प्रतिरक्षा कोशिकाओं की सतह पर एक विशेष ग्राही हो जो सारे घुसपैठियों को पहचान सके और फिर कोशिका को उसके बारे में उपयुक्त सुरक्षात्मक कार्रवाई करने को उकसा सके।

बदकिस्मती से, यदि पहचान और कार्रवाई की प्रक्रिया को उपयोगी होना हो, तो वे इतनी एकतरफा नहीं हो सकती। रोगजनक परजीवी बहुत विविध रूपों में और अत्यधिक लचीलेपन के साथ आते हैं। इसलिए यह तो कल्पना भी नहीं की जा सकती कि कोई एक ग्राही सारे रोगजनकों पर उपस्थित किसी ‘चिंह’ को पहचान पाएगा। इसलिए हमें ग्राहियों का एक विशाल समूह चाहिए।

इसी प्रकार से परजीवी घुसपैठ के लिए बहुत अलग-अलग रणनीतियां अपनाते हैं। प्रतिरक्षा तंत्र को इन विविध रणनीतियों से निपटने को भी तैयार होना चाहिए। इसलिए पहचान होने के बाद भी कोई एक तरीका काम नहीं करेगा।

अंतत:, इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि एक ‘चिंह’ एक ही रोगजनक से सम्बद्ध होगा और एक विशिष्ट प्रतिक्रिया पक्के तौर पर कारगर होगी।

इसलिए लक्ष्य की पहचान और उसके बारे में उचित कार्रवाई का निर्णय, ये दो कार्य अलग-अलग करने होंगे।

अब एक-एक करके इन दिक्कतों पर विचार करते हैं।

सबसे पहली चुनौती तो यह है कि प्रतिरक्षा तंत्र को इतने सारी ग्राही पैदा करने होंगे कि वे मिल-जुलकर सारे रोगजनकों को पहचान सकें। ऐसा कैसे किया जा सकता है?

इस संदर्भ में पहचान के दो मॉडल्स उपयोगी हो सकते हैं: क्लोनल एकरूपता और क्लोनल विविधता पर आधारित मॉडल्स।

प्रतिरक्षा लक्ष्यों की पहचान के मॉडल्स

मॉडल्स की बात शुरू करने से पहले कुछ शब्दों को परिभाषित कर लिया जाए।

क्लोनल एकरूप का मतलब है ऐसी कोशिकाओं का समूह जो हू-ब-हू एक-दूसरे की नकल हैं। इन सभी कोशिकाओं पर एकदम एक-जैसे ग्राही होंगे। शरीर में यही सामान्य स्थिति होती है; उदाहरण के लिए, लीवर की सारी कोशिकाएं एकदम एक जैसी दिखती हैं। दूसरी ओर, क्लोनल विविध कोशिका समूह एक ही मातृ कोशिका से पैदा हुई कोशिकाओं का समूह होता है जो सब एक ही कार्य करेंगी लेकिन प्रत्येक पर कोई एक ग्राही अन्य से अलग होगा।

क्लोनल एकरूप ग्राही ‘विदेशी’ लक्ष्य को इस आधार पर पहचानते हैं कि उन पर कोई ‘पराया’ अणु उपस्थित होता है। यह लगभग ऐसा है जैसे हर उस व्यक्ति को विदेशी माना जाएगा जो किसी खास रंग की टोपी पहने है जो आपके समुदाय में कोई नहीं पहनता। कहने का मतलब यह है कि उन आणविक चिंहों को विदेशी माना जाता है जो आम तौर पर स्तनधारियों के शरीर में नहीं बनते। एक उदाहरण लिपोपॉलीसेकराइड का है। क्लोनल एकरूप कार्यकारी कोशिकाएं (जैसे मैक्रोफेज और पोलीमॉर्फोन्यूक्लियर ल्यूकोसाइट) पर ऐसे ग्राही पाए जाते हैं। ऐसे ग्राहियों के समूह की पहचान-क्षमता अत्यंत सीमित होगी और स्थिर होगी क्योंकि इन्हें इस तरह बनाया गया है कि ये बार-बार नज़र आने वाले ‘चिंहों’ की पहचान कर सकें।

तो यह क्लोनल एकरूप पहचान का तरीका पर्याप्त क्यों नहीं है?

बार-बार नज़र आने वाले लक्ष्यों को पहचान करने के तरीके में कुछ बड़े जोखिम हैं। एक जोखिम तो यह है कि यदि रोगजनक परजीवी वह चिंह बनाना बंद कर दे या उसे इतना बदल दे कि वह उपलब्ध ग्राहियों द्वारा पहचान के काबिल न रहे, तो प्रतिरक्षा तंत्र ऐसे संशोधित घुसपैठियों के प्रति अंधा हो जाएगा। यानी ये प्रतिरक्षा तंत्र द्वारा की जाने वाली ‘मिथ्या नकारात्मक’ चूक साबित होंगे। दूसरी ओर, कई बैक्टीरिया ऐसे हैं जो स्तनधारी शरीरों में, खास तौर से आंतों में या त्वचा पर, मज़े से सहयोगी ढंग से रहते हैं। मान लीजिए ये सबके सब लिपोपोलीसेकराइड को सतह पर दर्शाएंगे, तो प्रतिरक्षा तंत्र इन सबको पहचान कर इनसे निपटने के लिए भारी उठापटक करेगा। यह एक बेकार की मेहनत होगी क्योंकि ये कोई नुकसान नहीं पहुंचाते, बल्कि कभी-कभी तो विटामिन वगैरह का निर्माण करके मददगार ही होते हैं। तो ये प्रतिरक्षा तंत्र द्वारा की गई ‘मिथ्या सकारात्मक’ चूकें होंगी और प्रतिरक्षा तंत्र अहानिकर सहजीवियों के खिलाफ जंग छेड़ता रहेगा।

यदि परजीवियों के प्रवेश की संभावना कम है तो यह उम्मीद की जा सकती है कि ऐसे ग्राहियों से युक्त थोड़ी-सी प्रतिरक्षा कोशिकाएं ठीक-ठाक काम कर पाएंगी। यह तब और भी ज़्यादा कारगर होगा जब मेज़बान को पहले से मालूम हो कि कौन-से परजीवी अंदर घुसने की कोशिश करने वाले हैं।

कुछ जंतु कमोबेश एक ही जगह पर टिके रहते हैं और उनके पर्यावरण में ज़्यादा बदलाव नहीं होते, उन्हें कुछ ही प्रकार के घुसपैठियों से निपटना पड़ता है। कुछ जंतु ऐसे हैं जिनके शरीर पर कठोर कवच होते हैं और परजीवियों के लिए शरीर में प्रवेश करना आसान नहीं होता। इन दोनों प्रकार के जंतुओं के लिए अपेक्षाकृत सरल प्रतिरक्षा व्यवस्था पर्याप्त होगी। ऐसे जंतुओं में कीटों या घोंघों जैसे जंतुओं के उदाहरण दिए जा सकते हैं। इनके लिए घुसपैठियों की पहचान का क्लोनल एकरूप मॉडल पर्याप्त है। दरअसल, ऐसे अधिकांश जंतुओं में प्रतिरक्षा व्यवस्था ऐसी ही कोशिकाओं के भरोसे रहती है जो बैक्टीरिया जैसे कणों को निगल सकती हैं।

लेकिन दूर-दूर तक आवागमन करने वाले, मुलायम और संवेदनशील त्वचा वाले जंतुओं (जैसे स्तनधारी) को काफी विविध प्रकार के और बड़ी संख्या में परजीवियों का सामना करना होता है। ऐसी स्थिति में क्लोनल एकरूप मॉडल की सीमाएं इन्हें परास्त कर देंगी।

तो, स्तनधारी जीवों की प्रतिरक्षा व्यवस्था इन समस्याओं से कैसे निपटती है? एक अत्यंत परिवर्तनशील लक्ष्य-पहचान तंत्र ऐसे लचीले परजीवियों से निपटने में कामयाब रहेगा। ऐसी व्यवस्था बनाने का एकमात्र तरीका यह है कि हरेक कोशिका को इनमें से मात्र एक ग्राही प्रदान किया जाए ताकि वह किसी एक ही लक्ष्य की पहचान कर सके – यह लक्ष्य पहचान का क्लोनल विविधता मॉडल है।

क्लोनल विविधता मॉडल

प्रतिरक्षा तंत्र की दृष्टि से इस मॉडल के कई फायदे हैं। पहला, प्रत्येक लक्ष्य प्रतिरक्षा तंत्र की कुछ कोशिकाओं को ही सक्रिय करेगा क्योंकि हर कोशिका पर किसी एक लक्ष्य के लिए ग्राही है। इसके चलते काफी संसाधन व ऊर्जा की बचत होगी।

लेकिन दिक्कत यह है कि यदि लाखों कोशिकाओं में से मात्र एक ही लक्ष्य का जवाब देगी तो इससे ज़्यादा फायदा नहीं होगा। इस कोशिका को अपने जैसी और कोशिकाओं को इस काम में लगाना होगा। लेकिन इस काम में वह आसपास पड़ी अन्य कोशिकाओं को तैनात नहीं कर सकती क्योंकि उनके ग्राही तो काफी अलग लक्ष्यों के लिए बने हैं। इसलिए उस कोशिका को विभाजन करके ढेर सारी कोशिकाएं बनानी होगी जो सब उस लक्ष्य के लिए विशिष्ट होंगी। इसके चलते कोशिकाओं की संख्यावृद्धि प्रतिरक्षा तंत्र के जवाब का बुनियादी हिस्सा है। संख्यावृद्धि पर आधारित इस व्यवस्था का फायदा यह है कि किसी भी समय पर इतनी सारी कोशिकाओं को तैयार अवस्था में उपस्थित नहीं रहना होता क्योंकि संख्यावृद्धि करते-करते वे तैयार भी होती जाती हैं।

यह प्रतिरक्षा तंत्र का एक और अनोखा पहलू है कि उसकी कोशिकाओं को लक्ष्य को पहचानने या उसके खिलाफ कार्रवाई करने से पहले परिपक्व होने के एक चरण से गुज़रना होता है। यही गुण इस तंत्र को अतीत में हुए संपर्कों को लक्ष्य-विशिष्ट ढंग से याद रखने की क्षमता प्रदान करता है। यानी जब प्रतिरक्षा तंत्र किसी लक्ष्य को एक बार देख ले तो उसे पहचानने वाली कोशिकाएं अधिक संख्या में संग्रहित हो जाती हैं। इसके चलते अगली बार वही लक्ष्य सामने आने पर प्रतिक्रिया कहीं अधिक त्वरित होती है। यह अनुकूलन की दृष्टि से फायदे का सौदा है क्योंकि इस बात की संभावना काफी अधिक होती है कि वही परजीवी बार-बार कोशिश करेगा।

तो, क्लोनल एकरूप और क्लोनल विविधता मॉडल के बीच एक अंतर यह है कि एकरूप मॉडल में प्रतिरक्षा कोशिकाओं को लगातार सक्रिय अवस्था में रहना होता है जबकि क्लोनल विविधता मॉडल में कोशिकाएं तब तक विश्राम अवस्था में पड़ी रह सकती हैं जब तक कि उनसे सम्बद्ध लक्ष्य उन्हें चुनौती नहीं देता।

दूसरा अंतर यह है कि सारी क्लोनल एकरूप कोशिकाएं किसी भी चलती हुई कार्रवाई में हिस्सा लेती हैं जबकि विविधता मॉडल में मात्र वही कोशिकाएं युद्धरत होती हैं जो उस लक्ष्य से सम्बंधित ग्राही से लैस हों। इसका एक मतलब यह है कि क्लोनल एकरूप कोशिकाएं आम तौर पर अतीत में हुए संपर्क को याद नहीं रखतीं क्योंकि उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लक्ष्य कौन-सा है। दूसरी ओर, क्लोनल विविधता वाली कोशिकाएं एक बार संपर्क हो जाने के बाद विश्राम अवस्था में भी चौकन्नी रहती हैं ताकि अगले संपर्क के समय त्वरित प्रतिक्रिया दे सकें।

क्लोनल एकरूप पहचान व्यवस्था को जन्मजात या कुदरती (innate प्रतिरक्षा कहते हैं और इसमें प्रतिरक्षा स्मृति की कोई गुंजाइश नहीं होती। दूसरी ओर क्लोनल विविधता आधारित प्रणाली को अनुकूली (Adaptive) या अर्जित प्रतिरक्षा कहते हैं और यह स्मरण के गुण से लैस होती है। इसी गुण की वजह से टीके यानी वैक्सीन बनाना संभव होता है।

ज़ाहिर है, क्लोनल विविधता आधारित पहचान प्रणाली की जटिलताएं कई व्यावहारिक दिक्कतों को जन्म देती है। अगली बार इन पर चर्चा करेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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टीके से जुड़े झूठे प्रचार को रोकने की पहल

हाल ही में ट्विटर ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्म से ऐसे अकाउंट्स को निलंबित या बंद कर दिया है जो नियमित रूप से कोविड-19 टीकों से जुड़ी भ्रामक जानकारी फैला रहे थे। इसी तरह की एक पहल के तहत अमेरिकी वैज्ञानिकों ने कोविड-19 टीके के बारे में भ्रामक जानकारियों के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है।

कुछ सर्वेक्षणों से पता चला है भ्रामक खबरों के परिणामस्वरूप अमेरिका की 20 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या टीकाकरण के विरोध में है। शोधकर्ता सोशल मीडिया पर टीके से सम्बंधित गलत सूचनाओं को ट्रैक करने और भ्रामक सूचनाओं, राजनैतिक बयानबाज़ी और जन नीतियों से टीकाकरण पर पड़ने वाले प्रभावों का डैटा एकत्र कर रहे हैं। इन भ्रामक सूचनाओं में षड्यंत्र सिद्धांत काफी प्रचलित है जिसके अनुसार महामारी को समाज पर नियंत्रण या अस्पतालों का मुनाफा बढ़ाने के लिए बनाया-फैलाया गया है। यहां तक कहा जा रहा है कि टीका लगवाना जोखिम से भरा और अनावश्यक है।

इस संदर्भ में वायरेलिटी प्रोजेक्ट नामक समूह ट्विटर और फेसबुक जैसे प्लेटफार्म द्वारा टीकों से जुड़ी गलत जानकारियों से निपटने के प्रयासों में तथा जन स्वास्थ्य एजेंसियों और सोशल-मीडिया कंपनियों के साथ मिलकर नियमों का उल्लंघन करने वालों की पहचान करने में मदद कर रहा है।

स्टैनफोर्ड इंटरनेट ऑब्ज़र्वेटरी की अनुसंधान प्रबंधक रिनी डीरेस्टा के अनुसार शोधकर्ताओं ने टीकाकरण के संदर्भ में भ्रामक प्रचार के चलते सार्वजनिक नुकसान की आशंका के कारण इस पर ध्यान केंद्रित किया गया है। हालांकि, सोशल मीडिया कंपनियां सभी मामलों में तो सच-झूठ की पहरेदार नहीं बन सकती लेकिन नुकसान की संभावना को देखते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ संतुलन अनिवार्य है।

फरवरी में ट्विटर, फेसबुक (इंस्टाग्राम समेत) ने झूठे दावों को हटाने के प्रयासों को विस्तार दिया है। दोनों ही कंपनियों ने घोषणा की है कि झूठी खबरें फैलाने वाली पोस्ट और ट्वीट को हटाया जाएगा और बार-बार नीतियों का उल्लंघन करने वालों के अकाउंट्स बंद भी कर दिए जाएंगे।

यह देखा गया है कि वेब पर गलत जानकारी अपेक्षाकृत थोड़े-से लोगों (सुपरस्प्रेडर्स) द्वारा फैलाई जाती है। इनमें अक्सर पक्षपाती मीडिया, सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर और राजनीतिक हस्तियां शामिल होती हैं।  

गौरतलब है कि कोविड-19 के बारे में लोगों की सोच का अनुमान लगाने के लिए बोस्टन स्थित नार्थवेस्टर्न युनिवर्सिटी, मेसाचुसेट्स के राजनीति वैज्ञानिक डेविड लेज़र के नेतृत्व में अमेरिका के सभी 50 राज्यों में प्रति माह 25,000 से अधिक लोगों का सर्वेक्षण किया जा रहा है और साथ ही ट्विटर का उपयोग करने वाले 16 लाख लोगों की जानकारी भी एकत्रित की जा रही है। 

फरवरी में लगभग 21 प्रतिशत लोगों ने टीकाकरण करवाने से इनकार किया। स्वास्थ्य कर्मियों में यह आंकड़ा लगभग 24 प्रतिशत था। देखा गया कि इस फैसले के पीछे शिक्षा का स्तर एक मुख्य कारक रहा। टीम यह समझने का प्रयास कर रही है कि स्वास्थ्य सम्बंधी गलत जानकारी का सामना करने में कौन-सी चीज़ें प्रभावी हो सकती हैं। लगता है कि डॉक्टर और वैज्ञानिकों को सबसे भरोसेमंद माना जाता है जबकि पक्षपातपूर्ण राजनीतिक नेताओं के संदेशों पर विश्वास की संभावना कम होती है। ऐसे में डॉक्टर की सकारात्मक सलाह लोगों की पसंद को प्रभावित कर सकती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जॉनसन एंड जॉनसन टीके पर अस्थायी रोक

मेरिका में जे-एंड-जे टीके लगाने के बाद क्लॉटिंग के 6 मामले सामने आने के बाद यूएस सेंटर फॉर डिसीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन और खाद्य व औषधि प्रशासन ने जॉनसन एंड जॉनसन (जे-एंड-जे) द्वारा निर्मित कोविड-19 टीके के उपयोग पर रोक लगाने की सिफारिश की है। इससे पूर्व युरोप में भी एस्ट्राज़ेनेका टीका प्राप्त लोगों में ऐसे मामले सामने आए थे और टीकाकरण के प्रयासों को काफी नुकसान हुआ था।

एफडीए कमिश्नर जेनेट वुडकॉक के अनुसार ये घटनाएं काफी बिरली हैं। टीकाकरण को रोकने के पीछे का कारण वास्तव में स्वास्थ्य प्रणाली को ऐसे मामलों की पहचान करके उपयुक्त इलाज के लिए तैयार करना है। इस बीच जे-एंड-जे ने युरोप में अपने टीके को लंबित रखा है। युरोपियन मेडिसिंस एजेंसी (ईएमए) अमेरिका में टीकाकृत लोगों में क्लॉटिंग के चार मामलों की जांच कर रही है। ड्यूक युनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के रुधिर रोग विशेषज्ञ गौतमी अरेपल्ली के अनुसार क्लॉटिंग के देखे गए मामले काफी असामान्य हैं। इन मामलों में व्यक्ति के दिमाग की नसों में क्लॉटिंग और प्लेटलेट की कमी देखी गई है। ऐसे में टीके पर अस्थायी रूप से रोक लगाना उचित ही है।     

हालांकि, छह सप्ताह पूर्व युरोप में एस्ट्राज़ेनेका टीके, वैक्सज़ेवरिया, के सम्बंध में इसी तरह की समस्या आने पर ईएमए ने इसके उपयोग पर रोक लगाने का कोई सुझाव नहीं दिया। फिर भी कई अन्य देशों ने कुछ समय के लिए इस पर रोक लगा दी है। कुछ देशों में वृद्ध समूह में इसका उपयोग जारी रखा गया क्योंकि उनमें कोविड-19 का खतरा कहीं ज़्यादा है। कम प्लेटलेट के साथ असामान्य क्लॉटिंग के मामले फाइज़र और मॉडर्ना द्वारा निर्मित संदेशवाहक आरएनए आधारित टीकों में नहीं देखे गए हैं।

वैक्सज़ेवरिया और जे-एंड-जे टीके दोनों ही संशोधित एडेनोवायरस पर आधारित हैं। इसलिए शोधकर्ता इस तकनीक के दुष्प्रभावों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। वैसे एडेनोवायरस आधारित अन्य टीकों (रूस के स्पुतनिक वी और चीन के कैनसाइनो बायोलॉजिक्स) में इस तरह के कोई मामले सामने नहीं आए हैं। वैसे इन टीकों पर उपलब्ध डैटा कुछ सीमित है और यह भी स्पष्ट नहीं है कि इन क्षेत्रों के नियामकों ने ऐसे मामलों को खोजने के प्रयास किए भी हैं या नहीं। समस्या की जड़ तक पहुंचने के प्रयास जारी हैं।

इस मामले में एफडीए से जुड़े पीटर माक्र्स इस परेशानी से सम्बंधित रोगियों के उचित इलाज का सुझाव देते हैं। खास तौर से क्लॉटिंग की समस्या के लिए हेपरिन के उपयोग से बचने की सलाह दी जा रही है क्योंकि टीका जनित क्लॉटिंग में हेपरिन का उपयोग समस्या को और गंभीर बना सकता है।    

अमेरिकी एजेंसियों द्वारा टीकाकरण पर रोक के कारण वैश्विक टीकाकरण की चिंताएं बढ़ गई हैं। अपेक्षाकृत आसान परिवहन और भंडारण तथा कम लागत के चलते वैक्सज़ेवरिया और जे-एंड-जे टीके कम और मध्यम आय वाले देशों के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। और तो और, जे-एंड-जे टीके की एक ही खुराक पर्याप्त होती है। इनके अभाव में कई देशों को कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है। वैसे वुडकॉक के अनुसार निलंबन थोड़े समय के लिए ही रहेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पृथ्वी का विशालतम जीव – डॉ. किशोर पंवार, भरत नागेश

पने तरह-तरह के जीव-जंतु देखे होंगे या इनके बारे में सुना होगा – अति सूक्ष्म जीवाणु से लेकर विशालकाय नीली व्हेल तक। पर यहां जिस जीव की बात करेंगे, आपने शायद ही कभी उसके बारे में सुना होगा। यदि हम आपसे प्रश्न करें कि इस पृथ्वी का सबसे बड़े जीव कौन है, तो आपकी जानकारी के अनुसार इसका उत्तर जिराफ, हाथी या ब्लू व्हेल या फिर सिकोया पेड़ होगा।

ब्लू व्हेल समुद्र में पाई जाती है जिसकी लंबाई लगभग 30 मीटर तथा वज़न 173 टन तक हो सकता है। यह संसार का सबसे बड़ा स्तनधारी जीव है। इसी तरह सिकोया पेड़ है जो उत्तरी अमेरिका में पाया जाता है, इसकी लंबाई लगभग 115 मीटर तथा चौड़ाई 10 मीटर तक हो सकती है। यह संसार का सबसे लंबा पेड़ है। लेकिन आश्चर्य की बात है कि ये दोनों ही पृथ्वी के विशालतम जीवों में से नहीं है। तो फिर कौन है?

आपके मन में यह सवाल भी आ रहा होगा कि विशालतम जीव का निर्धारण कैसे किया जाता है? इसके निर्धारण को लेकर वैज्ञानिक समुदाय में कुछ मतभेद हैं फिर भी कुछ पहलुओं के आधार पर इसका निर्धारण संभव है। जैसे, किसी जीव का परिमाप, क्षेत्रफल, लंबाई, ऊंचाई। यहां तक कि जीनोम के आकार के द्वारा भी इसका निर्धारण किया जा सकता है। चींटियों और मधुमक्खियों जैसे कुछ जीव साथ मिलकर सुपरऑर्गेनिज़्म का निर्माण करते हैं। लेकिन ये एकल जीव नहीं हैं। दी ग्रेट बैरियर रीफ दुनिया की सबसे बड़ी संरचना है जो 2000 किलोमीटर तक फैली है लेकिन इसमें कई प्रजातियों के जीव हैं।

वज़न के हिसाब से इस पृथ्वी का सबसे बड़ा ज्ञात जीव है – पंडो। शुद्ध वज़न के मामले में पंडो सबसे ऊपर है। पंडो का लैटिन भाषा में मतलब ‘I Spread’  (यानी मैं फैलता हूं) है। इसे ट्रेम्बलिंग जाएंट (कंपायमान दैत्य) या एस्पेन के नाम से भी जाना जाता है। पंडो संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिण मध्य ऊटा में कोलेरैडो पठार के पश्चिम छोर पर फिशलेक राष्ट्रीय उद्यान में है। लेकिन आप यदि इस जीव के बारे में पढ़े बिना इसे खोजने जाएंगे तो ढूंढना थोड़ा मुश्किल होगा क्योंकि यह एक पेड़ है। एक पेड़ को ढूंढना इतना मुश्किल क्यों है? तो आपको बता दें कि यह पेड़ देखने में एक जंगल के समान ही है। लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से पंडो एक पेड़ है जिसके क्लोनों के समुदाय 5 किलोमीटर तक फैले हो सकते हैं। आनुवंशिक शोधकर्ताओं द्वारा इसे एकल जीव के रूप में चिंहित किया गया है। यह लगभग 108 एकड़ में फैला है जिसका वजन लगभग 6000 टन (60,00,000 कि.ग्रा.) हो सकता है। यह सबसे बड़े विशालकाय सिकोया पेड़ से लगभग 5 गुना अधिक और लगभग पूरी तरह से विकसित 45 ब्लू व्हेल के बराबर है।

पंडो (Populus tremuloids) की पहचान 1976 में जेरी केम्परमैन और बर्टन बार्न्स ने की थी। माइकल ग्रांट, जेफरी लिटन और कोलेरैडो विश्वविद्यालय के यिन लिनहार्ट ने 1992 में क्लोन्स की फिर से जांच की और इसे पंडो नाम दिया। साथ ही वज़न के लिहाज़ से दुनिया का सबसे बड़ा जीव होने का दावा किया। ऐसा माना जाता है कि पंडो की शुरुआत एक बीज से हुई थी। यह लगभग 14,000 साल या उससे भी पहले की बात है। हालांकि इसकी उम्र का सही-सही अनुमान लगा पाना कठिन है। कुछ जगह इसकी उम्र  50,000-60,000 वर्ष भी बताई गई है। पंडो आनुवंशिक रूप से नर है जिसमें एक अलग जड़ तंत्र होता है जो आपस में जुड़ा हुआ होता है। वैज्ञानिक नहीं जानते कि क्लोन में बड़े पैमाने पर पेड़ कैसे जुड़े हैं। एक बार पौधे जब एक निश्चित उम्र तक पहुंच जाते हैं, तो वे अपने जड़ तंत्र को अलग कर सकते हैं। ऊटा विश्वविद्यालय की कैरन मॉक बताती हैं कि साझा आनुवंशिकी के कारण, अलग होने वाले पेड़ों में अभी भी एक जैसे गुणधर्म हैं। जैसे कि कलियों का एक समय में खिलना और पत्तियों का विशेष परिस्थिति होने पर एक ही समय में मुड़ना।

इसका जड़ तंत्र कई हज़ार साल पुराना माना जाता है। सभी क्लोन जड़ों की एक साझा प्रणाली के ज़रिए एक पेड़ द्वारा एकत्रित ऊर्जा या पानी को इस जड़ तंत्र के द्वारा सभी पेड़ साझा करते हैं। पंडो में अपने जड़ तंत्र के माध्यम से अलैंगिक रूप से आनुवंशिक रूप से समान संतानें उत्पन्न करने की अद्भुत क्षमता है।

पंडो देखने में खूबसूरत होता है। इसके सभी क्लोन लगभग समान ऊंचाई के हैं। शरद ऋतु में पंडो अपने पीले-सुनहरे रंग के लिए जाने जाते हैं। ऊटा ने 2014 में पंडो को अपने राज्य का अधिकारिक पेड़ बनाया। इसकी छाल सफेद-भूरे रंग की होती है जिसमें मोटे काले आड़े निशान और गांठें होती हैं। ये निशान एल्क (एक प्रकार का बारहसिंहा) द्वारा बनाए गए संकेत हैं जो दांतों द्वारा एस्पेन की छाल को छीलने से बने हैं। पंडो की पत्तियां गोल होती हैं और तनों पर विशिष्ट तरीके से जुड़ी हुई होती हैं। जब हवा इन पत्तियों को छूकर गुज़रती है तो वे विशिष्ट तरीके से हिलती-डुलती हैं।

लेकिन इस ग्रह का विशालतम जीव आज मरने की कगार पर है। इसके कुछ कारण ज्ञात हैं तो कुछ अज्ञात। रोग, जलवायु परिवर्तन और जंगल में लगी आग ने पंडो पर बहुत ही बुरा प्रभाव डाला है। परंतु गिरावट का मूल कारण बहुत ही आश्चर्यजनक है। बहुत सारे शाकाहारी जानवर (खच्चर, हिरण, एल्क) पंडो के बीच घूमते रहते हैं। परन्तु इनकी बढ़ती जनसंख्या सबसे बड़ा खतरा बन गई है। इन जानवरों ने नई निकल रही कोपलों तथा युवा तनों को तेज़ी से खाना प्रारंभ कर दिया है, जिसके कारण नए क्लोनों की संख्या घट रही है। पंडो पर शोध करने वाले रॉजर्स कहते हैं कि पुराने पेड़ के लगभग 47,000 तने लगभग 70 प्रतिशत मृत हैं या तेज़ी से अपने अंत के करीब हैं। अमेरिकी वन सेवा के निकोलस मास्टो कहते हैं कि पंडो के नए तने खच्चर, हिरण एवं एल्क के लिए स्वादिष्ट भोजन हैं। पंडो के पास अपना सुरक्षा तंत्र भी है – यदि पंडो खुद को खतरे में पाता है तो वह अपने रसायनों को बदल सकता है और अधिक अंकुरण कर सकता है। विपरीत परिस्थितियों में एस्पेन एक रसायन का उत्पादन करने में सक्षम होते हैं जो हिरणों के लिए अपने तनों के स्वाद को खराब करते हैं जो चराई के खिलाफ एक सुरक्षा है। शाकाहारी जानवरों से पंडो की सुरक्षा के लिए 2013 में अमरीकी वन विभाग के सहयोग से तथा संरक्षण प्रेमियों के एक गैर-मुनाफा संगठन की मदद से पंडो की 108 एकड़ जगह को तार से घेरा गया है। वैज्ञानिक आशावादी थे, पर कुछ कशमकश में थे कि शाकाहारी जानवरों के आक्रमण से बचाव के बाद पंडो के नए अंकुरों तथा युवा क्लोनों का क्या होगा? क्या पंडो नए क्लोनों को तेज़ी बनाने में सक्षम होंगे या फिर इनके मरने के और भी कारण है। खुशी की बात यह है कि फेंसिंग के कुछ साल बाद नए क्लोनों की कोपलें सुरक्षित हैं और युवा क्लोन तेज़ी से बढ़ रहे है। आशा है कि पृथ्वी का यह विशालतम जीव सुरक्षित रहेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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ब्रह्मांड में जीवन की उत्पत्ति कब हुई थी?

हाविस्फोट (बिग बैंग) के लगभग 1.5 करोड़ वर्ष बाद ब्रह्मांड धीरे-धीरे ठंडा होना शुरू हुआ। इस दौरान विद्युत-चुंबकीय विकिरण सामान्य तापमान पर आने लगा था। अमेरिकी भौतिक विज्ञानी एवी लोएब इस दौर को प्रारंभिक ब्रह्मांड का जीवन-योग्य युग कहते हैं। लोएब के अनुसार यदि हम उस दौर में रहते होते तो हमें गर्मी के लिए सूर्य की आवश्यकता नहीं होती बल्कि ब्रह्मांडीय पृष्ठभूमि विकिरण से प्राप्त गर्मी ही हमारे लिए पर्याप्त होती।

तो क्या यह माना जाए कि जीवन की शुरुआत इतनी जल्दी हुई थी। बिग बैंग घटना के बाद, पहले 20 मिनट की गर्म और सघन परिस्थितियों में केवल हाइड्रोजन और हीलियम के साथ मामूली मात्रा (10 अरब परमाणुओं में एक) में लीथियम भी उपस्थित था। अपेक्षाकृत भारी तत्व नगण्य थे।

जीवन के लिए तो पानी और कार्बनिक यौगिकों का होना आवश्यक है। इनके अस्तित्व में आने के लिए लगभग 5 करोड़ वर्ष और इंतज़ार करना पड़ा जब शुरुआती तारों में हाइड्रोजन और हीलियम के संलयन से ऑक्सीजन और कार्बन का निर्माण हुआ। यानी जीवन की शुरुआत के लिए प्रारंभिक अड़चन उपयुक्त तापमान नहीं बल्कि आवश्यक तत्वों की उपलब्धता भी थी।     

शुरुआत में भारी तत्वों की सीमित मात्रा को देखते हुए, जीवन की शुरुआत कितनी जल्दी हुई होगी? गौरतलब है कि ब्रह्मांड के अधिकांश तारे सूर्य से भी अरबों वर्ष पहले उपस्थित थे। तारों के निर्माण के इतिहास के आधार पर लोएब और उनके सहयोगियों का अनुमान है कि सूर्य जैसे तारों के आसपास जीवन की शुरुआत हाल के कुछ अरब वर्षों के दौरान हुई थी। अलबत्ता, भविष्य में बौने तारों (हमारे निकटतम पड़ोसी प्रॉक्सिमा सेंटॉरी जैसे) की परिक्रमा करने वाले ग्रहों में जीवन की शुरुआत होती रह सकती है। ये सूर्य की तुलना में सैकड़ों गुना अधिक समय तक जीवित रहेंगे। अंतत: शायद हमें प्रॉक्सिमा सेंटॉरी बी जैसे तारों के आसपास रहने योग्य ग्रहों पर जाकर बस जाना होगा जो कई खरब वर्षों तक जीवित रहने वाले हैं।

हमारी वर्तमान जानकारी के अनुसार पानी एकमात्र ऐसा पदार्थ है जो जीवन को सहारा दे सकता है। लेकिन इसके बारे में हमें अधिक जानकारी नहीं है। क्या शुरुआती ब्रह्मांड में कोई अन्य तरल पदार्थ मौजूद थे? मनस्वी लिंगम के साथ किए गए एक अध्ययन में लोएब बताते हैं कि शुरुआती तारों के निर्माण के समय अमोनिया, मिथेनॉल और हाइड्रोजन सल्फाइड तरल अवस्था में उपस्थित थे जबकि इथेन और प्रोपेन कुछ समय बाद तरल अवस्था में उपस्थित रहे। हालांकि जीवन की शुरुआत में इन पदार्थों की उपयुक्तता के बारे में तो अभी कोई जानकारी नहीं है लेकिन इनका प्रायोगिक अध्ययन किया जा सकता है। यदि भविष्य में हम संश्लेषित जीवन विकसित करने में सफल होते हैं तो हम यह भी खोज कर सकते हैं कि क्या जीवन पानी के अलावा अन्य तरल पदार्थों में भी उभर सकता है।

ब्रह्मांड में जीवन की शुरुआत का पता लगाने का एक तरीका यह हो सकता है कि क्या यह सबसे पुराने तारों के आसपास के ग्रहों पर शुरू हुआ था। ऐसे तारों पर हीलियम से अधिक भारी तत्वों की कमी होने की उम्मीद की जा सकती है जिन्हें खगोलविज्ञानी ‘धातु’ कहते हैं (यह परिभाषा आम रासायनिक परिभाषा से थोड़ी अलग है और इसमें ऑक्सीजन को धातु कहा जाता है)। धातु की कमी वाले तारे आकाशगंगा की परिधि में खोजे गए हैं और ये ब्रह्मांड के शुरुआती तारे माने गए हैं। इन तारों में अक्सर प्रचुर मात्रा में कार्बन दिखता है और इन्हें ‘कार्बन प्रचुर धातु विहीन’ (सीईएमपी) तारे कहा जाता है। लोएब का मत है कि सीईएमपी के आसपास के ग्रह ज़्यादातर कार्बन से बने होते हैं जिससे उनकी सतह पर प्रारंभिक जीवन का आधार मिल सकता है।

लिहाज़ा हम ऐसे ग्रहों की खोज कर सकते हैं जो सीईएमपी तारों के आसपास हैं और अपने वायुमंडलीय संघटन में जीवन की उपस्थिति के कुछ साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। हम इन तारों की उम्र के आधार पर यह अनुमान लगा पाएंगे कि ब्रह्मांड में जीवन की शुरुआत कितनी पहले हुई होगी।

इसके साथ ही हम अंतर-तारकीय तकनीकी उपकरणों की उम्र का भी अनुमान लगा सकते हैं जो पृथ्वी के नज़दीक चक्कर लगाते हुए दिखें या चंद्रमा से टकरा गए हों।

इसमें एक पूरक रणनीति अंतरिक्ष में प्रारंभिक दौर की सभ्यताओं के तकनीकी संकेतों की खोज करना भी हो सकती है। संचार संकेतों को भी खोजा जा सकता है लेकिन ऐसे संकेतों को यात्रा करने में अरबों वर्षों का समय लगता है और कोई भी सभ्यता इतनी धीमी गति से सूचनाओं के आदान-प्रदान में रुचि नहीं रखेगी। जीवन के संकेत हमेशा के लिए बने नहीं रहते हैं। खैर, अंतरिक्ष में जीवन जब मिलेगा, तब मिलेगा लेकिन तब तक हमें प्रकृति से मिले हुए अस्थायी उपहारों का जश्न मनाना चाहिए, लुत्फ उठाना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

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मधुमक्खियों में दूर तक संवाद

बेशक मधुमक्खियां हमारी तरह बोल नहीं सकतीं लेकिन हाल ही में शोधकर्ताओं ने पाया है कि उनमें भी लंबी दूरी का और बड़े पैमाने पर संवाद होता है। मधुमक्खियां आपस में मिलकर रसायनों की गंध के माध्यम से दूर-दूर मौजूद अपने अन्य साथियों को रानी मधुमक्खी की स्थिति के बारे में जानकारी देती हैं।

मधुमक्खियां फेरोमोन नामक रसायनों की मदद से आपस में संवाद करती हैं, जिसे वे अपने एंटीना के माध्यम से पहचानती हैं। रानी मधुमक्खी फेरोमोन्स जारी करके श्रमिक मधुमक्खियों को अपने पास बुलाती है। लेकिन फेरोमोन्स हवा में सीमित दूरी तक ही पहुंचते हैं। तो रानी का संदेश दूर के श्रमिकों तक कैसे पहुंचता है?

रानी मधुमक्खी के आसपास मंडराने वाली श्रमिक मधुमक्खियां भी नेसानोव नामक फेरोमोन जारी कर अन्यत्र मौजूद अपने साथियों को बुला सकती हैं। नेसानोव की गंध छोड़ने के लिए वे अपने पेट को थोड़ा ऊंचा उठाती हैं ताकि फेरोमोन स्रावित करने वाली ग्रंथियां हवा के संपर्क में आ जाएं। फिर अपने पंखों को फड़फड़ाकर वे गंध को पीछे की ओर भेजती हैं।

इस प्रक्रिया का खुलासा करने के लिए कोलेरैडो विश्वविद्यालय के कंप्यूटर विज्ञानी डियू माय गुयेन और उनके साथियों ने अध्ययन के लिए आम तौर पर पाई जाने वाली मधुमक्खियों (एपिस मेलिफेरा) की एक कॉलोनी को चुना। अध्ययन के लिए उन्होंने पिज़्ज़ा के डिब्बे के आकार का समतल क्षेत्र तैयार किया जिसकी छत पारदर्शी थी। इसमें मधुमक्खियां सिर्फ चल सकती थीं, उड़ नहीं सकती थीं। इसके एक कोने पर उन्होंने रानी मधुमक्खी को कैद कर दिया और दूसरी तरफ से श्रमिक मधुमक्खियों को छोड़ा और उनकी गतिविधियां कैमरे में रिकॉर्ड की। फिर कृत्रिम बुद्धि सॉफ्टवेयर की मदद से नेसानोव फेरोमोन जारी करने वाली मधुमक्खियों को ट्रैक किया।

शोधकर्ताओं ने पाया कि किसी श्रमिक मधुमक्खी द्वारा रानी की स्थिति पता कर लेने के बाद उन्होंने रानी मधुमक्खी के पास से एक-दूसरे को एक-समान दूरी पर व्यवस्थित रूप से कतारबद्ध करना शुरू कर दिया था, हरेक मधुमक्खी अपने पंख फड़फड़ा कर अपने पड़ोसी मधुमक्खी तक नेसानोव पहुंचाकर उसे ठीक से कतार में लगवा रही थी। प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ में शोधकर्ता बताते हैं कि इस तरह के सामूहिक संवाद का अवलोकन पहली बार मधुमक्खियों में किया गया है। यह संवाद मधुमक्खियों को रानी मधुमक्खी तक वापस पहुंचने में मदद करता है – जो एक अकेली मधुमक्खी द्वारा संभव नहीं है। देखा गया है कि मधुमक्खियां गंध की इस  शृंखला के द्वारा एक-दूसरे के बीच लगभग 6 सेंटीमीटर की दूरी रखती हैं। इससे लगता है कि किसी मधुमक्खी को फेरोमोन की एक निश्चित मात्रा प्राप्त होते ही वह अपना सारा काम छोड़कर खुद फेरोमोन स्रावित करने लगती है।

अन्य शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अध्ययन समतल स्थान में किया गया है जबकि वास्तव में मधुमक्खियां आगे-पीछे, ऊपर-नीचे कहीं भी हो सकती हैं। और तो और, अक्सर हवा और बारिश जैसे कारक उन्हें प्रभावित करते हैं, जो उनके संचार को और अधिक जटिल बनाते हैं। हालांकि सरलीकृत मॉडल से यह पता चलता है कि मधुमक्खियां कैसे खुद व्यवस्थित होती हैं, झुंड बनाती हैं। बहरहाल मधुमक्खियों के प्राकृतिक झुंडों का निरीक्षण करके देखना चाहिए कि क्या वास्तव में वे ऐसा करती हैं। (स्रोत फीचर्स)

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वन्यजीवों से कोरोनावायरस फैलने की अधिक संभावना

कोविड महामारी के स्रोत का पता लगाने के प्रयास लगातार जारी हैं। हाल ही में सीएनएन द्वारा प्रसारित साक्षात्कार में एक प्रमुख वैज्ञानिक सेंटर फॉर डिसीज़ कंट्रोल के पूर्व निदेशक और वायरोलॉजिस्ट रॉबर्ट रेडफील्ड ने बिना किसी प्रमाण के दावा किया कि सार्स-कोव-2 वुहान की प्रयोगशाला से निकला है। साथ ही उन्होंने कहा कि यह मात्र एक निजी राय है। इसके दो दिन बाद कुछ अन्य लोगों (डबल्यूएचओ और चीन सरकार की टीम) ने वायरस के वन्यजीवों से फैलने की बात कही जिसकी शुरुआत चमगादड़ों से हुई है। इसमें भी कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं दिया गया।

गौरतलब है कि वुहान की प्रयोगशाला में किसी को भी ऐसा कोरोनावायरस नहीं मिला है जिसे बदलकर ज़्यादा फैलने वाला बनाया गया हो और फिर उसने बदलते-बदलते सार्स-कोव-2 जैसा रूप लेकर वहां किसी कर्मचारी को संक्रमित कर दिया हो। इसी तरह किसी को जंगली जीवों में कोरोनावायरस के प्रमाण भी नहीं मिले हैं जो एक से दूसरे जंतु में आगे बढ़ते-बढ़ते उत्परिवर्तित होकर सार्स-कोव-2 के समान हो गया हो और फिर मनुष्यों में प्रवेश कर गया हो।

अभी तक ये दोनों ही विचार प्रमाण-विहीन हैं और दोनों ही संभव हैं।

फिर भी इन दोनों विचारों के सही होने की संभावना बराबर नहीं है। देखा जाए तो प्रयोगशाला से वायरस के निकलने की कोई एक या शायद कुछ मुट्ठी भर घटनाएं हो सकती हैं जबकि वन्यजीवों से वायरस के फैलने के अनेकों अवसर होंगे।

रेडफील्ड की अटकल है कि किसी भी वायरस के लिए इतने कम समय में जीवों से मनुष्यों में प्रवेश करने की कुशलता हासिल करना बिना प्रयोगशाला के संभव नहीं है। लेकिन एक बार में इतनी बड़ी छलांग बहुत बड़ी बात होगी। स्वयं रेडफील्ड ने कहा है कि यह वायरस हमारी जानकारी में आने के कई महीनों पहले से प्रसारित हो रहा था। यानी मनुष्यों तक पहुंचने से पहले एक लंबी अवधि रही होगी जो इस वायरस के वन्यजीवों से फैलने का संकेत देती है।

वन्यजीवों से वायरस के फैलने का विचार इस बात पर टिका है कि चीन में करोड़ों चमगादड़ हैं और उनका मनुष्यों समेत अन्य जीवों से खूब संपर्क होता है। अत:, वायरस के मनुष्यों में प्रवेश करने के कई मौके हो सकते हैं। मूल रूप में तो यह वायरस मनुष्यों में खुद की प्रतिलिपि तैयार करने में अक्षम होता है। लेकिन मनुष्यों को संक्रमित करने के पहले इसे विकसित होने के लाखों मौके मिले होंगे। गौरतलब है कि चमगादड़ अक्सर कई जीवों जैसे पैंगोलिन, बैजर, सूअर, एवं अन्य के संपर्क में आते हैं जिससे ये मौकापरस्त वायरस इन प्रजातियों को आसानी से संक्रमित कर देते हैं। चमगादड़ कॉलोनियों में रहते हैं इसलिए विभिन्न प्रकार के कोरोनावायरस के मिश्रण की संभावना होती है और उन्हें अपने जींस को पुनर्मिश्रित करने का पूरा मौका मिलता है। यहां तक कि एक अकेले चमगादड़ में भी विभिन्न कोरोनावायरस देखे गए हैं।

इन वायरसों को मेज़बानों के बीच छलांग लगाने के लिए कई महीनों का समय मिलता है। इसी दौरान वे उत्परिवर्तित भी होते रहते हैं। एक बार मनुष्यों में प्रवेश करने पर उन वायरस संस्करणों को वरीयता मिलती है जो मानव कोशिकाओं को संक्रमित करके अपनी प्रतिलिपियां बनाने की क्षमता रखते हैं। जल्द ही वे कोशिकाओं को इस स्तर तक संक्रमित कर देते हैं कि लोग बीमार होने लगते हैं। तब जाकर एक नई बीमारी प्रकट होती है। यह वही अवधि होती है जिसे रेडफील्ड ने माना है कि वायरस प्रसारित होता रहा है।

वास्तव में हम कोरोनावायरस के विकास में यह घटनाक्रम देख भी रहे हैं। इसमें काफी तेज़ी से उत्परिवर्तन हो रहे हैं (E484K और 501Y जैसे) जो वायरस को और अधिक संक्रामक बनाते हैं। युनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के वायरोलॉजिस्ट एडम लौरिंग के अनुसार ये परिवर्तन प्राकृतिक रूप से हो रहे हैं। जिसका कारण यह है कि वायरस को लाखों संक्रमित व्यक्तियों में उत्परिवर्तन के लाखों अवसर मिल रहे हैं।

तो किसे सही माना जाए? रेडफील्ड की प्रयोगशाला से रिसाव की परिकल्पना को जो मात्र एक संयोग पर निर्भर है? या फिर वन्यजीवों से प्रसारित होने की परिकल्पना को जिसे लाखों अवसर मिल रहे हैं? हालांकि दोनों ही संभव हैं लेकिन एक की संभावना अधिक मालूम होती है। इसीलिए, अधिकांश वैज्ञानिकों को वन्यजीवों के माध्यम से इस वायरस के फैलने के आशंका अधिक विश्वसनीय लगती है।

वायरस की उत्पत्ति का सवाल महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे किसी महामारी के शुरू होने की जानकारी मिल सकती है ताकि भविष्य में इस तरह की स्थितियों को रोका जा सके। आज भी कई रोग पैदा करने वाले वायरस हमारे बीच मौजूद हैं जो महामारी का रूप ले सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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स्वयं से बातें करना: लाभ-हानि

ई बार हम स्वयं से बातें करते हैं – या तो मन-ही-मन में या बोलकर। कुछ लोग ऐसा नियमित रूप से करते हैं तो कई अन्य ऐसा करके काफी अच्छा महसूस करते हैं। लेकिन क्या खुद से बात करना सामान्य है?

स्वयं से बात करने का काफी अध्ययन हुआ है। कई लोग इसे एक मानसिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में देखते हैं लेकिन ऐसे सेल्फ-टॉक या सेल्फ-डायरेक्टेड टॉक (स्वगत संभाषण) को मनोवैज्ञानिक सामान्य और कुछ परिस्थितियों में फायदेमंद भी मानते हैं।

इस व्यवहार के व्यवस्थित अध्ययन की शुरुआत 1880 के दशक में हुई थी। वैज्ञानिकों की विशेष दिलचस्पी यह जानने की थी कि लोग स्वयं से क्या बात करते हैं, क्यों और किस उद्देश्य से करते हैं। शोधकर्ताओं ने सेल्फ-टॉक को आंतरिक मतों या धारणाओं की मौखिक अभिव्यक्ति के रूप में परिभाषित किया है।

बच्चे अक्सर ऐसा करते हैं, और यह उनके भाषा के विकास, किसी कार्य में सक्रियता और प्रदर्शन को सुधारने का एक तरीका है। यह माता-पिता के लिए चिंता का कारण नहीं होना चाहिए। और तो और, वयस्क अवस्था में भी यह व्यवहार कोई समस्या नहीं है। यह फायदेमंद भी हो सकता है बशर्ते कि कोई व्यक्ति मतिभ्रम जैसी मानसिक समस्या का अनुभव न करने लगे।

किसी कार्य के दौरान सेल्फ-टॉक से उस काम में नियंत्रण, एकाग्रता और प्रदर्शन में सुधार होता है और साथ ही समस्या-समाधान के कौशल में भी बढ़ोतरी होती है। वर्ष 2012 में किए गए एक अध्ययन में देखा गया कि कैसे सेल्फ-टॉक किसी वस्तु की तलाश के कार्य को प्रभावित करता है। इस अध्ययन में पता चला कि जब हम किसी गुम वस्तु या सुपर मार्केट में किसी विशेष उत्पाद की तलाश करते हैं तब सेल्फ-टॉक मददगार होता है। खेलकूद में भी सेल्फ-टॉक काफी फायदेमंद साबित होता है। सब कुछ इस बात पर भी निर्भर करता है सेल्फ-टॉक किस प्रकार का है:

1. सकारात्मक: इससे व्यक्ति को सकारात्मक सोच के लिए प्रोत्साहन और शक्ति मिलती है। इससे चिंता में कमी और एकाग्रता एवं ध्यान में सुधार हो सकता है।

2. नकारात्मक: आलोचनात्मक और हतोत्साहित करने वाला संवाद होता है।

3. तटस्थ: यह न तो सकारात्मक होता है, न नकारात्मक। यह निर्देशात्मक होता है, न कि किसी विशेष विश्वास या भावना को प्रोत्साहित करने के लिए।

लेकिन मुख्य सवाल है कि सेल्फ-टॉक से लोगों को क्या फायदा होता है। शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि सेल्फ-टॉक से लोगों को भावनाओं को नियमित और संसाधित करने में मदद मिलती है। जैसे, क्रोध और घबराहट की स्थिति में सेल्फ-टॉक से भावनाओं को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। इसके अलावा 2014 में किए गए अध्ययन से पता चला है कि दुश्चिंता से ग्रस्त लोगों के लिए सेल्फ-टॉक काफी फायदेमंद होता है। तनावपूर्ण घटनाओं के बाद सेल्फ-टॉक से चिंता में भी कमी होती है।

यदि सेल्फ-टॉक जीवन में खलल डालने लगे तो उसे कम करने के उपाय भी हैं। जैसे व्यक्ति सेल्फ-टॉक को एक डायरी में लिखने की आदत डाल ले तो इस आदत को नियंत्रित किया जा सकता है। वैसे स्वयं की आलोचना और नकारात्मक सेल्फ-टॉक से मानसिक स्वास्थ्य के प्रभावित होने की आशंका भी होती है। कभी कभी सेल्फ-टॉक के साथ मतिभ्रम होना शीज़ोफ्रेनिया का द्योतक होता है। ऐसी परिस्थितियों में मनोचिकित्सक से परामर्श करना बेहतर होगा। कुल मिलाकर, स्वयं से बात करना एक सामान्य व्यवहार है जो किसी मानसिक समस्या का लक्षण नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

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अंतरिक्ष स्टेशन पर मिले उपयोगी बैक्टीरिया

पिछले 20 वर्षों से अंतरिक्ष यात्रियों का घर – अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (आईएसएस) – कुछ अनोखे बैक्टीरिया का मेज़बान भी बन गया है। स्पेस स्टेशन पर पाए गए चार बैक्टीरिया स्ट्रेन में से तीन के बारे में पूर्व में कोई जानकारी नहीं थी। फ्रंटियर्स इन माइक्रोबायोलॉजी जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार इन बैक्टीरिया स्ट्रेन्स का उपयोग भविष्य में लंबी अंतरिक्ष उड़ानों के दौरान पौधे उगाने के लिए किया जा सकता है।

गौरतलब है कि कई वर्षों से पृथ्वी से पूरी तरह से अलग होने से स्पेस स्टेशन एक अनूठा पर्यावरण है। ऐसे में यह जानने के लिए तरह-तरह के प्रयोग किए गए हैं कि यहां कौन-से बैक्टीरिया मौजूद हैं। पिछले 6 वर्षों में स्पेस स्टेशन के 8 विशिष्ट स्थानों पर निरंतर सूक्ष्मजीवों और बैक्टीरिया की वृद्धि की जांच की जा रही है। इन स्थानों में वह स्थान भी शामिल है जहां सैकड़ों वैज्ञानिक प्रयोग किए जाते हैं, पौधों की खेती का प्रकोष्ठ भी शामिल है और वह जगह भी जहां क्रू-सदस्य भोजन और अन्य अवसरों पर साथ आते हैं। इस तरह सैकड़ों नमूने पृथ्वी पर विश्लेषण के लिए आए हैं और कई हज़ार अभी कतार में हैं।

पृथक किए गए बैक्टीरिया के चारों स्ट्रेन मिथाइलोबैक्टीरिएसी कुल से हैं। मिथाइलोबैक्टीरियम प्रजातियां विशेष रूप से पौधों की वृद्धि में और रोगजनकों से लड़ने में सहायक होती हैं। हालांकि इन चार में से एक (मिथाइलोरुब्रम रोडेशिएनम) पहले से ज्ञात था जबकि छड़ आकार के तीन अन्य बैक्टीरिया अज्ञात थे। इनके आनुवंशिक विश्लेषण में वैज्ञानिकों ने पाया कि ये बैक्टीरिया प्रजातियां मिथाइलोबैक्टीरियम इंडीकम के निकट सम्बंधी हैं। अब इनमें से एक बैक्टीरिया का नाम भारतीय जैव-विविधता वैज्ञानिक मुहम्मद अजमल खान के सम्मान में मिथाइलोबैक्टीरियम अजमाली रखा गया है।

इस बैक्टीरिया के संभावित अनुप्रयोगों को समझने के लिए नासा जेट प्रपल्शन लेबोरेटरी के वैज्ञानिक कस्तूरी वेंकटेश्वरन और नितीश कुमार ने इस शोध पर काम किया है। वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि यह नया स्ट्रेन पौधों की वृद्धि में उपयोगी हो सकता है। न्यूनतम संसाधनों वाले क्षेत्रों में यह जीवाणु मुश्किल परिस्थितियों में भी पौधे के बढ़ने में सहायक होगा। पत्तेदार सब्ज़ियों और मूली को तो सफलतापूर्वक अंतरिक्ष स्टेशन पर उगाया गया है लेकिन फसलों को उगाने में थोड़ी कठिनाई होती है। ऐसे में मिथाइलोबैक्टीरियम इस संदर्भ में उपयोगी हो सकता है।

अभी इस बैक्टीरिया के सही उपयोग को समझने के लिए समय और कई प्रयोगों की ज़रूरत है। आईएसएस पर मिले ये तीन स्ट्रेन अलग-अलग समय पर और अलग-अलग स्थानों से लिए गए थे इसलिए आईएसएस में इनके टिकाऊपन और पारिस्थितिक महत्व का अध्ययन करना होगा। मंगल पर मानव को भेजा जाए, उससे पहले इस तरह के अध्ययन महत्वपूर्ण और ज़रूरी हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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