मौजूदा डिजिटल स्टोरेज डिवाइसेस में कई टेराबाइट
डैटा सहेजा जा सकता है। किंतु नई टेक्नॉलॉजी आने पर ये तकनीकें पुरानी पड़ जाती हैं
और इनसे डैटा पढ़ना मुश्किल हो जाता है, जैसा कि मैग्नेटिक टेप और
फ्लॉपी डिस्क के साथ हो चुका है। अब, वैज्ञानिक जीवित सूक्ष्मजीव
के डीएनए में इलेक्ट्रॉनिक रूप से डैटा लिखने की कोशिश में हैं।
डैटा सहेजने के लिए डीएनए कई कारणों से आकर्षित करता है। पहला
तो यह कि डीएनए हमारी सबसे कॉम्पैक्ट हार्ड ड्राइव से भी हज़ार गुना ज़्यादा सघन है; नमक के एक दाने के बराबर टुकड़े में यह 10 डिजिटल फिल्में सहेज सकता है। दूसरा, चूंकि डीएनए जीव विज्ञान का केंद्र बिंदु है इसलिए उम्मीद है कि डीएनए को पढ़ने-लिखने
की तकनीक समय के साथ सस्ती और अधिक बेहतर हो जाएंगी।
वैसे डीएनए में डैटा सहेजना कोई बहुत नया विचार नहीं है। शुरुआत
में शोधकर्ता डीएनए में डैटा सहेजने के लिए डिजिटल डैटा (0 और 1) को चार क्षार – एडेनिन, गुआनिन,
साइटोसीन और थायमीन – के संयोजनों के रूप में परिवर्तित करते
थे। डीएनए संश्लेषक की मदद से यह परिवर्तित डैटा डीएनए में लिखा जाता था। यदि कोड बहुत
लंबा हो तो डीएनए सिंथेसिस की सटीकता पर फर्क पड़ता है, इसलिए डैटा
को छोटे-छोटे हिस्सों (200 से 300 क्षार लंबे डैटा खंड) में तोड़कर डीएनए में लिखा जाता
है। प्रत्येक डैटा खंड को एक इंडेक्स नंबर दिया जाता है, जो अणु
में उसका स्थान दर्शाता है। डीएनए सीक्वेंसर की मदद से डैटा पढ़ा जाता है। लेकिन यह
तकनीक बहुत महंगी है; एक मेगाबिट डैटा लिखने में लगभग ढाई लाख रुपए
लगते हैं। और डीएनए जिस पात्र में सहेजा जाता है वह समय के साथ खराब हो सकता है।
इसलिए टिकाऊ और आसानी से लिखे जाने वाले विकल्प के रूप में पिछले
कुछ समय से शोधकर्ता सजीवों के डीएनए में डैटा सहेजने पर काम कर रहे हैं। कोलंबिया
विश्वविद्यालय के तंत्र जीव विज्ञानी हैरिस वांग ने जब ई.कोली बैक्टीरिया की
कोशिकाओं में फ्रुक्टोज़ जोड़ा तो उसके डीएनए के कुछ हिस्सों की अभिव्यक्ति में वृद्धि
हुई।
फिर, क्रिस्पर की मदद से अधिक अभिव्यक्त
होने वाले खंड को कई भागो में काट दिया और इनमें से कुछ को बैक्टीरिया के डीएनए के
उस विशिष्ट हिस्से में जोड़ा जो पूर्व में हुए वायरस के हमलों को ‘याद’ रखता है। इस
तरह जोड़ी गई जेनेटिक बिट डिजिटल 1 दर्शाती है। फ्रुक्टोज़ संकेत की अनुपस्थिति में डीएनए
कोई रैंडम बिट सहेजता है जो डिजिटल 0 दर्शाती है। ई. कोली के डीएनए को अनुक्रमित
कर डैटा पढ़ा जा सकता है।
लेकिन इस व्यवस्था में भी सीमित डैटा ही सहेजा जा सकता है इसलिए
वांग की टीम ने फ्रुक्टोज़ की जगह इलेक्ट्रॉनिक संकेतों का उपयोग किया। उन्होंने ई.
कोली बैक्टीरिया में कुछ जीन जोड़े जो विद्युत संकेत दिए जाने पर डीएनए की अभिव्यक्ति
में वृद्धि करते हैं। अभिव्यक्ति में वृद्धि बैक्टीरिया के डीएनए में 1 सहेजती है।
डीएनए को अनुक्रमित कर 0-1 के रूप में लिखा डैटा पढ़ा जा सकता है। नेचर केमिकल बायोलॉजी
में शोधकर्ता बताते हैं कि इस तकनीक की मदद से उन्होंने 72 बिट लंबा संदेश ‘हैलो वर्ल्ड!’
लिखा है। संदेशयुक्त ई. कोली को मिट्टी में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीवों के साथ भी जोड़कर
उनमें डैटा सहेजा जा सकता है।
बैक्टीरिया में उत्परिवर्तन से डैटा में बदलाव या उसकी हानि हो सकती है, जिस पर काम करने की आवश्यकता है। बहरहाल यह तकनीक जासूसी फिल्मों-कहानियों को जानकारी छुपाने के एक और खुफिया तरीके का विचार तो देती ही है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_image_-1280w__no_aspect/public/Ecoli_1280p_0.jpg?itok=D544o9Ku
जल्द ही वैज्ञानिक दांतों में जमा टार्टर का विश्लेषण कर बता
सकेंगे कि प्राचीन लोग किन (मादक) पदार्थों का सेवन किया करते थे। नई विकसित विधि से
उन्नीसवीं सदी के कंकाल पर किए गए परीक्षण में शोधकर्ताओं को ड्रग्स के अवशेष मिले
हैं। इसके अलावा हाल ही में मृत 10 शवों पर मानक रक्त परीक्षण विधि से किए गए ड्रग
परीक्षण की तुलना में नई विधि से अधिक ड्रग्स की उपस्थिति का पता चला है।
अब तक,
खुदाई में प्राप्त धूम्रपान या मद्यपान के पात्रों में जमा अवशेषों
के आधार पर प्राचीन मनुष्यों की औषधियों और मादक पदार्थों के सेवन की आदतों के बारे
में पता किया जाता था। लेकिन इस तरह के विश्लेषण में अक्सर उन ड्रग्स का पता नहीं चलता
जिनके सेवन के लिए पात्रों की ज़रूरत नहीं पड़ती जैसे भ्रांतिजनक मशरूम। इसके अलावा पात्रों
के विश्लेषण से यह भी पता नहीं चलता कि सेवन किसने किया था।
लीडेन युनिवर्सिटी के पुरातत्वविद ब्योर्न पियरे बार्थहोल्डी का अनुमान था कि उन्नीसवीं
सदी में,
जब डॉक्टर नहीं थे, ग्रामीण
अपनी बीमारियों और दर्द का इलाज स्वयं ही करते होंगे। इसकी पुष्टि के लिए उन्होंने
कंकालों के दांतों पर जमा कठोर परत से प्राचीन लोगों के आहार की पड़ताल करने वाली एक
तकनीक का सहारा लिया। दांतों पर जमा इस कठोर परत को टार्टर कहते हैं। टार्टर में खाते-पीते
वक्त भोजन,
पेय या अन्य पदार्थ के कुछ कण फंस जाते हैं, जो जीवाश्मो में लगभग 10 लाख सालों तक बने रह सकते हैं।
लेकिन अफीम,
भांग और अन्य औषधियों के फंसे हुए अवशेषों के बारे में पता करने
की कोई मानक विधि नहीं थी। इसलिए शोधकर्ताओं ने ऑरहस युनिवर्सिटी के फॉरेंसिक डेंटिस्ट
डॉर्थे बाइंडस्लेव की मदद से जीवित या हाल ही में मृत लोगों के रक्त या बालों के नमूनों
में ड्रग्स की उपस्थिति का पता लगाने की मानक विधि में बदलाव कर कंकालों में ड्रग्स
की उपस्थिति पता लगाने की एक नई विधि विकसित की।
शोधकर्ताओं ने टार्टर का मुख्य खनिज हाइड्रॉक्सीएपैटाइट लिया और उसमें कैफीन, निकोटीन और कैनबिडिओल जैसे वैध ड्रग्स नपी-तुली मात्रा मिलाए और ऑक्सीकोडोन, कोकीन और हेरोइन जैसे कुछ प्रतिबंधित ड्रग्स मिलाए। फिर इन नमूनों की उन्होंने
मास स्पेक्ट्रोमेटी की। इस तरह मिश्रण में उन्हें 67 ड्रग्स और ड्रग के पाचन से बने
पदार्थ मिले। मास स्पेक्ट्रोमेट्री में पदार्थ के आवेश और भार के अनुपात के आधार पर
विभिन्न रसायनों का पता लगाया जाता है।
इसके बाद उन्होंने हाल ही में मृत 10 शवों में नई परीक्षण विधि से ड्रग्स की उपस्थिति
जांची और इन परिणामों की तुलना रक्त आधारित मानक ड्रग परीक्षण के नतीजों से की। फॉरेंसिक
साइंस इंटरनेशनल में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार नई विधि से इन शवों में हेरोइन, हेरोइन मेटाबोलाइट और कोकीन सहित 44 ड्रग्स और मेटाबोलाइट्स मिले, जो मानक रक्त परीक्षण में मिले कुल ड्रग्स से थोड़े अधिक थे।
अब तक परीक्षणों में रक्त से ड्रग्स गायब हो जाने के बाद बालों के नमूनों से ड्रग्स के सेवन या उपस्थिति के बारे में पता किया जाता था। चूंकि टार्टर ड्रग्स सेवन का लंबे समय तक रिकॉर्ड रख सकता है इसलिए अब बालों की जगह टार्टर का उपयोग ड्रग्स की उपस्थिति पता करने के लिए किया जा सकता है। इससे ड्रग्स उपयोग के इतिहास को दोबारा लिखने में मदद मिल सकती है। लेकिन कुछ शोधकर्ताओं का कहना है कि नई विधि अच्छी तो है और इसमें रेत के एक कण से भी छोटे नमूने से काम चल जाता है, लेकिन इसके लिए एक अत्यधिक संवेदनशील मास स्पेक्ट्रोमीटर की ज़रूरत पड़ती है जो सामान्य प्रयोगशालाओं में उपलब्ध नहीं होते। इसके अलावा इस विधि से परीक्षण के बाद नमूने नष्ट हो जाते हैं। कुछ रसायन टार्टर के भीतर भी समय के साथ विघटित हो जाते हैं। इसके अलावा, इस विधि में वे पौधे भी छूट गए हैं जो किसी समय में प्राचीन लोगों द्वारा मादक, उत्तेजक और औषधियों के रूप में उपयोग किए जाते थे, लेकिन आधुनिक समय में उपयोग नहीं किए जाते या इनके बारे में मालूम नहीं है। लेकिन इस काम के आधार पर हम तकनीक को और अच्छी तरह विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_large/public/Calculus%20Deposits-1280×720.jpg?itok=lnW6HMWK
वर्ष 2020 में महामारी के कारण लॉकडाउन से ग्रीनहाउस गैसों के
उत्सर्जन में कमी की संभावना जताई गई थी। लेकिन हाल ही में नासा, यूके मौसम विभाग और अन्य संस्थानों की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार पृथ्वी का तापमान
पूर्व-औद्योगिक काल की तुलना में लगभग 1.25 डिग्री सेल्सियस अधिक है।
विभिन्न स्रोतों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर 2020 का औसत वैश्विक सतही तापमान
वर्ष 2016 के बराबर है। गौरतलब है कि वर्ष 2016 में एल-नीनो प्रभाव के कारण तापमान
में वृद्धि हुई थी। एल-नीनो प्रभाव पूर्वी प्रशांत महासागर में गहरे ठंडे पानी के प्रभाव
को रोक देता है जिससे वैश्विक तापमान में वृद्धि होती है। दूसरी ओर, पिछले वर्ष प्रशांत महासागर में ला-नीना के कारण शीतलन हुआ था लेकिन आश्चर्य की
बात है कि इसके बावजूद औसत वैश्विक तापमान बढ़ा।
गत 6 वर्ष पिछले कई सालों में सबसे गर्म रहे हैं लेकिन वायुमंडल का गर्म होना अनियमित
रहा है क्योंकि इसकी प्रकृति अव्यवस्थित है। देखा जाए तो महासागरों के गर्म होने का
रुझान ज़्यादा नियमित रहा है, जो वैश्विक तापमान की 90 प्रतिशत
से अधिक गर्मी को अवशोषित करते हैं। इस मामले में भी 2020 एक रिकॉर्ड वर्ष साबित हुआ।
एडवांसेज़ इन एटमॉस्फेरिक साइंस में वैज्ञानिकों ने बताया है कि महासागरों की ऊपरी सतह
में 2019 की अपेक्षा 2020 में 20 ज़ीटाजूल्स (1021 जूल्स) अधिक ऊष्मा थी।
यह औसत वार्षिक वृद्धि से दोगुनी थी। चाइनीज़ एकेडमी ऑफ साइंस के जलवायु वैज्ञानिक लीजिंग
चेंग के अनुसार उपोष्णकटिबंधीय अटलांटिक महासागर विशेष रूप से गर्म रहा जिसके चलते
काफी अधिक तूफान आए।
ऊष्मा का मापन 4000 रोबोट की सहायता से महासागरों में 2000 मीटर की गहराई तक किया
गया। इससे पता चला कि गर्मी समुद्रों की गहराई तक पहुंच रही है और ध्रुवों तक फैल रही
है। उत्तरी प्रशांत में अत्यधिक ग्रीष्म लहर से समुद्री जीवन काफी प्रभावित हुआ। पहली
बार अटलांटिक के गर्म पानी को आर्कटिक महासागर की ओर बढ़ते देखा गया जिसने बर्फ को रिकॉर्ड
निचले स्तर तक पिघलाया है। महासागरों के बढ़ते तापमान और बर्फ के पिघलने से समुद्र तल
में सालाना 4.8 मिलीमीटर की वृद्धि हो रही है और वृद्धि की दर बढ़ भी रही है।
भूमि पर तो हालत और खराब रही। बर्कले अर्थ द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार
2020 का तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर की तुलना में 1.96 डिग्री अधिक रहा। यह एशिया, युरोप और दक्षिण अमेरिका का अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा। रूस भी पिछले रिकॉर्ड
को तोड़ते हुए 1.2 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म रहा जबकि साइबेरिया का इलाका पूर्व-औद्योगिक
काल की तुलना में 7 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म रहा। इस बढ़े हुए तापमान के कारण व्यापक
स्तर पर आग और पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से इमारतों के गिरने और तेल रिसाव के मामले भी
सामने आए।
2020 की शुरुआत में ऑस्ट्रेलिया में भी रिकॉर्ड-तोड़ गर्मी और सूखे से व्यापक स्तर
पर आग के मामले सामने आए। इस आग से दक्षिण-पूर्वी ऑस्ट्रेलिया के लगभग एक-चौथाई जंगल
जल गए और 3000 घर तबाह हुए। इसी बीच अमेरिका में पहले से ही काफी गर्म दक्षिण पश्चिमी
भाग भी काफी तेज़ी से गर्म हुआ। एरिज़ोना राज्य स्थित फीनिक्स शहर में औसत 36 डिग्री
सेल्सियस तापमान दर्ज किया गया। यहां साल 2016 के बाद से गर्मी के कारण होने वाली मौतों
ने एक नया रिकॉर्ड बनाया है। एरिज़ोना स्टेट युनिवर्सिटी के जलवायु विज्ञानी डेविड होंडुला
के अनुसार वर्ष 2020 में गर्मी से 300 लोगों की मौत हुई जो पिछले वर्ष की तुलना में
50 प्रतिशत अधिक है।
हालांकि,
कोविड-19 जनित आर्थिक मंदी से कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन में
लगभग 7 प्रतिशत की कमी देखी गई लेकिन, हमारे वातावरण में बढ़ी हुई
कार्बन डाईऑक्साइड काफी समय से मौजूद है और पूर्व के उत्सर्जनों का भी काफी प्रभाव
मौजूद है। आने वाले समय में उत्सर्जन में कमी की संभावना काफी कम है। यूके मौसम विभाग
का अनुमान है कि मई में वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड का स्तर कई हफ्तों तक 417 पीपीएम
रहेगा जो पूर्व-औद्योगिक स्तर से 50 प्रतिशत अधिक है। जलवायु विज्ञानियों के अनुसार
उत्सर्जन में कमी लाने के लिए देशों को सख्त कदम उठाने होंगे।
यदि वैश्विक तापमान में वृद्धि इसी तरह से जारी रहती है तो इसे पेरिस जलवायु समझौते में निर्धारित लक्ष्यों (2035 और 2065 तक क्रमश: 1.5 डिग्री सेल्सियस और 2 डिग्री सेल्सियस वृद्धि) तक सीमित रखना काफी मुश्किल हो जाएगा। पिछले कई दशकों से तापमान में प्रति दशक 0.19 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि देखी गई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके तेज़ी से बढ़ने की आशंका है। सवाल यह है कि क्या हम इस पर काबू पा सकेंगे? (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_image_-1280w__no_aspect/public/ca_0122NID_Siberia_Wildfire_online.jpg?itok=y56X4-ub
व्हाट्सऐप फिलहाल भारी पलायन का सामना कर रहा है। निजता के प्रति
चिंतित उपयोगकर्ता तब से और चिंता में पड़ गए हैं जब से व्हाट्सऐप ने उपयोगकर्ताओं से
यह मांग की कि वे 8 फरवरी तक या तो उसकी नई निजता नीति को स्वीकार कर लें या व्हाट्सऐप
का उपयोग बंद कर दें। गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है कि व्हाट्सऐप ने अपनी जानकारी
को मूल कंपनी फेसबुक के साथ साझा करने के लिए अपनी निजता नीति में परिवर्तन किए हैं।
यह समझने के लिए कि चल क्या रहा है, हमें पीछे लौटकर फरवरी 2014 में
झांकना होगा जब फेसबुक ने व्हाट्सऐप को 22 अरब डॉलर में खरीदा था।
जब फेसबुक पहली बार व्हाट्सऐप का अधिग्रहण करने पर विचार कर रही थी, उस समय निजता सम्बंधी कार्यकर्ताओं ने इस बात को लेकर चिंता ज़ाहिर की थी कि इस
तरह के अधिग्रहण से व्हाट्सऐप और फेसबुक के बीच डैटा साझेदारी की संभावना बढ़ जाएगी।
इन चिंताओं को विराम देने के लिए व्हाट्सऐप के अधिकारियों ने यह वचन दिया था कि वे
कभी भी फेसबुक के साथ जानकारी साझा नहीं करेंगे। इस तरह के आश्वासन के बाद युरोपीय
आयोग,
संघीय व्यापार आयोग तथा अन्य नियामक संस्थाओं ने फेसबुक द्वारा
व्हाट्सऐप के अधिग्रहण को हरी झंडी दिखा दी थी।
अब हम पहुंचते हैं अगस्त 2016 में। व्हाट्सऐप ने घोषणा की कि वह अपनी कुछ जानकारी
फेसबुक के साथ साझा करेगा। इसमें उपयोगकर्ताओं के फोन नंबर तथा अंतिम गतिविधि से सम्बंधित
जानकारी शामिल थी। व्हाट्सऐप ने कहा था कि निजता नीति में इन परिवर्तनों के बाद फेसबुक
उपयोगकर्ताओं को सर्वोत्तम मित्र सम्बंधी सुझाव दे सकेगी और उनके लिए प्रासंगिक विज्ञापन
भी दिखा सकेगी। उपयोगकर्ताओं को इसे स्वीकार करने के लिए 30 दिन का समय दिया गया था
और यदि 30 दिनों में इसे अस्वीकार न करते तो उनके पास जानकारी की साझेदारी को मंज़ूर
करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। इसके अलावा, अगस्त
2016 के बाद जुड़ने वाले उपयोगकर्ताओं को तो कोई विकल्प ही नहीं दिया गया था – उन्हें
तो फेसबुक के साथ जानकारी साझा करने की बात को स्वीकार करना ही था।
जिन नियामकों ने निजता नीति को बरकरार रखने के व्हाट्सऐप के उपरोक्त आश्वासन के
बाद फेसबुक द्वारा अधिग्रहण को स्वीकृति दी थी, उन्हें
यह दोगलापन रास नहीं आया। 2017 में युरोपीय आयोग ने अधिग्रहण के समय भ्रामक जानकारी
देने के सम्बंध में फेसबुक पर 11 करोड़ यूरो का जुर्माना लगाया था। तब फेसबुक ने कहा
था कि उसके पास व्हाट्सऐप और फेसबुक के उपयोगकर्ताओं को आपस में जोड़ने की तकनीकी सामथ्र्य
ही नहीं है। 2016 से पहले भी जर्मनी तथा युनाइटेड किंगडम के डैटा सुरक्षा अधिकारियों
ने फेसबुक को निर्देश दिए थे कि वह व्हाट्सऐप के उपयोगकर्ताओं का डैटा संग्रह करना
बंद कर दे।
भारत में नीति परिवर्तन
भारत में व्हाट्सऐप के नीतिगत परिवर्तन एक पॉप-अप के रूप में सामने आए जिसमें उपयोगकर्ताओं
को सूचित किया गया था कि व्हाट्सऐप की निजता नीति बदल गई है और उन्हें 8 फरवरी तक इन
परिवर्तनों को स्वीकार करना होगा अथवा व्हाट्सऐप का उपयोग पूरी तरह बंद कर देना होगा।
हालांकि अधिकांश उपयोगकर्ताओं ने ‘एग्री’ यानी सहमति पर क्लिक कर दिया ताकि इस पॉप-अप
से छुटकारा मिले और वे संदेश भेजने का काम जारी रख सकें। अलबत्ता कुछ लोगों ने इस पॉप-अप
में निजता नीति में किए जा रहे परिवर्तनों पर ध्यान दिया और पाया कि ये परिवर्तन काफी
परेशान करने वाले हो सकते हैं क्योंकि ये उपयोगकर्ता की निजता को जोखिम में डाल सकते
हैं।
इस संदर्भ में एलोन मस्क ने ट्विटर पर लिखा कि लोगों को एक अन्य मेसेजिंग सॉफ्टवेयर
‘सिग्नल’ पर चले जाना चाहिए क्योंकि वह ज़्यादा सुरक्षित है और जानकारी इकट्ठी नहीं
करता। इस ट्वीट के बाद दुनिया भर में लोग व्हाट्सऐप को छोड़कर ‘टेलीग्राम’ तथा ‘सिग्नल’
जैसे ऐप्स पर जाने लगे हैं।
नीतिगत परिवर्तन क्या हैं?
नई नीति में कहा गया है कि अब व्हाट्सऐप नैदानिक व निजी जानकारी एकत्रित करता है
जिसे फेसबुक के साथ साझा किया जा सकता है।
नई नीति के अनुसार व्हाट्सऐप का एकीकरण फेसबुक व इंस्टाग्राम के साथ किया जाएगा
जिसके अंतर्गत इन तीनों के बीच जानकारी का आदान-प्रदान भी संभव है।
व्हाट्सऐप उपयोगकर्ताओं की जानकारी फेसबुक के स्वामित्व वाली अन्य बिज़नेस कंपनियों
के साथ भी साझा कर सकेगा।
पहले निजता सम्बंधी नीति में कहा गया था, “आपके व्हाट्सऐप
संदेशों की जानकारी फेसबुक पर साझा नहीं की जाएगी जहां इसे अन्य लोग देख सकें; दरअसल फेसबुक आपके व्हाट्सऐप संदेशों का उपयोग हमें सेवाओं में मदद देने के अलावा
किसी अन्य उद्देश्य से नहीं करेगा।” यह हिस्सा वर्तमान नीतिगत संशोधन में विलोपित कर
दिया गया है जिसका मतलब है कि व्हाट्सऐप के चैट्स का इस्तेमाल सेवा को बेहतर बनाने
के अलावा अन्य कार्यों में भी किया जा सकता है।
नई निजता नीति वैश्विक संचालन तथा डैटा हस्तांतरण को भी विस्तार देती है। इसमें
यह भी शामिल है कि कुछ जानकारियों का उपयोग आंतरिक रूप से फेसबुक की कंपनियों के साथ
और अन्य पार्टनर्स तथा सेवा प्रदाताओं के साथ किस तरह किया जाएगा।
फेसबुक की कंपनियों और अन्य पार्टनर्स के साथ व्हाट्सऐप जो जानकारी साझा करता है, उसमें निम्नलिखित शामिल है:
1. फोन नंबर
2. डिवाइस की पहचान
3. भौगोलिक स्थिति
4. उपयोगकर्ता के संपर्क
5. उपयोगकर्ता की वित्तीय जानकारी
6. प्रोडक्ट्स सम्बंधी क्रियाकलाप
7. उपयोगकर्ता द्वारा भेजी गई तस्वीरें, संदेश वगैरह
8. उपयोगकर्ता के पहचान के लक्षण
व्हाट्सऐप द्वारा उपयोगकर्ताओं की निजता सम्बंधी नई नीतियों के खिलाफ ऑनलाइन आक्रोश
शुरू होने के साथ ही, व्हाट्सऐप इस नई नीति को स्वीकार्य बनाने के
लिए ऐसे बयान जारी करने लगा कि यह नई नीति मात्र उन संवादों को प्रभावित करेंगी जो
कोई उपयोगकर्ता व्यापारिक प्रतिष्ठानों के साथ करता है। अलबत्ता, ये बयान लीपापोती से ज़्यादा कुछ नहीं हैं।
व्हाट्सऐप मेसेजिंग प्लेटफॉर्म पर इस समय 5 करोड़ से ज़्यादा व्यापारिक खाते हैं।
इसके चलते सारा डैटा इन व्यापार प्रतिष्ठानों के हाथ आ जाएगा। नीति में यह भी कहा गया
है कि उपयोगकर्ता जो बातचीत व्यापारिक प्रतिष्ठानों के साथ साझा करेंगे वह कंपनी के
अंदर भी और कई अन्य पार्टियों द्वारा देखी जा सकेगी।
तो क्या?
इस सबका मतलब यह है कि व्हाट्सऐप कंपनी न सिर्फ उपयोगकर्ता की बातचीत को किसी तीसरे
पक्ष के साथ साझा कर सकती है, बल्कि वह तीसरा पक्ष यह भी जांच
कर सकता है कि उपयोगकर्ता क्या-क्या खरीदता है वगैरह। इस जानकारी के आधार पर फेसबुक, इंस्टाग्राम तथा अन्य विज्ञापन बनाए जा सकेंगे।
यह भी हो सकता है कि उपयोगकर्ता को इस तरह के लक्षित विज्ञापन अन्य वेबसाइट्स पर
भी दिखने लगें,
जो शायद फेसबुक से सम्बंधित न हों। ऐसे अधिकांश लक्षित विज्ञापन
निशुल्क सोशल मीडिया के विश्लेषण से उभरते हैं। ये सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स अपनी जानकारी
व्यापारिक प्रतिष्ठानों को बेचते हैं। इसका मतलब यह भी है कि उपयोगकर्ता की किसी व्यापारिक
प्रतिष्ठान से बातचीत सुरक्षित नहीं होगी और यदि उस व्यापारिक प्रतिष्ठान का डैटा लीक
हुआ तो उपयोगकर्ता का खाता क्रमांक, मेडिकल जानकारी वगैरह अन्य प्रतिष्ठानों
के हाथ लग सकती है।
इसके बाद है मेटा-डैटा के उपयोग का सवाल। व्हाट्सऐप काफी समय से मेटा-डैटा एकत्रित
करता आ रहा है। मेटा-डैटा वह डैटा होता है जो वास्तविक डैटा के बारे में जानकारी प्रदान
करता है। जैसे,
यदि कोई उपयोगकर्ता व्हाट्सऐप पर बार-बार किसी स्त्रीरोग विशेषज्ञ
से संपर्क करे,
तो चाहे आपको संदेशों की विषयवस्तु न मालूम हो, पर आप अंदाज़ तो लगा ही सकते हैं कि उसे किस तरह की चिकित्सा समस्या है। इस तरह
के मेटा-डैटा को साझा करना भी उपयोगकर्ता की निजता का उल्लंघन है।
क्या किया जाए?
व्हाट्सऐप की वर्तमान नीति-परिवर्तन अधिसूचना के मुताबिक 8 फरवरी के बाद व्हाट्सऐप
का उपयोग जारी रखने के लिए उपयोगकर्ता को उक्त नीतिगत परिवर्तनों को स्वीकार करना होगा।
लगता तो है कि इस मामले में कुछ नहीं किया जा सकता। उपयोगकर्ता को दो में से एक विकल्प
चुनना होगा – या तो इन परिवर्तनों को माने या व्हाट्सऐप का उपयोग बंद कर दे।
व्हाट्सऐप या फेसबुक खाते की एक विशेषता यह भी है कि इन्होंने जो जानकारी एकत्रित
कर ली है वह अपने आप मिट नहीं जाती। अर्थात यदि आप निजता की चिंता करते हैं, तो एकमात्र विकल्प यही होगा कि आप इन खातों का उपय़ोग करना बंद कर दें। यही होने
भी लगा है।
निजता सम्बंधी इन परिवर्तनों की घोषणा के बाद देखा गया है कि अन्य ऐप्स बढ़ती संख्या
में डाउनलोड किए जा रहे हैं। उदाहरण के लिए टेलीग्राम के मासिक डाउनलोड में 15 प्रतिशत
और सिग्नल के डाउनलोड में 9000 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। शायद व्हाट्सऐप द्वारा निजता
में लगाई जा रही सेंध का यही सबसे अच्छा समाधान है। ये दोनों ऐप्स (टेलीग्राम और सिग्नल)
दोनों सिरों पर कूटबद्ध होते हैं और ऐसी जानकारी एकत्रित नहीं करते जिससे किसी उपयोगकर्ता
की पहचान की जा सके।
देखना यह है कि क्या व्हाट्सऐप अखबारों, सोशल मीडिया व अन्यत्र पड़ रहे दबाव के जवाब में अपनी नीति बदलता है और क्या व्हाट्सऐप छोड़कर जा रहे लोगों की संख्या उसे पुनर्विचार को बाध्य कर पाती है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://underspy.com/blog/wp-content/uploads/2017/12/whatsapp-security.jpg
एक साल पहले तक बढ़ते पर्यावरण संकट को लेकर लोगों में काफी
चिंता थी;
ज़रूरी कदम उठाने सम्बंधी युवा आंदोलन काफी ज़ोर-शोर से हो
रहे थे। लेकिन कोविड-19 ने जलवायु संकट पर उठाए जा रहे कदमों और जागरूकता से लोगों
का ध्यान हटा दिया। हकीकत में कोविड-19 और पर्यावरणीय संकट में कुछ समानताएं हैं।
दोनों ही संकट मानव गतिविधि के चलते उत्पन्न हुए हैं, और
दोनों का आना अनपेक्षित नहीं था। इन दोनों ही संकटों को दूर करने या उनका सामना
करने में देरी से कदम उठाए गए, अपर्याप्त कदम या गलत कदम
उठाए गए,
जिसके कारण जीवन की अनावश्यक हानि हुई। अभी भी हमारे पास
मौका है कि हम सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा को बेहतर करें, एक
टिकाऊ आर्थिक भविष्य बनाएं और पृथ्वी पर बचे-खुचे प्राकृतिक संसाधनों और जैव
विविधता की रक्षा करें।
यह तो जानी-मानी बात है कि स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन एक दूसरे से जुड़े हुए
हैं। पिछले पांच वर्षों से स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन के लैंसेट काउंटडाउन ने
जलवायु परिवर्तन के कारण स्वास्थ्य पर होने वाले प्रभावों को मापने वाले 40 से
अधिक संकेतकों का विवरण दिया है और उन पर नज़र रखी हुई है। साल 2020 में प्रकाशित
लैंसेट की रिपोर्ट में बढ़ती गर्मी से सम्बंधित मृत्यु दर, प्रवास
और लोगों का विस्थापन, शहरी हरित क्षेत्र में कमी, कम कार्बन आहार (यानी जिस भोजन के सेवन से पर्यावरण को कम से कम नुकसान हो) और
अत्यधिक तापमान के कारण श्रम क्षमता के नुकसान की आर्थिक लागत जैसे नए संकेतक भी
शामिल किए गए। जितने अधिक संकेतक होंगे जलवायु परिवर्तन के स्वास्थ्य और स्वास्थ्य
तंत्र पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने में उतने ही मददगार होंगे। जैसे वायु
प्रदूषण के कारण होने वाला दमा, वैश्विक खाद्य सुरक्षा की
चुनौतियां और कृषि पैदावार में कमी के कारण अल्प आहार, हरित
क्षेत्र में कमी से बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य सम्बंधी तकलीफों का जोखिम और 65 वर्ष से
अधिक आयु के लोगों में अधिक गर्मी का असर, जैसी
समस्याओं को ठीक करने का सामथ्र्य स्वास्थ्य प्रणालियों की क्षमता पर निर्भर करता
है,
और यह क्षमता स्वास्थ्य सेवाओं के लचीलेपन पर निर्भर करती
है। इन दो संकटों के कारण हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था पहले ही काफी दबाव में है।
लैंसेट काउंटडाउन में राष्ट्र-स्तरीय नीतियां दर्शाने वाले क्षेत्रीय डैटा को
भी शामिल किया है। इस संदर्भ में लैंसेट काउंटडाउन की दी लैंसेट पब्लिक हेल्थ में
एशिया की पहली क्षेत्रीय रिपोर्ट प्रकाशित हुई है, और
ऑस्ट्रेलियाई एमजेए-लैंसेट काउंटडाउन की तीसरी वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। विश्व
में सर्वाधिक कार्बन उत्सर्जक और सर्वाधिक आबादी वाले देश के रूप में चीन की
जलवायु परिवर्तन पर प्रतिक्रिया, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय, दोनों स्तरों पर बहुत मायने रखती है। रिपोर्ट बताती है कि बढ़ते तापमान के कारण
बढ़ते स्वास्थ्य जोखिमों से निपटने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कदम उठाए जाने की
ज़रूरत है। हालांकि 23 संकेतक बताते हैं कि कई क्षेत्रों में प्रभावशाली सुधार किए
गए हैं,
और जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयास कर सार्वजनिक
स्वास्थ्य में सुधार करने की पहल भी देखी गई है। लेकिन इस पर चीन की प्रतिक्रिया
अभी भी ढीली है।
जलवायु परिवर्तन को बढ़ाने वाले कारकों पर अंकुश लगाकर ज़ूनोटिक (जंतु-जनित)
रोगों के उभरने और दोबारा उभरने को रोका जा सकता है। अधिकाधिक खेती, जानवरों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और वन्य जीवों के प्राकृतिक आवासों में
बढ़ता मानव दखल ज़ूनोटिक रोगों से मानव संपर्क और उनके फैलने की संभावना को बढ़ाते
हैं। विदेशी यात्राओं में वृद्धि और शहरों में बढ़ती आबादी के कारण ज़ूनोटिक रोग
अधिक तेज़ी से फैलते हैं। जलवायु परिवर्तन के पर्यावरणीय स्वास्थ्य निर्धारकों के
रूप में इन कारकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।
कोविड-19 और जलवायु संकट, दोनों इस तथ्य को और भी
नुमाया करते हैं कि समाज के सबसे अधिक गरीब और हाशियाकृत लोग, जैसे प्रवासी और शरणार्थी लोग, हमेशा ही सर्वाधिक असुरक्षित
होते हैं और इसके प्रभावों की सबसे अधिक मार झेलते हैं। जलवायु परिवर्तन के संदर्भ
में देखें तो इस संकट से सर्वाधिक प्रभावित लोगों का योगदान इस संकट को बनाने में
सबसे कम है। इस वर्ष की काउंटडाउन रिपोर्ट के अनुसार कोई भी देश इस बढ़ती असमानता
के कारण होने वाली जीवन की क्षति को बचाने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई नहीं पड़ता।
कोविड-19 के प्रभावों से निपटना अब राष्ट्रों की वरीयता बन गया है और जलवायु संकट के मुद्दों से उनका ध्यान हट गया है। जिस तत्परता से राष्ट्रीय सरकारें कोविड-19 से हुई क्षति के लिए आर्थिक सुधार की योजनाएं बना रहीं हैं और उन पर अमल कर रही हैं, उतनी ही तत्परता से जलवायु परिवर्तन और सामाजिक समानता के मुद्दों पर काम करने की ज़रूरत है। अब इन दोनों तरह के संकटों से एक साथ निपटना लाज़मी और अनिवार्य है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://dialogochino.net/wp-content/uploads/2020/04/GEF-Blue-Forests-1440×720.jpg
भारत के औषधि नियामक ने 3 जनवरी को दो कोविड-19 टीकों को
मंज़ूरी दी है। प्रधान मंत्री ने इस फैसले को महामारी के विरुद्ध लड़ाई में निर्णायक
बताया और भारतीय वैज्ञानिक समुदाय की आत्म निर्भरता के प्रमाण के रूप में देखा।
लेकिन कुछ वैज्ञानिकों ने इस फैसले की आलोचना की है। इसमें विशेष रूप से भारत
बायोटेक द्वारा निर्मित कोवैक्सीन पर आपत्ति ज़ाहिर की जा रही है जिसकी प्रभाविता
और सुरक्षा के तीसरे चरण के परिणामों की प्रतीक्षा किए बिना मंज़ूरी दी गई है।
भारत के औषधि महानियंत्रक वी.जी. सोमानी के अनुसार यह मंज़ूरी ‘पर्याप्त सावधानी’ के साथ प्रदान की गई है और इसका प्रभाविता
अध्ययन जारी रहेगा। उद्देश्य यह है कि सार्स-कोव-2 के परिवर्तित रूप के खिलाफ
बैक-अप सुरक्षा उपलब्ध रहे। युनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड और एस्ट्राज़ेनेका द्वारा निर्मित
टीके को भी ‘सशर्त उपयोग’
की मंज़ूरी दी गई है और इसके भी क्लीनिकल परीक्षण जारी रखे
जाएंगे।
कई वैज्ञानिक तीसरे चरण के डैटा के बिना टीके की स्वीकृति को गलत मानते हैं।
केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) के दिशानिर्देशों के अनुसार किसी
भी टीके को मंज़ूरी मिलने के लिए तीसरे चरण के परीक्षणों में कम से कम 50 प्रतिशत
प्रभावी होना चाहिए। इस टीके को मंज़ूरी देने में इन दिशानिर्देशों को अनदेखा किया
गया है।
इसके अलावा एस्ट्राज़ेनेका-ऑक्सफ़ोर्ड से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के तहत सीरम
इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा निर्मित कोवीशील्ड टीके को मंज़ूरी देने में भी
जल्दबाज़ी की गई है। कोविशील्ड को ब्राज़ील और यूके में तीसरे चरण के अध्ययन से
प्राप्त डैटा के आधार पर मंज़ूरी मिली है। लेकिन सीडीएससीओ के दिशानिर्देशों के
अनुसार यह जांच ज़रूरी है कि यह टीका भारतीय लोगों में कारगर है। ऐसा इसलिए आवश्यक
है क्योंकि पूर्व में भी पोलियो और टाइफाइड के टीके पश्चिमी आबादी की तुलना में
भारतीयों में कम असरदार साबित हुए हैं। सीरम इंस्टिट्यूट के अध्ययन के आंकड़ों का
अभी तक पूरी तरह विश्लेषण नहीं किया गया है।
फिलहाल स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने अगस्त तक जन स्वास्थ्य एवं
फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं से शुरू करते हुए देश की एक-चौथाई आबादी के टीकाकरण की
योजना बनाई है। इसमें सीरम इंस्टिट्यूट ने फरवरी तक 10 करोड़ टीके प्रति माह की
आपूर्ति करने का वादा किया है। इस बीच कोवैक्सीन को ‘बैकअप’ के तौर पर उपयोग करने की योजना है।
इसलिए दवा नियामक द्वारा कोवैक्सीन को मंज़ूरी देने में जल्दबाज़ी का कारण समझ
नहीं आता। गौरतलब है कि भारत बायोटेक ने जब आवेदन किया था तब वह तीसरे चरण के
परीक्षण में वालंटियर्स भर्ती कर ही रही थी। यह प्रक्रिया काफी धीमी है और फिलहाल
कंपनी इस स्थिति में भी नहीं पहुंची है कि अंतरिम प्रभाविता का विश्लेषण किया जा
सके।
लेकिन भारत बायोटेक के प्रमुख कृष्णा एला इसे असामान्य नहीं मानते; वे रूस द्वारा विकसित स्पुतनिक वी और चीन द्वारा विकसित सायनोफार्म का हवाला
देते हैं जिनको पहले और दूसरे चरण के पशु अध्ययन के आधार पर वितरित किया गया है।
उन्होंने सभी टीका प्राप्तकर्ताओं की सुरक्षा के लिए निगरानी करने का दावा किया
है। लेकिन यह दावा सिर्फ इस आधार पर है कि यह टीका निष्क्रिय वायरस से विकसित किया
गया है जिसके सुरक्षित उपयोग का लंबा इतिहास है। कृष्णा के अनुसार पशुओं और
मनुष्यों पर दूसरे चरण के परीक्षण के आधार पर टीके के प्रभावी होने की संभावना है।
इन सब के बाद भी कोवैक्सीन की सुरक्षा पर सवाल बना हुआ है। इसमें प्रतिरक्षा
प्रक्रिया को बढ़ावा देने वाले घटक, एल्युमिनियम हायड्रॉक्साइड और
इमिडाज़ोक्विनोलिनोन का उपयोग किया गया है जिन्हें पहले कभी इस्तेमाल नहीं किया गया
है। ऐसे में इसकी सुरक्षा संदेहास्पद है। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि
वैज्ञानिक दूसरे चरण में मापी गई प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाओं के आधार पर किसी टीके
की प्रभाविता का अनुमान नहीं लगा सकते हैं।
कोवीशील्ड के तीसरे चरण के परिणामों के अंतरिम विश्लेषण में प्रभाविता 62 प्रतिशत पाई गई है। हालांकि कुछ अस्पष्टता के बाद भी इसे यूके और अर्जेन्टाइना में उपयोग के लिए अधिकृत किया गया है। भारत में सीरम इंस्टिट्यूट ने एस्ट्राज़ेनेका के टीके से कोवीशील्ड की प्रतिरक्षा प्रक्रिया की तुलना करने के लिए 400 भारतीयों और सुरक्षा का परीक्षण करने के लिए 1200 भारतीयों पर अध्ययन करने का डिज़ाइन तैयार किया है। यह अंतरिम विश्लेषण सीडीएससीओ को संतुष्ट करने के लिए तो पर्याप्त है लेकिन इसके परिणाम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। ऐसे में सम्मिलित लोगों की संख्या स्पष्ट नहीं है। यह भारतीय नियामक द्वारा नियम बनाने और स्वयं उन्हें तोड़ने का स्पष्ट उदाहरण है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_large/public/astrazeneca_1280p.jpg?itok=FNLOFVd4
नए साल
में सार्स-कोव-2 का नया संस्करण, ए.1.1.7, वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। पिछले महीने दक्षिण-पूर्वी
इंग्लैंड में पहली बार पहचाना गया यह संस्करण संभवत: इस महामारी को एक भयावह रूप
में आगे बढ़ा सकता है।
वेलकम ट्रस्ट के प्रमुख जेरेमी फेरार चिंता जताते हैं कि
अधिक तेज़ी से फैलने की क्षमता के कारण शायद ए.1.1.7 संस्करण विश्व स्तर पर इस
महामारी का प्रमुख संस्करण बन जाएगा। उनको लगता है कि यह बीमारी की एक खतरनाक लहर
पैदा करेगा। साल 2020 में थोड़ा अंदाज़ा मिलने लगा था कि यह महामारी किस दिशा में
आगे बढ़ेगी लेकिन वायरस के इस नए संस्करण के फैलने से अब इस बारे में ठीक-ठीक कुछ
कहना मुश्किल हो गया है।
इस चिंता ने कुछ देशों में टीके की मंज़ूरी प्रक्रिया या
टीके देने के तरीके को निश्चित करने की चर्चा को गति दे दी है ताकि जल्द से जल्द
अधिकाधिक लोगों को सुरक्षा दी जा सके। लेकिन जिस तरह नया संस्करण अन्य देशों में
प्रवेश कर रहा है, वैज्ञानिकों ने देश की सरकारों को मौजूदा
नियंत्रण उपायों को भी मज़बूत करने की सलाह दी है। यू.के. ने तो और भी सख्त
प्रतिबंध लगाने की घोषणा भी कर दी है जिसमें स्कूलों को बंद रखने और अत्यावश्यक
परिस्थितियों में ही लोगों को घर से बाहर निकलने की अपील की गई है। अलबत्ता, कई देश अभी इस तरह के कदम उठाने में हिचक रहे हैं।
प्रतिबंध लगाते समय यू.के. के प्रधानमंत्री ने कहा था कि यह
नया संस्करण 50-70 प्रतिशत अधिक तेज़ी से फैलता है, लेकिन
शोधकर्ता इस बारे में कुछ भी कहने में सावधानी बरत रहे हैं। पिछले एक महीने में
यू.के. में संक्रमण के मामले बढ़े तो हैं लेकिन देखा जाए तो मामले तब बढ़े हैं जब
यू.के. के विभिन्न हिस्सों में विभिन्न स्तर का प्रतिबंध लगा था, और लोगों के व्यवहार में बदलाव और क्रिसमस के समय क्षेत्रीय संक्रमण दर के
कारण बनीजटिल स्थिति में नए संस्करण के प्रभाव को ठीक-ठीक पहचानना कठिन है।
फिर भी साक्ष्य बताते हैं कि ए.1.1.7 के स्पाइक प्रोटीन में
हुए आठ परिवर्तनों सहित कई परिवर्तन इस वायरस की संक्रामकता को बढ़ाते हैं। पब्लिक
हेल्थ इंग्लैंड द्वारा किए गए एक विश्लेषण में पता चला है कि इंग्लैंड में ए.1.1.7
संस्करण से संक्रमित लोगों के संपर्क में आए कुल लोगों में से लगभग 15 प्रतिशत लोग
कोविड-19 पॉज़िटिव पाए गए जबकि अन्य संस्करणों से संक्रमित लोगों के संपर्क में आए
कुल लोगों में से 10 प्रतिशत लोग ही कोविड-19 पॉज़िटिव पाए गए।
जिन अन्य देशों में ए.1.1.7 संस्करण देखा गया है, यदि वहां भी इस संस्करण की लहर आती है तो यह इसका एक पुख्ता प्रमाण हो सकता है
कि यह संस्करण तेज़ी से फैलता है। आयरलैंड में, जहां
तेज़ी से संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं, वहां डीएनए अनुक्रमित
किए गए एक चौथाई मामलों में संक्रमण के लिए यही नया संस्करण ज़िम्मेदार पाया गया
है। लेकिन युरोपीय संघ में सर्वाधिक अनुक्रमण करने वाले देश डेनमार्क ने अभी इस
बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा है। यहां नियमित जांच में दर्जनों बार यह
संस्करण दिखा है;
दिसंबर की शुरुआत में अनुक्रमित जीनोम में इसकी आवृत्ति 0.2
प्रतिशत थी जो तीन सप्ताह बाद से 2.3 प्रतिशत हो गई। यदि अन्य देशों में भी मामले
बढ़ने की प्रवृत्ति इसी तरह बनी रहती है तो यह एक स्पष्ट संकेत होगा कि यू.के. की
तरह वहां भी इस संस्करण की लहर उभर सकती है जिसका सामना करने के लिए हमें तैयार
रहना चाहिए।
अब तक इस संदर्भ में कुछ साक्ष्य मिले हैं कि नया संस्करण
लोगों को कम बीमार करता है लेकिन यह कोई तसल्ली की बात नहीं है। किसी वायरस की
प्रसार क्षमता में वृद्धि उसकी घातकता में वृद्धि की तुलना में अधिक चिंताजनक है
क्योंकि इसके प्रभाव तेज़ी से बढ़ते हैं। मसलन, यदि
किसी रोग की मृत्यु दर एक प्रतिशत है और वह लोगों में अधिक तेज़ी से फैलता है जिससे
अधिक लोग प्रभावित होते हैं तो इस स्थिति में अधिक लोग मरेंगे बनिस्बत उस स्थिति
के जिसमें किसी रोग की मृत्यु दर तो दो प्रतिशत हो लेकिन फैलता कम हो।
यदि वास्तव यू.के. में वायरस की प्रसार दर में 50-75
प्रतिशत की वृद्धि हुई है तो वायरस को
फैलने से रोकना बहुत कठिन होगा। संक्रमितों को अलग करके, उनके
संपर्क में आए लोगों को पहचान कर क्वारेंटाइन करके और उनका परीक्षण करने जैसे उपाय
कर वायरस की प्रसार दर को 2 से 1 पर लाया जा सकता है। लेकिन यदि मामले एक सीमा तक
पहुंच जाते हैं और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर अधिक भार पड़ता है तो ये कदम
नाकाम जाएंगे। यानी सख्त उपाय ही नए संस्करण के प्रसार को रोकने में मदद कर सकते
हैं।
पहले ही सार्स-कोव-2 के कई संस्करण उभर चुके हैं। अब, संक्रमण फैलने से रोककर हम वायरस के लिए और अधिक विकसित होने के अवसर भी कम कर सकते हैं। वायरस में कोई उत्परिवर्तन टीकों की प्रभाविता को भी खतरे में डाल सकता है। महामारी के पहले जैसी दुनिया, दिनचर्या के अनुभव के लिए हमें इस वायरस को रोकना होगा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_large/public/glasgow_1280p.jpg?itok=obBUnq7-
यू.एस. व भारत के बाद कोविड-19 के सबसे अधिक मामलों वाले ब्राज़ील
में जल्द ही पहला टीका अधिकृत होने जा रहा है। ब्राज़ीली शोधकर्ताओं के अनुसार
12,000 स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं पर किए गए अध्ययन में चीनी कंपनी सायनोवैक द्वारा
निर्मित टीका,
कोरोनावैक, सुरक्षित तथा कोविड-19 के
हल्के मामलों की रोकथाम में 78 प्रतिशत प्रभावकारी पाया गया। यह मध्यम और गंभीर
बीमारी को पूरी तरह से रोकने के सक्षम पाया गया।
इस परीक्षण के प्रायोजक, सरकारी टीका निर्माता बुटानन
इंस्टीट्यूट ने सभी दस्तावेज़ जमा कर दिए हैं और जल्द ही स्वीकृति की उम्मीद करते
हैं। गौरतलब है कि ब्राज़ील में एस्ट्राज़ेनेका और युनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड द्वारा
निर्मित कोविड-19 टीके के प्रभाविता परीक्षण भी चल रहे हैं और जल्द ही स्वीकृति
मिलने की संभावना है।
लेकिन कोरोनावैक टीके की अच्छी खबरों के बीच सम्बंधित डैटा की कमी ने ब्राज़ील
के सहयोगियों को असमंजस में डाल दिया है। इससे पहले भी ब्राज़ील के शोधकर्ताओं ने
टीके की सफलता की घोषणा तो की थी लेकिन तब भी उन्हें सटीक प्रभाविता डैटा प्रदान
करने की अनुमति नहीं थी।
गौरतलब है कि कई देशों में अधिकृत अधिकांश टीके उन्नत तकनीक (जैसे mRNA या
हानिरहित वायरल वेक्टर) पर आधारित हैं। एस्ट्राज़ेनेका-ऑक्सफोर्ड द्वारा भी ऐसी ही
तकनीक का उपयोग किया गया है जबकि सायनोवैक ने अधिक स्थापित तकनीक का उपयोग किया है।
सायनोवैक द्वारा निर्मित टीका समूचे मगर दुर्बलीकृत कोरोनावायरस पर निर्भर है ताकि
यह बीमारी का कारण न बने। दो mRNA आधारित टीकों ने हल्के रोग के विरुद्ध 95
प्रतिशत प्रभाविता दर्ज की है। लेकिन एक मत यह है कि टीके का मुख्य काम लोगों को
गंभीर रोग से बचाने का होना चाहिए। मध्य पूर्वी देशों में किए गए परीक्षणों में
सायनोफार्म के टीके ने भी लगभग ऐसे ही परिणाम दर्शाए हैं।
लेकिन सायनोवैक और सायनोफार्म ने अपने साझेदारों को बहुत कम जानकारी सार्वजनिक
करने की अनुमति दी है। ब्राज़ीली शोधकर्ता केवल यह बता पाए कि कोरोनावैक की
प्रभाविता 50 प्रतिशत से अधिक है, जो किसी भी टीके की स्वीकृति
का अंतर्राष्ट्रीय मानक है। इसके अलावा संख्याओं के बारे में कोई जानकारी प्रदान
नहीं की गई। पत्रकारों द्वारा सवाल करने पर मात्र यह बताया गया कि हल्की बीमारी के
218 मामले हैं लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि इनमें से कितने प्लेसिबो समूह के हैं और
कितने टीका-प्राप्त समूह के। यह कहा गया कि टीका सभी आयु समूहों में प्रभावी है।
डैटा की कमी से काफी संदेह उत्पन्न होता है। अन्य कोविड-19 टीका निर्माताओं द्वारा भी प्रारंभिक प्रभाविता परीक्षण सम्बंधी घोषणाओं में कम ही जानकारी प्रदान की गई। परीक्षण आयोजित करने वाले शोधकर्ता एस्पर कैलस के अनुसार जांचकर्ताओं के पास भी पूरा डैटा उपलब्ध नहीं था। कैलस के अनुसार ब्राज़ील की टीम और टीका निर्माता के बीच विवाद का कारण यह है कि क्या किसी मामले के पुष्ट मानने के लिए पीसीआर परीक्षण के अलावा कोविड-19 के एक-दो लक्षण भी दिखना चाहिए। तुर्की में कोरोनावैक का परीक्षण करने वाले शोधकर्ताओं को इस तरह की समस्या का सामना नहीं करना पड़ा। क्योंकि डैटा जारी करने के बारे में सायनोवैक से कोई अनुबंध नहीं था। उनके डैटा में प्लेसिबो प्राप्त 570 प्रतिभागियों में से 26 और टीका प्राप्त 752 में से 3 कोविड-19 के मामले सामने आए (प्रभाविता 91.25 प्रतिशत)। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_large/public/sinovac_1280p_0.jpg?itok=S9pv2Ku3
पिछले कई दशकों में हमने विकास के लिए जो कदम उठाए हैं, उसने हमें पर्यावरण संकट के दौर में लाकर खड़ा कर दिया है। पर्यावरण संकट के इस दौर में देश के पर्यावरण विनियमन में पिछले कुछ सालों में कई बड़े बदलाव किए गए हैं और पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) के नियमों में भी बदलाव की कोशिश जारी है। इन बदलावों से भारत की जैव-विविधता पर क्या असर होगा। इस तरह के मसलों पर रोशनी डालता प्रो. माधव गाडगिल का यह व्याख्यान।
पर्यावरणीय मसलों पर बहस तो कई सालों से छिड़ी हुई है लेकिन
पिछले एक साल से पर्यावरण के संदर्भ में तीन विषयों पर काफी गंभीर बहस चल रही है।
पहला विषय है पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना यानी पर्यावरण पर होने वाले असर का
मूल्यांकन करने वाले मौजूदा नियमों में बदलाव करने के लिए जारी की गई अधिसूचना।
दूसरा,
राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) में जैव-विविधता कानून के
संदर्भ में दायर की गई याचिका। जैव विविधता कानून 2004 में लागू हुआ था। इस कानून
के मुताबिक हर स्थानीय निकाय (पंचायत, नगर पालिका, नगर निगम) में एक जैव-विविधता प्रबंधन समिति स्थापित की जानी चाहिए। समिति के
सदस्य वहां के स्थानीय लोग होंगे जो अपने क्षेत्र की पर्यावरण सम्बंधी समस्याओं और
पर्यावरणीय स्थिति का अध्ययन करके एक दस्तावेज़ तैयार करेंगे। इसे पीपुल्स
बायोडायवर्सिटी रजिस्टर (लोक जैव विविधता पंजी) कहा गया। लेकिन वर्ष 2004 से 2020
तक,
यानी 16 सालों की अवधि में इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।
इस कार्य को संपन्न कराने के अधिकार वन विभाग को दे दिए गए।
यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि वन विभाग स्थानीय लोगों के खिलाफ है।
दस्तावेज़ीकरण जैसे कामों में स्थानीय लोगों को शामिल करने का मतलब है कि लोगों को
इससे कुछ अधिकार प्राप्त हो जाएंगे, और विभाग यही तो नहीं चाहता।
इसलिए 16 वर्षों तक इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
इस सम्बंध में एक याचिका दायर की गई, लेकिन जब यह याचिका
दायर हुई तो एक अजीब ही स्थिति बन गई। वन विभाग द्वारा पीपुल्स बायोडायवर्सिटी
रजिस्टर तैयार करने के लिए बाहर की कई एजेंसियों को ठेका दे दिया गया। ठेका
एजेंसियों ने गांव वालों की जानकारी के बिना खुद ही ये दस्तावेज़ तैयार कर दिए और
वन विभाग को सौंप दिए। वन विभाग ने इसे NGT को सौंप दिया और कहा कि हमने काम पूरा
कर दिया। यह बिलकुल भी ठीक नहीं हुआ और इसी पर बहस चल रही है। यह भी जैव-विविधता
से ही जुड़ा हुआ विषय है।
और बहस का तीसरा मुद्दा है कि कुछ दिनों पहले पता चला कि पूरे देश के कृषि
महाविद्यालयों को कहा गया था कि वे इस बात का अध्ययन करके बताएं कि उनके अपने
क्षेत्र के खाद्य पदार्थों, पेय पदार्थों या अन्य चीज़ों
में कीटनाशक कितनी मात्रा में उपस्थित हैं। जब महाविद्यालय यह काम कर रहे थे तो
उनको आदेश दिया गया कि इस जांच के जो भी निष्कर्ष मिलें उन्हें लोगों के सामने
बिलकुल भी ज़ाहिर न होने दें, इन्हें गोपनीय रखा जाए। यानी
लोगों को यह पता नहीं चलना चाहिए कि हमारे खाद्य और पेय पदार्थों में बड़े पैमाने
पर कीटनाशक पहुंच गए हैं।
इस देश को विषयुक्त बनाया जा रहा है और क्यों बनाया जा रहा है। विषयुक्त देश
बनाए रखे जाने का भी इस अधिसूचना में समर्थन किया गया; इसके
समर्थन में कहा गया कि यह सब भारत के संरक्षण के लिए बहुत ज़रूरी है। लेकिन पूरा
देश विषाक्त करके भारत का संरक्षण किस तरह होगा, यह
समझना बहुत मुश्किल है। इससे तो ऐसा ही लगता है कि जो भी प्रदूषण फैलाने वाले
उद्यम हैं उनको बेधड़क प्रदूषण फैलाने की छूट देकर देश को खत्म करने की अनुमति दे
दी गई है। एक तो पहले से ही देश का पर्यावरण संरक्षण पर नियंत्रण बहुत ही कमज़ोर था, अब तो इसे पूरी तरह से ध्वस्त करने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं।
इस तरह की शासन प्रणाली को हमें चुनौती ज़रूर देना चाहिए। हमें यह समझ लेना
चाहिए कि चुनौती देने के लिए हमारे हाथ में अब कई बहुत शक्तिशाली साधन आ गए हैं।
ये शक्तिशाली साधन हैं पूरे विश्व में तेज़ी से बदलती ज्ञान प्रणाली।
पहले बहुत थोड़े लोगों के हाथों में ज्ञान का एकाधिकार था। लेकिन अब यह
एकाधिकार खत्म हो रहा है और आम व्यक्ति तक ज्ञान पहुंच रहा है। यह एक बहुत ही
क्रांतिकारी और आशाजनक बदलाव है। एकलव्य द्वारा प्रकाशित मेरी किताब जीवन की बहार
में अंत में एक विवेचना इसी विषय पर की गई है कि पृथ्वी पर जीवन की इस चार अरब साल
की अवधि में जो प्रगति हुई है और हो रही है, वह है
कि ज्ञान को अपनाने या हासिल करने के लिए जीवधारी अधिक से अधिक समर्थ बनते गए हैं।
इस अवधि में हुए जो मुख्य बड़े परिवर्तन बताए गए हैं, उसमें
सबसे आखिरी नौवां चरण है मनुष्य की सांकेतिक भाषा का निर्माण। इस सांकेतिक भाषा के
आधार पर हम एक समझ और ज्ञान प्राप्त करने लगे। ज्ञान ऐसी अजब चीज़ है कि जो बांटने
से कम नहीं होती,
बल्कि बढ़ती है।
लेकिन ज्ञान अर्जन की जो भी प्रवृत्तियां थीं, इन
प्रवृत्तियों का अंतिम स्वरूप क्या होगा? इस विषय में मैनार्ड
स्मिथ ने बहुत ही अच्छी विवेचना करते हुए बताया है कि दसवां परिवर्तन होगा कि विश्व
में सभी लोगों के हाथ में सारा ज्ञान आ जाएगा। कोई भी किसी तरह के ज्ञान से वंचित
नहीं होगा और ज्ञान पर किसी का एकाधिकार नहीं रहेगा। लेकिन अफसोस कि हमारी शासन
प्रणाली ज्ञान पर केवल चंद लोगों को एकाधिकार देकर बाकी लोगों को ज्ञान से वंचित
करने का प्रयत्न कर रही है।
लेकिन अब हम शासन के इस प्रयत्न को बहुत ही अच्छे-से चुनौती दे सकते हैं। जिस
तरह आम व्यक्ति के हाथ तक ज्ञान पहुंच रहा है उसकी मदद लेकर। इसका एक बहुत ही
अच्छा उदाहरण देखने में आया था। स्थानीय लोगों को शामिल करके पीपुल्स
बायोडायवर्सिटी रजिस्टर बनाने का जो काम किया जाना था, उस पर
शासन (वन विभाग) का कहना है कि स्थानीय लोग ये दस्तावेज़ बनाने में सक्षम में नहीं
हैं,
उनको अपने आसपास मिलने वाली वनस्पतियों, पेड़-पौधों,
पशु-पक्षियों, कीटों वगैरह के नाम तक
पता नहीं होते। इनके बारे में जानकारी का आधार इनके वैज्ञानिक नाम ही हैं। जब वे
ये नहीं जानते,
तो दस्तावेज़ कैसे बना पाएंगे। इसीलिए, उनका तर्क था कि हमने बाहर के विशेषज्ञों को इन्हें तैयार करने का ठेका दे
दिया।
मगर इस तर्क के विपरीत एक बहुत ही उत्साहवर्धक उदाहरण मेरे देखने में आया।
महाराष्ट्र के गढ़चिरौली ज़िले में कई गांवों को सामूहिक वनाधिकार प्राप्त हुए।
सामूहिक वनाधिकार प्राप्त होने के बाद वहां रहने वाले आदिवासी (अधिकतर गौंड) लोगों
के लिए पहली बार ऐसा हुआ कि उनका घर के बाहर कदम रखना अपराध नहीं कहलाया। इसके
पहले तक उनका घर से बाहर कदम रखना भी अपराध होता था क्योंकि जहां वे रहते हैं वह
रिज़र्व फॉरेस्ट है, और रिज़र्व फॉरेस्ट में किसी का भी प्रवेश
अपराध है। इसके पीछे वन विभाग की लोगों से रिश्वत लेने की मंशा थी। जीवनयापन के
लिए उन लोगों को बाहर निकलने के बदले वन विभाग को विश्वत देनी पड़ती थी। आज भी यह
स्थिति कई जगह बनी हुई है। लेकिन सौभाग्य से गढ़चिरौली में अच्छा नेतृत्व मिला और
वहां के डिप्टी कलेक्टर द्वारा वनाधिकार कानून ठीक से लागू किया गया; इससे ग्यारह सौ गांवों को वन संसाधन और वन क्षेत्र पर अधिकार मिल गए। इस
अधिकार के आधार पर वे वहां की गैर-काष्ठ वनोपज जैसे बांस, तेंदूपत्ता, औषधियों,
वनस्पतियों वगैरह का दोहन कर सकते हैं और उनको बेच सकते
हैं। इस तरह वे लोग सक्षम बन रहे हैं।
इन गांवों के युवक-युवतियों को सामूहिक वन संसाधन का ठीक से प्रबंधन करने में
समर्थ बनाने के लिए उनको प्रशिक्षण भी दिया गया। इसमें हमने उनके गांव में ही उन्हें
पांच महीनों का विस्तृत प्रशिक्षण दिया। कई युवक-युवतियों ने प्रशिक्षण लिया। हमने
पाया कि इन युवक-युवतियों को उनके आसपास के पर्यावरण के बारे में बहुत ही गहरा
ज्ञान था क्योंकि वे बचपन से ही वे वहां रह रहे थे और ठेकेदार के लिए तेंदूपत्ता, बांस आदि वनोपज एकत्र करके देते थे। इस प्रशिक्षण के बाद उनमें और भी जानने का
कौतूहल जागा।
प्रशिक्षण में हमने युवक-युवतियों को स्मार्ट फोन के उपयोग के बारे में भी
सिखाया था। कम से कम महाराष्ट्र के सारे गांवों में परिवार में एक स्मार्टफोन तो
पहुंच गया है;
इंटरनेट यदि गांव में ना उपलब्ध हो तो भी नज़दीकी बाज़ार वाले
नगर में होता है। गांव वाले अक्सर बाज़ार के लिए जाते हैं तो वहां इंटरनेट उपयोग कर
पाते हैं। काफी समय तक स्मार्टफोन को भारतीय भाषाओं में उपयोग करने में मुश्किल
होती थी। हमारे यहां की कंपनियां और शासन की संस्थाओं (जैसे सी-डैक) को भारतीय
भाषाओं में इसका उपयोग करने की प्रणाली बनाने का काम दिया गया था जो उन्होंने अब
तक ठीक से नहीं किया है। दक्षिण कोरिया की कंपनी सैमसंग चाहती थी कि अधिक से अधिक
लोग स्मार्टफोन का उपयोग करें ताकि मांग बढ़े। इसलिए सैमसंग कंपनी ने भारतीय भाषाओं
में उपयोग की सुविधा उपलब्ध कराई, जो भारत इतने सालों में नहीं
कर सका था। और अब गूगल में भी सारी भाषाओं में उपयोग सुविधा उपलब्ध है। गूगल कंपनी
ने दो साल पहले एक सर्वे किया था जिसमें उन्होंने पाया था कि भारत की अस्सी
प्रतिशत आबादी अपनी भाषा में स्मार्टफोन का उपयोग कर रही है, केवल 20 प्रतिशत लोग अंग्रेज़ी का इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन भारत में ऐसी
अजीब स्थिति बन गई है कि जब यहां के सुशिक्षित लोगों को यह बात बताई जाती है तो वे
कहते हैं कि ऐसा कैसे हो सकता है।
प्रशिक्षण में हमने यह भी सिखाया था कि गूगल के एक एप का उपयोग करके वे लोग
अपने सामूहिक वनाधिकार की सीमा कैसे पता कर सकते हैं। स्थानीय लोगों द्वारा वन
विभाग से काफी समय से सामूहिक सीमा का नक्शा मांगने के बावजूद विभाग नक्शा नहीं दे
रहा था क्योंकि इससे लोग अपने सामूहिक वन क्षेत्र की सीमा निश्चित करके उसका ठीक
से लाभ उठा सकते हैं। अब ये लोग गूगल एप की मदद से खुद ही नक्शा बना सकते हैं।
गूगल एप से सीमांकन बहुत ही सटीक हो जाता है, सैकड़ों
मीटर में 2-3 मीटर ही ऊपर-नीचे होता है।
हमने प्रशिक्षण समूह का एक व्हाट्सएप ग्रुप भी बनाया था जिसमें वे जानकारियों
के लिए आपस में बात करते थे, एक-दूसरे से जानकारी साझा
करते,
सवाल करते थे। जब किसी भी फल, वनस्पति
या जीव के बारे में उन्हें जानना होता वे उसकी फोटो ग्रुप में भेज देते थे। इस
ग्रुप में 22-23 साल का एक बहुत ही होशियार लड़का था लेकिन अंग्रेज़ी ना आने के कारण
वह दसवीं में फेल हो गया था। ग्रुप में जब भी कोई इस तरह की फोटो भेजता तो वह
तुरंत ही उसका ठीक-ठीक वैज्ञानिक नाम बता देता। यदि किसी भी वनोपज का वैज्ञानिक
नाम मालूम हो तो इससे उसके बारे में बहुत कुछ पता किया जा सकता है। जैसे उसके
क्या-क्या उपयोग हैं, उसका व्यापार कहां है, उसका बाज़ार कहां अधिक है, किस प्रक्रिया से उस वनोपज का
मूल्यवर्धन किया जा सकता है। इस युवक के तुरंत नाम बताने पर मुझे आश्चर्य हुआ तो
मैंने उससे पूछा कि तुम यह कैसे पता कर रहे हो। तो उसने बताया कि प्रशिक्षण में जब
स्मार्टफोन का उपयोग करना सिखाया गया तो हमने यह भी समझना शुरू किया कि अन्य गूगल
एप्स क्या हैं। गूगल फोटो और गूगल लेंस एप के बारे में पता चला। इसमें किसी भी
प्राणी या वनस्पति का फोटो डालो तो तुरंत ही उसका वैज्ञानिक नाम मिलने की संभावना
होती है। आज से दस साल पहले तक गूगल के पास लगभग दस अरब फोटो संग्रहित थे, जो अब शायद कई अरब होंगे। इस संग्रह में हरेक किस्म की तस्वीरें हैं, जिनमें से शायद पांच से दस अरब चित्र पशु-पक्षियों, कीटों, वनस्पतियों वगैरह के होंगे।
एक नई ज्ञान प्रणाली का बड़े पैमाने पर विकास विकास हुआ है, जिसे कृत्रिम बुद्धि कहते हैं। तस्वीर डालने पर गूगल का शक्तिशाली सर्च इंजन
अपने भंडार से सबसे नज़दीकी चित्र ढूंढकर उस तस्वीर सम्बंधी जानकारी, वैज्ञानिक नाम वगैरह बता देता है। इसके बारे में उस युवक ने खुद से सीख लिया
था और जानकारियां व्हाट्सएप ग्रुप और अपने अन्य साथियों को दे रहा था। अब गढ़चिरौली
के वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक भी उस युवक को किसी पौधे का नाम ढूंढकर बताने को
कहते हैं। जैसा कि मैनार्ड स्मिथ कहते हैं, ऐसी
नई ज्ञान प्रणाली लोगों के हाथों में आने से सारे लोगों के पास वि·ा का समस्त ज्ञान पहुंचने की ओर कदम बढ़ रहे हैं।
किसी खाद्य पदार्थ में या हमारे आसपास कीटनाशकों की कितनी मात्रा मौजूद है यह
जानकारी भी शासन द्वारा लोगों को नहीं दी जा रही है। अब तक, किसी भी चीज़ में कीटनाशक की मात्रा पता लगाने के लिए स्पेक्ट्रोफोटोमीटर चाहिए
होता था। स्पेक्ट्रोफोटोमीटर तो कुछ ही आधुनिक प्रयोगशालाओं में उपलब्ध था, जैसे किसी कृषि महाविद्यालय या इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस में। लेकिन यह आम
लोगों की पहुंच में नहीं था। इसलिए पर्यावरण में मौजूद कीटनाशक की मात्रा पता करना
आम लोगों के लिए मुश्किल था। कीटनाशकों से काफी बड़े स्तर पर जैव-विविधता की हानि
हुई है। इस सम्बंध में मेरा अपना एक अनुभव है। मुझे और मेरे पिताजी को पक्षी
निरीक्षण का शौक था। तो मैंने बचपन (लगभग 1947) में ही पक्षियों की पहचान करना सीख
लिया था। तब हमारे यहां कीटनाशक बिलकुल नहीं थे और उस वक्त (1947-1960) हमारे घर
के बगीचे और पास की छोटी-छोटी पहाड़ियों पर प्रचुर जैव-विविधता थी और काफी संख्या
में पक्षी थे। जैसे-जैसे कीटनाशक भारत में फैले, पक्षी
बुरी तरह तबाह हुए। उस समय की अपेक्षा अब उस पहाड़ी पर पांच-दस प्रतिशत ही
प्रजातियां दिखाई पड़ती हैं, बाकी सारी समाप्त हो गई हैं
या उनकी संख्या बहुत कम हो गई है।
सवाल है कि कीटनाशक कितनी मात्रा में है यह कैसे जानें? शासन तो लोगों को इसकी जानकारी ना मिले इसके लिए कार्यरत है। 1975-76 में
मैसूर के सेंट्रल फूड टेक्नॉलॉजी रिसर्च इंस्टीट्यूट में जीवन के उद्विकास
व्याख्यान के लिए मेरा जाना हुआ। उनका कीटनाशक सम्बंधी एक विभाग था। वहां के प्रमुख
ने बताया कि मैसूर के बाज़ार में जो खाद्य पदार्थ मिलते हैं उनमें कितनी मात्रा में
कीटनाशक हैं हम इसका तो पता करते हैं, लेकिन हमें कहा गया है
कि इन नतीजों को लोगों को बिलकुल नहीं बताना है। आज तक शासन लोगों से इस जानकारी
को छुपाना चाहता है।
लेकिन अब,
कीटनाशक की मात्रा पता लगाने वाले स्पेक्ट्रोफोटोमीटर जैसा
एक यंत्र बाज़ार में उपलब्ध है जिसे खरीदा जा सकता है। हालांकि इसकी कीमत (20-25
हज़ार रुपए) के चलते आम लोग अब भी इसे नहीं खरीद सकते लेकिन एक समूह मिलकर या कोई
संस्था इसे खरीद सकती है और कई लोग मिलकर उपयोग कर सकते हैं। बैंगलुरु के तुमकुर
ज़िले में शाला शिक्षकों का एक संगठन है तुमकुर साइंस फोरम। इस फोरम के एक
प्रोजेक्ट के तहत वे इस यंत्र की मदद से कई स्थानों, खाद्य
व पेय पदार्थों में कीटनाशकों का पता लगा रहे हैं। यह जानकारी वे लोगों के लिए
उपलब्ध करा देंगे। आजकल इंटरनेट आर्काइव्स नामक एक वेबसाइट पर तमाम तरह की
जानकारियां अपलोड की जा सकती हैं, जिसे कोई भी देख-पढ़ सकता है।
इस तरह इस नई ज्ञान प्रणाली से कुछ लोगों का ही ज्ञान पर एकाधिकार खत्म हो रहा है।
लोग इस तरह की पड़ताल खुद कर सकते हैं।
अब तक यह स्पष्ट हो गया है कि जो कुछ
शासन की मंशा है वह पर्यावरण संरक्षण पूरा नष्ट करेगी। इसका असर जैव-विविधता पर भी
होगा। लेकिन जैसा कि अब तक की बातों में झलकता है, हमारे
पास भारत की जैव-विविधता सम्बंधी डैटा बहुत सीमित है। इसका एक बेहतर डैटाबेस बन
सकता था यदि पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर बनाने का काम ठीक से किया जाता, लेकिन अफसोस,
यह ठीक से नहीं किया गया। इसलिए हमारे पास बहुत ही सीमित
जानकारी है,
जो चुनिंदा अच्छे शोध संस्थाओं ने अपने खुद के अध्ययन करके
शोध पत्रों के माध्यम से लोगों को उपलब्ध कराई है। इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस के
अध्ययनों में सामने आया है कि जैव-विविधता कम हो रही है। इस संदर्भ में यह
अधिसूचना और भी खतरनाक है, लेकिन यह भी सीमित रूप से ही
कहा जा सकता है क्योंकि हमारी जैव-विविधता के बारे में जानकारी ही अधूरी है।
अच्छी विज्ञान शिक्षा के प्रयास में हम सारे लोग काफी कुछ कर सकते हैं। इस
दिशा में शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे लोग अपने-अपने स्थानों की पंचायत, नगर पालिका या नगर निगम में प्रयत्न करके उपरोक्त जैव-विविधता प्रबंधन समिति
का प्रस्ताव रख सकते हैं और जैव-विविधता रजिस्टर बना सकते हैं। इससे जैव-विविधता
के बारे में बहुत ही समृद्ध जानकारी उपलब्ध होगी। और यह बनाना आसान है। गूगल फोटो
या गूगल लेंस की मदद से किसी भी जगह की वनस्पति या जीव के नाम और जानकारी पता चल
सकती है। इस तरह अब तक अर्जित ज्ञान को फैलाने के साथ-साथ बच्चे-युवा खुद अपने
ज्ञान का निर्माण कर सकते हैं। स्कूल के स्तर पर भी शालाएं पीपुल्स बायोडायवर्सिटी
रजिस्टर बनाने में सहयोग कर सकती हैं और बना सकती हैं। गढ़चिरौली ज़िले और कई अन्य
जगहों पर कई स्कूलों में इस तरह का काम किया जा रहा है, कई
स्कूलों ने बहुत अच्छे से रजिस्टर बनाए हैं। इससे बच्चे दस्तावेज़ीकरण की प्रक्रिया
भी सीख सकते हैं। और इन दस्तावेज़ों के आधार पर जैव-विविधता का संरक्षण कैसे किया
जाए इसके बारे में पता कर सकते हैं।
अफसोस की बात है कि भारत को छोड़कर
बाकि सभी देश ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से निपटने के लिए कुछ ना कुछ कर रहे हैं।
अधिक मात्रा में कोयले जैसे र्इंधनों का उपयोग करने वाले देश चीन ने भी अब साल
2050 तक कोयला जलाना बंद करना तय किया है। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प के जाने
और बाइडेन के आने से अमरीका में कोयला और पेट्रोलियम जैसे र्इंधन का इस्तेमाल कम
होने की आशा है। केवल भारत ही कोयले-पेट्रोलियम का उपयोग बढ़ाता जा रहा है। माना कि
हमें भी विकास और बदलाव की ओर जाना है, लेकिन किस कीमत पर। इस
बारे में हमें स्वयं ही ज्ञान संपन्न होकर कदम उठाने होंगे।
लोगों में एक बड़ी गलतफहमी व्याप्त है कि विकास (या उत्पादन) और पर्यावरण इन दो
के बीच प्रतिकूल (या विरोधाभासी) सम्बंध है। एक को बढ़ाने से दूसरा प्रभावित होगा।
हमारे सामने कई ऐसे राष्ट्रों के उदाहरण हैं जो बहुत उच्छा उत्पादन कर रहे हैं और
उतनी ही अच्छी तरह से पर्यावरण की देखभाल भी कर रहे हैं। जैसे जर्मनी, स्विटज़रलैंड,
डैनमार्क, स्वीडन। ये राष्ट्र उद्योगों
के मामले में विश्व में अग्रणी हैं। आज भारत यह बातें करता है कि हमने उत्पादन
बढ़ाया है लेकिन जिन देशों को हम पिछड़ा मानते थे (जैसे बांग्लादेश) उनका उत्पादन
भारत से ज़्यादा है। भारत में जो हो रहा है, वह
केवल पर्यावरण नष्ट करने वाले कई बहुत ही चुनिंदा लोगों के हित में हो रहा
है। वियतनाम, जिसका
आबादी घनत्व भारत से ज़्यादा है, जो कई युद्धों के कारण बर्बाद
हुआ,
जहां अमरीका और फ्रांस ने मिलकर 1955-75 के दौरान विनाश
किया,
आज वह उद्योग में भारत से थोड़ा आगे ही है और पर्यावरण
सम्बंधी सूचकांक में भी हमसे आगे है।
इन नई ज्ञान प्रणाली का उपयोग कर लोग सक्षम हो सकते हैं और शासन को चुनौती देने के लिए तैयार हो सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://static.toiimg.com/thumb/msid-77882423,width-1200,height-900,resizemode-4/.jpg
नोवावैक्स कंपनी ने कोविड-19 के खिलाफ बनाए अपने टीके की
प्रभाविता जांचने के लिए लंबे समय से प्रतीक्षित तृतीय चरण के मानव परीक्षण को
यू.एस में जल्द ही शुरू करने की घोषणा की है। इसका तृतीय चरण का मानव परीक्षण
युनाइटेड किंगडम में भी किया जाना है, जिसके लिए 15,000 से अधिक प्रतिभागियों ने
नामांकन भी कर दिया है। यूके के परीक्षण परिणामों के आधार पर नोवावैक्स युरोपीय
नियामक से अनुमोदन का आवेदन करेगी। अध्ययन के परिणाम अभी प्रतीक्षित हैं।
पर्याप्त मात्रा में टीका ना बना पाने के
कारण कंपनी ने अमेरिका में बड़े स्तर पर प्रस्तावित अपना तृतीय चरण का मानव परीक्षण
कई बार स्थगित किया था, लेकिन अब इसे शुरू करने की तैयारी में हैं। गौरतलब है कि
नोवावैक्स कंपनी एक समय काफी संकट में थी,
और नोवावैक्स को टीका
तैयार करने के लिए अमरीकी सरकार और कोलीशन फॉर एपिडेमिक प्रीपेयर्डनेस इनोवेशन ने
दो अरब डॉलर की राहत राशि दी है। द्वितीय चरण के परीक्षण में इस टीके के परिणाम
आशाजनक थे। लेकिन कंपनी के टीका बनाने के इतिहास को देखें तो पिछले 30 सालों में
कंपनी को किसी भी टीके के लिए अनुमोदन नहीं मिला है। तो क्या इस महामारी के टीके
के लिए कंपनी अनुमोदन ले पाएगी?
नोवावैक्स द्वारा तैयार टीका प्रोटीन
आधारित उन दो टीकों में से एक है जिस पर अमेरिकी सरकार ने अरबों डॉलर खर्च किए हैं, और
जो प्रभाविता परीक्षण के चरण में पहुंचा है। इस टीके में सार्स-कोव-2 के स्पाइक
प्रोटीन की प्रतिलिपियों के साथ सूक्ष्म लिपिड कण हैं। कोविड-19 के अन्य टीकों की
तरह इस टीके के लिपिड में पॉलीमर पॉलीएथिलीन ग्लाइकॉल नहीं है, जो
एलर्जी की होने की संभावना को हटाता है। इसकी बजाय इसमें प्रतिरक्षा बढ़ाने वाला
यौगिक सैपोनिन है।
नोवावैक्स का यह प्लेसिबो-नियंत्रित
परीक्षण अमेरिका के 108 स्थानों और मैक्सिको के सात स्थानों पर करने की योजना है
जिसमें 30,000 प्रतिभागियों में से दो तिहाई प्रतिभागियों को वास्तविक टीके दिए
जाएंगे।
कंपनी यह मानती है कि जब फाइज़र और
बायोएनटेक द्वारा तैयार दो ऐसे टीके उपलब्ध हैं जिनकी प्रभाविता 90 प्रतिशत से
अधिक पाई गई है और जिन्हें खाद्य और औषधि प्रशासन द्वारा आपातकालीन उपयोग के लिए
मंज़ूरी भी प्राप्त है, तो संभव है कि लोग इस परीक्षण में नामांकन करने में हिचकें।
कारण है कि लोग प्लेसिबो नियंत्रित परीक्षण में प्लेसिबो मिलने की संभावना का या
नोवावैक्स के कम सुरक्षित होने की संभावना का जोखिम क्यों लेंगे।
वैसे नोवावैक्स की तैयारी है कि यदि किसी जगह पर प्रतिभागी ना मिलें तो वे परीक्षण दूसरे स्थान पर शुरू कर लें। हालांकि वे स्वीकारते हैं कि 30,000 प्रतिभागियों का नामांकन हासिल करना मुश्किल है। लेकिन कई परोपकारी लोग हैं जो बेहतर टीका तैयार करने में योगदान देना चाहते हैं। तो वे लोग तो इस परीक्षण में शामिल होंगे ही। ऐसे कई लोग नामांकन कर भी चुके हैं। लेकिन जैसे-जैसे समय निकलता जाएगा लोगों को शामिल करना और मुश्किल होता जाएगा।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_image_-1280w__no_aspect/public/Novavax_vaccine_update_1280x720.jpg?itok=g9kFd7ca