शहरों में हरियाली के लिए पेड़ सोच-समझकर चुनें

म सबने मनुष्य की सहूलियत के लिए बड़े से लेकर छोटे शहरों को तेज़ी से क्रॉन्कीट के जंगलों (concrete forests) में तब्दील होते देखा है। पहले तो शहरों के और फिर शहरों के आसपास के खेतों और जंगलों में नैसर्गिक रूप से लगे पेड़ों की धड़ल्ले से कटाई हुई और उनकी जगह इमारतों और इंफ्रास्ट्रक्चर ने ले ली।

जब गर्माती दुनिया और बदलती जलवायु की समस्या ने पैर पसारे तो वनीकरण, वृक्षारोपण और शहरी हरितीकरण (green cities) के प्रयास शुरू हुए। शहरों को हरा-भरा करने के एक प्रयास में शहरों में सड़कों के किनारे, बाग-बगीचों में लगाने के लिए ऐसे पेड़-पौधे चुन लिए जाते हैं जो तेज़ी से बड़े हो सकें; इससे शहर में जल्द हरियाली दिखने लगती है। लेकिन इस तरह के पेड़ों के चुनाव के अपने जोखिम हैं। वनीकरण और हरितीकरण के लिए कुछ पेड़-पौधों को चुनने से जैव-विविधता में कमी का जोखिम तो है ही, लेकिन एक हालिया अध्ययन बताता है कि ये पेड़-पौधे वायु प्रदूषण बढ़ाने में एक बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।

पेड़ की वायु प्रदूषण में भूमिका, यह बात सुनकर हैरत हो सकती है। लेकिन कुछ पेड़ों से प्रकाश संश्लेषण के समय उत्सर्जित होने वाले वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) (Volatile organic compounds) और वायुमंडल में मौजूद नाइट्रोजन ऑक्साइड्स की अभिक्रिया से ओज़ोन बनती है। वायुमंडल की निचली परतों में ओज़ोन  स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है। इससे श्वास नली में सूजन, दमा और फेफड़ों सम्बंधी समस्याएं हो सकती हैं।

यहां गौरतलब बात यह है कि पेड़ों से उत्सर्जित VOC खुद वायु प्रदूषण (air pollution) में योगदान नहीं देते हैं, बल्कि जब ये मनुष्य की गतिविधियों के चलते उत्सर्जित होने वाले नाइट्रोजन ऑक्साइड्स (NOx) से अभिक्रिया करते हैं, तब वे हानिकारक ओज़ोन बनाते हैं। एक और गौरतलब बात यह है कि VOCs महज़ वनस्पतियों द्वारा उत्सर्जित नहीं होते, मनुष्य द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली तमाम खुशबूदार चीज़ों, जीवाश्म ईंधनों, रसायन उद्योग वगैरह भी VOC उत्सर्जन का कारण हैं।

चीन की जिनान युनिवर्सिटी के वायुमंडल रसायन विज्ञानी बिन युआन ओज़ोन प्रदूषण (ozone pollution) पर मानवीय गतिविधियों के असर समझने की कोशिश रहे थे, तभी कुछ आंकड़ों ने उन्हें चौंकाया – उन्होंने पाया कि शहरी पेड़-पौधे ओज़ोन उत्सर्जन में पूर्व-अनुमानित स्तर से कहीं ज़्यादा योगदान दे रहे थे। इन आंकड़ों ने उन्हें आगे अध्ययन को उकसाया।

यह तो मालूम था कि कई वनस्पति प्रजातियां VOCs उत्सर्जित करती हैं, और कुछ प्रजातियां अन्य की तुलना में ज़्यादा VOCs उत्सर्जित करती हैं। इन प्रजातियों में वीपिंग विलो (Salix babylonica) और पॉपलर (Populus वंश) के पेड़ शामिल हैं। ये पेड़ आजकल शहरों को जल्दी हरा-भरा बनाने के लिए लगाए जा रहे हैं, खासकर चीन के शहरों में। भारत के शहरी बगीचों और सड़कों के किनारे भी आजकल वीपिंग विलो (weeping willow) काफी दिखाई देते हैं, और पॉपलर के पेड़ व्यावसायिक दृष्टि से शहरों के बाहर काफी लगाए जा रहे हैं। ये पेड़ बड़ी मात्रा में आइसोप्रीन (isoprene) नामक यौगिक का उत्सर्जन करते हैं जो एक प्रकार का VOC है और प्रकाश संश्लेषण के उप-उत्पाद के रूप में बनता है।

शोधकर्ताओं ने अपना अध्ययन चीन के बीज़िंग शहर पर केंद्रित किया। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने बीजिंग शहर की हवा के नमूने लिए, साथ ही शहर के आसपास के निगरानी केंद्रों से ओज़ोन सम्बंधी डैटा लिया। उन्होंने पाया कि मई 2021 से जुलाई 2021 के बीच बीजिंग में कुल VOC उत्सर्जन में पेड़-पौधों का योगदान लगभग 10 प्रतिशत था, बाकी हिस्सा मानवीय गतिविधियों (Human practices) से आया था।

उन्होंने 24 अन्य बड़े शहरों में लगाए गए पेड़ों की प्रजातियों का भी अध्ययन किया ताकि उनके द्वारा होने वाले संभावित आइसोप्रीन उत्सर्जन (emissions) का अंदाज़ मिल सके। पाया गया कि बीजिंग में लगभग 35 प्रतिशत पेड़ ऐसे हैं जो आइसोप्रीन उत्सर्जन करते हैं। और तो और सिडनी, मेलबर्न समेत ज़्यादातर शहरों में आइसोप्रीन का उत्सर्जन बीजिंग से भी ज़्यादा है। मसलन सिडनी में लगभग 65 प्रतिशत पेड़ आइसोप्रीन उत्सर्जन करने वाले हैं।

चूंकि VOC सीधे ओज़ोन नहीं बनाते हैं, इसलिए शहर के ओज़ोन प्रदूषण में पेड़-पौधों के योगदान का आकलन करने के लिए उन्होंने एक तरीका अपनाया। उन्होंने देखा कि वातावरण में VOCs कितनी तेज़ी से हाइड्रॉक्सिल मूलकों के साथ अभिक्रिया करते हैं। दरअसल, हाइड्रॉक्सिल VOCs के साथ अभिक्रिया करके पेरोक्सी रेडिकल (peroxy radicle) बनाते हैं, जो हवा में मौजूद नाइट्रोजन ऑक्साइड के साथ अभिक्रिया करके ऐसे यौगिक बनाते हैं जो सूर्य के प्रकाश में ओज़ोन में बदल जाते हैं। पाया गया कि ओज़ोन बनाने वाले रसायन में 52 प्रतिशत हिस्सा पेड़-पौधों का था, आइसोप्रीन मुख्य योगदानकर्ता था।

हालांकि मानवीय गतिविधियों से होने वाला कुल VOC उत्सर्जन पेड़-पौधों से होने वाले उत्सर्जन से ज़्यादा था, लेकिन ओज़ोन बनने में उनका योगदान पेड़-पौधों की तुलना में कम था।

यह तो जानी-मानी बात है कि तापमान बढ़ने के साथ VOCs और ओज़ोन का उत्पादन बढ़ता है। पाया गया कि 35 डिग्री सेल्सियस पर VOCs के साथ हाइड्रॉक्सिल की अभिक्रिया दर 20 डिग्री सेल्सियस की तुलना में सात गुना ज़्यादा थी।

शोधकर्ताओं ने बीजिंग के शहरी गर्म टापू प्रभाव (शहरी इलाकों का आसपास के इलाकों की तुलना में ज़्यादा गर्म होना) पर भी विचार किया। अनुमान है कि गर्मियों में दिन के समय, जब अधिकतम तापमान 32 डिग्री सेल्सियस होता है, तब शहर में 0.8 डिग्री सेल्सियस की अधिकता आइसोप्रीन उत्सर्जन को 12 प्रतिशत तक बढ़ा सकती है। यानी गर्माती पृथ्वी (global warming) शहरी पेड़-पौधों से होने वाले VOC उत्सर्जन को और भी बढ़ा सकती है।

यहां सचेत रहने वाली कुछ बातें हैं। एक यह कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वातावरण में VOC उत्सर्जन का एक बड़ा हिस्सा मानवीय गतिविधियों के कारण पहुंचता है, जिसे थामने की ज़रूरत है। साथ ही साथ NOx उत्सर्जन को कम करने की भी ज़रूरत है क्योंकि VOC और इनकी आपसी अभिक्रिया से ही ओज़ोन बनती है – NOx के बिना VOCs ओज़ोन प्रदूषण में योगदान नहीं दे सकते।

दूसरा यह कि साइंस एडवांसेज़ में प्रकाशित अध्ययन के इन नतीजों का मतलब यह नहीं है कि हमें पेड़ नहीं लगाने चाहिए। पेड़ों के कई फायदे हैं, जिन्हें यहां गिनाने की ज़रूरत नहीं लगती। ज़रूरत है कि शहरों का हरितीकरण करते समय शहरों और जलवायु के अनुकूल (climate adaptive trees) पेड़-पौधे चुने जाएं।

वैसे भारत के संदर्भ में भी VOC उत्सर्जक पेड़ों के असर को मापना दिलचस्प होगा क्योंकि यहां के शहरों में भी वीपिंग विलो अब काफी देखने को मिलते हैं, और पॉपलर के पेड़ों को उनके व्यवसायिक उपयोग के लिए शहरों के बाहर लगाया जा रहा है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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