वर्ष 2008 में नामीबिया के तट पर खनन करने वाले मजदूरों ने
मिट्टी में दफन एक खजाना खोज निकाला था – एक व्यापारिक पुर्तगाली जहाज़ बोम जीसस। वर्ष
1533 में भारत की यात्रा पर निकला यह जहाज़ दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। जहाज़ में सोने-चांदी
के सिक्कों के अलावा अन्य मूल्यवान सामग्री भरी थी। लेकिन पुरातत्वविदों और जीव
विज्ञानियों की एक टीम के लिए तो बोम जीसस का सबसे कीमती खज़ाना था 100 से अधिक
हाथी दांत,
जो अफ्रीकी हाथी दांत का अब तक का सबसे बड़ा पुरातात्विक
जानकारी का भंडार था।
हाथी दांत का आनुवंशिक और रासायनिक विश्लेषण करने पर हाथियों की उन नस्लों का
पता लगा है जो कई अलग-अलग समूहों में पश्चिम अफ्रीका में सदियों पूर्व विचरण करते
थे। करंट बायोलॉजी में प्रकाशित शोध पत्र के अनुसार वैज्ञानिकों का मानना
है कि यह अध्ययन अफ्रीका के हाथियों की 500 वर्ष पुरानी आबादी और हाथी दांत
व्यापार सम्बंधी बहुमूल्य जानकारी दे रहा है।
लगभग 500 वर्षों तक समुद्र की तलछट में दबे रहने के बावजूद हाथी दांत अविश्वसनीय
रूप से अच्छी तरह से संरक्षित थे। जब जहाज़ समुद्र में डूबा तो डिब्बों में हाथी
दांत के ऊपर जमी तांबे और सीसे की सिल्लियों ने हाथी दांतों को समुद्र में नीचे
धकेल दिया और वे मिट्टी में धंस कर नष्ट होने से बच गए। यह भी अनुमान है कि
अटलांटिक के इस क्षेत्र से ठंडा महासागरीय प्रवाह भी चलता है, जिसने डीएनए के संरक्षण में मदद की होगी।
44 हाथी दांत के डीएनए के अध्ययन में पाया गया कि ये हाथी दांत घास के मैदानों
की प्रजाति (लोक्सोडोंटा अफ्रीकाना) की बजाय अफ्रीकी जंगली हाथियों (लोक्सोडोंटा
साइक्लोटिस) के थे।
पहले से ज्ञात आबादियों के डीएनए से तुलना करके टीम ने निर्धारित किया कि बोम
जीसस से प्राप्त हाथी दांत पश्चिम अफ्रीका में कम से कम 17 अलग-अलग आनुवंशिक
समूहों के हाथियों के थे, जिनमें से केवल चार वर्तमान
में मौजूद हैं। हाथी दांत में पाए गए कार्बन और नाइट्रोजन के समस्थानिकों ने इन
हाथियों के आवास के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध कराई है।
भोजन और पानी के माध्यम से कार्बन और नाइट्रोजन ताउम्र हाथी दांत में जमा होते
रहते हैं। कार्बन और नाइट्रोजन के विभिन्न समस्थानिकों की सापेक्ष मात्रा इस बात
का संकेत है कि किसी हाथी ने अपना अधिकांश समय किसी वर्षा-वन में बिताया है या
किसी शुष्क घास के मैदान में। बोम जीसस के हाथी दांत के समस्थानिकों से पता चला कि
ये हाथी जंगलों और घास के मैदानों के मिश्रित प्रकार के आवास में रहते थे।
परंतु वैज्ञानिक शोध परिणाम से बहुत हैरान थे क्योंकि उनका अनुमान था कि वनों
में रहने वाले हाथी 20वीं सदी में पहली बार जंगल से घास के मैदानों में आए थे।
लेकिन परिणाम बता रहे थे कि अफ्रीकी हाथी तो दोनों आवासों में विचरते रहे हैं।
आवास की जानकारी संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
बोम जीसस से प्राप्त हाथी दांत 16वीं शताब्दी में अफ्रीकी महाद्वीप से हाथी दांत के व्यापार की तस्वीर चित्रित करते हैं। लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि पुर्तगाली जहाज़ पर लादे गए ये हाथी दांत विभिन्न बंदरगाहों से आए थे या किसी एक ही जगह से। भविष्य में ऐतिहासिक बंदरगाह वाले स्थानों से प्राप्त प्रमाण हाथी आवास की जानकारी के रहस्य को सुलझाने में मदद कर सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.archaeology.wiki/wp-content/uploads/2020/12/elephant.jpg
वर्ष 2020 में, सोशल मीडिया के माध्यम
से फैलने वाली भ्रामक खबरों, लाइक्स वगैरह में 17 प्रतिशत
की वृद्धि हुई है। परिमाम हैं ध्रुवीकरण, हिंसक उग्रवाद और
नस्लवाद में वृद्धि। यहां तक कि जलवायु परिवर्तन से सम्बंधित कार्रवाइयों और
टीकाकरण अभियानों का भी काफी विरोध हुआ है। इस विषय में सोशल मीडिया कंपनियों ने
झूठी खबरों को हटाने और भ्रामक खबरों को चिंहित करने के कुछ प्रयास किए हैं। जहां
फेसबुक और इंस्टाग्राम अपने उपयोगकर्ताओं को आपत्तिजनक पोस्ट की शिकायत करने का
मौका देते हैं,
वहीं ट्विटर किसी भी पोस्ट को री-ट्वीट करने से पहले अच्छी
तरह पढ़ने की सलाह देता है।
सोशल मीडिया पर झूठी खबरों से निपटने के लिए कंपनियों द्वारा अपने एल्गोरिदम
में सुधार लाने को लेकर चर्चाएं चल रही हैं लेकिन यह बात चर्चा से नदारद है कि इस
बात पर कैसे असर डाला जाए कि लोग क्या साझा करना चाहते हैं। देखा जाए तो विश्वसनीयता
के लिए कोई स्पष्ट और त्वरित प्रोत्साहन नहीं है। जबकि तंत्रिका वैज्ञानिकों
द्वारा किए गए अध्ययनों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को उसके पोस्ट पर ‘लाइक’ मिलता
है तो उसका अहंकार तुष्ट होता है और इससे उसके फॉलोअर्स की संख्या बढ़ती है जिसके
आधार पर उसे कुछ अन्य उपलब्धियां भी मिल सकती हैं।
आम तौर पर सोशल मीडिया में यदि किसी पोस्ट की पहुंच अधिक होती है तो लोग वैसे
ही पोस्ट करना पसंद करते हैं। पेंच यही है कि झूठी खबरें विश्वसनीय खबरों की तुलना
में 6-20 गुना अधिक तेज़ी से फैलती हैं। इसका संभावित कारण उस सामग्री की ओर लोगों
का आकर्षण है जो उनकी वर्तमान धारणाओं की पुष्टि करती है। और तो और, यह भी देखा गया है कि लोग उन जानकारियों को भी साझा करने से नहीं हिचकते जिन
पर वे खुद भरोसा नहीं करते हैं। एक प्रयोग के दौरान जब लोगों को उनके राजनीतिक
जुड़ाव के अनुरूप,
लेकिन झूठी, खबर दिखाई गर्इं तो 40 प्रतिशत
लोगों ने इसे साझा करने योग्य समझा जबकि उनमें से मात्र 20 प्रतिशत लोगों को लगता
था कि खबर सच है।
देखा जाए तो सोशल मीडिया पर आमजन को अधिक आकर्षित करने वाली जानकारियों को
वरीयता मिलती है,
भले ही वह कम गुणवत्ता वाली ही क्यों न हो। लेकिन कंपनियों
के पास अभी तक विश्वसनीय और सटीक जानकारियों को मान्यता देने के लिए कुछ नहीं है।
कोई ऐसी प्रणाली अपनाने की ज़रूरत है जिसमें विश्वसनीयता और स्पष्टता को पुरस्कृत
किया जाए। यह प्रणाली मनुष्य की प्राकृतिक प्रवृत्ति के साथ सटीक बैठती है जिसमें
वे उन कार्यों को महत्ता देते हैं जिससे कोई इनाम या मान्यता मिले। इससे अन्य लोग
भी विश्वसनीय सामग्री की ओर बढ़ेंगे।
पारितोषिक प्रणाली कई देशों में अन्य संदर्भों में काफी प्रभावी रही है।
स्वीडन में गति सीमा का पालन करने वाले ड्राइवरों को पुरस्कृत किया गया जिससे औसत
गति में 22 प्रतिशत की कमी आई। दक्षिण अफ्रीका में एक स्वास्थ्य-बीमा कंपनी ने
अपने ग्राहकों को सुपरमार्केट से फल या सब्ज़ियां खरीदने, जिम
में कसरत करने या मेडिकल स्क्रीनिंग में भाग लेने पर पॉइंट्स देना शुरू किए। वे इन
पॉइंट्स को कुछ सामान खरीदने के लिए उपयोग कर सकते हैं और इस उपलब्धि को वे एक
तमगे के तौर पर अपने साथियों और सहयोगियों से साझा भी कर सकते हैं। ऐसा करने से
उनके व्यवहार में बदलाव आया और अस्पताल के चक्कर भी कम हुए।
सोशल मीडिया पर इस तरह की प्रणाली लागू करने में सबसे बड़ी चुनौती जानकारियों
की विश्वसनीयता के आकलन करने की है। इसमें एक तरीका ‘ट्रस्ट’ बटन शामिल करना हो
सकता है जिसमें यह दर्शाया जा सके कि किसी पोस्ट को कितने लोगों ने विश्वसनीय माना
है। इसमें यह जोखिम तो है कि लोग इसके साथ खिलवाड़ करने लगेंगे लेकिन इससे लोगों को
अपनी बात कहने का एक और रास्ता मिल जाएगा और यह सोशल मीडिया कंपनियों के व्यापार
मॉडल के अनुरूप भी होगा। इसमें लोग विश्वसनीयता के महत्व पर अधिक ज़ोर देंगे।
उपरोक्त अध्ययन में एक यह बात सामने आई कि जब लोगों से किसी एक वक्तव्य की सत्यता
विचार करने का आग्रह किया गया तो झूठी खबरों को साझा करने की संभावना भी कम हो गई।
उपयोगकर्ताओं द्वारा मूल्यांकन के काफी सकारात्मक उदाहरण मौजूद हैं। ऑनलाइन
खरीददारी वेबसाइट अमेज़न पर ऐसे समीक्षकों को अमेज़न वाइन प्रोग्राम के तरह इनाम
दिया जाता है जिनकी समीक्षा से लोगों को किसी उत्पाद की पहचान करने में सहायता मिली
हो। इसमें एक अच्छी बात यह भी सामने आई कि अधिक संख्या में लोगों द्वारा की गई
समीक्षा पेशेवर लोगों द्वारा की गई समीक्षा से मेल खाती है।
विकिपीडिया भी एक ऐसा उदाहरण है जिसमें लोगों द्वारा किसी जानकारी की विश्वसनीयता
का आकलन किया जा सकता है। वर्तमान में सोशल मीडिया कंपनियों ने फैक्ट-चेकर की टीम
तैयार की है जो भ्रामक खबरों पर ‘ट्रस्ट’ बटन को हटा सकते हैं और विश्वसनीय खबरों
पर ‘गोल्डस्टार’ दे सकते हैं। इसमें विश्वसनीयता में निरंतर उच्च रैंक प्राप्त
करने वालों को ‘विश्वसनीय उपभोक्ता’ के बैज से सम्मानित किया जा सकता है।
वैसे, कुछ लोगों का मानना है कि सटीक जानकारी को बढ़ावा देने के लिए पारितोषिक अधिकतम लाइक्स एल्गोरिदम और भ्रामक जानकारी को बढ़ावा देने की मानवीय प्रवृत्ति के खिलाफ पर्याप्त नहीं है। लेकिन इस प्रणाली को आज़माने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। और सोशल मीडिया पर इस तरह का एक स्वस्थ माहौल बनाने के लिए नेटवर्क वैज्ञानिकों, कंप्यूटर वैज्ञानिकों, मनोचिकित्सकों और अर्थशास्त्रियों के साथ अन्य लोगों के सहयोग की भी आवश्यकता होगी। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://s.abcnews.com/images/Technology/SocialMediaMisinformation_010620_v01_BV_hpMain_4x3_992.jpg
लीडेन युनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन से पता
चला है कि पीपीई कचरा दुनिया भर में जीव-जंतुओं की जान ले रहा है। यह अध्ययन एनिमल
बायोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। कोविड-19 से बचने के लिए सामाजिक दूरी रखना और
बड़े पैमाने पर दस्ताने व मास्क जैसे व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों (पीपीई) का उपयोग
एक मजबूरी है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि दुनिया भर में कोरोना से बचने के लिए
मेडिकल स्टाफ को हर महीने करीब 8 करोड़ दस्ताने, 16 लाख
मेडिकल गॉगल्स और 9 करोड़ मेडिकल मास्क की ज़रूरत पड़ रही है। आम लोगों द्वारा उपयोग
किए जा रहे मास्क की संख्या तो अरबों में पहुंच चुकी है। एक अन्य शोध से पता चला
है कि वैश्विक स्तर पर हर वर्ष औसतन 12,900 करोड़ फेस मास्क और 6500 करोड़ दस्तानों
का उपयोग किया जा रहा है। हांगकांग के सोको आइलैंड पर सिर्फ 100 मीटर की दूरी में
70 मास्क पाए गए थे, जबकि यह एक निर्जन स्थान है।
उपयोग पश्चात ठीक निपटान न होने व यहां-वहां फेंकने से सड़कों पर फैला यह
मेडिकल कचरा इंसानों के साथ-साथ पशुओं के लिए भी खतरनाक है, और समुद्र में पहुंचकर जलीय जीवों को भी नुकसान पहुंचा रहा है।
सबसे अधिक प्रभावी अधिकांश थ्री-लेयर मास्क पॉलीप्रोपायलीन के और दस्ताने व
पीपीई किट रबर व प्लास्टिक से बने होते हैं। प्लास्टिक की तरह ये पॉलीमर्स भी
सैकड़ों सालों तक पर्यावरण के लिए खतरा बने रहेंगे।
पीपीई किट से महामारी से सुरक्षा तो हो रही है लेकिन इनके बढ़ते कचरे ने एक नई
समस्या को जन्म दिया है। शोध से पता चला है कि यह कचरा ज़मीन पर रहने वाले जीवों के
साथ ही जल में रहने वाले जीवों को भी प्रभावित कर रहा है। जीव इनमें फंस रहे हैं
और उनके द्वारा कई बार इन्हें निगलने के मामले भी सामने आए हैं।
शोधकर्ताओं ने पहली बार लीडेन की नहर में एक मछली को लेटेक्स से बने दस्ताने
में उलझा पाया था। आगे खोजबीन में यूके में लोमड़ी, कनाडा
में पक्षी,
हेजहॉग, सीगल, केंकड़े
और चमगादड़ वगैरह इन मास्क में उलझे पाए गए। मछलियां पानी में तैरते मास्क और
प्लास्टिक कचरे को अपना भोजन समझ रही हैं। विशेषकर डॉल्फिन पर तो बड़ा संकट है
क्योंकि वे तटों के करीब आ जाती हैं।
संस्थान क्लीन-सीज़ की प्रमुख लौरा फॉस्टर का कहना है कि आपको नदियों में बहते
मास्क दिख जाएंगे। कई बार ये मास्क आपस में उलझकर जाल-सा जैसे बना लेते हैं और
जीव-जंतु इसमें फंस जाते हैं। कई बार ये आग लगने का कारण भी बनते हैं। ये सड़ते
नहीं लेकिन टुकड़ों-टुकड़ों में बिखर सकते हैं। ऐसे में समुद्र में माइक्रोप्लास्टिक
और बढ़ जाता है।
कई बार पक्षियों को इस कचरे को घोंसले के लिए भी इस्तेमाल करते हुए पाया गया
है। नीदरलैंड्स में कूट्स पक्षियों को अपने घोंसले के लिए मास्क और ग्लव्स का
उपयोग करते पाया गया था। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कई जानवरों में भी
कोविड-19 के लक्षण सामने आए हैं।
पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि अगर यह मेडिकल कचरा जंगलों तक पहुंच गया तो परिणाम भीषण और दूरगामी होंगे। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://akm-img-a-in.tosshub.com/indiatoday/images/story/202008/ppe-kits-garbage-pti.jpeg?w6mWtXmeyZATl4ZCieVlUG_Mm73ZaWIe&size=1200:675
हाल ही में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (IISER), भोपाल द्वारा किए गए एक आनुवंशिक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने ग्वारपाठा (एलो
वेरा) में सूखा प्रतिरोधी जीन्स की पहचान की है। ये जीन्स ग्वारपाठा को अत्यंत
गर्म और शुष्क जलवायु में पनपने में मदद करते हैं।
संस्थान के विनीत के. शर्मा और उनके साथियों ने ग्वारपाठा के पूरे जीनोम का
अनुक्रमण किया है, जिसमें उन्होंने 86,000 से अधिक
प्रोटीन-कोडिंग जीन्स की पहचान की। यह अध्ययन iScience नामक शोध पत्रिका में फरवरी
2021 में प्रकाशित हुआ है।
पहचाने गए कुल जीन्स में से टीम ने सिर्फ उन 199 जीन्स का बारीकी से अध्ययन
किया,
जिनकी भूमिका पौधे के विकास और अनुकूलन में महत्वपूर्ण देखी
गई। इनमें से कुछ जीन्स पौधे को सूखे की स्थिति में पुष्पन में मदद करते हैं और इस
तरह उनके प्रजनन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इसके अलावा शोधकर्ताओं ने अनुक्रम-विशिष्ट डीएनए से जुड़ने वाले जीन्स भी
पहचाने हैं जो बाहरी उद्दीपनों पर संकेत देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने ग्वारपाठा में ऐसे जीन्स भी देखे जो कार्बोहाइड्रेट को तोड़कर ऊर्जा बनाने
में मदद करने के अलावा कम या उच्च तापमान, पानी
की कमी,
उच्च लवणीयता और पराबैंगनी विकिरण जैसी तनावपूर्ण स्थितियों
में प्रतिक्रिया को नियंत्रित करते हैं।
सूखे की स्थिति से निपटने में इस पौधे के कम से कम 90 जीन्स भूमिका निभाते
हैं। ये जीन भौतिक रूप से भी एक-दूसरे के साथ संपर्क में आते हैं, जिससे लगता है कि ग्वारापाठा में सूखा से निपटने वाले तंत्र का अनुकूली विकास
हुआ होगा।
उम्मीद है कि यह अध्ययन भविष्य में इस पौधे के विकास के साथ-साथ इसके औषधीय गुणों को भी समझने में मदद करेगा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://opt.toiimg.com/recuperator/img/toi/m-77338841/77338841.jpg?resizemode=1&width=90&height=66
पुरातात्विक स्थलों से प्राप्त वस्तुओं-कंकालों के आधार पर
वैज्ञानिक उस समय के समाज-संस्कृति का अनुमान लगाते हैं। कांस्य युगीन युरोप से
प्राप्त टूटे-फूटे कंकालों के देखकर यह अंदाज़ा मिलता है कि यह समय इस समाज के लिए
मुश्किल रहा होगा। अधिकांश इतिहासकार और पुरातत्वविद यह मानते हैं कि इन योद्धा
समाजों का नेतृत्व पुरुष द्वारा ही किया जाता होगा।
अलबत्ता,
हाल ही में हुए एक अध्ययन में, कांस्य
युगीन महल में दफन महिला कंकाल का विश्लेषण यह संभावना जताता है कि महिलाएं भी
नेतृत्व की भूमिका में रही होंगी। हालांकि स्पष्ट रूप से यह पता करने का कोई तरीका
नहीं है कि महिलाएं कितनी शक्तिशाली रही होंगी, लेकिन
इस अध्ययन के आधार पर शोधकर्ताओं का कहना है कि प्राचीन समय में महिलाओं की स्थिति
या भूमिका के बारे में हमारी मान्यताओं पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत है।
वर्ष 2014 में स्पेनिश शोधकर्ताओं को ला अल्मोलोया खुदाई स्थल पर एक खंडहर महल
के नीचे बने मकबरे में एक कब्र मिली थी। यह खंडहर महल विस्तृत मैदान के बीच एक
चट्टानी पहाड़ी पर स्थित था। जिस स्थल पर यह खंडहर था वह किसी ज़माने में एल एलगर
समाज का हिस्सा था, जो लगभग 2200 से 1550 ईसा पूर्व तक
दक्षिण-पूर्वी आइबेरियाई प्रायद्वीप के आसपास फला-फूला। पुरातत्वविदों को स्थल पर
बुनाई के उपकरण और सामग्रियां मिली थीं, जिसके आधार पर उनका कहना
था कि यह एक प्रमुख कपड़ा उत्पादक क्षेत्र था और संभवत: साम्राज्य का शक्तिशाली
धन-सम्पन्न केंद्र भी था।
महल के मकबरे के नीचे एक बड़ा कमरा था। इस कमरे में आम तौर पर पाई जाने वाली
वस्तुएं,
जैसे औज़ार या पानी के बर्तन, या
समारोह में इस्तेमाल होने वाली चीज़ें नहीं थी बल्कि कमरे की दीवारों से सटी हुई पत्थर
की बेंच लगी थीं। इन्हें देखकर लगता था कि यह कमरा ध्यान लगाने, विचार-विमर्श करने या दरबार की जगह रही होगी।
कमरे के फर्श के नीचे मिट्टी का एक बड़ा पात्र दफन था जिसमें एक पुरुष और एक
महिला का कंकाल था। रेडियोकार्बन डेटिंग ने पता चलता है कि उनकी मृत्यु 1650 ईसा
पूर्व के आसपास हुई होगी। मृत्यु के समय पुरुष की उम्र लगभग 35-40 वर्ष होगी और
महिला की उम्र लगभग 25-30 वर्ष होगी। शोधकर्ताओं को उनकी मृत्यु का कारण स्पष्ट
नहीं हो पाया,
क्योंकि उनके कंकाल में किसी तरह की घातक चोट के निशान नहीं
थे। कंकालों के आनुवंशिक विश्लेषण से यह पता चला है दोनों कंकाल आपस में सम्बंधी
(एक ही वंश के) नहीं थे। लेकिन उन दोनों की एक बेटी थी जिसकी मृत्यु बचपन में ही
हो गई थी,
और उसका शव वहीं पास में दफन था।
महिला-पुरुष के कंकालों का यह जोड़ा बहुमूल्य चीज़ों के साथ दफन था। पुरुष ने
तांबे का कंगन पहना था और उसके कानों में सोने के बुंदे थे। लेकिन महिला आभूषणों
से पूरी तरह लदी हुई थी। महिला ने चांदी के कई कंगन और अंगूठियां पहनी थीं, उसके गले में मोतियों का हार था और उसके सर पर आकर्षक ताज सुशोभित था। इस
पुरातत्व स्थल से 90 किलोमीटर दूर स्थित एक अन्य पुरातत्व स्थल पर मिले एल एलगर
समाज की चार महिलाओं के कंकाल के सर पर भी इसी तरह के ताज सुशोभित थे।
मूल्यवान चीज़ों के साथ दफन महिला-पुरुष के कंकालों के आधार पर शोधकर्ताओं का
कहना है कि ये जोड़ा कुलीन वर्ग का होगा। महिला के आभूषणों को देखकर लगता है कि
पुरुष और महिला में से महिला अधिक शक्तिशाली रही होगी, और
संभवत: वह पास के एल एलगर समाज की क्षेत्रीय शासक होगी। युरोप के अन्य कांस्य
युगीन स्थलों पर भी आभूषणों से सुसज्जित महिलाओं की कई कब्रों मिली हैं।
पुरातत्वविद अब तक इन्हें भी शक्तिशाली योद्धाओं की पत्नियों के रूप में ही देखते
आए हैं। लेकिन ला अल्मोलोया सहित अन्य सम्पन्न कब्रों को देखकर हम यह कल्पना क्यों
नहीं करते कि संभवत: ये महिलाएं आर्थिक और राजनीतिक नेता रही हों।
प्राचीन समाज की वास्तविकता क्या है? वास्तव में उन समाजों में लोग एक दूसरे को किस तरह की भूमिका में देखते थे, यह स्पष्ट रूप से जानना तो लगभग असंभव है। लेकिन बेहतर होगा यदि हम आभूषणों से सुसज्जित प्राचीन महिला को पुरुष पराक्रम की छाया के रूप में न देखें। यदि हम यह मानते हैं कि कब्रों में साथ में दफनाई गई चीज़ें व्यक्ति की अपनी होती हैं तो हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि शायद कांस्य युग में महिलाएं भी शासकों की भूमिका में रही थीं। (स्रोत फीचर्स)
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चीन में हुए कुछ अध्ययनों से पता चला है कि कोरोनावायरस
फ्रोज़न सतहों से फैल सकता है। लेकिन डबल्यूएचओ की टीम ने कहा है कि महामारी की
शुरुआत इस रास्ते से नहीं हुई है।
फरवरी में एक प्रेसवार्ता में टीम ने कोरोनावायरस के चमगादड़ों से एक मध्यवर्ती
जीव के मार्फत मनुष्यों में प्रवेश की बात की। टीम का मत है कि चीनी फार्मस में जंगली जीवों का फ्रोज़न मांस वायरस के शुरुआती मामलों का कारण हो सकता है।
अलबत्ता टीम के एक सदस्य डोमिनिक डायर के मुताबिक यह जानना ज़रूरी है कि फ्रोज़न
वन्यजीव संक्रमित कैसे हुए।
लगता तो यह है कि डबल्यूएचओ द्वारा फ्रोज़न मांस की जांच के सुझाव का गलत अर्थ
निकाला गया है। वायरस के फ्रोज़न सतह से फैलने के विचार के आधार पर कहा गया कि यह
वायरस विदेशों से आयात किए गए फ्रोज़न वन्यजीवों के साथ वुहान में आया है। इसी तरह
बाद के मामलों के पीछे भी आयातित फ्रोज़न फूड को दोषी ठहराया गया। चीन के
वैज्ञानिकों ने भी फ्रोज़न मांस से वायरस फैलने के साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं।
दूसरी ओर,
चीन के बाहर के कई वैज्ञानिकों ने इस ‘कोल्ड चेन’ सिद्धांत
को खारिज कर दिया है और इसे आलोचनाओं से बचने का एक प्रयास बताया है। उनके अनुसार
संक्रमित सतहों से सार्स-कोव-2 का फैलना बहुत कम संभव है।
बहरहाल,
कुछ अध्ययन सतह से संक्रमण की संभावना को दर्शाते हैं।
अगस्त में सिंगापुर के शोधकर्ताओं द्वारा बायोआर्काइव्स में प्रकाशित एक
रिपोर्ट में बताया गया कि सार्स-कोव-2 वायरस फ्रोज़न या फ्रिज में रखे मांस पर तीन
सप्ताह से अधिक समय तक संक्रामक रह सकता है। वैसे इस पेपर की समकक्ष समीक्षा नहीं
की गई है। इसके दो माह बाद चीनी शोधकर्ताओं ने ज़िनफादी बाज़ार में जून में फैले
प्रकोप को भी फ्रोज़न मांस से जोड़कर देखा। इसमें पहला मामला बिना किसी सामुदायिक
प्रसार के 56 दिन के बाद सामने आया जिसमें सार्स-कोव-2 का एक विशिष्ट स्ट्रेन पाया
गया। जांचकर्ताओं ने यही स्ट्रेन कोल्ड स्टोरेज में रखी साल्मन मछली पर भी पाया
था।
इसी तरह नवंबर में प्रकाशित तीसरे अध्ययन में चीनी वैज्ञानिकों के एक अन्य
समूह ने शैनडांग के पूर्वी प्रांत किंगडाओ बंदरगाह के कर्मचारियों में संक्रामक
वायरस का पता लगाया जो फ्रोज़न कॉड मछली की पैकेजिंग का काम करते थे। वैज्ञानिक के
अनुसार इस संक्रमण का कारण फ्रोज़न कॉड हो सकता है। इन रिपोर्ट्स के आधार पर चीनी
अधिकारियों ने नवंबर में सभी फ्रोज़न सामग्रियों के अनिवार्य विसंक्रमण के निर्देश
दिए थे।
डबल्यूएचओ की टीम महामारी के शुरुआती मामलों के पीछे खाद्य सामग्री या
पैकेजिंग से संक्रमण के विचार से सहमत नहीं है। जांचकर्ता ये ज़रूर मानते हैं कि
वायरस से संक्रमित कोई जीव हुनान सीफूड बाज़ार में शुरुआती प्रकोप का कारण हो सकता
है। डायर के अनुसार ऐसी भी संभावना है कि बाज़ार में किसी संक्रमित व्यक्ति या
उत्पाद के आने से यह प्रकोप फैल गया हो।
देखा जाए तो जनवरी 2020 में हुनान बाज़ार के बंद होने से पहले तक वहां की 653
में से 10 दुकानों पर फार्म से लाए गए जीवित या फ्रोज़न वन्यजीव बेचे जाते थे। डायर
के अनुसार रैकून और बिज्जू कोरोनावायरस के प्रति अतिसंवेदनशील होते हैं। लेकिन
बाज़ार बंद होने के बाद जब मांस, जीव और यहां तक कि उनके फ्रोज़न
मृत शरीर के नमूनों का अध्ययन किया गया तो किसी में भी सार्स-कोव-2 नहीं मिला, हालांकि नमूनों की कम संख्या को देखते हुए इस संभावना को खारिज नहीं किया जा
सकता।
युनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड के एंड्रयू ब्रीड के अनुसार वायरस से संक्रमित
फ्रोज़न शवों के हैंडलिंग के दौरान संक्रमण का खतरा हो सकता है। यह विशेष रूप से
मध्यवर्ती जीवों के लिए सही हो सकता है जिनका प्रतिरक्षा तंत्र संक्रमण से निपटने
के लिए अनुकूलित नहीं होता और वे काफी मात्रा में वायरस बिखेरते हैं। अफ्रीका में
एबोला प्रकोप के दौरान ऐसा मामला देखा गया था। लेकिन पूरी जानकारी के अभाव में कुछ
भी स्पष्ट कह पाना संभव नहीं है।
इसी बीच जीवित जानवरों से सार्स-कोव-2 के फैलने की संभावना भी जताई जा रही है। चीन में अधिकतर जीवित जानवरों का व्यापार किया जाता है जिससे जीवों से मनुष्यों में वायरस फैलने की अधिक संभावना रहती है। इनमें से कई जीव चीन के दूरदराज़ फार्म से बाज़ार में लाए जाते हैं। ऐसे में विभिन्न प्रजातियों के जीवों के एक स्थान पर आने से नए वायरस उत्पन्न होने की संभावना बनी रहती है। डायर के अनुसार वुहान बाज़ार में उत्पादों को पहुंचाने वाले वन्यजीव कर्मचारियों में सार्स-कोव-2 की एंटीबॉडी तलाशना इसमें काफी निर्णायक हो सकता है। (स्रोत फीचर्स) नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://media.nature.com/lw800/magazine-assets/d41586-021-00495-0/d41586-021-00495-0_18896774.jpg
गर्मी का मौसम आते ही गन्ने का रस, जलज़ीरा, नींबू पानी जैसे ठंडे पेय की दुकानें सज जाती है। ठंडे पेय लोगों को गर्मी से
राहत देते हैं। किंतु कुछ लोगों का ऐसा भी कहना है कि गर्म पेय भी गर्मियों में
ठंडक पहुंचा सकते हैं। अब तक वैज्ञानिकों को इस पर संदेह रहा है क्योंकि गर्म
चीज़ें पीकर तो आप शरीर को ऊष्मा दे रहे हैं। लेकिन हाल ही में हुआ एक अध्ययन बताता
है कि गर्मियों में कुछ विशेष परिस्थितियों में गर्म पेय वाकई आपको ठंडक दे सकते
हैं।
होता यह है कि गर्म पेय पीने से हमारे शरीर की ऊष्मा में इज़ाफा होता है, जिससे हमें पसीना अधिक आता है। जब यह पसीना वाष्पीकृत होता है तो पसीने के साथ
हमारे शरीर की ऊष्मा भी हवा में बिखर जाती है, जिसके
परिणामस्वरूप हमारे शरीर की ऊष्मा में कमी आती है और हमें ठंडक महसूस होती है।
शरीर की ऊष्मा में आई यह कमी उस ऊष्मा से अधिक होती है जितनी गर्म पेय पीने के
कारण बढ़ी थी।
यह हो सकता है कि पसीना आना हमें अच्छा न लगता हो, लेकिन
पसीना शरीर के लिए अच्छी बात है। ठंडक पहुंचाने में अधिक पसीना आना और उसका वाष्पन
महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पसीना जितना अधिक आएगा, उतनी
अधिक ठंडक देगा लेकिन उस पसीने का वाष्पन ज़रूरी है।
यदि हम किसी ऐसी जगह पर हैं जहां नमी या उमस बहुत है, या
किसी ने बहुत सारे कपड़े पहने हैं, या इतना अधिक पसीना आए कि वह
चूने लगे और वाष्पीकृत न हो पाए, तो फिर गर्म पेय पीना घाटे का
सौदा साबित होगा। क्योंकि वास्तव में तो गर्म पेय शरीर में गर्मी बढ़ाते हैं। इसलिए
इन स्थितियों में जहां पसीना वाष्पीकृत न हो पाए, ठंडे
पेय पीना ही राहत देगा।
गर्म पेय का सेवन ठंडक क्यों पहुंचाता है, यह
जानने के लिए ओटावा विश्वविद्यालय के स्कूल फॉर ह्यूमन काइनेटिक्स के ओली जे और
उनके साथियों ने प्रयोगशाला में सायकल चालकों पर अध्ययन किया। प्रत्येक सायकल चालक
की त्वचा पर तापमान संवेदी यंत्र लगाए और शरीर के द्वारा उपयोग की गई ऑक्सीजन और
बनाई गई कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा को नापने के लिए एक माउथपीस भी लगाया।
ऑक्सीजन और कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा बताती है कि शरीर के चयापचय में कितनी
ऊष्मा बनी। साथ ही उन्होंने हवा के तापमान और आर्द्रता के साथ-साथ अन्य कारकों की
भी बारीकी से जांच की। इस तरह एकत्रित जानकारी की मदद से उन्होंने पता किया कि
प्रत्येक सायकल चालक ने कुल कितनी ऊष्मा पैदा की और पर्यावरण में कितनी ऊष्मा
स्थानांतरित की। देखा गया कि गर्म पानी (लगभग 50 डिग्री सेल्सियस तापमान पर) पीने
वाले सायकल चालकों के शरीर में अन्य के मुकाबले में कम ऊष्मा थी।
वैसे यह अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि गर्म पेय शरीर को अधिक पसीना पैदा
करने के लिए क्यों उकसाते हैं, लेकिन शोधकर्ताओं का अनुमान है
कि ऐसा करने में गले और मुंह में मौजूद ताप संवेदकों की भूमिका होगी। इस पर आगे
अध्ययन की ज़रूरत है।
फिलहाल शोधकर्ताओं की सलाह के अनुसार यदि आप नमी वाले इलाकों में हैं तो गर्मी में गर्म पानी न पिएं। लेकिन सूखे रेगिस्तानी इलाकों के गर्म दिनों में गर्म चाय की चुस्की ठंडक पहुंचा सकती है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://live-production.wcms.abc-cdn.net.au/a3a7be363238b5a0e0b02c428713ac4b?impolicy=wcms_crop_resize&cropH=1080&cropW=1618&xPos=151&yPos=0&width=862&height=575
दुनिया भर में प्लास्टिक प्रदूषण का खतरा बढ़ता जा रहा है और
अब समुद्र भी इससे अछूते नहीं हैं। सार्वजनिक दबाव का नतीजा राष्ट्र-आधारित नियम
कायदों और स्वैच्छिक प्रयासों के पैबंदों रूप में ही सामने आया है। लेकिन ये इस
व्यापक समस्या को संबोधित करने में प्राय: नाकाम ही रहे हैं। अब कॉर्पोरेशन्स के
एक वैश्विक समूह ने राष्ट्र संघ के माध्यम से एक संधि-आधारित, समन्वित चक्रीय रणनीति की पहल की है। सवाल इतना ही है कि क्या यह रणनीति सफल
होगी या अतीत के प्रयासों की तरह नाकाम रहेगी।
पहल
नवीन प्लास्टिक अर्थ व्यवस्था का विचार एलन मैककार्थर फाउंडेशन का है। विचार
यह है कि इस अर्थ व्यवस्था में प्लास्टिक कभी भी एक कचरा या प्रदूषक नहीं बनेगा।
फाउंडेशन ने तीन सुझाव दिए हैं ताकि एक चक्रीय प्लास्टिक अर्थ व्यवस्था हासिल की
जा सके। फाउंडेशन का दावा है कि समस्यामूलक प्लास्टिक वस्तुओं को हटाकर, यह सुनिश्चित करके कि सारा प्लास्टिक पुन:उपयोग, पुनर्चक्रण
और कंपोस्ट-लायक हो, हम एक ऐसी अर्थ व्यवस्था हासिल कर सकते हैं
कि सारा प्लास्टिक अर्थ व्यवस्था में ही बना रहे और पर्यावरण से बाहर रहे।
एलन मैककार्थर फाउंडेशन के ही शब्दों में शून्य प्लास्टिक कचरा उत्पन्न करने
वाली अर्थव्यवस्था के कुछ तत्व निम्नानुसार होंगे:
1. रीडिज़ाइनिंग, नवाचार और डीलिवरी के नए
मॉडल्स अपनाकर समस्यामूलक तथा अनावश्यक प्लास्टिक पैकेजिंग से मुक्ति पाई जा सकती
है।
1क – प्लास्टिक के कई लाभ हैं।
लेकिन बाज़ार में कुछ समस्यामूलक वस्तुएं भी हैं जिन्हें हटाना होगा ताकि चक्रीय
अर्थ व्यवस्था हासिल की जा सके। कहीं-कहीं तो उपयोगिता से समझौता किए बगैर
प्लास्टिक पैकेजिंग को पूरी तरह समाप्त भी किया जा सकता है।
2. जहां संभव और प्रासंगिक हो, पुन:उपयोग के मॉडल को लागू किया जाए, पैकेजिंग में एक बार-उपयोग की ज़रूरत को समाप्त किया जाए।
2क – हालांकि पुन:चक्रण को
बेहतर बनाना महत्वपूर्ण है, लेकिन मात्र पुन:चक्रण के दम
पर हम प्लास्टिक सम्बंधी वर्तमान मुद्दों को नहीं निपटा सकते।
2ख – जहां भी प्रासंगिक हो, पुन:उपयोग के मॉडल को सामने लाया जाना चाहिए ताकि एकबार-उपयोग वाले पैकेजिंग
की ज़रूरत कम से कम हो।
3. सारा प्लास्टिक पैकेजिंग 100 फीसदी पुन:उपयोग, पुनर्चक्रण या कंपोÏस्टग के लायक हो।
3क – इसके लिए बिज़नेस मॉडल्स, पदार्थों,
पैकेजिंग और डिज़ाइन तथा पुन:प्रसंस्करण की टेक्नॉलॉजी में
रीडिज़ाइन और नवाचार की ज़रूरत होगी।
3ख – कंपोÏस्टग-योग्य प्लास्टिक पैकेजिंग कोई रामबाण समाधान नहीं है
बल्कि विशिष्ट अनुप्रयोगों के लिए कारगर होगा।
4. सारे प्लास्टिक पैकेजिंग का पुन:उपयोग, पुनर्चक्रण या कंपोÏस्टग किया जाएगा।
4क – कोई भी प्लास्टिक
पर्यावरण,
कचरा भराव स्थलों, इंसनरेटरों या
कचरे-से-ऊर्जा संयंत्रों में नहीं पहुंचना चाहिए। ये चक्रीय प्लास्टिक अर्थ
व्यवस्था के हिस्से नहीं हैं।
4ख – पैकेजिंग का उत्पादन व
बिक्री करने वाले कारोबारियों की ज़िम्मेदारी मात्र उनके पैकेजिंग का डिज़ाइन करने व
उपयोग करने तक सीमित नहीं है; उन्हें यह भी ज़िम्मेदारी लेनी
होगी कि उस प्लास्टिक का वापिस संग्रह किया जाए, पुन:चक्रण
किया जाए या कंपोस्ट किया जाए।
4ग – कारगर संग्रह के लिए
अधोरचना बनाने,
सम्बंधित आत्म-निर्भर वित्त-पोषण की व्यवस्थाएं बनाने तथा
उपयुक्त नियामक व नीतिगत माहौल तैयार करने के लिए सरकारों की भूमिका अनिवार्य है।
5. प्लास्टिक उपयोग को सीमित संसाधनों के उपभोग से पूरी तरह पृथक करना
होगा।
5क – इस पृथक्करण का सबसे पहला
चरण वर्जिन प्लास्टिक के उपयोग को कम करना होगा (पुन:उपयोग और पुन:चक्रण के माध्यम
से)
5ख – पुन:चक्रित पदार्थों का
उपयोग ज़रूरी है (जहां तकनीकी व कानूनी रूप से संभव हो) ताकि सीमित संसाधनों से इसे
मुक्त किया जा सके और संग्रह व पुन:चक्रण को बढ़ावा दिया जा सके।
5ग – धीरे-धीरे प्लास्टिक का
समस्त उत्पादन व पुन:चक्रण नवीकरणीय ऊर्जा से किया जाना चाहिए।
6. सारा प्लास्टिक पैकेजिंग हानिकारक रसायनों से मुक्त हो और सम्बंधित
पक्षों के स्वास्थ्य व सुरक्षा अधिकारों का सम्मान किया जाए।
6क – पैकेजिंग, और उसके उत्पादन व पुन:चक्रण की प्रक्रियाओं में हानिकारक रसायनों का उपयोग
समाप्त होना चाहिए।
6ख – प्लास्टिक कारोबार के
समस्त क्षेत्रों में शामिल सारे लोगों के स्वास्थ्य, सुरक्षा
व अधिकारों का सम्मान ज़रूरी है, खास तौर से अनौपचारिक क्षेत्र
के कामगारों (कचरा बीनने वालों) के संदर्भ में।
राष्ट्र संघ संधि
दी बिज़नेस केस फॉर दी यूएन ट्रीटी ऑन प्लास्टिक पोल्यूशन (प्लास्टिक प्रदूषण पर राष्ट्र संघ संधि के लिए कारोबार का पक्ष) विश्व
प्रकृति निधि (डब्लू.डब्लू.एफ.), एलन मैककार्थर फाउंडेशन तथा
बोस्टन कंसÏल्टग ग्रुप द्वारा प्रस्तुत एक
रिपोर्ट है। इन संस्थाओं का प्रयास है कि प्लास्टिक प्रदूषण पर एक नई राष्ट्र संघ
संधि विकसित हो।
इस रिपोर्ट के आधार पर प्रमुख कंपनियों ने 13 अक्टूबर 2020 को आव्हान किया था
कि प्लास्टिक प्रदूषण पर एक राष्ट्र संघ संधि तैयार की जाए ताकि नियमन के टुकड़ा-टुकड़ा
ढांचे की समस्या को संबोधित किया जा सके और वर्तमान स्वैच्छिक प्रयासों को
व्यवस्थित रूप दिया जा सके।
इस तरह की संधि पर बातचीत शुरू करने के लिए एक प्रस्ताव राष्ट्र संघ पर्यावरण
सभा के पांचवे सत्र में फरवरी 2021 में पेश हुआ था। इसमें सभा ने प्लास्टिक प्रदूषण
को एक समस्या के रूप में मान्यता दी और 2017 में राष्ट्र संघ पर्यावरण सभा द्वारा
निर्धारित छानबीन के उपरांत यह स्वीकार किया कि प्लास्टिक प्रदूषण सम्बंधी वर्तमान
कानूनी प्रावधान अपर्याप्त हैं।
क्या यह सफल होगा?
ऐसी किसी योजना की सफलता की संभावना कुछ वर्षों पूर्व नगण्य ही होती। अलबत्ता, हाल ही में जैविक विकल्पों में हुई तरक्की ने एक ऐसी अंतर्राष्ट्रीय संधि के
लिए पृष्ठभूमि तैयार कर दी है जो व्यावसायिक नवाचारों को बढ़ावा दे।
कोका कोला इस मामले में नवीन टेक्नॉलॉजी को अपनाने में आगे आया है और उसने
2009 में अमरीका के कुछ प्रांतों में ‘प्लांटबॉटल’ (‘PlantBottel’) लॉन्च की है।
इसके अलावा,
पेट्रोकेमिकल पुन:चक्रण की अगली पीढ़ी की टेक्नॉलॉजी के
विकास ने यह संभावना पैदा कर दी है कि फोम, पोलीस्टायरीन, पोलीथीन जैसे मुश्किल से पुन:चक्रित प्लास्टिक्स और मिश्रित कचरे का पुन:चक्रण
किया जा सके।
यूएस के नीति निर्माताओं ने इस क्षेत्र में आर्थिक विकास की संभावना को पहचाना
है। हाल ही में यूएस के ऊर्जा विभाग ने डेलावेयर विश्वविद्यालय को उसके नए सेंटर
फॉर प्लास्टिक इनोवेशन के लिए 1.16 करोड़ डॉलर का वित्तीय समर्थन दिया है। ऐसा माना
जा रहा है कि यह अनुसंधान एकबार-उपयोग वाले प्लास्टिक पैकेजिंग के क्षेत्र में और
अन्य क्षेत्रों में भी 100 फीसदी पुन:चक्रण योग्य उत्पाद बनाने के प्रयासों में
मददगार होगा। एडिडास द्वारा 100 प्रतिशत पुन:चक्रण योग्य जूतों का विकास इसी का एक
उदाहरण है।
सन 2020 में यूएस के ऊर्जा विभाग ने 12 नए प्रोजेक्ट्स के लिए 2.7 करोड़ डॉलर
की सहायता का वचन दिया है। इनमें जैविक उत्पादों के विकास के प्रोजेक्ट्स शामिल
हैं।
इसके अलावा,
यूएस में कुछ एकबारी उपयोग वाले प्लास्टिक पैकेजिंग
उपयोगकर्ता अब प्लास्टिक संसाधनों के विकास के लिए अपने आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर
नहीं हैं। वे स्वयं ऐसे अनुसंधान को वित्तीय सहायता दे रहे हैं जो ज़्यादा टिकाऊ
उत्पाद व कच्चा माल तैयार करने में मददगार हो। इसका एक उदाहरण लोरियाल है जिसने
पीईटी बोतलों के विकास के लिए फ्रांसीसी जैव-औद्योगिक अनुसंधान कंपनी कार्बिओस के
साथ आणविक-स्तर की पुन:चक्रण टेक्नॉलॉजी पर काम शुरू किया है।
बिज़नेस की दृष्टि
यूएस की कंपनियों के उपरोक्त प्रयासों के अलावा, हाई-टेक
पुन:चक्रण के क्षेत्र नवीन आर्थिक गतिविधियों का एक संकेत पेनसिल्वेनिया की
प्रांतीय सीनेट में पारित एक विधेयक से भी मिलता है। इस विधेयक के तहत पुन:चक्रण
को एक अलग क्षेत्र मानने की बजाय निर्माण उद्योग का ही अंग माना जाएगा। इस कदम से
पता चलता है कि पारंपरिक कचरे-से-ऊर्जा की दहन टेक्नॉलॉजी और आधुनिक पायरोलिसिस
टेक्नॉलॉजी में कितना अंतर है।
दहन के विपरीत पायरोलिसिस एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें प्लास्टिक को पिघलाकर
पुन: उपयोग के काबिल कच्चे माल में परिवर्तित किया जाता है और इसमें गैसों का
उत्सर्जन भी बहुत कम होता है। पायरोलिसिस का इस्तेमाल प्लास्टिक से तरल र्इंधन
प्राप्त करने में भी किया जा सकता है। अलबत्ता, इस
प्रक्रिया के लिए जो ऊर्जा लगती है, उसके लिए पर्यावरण-अनुकूल
मार्ग खोजने की ज़रूरत है और पेनसिल्वेनिया में यही कोशिश चल रही है। सौर ऊर्जा के
उपयोग पर काम चल रहा है।
पेनसिल्वेनिया में चल रहे प्लास्टिक पुन:चक्रण के अगली पीढ़ी के इन प्रयासों की
खास बात यह है कि इनमें सरकार एक भागीदार है और यह ऊर्जा विभाग की एक वर्तमान
योजना का हिस्सा है। यह एक और उदाहरण है कि प्लास्टिक पुन:चक्रण की उपलब्ध
टेक्नॉलॉजी को व्यवहार में उतारने की ज़रूरत है।
उपभोक्ता की दृष्टि
प्लास्टिक में कमी लाने के सारे प्रयासों के लिए सबसे महत्वपूर्ण घटक
उपभोक्ताओं का समर्थन है और इसका अभाव भी सबसे ज़्यादा है। निजी आदतों को बदलना
मुश्किल होता है और दुनिया के कई हिस्सों में पुन:चक्रण के क्षेत्र में धीमी
प्रगति इसका प्रमाण है। भारत में भी यदि हम अपने घरों के बाहर नज़र डालें तो देख
सकते हैं कि हममें से कितने लोग कचरे का पृथक्करण करते हैं और उसे कचरा गाड़ियों
में सही जगह पर डालते हैं। लेकिन एकल-उपयोग प्लास्टिक की बजाय पुन:उपयोगी पैकेजिंग
के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए उपभोक्ताओं की भागीदारी ज़रूरी है और इस बात के
प्रमाण मिल रहे हैं कि प्लास्टिक प्रदूषण की रोकथाम की जागरूकता बढ़ रही है। विश्व
प्रकृति निधि व अन्य संस्थाओं के प्रयासों से प्लास्टिक प्रदूषण का संकट मुख्यधारा
के विमर्श का हिस्सा बन गया है।
बिज़नेस केस फॉर ए यूएन ट्रीटी में कहा गया है, “दुनिया भर में प्लास्टिक प्रदूषण को नंबर तीन का पर्यावरणीय संकट माना गया
है।” रिपोर्ट में 2017 को एक निर्णायक मोड़ का बिंदु भी कहा गया है। यूएस में एक
अध्ययन में पाया गया कि “प्लास्टिक को उपभोक्ता वस्तुओं में सबसे नकारात्मक पदार्थ
माना जाता है। और अध्ययन में शामिल किए गए 65 प्रतिशत उपभोक्ताओं ने माना था इसका
सम्बंध समुद्री प्रदूषण से है और 75 प्रतिशत ने इसे पर्यावरण के लिए हानिकारक माना
था।”
भारत में क्रियांवयन
पूर्व के अध्ययनों के लिए उदाहरण यूएस से लिए गए थे क्योंकि वहां प्लास्टिक की
एक चक्राकार अर्थ व्यवस्था सम्बंधी छिटपुट प्रयास शुरू हो चुके हैं। अब भारत पर एक
नज़र डालते हैं। कुछ मायनों में भारत एक अनूठा देश है। इसलिए यहां ऐसी चक्राकार
अर्थ व्यवस्था के विकास के समक्ष कुछ विशिष्ट चुनौतियां उपस्थित होंगी। उदाहरण के
लिए,
सड़कों-गलियों में कचरा फेंकना हमारे यहां बहुत बुरी बात
नहीं माना जाता। इसलिए इस बात पर अमल करना थोड़ा मुश्किल होगा कि कोई प्लास्टिक
पर्यावरण में न पहुंचे।
चक्राकार प्लास्टिक अर्थ व्यवस्था के लिए जो भी कारोबारी मॉडल अपनाया जाए, वह सरकार व बिज़नेस दोनों के लिए लाभदायक होना चाहिए। बिज़नेस को अपने उत्पादन
के तौर-तरीकों में बदलाव करने होंगे ताकि प्लास्टिक कचरे को कम करने के नए तरीकों
का समावेश किया जा सके। आम तौर पर सरकार के पास ऐसा कोई कदम उठाने का प्रलोभन नहीं
होता जिससे वोट का सम्बंध न हो। देश में शिक्षा की अल्प अवस्था को देखते हुए शायद
अधिकांश लोगों ने नई प्लास्टिक अर्थ व्यवस्था के बारे में सुना तक न होगा। यदि इस
नए मॉडल को लागू करने से उद्योगों का मुनाफा कम होता है, तो वे
शायद ऐसी नवीन चक्राकार प्लास्टिक अर्थ व्यवस्था के विरुद्ध मुहिम शुरू कर दें। और
आम लोगों को ऐसे मॉडल को अपनाने के लिए प्रेरित करने के कोई तरीके भी नहीं हैं।
लोगों को पुन:चक्रण के लिए तैयार करने के लिए कुछ तो नगद प्रलोभन देना होगा। लेकिन
प्राय: देखा गया है कि ऐसे प्रलोभन गलत व्यवहार को बढ़ावा देने लगते हैं।
निष्कर्ष
यह सही है कि नई प्लास्टिक अर्थ व्यवस्था के लिए राष्ट्र संघ संधि सही दिशा
में एक कदम है,
लेकिन किसी इकलौते मॉडल को सब जगह लागू करना मुश्किल है
क्योंकि हर देश की अपनी विशिष्ट चुनौतियां हैं। अभी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा
सकता कि जहां अन्य मॉडल्स नाकाम रहे हैं, वहां यह नया मॉडल किस हद
तक सफल होगा। ज़रूरत यह है कि मात्र पुन:चक्रण, कंपोस्टिग
और पुन:उपयोग से आगे बढ़कर कोई ऐसी चीज़ आज़माई जाए जो बदलाव पैदा कर दे।
एक नज़रिया तो यह है कि भरपूर उपयोग करके फिर कचरे को ठिकाने लगाने के बारे में सोचने की बजाय गैर-ज़रूरी उपयोग को कम किया जाए। अधिक उपभोग ही प्लास्टिक कचरे के पर्यावरण में जमा होने का प्रमुख कारण है। शायद चक्राकार अर्थ व्यवस्था में इस बात पर काफी ध्यान दिया जाना चाहिए कि हम मात्र ज़रूरी कार्यों में प्लास्टिक का उपयोग करें और जहां संभव हो वहां पुन:उपयोग करें। बहरहाल, नवीन प्लास्टिक अर्थ व्यवस्था एक अनोखा मॉडल है जो रोचक है और इस बात को लेकर एक ताज़ातरीन नज़रिया देता है कि हम कचरे के साथ कैसे व्यवहार करते हैं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.ellenmacarthurfoundation.org/assets/images/_bigImage/NPEC-vision-EMFlogo.png
गत 6 मार्च को एक 340 मीटर चौड़ा क्षुद्रग्रह एपोफिस पृथ्वी
के निकट से सुरक्षित निकल गया। अगली बार 2029 में यह पृथ्वी से मात्र 40,000
किलोमीटर दूर से गुज़रेगा। यह उस क्षेत्र के ठीक ऊपर से गुज़रेगा जहां उच्च-कक्षा
वाले उपग्रह चक्कर लगाते हैं। पहली बार खगोलविद इतने बड़े क्षुद्रग्रह को पृथ्वी के
पास से गुज़रते हुए देखेंगे। इस घटना ने वैज्ञानिकों को ग्रह रक्षा प्रणाली का आकलन
करने का मौका दिया है। इसके अंतर्गत खगोलविद क्षुद्रग्रहों के मार्ग का आकलन करते
हुए पृथ्वी से टकराने की संभावना का पता लगाते हैं। एरिज़ोना विश्वविद्यालय के
प्लेनेटरी वैज्ञानिक विष्णु रेड्डी ने इस अवलोकन अभियान का समन्वय किया है। एपोफिस
ने इस बात को रेखांकित किया है कि खगोलविद नज़दीक से गुज़रने वाले क्षुद्रग्रहों के
बारे में कितना कुछ जानते हैं और क्या जानना बाकी है।
नासा द्वारा 1998 में क्षुद्रग्रह की खोज की व्यवस्थित शुरुआत से लेकर अब तक
वैज्ञानिकों ने 25,000 से अधिक नज़दीकी क्षुद्रग्रहों का पता लगाया है। वर्ष 2020
में क्षुद्रग्रह देखने की रिकॉर्ड घटनाएं दर्ज की गई हैं। कोविड-19 महामारी के
दौरान कई सर्वेक्षण कार्यक्रम बाधित होने के बाद भी खगोलविदों ने 2020 में अब तक
अज्ञात 2958 क्षुद्रग्रह सूचीबद्ध किए हैं।
इनमें से बड़ी संख्या का पता एरिज़ोना स्थित तीन दूरबीनों की मदद से कैटलिना
हवाई सर्वे द्वारा लगाया गया है। हालांकि पिछले वर्ष वसंत के मौसम में महामारी और
जून में जंगलों की आग के कारण कुछ समय के लिए संचालन बंद होने के बाद भी पृथ्वी के
निकट 1548 पिंडों का पता लगाया गया। इसमें 2020 सीडी3 नामक एक दुर्लभ क्षुद्रग्रह
भी देखा गया। यह ‘मिनीचंद्रमा’ लगभग तीन मीटर व्यास वाला एक छोटा क्षुद्रग्रह है।
यह पास से गुज़रते हुए अस्थायी रूप से पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण की गिरफ्त में आ गया
था। फिर पिछले वर्ष अप्रैल में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण को भेदकर बाहर निकल गया।
इसके अलावा,
पिछले वर्ष हवाई स्थित Pan-STARS सर्वे टेलिस्कोप द्वारा 1152
क्षुद्रग्रहों का पता लगाया गया। इस खोज में 2020 एसओ नामक पिंड भी शामिल है जिसे
गलती से क्षुद्रग्रह मान लिया गया था। यह वास्तव में 1966 में नासा के चंद्रमा
मिशन के रॉकेट बूस्टर का शेष भाग था जो तभी से अंतरिक्ष में चक्कर काट रहा था।
गौरतलब है कि पिछले वर्ष खोजे गए क्षुद्रग्रहों में से लगभग 107 ऐसे थे जो
चंद्रमा से भी कम दूरी से गुज़रे हैं। इनमें से एक छोटा क्षुद्रग्रह, 2020 क्यूजी,
अगस्त में हिंद महासागर से लगभग 2950 किलोमीटर ऊपर से गुज़रा
था। इसने सबसे नज़दीक से गुज़रने का रिकॉर्ड बनाया था। लेकिन इसके तीन महीने बाद ही
2020 वीटी4 नामक एक छोटा क्षुद्रग्रह 400 किलोमीटर से भी कम दूरी से गुज़रा। हैरानी
की बात है कि गुज़र जाने के बाद 15 घंटे तक इसे देखा नहीं गया।
इन सभी खोजों से खगोलविद सौर मंडल की कैरम-नुमा प्रवृत्ति के प्रति अधिक जागरूक हो गए हैं। रेड्डी के अनुसार एपोफिस के हालिया अवलोकन इस बात के संकेत देते हैं कि कैसे विश्व भर के खगोलविद एक साथ काम करते हुए क्षुद्रग्रह से होने वाले खतरों का आकलन कर सकते हैं। ऐसी उम्मीद है कि आठ वर्ष बाद जब एपोफिस लौटकर आएगा तब तक वैज्ञानिकों के पास खतरनाक क्षुद्रग्रहों के बारे में अधिक विस्तृत जानकारी होगी। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.pennlive.com/resizer/v54AXPKd7c4CP7tmtLReoWGaBi8=/1280×0/smart/cloudfront-us-east-1.images.arcpublishing.com/advancelocal/PPO3UTSKK5FLRO5KILR33MYYQY.jpg
पृथ्वी के समुद्रों का स्तर तापमान के अनुसार हमेशा घटता-बढ़ता
रहा है लेकिन इसकी सतह पर पानी की कुल मात्रा हमेशा से ही स्थिर मानी जाती रही है।
लेकिन हालिया साक्ष्यों से पता चला है कि लगभग 3 से 4 अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी के
समुद्रों में आज की तुलना में दोगुना पानी था। यानी पृथ्वी पर इतना पानी था कि
सारे महाद्वीप माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई तक जलमग्न हो जाएं। इस व्यापक बाढ़ ने
टेक्टोनिक प्लेट्स की गतिविधि को बढ़ा दिया होगा जिससे ज़मीन पर जीवन की शुरुआत अधिक
मुश्किल हो गई होगी।
ऐसा माना जाता है कि भूपर्पटी के नीचे मेंटल की चट्टानों में एक ऐसा क्षेत्र
है जिसमें काफी मात्रा में पानी है। यह पानी तरल रूप में नहीं है बल्कि खनिजों में
पाया जाता है। लेकिन पृथ्वी के इतिहास की शुरुआत में रेडियोधर्मिता के कारण मेंटल
आज की तुलना में चार गुना अधिक गर्म था। हाइड्रोलिक प्रेस की मदद से किए गए हालिया
अध्ययन से पता चला है कि इतने अधिक तापमान और दबाव पर कई खनिज इतनी मात्रा में
हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को जमा रखने में सक्षम नहीं रहे होंगे। एजीयू एडवांसेज़
में प्रकाशित हारवर्ड युनिवर्सिटी के मिनरल फिज़िक्स के छात्र जुंजी डोंग के शोध
पत्र के अनुसार काफी संभावना है कि यह पानी सतह पर रहा होगा।
मेंटल की गहराई में पाए जाने वाले दो खनिजों, वाडस्लेआइट
और रिंगवुडाइट,
में काफी मात्रा में पानी भंडारित पाया गया है। इन खनिजों
से बनी चट्टानें ग्रह के कुल द्रव्यमान का 7 प्रतिशत हैं। हालांकि इनमें पानी का
वज़न केवल 2 प्रतिशत है, लेकिन नार्थवेस्टर्न युनिवर्सिटी के
प्रायोगिक खनिज विज्ञानी स्टीवन जैकबसेन के अनुसार बूंद-बूंद से घट भरे की तर्ज़ पर
यह 2 प्रतिशत भी काफी है।
जैकबसेन और उनके साथियों ने चट्टानों के चूरे पर उच्च दबाव और तापमान आरोपित
करके इन खनिजों का निर्माण किया। डोंग की टीम ने विभिन्न प्रयोगों से प्राप्त
आंकड़ों के आधार पर बताया कि वाडस्लेआइट और रिंगवुडाइट उच्च तापमान पर काफी कम
मात्रा में पानी सहेज पाते हैं। जैसे-जैसे मेंटल ठंडा होता गया, ये खनिज प्रचुर मात्रा में पाए जाने लगे जिससे पृथ्वी की आयु बढ़ने के साथ-साथ
उनकी पानी सोखने की क्षमता भी बढ़ती रही।
इसके अलावा कुछ अन्य साक्ष्य भी हैं जो पृथ्वी के जल-प्लावित होने के संकेत
देते हैं। पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के 4 अरब वर्ष पुराने ज़िरकॉन क्रिस्टल में
टाइटेनियम सांद्रता से पता चलता है कि ये पानी में निर्मित हुए हैं। इसके अलावा, ऑस्ट्रेलिया और ग्रीनलैंड में पाई गई पृथ्वी की सबसे पुरानी (3 अरब वर्ष
पुरानी) बैसाल्ट,
बलबस चट्टानें तभी बनती हैं जब मैग्मा पानी के संपर्क में
आकर ठंडा होता है।
युनिवर्सिटी ऑफ कोलेरेडो के जिओबायोलॉजिस्ट जॉनसन और बोसवेल विंग ने इस विषय
में अधिक प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। ऑस्ट्रेलिया से पाए गए 3.2 अरब साल पुरानी
महासागरीय पर्पटी के नमूनों में भारी ऑक्सीजन आइसोटोप की मात्रा वर्तमान महासागरों
की तुलना में काफी अधिक पाई गई। जब बारिश का पानी महाद्वीपीय पर्पटी के साथ
प्रतिक्रिया करके कीचड़ में परिवर्तित होता है तब भारी ऑक्सीजन मुक्त होती है।
प्राचीन महासागरों में इसकी प्रचुरता से पता चलता है कि तब शायद ही महाद्वीप उभरे
होंगे। इन परिणामों से यह तो पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि महासागर विशाल थे
लेकिन बड़े सागरों में जलमग्न महाद्वीप होना आसान है।
हालांकि विशाल महासागरों से महाद्वीपों का उभर पाना मुश्किल रहा होगा लेकिन
इससे इस बात की व्याख्या हो जाती है कि क्यों महाद्वीप काफी पहले से चलायमान हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार विशाल महासागरों के कारण दरारों में जल के घुसने से
पर्पटी कमज़ोर पड़ गई और टेक्टोनिक प्लेट्स गतिशील होने लगीं। इस प्रक्रिया से धसान
क्षेत्रों का निर्माण हुआ जिसमें एक चट्टानी परत दूसरे के नीचे फिसलती गई होगी। जब
एक बार चट्टान धंसना शुरू हुई तो मज़बूत मेंटल ने चट्टान को झुकाए रखा होगा, जिससे चट्टान का धंसना जारी रहा।
विशाल महासागरों के साक्ष्य इस बात को चुनौती देते हैं कि पृथ्वी पर जीवन की
शुरुआत कैसे हुई। कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि इसकी शुरुआत महासागरों में मौजूद
पोषक तत्वों से समृद्ध हाइड्रोथर्मल वेंट के अंदर हुई जबकि कुछ मानते हैं कि
शुरुआत शुष्क भूमि पर उथले तालाबों में हुई जहां रसायनों की सांद्रता बढ़ जाती थी।
जलमग्न पृथ्वी का विचार इन दोनों परिकल्पनाओं पर सवाल खड़े कर देता है और कुछ
वैज्ञानिक एक तीसरे विकल्प पर विचार कर रहे हैं।
यह प्राचीन पानी इस बात की भी याद दिलाता है कि पृथ्वी का विकास कितना परिस्थितियों के अधीन है। जन्म के समय पृथ्वी सूखी थी जब तक कि पानी से लबालब क्षुद्रग्रह इससे टकराए नहीं। यदि इन क्षुद्रग्रहों ने आज की तुलना में दोगुना पानी जमा कर दिया होता या फिर मेंटल में कम पानी सोखने की क्षमता होती तो ग्रह के जीवन और जलवायु के लिए आवश्यक महाद्वीप कभी उभरे ही नहीं होते। बहुत अधिक जल या बहुत कम जल, दोनों ही से काम बन पाना संभव नहीं था। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://earthsky.org/upl/2021/03/ancient-earth-water-world-e1615904017511.jpg