भाग 3 – अनुसंधान
डॉ. सुशील जोशी
लेख के इस भाग में हम कुछ और महत्वपूर्ण अनुसंधानों पर बात करेंगे।

ट्रांसडक्शन
दरअसल, बैक्टीरिया में जेनेटिक फेरबदल की दो विधियां तो ज्ञात थीं – एक थी उत्परिवर्तन (mutation) यानी बैक्टीरिया की जेनेटिक संरचना में स्वतः परिवर्तन और दूसरी थी संयुग्मन (conjugation)। लेडरबर्ग और ज़िंडर ने एक तीसरी विधि की खोज की थी। इसकी खोज उन्होंने साल्मोनेला नामक बैक्टीरिया के एक प्रतिरोधी स्ट्रेन के साथ प्रयोग करके की थी।
वे देखना चाहते थे कि क्या उनके प्रयोग वास्तव में जेनेटिक पुनर्संयोजन को दर्शाते हैं। उन्होंने एक U आकार की नली लेकर उसके निचले मोड़ पर एक अत्यंत महीन कांच का फिल्टर फिट कर दिया। इसमें उन्होंने एक पोषक माध्यम भर दिया जिसमें उनके द्वारा चुने गए साल्मोनेला उत्परिवर्तित रूपों के लिए ज़रूरी पोषक तत्व नहीं थे।
फिर उन्होंने एक-एक उत्परिवर्ती स्ट्रेन को नली की दोनों भुजाओं में डाल दिया और माध्यम को एक पंप की मदद से दोनों तरफ बहाते रहे। उम्मीद थी कि कोई पुनर्संयोजन नहीं होगा क्योंकि बर्नार्ड डेविस ऐसे ही एक प्रयोग में दर्शा चुके थे कि पुनर्संयोजन के लिए बैक्टीरिया कोशिकाओं के बीच सीधे संपर्क ज़रूरी है।
लेकिन आश्चर्जनक रूप से, कई बैक्टीरिया पनपे और संख्यावृद्धि भी करते दिखे। यानी पुनर्संयोजन हुआ था। और इसने दोनों उत्परिवर्तियों को अपनी-अपनी पोषण की कमी की भरपाई करने में मदद की थी।
इसका मतलब था कि ऐसा कोई एजेंट था जो उस महीन फिल्टर में से आ-जा सकता था। जब उन्होंने उस एजेंट का शुद्धिकरण किया तो पाया कि वह न तो शुद्ध डीएनए से बना था और न ही आरएनए से क्योंकि इन्हें तोड़ने वाले एंज़ाइम का उस पर कोई असर नहीं हुआ। दरअसल, यह एजेंट एक बैक्टीरियोफेज निकला।
हुआ यह था कि लेडरबर्ग और ज़िंडर ने जिस साल्मोनेला का उपयोग किया था वह काफी पहले एक लायसोजेनिक वायरस से संक्रमित था, जिसका डीएनए साल्मोनेला के जीनोम में जुड़ गया था और बैक्टीरिया के प्रजनन के साथ वायरस डीएनए की प्रतिलिपियां भी आगे बढ़ती गई थीं। प्रयोग के दौरान वह वायरस डीएनए से अलग हो गया, खुद की प्रतिलिपियां बनाने लगा और फिर बैक्टीरिया कोशिका फट गई और वायरस बाहर रखे माध्यम में जा पहुंचा। बैक्टीरिया जीनोम से अलग होने से पहले वह वायरस अपने साथ बैक्टीरिया के डीएनए के कुछ खंड भी लेता गया। फिल्टर वायरसों की आवाजाही के लिए ठीक था। तो वायरसों के साथ बैक्टीरिया के जीन्स भी नली की दूसरी भुजा में पहुंचे, वहां उन्होंने उस भुजा के बैक्टीरिया को संक्रमित किया और उनके जीनोम्स में फिट हो गए। लेडरबर्ग और ज़िंडर का निष्कर्ष था कि नए-नए संक्रमित बैक्टीरिया में वे जीन पहुंच गए जो उनके पोषण सम्बंधी अभाव की भरपाई करते थे।
यहां यह स्पष्ट कर देना लाज़मी है कि वायरस किसी बैक्टीरिया को संक्रमित करने के बाद दो रास्ते अपना सकता है – लायसोजेनिक और लायसिस। लायसोजेनिक मार्ग में होता यह है कि वायरस अपना पूरा जीनोम बैक्टीरिया के जीनोम में जोड़कर सुप्त हो जाता है। फिर बैक्टीरिया की कोशिका के विभाजन के साथ वायरस के जीनोम की भी प्रतिलिपि बनती रहती है। मौका आने पर वायरस का जीनोम अलग होकर स्वयं की प्रतिलिपियां बनाने लगता है (यानी नए वायरस बनने लगते हैं) जो बैक्टीरिया कोशिका को फोड़कर बाहर निकल आते हैं। लायसिस की प्रक्रिया में वायरस संक्रमण के तत्काल बाद अपनी प्रतिलिपियां बनाने लगता है और कोशिका के विनाश कारण बन जाता है। कतिपय तनाव की परिस्थितियों में (जैसे पराबैंगनी विकिरण) वायरस का जीनोम मेज़बान के गुणसूत्र से अलग होकर अपनी प्रतिलिपियां बनाने लगता है और मेज़बान कोशिका को फोड़कर सारे वायरस बाहर निकल जाते हैं। लायसोजेनी की क्रियाविधि का खुलासा आंद्रे ल्वॉफ ने ई. कोली पर काम करते हुए किया था।
यह सही हैं कि ट्रांसडक्शन प्रक्रिया की खोज साल्मोनेला में हुई, लेकिन इसे मनचाहा जीन हस्तांतरण की विधि के रूप ई. कोली में ही विकसित किया गया।
ट्रांसडक्शन की खोज और आगे का विकास बुनियादी महत्व का साबित हुआ। एक तो इससे स्पष्ट हुआ कि प्रोकेरियोट्स (जिनमें एक सुपरिभाषित केंद्रक नहीं होता) में ज़रूरी नहीं कि दो जीवों की पूरी की पूरी जेनेटिक सामग्री का पुनर्संयोजन हो। उनमें आपस में डीएनए के छोटे-छोटे खंड का लेन-देन भी होता है। दूसरी ओर केंद्रक युक्त (यूकेरियोट्स) कोशिकाओं में पूरी की पूरी जेनेटिक सामग्री का मिलन ज़रूरी होता है। प्रोकेरियोट्स और यूकेरियोट्स के बीच विभेद का यह मापदंड आणविक जीव विज्ञान की एक बुनियादी अवधारणा है।
बहरहाल, ट्रांसडक्शन ने चिकित्सा और जैव-टेक्नॉलॉजी के क्षेत्र में भी भारी योगदान दिया है। इसने बैक्टीरिया में एंटीबायोटिक प्रतिरोध के त्वरित प्रसार की एक नई प्रक्रिया का खुलासा किया।
ट्रांसडक्शन जेनेटिक इंजीनियरिंग में भी महत्वपूर्ण साबित हुआ है। इसकी मदद से जीन्स का हस्तांतरण करवाया जा सकता है। 1970 के दशक में वैज्ञानिक डीएनए के मनचाहे खंडों को बैक्टीरियोफेज में जोड़कर उसे किसी अन्य बैक्टीरिया में पहुंचाना सीख गए थे। फिर 1990 के दशक में किसी वायरस-वाही की मदद से किसी गड़बड़ जीन के स्थान पर स्वस्थ जीन पहुंचाना जीन थेरपी का आधार बना।
मनचाहे रसायनों का उत्पादन
ट्रांसडक्शन ने ई. कोली के जीनोम में फेरबदल करने की तकनीक उपलब्ध कराई। लिहाज़ा, ई. कोली के जीनोम में परिवर्तन करके उससे मनचाहे रसायन बनवाए जा सकते हैं।
उदाहरण के लिए, फिनाइलप्रोपेनॉइड यौगिकों को लेते हैं। फिनाइलप्रोपेनॉइड समूह के पदार्थ पौधों को विभिन्न तरह से सुरक्षा प्रदान करते हैं। जैसे पौधों की कोशिका भित्ती को दृढ़ता प्रदान करने वाला लिग्निन फिनाइलप्रोपेनॉइड से बनता है। ये पदार्थ पौधों को सूक्ष्मजीवों और पराबैंगनी विकिरण से सुरक्षा प्रदान करते हैं। फूलों व फलों को रंगत देने वाले फ्लेवोनॉइड तथा एंथोसायनीन भी फिनाइलप्रोपेनॉइड से ही बनते हैं। फिनाइलप्रोपेनॉइड्स खाद्य परिरक्षण व पैकेजिंग, औषधि, सौंदर्य प्रसाधन तथा जैव ईंधन जैसे उद्योगों में महत्वपूर्ण हैं।
कोशिश यह है कि फिनाइलप्रोपेनॉइड्स का उत्पादन ई. कोली से करवाया जाए। इसके लिए पौधों के फिनाइलप्रोपेनॉइड बनाने वाले जीन्स को ई. कोली के जीनोम में जोड़ा जा सकता है। लेकिन दिक्कत यह है कि ई. कोली ऐसे पदार्थों को सहन नहीं कर सकता। इसलिए ज़रूरी है कि ई. कोली से फिनाइलप्रोपेनॉइड्स बनवाने के लिए पौधों से इन पदार्थों के निर्माण व सहिष्णुता के जीन्स भी बैक्टीरिया में जोड़े जाएं। और कुछ मामलों में यह सफलतापूर्वक किया भी गया है।
एक महत्वपूर्ण तकनीक
ई. कोली पर काम करते हुए लेडरबर्ग और एस्थर ने रेप्लिका प्लेटिंग नामक एक तकनीक का विकास किया जो बैक्टीरिया की छंटाई की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण साबित हुई। इसका उपयोग करके यह पता लगाया जा सकता था कि कौन-से बैक्टीरिया एंटीबायोटिक के या संक्रामक वायरस के प्रतिरोधी हैं। इसमें किया यह जाता है कि एक तश्तरी (मास्टर प्लेट) में बैक्टीरिया कॉलोनियों को पनपने दिया जाता है। फिर इस तश्तरी से इन बैक्टीरियल कॉलोनी की छाप को एक अन्य बैक्टीरियाविहीन तश्तरी पर आरोपित कर दिया जाता है। यह मास्टर तश्तरी की प्रतिकृति होती है। इसके बाद एंटीबायोटिक या संक्रामक वायरस को उस दूसरी तश्तरी पर छिड़का जाता है। तब सिर्फ वही कॉलोनी विकसित होंगी जो प्रतिरोधी है। इस तरह से मास्टर तश्तरी पर प्रतिरोधी कॉलोनियों की स्थिति पता चल जाती है।
रेप्लिका प्लेटिंग के प्रयोगों से स्पष्ट हुआ कि बैक्टीरिया में प्रतिरोध उत्परिवर्तनों का परिणाम है, न कि चयनकारी वातावरण के प्रति किसी अनुकूलन का।
जीन नियमन
जीन नियमन का अध्ययन पेरिस के पाश्चर इंस्टीट्यूट में शुरू हुआ था। जीन नियमन के विकास में तीन लोगों का योगदान प्रमुख रहा – आंद्रे ल्वॉफ, जेकेस मोनोड और फ्रांस्वा जेकब। यहां बताया जा सकता है कि ये तीनों ही नाज़ी अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष में गहराई से जुड़े थे।
1941 में जैकेस मोनोड ने ई. कोली तथा बैसिलस सब्टिलिस पर काम करते हुए डाइऑक्सी (Diauxie) की खोज की थी। डाइऑक्सिक प्रयोग (Diauxic experiment) एक ऐसा प्रयोग है जिसमें एक जीव को दो अलग-अलग शर्कराओं (जैसे ग्लूकोज़ और लैक्टोज़) के मिश्रण वाले माध्यम में पनपाया जाता है। इस प्रयोग में, जीव पहले एक शर्करा (प्राय: ग्लूकोज़) का उपयोग करता है। इस दौरान, जीव तेज़ी से बढ़ता है। जब ग्लूकोज़ समाप्त हो जाता है, तो जीव को लैक्टोज़ का उपयोग करने के लिए अनुकूलित होने में कुछ समय लगता है। इस दौरान, जीव की वृद्धि धीमी हो जाती है। इसके बाद जीव लैक्टोज़ का उपयोग करना शुरू कर देता है। वृद्धि का यह दूसरा चरण पहले चरण की तुलना में धीमा होता है।
यह प्रयोग जीवों द्वारा शर्करा के चयापचय और एंज़ाइम संश्लेषण की प्रक्रिया को समझने में मदद करता है और जीन नियमन के अध्ययन के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह प्रयोग विभिन्न प्रकार के जीवों में चयापचय अनुकूलन का अध्ययन करने के लिए भी उपयोगी है। मोनोड ने इसे एंज़ाइम अवरोध या एंज़ाइमों के दमन का परिणाम बताया। मोनोड की प्रारंभिक व्याख्या इस विचार पर केंद्रित थी कि लैक्टोज़ चयापचय के लिए आवश्यक एंज़ाइम ग्लूकोज़ की उपस्थिति में बाधित या दबा दिए जाते हैं।
मोनोड ने आगे बढ़कर ई. कोली में लैक्टोज़ तंत्र का जेनेटिक विश्लेषण किया। उन्होंने स्थापित किया कि ई. कोली में बीटा-गैलेक्टोसाइडेज़ एंज़ाइम का संश्लेषण तीन जीन्स पर निर्भर होता है। इसके उत्पादन को विशिष्ट उद्दीपनों पर शुरू करवाया जाता है। ऐसा एक उद्दीपन होता है लैक्टोज़ की उपस्थिति।
कई सारे प्रयोगों के बाद जेकब और मोनोड ने जीन नियमन का एक मॉडल प्रस्तावित किया था।
जीन नियमन का मॉडल
जेकब और मोनोड ने ई. कोली मॉडल में जीन नियमन की प्रक्रिया का गहन अध्ययन किया था। इसी दौरान उन्होंने संदेशवाहक यानी मेसेंजर आरएनए (एम-आऱएनए) की खोज की थी। एम-आरएनए ही डीएनए पर उपस्थित जेनेटिक सूचना को राइबोसोम तक ले जाने का काम करता है। इसके बाद उन्होंने जीन नियमन का एक मॉडल प्रस्तावित किया था। इस मॉडल के अनुसार किसी एक प्रक्रिया के लिए ज़िम्मेदार जीन्स ऑपेरॉन नामक समूह में एकीकृत होते हैं। यह भी कहा गया था कि एक ही एम-आरएनए एकाधिक सम्बंधित प्रोटीन्स का वाहक हो सकता है। इस मॉडल से यह समझने में मदद मिली कि कोशिका में विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में प्रोटीन उत्पादन का समन्वय कैसे किया जाता है। जेकब और मोनोड ने ई. कोली में लैक ऑपेरॉन (lac operon) के उदाहरण से इसे स्पष्ट किया था।
यह ऑपेरॉन ई. कोली में लैक्टोज़ नामक शर्करा के पाचन के लिए ज़रूरी एंज़ाइम के निर्माण का नियमन करता है। जेकब और मोनोड यह दर्शाने में सफल रहे थे कि इस ऑपेरॉन की अभिव्यक्ति एक दमनकारी (repressor) जीन से संचालित होती है जो लैक्टोज़ की अनुपस्थिति में डीएनए के एक हिस्से से जुड़ जाता है और उसकी अभिव्यक्ति को बाधित कर देता है। जब लैक्टोज़ उपस्थित होता है तो वह (लैक्टोज़) जाकर इस दमनकारी जीन से जुड़कर उसकी क्रिया को रोक देता है और डीएनए से एम-आरएनए का निर्माण (प्रतिलेखन) शुरू हो जाता है। इस मॉडल ने न सिर्फ एम-आरएनए की उपस्थिति प्रमाणित की बल्कि यह जटिल जीवों में जीन नियमन को समझने का मॉडल बना।
इस पूरी प्रक्रिया को कदम-दर-कदम समझने और एक संपूर्ण चित्र तैयार करने में कई वैज्ञानिकों, कई सूक्ष्म जीवों की भूमिका रही है, जिनमें ई. कोली ने भी हाथ बंटाया है। और जीन नियमन की प्रक्रिया का खुलासा करने के लिए जेकब और मोनोड (साथ में आंद्रे ल्वॉफ) को 1965 में नोबेल से नवाज़ा गया था।
डीएनए से प्रोटीन का सफर
वैज्ञानिकों के शोध कार्य से यह तो स्पष्ट हो गया था कि डीएनए में न्यूक्लियोटाइड के क्रम से ही यह तय होता है कि कौन-से प्रोटीन बनेंगे। लेकिन यह प्रक्रिया कैसे काम करती है, इसे लेकर कई सारे विचार थे।
एक विचार यह था कि डीएनए के अणु पर ही प्रोटीन का संश्लेषण होता है (जॉर्ज गैमोव)। दूसरी ओर, यह विचार भी था कि प्रोटीन का संश्लेषण डीएनए के अणु पर नहीं बल्कि कोशिका द्रव्य में होता है और इसके लिए आरएनए की ज़रूरत होती है। लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि यह प्रक्रिया होती कैसे है और इसमें आरएनए की क्या भूमिका है?
फिर 1940 के दशक में ज़्यां ब्रेश और टॉरब्योर्न कैस्परसन (Jean Brachet, Torbjörn Caspersson) ने ई. कोली व अन्य जीवों पर काम करके बताया कि आरएनए ज़्यादातर कोशिका द्रव्य में पाया जाता है और जिस कोशिका में प्रोटीन संश्लेषण तेज़ गति से हो रहा हो उसमें आरएनए की मात्रा भी अधिक होती है। इससे लगा कि प्रोटीन संश्लेषण और आरएनए के बीच कुछ सम्बंध है।
आरएनए की भूमिका की पहली परिकल्पना आंद्रे बोइविन (André Boivin) के वर्ष 1947 के शोध पत्र में सामने आई थी। यह शोध पत्र फ्रेंच भाषा में लिखा गया था, लेकिन अंग्रेज़ी भाषा में लिखे गए संपादकीय में पर्चे का सार इन शब्दों में व्यक्त किया गया था: “डीएनए नामक विशाल अणु एक अन्य विशाल अणु आरएनए के निर्माण का संचालन करता है और ये आरएनए अणु कोशिका द्रव्य में प्रोटीन निर्माण का नियंत्रण करते हैं।”
इसके बाद 1950 के दशक में वैज्ञानिकों ने ई. कोली के कोशिका द्रव्य का विश्लेषण करके आरएनए प्रचुर संरचनाएं खोजीं जिन्हें उस समय माइक्रोसोमल पार्टिकल कहा गया। आगे चलकर इनका नाम राइबोसोम हुआ और यह पहचाना गया कि राइबोसोम प्रोटीन संश्लेषण का प्रमुख पात्र है। राइबोसोम पर उपस्थित आरएनए के आधार पर यह विचार बना कि राइबोसोम ही प्रोटीन संश्लेषण की स्थली है।
धीरे-धीरे डीएनए से प्रोटीन तक की पूरी प्रक्रिया स्पष्ट हुई। डीएनए से संदेशवाहक आरएनए बनता है जो जाकर राइबोसोम से जुड़ जाता है। यहां छोटे-छोटे आरएनए अणु (ट्रांसफर आरएनए – tRNA) बनते हैं जो कोशिका द्रव्य में से एक-एक अमीनो अम्ल को राइबोसोम तक लाते हैं जिन्हें जोड़कर प्रोटीन बनता है।
इन खोजों ने न सिर्फ जीव विज्ञान में समझ को आगे बढ़ाया बल्कि इसने आजकल हो रहे जीव वैज्ञानिक नवाचारों का मार्ग भी प्रशस्त किया। एम-आरएनए की खोज ने चिकित्सा के क्षेत्र में नए विचारों को जन्म दिया।
बैक्टीरिया में लैंगिक प्रजनन
एफ. जेकब और ई. वोलमैन ने बैक्टीरिया में लैंगिक प्रक्रिया का खुलासा किया और बैक्टीरिया के गुणसूत्र की वृत्ताकार बनावट को उजागर किया था। इसके लिए उन्होंने एक अन्य प्रयोगशाला में पृथक किए गए ई. कोली के एक स्ट्रेन की मदद ली थी।
रीकॉम्बिनेन्ट टेक्नॉलॉजी
ई. कोली तथा उसे संक्रमित करने वाले वायरस रिकॉम्बिनेंट डीएनए टेक्नॉलॉजी के विकास में प्रमुख रहे हैं। यह टेक्नॉलॉजी डब्ल्यू. आर्बर (Werner Arber) द्वारा रेस्ट्रिक्शन मॉडिफिकेशन तंत्र की खोज पर आधारित थी।
रेस्ट्रिक्शन मॉडिफिकेशन तंत्र की खोज भी ई. कोली और बैक्टीरियोफेज पर किए गए प्रयोगों से ही संभव हुई थी। सबसे पहले तो यह देखा गया कि कुछ फेज किसी एक बैक्टीरिया स्ट्रेन पर विकसित होने के लिए अनुकूलित होते हैं लेकिन किसी अन्य स्ट्रेन पर नहीं। इसका मतलब है कि बैक्टीरिया में बाहरी डीएनए के विरुद्ध कुछ प्रतिरोधक प्रक्रिया होती है।
इस अवलोकन ने स्टुअर्ट लिन (Stuart Linn) और आर्बर को ई. कोली में से दो तरह के एंज़ाइम पृथक करने को प्रेरित किया – रेस्ट्रिक्शन एंज़ाइम तथा मॉडिफिकेशन एंज़ाइम। आगे चलकर हैमिल्टन स्मिथ (Hamilton Othanel Smith) ने एक बैक्टीरिया हीमोफिलस इंफ्लुएंज़े में से एक रेस्ट्रिक्शन एंज़ाइम शुद्ध रूप में प्राप्त भी किया। लिन और आर्बर ने एक मॉडिफिकेशन एंज़ाइम (मिथायलेज़) प्राप्त किया जो डीएनए पर सुरक्षात्मक मिथाइल समूह जोड़ता है और एक रेस्ट्रिक्शन एंज़ाइम मिथाइल समूह रहित सारे डीएनए को तोड़ देता है। यानी स्वयं बैक्टीरिया का डीएनए मिथाइल समूह युक्त होने के चलते बच जाएगा जबकि बाहर से आया डीएनए नष्ट कर दिया जाएगा।
इस खोज का महत्व स्वत: स्पष्ट है – इसने हमें डीएनए के साथ खिलवाड़ का एक महत्वपूर्ण औज़ार उपलब्ध कराया है।
यह थी कुछ महत्वपूर्ण अध्ययनों पर बात। लेकिन, जैसा कि शुरू में भी कहा था, ई. कोली कम से कम 3,12,000 शोध पत्रों का विषय रहा है और इसके ज़रिए कई खुलासे हुए हैं, भविष्य में भी शोध होंगे। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo credit – https://www.news-medical.net/life-sciences/What-is-Viral-Transduction.aspx