वनीकरण का मतलब महज़ पेड़ लगाने से नहीं है

संयुक्त राष्ट्र ने 2021-2030 के दशक को पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली का दशक घोषित किया है। और कई देशों ने वित्तदाताओं की मदद से उजाड़ जंगलों को बहाल करने के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम भी शुरू कर दिए हैं। पिछले हफ्ते कॉप-27 में, युरोपीय संघ और 26 देशों ने जलवायु परिवर्तन को धीमा करने के लिए वनों को बढ़ावा देने के लिए 16 अरब डॉलर खर्चने का वादा किया है चूंकि पेड़ कार्बन सोखकर जलवायु परिवर्तन को थाम सकते हैं। इसका एक बड़ा हिस्सा पुनर्वनीकरण पर खर्च किया जाएगा। लेकिन इस बारे में मालूमात बहुत कम है कि इसे कैसे किया जाए।

विश्व संसाधन संस्थान के अनुसार वर्ष 2000 से 2020 के बीच वन क्षेत्र में कुल 13 लाख वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई है, जिसमें चीन और भारत अग्रणि रहे हैं। लेकिन इन नए वनों में से लगभग 45 प्रतिशत प्लांटेशन हैं, यानी इन वनों में एक ही प्रजाति के वृक्षों का वर्चस्व है। प्राकृतिक वनों की तुलना में ये जैव विविधता और दीर्घकालिक कार्बन भंडारण के लिहाज़ा कम लाभप्रद हैं।

कई पुनर्वनीकरण परियोजनाएं  इस बात पर ज़्यादा ध्यान देती हैं कि कितने पेड़ लगाए गए और इन बातों पर कम ध्यान देती हैं कि कितने जीवित बचे, कितने स्वस्थ हैं, उन वनों में कितनी विविधता है, या वे कितना कार्बन सोखते हैं। दरअसल, हम इस बारे में बहुत कम जानते हैं कि किस तरह का वनीकरण कारगर है, कहां कारगर है, और क्यों।

पिछले हफ्ते प्रकाशित फिलॉसॉफिकल ट्रांज़ेक्शन ऑफ रॉयल सोसाइटी का एक विशेषांक इस बारे में मार्गदर्शक है। इनमें से एक अध्ययन दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया की वनीकरण परियोजनाओं पर गहराई से नज़र डालता है जो इसकी चुनौतियां उजागर करती हैं। यूके सेंटर फॉर इकॉलॉजी एंड हाइड्रोलॉजी की वन पारिस्थितिकीविद लिंडसे बैनिन और उनके साथियों ने इस बाबत डैटा का अध्ययन किया कि 176 पुनर्विकसित स्थलों की अलग-अलग मिट्टी और जलवायु में अलग-अलग तरह के पेड़-पौधे कितनी अच्छी तरह से पनपे। पाया गया कि कुछ स्थानों पर, पांच में से मात्र एक पौधा जीवित रहा, जबकि औसतन मात्र 44 प्रतिशत पौधे ही 5 वर्ष से अधिक जीवित रह पाए।

अलबत्ता, इस अध्ययन ने एक उत्साहजनक बात दर्शाई है: परिपक्व पेड़ों के पास रोपे गए पौधों में से औसतन 64 प्रतिशत पौधे जीवित रहे, शायद इसलिए क्योंकि ये जगहें उतनी बर्बाद नहीं हुई थीं। अन्य अध्ययन बताते हैं कि बागड़ लगाकर मवेशियों को बाहर रखने और मिट्टी की हालत में सुधार करने जैसे उपायों से भी पौधों के जीवित रहने की संभावना बढ़ सकती है, लेकिन ये उपाय महंगे हो सकते हैं।

एकाध ऐसी प्रजातियों के पौधे लगाने से भी मदद मिल सकती है जो अपने आप आसानी से फल-फूल-फैल जाती हैं। ये प्रजातियां अन्य प्रजातियों के पनपने का मार्ग प्रशस्त करती हैं। चियांग माई विश्वविद्यालय के पादप पारिस्थितिकीविद स्टीफन इलियट और पिमोनरेट तियानसावत के अध्ययन का निष्कर्ष है कि प्रारंभिक प्रजातियां ऐसी होनी चाहिए जो उस क्षेत्र की स्थानीय हों, जो खुले क्षेत्रों में पनपती हों, तेज़ी से बढ़ती हों, खरपतवार को पनपने से रोकती हों और बीज फैलाने वाले पशु-पक्षियों को आकर्षित करती हों। ऑस्ट्रेलिया में एक झाड़ी, (ब्लीडिंग हार्ट – होमलैंथस नोवोगुइनेंसिस) का उपयोग प्रभावी स्टार्टर के तौर पर किया जाता है। इसकी जड़ें मिट्टी को पोला करती हैं और इसकी पत्तियां मिट्टी में पोषक तत्व जोड़ती हैं, जो अन्य प्रजातियों को वहां पनपने में मदद करता है। और इसके गूदेदार हरे फल बीज फैलाने वाले जानवरों को आकर्षित करते हैं।

पौधारोपण के लिए सही जगह का चुनाव भी महत्वपूर्ण है। वेगनिंगेन युनिवर्सिटी एंड रिसर्च के पारिस्थितिकीविद लुइस कोनिग और कैटरीना जेकोवैक ने 25 वर्षों तक ब्राज़ील की बंद हो चुकी टिन खदानों के कारण बंजर हो चुकी भूमि में पुर्नवनीकरण के प्रयासों का अध्ययन किया। वे बताते हैं कि डंपिंग एरिया, जहां की मिट्टी अनुपजाऊ और ज़हरीली हो गई हो वहां पेड़ों को वृद्धि करने में कठिनाई होती है। खनन गड्ढों और बचे-खुचे जंगलों के पास पौधारोपण के परिणाम बेहतर रहे।

एक किफायती तरीका हो सकता है कि किसी संपूर्ण क्षेत्र को पौधों से पूरा पाटने की बजाय छोटे-छोटे भूखंडों में पौधारोपण करें जो जंगल को पनपाने का काम करेंगे और उनके चारो ओर जंगल अपने-आप फैलेगा। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय की एंडी कुलिकोव्स्की और कैरेन होल द्वारा कोस्टा रिका के 13 प्रायोगिक स्थलों के अध्ययन में पाया गया कि किसी जगह पर एक या चंद प्रजाति के पौधों लगाने की तुलना में यह तरीका विविधतापूर्ण जंगल के पुन: उगने में बेहतर हो सकता है। इसे एप्लाइड न्यूक्लिएशन कहा गया है। इस तरीके से पेड़ों को अधिक जगह के साथ-साथ अधिक प्रकाश मिलता है।

वैसे जंगल अपने दम पर भी काफी कुछ बहाल कर सकते हैं। वन पारिस्थितिकीविद रॉबिन शेडॉन 1997 से उत्तरी कोस्टा रिका के पूर्व में चारागाह रहे एक उजाड़ भू-क्षेत्र की निगरानी कर रहे थे, जहां एक भी पेड़ नहीं लगाया गया था। अब, वहां एक स्वस्थ प्राकृतिक जंगल है।

योजना बनाने में एक महत्वपूर्ण कारक यह भी है कि पुनर्वनीकरण स्थानीय लोगों को कैसे प्रभावित करता है और स्थानीय लोग पुनर्वनीकण को कैसे प्रभावित करते हैं। पुनर्वनीकरण खेती के लिए उपलब्ध भूमि में कमी ला सकता है, लेकिन स्थानीय समुदाय को इसका मुआवज़ा दिया जा सकता है – और नया जंगल उन्हें इमारती लकड़ी, शिकार के अवसर और आय के अन्य स्रोत दे सकता है। यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पुनर्वनीकरण स्थानीय लोगों के लिए फायदेमंद हो।

यॉर्क विश्वविद्यालय के संरक्षण विज्ञानी रॉबिन लोवरिज और एंड्रयू मार्शल ने पूर्वी तंज़ानिया में पुनर्वनीकरण परियोजनाओं के अध्ययन में पाया कि वह जंगल बेहतर हाल में था और लोग अधिक खुश थे जहां प्रबंधन समुदाय के लोग कर रहे थे।

विषय विशेषांक के सह-संपादक मार्शल का कहना है कि कई अन्य मुद्दों पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है। जैसे बेलें और काष्ठ-लताएं – जो वनों को तूफानों से बचा भी सकती हैं और प्रकाश को रोककर पुनर्वनीकरण को थाम भी सकती हैं। इसी प्रकार से परियोजनाओं की सफलता का पैमाना और प्रबंधन के तौर-तरीके के मुद्दे भी शामिल हैं। इनके जवाब स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करेंगे।

युनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के वन पारिस्थितिकीविद सिमोन लुईस पुनर्वनीकरण की गति को लेकर उत्साहित हैं लेकिन नवीन जंगल की गुणवत्ता को लेकर चिंतित हैं। चिंता का एक विषय यह है कि जहां देश वनों की क्षति को कम करने के कठिन लक्ष्यों को हासिल करने की जीतोड़ कोशिश कर रहे हैं, वहीं पुराने जंगलों को अब भी काटा जा रहा है, और उनकी जगह नए जंगल अन्यत्र लगाए जा रहे हैं। इसका मतलब है कि कुल मिलाकर वनों में तो कोई कमी नहीं आ रही है लेकिन अधिक जैव विविधिता और अधिक कार्बन सोखने की क्षमता वाले वनों की जगह कम जैव विविधता और कम कार्बन सोखने की क्षमता वाले वन लेते जा रहे हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://media.istockphoto.com/id/951136424/photo/beautiful-path-in-forest-with-lush-green-trees.jpg?s=170667a&w=0&k=20&c=L6l0XENgkVaiPd5QL3uG3bjUphEnDEmwJ6A9qOuFHxI=

27वां जलवायु सम्मेलन: आशा या निराशा

हाल ही में मिस्र में आयोजित 27वें जलवायु सम्मेलन (कॉप-27) का समापन हुआ। इस सम्मेलन में जीवाश्म ईंधन के उपयोग को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने के प्रयासों की धीमी गति को लेकर शोधकर्ताओं में काफी निराशा देखने को मिली। हालांकि, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की भरपाई के लिए ‘हानि व क्षतिपूर्ति’ (लॉस एंड डैमेजेस) फंड के निर्माण ने निम्न और मध्यम आय देशों में एक नई उम्मीद भी जगाई। यह फंड इन देशों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में मदद करेगा।

सम्मेलन के अंतिम दिन जारी किए गए 10 पन्नों के दस्तावेज़ में कहा गया है कि वैश्विक तापमान वृद्धि को उद्योग-पूर्व स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस अधिक तक सीमित रखने के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को तेज़ी से कम करना होगा। लेकिन जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने के आह्वान का तेल उत्पादक देशों ने जमकर विरोध किया; कुछ प्रतिनिधियों ने तो कार्बन-मुक्ति की धीमी रफ्तार को भी संतोषप्रद ठहराने की कोशिश की। कई ने जीवाश्म ईंधन के मामले में प्रगति की कमी के लिए रूस-यूक्रेन युद्ध को ज़िम्मेदार ठहराया। कई विशेषज्ञों का मत था कि तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री तक सीमित रखने का समय बीतता जा रहा है और यह तभी हासिल हो सकता है जब कार्बन डाईऑक्साइड को वातावरण से हटाने के ज़ोरदार प्रयास किए जाएं।

इस बार सम्मेलन में पूरे 45,000 लोगों ने पंजीकरण किया जिसके चलते कई लोगों ने सवाल उठाया कि क्या आपात स्थिति को संभालने की दृष्टि से सम्मेलन का यह प्रारूप सही है। नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की महानिदेशक सुनीता नारायण सम्मेलन के दौरान हुई बातचीत को वास्तविकता से काफी दूर मानती हैं। नारायण के अनुसार सम्मेलन का यह प्रारूप लोगों को साथ लाने और विचार साझा करने का मौका तो प्रदान करता है लेकिन मुख्य उद्देश्य – विश्व नेताओं पर ठोस कार्यवाही के लिए दबाव बनाना और उन्हें जवाबदेह ठहराना – से भटकाता है। यह सम्मेलन एक तरह के भव्य जलसे में बदलता नज़र आ रहा है। सम्मेलन में पहली बार आए शोधकर्ता और कार्यकर्ता सरकारी वार्ताकारों द्वारा दस्तावेज़ के एक-एक शब्द पर अंतहीन बहस को लेकर चिंतित दिखे।

वित्तीय सहायता के लिए संघर्ष

निम्न-मध्य आय देशों और चीन के प्रतिनिधि ‘हानि व क्षतिपूर्ति’ कोश के निर्माण को लेकर काफी आश्वस्त थे क्योंकि इस मुद्दे को सम्मेलन के आरंभ में एजेंडा में शामिल किया गया था। इस कोश का उपयोग जलवायु परिवर्तन से प्रभावित देशों के लिए किया जाएगा। जैसे, सोमालिया जहां 70 लाख लोग भुखमरी का सामना कर रहे हैं या पाकिस्तान जहां इस वर्ष बाढ़ से लगभग 30 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है।

वैसे तो, अमेरिकी जलवायु दूत जॉन केरी ऐसे किसी कोश का विरोध करते हुए सम्मेलन में पहुंचे थे। उनका कहना था कि मौजूदा फंड से ही जलवायु सम्बंधी नुकसान की भरपाई की जा सकती है। इसके अलावा अमेरिकी वार्ताकारों ने उच्च ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जकों को अपने अतीत के उत्सर्जन का दायित्व स्वीकार करने के विचार का भी विरोध किया। उनको डर है कि इस विचार को स्वीकार करने का मतलब खरबों डॉलर का भुगतान करना होगा।

शुरुआत में युरोपीय संघ ने भी इस विचार को लेकर आशंका ज़ाहिर की लेकिन अंतत: अपना विचार बदल दिया जिसके चलते अमेरिका को दबाव का सामना करना पड़ा। कोश में कुल कितनी राशि जमा की जाएगी और विभिन्न देश कितना योगदान देंगे यह आने वाले सम्मेलन पर छोड़ दिया गया है।  

यह पहला जलवायु सम्मेलन था जिसके अंतिम दस्तावेज़ में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोश (आईएमएफ) और विश्व बैंक जैसी बड़ी वित्तीय संस्थाओं की नीतियों में सुधार की भी बात कही गई है। ये संस्थाएं वैश्विक अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। फिलहाल, वित्तीय संकट में फंसे देशों को कर्ज़ देने के लिए आईएमएफ एक खरब डॉलर की राशि देता है लेकिन इसका मामूली हिस्सा ही जलवायु परिवर्तन सम्बंधी होता है।

उर्जा संकट का प्रभाव

सम्मेलन में रूस-यूक्रेन युद्ध से उत्पन्न उर्जा संकट चर्चा में रहा। प्राकृतिक गैस की ऊंची कीमतों ने वैश्विक उर्जा बाज़ार को प्रभावित किया है और कुछ युरोपीय देशों को प्राकृतिक गैस के नए स्रोत खोजने तथा अस्थायी रूप से कोयले का उपयोग जारी रखने को बाध्य किया है। वैसे इंडोनेशिया में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन में घोषित समझौते से कॉप-27 की बात आगे बढ़ी जहां धनी देशों ने इंडोनेशिया को कोयला उपयोग से दूर करने के लिए 20 अरब डॉलर देने पर सहमति जताई है। इसके अलावा जर्मनी ने हरित हाइड्रोजन और तरलीकृत प्राकृतिक गैस के निर्यात को आगे बढ़ाने के लिए मिस्र के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इसी तरह कुछ अन्य सरकारें और कंपनियां भी सेनेगल, तंज़ानिया और अल्जीरिया जैसे देशों में इस तरह की परियोजनाएं शुरू कर रही हैं।

गौरतलब है कि युरोपीय नेता इन उपायों को अल्पकालिक तिकड़में मानते हैं जिनका प्रभाव उनकी दीर्घकालिक प्रतिबद्धताओं पर नहीं पड़ेगा। लेकिन नारायण के अनुसार नज़ारा अच्छा नहीं है; इस संकट से पूर्व समृद्ध देश कह रहे थे कि कम आय वाले देशों में जीवाश्म-ईंधन परियोजनाओं को वे पैसा नहीं देंगे लेकिन अब वे इन देशों से आपूर्ति बढ़ाने के लिए कह रहे हैं। इन तनावों का कॉप-27 सम्मेलन पर काफी प्रभाव पड़ा और जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने की बात को अंतिम दस्तावेज़ से हटा दिया गया और कम-उत्सर्जन प्रणालियों की बात रखी गई। संभवत: भविष्य में इसका उपयोग प्राकृतिक-गैस के विकास को सही ठहराने के लिए किया जाएगा। इसके चलते आने वाले दिनों में जीवाश्म ईंधन पर लगाम लगाने सम्बंधी बातचीत धरी की धरी रह जाएगी।

खाद्य सुरक्षा पर ध्यान

कॉप-27 सम्मेलन के समझौते  में कहा गया है कि ‘खाद्य सुरक्षा और भुखमरी को खत्म करना’ एक प्राथमिकता है। यदि जल तंत्रों की रक्षा और संरक्षण किया जाए तो समुदाय जलवायु परिवर्तन का सामना करने में ज़्यादा सक्षम होंगे। ग्लासगो जलवायु समझौते में कृषि, भोजन या पानी का कोई ज़िक्र नहीं किया गया था। कई विशेषज्ञों ने कहा है कि कम से कम शब्दों के स्तर पर तो प्रगति हुई है लेकिन वास्तविक कार्रवाइयों की कमी खलती है।     

कॉप-26 में सरकारों ने खाद्य प्रणालियों के लिए बहुत कम निधि रखी थी। जबकि इसके विपरीत बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने छोटे किसानों को जलवायु परिवर्तन के तत्काल और दीर्घकालिक प्रभावों से बचाने के लिए चार वर्षों में 1.4 अरब डॉलर खर्च करने का संकल्प लिया था। कॉप-27 के दस्तावेज़ में जलवायु सम्बंधी अंतर्सरकारी पैनल के इस निष्कर्ष का भी कोई ज़िक्र नहीं है कि वैश्विक उत्सर्जन में 21-37 प्रतिशत योगदान खाद्य प्रणाली का है। इस निष्कर्ष के मद्देनज़र जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए ‘जैविक खेती’ और भूमि उपयोग परिवर्तन पर विचार करना भी ज़रूरी है जिसे इस सम्मेलन में पूरी तरह अनदेखा कर दिया गया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.unesco.org/sites/default/files/styles/paragraph_medium_desktop/public/2022-10/COP27_logo_web.jpg?itok=nwgoAG9t

शनि के उपग्रह पर ड्रोन भेजने की तैयारी में नासा – प्रदीप

बीते चार-पांच दशकों में शनि का सबसे बड़ा चंद्रमा टाइटन आकर्षण का केंद्र रहा है। टाइटन पृथ्वी के अलावा सौरमंडल का इकलौता ऐसा पिंड है, जिसकी सतह पर नहरों, सागरों आदि की उपस्थिति के ठोस प्रमाण मिले हैं। विज्ञानियों का मानना है कि एक समय हमारी पृथ्वी टाइटन की तरह ही थी। टाइटन के वायुमंडल में बादलों की मौजूदगी और तड़ित की घटनाएं पृथ्वी जैसे मौसम का वायदा करती हैं। इसलिए वहां सूक्ष्मजीवी जीवन की मौजूदगी की पूरी संभावना है।

पृथ्वी से बाहर जीवन की मौजूदगी की जिज्ञासा में दुनिया भर की स्पेस एजेंसियां लंबे समय से टाइटन की ओर टकटकी लगाए बैठी हैं। इसी क्रम में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा टाइटन पर जीवन की संभावनाओं की पड़ताल के लिए ड्रैगनफ्लाई नामक ड्रोन भेजने की तैयारी में है। मिशन ड्रैगनफ्लाई को 2027 में लांच किया जाना है और 2034 में इसके टाइटन पर पहुंचने की उम्मीद है।

हाल ही में कॉर्नेल युनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की एक टीम ने टाइटन पर ड्रैगनफ्लाई की लैंडिंग साइट निर्धारित करने के लिए कैसिनी मिशन द्वारा ली गई तस्वीरों का विश्लेषण किया है ताकि ड्रैगनफ्लाई की लैंडिंग के लिए एक आदर्श स्थान चुना जा सके। अंतत: सेल्क क्रेटर के पास के साग्रीला टीले को चुना गया है।

दी प्लेनेटरी साइंस जर्नल में प्रकाशित शोधपत्र के प्रधान लेखक ली बोनेफाय का कहना है कि ड्रैगनफ्लाई टाइटन की विषुवत रेखा के सूखे इलाके में उतरेगा जहां बहुत ही ठंडे और घने वायुमंडल वाले हाइड्रोकार्बन का संसार है। कई बार वहां तरल मीथेन की बारिश होती है। लेकिन कई जगह धरती के रेगिस्तानों जैसी हैं, जहां रेत के टीले हैं, छोटे पहाड़ हैं और इम्पैक्ट क्रेटर भी हैं। अभी तक बहुत सारी जानकारियां (जैसे सेल्क क्रेटर का आकार और ऊंचाई) अनुमान ही हैं इसलिए इस सम्बंध में 2034 से पहले ज़्यादा से ज़्यादा सटीक जानकारी जुटाने की ज़रूरत है।

तकरीबन 85 करोड़ डॉलर के इस मिशन के तहत ड्रोन की मदद से टाइटन की सतह से नमूने एकत्रित कर उसकी संरचना समझने की कोशिश होगी। नासा को कैसिनी मिशन के दौरान ऐसे संकेत मिले थे कि टाइटन पर कुछ ऐसे कार्बनिक पदार्थ मौजूद हैं, जिन्हें जीवन के लिए ज़रूरी माना जाता है। तरल पानी की मौजूदगी का भी दावा किया गया था। ड्रैगनफ्लाई छोटी-छोटी उड़ानें भरेगा और विभिन्न स्थानों पर उतर कर वहां से नमूने इकट्ठा करेगा। इसकी उड़ानें आठ किलोमीटर तक की होंगी और यह कुल 175 किलोमीटर की उड़ान भरेगा। यह दूरी मंगल पर समस्त रोवरों द्वारा मिलकर तय की गई दूरी से दोगुनी होगी। उम्मीद है कि ड्रैगनफ्लाई टाइटन के सघन वायुमंडल को भेदकर उसकी बहुतेरी गुत्थियों से पर्दा उठाने में मददगार साबित होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://d3i6fh83elv35t.cloudfront.net/static/2019/12/dragonfly1-1024×576.jpg

एक लोकप्रिय पौधे का नाम बदलना – डॉ. किशोर पंवार

स्नेक प्लांट एक सजावटी पौधा है, जिसका उपयोग ऑफिस के अंदर और घर की हवा की गुणवत्ता सुधार हेतु आजकल बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। ऑनलाइन दुकानों पर भी यह पौधा खूब बिक रहा है। इसका एक नाम मदर-इन-लॉज़ टंग (mother-in-law’s tongue) भी है।

वनस्पति विज्ञान में इसे अभी तक सेंसिविएरिया ट्रायफेसिएटा  (Sansevieria trifasciata) के नाम से जाना जाता था। अब इस पौधे का नाम बदल दिया गया है। अब इसे ड्रेसीना ट्रायफेसिएटा (Dracaena trifasciata) कहा जाने लगा है।

लेकिन क्यों?

सवाल यह है कि पौधों के नाम आखिर बदले ही क्यों जाते हैं? जो चलन में है उन्हें ही चलने दें। लेकिन यहां बात चलन की नहीं है, सही होने की है। दरअसल, नाम बदलने के तीन कारण होते हैं –

पहला, सबसे पुराना नाम वह माना जाता है जो सबसे पहले प्रकाशित हुआ हो। यदि ऐसी कोई प्रामाणिक जानकारी मिलती है कि जो नाम आजकल चलन में है उससे पूर्व का भी कोई नाम प्रकाशित हुआ था, तो नए नाम को छोड़कर पुराना नाम अपना लिया जाता है।

दूसरा, यदि पौधे का जो नाम चलन में है, उस पौधे की पहचान ही गलत हुई हो, तो गलती को सुधारा जाता है।

नाम बदलने का तीसरा कारण यह है कि पौधे को नए सिरे से वर्गीकृत किया गया हो। दरअसल पूर्व के वर्गीकरणविदों ने पेड़-पौधों का जो नामकरण किया था उसका मुख्य आधार उनका रूप-रंग, आकार-प्रकार, फूलों की आपसी समानता आदि थे। यानी मुख्य रूप से आकारिकी आधारित वर्गीकरण था। फिर पादप रसायन शास्त्र, भ्रूण विज्ञान, आंतरिक संरचना, पुराजीव विज्ञान आदि के आधार पर पौधों को फिर से वर्गीकृत किया गया।

नाम बदलने का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है बबूल का। पहले इसे अकेसिया अरेबिका (Acacia arabica) कहते थे और फिर बदलकर अकेसिया निलोटिका (Acacia nilotica) कर दिया गया था। लेकिन एक बार फिर नाम बदला गया और बबूल हो गया वेचेलिया निलोटिका (Vachellia nilotica)

यहां यह बात गौरतलब है कि सामान्यत: वानस्पतिक नामों में दो पद होते हैं। इसे द्विनाम प्रणाली कहते हैं। इनमें से पहला पद (जैसे अकेशिया अथवा वेचेलिया) वंश या जीनस दर्शाता है और दूसरा पद (अरेबिका अथवा निलोटिका) प्रजाति बताता है। इसका मतलब है कि अकेशिया अरेबिका से बदलकर अकेशिया निलोटिका करने का मतलब था कि यह पौधा अभी भी उसी वंश (अकेशिया) में माना गया था लेकिन इसे बदलकर वेचेलिया निलोटिका करने का मतलब है कि इस पौधे को एक नए वंश में शामिल कर लिया गया है।

और अब तो ज़माना जीनोम अनुक्रमण और जेनेटिक सम्बंधों का है। जब से जिनोम अनुक्रमण ने वर्गीकरण के मैदान में कदम रखा है तब से चीज़ें बहुत बदल गई हैं। जीनोम अनुक्रमण (यानी किसी जीवधारी की संपूर्ण जेनेटिक सामग्री यानी डीएनए में क्षारों का क्रम पता लगाना) की मदद से जीवधारियों के बीच सम्बंध ज़्यादा स्पष्टता से सामने आते हैं और इसके आधार पर यह तय किया जा सकता है कि कौन-से पौधे या प्राणि ज़्यादा निकटता से सम्बंधित हैं। इस नई जानकारी के आधार पर वर्गीकरण में परिवर्तन स्वाभाविक है।

स्नेक प्लांट यानी मदर- इन-लॉज़ टंग के मामले में यही हुआ। वर्ष 2017 तक जिसे वनस्पति वैज्ञानिक सेंसेविएरिया ट्रायिफेसिएटा कहते थे, जीनोम अनुक्रमण से प्राप्त जानकारी के चलते उसे ड्रेसीना वंश में समाहित कर दिया गया है। कारण यह है कि सेंसेविएरिया प्रजातियों के जीनोम और ड्रेसीना वंश की प्रजातियों के जीनोम में काफी समानता देखी गई है।

ड्रेसीना एक बड़ा वंश है जिसमें लगभग 120 प्रजातियां शामिल हैं। सेंसेविएरिया वंश में करीब 70 प्रजातियां शामिल थीं और अब सबकी सब ड्रेसीना वंश में समाहित हो गई हैं। दोनों वंशों की अधिकांश प्रजातियां अफ्रीका, दक्षिण एशिया से लेकर उत्तरी ऑस्ट्रेलिया की मूल निवासी हैं।

ड्रेसिना ट्राइफेसिएटा मूल रूप से दक्षिण अफ्रीका, नाइजीरिया और कांगों तक पाया जाता है। इसमें कड़क हरी पत्तियां सीधी खड़ी लंबाई में वृद्धि करती है। पत्तियों के किनारे पीले होते हैं और पूरी पत्ती पर हल्के भूरे रंग के आड़े पट्टे बने होते हैं। पत्तियों की लंबाई 70 से 90 सेंटीमीटर और चौड़ाई 5 से 6 सेंटीमीटर होती है। और यह 2 मीटर तक लंबा हो सकता है।

नासा ने अपनी स्टडी में सिक बिल्डिंग सिंड्रोम के लिए ज़िम्मेदार 5 ज़हरीले रसायनों में से चार को फिल्टर करने में स्नेक प्लांट को उपयोगी पाया है। इसे घर के बाहर और अंदर दोनों जगह बड़े आराम से लगाया जा सकता है। हालांकि हवा को साफ करने की इसकी क्षमता बहुत ही धीमी है। अतः इस कार्य हेतु इसका उपयोग व्यावहारिक नहीं है।

इस हेतु दूसरा पौधा है सेंसिविएरिया सिलेंड्रिका, जिसे सिलेंड्रिकल स्नेक प्लांट, अफ्रीकन स्पीयर, सेंट बारबरास स्वॉर्ड कहते हैं। यह अंगोला का मूल निवासी है। इसमें पत्तियां 3 सेंटीमीटर तक मोटी और 2 मीटर तक लंबी, लगभग गोल, चिकनी और हरे रंग की होती हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/f/fb/Snake_Plant_%28Sansevieria_trifasciata_%27Laurentii%27%29.jpg

नींद क्यों ज़रूरी है? – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

ब मेरे जैसे अति-बुज़ुर्ग बच्चे हुआ करते थे तब हमें रात 8 बजे तक सो जाना पड़ता था। फिर सुबह 4 बजे उठकर मंजन करना, नहाना, फिर बचा-खुचा होमवर्क पूरा करना, नाश्ता करना और टिफिन बॉक्स लेकर स्कूल के लिए निकल जाना होता था।

स्कूल और खेलने के बाद हम शाम 6 बजे तक घर वापस आ जाते थे। वापिस आकर अपना होमवर्क करते, रेडियो सुनते, अखबार पढ़ते, रात का खाना खाते और रात 8 बजे तक बिस्तर पर गिरते और सो जाते। लेकिन अफसोस कि आजकल चीज़ें बदल गई हैं।

आईआईटी या आईआईएम जैसे पेशेवर संस्थानों में दाखिला पाने की चाह रखने वाले विद्यार्थियों के लिए सेवा निवृत्त प्रोफेसरों द्वारा चलाई जा रही कोचिंग क्लासेस (जो अल्सुबह – आम तौर पर सुबह 4 या 5 बजे) शुरू होती हैं, के चलते नींद का समय कम हो गया है जबकि यह उनके लिए ज़रूरी है।

अमेरिकन एकेडमी ऑफ स्लीप मेडिसिन ने सिफारिश की है कि 6-12 साल के बच्चों को रोज़ाना 9-12 घंटे की नींद लेनी चाहिए। और 13-18 साल के किशोरों के लिए रोज़ाना 8-10 घंटे की नींद ज़रूरी है।

लेकिन हम देख रहे हैं कि आजकल के बच्चों को इतनी नींद नहीं मिल रही है, क्योंकि वे पूरे दिन कक्षाओं में रहते हैं। और तो और, उनके ‘प्रशिक्षक’ भी पर्याप्त नींद नहीं ले पाते हैं, जो आम तौर पर 40-70 साल के होते हैं, और स्वस्थ जीवन के लिए उन्हें सात घंटे की नींद की ज़रूरत है।

हाल ही में डॉ. जे. एलन हॉब्सन ने नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक समीक्षा का आकर्षक शीर्षक दिया है: ‘नींद दिमाग की, दिमाग के द्वारा, दिमाग के लिए होती है’ (Sleep is of the brain, by the brain and for the brain)। इसमें वे बताते हैं कि हमारी नींद के दो चरण होते हैं। एक जिसे रैपिड आई मूवमेंट (REM) कहा जाता है, और दूसरा गैर-REM कहलाता है। REM नींद कुल नींद के लगभग 20 प्रतिशत समय होती है और इसमें सपने आते हैं, जबकि गैर- REM नींद कुल नींद के लगभग 80 प्रतिशत समय होती है और इसे सुदृढ़ता लाने, याददाश्त को मज़बूत करने और नई चीजें सीखने के लिए जाना जाता है।

पोषण और नींद

यूएस नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन की वेबसाइट मेडिसिन प्लस बताती है कि पोषण का सम्बंध स्वस्थ और संतुलित आहार लेने से है। भोजन और पेय आपको स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक ऊर्जा और पोषक तत्व प्रदान करते हैं। पोषण सम्बंधी इन बातों को समझने से आपके लिए भोजन के बेहतर विकल्प चुनना आसान हो सकता है।

यूएस का स्लीप फाउंडेशन बताता है कि आहार और पोषण आपकी नींद की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं, और कुछ फल और पेय आपके लिए आवश्यक नींद लेने को मुश्किल बना सकते हैं। कैल्शियम, विटामिन A, C, D, E और K जैसे प्रमुख पोषक तत्वों की कमी के कारण नींद की समस्या हो सकती है।

रात के भोजन में उच्च ग्लायसेमिक सूचकांक वाले कार्बोहाइड्रेट युक्त भोजन (जैसे, पॉलिश किया हुआ चावल या मैदा. शकर), शराब या तम्बाकू के सेवन से व्यक्ति उनींदा बन सकता है। यह बार-बार जगाकर आवश्यक नींद की अवधि कम कर सकता है।

स्लीप फाउंडेशन आगे बताता है कि हमें मेडिटेरेनियन आहार अपनाना चाहिए, जिसमें वनस्पति आधारित खाद्य, वसारहित मांस, अंडे और उच्च फाइबर वाले खाद्य पदार्थ शामिल हैं। ऐसा आहार न केवल व्यक्ति के हृदय की सेहत में सुधार करता है बल्कि नींद की गुणवत्ता में भी सुधार लाता है।

खुशी की यह बात है कि अधिकांश भारतीय भोजन मेडिटेरेनियन आहार का ही थोड़ा बदला हुआ रूप है। और हमें यह सलाह भी दी जाती है कि अच्छी नींद लेने के लिए पर्याप्त भोजन करना चाहिए। तो आइए हम कामना करते हैं कि सभी को स्वस्थ और ‘अच्छी’ नींद आए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://th-i.thgim.com/public/news/national/9oqf1w/article66188644.ece/alternates/FREE_1200/istock.JPG

परिवर्तनशील रोबोट नए हुनर सीखते हैं

क्कीसवीं सदी के कारखानों से लेकर शल्य क्रिया कक्ष तक छोटे-बड़े, हर आकार-प्रकार के रोबोट्स से भरते जा रहे हैं। कई रोबोट्स मशीन लर्निंग के ज़रिए गलती कर-करके नए कौशल सीख लेते हैं। लेकिन हालिया दिनों में एक नई विधि ने अलग-अलग तरह के रोबोट्स में इस तरह के कौशल स्थानांतरित करने में काफी मदद की है। इस तकनीक से उनको हर कार्य शुरू से सिखाने की आवश्यकता नहीं होती है। कॉर्नेजी मेलन युनिवर्सिटी के कंप्यूटर वैज्ञानिक और इस अध्ययन के प्रमुख ज़िन्गयू ल्यू ने इसे इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन मशीन लर्निंग में प्रस्तुत किया है।

रोबोट्स के बीच कौशल स्थानांतरण को एक उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए आपके पास एक रोबोटिक हाथ है जो हू-ब-हू मानव हाथ के समान है। आपने इसे पांचों अंगुलियों से हथौड़ा पकड़ने और कील ठोकने के लिए प्रशिक्षित किया है। अब आप इसी काम को दो-उंगलियों वाली पकड़ से करवाना चाहते हैं। इसके लिए वैज्ञानिकों ने इन दो हाथों के बीच क्रमिक रूप से बदलते रोबोट्स की एक शृंखला बनाई जो धीरे-धीरे मूल स्वरूप से अंतिम रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। प्रत्येक मध्यवर्ती रोबोट निर्दिष्ट कार्य का अभ्यास करता है जो एक कृत्रिम न्यूरल नेटवर्क को सक्रिय कर देता है जब तक कि सफलता का एक स्तर हासिल नहीं हो जाता। अगले रोबोट में नियंत्रक कोड भेजा जाता है।

वर्चुअल स्रोत से लक्षित रोबोट में स्थानांतरण के लिए टीम ने एक ‘गति वृक्ष’ तैयार किया। जिसमें नोड्स भुजाओं के द्योतक हैं और उनके बीच की कड़ियां जोड़ों को दर्शाती हैं। हथौड़ा मारने के कौशल को दो-उंगली की पकड़ में स्थानांतरित करने के लिए टीम ने तीन उंगलियों के नोड्स के वज़न और आकार को शून्य कर दिया। इस तरह प्रत्येक मध्यवर्ती रोबोट की उंगलियों का आकार और वज़न थोड़ा छोटा होता गया और उनको नियंत्रित करने वाले नेटवर्क को समायोजित करना सीखना पड़ा। शोधकर्ताओं ने प्रशिक्षण पद्धति में ऐसे परिवर्तन किए कि सीखने की प्रक्रिया में रोबोट्स के बीच अंतर बहुत ज़्यादा या बहुत कम न हों।

वैज्ञानिकों ने इस सिस्टम को रिवॉल्वर (Robot-Evolve-Robot) नाम दिया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://static.scientificamerican.com/sciam/cache/file/4236CB75-BEF2-4532-80F5F0D692942457_source.jpg?w=590&h=800&E907F3C9-139A-47A9-A3F49391CD530F9C

चंद्रमा पर पहुंचने की दौड़ में निजी क्षेत्र

जापानी कंपनी आईस्पेस द्वारा निर्मित एम1 लैंडर शायद चांद पर उतरने वाला पहला निजी यान होगा। इसे शीघ्र ही फ्लोरिडा स्थित केप कार्निवल से प्रक्षेपित किया जाएगा। इस लैंडर में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और जापानी स्पेस एजेंसी JAXA के मून रोवर्स सहित अन्य पेलोड भेजने की योजना है। मिशन सफल रहा तो ये दोनों देश अमेरिका, चीन और सोवियत संघ के साथ चंद्रमा पर उतरने वाले देशों की श्रेणी में शामिल हो जाएंगे।

एम1 को एक अन्य निजी कंपनी स्पेस-एक्स के रॉकेट की मदद से अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। चंद्रमा तक पहुंचने के लिए यह एक घुमावदार मार्ग अपनाते हुए मार्च-अप्रैल 2023 में चांद पर उतरेगा।

इसके अलावा, टेक्सास स्थित इंट्यूटिव मशीन्स नामक यूएस फर्म के नोवा-सी मिशन को मार्च 2023 में प्रक्षेपित करने की योजना है। यह चंद्रमा तक पहुंचने के लिए सीधा रास्ता अपनाएगा और केवल 6 दिन का समय लेगा।      

एम1 वास्तव में पृथ्वी और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल का उपयोग करते हुए चंद्रमा तक पहुंचेगा इस तकनीक से कम ईंधन की आवश्यकता होगी और एम1 कम लागत में अधिक भारी पेलोड ले जा पाएगा।  

चंद्रमा के नज़दीक पहुंचने के बाद लैंडर चंद्रमा की परिक्रमा बढ़ते दीर्घवृत्ताकार पथ पर करेगा और फिर सीधे उर्ध्वाधर लैंडिंग करेगा। यह सबसे जोखिम भरा हिस्सा है। लैंडर को चंद्रमा के एटलस क्रेटर के निकट उतारने का लक्ष्य है। इस स्थल का चुनाव इसलिए किया गया है क्योंकि यह समतल है और बोल्डर-मुक्त है। लेकिन चंद्रमा से सम्बंधित डैटा की कमी के चलते नए स्थान पर लैंडर को उतारना काफी रोमांचक हो सकता है।

इस रॉकेट के माध्यम से मोहम्मद बिन राशिद स्पेस सेंटर द्वारा निर्मित राशिद रोवर भेजा जा रहा है। यूएई सरकार द्वारा निर्धारित 2024 की समय सीमा से काफी पहले राशिद रोवर रवाना हो रहा है। यह रोवर मात्र 50 सेंटीमीटर लंबा और 10 किलोग्राम वज़नी है। मिशन राशिद केवल एक चंद्र दिवस के लिए चलेगा जो पृथ्वी के 14 दिनों के बराबर होता है। यह रोवर एआई एल्गोरिदम द्वारा निर्देशित होगा और इलाके की विशेषताओं की पहचान करेगा।  

रोवर के उपकरणों में चार लांगम्यूर प्रोब हैं जो चंद्रमा की सतह पर धूल की गति को प्रभावित करने वाले आवेशित कणों के तापमान और घनत्व की गणना करेंगे। राशिद में चार कैमरे भी लगाए गए हैं जिनमें से दो कैमरे पर्यावरण का निरीक्षण करेंगे, रेगोलिथ नामक एक माइक्रोस्कोपिक कैमरा चंद्रमा की मिट्टी का अध्ययन करेगा और एक थर्मल इमेजर कैमरा लैंडिंग साइट की भूगर्भीय विशेषताओं का अध्ययन करेगा। इसके अलावा ग्रैफीन आधारित कम्पोज़िट सामग्रियों के नमूने भी रोवर के पहियों में चिपकाए जाएंगे ताकि चंद्रमा के कठोर वातावरण में उनका परीक्षण किया जा सके। राशिद रोवर के प्रोजेक्ट मैनेजर हमद अल मर्ज़ूकी के अनुसार राशिद से प्राप्त डैटा भावी खोज में और रोवर तथा रोबोट के विकास को बेहतर बनाने में मददगार होगा।  

एम1 में एक दो पहिया JAXA रोबोट भी शामिल है जो केवल कुछ घंटों के लिए काम करेगा। एजेंसी के अनुसार यह रोवर चंद्रमा की सतह के चारों ओर चक्कर लगाकर डैटा एकत्रित करेगा जिसका उपयोग भविष्य के मानवयुक्त रोवर डिज़ाइन करने में किया जाएगा। इसके अलावा एम1 में एक 360-डिग्री कैमरा भी शामिल है जो जापानी फर्म एनजीके स्पार्क प्लग द्वारा निर्मित एक सॉलिड स्टेट बैटरी का परीक्षण करेगा।

आईस्पेस 2024 में एम2 को प्रक्षेपित करने की योजना भी बना रहा है। देखा जाए तो पिछले कुछ समय में कई राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसियों और निजी कंपनियों के लिए चंद्रमा एक लोकप्रिय गंतव्य बन गया है। आईस्पेस के मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी रयो उजी आईस्पेस और इसी तरह के अन्य कार्यक्रमों को चंद्रमा पर एक पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने के लिए काफी महत्वपूर्ण मानते हैं। यह चंद्रमा पर जल दोहन की दिशा में एक कदम है। कुछ कंपनियों को उम्मीद है कि चंद्रमा पर उपस्थित पानी का उपयोग रॉकेट ईंधन के रूप में किया जा सकता है जिससे सौर मंडल की खोज को काफी सस्ता बनाया जा सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://media.nature.com/lw767/magazine-assets/d41586-022-03675-8/d41586-022-03675-8_23701596.jpg?as=webp

मतदान में विकलांगजन की भागीदारी – सुबोध जोशी

लोकतांत्रिक प्रणाली का आधार चुनाव है और मतदान का अधिकार लोकतंत्र का एक मौलिक अधिकार है। हालांकि भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों में इसे स्थान नहीं दिया गया है लेकिन यह वयस्क नागरिकों का एक अघोषित मौलिक अधिकार है।

लेकिन भारत में अधिकांश विकलांगजन अपने मताधिकार का उपयोग करने और लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया में भागीदारी करने से वंचित रह जाते हैं। इसका कारण यह नहीं है कि वे मतदान करना नहीं चाहते। इसका कारण यह है कि अनेक प्रकार की बाधाएं उन्हें मतदान करने से दूर रखती हैं। हालांकि संविधान और विकलांगजन कानून उन्हें समानता प्रदान करते हैं और विकलांगजन कानून प्रत्येक दृष्टि से उनकी समान भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए बाधामुक्त वातावरण विकसित करने की बात भी करता है।

दुर्भाग्यवश ज़मीनी स्तर पर सच्चाई बिलकुल विपरीत है। आज़ादी के 75 सालों बाद और 1995 में विकलांगजन के लिए पहला कानून आने से लेकर 2016 में नया कानून आ जाने के बावजूद गिने-चुने अपवादों को छोड़कर बाधामुक्त वातावरण आज भी भारत में एक दिवास्वप्न ही है। इस स्थिति के चलते विकलांगजन अपने विभिन्न अधिकारों का उपयोग करने और शिक्षा, रोज़गार, समाज की विभिन्न गतिविधियों आदि में भागीदारी करने से वंचित हैं। चुनाव प्रक्रिया में भागीदारी से वंचित रहना उन्हीं में से एक है। जब हम भारत की बात करते हैं तो हमें ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे कस्बों को मुख्य रूप से ध्यान में रखना चाहिए जहां गैर-विकलांग व्यक्ति भी अनेक बाधाओं और कठिनाइयों से जूझ रहे हैं। विकलांगजन तो और अधिक मुश्किलों का सामना करते हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया में सितंबर 2021 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक निर्वाचन आयोग ने पंजीकृत विकलांग मतदाताओं की संख्या 77.4 लाख बताई थी जबकि वर्ष 2019 में लोक सभा चुनाव के लिए पंजीकृत विकलाग मतदाताओं की संख्या 62.6 लाख थी। 2019 के लोक सभा निर्वाचन में मतदान केंद्रों पर दी गई सुविधाओं का असर कर्नाटक व हिमाचल प्रदेश में उल्लेखनीय रहा था। कर्नाटक में कुल 4.2 लाख पंजीकृत विकलांग मतदाताओं में से 80.12 प्रतिशत ने और हिमाचल प्रदेश में 74 प्रतिशत ने मताधिकार का उपयोग किया था। इसी प्रकार से, हाल ही में सम्पन्न विधान  सभा चुनावों में हिमाचल प्रदेश के 56 हज़ार से ज़्यादा पंजीकृत विकलांग मतदाताओं में से लगभग 50 हज़ार ने मतदान किया।

चुनाव प्रक्रिया के संदर्भ में स्थिति यह है कि अधिकांश विकलांगजन मतदान केन्द्रों तक जा नहीं पाते हैं और वहां उनके अनुकूल इंतज़ाम भी नहीं होते हैं। उनकी अनेक व्यक्तिगत समस्याएं होती हैं। इनके कारण वे चाहकर भी अपने मताधिकार का उपयोग करने नहीं जा पाते हैं। बाधामुक्त वातावरण का अभाव उनके संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों के हनन का कारण बनता है।

विकलांगजन के लिए घर से मतदान केंद्र तक जाकर मतदान करने का निर्णय लेना कोई आसान काम नहीं है। इसके लिए उन्हें अपनी विशिष्ट व्यक्तिगत आवश्यकताओं और सुविधाओं के बारे में सोच-विचार करना पड़ता है। संभव है, ज़रूरी सुविधाएं जुटाने में वे मतदान के दिन सफल न हों। यहां तक कि अगर वे किसी तरह से जाकर मतदान करने का फैसला करते भी हैं तो उन्हें और उनके सहायकों को असहनीय मानसिक पीड़ा, अपमान और प्रक्रिया सम्बंधी कठिनाइयों से गुज़रना पड़ता है। इस वजह से उनमें से बहुत से लोग मतदान करने के लिए नहीं जाते हैं, हालांकि वे मतदान करना चाहते हैं। चुनाव आयोग द्वारा उन्हें मतदान केंद्र तक ले जाने की सुविधा और व्हीलचेयर प्रदान करना एक स्वागत योग्य पहल है और संभव है इससे कई विकलांग मतदाताओं को मदद मिलेगी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इस तरह की व्यवस्था या सुविधा प्रत्येक विकलांग मतदाता के लिए सुविधाजनक होगी और वह आसानी से मतदान कर सकेगा। वास्तव में कई विकलांग व्यक्ति अनजान सहायक की मदद से बाहर नहीं जा सकते और यह ज़रूरी नहीं है कि मतदान के दिन प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले सहायक के साथ या प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले वाहन और व्हीलचेयर में वे सहज महसूस करें।

आज जब भारत तेज़ी से टेक्नॉलॉजी इस्तेमाल की दिशा में कदम बढ़ा रहा है और डिजिटल इंडिया अभियान के ज़रिए अनेक क्षेत्रों में क्रांतिकारी बदलाव लाए जा रहे हैं, तब टेक्नॉलॉजी के सहारे बहुत ही आसानी से विकलांगजन के लिए मतदान सुगम और संभव बनाया जा सकता है।

जैसे, मतदान के दिन विकलांग मतदाताओं को कहीं से भी मोबाइल या कम्प्यूटर के जरिए ऑनलाइन वोटिंग की सुविधा प्रदान करके इस समस्या का समाधान किया जा सकता है। जब डिजिटल आर्थिक लेन-देन सुरक्षित ढंग से किए जा सकते हैं, तो मतदान क्यों नहीं?

विकलांग मतदाताओं की सुविधा के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:

1. विकलांगजन को अपने घर या जहां कहीं भी वे हों वहां से कंप्यूटर या मोबाइल के माध्यम से ऑनलाइन वोटिंग की सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए। BHIM App की तरह यह सेवा बिना इंटरनेट काम करे, तो और बेहतर होगा। डिजिटल टेक्नॉलॉजी के कारण यह अत्यंत सरल और सुरक्षित व्यवस्था साबित होगी। अनेक विकलांगों के फिंगर प्रिंट बायोमेट्रिक मशीन पर नहीं आ पाते हैं, अतः इस तरह की अनिवार्यताएं ऑनलाइन वोटिंग में नहीं रखी जानी चाहिए। आधार कार्ड से सम्बंधित प्रक्रियाओं में देखी गई ऐसी अनेक कठिनाइयां मार्गदर्शक हो सकती हैं। 

2. विकलांगजन को डाक द्वारा मतदान की सुविधा भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए, जो ड्यूटी पर तैनात शासकीय कर्मचारियों और सैनिकों को पहले से प्राप्त एक मान्य सुविधा है ।

3. विकलांगजन के साथ अति-वृद्धजन और गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों को भी इस तरह की सुगम मतदान सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

4. ऑनलाइन वोटिंग और डाक द्वारा मतदान की सुविधा दिए जाने के बावजूद बाधामुक्त वातावरण विकसित करने का कार्य तेज़ी से किया जाना चाहिए ताकि विकलांग मतदाता मतदान केंद्रों पर जाकर मतदान करने का विकल्प भी चुन सकें।

यदि ऑनलाइन वोटिंग की सुविधा उपलब्ध करा दी जाए तो विकलांग मतदाताओं के साथ-साथ अति-वृद्ध और गंभीर रूप से बीमार मतदाता अपने मताधिकार का सरलता से उपयोग कर सकेंगे और लोकतांत्रिक निर्वाचन प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बढ़ेगी। निकट भविष्य में कुछ महत्वपूर्ण विधानसभा और लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र इस दिशा में शीघ्र कदम उठाना मुनासिब होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.accessibility-services.co.uk/wp-content/uploads/2019/12/702x400px-Campaign-update-voting-edited_0230.jpg

स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी है पर्याप्त निद्रा – डॉ. आर. बी. चौधरी

साइंस डेली में छपे एक अध्ययन के अनुसार 5 घंटे से कम सोने से शरीर में कई बीमारी पैदा होने का खतरा बढ़ जाता है। दी न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, 50 साल की उम्र के आसपास पांच घंटे या उससे कम सोने वालों को सात घंटे सोने वालों की तुलना में कहीं अधिक बीमारियों घेर लेती हैं।

एक अध्ययन में पाया गया कि 50 प्रतिशत से कम नींद किसी भी व्यक्ति के लिए बड़ा खतरा हो सकती है। ब्रेन कम्यूनिकेशंस के अनुसार नींद की कमी से अल्ज़ाइमर विकसित होने का खतरा बढ़ जाता है। इसी प्रकार, वाशिंगटन स्टेट युनिवर्सिटी के एक अध्ययन में भी बताया गया है कि नींद की गुणवत्ता का सीधा प्रभाव महिलाओं के मूड, उनकी महत्वाकांक्षा और करियर आगे बढ़ने पर पड़ता है। इसके विपरीत, नींद की गुणवत्ता पुरुषों की भावनाओं पर ज़्यादा असरकारी नहीं पाई गई।

कई सर्वेक्षणों में स्पष्ट हुआ है कि कोरोना की महामारी ने हमारे सोने के पैटर्न को गड़बड़ा दिया है। सोशल मीडिया कम्यूनिटी प्लेटफॉर्म द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया है कि अध्ययन में शामिल 52 प्रतिशत भारतीयों ने यह स्वीकार किया कि महामारी के बाद उनकी नींद के पैटर्न में बदलाव आया है।

प्रत्येक 2 भारतीयों में से 1 ने कहा कि उसे हर रात 6 घंटे से भी कम नींद आती है जबकि 4 में से 1 व्यक्ति 4 घंटे से कम सो रहा है। कोविड से प्रभावित लोग मानसिक और शारीरिक रूप से तनावग्रस्त होते हैं। यह काफी हद तक नींद के पैटर्न को प्रभावित करता है। मन में भय पैदा हो जाता है और ऐसे लोग अलग-थलग पड़ जाते हैं और सामान्य दिनचर्या नहीं व्यतीत कर पाते हैं। यह सब बहुत अधिक मानसिक दबाव के कारण होता है। अध्ययन में यह भी बताया गया है कि अगर कोई ठीक से नहीं सोता है तो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता और मस्तिष्क की संज्ञानात्मक क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

अच्छी नींद तंदुरुस्ती बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। जिसके लिए रात का खाना समय पर लेना चाहिए और सोने तथा अंतिम भोजन के बीच कम से कम 2 घंटे का अंतराल होना चाहिए। सोने से कम से कम 1 घंटे पहले से मोबाइल फोन, लैपटॉप का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। जिस बिस्तर पर सोते हैं उसे केवल सोने के लिए ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए; कार्यालय के काम के लिए इसका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। दिन के दौरान झपकी से बचना चाहिए। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार रोज़ाना व्यायाम ज़रूरी है तथा हल्का भोजन करना चाहिए। अच्छी नींद के लिए शराब और कैफीन का सेवन नहीं करना चाहिए। ये सामाजिक सम्बंधों को प्रभावित कर सकते हैं और कार्डियोवैस्कुलर और चयापचय सम्बंधी जटिलताओं और बीमारियों में वृद्धि का कारण बन सकते हैं। इनसे शरीर में कमज़ोरी आती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता लगातार घटती जाती है।

दिन का करीब एक तिहाई हिस्सा सोने के लिए उपयोग किया जाना चाहिए। 1950 के दशक से पहले, ज़्यादातर लोगों का मानना था कि नींद एक ऐसी अवस्था है जिसके दौरान शरीर क्रिया और मस्तिष्क निष्क्रिय रहता है। इस दौरान मस्तिष्क कई प्रक्रियाओं से गुज़रता है और मस्तिष्क में होने वाली गतिविधियों का सीधा सम्बंध हमारी दिनचर्या से होता है। शोधकर्ता इन प्रक्रियाओं के बारे में अधिक जानने की कोशिश कर रहे हैं ताकि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारकों के बारे में अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त की जा सके। नींद पर अनुसंधान कर रहे वैज्ञानिकों का मानना है कि सोते समय मस्तिष्क दो अलग-अलग प्रकार की निद्राओं के माध्यम से मस्तिष्क की प्रक्रिया के कई चक्रों को पूरा करता है। इसमें रैपिड-आई मूवमेंट (आरईएम) नींद और गैर-आरईएम नींद को प्रमुख माना जाता है।

इस चक्र का पहला भाग गैर-आरईएम नींद है, जो चार चरणों से बना है। पहला चरण जागने और सो जाने के बीच आता है। दूसरा है हल्की नींद, जब हृदय गति और श्वास नियंत्रित होते हैं और शरीर का तापमान गिर जाता है। तीसरा और चौथा चरण है गहरी नींद। हालांकि आरईएम नींद को पहले सीखने और स्मृति के लिए सबसे महत्वपूर्ण चरण माना जाता था, नए आंकड़ों से पता चलता है कि इन कार्यों के लिए गैर-आरईएम नींद अधिक महत्वपूर्ण है। साथ ही अधिक आरामदायक नींद और पुनर्स्थापना चरण की नींद भी शामिल है। जैसे ही कोई व्यक्ति नींद में जाता है तो आंखें बंद होने लगती हैं और आंखों की पुतलियां पलकों के पीछे तेज़ी से गति करती हैं। हालांकि, मस्तिष्क तरंगें जागृत अवस्था के समान होती हैं। जब कोई व्यक्ति सपना देखता है तो सांस की गति बढ़ जाती है और शरीर अस्थायी रूप से शून्य जैसी अवस्था में चला जाता है। यह चक्र कई बार दोहराया जाता है। इस प्रकार सामान्यत: रात में चार या पांच चक्र होते हैं।

अमेरिका की जॉन्स हापकिंस युनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने वर्ष 2014 में फ्रूट फ्लाई पर किए गए प्रयोगों के माध्यम यह पता लगाया था कि न सो पाने वाली फ्रूट फ्लाई के अंदर एक खास उत्परिवर्ती जीन नींद का नियंत्रण करता है। इस जीन को उन्होंने वाइड अवेक नाम दिया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि यह उत्परिवर्ती वाइड अवेक जीन जैविक घड़ी को अनियमित करके नींद उड़ाने का काम करता है। उन्होंने पाया था कि यह सामान्य वाइड अवेक जीन एक प्रोटीन बनाता है जो रात में नींद के लिए ज़िम्मेदार होता है और नींद के चक्र को नियंत्रित करता है।

इसी क्रम में यह भी पाया गया कि मनुष्यों और चूहों में भी ऐसा ही निद्रा जीन मौजूद होता है। हमारे अंदर एक जैविक घड़ी होती है जिसके द्वारा मस्तिष्क को समय की सूचना मिलती है। इसका काफी सम्बंध हमें मिलने वाले प्रकाश से होता है जैसे भोजन के बिना हमें भूख लगती है और उसकी आपूर्ति ज़रूरी हो जाती है, उसी प्रकार से नींद की कमी की दशा में पूरे दिन नींद की इच्छा बनी रहती है और हमें सोने की ज़रूरत महसूस होती है। अलबत्ता, नींद और भूख के बीच एक अंतर भी है। भूख लगने पर हमारा शरीर भोजन के लिए सीमा से परे मजबूर नहीं कर सकता है। लेकिन थका व्यक्ति सोने को बाध्य हो जाता है। आंखें अपने आप बंद होने लगती हैं। भले ही आंखें खुली हो लेकिन नींद पूरी न होने की दशा में कुछ मिनट के लिए झपकी मजबूरन आ जाती है। पर्याप्त नींद स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://sph.umich.edu/pursuit/2020posts/2020images/Sleep101.jpg

आठ अरब के आगे क्या?

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार गत 15 नवंबर को दुनिया की आबादी 8 अरब हो गई है, और वृद्धि जारी है। वैसे, जनसंख्या वृद्धि के संदर्भ में अलग-अलग देशों की स्थिति अलग-अलग है। नाइजीरिया जैसे कुछ देशों में आबादी तेज़ी से बढ़ रही है, जबकि जापान जैसे देशों में घट रही है। चीन को पीछे छोड़ते हुए भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा।

गौरतलब है कि होमो सेपियन्स के उद्भव से लेकर वर्ष 1804 तक पृथ्वी की कुल आबादी एक अरब होने में लगभग 3,00,000 वर्षों का समय लगा था। दूसरी ओर, पृथ्वी की आबादी में एक अरब का इज़ाफा मात्र पिछले 12 साल में हुआ है।

यह कहना तो मुश्किल है कि हम 8 अरब की संख्या पर ठीक कब पहुंचे क्योंकि दुनिया के कुछ हिस्सों में जनगणना के आंकड़े दशकों पुराने हैं। कोविड-19 के समय में कुछ देशों के लिए हर एक मौत को दर्ज करना लगभग असंभव था। उत्कृष्ट कंप्यूटर मॉडल भी एक साल या उससे अधिक समय तक बंद रहे होंगे।

बेहतर स्वास्थ्य देखभाल, साफ पेयजल और स्वच्छता में सुधार की बदौलत पृथ्वी पर हर जगह मनुष्यों की औसत आयु बढ़ी है। उर्वरकों और सिंचाई से फसल की पैदावार में वृद्धि हुई है जिससे पोषण में सुधार हुआ है। कई देशों में जन्म दर बढ़ रही है और मृत्यु दर कम हो रही है।

लेकिन इस रफ्तार से बढ़ती आबादी के कारण हम कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। बढ़ते प्रदूषण और अत्यधिक मत्स्याखेट से महासागर प्रभावित हो रहे हैं। विकास, कृषि और पेड़ों से बने उत्पादों के लिए वनों की कटाई और कृषि हेतु वन भूमि की सफाई से वन्य जीवन पर खतरा मंडराने लगा है। जीवाश्व ईंधनों के कारण जलवायु प्रभावित हो रही है, और जैव विविधता, खाद्य सुरक्षा तथा पानी की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं।

बढ़ती आबादी के मद्देनज़र पृथ्वी और हमारा अपना कल्याण इस बात पर निर्भर करते हैं कि हम जलवायु परिवर्तन से कैसे निपटते हैं। संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक व सामाजिक मामला विभाग के पैट्रिक गेरलैंड का कहना है कि अब भी कुछ हद तक मानव जीवन पर पड़ने वाले भावी प्रभावों को सटीक ढंग से निर्धारित किया जाना बाकी है। इतिहास को देखें तो दुनिया अपनी समस्याओं के हल खोजने और अपनाने में सफल रही है। हमें आशावादी होने की ज़रूरत है। लेकिन कुछ न करना इसका हल नहीं हो सकता। हम मानें या न मानें, जलवायु परिवर्तन तो हो रहे हैं, और ये अपने आप नहीं निपट जाएंगे।

इसी दौरान, विभिन्न देशों की अलग-अलग स्थितियों के बावजूद कुल मिलाकर जनसंख्या बढ़ रही है। और दुनिया के शीर्ष जनसांख्यिकीविद इस पर एकमत नहीं हैं कि हमारी आबादी यहां से आगे कहां पहुंचेगी। एक ही समय में कहीं जनसंख्या में भारी वृद्धि हो रही है और कहीं तेज़ी से कमी हो रही है।

इस साल पहली बार चीन सबसे अधिक आबादी वाला देश नहीं रहेगा, भारत उससे आगे निकल जाएगा। चीन में 1980 में एक-बच्चा नीति लागू होने के पहले से ही जन्म दर घटने लगी थी, जो अब भी लगातार घट रही है। 1970 के दशक में ही उसकी जन्म दर घटकर आधी रह गई थी। बेहतर शिक्षा और करियर के बढ़ते अवसरों से अधिकतर महिलाओं ने प्रसव को टाला है। महामारी के दौरान जन्म दर और घटी। 2015 की तुलना में वर्ष 2020 में 45 प्रतिशत कम बच्चे पैदा हुए थे।

यहां तक कि किसी भी देश के मुकाबले सबसे लंबी जीवन प्रत्याशा, 85 वर्ष, के साथ चीन की 1.4 अरब की आबादी जल्द ही घटने की उम्मीद है – हो सकता है घटना शुरू भी हो गई हो। नेचर में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार अगली चौथाई शताब्दी में चीन में 60 वर्ष से अधिक आयु के लगभग 30 करोड़ लोग होंगे औैर इसका दबाव सार्वजनिक संसाधनों पर होगा।

वहीं दूसरी ओर, अफ्रीका में रुझान विपरीत दिशा में हैं। सहेल में जनसंख्या तेज़ी से बढ़ रही है। नाइजीरिया की आयु का मध्य मूल्य (मीडियन) सिर्फ 17 वर्ष है, जो चीन के आधे से भी कम है। मध्य मूल्य या माध्यिका से यह पता चलता है कि यदि आबादी को 17 वर्ष से कम और 17 वर्ष से अधिक के समूहों में बांटा जाए तो दोनों समूहों में बराबर लोग होंगे। नाइजीरिया में भी जन्म दर गिर तो रही है, लेकिन चीन की तुलना में अब भी 20 गुना अधिक है।

यहां खाद्य सुरक्षा पहले ही एक चिंता का विषय है। देश की एक तिहाई से अधिक आबादी अत्यधिक गरीब है। हर तीसरे परिवार के एक सदस्य को कभी-कभी दिन के एक समय का भोजन छोड़ना पड़ता है ताकि बाकी लोगों को भोजन मिल सके। नाइजीरिया की वर्तमान आबादी 21.6 करोड़ है और अनुमान है कि सदी के अंत तक यह चौगुनी हो जाएगी। तब इसमें चीन की जनसंख्या से भी अधिक लोग होंगे, जबकि चीन के पास 10 गुना अधिक ज़मीन है। लेकिन वास्तविक स्थिति क्या बनेगी यह जन्म दर में कमी सहित कई बातों पर निर्भर करेगा।

जन्म दर में कमी लाने का सबसे बड़ा कारक है शिक्षा, खासकर लड़कियों की शिक्षा। एक दशक पहले, शोधकर्ताओं ने बताया था कि शिक्षा तक बढ़ती पहुंच से सदी के मध्य तक वैश्विक जनसंख्या की वृद्धि में एक अरब तक की कमी आ सकती है। लेकिन आने वाले सालों में शिक्षा कितनी तेज़ी से और कितने व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंचेगी, यह एक अनुत्तरित सवाल है।

अधिकांश विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले पच्चीस सालों में विश्व की जनसंख्या 9 अरब से अधिक हो जाएगी।

उसके बाद अनुमान बहुत अलग-अलग हो जाते हैं। कुछ साल पहले संयुक्त राष्ट्र ने अनुमान लगाया था कि 2100 तक दुनिया की आबादी 11 अरब हो जाएगी। लेकिन अब प्रति परिवार में पैदा होने वाले बच्चों की संख्या में कमी को देखते हुए, उसने अपने अनुमानों को घटाकर लगभग 10.4 अरब कर दिया है। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एप्लाइड सिस्टम्स एनालिसिस के शोधकर्ताओं ने 2018 में अनुमान लगाया था कि जनसंख्या 2070 में बढ़कर 9.7 अरब हो सकती है और फिर सदी के अंत तक गिरकर लगभग 9 अरब हो जाएगी। सिएटल इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स के अनुसार 2064 में जनसंख्या लगभग 9.7 अरब तक बढ़ेगी, लेकिन सदी के अंत तक यह गिरकर 8.8 अरब हो सकती है। बुल्गारिया और स्पेन सहित लगभग दो दर्जन देशों में जनसंख्या आधी हो सकती है। अनुमानों में ये अंतर अनुमान लगाने की विधि सहित कई कारणों से हैं।

बहरहाल, सभी शोधकर्ता इस बात से सहमत हैं कि अब तक भविष्य के जनसंख्या अनुमानों में जलवायु परिवर्तन को शामिल करने के प्रयास अपर्याप्त रहे हैं। आंशिक रूप से ऐसा इसलिए है क्योंकि संभावित प्रभाव काफी हद तक इस बात पर निर्भर करते हैं कि हम कितनी जल्दी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करते हैं। लेकिन एक कारण जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का आकलन करने को लेकर भी है। अत्यधिक गर्मी मध्य पूर्व, उप-सहारा अफ्रीका और भारत के कुछ हिस्सों को रहने के अयोग्य बना सकती है। तूफान खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं। यह भी स्पष्ट नहीं है कि घनी आबादी वाले तटीय क्षेत्रों में लोग तेज़ी से बढ़ते समुद्र स्तर पर कैसी प्रतिक्रिया देंगे।

वैश्विक जनसंख्या अनुमानों के अलावा, जलवायु परिवर्तन और राजनीति भी संभावित रूप से देशों के बीच प्रवासन को बहुत प्रभावित करेगी। अमेरिका और पश्चिमी युरोप काफी हद तक आप्रवासियों पर निर्भर हैं, लेकिन यह एक तल्ख राजनीतिक मुद्दा बन गया है। घटती आबादी वाले जापान जैसे अन्य देश भी आप्रवासियों को अपने यहां नहीं आने देना चाहते। फिर भी कहीं घटती कहीं बढ़ती आबादी निश्चित रूप से लगभग हर जगह प्रवासन का दबाव बढ़ाएगी। और इस जनसांख्यिकीय असंतुलन से बाहर निकलने का एकमात्र तरीका है – सुप्रबंधित अंतर्राष्ट्रीय सहयोग। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://static.nationalgeographic.co.uk/files/styles/image_3200/public/02_gettyimages-1244172078.jpg?w=400&h=400&q=75