कोविड-19 टीकों की कमी का सामना करते हुए कुछ देशों ने एक
अप्रमाणित रणनीति अपनाई और टीके की खुराक के लिए अलग-अलग टीकों का उपयोग किया। आम
तौर पर अधिकांश टीकों की दो खुराक दी जाती है। लेकिन कनाडा और कई युरोपीय देश कुछ
रोगियों में दो खुराकों के लिए अलग-अलग टीकों के उपयोग की सिफारिश कर रहे हैं। और, शुरुआती आंकड़े बता रहे हैं कि मजबूरी की यह रणनीति वास्तव में लाभदायक हो सकती
है।
तीन अध्ययनों में रक्त के नमूनों की जांच करने पर पता चला है कि एस्ट्राज़ेनेका
टीके की एक खुराक के बाद दूसरी खुराक के लिए फाइज़र-बायोएनटेक टीके का उपयोग करने
से मज़बूत प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया विकसित होती है। इनमें से दो अध्ययनों से यह भी
पता चला है कि मिश्रित टीकों से फाइज़र-बायोएनटेक की दो खुराकों के बराबर सुरक्षा
मिलेगी जो सबसे प्रभावी कोविड-19 टीकों में से एक है।
यदि टीकों का मिला-जुला उपयोग सुरक्षित और प्रभावी होता साबित है तो अरबों
लोगों को सुरक्षा प्रदान की जा सकती है। क्लीनिकल रिसर्च स्पेशलिस्ट क्रिस्टोबल
बेल्डा-इनिएस्ता के अनुसार तब दूसरी खुराक के लिए उसी टीके की उपलब्धता की चिंता
नहीं रहेगी। उनके नेतृत्व में किए गए एक अध्ययन में 448 लोगों में एस्ट्राज़ेनेका
और बायोएनटेक टीकों के मिले-जुले उपयोग में दूसरी खुराक के दो सप्ताह बाद मामूली
साइड इफेक्ट और मज़बूत एंटीबॉडी प्रतिक्रिया देखी गई।
इसी तरह बर्लिन स्थित चैरिटी युनिवर्सिटी हॉस्पिटल में 61 स्वास्थ्य
कार्यकर्ताओं को 10 से 12 सप्ताह के अंतराल से दो खुराकें दी गर्इं। इन सभी
कार्यकर्ताओं में स्पाइक एंटीबॉडी पाई गई जो तीन सप्ताह के अंतराल में
फाइज़र-बायोएनटेक टीके की दोनों खुराकें प्राप्त होने के बाद पाई गई थीं और कोई
साइड इफेक्ट भी नहीं हुआ। इसके अलावा, एंटीबॉडी प्रतिक्रिया को
बढ़ावा देने वाली और शरीर को संक्रमित कोशिकाओं से छुटकारा दिलाने वाली टी-कोशिकाओं
की प्रतिक्रया भी पूरी तरह फाइज़र-बायोएनटेक से टीकाकृत लोगों से अधिक पाई गर्इं।
जर्मनी की टीम ने एक छोटे अध्ययन में लगभग समान परिणाम सामने पाए हैं।
इन निष्कर्षों के बाद वैज्ञानिकों का मत है कि दो अलग-अलग टीकों की खुराकें
अधिक शक्तिशाली साबित हो सकती हैं। गौरतलब है कि दो टीकों को मिलाकर उपयोग करने से
प्रतिरक्षा प्रणाली को रोगजनकों को पहचानने के कई तरीके मिल सकते हैं। वैज्ञानिकों
के अनुसार mRNA आधारित टीके एंटीबॉडी
प्रतिक्रिया को तेज़ करते हैं और वेक्टर-आधारित टीके टी-कोशिका प्रतिक्रियाओं को शुरू
करते हैं। इसलिए दो प्रकार के टीकों का उपयोग करने पर बेहतर परिणाम मिलते हैं।
अलबत्ता,
कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है और
लंबे समय के अध्ययनों की ज़रूरत है। फिलहाल वैज्ञानिक लगभग 100 लोगों में आठ
विभिन्न प्रकार के टीकों को अदल-बदल कर लगाने का प्रयास कर रहे
हैं और साथ ही दो खुराकों के बीच के अंतराल में भी परिवर्तन करके अध्ययन किया
जाएगा।
फिर भी, ये निष्कर्ष नीति परिवर्तन के लिए सहायक सिद्ध हुए हैं। स्पेन ने 60 वर्ष से कम आयु के लोगों के लिए मिश्रित टीकों के उपयोग करने की अनुमति दी है। कनाडा, जर्मनी, फ्रांस, नॉर्वे और डेनमार्क जैसे देश जिन्होंने एस्ट्राज़ेनेका टीकों पर आयु सीमा निर्धारित की थी उन्होंने भी इस तरह के सुझाव दिए हैं। आगे चलकर और अधिक टीके शामिल किए जा सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_image_-1280w__no_aspect/public/vials_1280p_0.jpg?itok=iEYFoEVj
स्कूल के दिनों की सुखद यादों में हमें अक्सर परख नलियों, बुन्सन बर्नर की मदद से किए गए रसायन विज्ञान के प्रयोग भी याद आते हैं। रसायन
विज्ञान अणुओं के गुणों का अध्ययन है। हर सजीव या निर्जीव चीज़ अणुओं से बनी होती
है। लेकिन स्कूल में पढ़ाए गए साधारण रसायन, जैसे
हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (जिसमें दो परमाणु होते हैं – एक हाइड्रोजन; एक क्लोरीन),
जैविक रसायन विज्ञान की जटिलताओं के सामने बौने पड़ जाते
हैं। किसी प्रोटीन अणु में हज़ारों परमाणु हो सकते हैं।
अणुओं का अनुरूपण
रासायनिक सिद्धांतों के बढ़ते ज्ञान के कारण ‘परख नली’ से आगे बढ़कर अणुओं का
सैद्धांतिक अध्ययन, उनकी संरचना और अन्य अणुओं से उनकी परस्पर
क्रिया का अध्ययन संभव हो गया है। उदाहरण के लिए जिस तरह अनुरूपण (सिमुलेशन) गेम
में कंप्यूटर के पर्दे पर विमान के उड़ने-उतरने का अनुरूपण किया जाता है, उसी तरह जटिल जैविक अणुओं की परस्पर क्रिया का भी पर्याप्त सटीकता के साथ
अनुरूपण किया जा सकता है। अनुरूपण चाहे विमान की उड़ान का हो या अणुओं का, अनुरूपण की गणितीय विधियों को भौतिकी के मूलभूत नियमों से जोड़ा जाता है।
देखा जाए तो कोई भी प्रोटीन एक-दूसरे से जुड़े अमीनो एसिड (20 अमीनो एसिड, जिनमें से प्रत्येक अमिनो एसिड 10 से 27 परमाणुओं से बना होता है) की एक सीधी शृंखला
ही तो है,
जो बड़े करीने से एक अद्वितीय आकार में तह की गई होती है।
प्रत्येक अमीनो एसिड पर आवेश (धनात्मक, ऋणात्मक, उदासीन) या उसके जुड़ने (या चिपकने) की क्षमता भिन्न होती है। अमीनो एसिड की इस
शृंखला के कुछ हिस्से अणु की गहराई में दबे होते हैं। और बाकी हिस्से सतह पर होते
हैं। सतह पर मौजूद अमीनो एसिड ही अन्य प्रोटीन्स से लेन-देन करते हैं – ये कोई
संरचना बनाने,
ग्राही तथा एंटीबॉडी आदि से जुड़ने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
अब हम वास्तविक दुनिया का रुख करते हैं। हममें से कई लोगों
ने कोविड-19 महामारी की प्रगति पर लगातार नज़र रखी है, और
इसके थमने या धीमा होने के संकेतों पर नज़र रखी है। हमने नई शब्दावली सीखी है, और कंटीले स्पाइक वाले गेंदनुमा वायरस की डरावनी छवि के आदी भी हो गए हैं।
वर्तमान में हम इस वायरस के नवीन और अधिक चिंताजनक संस्करणों का सामना कर रहे
हैं। प्रत्येक संस्करण को या तो उसके भौगोलिक उत्पत्ति, या
डब्ल्यूएचओ नामकरण पद्धति (अल्फा, बीटा, आदि)
से मिले नाम,
या ज़्यादा सटीक E484K, D614G जैसे नामों से पुकारा जाता है। E484K, D614G जैसी ये संख्याएं हमें प्रोटीन में अमीनो एसिड की रैखीय शृंखला का ध्यान
दिलाती हैं। इस मामले में यह वायरस की सतह पर मौजूद स्पाइक प्रोटीन है।
स्पाइक प्रोटीन संक्रमण शुरू करता है – यह हमारे फेफड़ों और अन्य ऊतकों की
कोशिकाओं की सतह पर मौजूद ग्राहियों से जुड़ जाता है। यह प्रोटीन अणु 1273 अमीनो
एसिड की एक शृंखला है, और तीन अलग-अलग अणु मिलकर वायरस का
‘स्पाइक’ बनाते हैं। वायरस संस्करण E484K में संख्या 484 अमीनो एसिड की इस शृंखला
के 484वें स्थान की द्योतक है। E इस स्थान पर पहले संस्करण में मौजूद ऋणात्मक आवेश वाले अमीनो एसिड ग्लूटामेट
का संकेत है जो मेज़बान ग्राही से जाकर जुड़ता है। पूरा नाम दर्शाता है कि इस
संस्करण में ऋणावेशित E
(ग्लूटामेट) का स्थान अब धनावेशित अमीनो एसिड K (लाइसीन) ने ले लिया है। यह वाला उत्परिवर्तन बीटा और गामा
संस्करणों में पाया गया है।
उत्परिवर्तन का प्रभाव
गौरतलब है कि उत्परिवर्तन में ऋणात्मक आवेश वाले ग्लूटामेट का स्थान धनात्मक
आवेश वाले लाइसीन ने ले लिया है। क्या यह हम मनुष्यों के लिए अच्छी खबर है? उपलब्ध मैदानी आंकड़ों से पता चलता है कि वायरस का यह संस्करण अधिक संक्रामक
है। और तो और,
वायरस का यह संस्करण वायरस के खिलाफ बनी एंटीबॉडी से बच
निकलने में भी सक्षम है।
सुर्खियों में छाए डेल्टा संस्करण में E484Q उत्परिवर्तन
हुआ है। इसमें Q का
मतलब ग्लूटामाइन है, जो ग्लूटामेट (E) से बहुत अलग नहीं है लेकिन Q उदासीन और ध्रुवीय है।
एक अन्य उत्परिवर्तन है L452 R। यह उत्परिवर्तन भी स्पाइक के ग्राही से बंधने वाले स्थान पर हुआ है। इसमें L का मतलब है ल्यूसीन जो कि अनावेशित और
‘चिपचिपा’ अमीनो एसिड है, और R धनावेशित आर्जिनीन है।
यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि वायरस के कई चिंताजनक संस्करणों के स्पाइक
प्रोटीन के ग्राही से जुड़ने वाले हिस्से में सिर्फ एक या दो अमीनो एसिड में
परिवर्तन नहीं हुए हैं। यूके में पहली बार देखे गए अल्फा संस्करण में कुल 23
उत्परिवर्तन हैं। इनमें से नौ उत्परिवर्तन स्पाइक प्रोटीन के किसी अन्य भाग में
हुए हैं और कुछ अन्य उत्परिवर्तन वायरस के अन्य भागों में हुए हैं, जिन्हें अच्छी तरह समझा नहीं जा सका है।
यह स्पष्ट है कि इस प्रकार के परिवर्तन – विशाल अणु में एक या दो प्रतिस्थापन – का काफी कुशल और काफी विश्वसनीय कंप्यूटर मॉडल तैयार किया जा सकता है। जब भी वायरस प्रोटीन का नया संस्करण सामने आता है तो इस तरह की मॉडलिंग करके हम उसके बारे में त्वरित अनुमान लगा सकते हैं। इसके अलावा, मॉडलिंग हमें वायरस के प्रोटीन से मज़बूती से जुड़ने वाली औषधियों के अणुओं को डिज़ाइन करने और उन्हें परिष्कृत करने में मदद कर सकता है। उदाहरण के लिए, कोरोनावायरस में एक एंज़ाइम होता है (प्रोटीएज़ वर्ग का एंज़ाइम), जो नए वायरस कण बनने से पहले स्पाइक प्रोटीन में कांट-छांट करके उसे सही आकार देता है। यदि औषधि अणु इस एंज़ाइम से कसकर बंध जाए, तो वह इस कांट-छांट को रोक कर वायरस की वृद्धि बाधित करेगा। आणविक मॉडलिंग से हज़ारों संभावित औषधियों में कुछ सर्वाधिक कारगर अणुओं को पहचानने में मदद मिलती है, जिनकी कारगरता फिर प्रयोगशाला में जांची जा सकती है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.thehindu.com/sci-tech/science/5c31ej/article34799223.ece/ALTERNATES/LANDSCAPE_615/Figure-1-new
महामारी की शुरुआत से वैज्ञानिक कोविड-19 के उपचार के लिए
एंटीबॉडी विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं। फिलहाल कई एंटीबॉडी क्लीनिकल परीक्षण
के अंतिम दौर में हैं और कइयों को अमेरिका और अन्य देशों की नियामक एजेंसियों
द्वारा आपातकालीन उपयोग की अनुमति दी गई है।
अलबत्ता,
डॉक्टरों के बीच एंटीबॉडी उपचार अधिक लोकप्रिय नहीं है।
गौरतलब है कि फिलहाल एंटीबॉडी इंट्रावीनस मार्ग (रक्त शिराओं) से दी जाती हैं न कि
सीधे सांस मार्ग जबकि वायरस मुख्य रूप से वहीं पाया जाता है। इस वजह से काफी अधिक
मात्रा में एंटीबॉडी का उपयोग करना होता है। एक अन्य चुनौती यह है कि सार्स-कोव-2
वायरस के कुछ संस्करण ऐसे भी हैं जो एंटीबॉडीज़ को चकमा देने में सक्षम हैं।
इस समस्या के समाधान के लिए युनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास के हेल्थ साइंस सेंटर के
एंटीबॉडी इंजीनियर ज़ीचियांग एन और उनकी टीम ने ऐसी एंटीबॉडी विकसित कीं जिन्हें
सीधे श्वसन मार्ग में पहुंचाया जा सके जहां उनकी ज़रूरत है। इसके लिए टीम ने स्वस्थ
हो चुके लोगों की हज़ारों एंटीबॉडीज़ की जांच की और अंतत: ऐसी एंटीबॉडीज़ पर ध्यान
केंद्रित किया जो सार्स-कोव-2 के उस घटक की पहचान कर पाएं जो वायरस को कोशिकाओं
में प्रवेश करने में मदद करता है। इनमें से सबसे प्रभावी IgG एंटीबॉडीज़ पाई गर्इं जो संक्रमण के बाद अपेक्षाकृत देर से
प्रकट होती हैं लेकिन विशिष्ट रूप से किसी रोगजनक के खिलाफ कारगर होती हैं।
इसके बाद टीम ने सार्स-कोव-2 को लक्षित करने वाले IgG अंशों को IgM नामक एक अन्य अणु से जोड़ा। IgM संक्रमण के प्रति काफी शुरुआती दौर में प्रतिक्रिया देता है। इस तरह से तैयार
किए गए IgM ने सार्स-कोव-2 के 20
संस्करणों के विरुद्ध मात्र IgG की तुलना में अधिक शक्तिशाली प्रभाव दर्शाया। नेचर में प्रकाशित
रिपोर्ट के अनुसार जब विकसित किए गए IgM को चूहों के श्वसन मार्ग में संक्रमण के 6 घंटे पहले या 6 घंटे बाद डाला गया
तो दो दिनों के भीतर चूहों में वायरस का संक्रमण कम हो गया।
लेकिन फिलहाल ये प्रयोग चूहों पर किए गए हैं और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या
ये एंटीबॉडी मनुष्यों में उसी तरह से काम करेंगी।
एन का मत है कि यह एंटीबॉडी एक तरह का रासायनिक मास्क है जिसका उपयोग सार्स-कोव-2
के संपर्क में आए व्यक्ति कर सकते हैं। यह उन लोगों के लिए रक्षा का एक और कवच हो
सकता है जो टीका लगने के बाद पूरी तरह सुरक्षित नहीं हुए हैं।
IgM अणु अपेक्षाकृत टिकाऊ होते हैं, इसलिए इनको नेज़ल स्प्रे के रूप में आपातकालीन उपयोग के लिए रखा जा सकता है। फिलहाल कैलिफोर्निया आधारित IgM बायोसाइंस नामक एक बायोटेक्नॉलॉजी कंपनी द्वारा एन के साथ मिलकर इस एंटीबॉडी के क्लीनिकल परीक्षण की योजना है। (स्रोत फीचर्स)
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आजकल अखबारों में, नेट पर,
सोशल मीडिया पर ऐसे
पौधों की सूचियों की भरमार है जिनके बारे में यह दावा किया जा रहा है कि वे रात
में भी ऑक्सीजन छोड़ते हैं। जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया (https://timesofindia.indiatimes.com/life-style/home-garden/5-plants-that-release-oxygen-at-night/photostory/59969056.cms) में छपी यह खबर ‘फाइव प्लांट्स रिलीज़
ऑक्सीजन एट नाइट’। ये पांच पौधे हैं एलो वेरा,
स्नेक प्लांट, ऑर्किड, नीम
और पीपल। इनमें पहले तीन पौधे तो ‘कैम’ प्रकार के हैं परंतु बाकी दो सामान्य प्रकार
के हैं। अर्थात अन्य सभी पौधों जैसा प्रकाश संश्लेषण करने वाले हैं। कैम के बारे
में आगे बात करते हैं। एक और साइट है फर्न एंड पेटल्स जिसमें आलेख है ‘9 प्लांट
रिलीज़ ऑक्सीजन एट नाइट’। नाम हैं एलो वेरा,
पीपल, स्नेक
प्लांट, अरेका पाम, नीम,
ऑर्किड, जरबेरा, क्रिसमस
कैक्टस, तुलसी, मनी प्लांट।
इन सब में कहीं ना कहीं नासा का ज़िक्र है।
परंतु नासा की मूल रिपोर्ट में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि ये पौधे रात में
ऑक्सीजन छोड़ते हैं। इस रिपोर्ट में यह ज़रूर कहा गया है कि ये तरह-तरह के वाष्पशील
पदार्थों को सोखकर घर के अंदर की हवा को साफ करते हैं। ये हवा से रात में भी
कार्बन डाईऑक्साइड ग्रहण करते हैं क्योंकि इनमें से अधिकतर कैम पौधे हैं।
हद तो तब हो गई जब प्राणी विज्ञान के मेरे
एक परिचित प्राध्यापक ने रोज़ मेरे मोबाइल पर चौबीसों घंटे ऑक्सीजन छोड़ने वाले
पौधों की लिस्ट भेजना शुरू कर दिया। मैंने उन्हें बताया कि ऐसा नहीं हो सकता परंतु
वे मानते ही नहीं, पौधों की सूची रोज़ डाल देते हैं।
1989 में प्रकाशित नासा की उक्त रिपोर्ट
में 15 पौधों की सूची है। इनमें इंग्लिश आईवी,
स्पाइडर प्लांट, पीस
लिली, चाइनीस एवरग्रीन, बैम्बू पाम,
हार्टलीफ
फिलोडेंड्रॉन, एलीफैंट फिलोडेंड्रॉन,
गोल्डन पोथास, ड्रेसीना
की विभिन्न किस्में, फाइकस बेंजामिना आदि के नाम हैं। रिपोर्ट के मुताबिक ये हवा
को साफ करते हैं, हमारे आसपास की हवा से प्रदूषक पदार्थों को हटाते हैं। ये
मुख्य रूप से बेंज़ीन, फॉर्मेल्डिहाइड, ट्राइक्लोरोएथेन,
ज़ायलीन, अमोनिया
जैसे वाष्पशील पदार्थों को सोखते हैं। साथ ही कार्बन डाईऑक्साइड भी सोखते हैं।
इनमें से कुछ पौधे कैम प्रकार के भी हैं। रात में स्टोमैटा खुले होने के कारण ये
इन प्रदूषकों को सोखते रहते हैं। रिपोर्ट में रात में ऑक्सीजन छोड़ने का ज़िक्र कहीं
नहीं है।
तो भ्रम का कारण क्या है?
मुझे लगता है कि यह भ्रम आधी-अधूरी जानकारी
से उत्पन्न हुआ है। हमने यह तो पढ़ लिया कि कैम पौधे रात में प्रकाश संश्लेषण करते
हैं पर यह ध्यान नहीं दिया कि इस क्रिया का कौन-सा चरण रात में और कौन-सा चरण दिन
में चलता है। इस क्रिया के कितने चरण हैं?
और कौन, कब
और कैसे कार्य करता है?
पौधों में भोजन निर्माण अर्थात प्रकाश
संश्लेषण एक बहुत ही जटिल जैव रासायनिक क्रिया है। इसमें चार चीज़ों की ज़रूरत होती
है। पहला, प्रकाश; सामान्यत: इसका स्रोत सूर्य का प्रकाश ही
है। वैसे कृत्रिम प्रकाश यानी फिलामेंट बल्ब,
सीएफएल या एलईडी की
तेज़ रोशनी में भी यह क्रिया हो सकती है। दूसरा,
पानी (जो जड़ों से
सोखा जाता है); तीसरा, कार्बन डाईऑक्साइड (गैस जो हवा से मिलती
है)। और चौथा है क्लोरोफिल यानी पत्तियों में उपस्थित हरा पदार्थ। पौधों में भोजन
निर्माण की क्रिया को एकदम सरल रूप में हम यू लिख सकते हैं
यह जटिल जैव रासायनिक क्रिया पौधों में 2
चरणों में संपन्न होती है। पहले चरण के लिए प्रकाश ज़रूरी होता है। अत: इसे
प्रकाश-निर्भर क्रिया कहते हैं। इसमें पानी भाग लेता है,
कुछ इस तरह – क्लोरोफिल की उपस्थिति में सूर्य के प्रकाश
की ऊर्जा पानी के अणु को तोड़ती है जिसके फलस्वरूप ऑक्सीजन बनती है और साथ में
एटीपी और एनएडीपीएच जैसे अणुओं के रूप में रासायनिक ऊर्जा संचित कर ली जाती है। इसके
लिए प्रकाश ज़रूरी है।
अर्थात भोजन निर्माण (प्रकाश संश्लेषण) के
प्रथम चरण में हरे पौधे प्रकाश ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदल देते हैं। इसे
प्रकाश-निर्भर अभिक्रिया कहते हैं और ऑक्सीजन इसी के दौरान निकलती है। यह ऑक्सीजन
स्टोमैटा के रास्ते हवा में विसरित हो जाती है। अन्य सभी जीवों के लिए ऑक्सीजन का
यही स्रोत है।
प्रकाश संश्लेषण के दूसरे चरण को डार्क
रिएक्शन (प्रकाश-स्वतंत्र अभिक्रिया) कहते हैं। इसके लिए प्रकाश ज़रूरी नहीं होता
परंतु यह प्रकाश की उपस्थिति में भी चलती रह सकती है और चलती है। अर्थात सामान्य
पौधों में प्रकाश-निर्भर अभिक्रिया और प्रकाश-स्वतंत्र अभिक्रिया दिन में साथ-साथ
लगातार चलती रहती हैं। प्रकाश-स्वतंत्र अभिक्रिया के दौरान उस रासायनिक ऊर्जा का
उपयोग होता है जो प्रकाश-निर्भर अभिक्रिया के दौरान रासायनिक रूप संचित हुई थी।
प्रकाश-स्वतंत्र अभिक्रिया को हम कुछ इस प्रकार लिख सकते हैं
कार्बन डाईऑक्साइड + एटीपी + एनडीपीएच = कार्बोहाइड्रेट +
पानी +
एडीपी + एनएडीपी
अधिकांश पौधों में यही चरण होते हैं। इन
सामान्य पौधों के अलावा कुछ ऐसे भी पौधे हैं जो रेगिस्तानी परिस्थितियों में उगते
हैं। यहां पानी की कमी होती है और गर्मी अधिक होती है। लिहाज़ा, पानी
बचाने के लिए इन पौधों के स्टोमैटा दिन में बंद रहते हैं और रात में खुलते हैं।
इन्हें क्रेसुलेसियन एसिड मेटाबोलिज़्म (कैम) पौधे कहा जाता है। इस प्रक्रिया को
सबसे पहले क्रेसुलेसी कुल के पौधों में खोजा गया था।
स्टोमैटा बंद होने के कारण कैम पौधों में
दिन के समय गैसों का आदान-प्रदान बहुत कम होता है। रात में स्टोमैटा खुले रहते हैं
और हवा की आवाजाही रहती है। अत: रात के समय ये पौधे कार्बन डाईऑक्साइड का संग्रहण
करते हैं। इस कार्बन डाईऑक्साइड को कार्बनिक अम्लों के रूप में परिवर्तित करके
पत्तियों की कोशिकाओं में जमा कर लिया जाता है।
दिन में जब इन कोशिकाओं पर सूर्य की रोशनी गिरती है तब स्टोमैटा तो बंद रहते हैं परंतु रात में बने कार्बनिक अम्लों के टूटने से कार्बन डाईऑक्साइड बनने लगती है जो प्रकाश संश्लेषण की सामान्य क्रिया में भाग लेती है। यह पहले चरण (प्रकाश-निर्भर अभिक्रिया) में बनी ऑक्सीजन एवं रासायनिक ऊर्जा अर्थात एटीपी और एनएडीपीएच द्वारा प्रकाश-स्वतंत्र अभिक्रिया के रास्ते कार्बोहायड्रेट में बदल जाती है।
कैम-प्रेमियों के लिए वैसे तो यह स्पष्ट ही है कि पौधा चाहे सामान्य प्रकाश संश्लेषण करने वाला हो या कैम चक्र की मदद लेता हो, ऑक्सीजन का उत्पादन तो प्रकाश-निर्भर अभिक्रिया के चरण में ही होता है और ज़ाहिर है यह अभिक्रिया दिन में होती है। लेकिन फिर भी यदि किसी कैम प्रेमी को पीपल के नीचे रात बिताकर ऑक्सीजन प्राप्त करने की धुन सवार है, तो एक सूचना काफी लाभदायक हो सकती है। पता यह चला है कि पीपल का पेड़ या पौधा उसी स्थिति में कैम चक्र का उपयोग करता है जव वह किसी अन्य पेड़ के ऊपर उगा हो। मिट्टी में लगा पीपल का पेड़ सामान्य प्रकाश संश्लेषण ही करता है। ज़ाहिर है किसी अन्य पेड़ के ऊपर पीपल के नन्हे पौधे ही उगते हैं, पेड़ तो ज़मीन पर ही होते हैं। तो कैम-सुख के लिए (यदि रात में ऑक्सीजन देने में मददगार हो तो भी) आपको किसी पेड़ के ऊपर उगे पीपल के पेड़ ढूंढने होंगे।
कैम पौधे इस मायने में विशिष्ट हैं उनमें
रात में कैम चक्र चलता है। लेकिन दिन में उसी कोशिका में प्रकाश-निर्भर क्रिया और
प्रकाश-स्वतंत्र अभिक्रिया (केल्विन चक्र) दोनों चलते रहते हैं। अत: स्पष्ट है कि
रात में ये ऑक्सीजन नहीं छोड़ते क्योंकि रात में उनमें प्रकाश-निर्भर अभिक्रिया
नहीं होती। रात में तो केवल कार्बन डाईऑक्साइड का संग्रहण ही होता है। यानी
सामान्य पौधों एवं कैम पौधों में अंतर सिर्फ इतना है कि कैम पौधों में कार्बन
डाईऑक्साइड को कार्बनिक अम्लों के रूप में जमा करके रखा जाता है और बाद में मुक्त
कर दिया जाता है। शेष प्रक्रिया तो वही है।
सवाल यह है कि क्या कुछ पौधे रात में प्रकाश संश्लेषण का प्रथम चरण यानी प्रकाश-निर्भर अभिक्रिया सम्पन्न कर सकते हैं। इसका जवाब है कि यह संभव नहीं है क्योंकि प्रकाश-निर्भर अभिक्रिया में पानी को तोड़कर उससे ऑक्सीजन मुक्त करने की क्रिया के लिए प्रकाश की जितनी मात्रा चाहिए रात में नहीं मिलती। यहां तक कि चांदनी रात में भी नहीं, क्योंकि पूर्णिमा की रात को भी चंद्रमा से दिन के सूर्य के प्रकाश की तुलना में 32 हज़ार गुना कम प्रकाश मिलता है। अत: यह कहना गलत है कि कैम पौधे (जैसे एलो वेरा, स्नेक प्लांट आदि) रात में प्रकाश संश्लेषण करते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं। हां, ये आसपास की हवा को साफ ज़रूर करते हैं। अत: कैम पौधे एयर प्यूरीफायर हो सकते हैं परंतु रात में ऑक्सीजन प्रदाता कदापि नहीं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://static.toiimg.com/photo/59969755.cms
वर्ष 1918 में उस समय के नए इन्फ्लुएंज़ा स्ट्रेन से मारे गए
दो जर्मन सैनिकों के फेफड़ों से बीसवीं सदी की सबसे विनाशकारी महामारी की आणविक झलक
देखने को मिली है। इन दोनों सैनिकों के फेफड़े लगभग सौ वर्षों से बर्लिन म्यूज़ियम
ऑफ नेचुरल हिस्ट्री में फॉर्मेलिन में संरक्षित रखे हुए हैं। हाल ही में
शोधकर्ताओं ने इन फेफड़ों में से वायरस के जीनोम के बड़े हिस्से को सफलतापूर्वक
अनुक्रमित किया है। इन आंशिक जीनोम्स में इस बात के सुराग मिले हैं कि शायद इस
फ्लू महामारी की दो लहरों के बीच यह वायरस मनुष्यों के साथ अनुकूलित हुआ होगा।
इसके अलावा शोधकर्ताओं ने 1918 में कभी जान गंवाने वाली म्यूनिश की एक महिला से
प्राप्त रोगजनक के पूरे जीनोम को भी अनुक्रमित किया है। यह रोगजनक वायरस का तीसरा
ऐसा जीनोम है और उत्तरी अमेरिका के बाहर का पहला। संग्रहालय में संरक्षित सामग्री
से आरएनए वायरस को पुनर्जीवित करने के ऐसे काम की पूर्व में सिर्फ कल्पना की जा
सकती थी।
गौरतलब है कि वर्तमान में जीनोम अनुक्रमण
एक नियमित कार्य हो गया है। कोरोनावायरस महामारी के दौरान शोधकर्ताओं द्वारा
सार्स-कोव-2 के 10 लाख से अधिक जीनोम का डैटाबेस एकत्रित किया गया है जिससे नए
संस्करणों निगरानी की जा सकी है। लेकिन 1918-19 में महामारी के लिए ज़िम्मेदार
एच1एन1 इन्फ्लुएंज़ा वायरस के बहुत कम अनुक्रमण उपलब्ध हैं।
इससे पहले 2000 के दशक में अमेरिका के कुछ
वैज्ञानिकों ने अलास्का की बर्फ में दफन एक महिला के शरीर से प्राप्त नमूनों से एक
पूरा जीनोम तैयार किया था। इसी तरह 2013 में आर्म्ड
फोर्सेस इंस्टीट्यूट ऑफ पैथोलॉजी में
संरक्षित नमूनों से अमेरिका के घातक फ्लू का दूसरा जीनोम पुनर्निर्मित किया गया। दोनों
ही प्रयास काफी श्रमसाध्य और महंगे थे।
इसी तरह के एक प्रयास में रॉबर्ट कोच
इंस्टीट्यूट के जीव वैज्ञानिक सेबेस्टियन कैल्विनैक और उनके सहयोगियों ने 1900 से
1931 के बीच बर्लिन के चिकित्सा संग्रहालय में संरक्षित फेफड़ों के ऊतकों के 13
नमूनों की जांच की। उनमें से तीन नमूनों में फ्लू वायरस के आरएनए मिले जो डेटिंग
करने पर 1918 के समय के पाए गए। गौरतलब है कि सार्स-कोव-2 की तरह इन्फ्लुएंज़ा
वायरस का जीनोम भी आरएनए आधारित था। आरएनए कई टुकड़ों में था लेकिन यह वायरस के
पूरे जीनोम को तैयार करने के लिए काफी था। यह एक 17 वर्ष की महिला का था और दोनों
सैनिकों में पाए गए जीनोम को 90 प्रतिशत और 60 प्रतिशत तक तैयार किया जा सका।
दो सैनिकों से प्राप्त आंशिक जीनोम महामारी
की पहली और हल्की लहर के समय के हैं जिसके बाद 1918 के अंत में इसने काफी गंभीर
रूप ले लिया था। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह वायरस पक्षियों से उत्पन्न हुआ था
और पहली और दूसरी लहर के बीच मनुष्यों में बेहतर ढंग से अनुकूलित हो गया। इसका एक
कारण वायरस की सतह पर उपस्थित एक महत्वपूर्ण प्रोटीन हीमग्लूटिनिन के लिए
ज़िम्मेदार जीन हो सकता है। इसमें अमीनो अम्ल की अदला-बदली वाला उत्परिवर्तन हुआ
जिसमें पक्षियों के फ्लू वायरस में पाए जाने वाले एक अमीनो अम्ल ग्लायसिन की जगह
एस्पार्टिक अम्ल ने ले ली। यह एस्पार्टिक अम्ल मनुष्यों के वायरस की विशेषता होती
है। हालांकि, दोनों जर्मन अनुक्रमों में एस्पार्टिक अम्ल ऐसी स्थिति में
था जिससे यह बात संभव नहीं लगती।
फिर भी शोधकर्ताओं को वायरस के
न्यूक्लियोप्रोटीन के जीन में विकास के संकेत मिले हैं। वास्तव में
न्यूक्लियोप्रोटीन एक ऐसा प्रोटीन है जो यह निर्धारित करने में मदद करता है कि
वायरस किस प्रजाति को संक्रमित कर सकता है। 1918 की महामारी के अंत में पाए गए
दोनों फ्लू स्ट्रेन के जीन में दो ऐसे उत्परिवर्तन पाए गए जो इन्फ्लुएंज़ा को मानव
शरीर की प्राकृतिक एंटीवायरल सुरक्षा से बचने में मदद करते हैं। जर्मन सैनिकों से
प्राप्त अनुक्रम पक्षियों से मेल खाते हैं। कैल्विनैक के अनुसार महामारी के शुरुआती
महीनों में मानव प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया से खुद को बेहतर तरीके से बचाने के लिए
वायरस विकसित हुआ। इसी तरह महिला के फ्लू स्ट्रेन में भी पक्षियों के समान
न्यूक्लियोप्रोटीन पाए गए जबकि उसकी मृत्यु की अनिश्चित तारीख को देखते हुए
स्ट्रेन के विकास के बारे में कोई अधिक निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते।
महिला के पूर्ण जीनोम से अन्य सुराग मिले
हैं। शोधकर्ताओं ने इन जीन्स का उपयोग करते हुए वायरस के पॉलीमरेज़ कॉम्प्लेक्स को
पुनर्जीवित किया है। कोशिका कल्चर प्रयोगों में उन्होंने पाया कि म्यूनिश स्ट्रेन
का पॉलीमरेज़ कॉम्प्लेक्स अलास्का स्ट्रेन में पाए गए पॉलीमरेज़ कॉम्प्लेक्स से लगभग
आधा सक्रिय है।
इस अध्ययन में पूरा वायरस नहीं बनाया गया था इसलिए इसमें कोई भी सुरक्षा सम्बंधी चिंताएं नहीं हैं। फिर भी ये अध्ययन पैथोलॉजी के इन खज़ानों की महत्ता को दर्शाते हैं जो आने वाले समय में 1918 की महामारी के बारे में अधिक जानकारी दे सकते हैं। इसकी मदद से भविष्य की महामारियों को नियंत्रित करने में भी मदद मिल सकती है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_image_-1280w__no_aspect/public/1918flu_1280p2_0.jpg?itok=HO07cnNs
इन दिनों फफूंद के बड़े चर्चे हैं। ब्लैक फंगस, वाइट
फंगस और फिर येलो फंगस। वैसे ये फफूंदें तो सहस्राब्दियों से हमारे साथ रहती आई
हैं और रहेंगी। कभी दोस्त तो कभी दुश्मन बन कर।
अनुमान के मुताबिक हमारे आसपास फफूंद की
15-50 लाख तक प्रजातियां हो सकती हैं। इनमें से अधिकांश मृतजीवी हैं (मृत, सड़ते-गलते
जीवों से भोजन प्राप्त करती हैं)। इनमें से कुछ ही मानव में बीमारी फैलाने के लिए
ज़िम्मेदार मानी गई हैं। पृथ्वी पर हमारे सहित सभी जीव-जंतु फफूंदों के साथ-साथ
विकसित हुए हैं। मानव का प्रतिरक्षा तंत्र भी इनके साथ विकसित हुआ है। अत: इनके
संक्रामक होने की संभावना बहुत कम होती है।
काली फफूंद के बीजाणु सांस के साथ, खाने
के साथ या फिर त्वचा के द्वारा प्रवेश करते हैं। ये बीजाणु ही रोग का कारण होते
हैं।
फफूंद ऐसे जीव हैं जो न तो पेड़-पौधों से
मेल खाते हैं न जंतुओं से। ये बैक्टीरिया भी नहीं हैं। ये तो अलग ही किस्म के जीव
हैं। इन्हें हम कुकुरमुत्ता, टोडस्टूल या यह खमीर जैसे नामों से जानते
हैं। इनकी उत्पत्ति, रचना, व्यवहार एवं प्रजनन आदि के तरीके लंबे समय
तक रहस्य और रोमांच के आवरण में ढंके रहे। कई किंवदंतियां जुड़ी हैं इनकी उत्पत्ति
से। जैसे कूड़े के ढेर पर कुत्ता पेशाब कर दे तो कुकुरमुत्ते उगते हैं।
इनमें पौधों की तरह न जड़ होती है न तना, पत्ती
या फूल। जंतुओं की तरह इनमें हाथ-पैर, सिर वगैरह भी नहीं है। और तो और, ये
पौधों की तरह अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते हैं। और न ही जंतुओं की तरह चरते-कुतरते
हैं। इसके बावजूद भी ये दूर-दूर तक फैले हुए हैं। कुछ ज़मीन पर उगते हैं तो कुछ पानी
में मिलते हैं। कुछ पेड़-पौधों की पत्तियों,
तनों, जड़ों
और फलों पर अपना डेरा जमाते हैं तो कुछ हमारे जैसे जंतुओं की त्वचा पर। डैंड्रफ
यानी रूसी भी एक तरह की फफूंद है। तरह-तरह के फफूंद नाशक इनका सफाया नहीं कर पाते।
हां, यह अलग बात है डैंड्रफ हटाने के चक्कर में हमारी जेबें ज़रूर
साफ होती रहती हैं। खुजली, दाद और एग्ज़ीमा का कारण भी फफूंद ही हैं।
ये भोजन कहां से पाती हैं?
सड़ी-गली लकड़ियों और बरसात में घूरे पर उगी
काली, सफेद, भूरी छतरियां,
कार्टून कथाओं के
मेंढक के छाते, ज़मीन पर उगी पफ बॉल्स तथा अर्थस्टार्स सब इनके ही विभिन्न
रूप हैं। इन सबकी एक ही खासियत है कि ये हरे नहीं होते यानी क्लोरोफिल इनमें नहीं
होता। परिणामस्वरूप ये अपना भोजन नहीं बना पाते। मगर जीने के लिए तो भोजन ज़रूरी
है।
लिहाज़ा, अधिकांश फफूंद मृतजीवी हैं। कुछ ऐसी भी हैं जो पहले किसी जीते-जागते जीव से परजीवी की तरह भोजन लेती रहती हैं और फिर उसके मर जाने पर भी उनका पीछा नहीं छोड़ती हैं – जीवन के साथ भी, जीवन के बाद भी। ऐसी फफूंद विकल्पी परजीवी कहलाती हैं। कुछ फफूंदों ने भोजन चुराने का रास्ता भी अपनाया है, अमरबेल के समान। कुछ फफूंद इससे उलट भी होती हैं – वे यूं तो मृतजीवी होती हैं, परंतु मौका मिलते ही परजीवी बन जाती हैं। ब्लैक फंगस इसी मौकापरस्त श्रेणी में आती है। (स्रोत फीचर्स)
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कोविड-19 महामारी ने यह तथ्य पुख्ता किया है कि जब तक सभी लोग
सुरक्षित नहीं होंगे तब तक इस महामारी से कोई भी सुरक्षित नहीं होगा। मार्च 2021
के दूसरे पखवाड़े में दुनिया भर के समाचार पत्रों में एक संयुक्त पत्र प्रकाशित हुआ
था, जिसमें दुनिया भर के नेताओं ने भविष्य में होने वाले
प्रकोपों के समय आपसी सहयोग और पारदर्शिता में सुधार के लिए एक महामारी संधि का
आह्वान किया है। उनका कहना है कि कोविड-19 महामारी ने वैश्विक समुदाय के सामने
सबसे बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
इस संधि पर हस्ताक्षर करने वालों में यूके
के प्रधान मंत्री बोरिस जॉनसन, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और
जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल जैसी हस्तियों समेत युरोप,
अफ्रीका, दक्षिण
अफ्रीका और एशिया के 20 से अधिक देशों के नेता व अधिकारी शामिल हैं।
भविष्य की महामारियों से निपटने के लिए इस
संधि की शुरुआत करने वाले विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के महानिदेशक टेडरोस
एडेनॉम गेब्रोयेसस और युरोपीय परिषद के अध्यक्ष चार्ल्स माइकल ने भी इस
अंतर्राष्ट्रीय समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके अलावा अल्बेनिया, चिली, कोस्टा
रिका, युरोपीय परिषद, फीजी,
फ्रांस, जर्मनी, ग्रीस, इंडोनेशिया, इटली, नार्वे, पुर्तगाल, कोरिया
गणराज्य, रोमानिया, रवांडा,
सेनेगल, दक्षिण
अफ्रीका, स्पेन, थाईलैंड,
त्रिनिदाद व टोबैगो, ट्यूनीशिया, युनाइटेड
किंगडम और युक्रेन के नेताओं ने भी इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं।
खास बात यह है कि इस महामारी के दौरान जिन
दो देशों – चीन और अमेरिका – के बीच पारदर्शिता में कमी,
(कु)प्रचार करने और
गलत सूचनाओं के प्रसार को लेकर तनातनी रही,
वे ही देश इस सूची से
गायब हैं। जब इस संधि के प्रस्तावक और हस्ताक्षरकर्ता,
गेब्रोयेसस से
अमेरिका और चीन की इस संधि से अनुपस्थिति के बारे में पूछा गया तो उन्होंने यह आश्वासन
दिया कि इस संधि पर अमेरिका और चीन की प्रतिक्रिया ‘सकारात्मक’ है, लेकिन
उन्होंने इस बात की पुष्टि नहीं की कि अमेरिका और चीन (साथ ही रूस और अन्य
उल्लेखनीय अनुपस्थित देश) इसमें शामिल होंगे या नहीं।
संधि व पत्र क्या कहते हैं?
वैश्विक नेताओं ने इस पत्र से उम्मीद जगाई
है। पत्र में लिखा है कि ‘एक अधिक मज़बूत अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य ढांचा बनाया जा
सकता है जो भावी पीढ़ी को अधिक सुरक्षित कर सकता है।’
‘भविष्य में दुनिया में और भी अन्य
महामारियां और गंभीर स्वास्थ्य संकट आएंगे। और कोई भी राष्ट्रीय सरकार या संघ
अकेले इन मुश्किलों का सामना नहीं कर सकता। और यह तो वक्त बताएगा कि यह ज़रूरत कब
पड़ेगी।’
इस संधि का उद्देश्य राष्ट्रीय, क्षेत्रीय
और वैश्विक क्षमताओं को मज़बूत करना है और भविष्य की महामारियों के प्रति लचीलापन
बनाना है। यह उद्देश्य डब्ल्यूएचओ के उद्देश्य से मेल खाता है जो मानता है कि विश्व
के हरेक व्यक्ति को बेहतर स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध हो।
पारदर्शिता इस अंतर्राष्ट्रीय महामारी संधि
के मुख्य बिंदुओं में से एक है। देखा गया है कि कोविड-19 महामारी के दौरान
पारदर्शिता में कमी लगातार एक डर पैदा करती रही।
यूके पहले ही कह चुका है कि वह एक नई
स्वास्थ्य सुरक्षा एजेंसी शुरू करेगा जो यह सुनिश्चित करेगी कि देश किसी भी भावी
महामारी से निपटने के लिए तैयार रहे। चूंकि हाल ही में टीकों की आपूर्ति और वितरण
देशों के बीच कटुता का नवीन स्रोत बनकर उभरा है,
इसलिए यह संधि
महामारी के दौरान अंतर्राष्ट्रीय सहयोग पर भी केंद्रित होगी। अंतर्राष्ट्रीय
महामारी संधि का आह्वान करने वाले अंतर्राष्ट्रीय नेताओं का कहना है कि संधि का
मुख्य उद्देश्य ‘राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और वैश्विक क्षमताओं को मज़बूत
करने वाले और भावी महामारियों के प्रति लचीलापन बनाने वाले राष्ट्रव्यापी व
सामाजिक तरीकों को बढ़ावा देना है।’
अंतर्राष्ट्रीय महामारी संधि का आगाज़ करने
वाले नेताओं को लगता है कि यह संधि चेतावनी प्रणाली को बेहतर करने में सहयोग
बढ़ाएगी। संधि इसमें शामिल राष्ट्रों के साथ डैटा साझा करने और अनुसंधान करने की
बात भी कहती है। इसमें स्थानीय, क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर टीके व
सार्वजनिक स्वास्थ्य विकास, और जन स्वास्थ्य सामग्री (जैसे टीके, दवाइयां, नैदानिक
उपकरण और व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण) की वितरण युक्तियों का भी उल्लेख किया गया है।
संधि में उतनी ही महत्वपूर्ण बात यह भी है
कि यह संधि हस्ताक्षरकर्ता देशों के बीच ‘पारदर्शिता,
सहयोग और ज़िम्मेदारी’
बढ़ाएगी। यही बात नेताओं ने भी अपने पत्र में कही है: ‘यह संधि अपने नियमों और
मानदंडों के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर परस्पर दायित्व और साझा ज़िम्मेदारी, पारदर्शिता
और सहयोग को बढ़ावा देगी।’
संधि के हस्ताक्षरकर्ताओं का कहना है कि
‘इन उद्देश्य की पूर्ति के लिए हम दुनिया भर के नेताओं और सभी हितधारकों समेत
समुदाय और निजी क्षेत्रों के साथ भी काम करेंगे। देश,
सरकार और
अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों के प्रमुख होने के नाते यह सुनिश्चित करना हमारी
ज़िम्मेदारी है कि दुनिया कोविड-19 महामारी से सबक सीखे।’
अंतर्राष्ट्रीय महामारी संधि अपना स्वरूप
ले रही है, और अधिक से अधिक देशों के प्रतिनिधि महामारी के खिलाफ
दुनिया को एकजुट करने के लिए इसमें शामिल हो रहे हैं। ऐसे में सात औद्योगिक देशों
के समूह (जी-7) से उम्मीद है कि जून में यूके में होने वाले शिखर सम्मेलन में वे
महामारी संधि के विचार को समझें।
संधि के संभावित परिणाम
यह तंत्र इसलिए बनाया जा रहा है ताकि भावी
महामारियों से बेहतर ढंग से निपटने में हस्ताक्षरकर्ता देश एक-दूसरे को तैयार
करें। यदि यह संधि अस्तित्व में आती है तो इसके परिणाम कुछ इस प्रकार हो सकते हैं
–
डैटा साझा करने और साझा अनुसंधान करने से महामारियों के
खिलाफ सुरक्षा उपाय जल्द पता किए जा सकेंगे,
क्योंकि ऐसा करने से
एक ही समस्या पर न सिर्फ अधिक लोग काम कर रहे होंगे बल्कि वे एक-दूसरे के साथ
मिलकर काम कर रहे होंगे।
कुछ देशों के पास टीके बनाने के लिए ज़रूरी कच्चा माल
बहुतायत में उपलब्ध है, जबकि कुछ देशों को अपने टीके बनाने के लिए इसे आयात करना
पड़ता है। इसलिए देशों के बीच संसाधनों की साझेदारी से टीकों और दवाइयों का तेज़ी से
निर्माण किया जा सकेगा।
भविष्य में महामारी का सामना करके देश समन्वित तरह से श्रम
विभाजन कर सकेंगे, जिससे वे अपनी विशेषज्ञता के अनुसार स्वास्थ्य सेवा
सामग्रियों का निर्माण कर सकेंगे और इन सामग्रियों और सुविधाओं की एक विस्तृत
आपूर्ति शृंखला स्थापित कर सकेंगे। जो एक अकेले राष्ट्र या संगठन द्वारा हासिल करना
संभव नहीं है।
चूंकि इस संधि के तहत देश एक-दूसरे की मदद करेंगे और ऐसे
कार्यों से राष्ट्रों के बीच सद्भावना बनेगी,
नतीजतन यह संधि देशों
के बीच बेहतर सम्बंध बना सकेगी।
चूंकि संधि के सदस्य इसमें शामिल अन्य सदस्यों से चिकित्सा
उपकरणों की सहायता मांग सकते हैं, इसलिए इससे किसी भी राष्ट्र के लिए
चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता बढ़ जाएगी। यह किसी देश को सिर्फ अपनी स्वास्थ्य
सुविधाओं के साथ महामारी से अकेले जूझने की तुलना में अधिक मददगार साबित होगा।
महामारी से यदि कुछ देशों की अर्थव्यवस्था गड़बड़ाती है, तो
इस संधि के तहत हस्ताक्षरकर्ता देशों के बीच होने वाले लेन-देन के कारण कुछ हद तक
उन देशों का आर्थिक विकास भी हो सकेगा। इस तरह के लेन-देन सुरक्षात्मक उपकरण, चिकित्सा
संसाधन, कच्चे माल आदि की आपूर्ति करने वाले देशों को राजस्व देंगे।
निष्कर्ष
दुनिया भर के नेताओं द्वारा ज़रूरत के वक्त एक दूसरे की मदद करने का आह्वान, अंतर्राष्ट्रीय महामारी संधि, काफी अच्छा विचार है। महामारी को हराने और जान-माल के नुकसान को कम करने के लिए एकजुट होकर काम करना एक अच्छा विचार है, लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि संधि कैसी होगी। अमेरिका, चीन और रूस ने संधि पर हस्ताक्षर क्यों नहीं किए, यह सवाल अभी भी अनुत्तरित है। जी-7 शिखर सम्मेलन होने ही वाला है। इसलिए जब तक इन सवालों के जवाब स्पष्ट नहीं हो जाते और संधि एक ठोस रूप और ढांचा अख्तियार नहीं करने लगती, तब तक यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि वास्तव में इस संधि से लोगों को कोविड-19 और भविष्य में आने वाली महामारियों के दौरान लाभ मिलेगा या नहीं। आशावादी होना और बेहतर की कामना करना अच्छा है, लेकिन सभी की समस्याओं को हल करने के लिए एक ही संधि से आस बांधना भी व्यावहारिक नहीं है। इस तरह की संधि यकीनन सही दिशा में एक कदम है और मौजूदा हालात में यह आशाजनक ही लग रही है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.consilium.europa.eu/media/49751/10-points-infographic-pandemics-treaty-thumbnail-2021.png
प्रतिरक्षा तंत्र बेतरतीबी से निर्मित खजाने से कैसे काम चलाता है?
प्रतिरक्षा तंत्र यह कैसे सुनिश्चित करता है कि पहचान के लिए
जो चाभियां वह बना रहा है, वे किसी गलत ताले को नहीं
खोलेंगी और खुद ही बीमारी का कारण नहीं बन जाएंगी?
ज़ाहिर है कि यदि प्रतिरक्षा तंत्र को इस तरह तैयार किया गया है कि वह जिन
लक्ष्यों को पहचाने उनके खिलाफ ज़ोरदार कार्रवाई करे, तो हम
यह तो नहीं चाहेंगे कि वह किसी ऐसी चीज़ को लक्ष्य के रूप में पहचान ले जिसकी हमें
ज़रूरत है,
जैसे हमारी लिवर की कोशिकाएं। लेकिन हमने कहा था कि विकसित
होता प्रतिरक्षा खजाना तो मूलत: बेतरतीब होता है। इसलिए यह संभावना रहती ही है कि
उसमें ऐसे ग्राही तैयार हो जाएंगे जो हमारे अपने शरीर के सामान्य हिस्सों यानी
‘स्व’ को लक्ष्य के रूप में पहचान लेंगे।
अब चूंकि हम ग्राही-निर्माण प्रणाली की बेतरतीब व्यवस्था को गंवाना नहीं चाहते, इसलिए हम इस समस्या में उलझ जाते हैं कि ऐसी बी तथा टी कोशिकाएं बन जाएंगी जो
स्व-पहचान ग्राहियों से लैस होंगी। यदि हम ऐसी कोशिकाओं को बनने से रोक नहीं सकते, तो हम यही उम्मीद कर सकते हैं कि बनने के बाद उन्हें ठप कर दिया जाएगा। इसके
लिए पहली ज़रूरी बात यह होगी कि उन कोशिकाओं को पहचाना जाए जिन पर ऐसे ग्राही हैं, जो अपने शरीर के किसी घटक को पहचानते हों। इसके बाद किसी युक्ति से उन्हें ठप
करना होगा। प्रतिरक्षा विज्ञान की अत्यंत प्रतिष्ठित ‘मूलभूत मान्यता’ यह है कि
प्रतिरक्षा तंत्र ‘अपने’ और ‘पराए’ में भेद करता है। यह काम छंटाई जैसी साधारण
प्रक्रियाओं पर टिका है हालांकि प्रतिरक्षा वैज्ञानिक इसे ‘नकारात्मक चयन’ कहकर
महिमामंडित करते हैं।
इसका मतलब है कि ‘अपने-पराए’ का भेद संरचना के किसी सामान्य नियम के तहत नहीं
किया जाता। प्रतिरक्षा तंत्र में ऐसा कोई पूर्व निर्धारित मापदंड नहीं है जो उसे
बताए कि वे अणु कौन-से हैं जो शरीर में ‘सामान्यत:’ बनते हैं। इनकी परिभाषा शुद्ध
रूप से अनुभव-आधारित है: यदि कोई चीज़ लगातार आसपास नज़र आती है, शरीर में सब जगह मिलती है और किसी घुसपैठिए के कामकाज से जुड़ा कोई चिंह नहीं
है तो बहुत संभावना है कि यह ‘अपना’ अणु होगा। अन्यथा इसके पराया होने की संभावना
ज़्यादा है।
प्रतिरक्षा तंत्र द्वारा ‘अपने’ की पहचान
सवाल यह है कि प्रतिरक्षा तंत्र ऐसे अनुभव-आधारित फैसले कैसे करता है? एक तरीका यह है कि यदि कोई अणु लगातार उपस्थित हो तो काफी संभावना है कि उसका
सामना ‘नवनिर्मित’ बी या टी कोशिका से जन्म लेते ही हो जाएगा। तो एक नियम यह है कि
यदि कोई बी या टी कोशिका लड़कपन (यानी बनने के कुछ ही समय बाद) में ही किसी लक्ष्य
को पहचान ले,
तो वह बी या टी कोशिका हानिकारक है और उसे खामोश हो जाना
चाहिए। यदि उसे (बी या टी कोशिका को) अपना लक्ष्य प्रौढ़ होने के बाद नज़र आए तो
संभावना यह है कि वह लक्ष्य पराया होगा और ऐसी कोशिकाओं को उस लक्ष्य के विरुद्ध
पूरी ताकत से प्रतिक्रिया देना चाहिए। दूसरे शब्दों में बी व टी कोशिकाओं के विकास
के दौरान एक अवधि ऐसी होती है (कोशिका की सतह पर ग्राही के अभिव्यक्त होने के
तुरंत बाद) जब किसी एंटीजन से सामना होने पर वे सक्रिय होने की बजाय निष्क्रिय हो
जाएंगी।
ज़ाहिर है,
इसमें कई भूल-चूक की संभावना है। यदि शरीर में कोई संक्रमण
चल रहा है,
जिसके अणु (एंटीजन) नवजात प्रतिरक्षा कोशिकाओं को नज़र आ
जाते हैं,
तो ऐसी प्रतिरक्षा कोशिकाओं को छांटकर अलग कर दिया जाएगा।
वे उस एंटीजन के विरुद्ध कार्रवाई करने की बजाय निष्क्रिय हो जाएंगी। ऐसा गर्भाशय
में पल रहे बच्चे के मामले में होता है जो अपनी मां से कोई संक्रमण (जैसे
हिपैटाइटिस बी वायरस) हासिल कर लेता है।
दूसरा,
शरीर के सारे अणु लगातार अस्थि मज्जा या थायमस ग्रंथि में
आते-जाते तो नहीं रह सकते। शरीर के कई अणु कोशिकांतर्गत प्रोटीन के रूप में होते
हैं। या कुछ अणु मात्र कुछ विशिष्ट ऊतकों में प्रकट होते हैं। इसलिए संभावना है कि
अस्थि मज्जा या थायमस ग्रंथि में रहते हुए बी या टी कोशिकाएं इनके संपर्क में न
आएं। लेकिन जब वे अपनी जन्मस्थली से निकलकर व्यापक शरीर में पहुंचेंगी तो उनका
सामना इन अणुओं से होगा। यदि ऐसा हुआ, तो चाहे ये अणु शरीर के
दृष्टिकोण से ‘अपने’ हों, लेकिन प्रतिरक्षा तंत्र इन्हें
‘पराया’ मानेगा और हमला कर देगा। यह तो स्वास्थ्य व खुशहाली के लिए नुकसानदायक
होगा। तो एक और पहचान व्यवस्था की ज़रूरत है। क्या किया जाए?
प्रतिरक्षा तंत्र कैसे तय करे कि किस पर हमला करे और किसे छोड़ दे?
हमने ऊपर कहा था कि ‘अपने’ को पहचानने का एक और तरीका यह है कि ‘अपने’ पर
सामान्यत: किसी घुसपैठिए के कामकाज का कोई चिंह नहीं होगा। यह चीज़ एक अन्य समस्या
से जुड़ी है जिसका ज़िक्र हम पहले कर चुके हैं। इसका सम्बंध प्रतिरक्षा तंत्र के
पहचान मॉडल से है। यदि किसी चीज़ पर कोई ‘बिल्ला’ चिपका है, तो ज़रूरी
नहीं कि वह चीज़ हानिकारक ही हो। लिहाज़ा, हर ‘बिल्ले’ पर टूट पड़ना
संसाधन और श्रम की बरबादी होगी। तो प्रतिरक्षा तंत्र कैसे तय करे कि कब
प्रतिक्रिया दे और कब अनदेखा करे?
दरअसल,
यह दिक्कत एक अन्य वजह से और मुश्किल हो जाती है – ध्यान
रखें कि प्रतिरक्षा तंत्र को अलग-अलग रोगजनकों के बारे में यह भी फैसला करना होता
है कि कार्रवाई के किस मार्ग का उपयोग करे। वायरस को थामने के लिए उसे संक्रमित
कोशिका को मारना होता है; कोशिका से बाहर मौजूद संक्रमण
के लिए विशिष्ट किस्म की एंटीबॉडी बनानी होती हैं; और
विकल्पी परजीवियों के लिए उन भक्षी-कोशिकाओं को सक्रिय करना होता है जिनके अंदर ये
परजीवी बैठे हैं।
इनमें से कोई भी प्रतिक्रिया हर किस्म के संक्रमण के विरुद्ध कारगर नहीं
होंगी। तो प्रतिरक्षा तंत्र कैसे तय करेगा कि कब क्या करना है? और इसके साथ टीकों की बात जोड़ लें, तो हम प्रतिरक्षा तंत्र
को कैसे तैयार करेंगे कि वह सही किस्म की शक्तिशाली प्रतिक्रिया दे? आप देख ही सकते हैं कि प्रतिरक्षा खज़ाने की छंटाई करना टी और बी कोशिकाओं के
संदर्भ में सही निर्णय करने की सामान्य समस्या का ही हिस्सा है।
इस समस्या से निपटने का एक ही वास्तविक तरीका है – कि किसी लक्ष्य की पहचान के
बाद प्रतिरक्षा तंत्र की प्रतिक्रिया को संदर्भ के भरोसे छोड़ दिया जाए। यानी यह
संदर्भ ऐसे संकेतों से बना होगा जो यह नहीं बताएंगे कि लक्ष्य क्या है, बल्कि यह बताएंगे कि वह लक्ष्य ‘खतरे’ का द्योतक है या नहीं ऐसा होने पर
प्रतिरक्षा कोशिका को चुप बैठने की बजाय कुछ करना चाहिए। ज़ाहिर है, सबसे सरल संदर्भ संकेत वे होंगे जिनका उपयोग जन्मजात प्रतिरक्षा तंत्र करता है
– जैसे कि भक्षी कोशिकाएं अपने ढंग से परजीवियों से निपटने में करती हैं। कोशिकाओं
की सतह पर उपस्थित अणु तथा रुाावित प्रोटीन दोनों का स्तर संक्रमण से प्रेरित होता
है,
ऐसे संदर्भ जनित संकेत होते हैं और यदि लक्ष्य की पहचान ऐसे
संकेतों की अनुपस्थिति में हो तो बी और टी कोशिकाएं कोई प्रतिक्रिया नहीं देंगी
बल्कि खामोश कर दी जाएंगी। यह एक सफल नकारात्मक चयन होगा।
बहरहाल,
नकारात्मक चयन की ये सारी शैलियां लगभग ही ठीक बैठती हैं, और अपेक्षा की जानी चाहिए कि इनमें कई खामियां होंगी। दरअसल, सामान्य व्यक्तियों में भी स्व-सक्रिय प्रतिरक्षा कोशिकाएं बहुत दुर्लभ नहीं
होतीं। तो सवाल उठता है कि ऐसी स्व-सक्रिय प्रतिरक्षा कोशिकाएं बार-बार
आत्म-प्रतिरक्षा बीमारियां पैदा क्यों नहीं करतीं। इस सवाल का जवाब इस बात में
छिपा है कि संदर्भ-जनित संकेत प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का सूक्ष्म प्रबंधन करते
हैं।
ठप कर दी गई बी और टी कोशिकाओं का क्या होता है?
यह कहना तो ठीक है कि आप बी या टी कोशिका को ठप कर देंगे। लेकिन ठप करने का
ठीक-ठीक मतलब क्या है? मोटे तौर पर प्रतिरक्षा तंत्र के सामने दो
विकल्प हैं। एक तो यह है कि जिस कोशिका को ठप किया जाना है उसे उकसाया जाए कि वह
अपने मारक जीन्स को सक्रिय करके खुदकुशी कर ले। इसका मतलब होगा कि वह स्व-सक्रिय
कोशिका भौतिक रूप से मिटा दी जाएगी और फिर कभी समस्या पैदा नहीं करेगी। नवजात बी व
टी कोशिकाओं द्वारा स्व-लक्ष्य की कुशलतापूर्व पहचान और साथ में खतरे के सशक्त
संदर्भ-जनित संकेत मौजूद हों, तो सफाए का यही तरीका अपनाया
जाता है।
दूसरी ओर,
यदि संकेत (खास तौर से संदर्भ-जनित संकेत) इतने सशक्त न हों
कि वे कोशिका को खुदकुशी तक खींच लाएं, तो उस कोशिका को कोल्ड
स्टोरेज में डालकर खामोश रखा जा सकता है। कहने का मतलब कि उसके साथ ऐसी छेड़छाड़ की
जाती है कि वह काफी समय तक किसी चीज़ के प्रति प्रतिक्रिया नहीं दे पाएगी। यह एक
ऐसा उपचार है जो सिर्फ नवजात कोशिकाओं पर नहीं बल्कि सारी बी व टी कोशिकाओं पर
किया जा सकता है। तो यह छंटाई का एक सामान्य तरीका है।
लेकिन यह उपचार बार-बार करते रहना होगा, और
इसलिए ये संभावित स्व-सक्रिय बी व टी कोशिकाएं शरीर के लिए हमेशा एक खतरे के रूप
में उपस्थित रहेंगी। बहरहाल, प्रतिरक्षा तंत्र के पास इनसे
निपटने के उपाय हैं जो इन कोशिकाओं के ग्राहियों में फेरबदल कर सकते हैं। ऐसा
फेरबदल करने पर ये स्व की बजाय पराए लक्ष्यों को पहचानने लगती हैं। यानी कोल्ड स्टोरेज
विकल्प का कुछ फायदा तो है। ज़ाहिर है, यदि ग्राही को ही बदल
दिया गया तो इस कोशिका को ठप करने का उपचार फिर शायद काम न करे क्योंकि यह उपचार
इस बात पर निर्भर है कि कोई ग्राही शरीर में सदा उपस्थित किसी चीज़ को पहचाने। यदि
ग्राही बदल गया तो ये कोशिकाएं फिर से सक्रिय हो जाएंगी और संभावना है कि किसी काम
आएं।
तो हमने देखा कि विभिन्न सम्बंधित तंत्रों से कोशिकाएं और प्रक्रियाएं उधार लेकर प्रतिरक्षा तंत्र अपने लिए ऐसे जुगाड़ करता है कि उसे काम करने में मदद मिलती है – किसी भी बाहरी घुसपैठिए के खिलाफ काफी लक्ष्योन्मुखी ढंग से। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://2rdnmg1qbg403gumla1v9i2h-wpengine.netdna-ssl.com/wp-content/uploads/sites/3/2016/11/immuneSystem-1190000241-770×553-1-650×428.jpg
प्रतिरक्षा तंत्र उन तालों की चाभियां कैसे बनाता है, जिन्हें उसने पहले कभी न देखा हो? और यह कैसे सुनिश्चित
करता है कि हर किरदार के पास एक अनोखी चाभी हो?
प्रतिरक्षा तंत्र की अंतहीन विविधता
हमने पिछली बार बात की थी प्रतिरक्षा तंत्र के लिए एक सचमुच खुले खज़ाने के निर्माण
की। अब तक हमने जो बातें की हैं उनसे तो जीन्स के पुन:संयोजन के करतबों से मात्र
एक काफी बड़े खज़ाने के निर्माण तक पहुंच पाए हैं। वास्तव में एक अनंत खज़ाना बनाने
का एकमात्र तरीका तो यही होगा कि प्रतिरक्षा ग्राहियों की प्रत्येक शृंखला के
परिवर्ती क्षेत्र बनाने वाले VDJ या VJ एक्सॉन
में उत्परिवर्तन की मदद ली जाए। भेड़ जैसे कुछ प्राणि ऐसा करते भी हैं और मुर्गों
जैसे कुछ जीव इस विधि का थोड़ा परिवर्तित रूप इस्तेमाल करते हैं।
अलबत्ता,
माइस (एक किस्म का चूहा, जिसके
प्रतिरक्षा तंत्र का सर्वाधिक अध्ययन किया गया है) और मनुष्य इसकी बजाय एक ज़्यादा
आसान जुगाड़ का सहारा लेते हैं। सबसे पहले तो वे V,
D और J मिनी-जीन्स को जोड़ने में एक बुनियादी पुनर्मिश्रण मशीनरी
का उपयोग करते हैं। यह मशीनरी जोड़े जाने वाले दो जीन्स को पंक्तिबद्ध कर देती है।
पंक्तिबद्ध करने में वह पहचान व सीध मिलाने के लिए अनुक्रम पहचान का उपयोग करती
है। प्रत्येक मिनी-जीन के कोडिंग क्षेत्र के नज़दीक एक चिंह होता है जो दो संरक्षित
अनुक्रमों से बना होता है – एक हैप्टोमर (7 क्षार) और एक नैनोमर (9 क्षार)। ये
एक-दूसरे से 12 अथवा 23 क्षारों की दूरी पर होते हैं। सीध मिलाने की क्रियाविधि
ऐसी है कि 7-12-9 संकेत चिंह सिर्फ 7-23-9 संकेत चिंह से जुड़ सकता है। चूंकि V और J दोनों भारी शृंखला मिनी-जीन्स पर एक ही किस्म के
संकेत-चिंह होते हैं, इसलिए यह व्यवस्था सुनिश्चित कर देती है कि
वे भारी शृंखला में D
मिनी-जीन को छोड़कर गलती से भी एक-दूसरे से नहीं जुड़ेंगे।
विविधता उत्पन्न करने का अगला जुगाड़ इस तथ्य पर टिका है कि VDJ को जोड़ते समय पुनर्मिश्रण की
घटना में डीएनए दोहरी कुंडली में से एक सूत्र को काटना अनिवार्य होता है। इसके
चलते कोशिकीय रख-रखाव की इस मशीनरी को मौका मिल जाता है कि कटे हुए सूत्र का उपयोग
करते हुए दूसरे सूत्र को भी तोड़ दे और फिर दोनों सिरों को जोड़कर एक हेयरपिन जैसा
छल्ला बना दे। तो अब पुनर्मिश्रण की मशीनरी डीएनए के इन दो हेयरपिन छल्लों को पकड़
लेती है – प्रत्येक मिनी-जीन का एक छल्ला – और उन्हें पास-पास लाकर सिल देती है।
सिलने के बाद वह इन्हें फिर से काटकर खोल देती है। इस काटने की वजह से वह छल्ला
दूसरी बार जहां से खुलता है वह मूल स्थान से अलग होता है। तो अब डीएनए के दो सूत्र
एक ही बिंदु पर समाप्त नहीं होते। वास्तव में एक दूसरे की अपेक्षा थोड़ा आगे तक
लटका होता है। यह बाहर लटकता टुकड़ा डीएनए सफाई करने वाले एंज़ाइम्स
(एक्सोन्यूक्लिएज़) के प्रति बहुत संवेदनशील होता है। ये एंज़ाइम तत्काल इनका मुंह
पकड़कर इन्हें चबाना शुरू कर देते हैं। कई बार जोश में आकर वे बाहर लटकते हिस्से से
भी अधिक चबा डालते हैं। ज़ाहिर है, यह प्रक्रिया जुड़ाव बिंदु पर
डीएनए के अनुक्रम को इस तरह बदल देती है, जैसा जीनोम के द्वारा
अपेक्षित नहीं था। दूसरे शब्दों में, अब जीनोम सांचे से इतर
बेतरतीबी VDJ एक्सॉन में शामिल हो चुकी है।
एक अन्य रख-रखाव एंज़ाइम (टर्मिनल डीऑक्सीन्यूक्लियोटाइड ट्रांसफरेज़) डीएनए में
से क्षारों को इस तरह हटा सकता है जो मूल योजना का हिस्सा नहीं था। यह एंज़ाइम
अनुक्रम को और बदल देता है।
क्या बी-कोशिका और टी-कोशिका ग्राही विविधता में कुछ पैटर्न हैं?
हमने बात की थी कि बी-कोशिकाएं और टी-कोशिकाएं अपने लक्ष्यों को अलग-अलग ढंग
से पहचानती हैं। बी-कोशिका के ग्राही सारे लक्ष्यों को पहचानते हैं और उनमें कोई
स्थान-आधारित रुकावट नहीं होती। दूसरी ओर, टी-कोशिकाएं
किसी लक्ष्य को तभी पहचानती हैं जब वह किसी कोशिका की सतह पर एमएचसी प्रोटीन से
जुड़ा कोई पेप्टाइड हो। ज़ाहिर है, इन एमएचसी प्रोटीन्स में बहुत
अधिक विविधता नहीं होगी। हमने कहा भी था कि मात्र उन टी-कोशिकाओं को चुना जाता है
जो शरीर में उपलब्ध एमएचसी प्रोटीन से सम्बद्ध अज्ञात पेप्टाइड को पहचान पाए। इस
प्रक्रिया को सकारात्मक चयन कहते हैं।
तो बी- एवं टी-कोशिकाओं के ग्राहियों के विभिन्न खंडों में विविधता का इससे
क्या सम्बंध है?
स्पष्ट है कि बी-कोशिकाओं के ग्राहियों के सारे हिस्सों में काफी विविधता की ज़रूरत
होगी क्योंकि ग्राही के सारे घटकों का संपर्क लक्ष्यों के निहायत विविध आकारों से
होने की संभावना है। इसके विपरीत टी-कोशिका ग्राहियों के जो हिस्से एमएचसी अणु से
संपर्क बनाएं उनमें उतनी विविधता की ज़रूरत नहीं है जितनी कि उस हिस्से में जो
पेप्टाइड के संपर्क में आएगा।
तो टी-कोशिकाओं के ग्राहियों के निर्माण में VDJ मिनी-जीन हिस्सों का योगदान कितना है (जो सांचे के रूप में
काम करते हैं) और जोड़ वाले हिस्सों का क्या योगदान है जो गैर-सांचा गत ढंग से काम
करते हैं?
रोचक बात है कि टी-कोशिका ग्राही के वे हिस्से जो पेप्टाइड
के संपर्क में आते हैं, उनका कोडिंग गैर-सांचागत विविधता-जनक हिस्से
में होता है। V, D और J जीन्स में विविधता स्वाभाविक रूप से V, D और J समूहों में उपलब्ध वैकल्पिक समूहों से आती
है। यहां,
टी-कोशिका ग्राहियों के लिए उपलब्ध संख्या कहीं कम होती है, बनिस्बत बी-कोशिका ग्राहियों के। इससे एक बार फिर यह बात रेखांकित होती है कि
पेप्टाइड के संपर्क में आने वाले ग्राहियों की अपेक्षा एमएचसी प्रोटीन्स के संपर्क
में आने वाले टी-कोशिका ग्राहियों में विविधता काफी कम होती है। दूसरी ओर, बी-कोशिका ग्राहियों के लिए मिनी-जीन्स के विकल्पों की संख्या बहुत अधिक होती
है क्योंकि उन्हें बहुत अधिक कुल विविधता की ज़रूरत होती है। यानी पूरी व्यवस्था
में न सिर्फ विविधता बढ़ाने का इंतज़ाम है बल्कि उन हिस्सों में विविधता और अधिक
बढ़ाने का इंतज़ाम है जहां इसकी ज़्यादा ज़रूरत हो।
प्रत्येक कोशिका पर एक ही ग्राही होता है जबकि गुणसूत्र दो होते हैं
लक्ष्य-पहचान के क्लोनल विविधरूपी मॉडल के फायदों की बात करते हुए हमने कहा था
कि बेहतर होगा यदि प्रत्येक कोशिका पर एक ही लक्ष्य का ग्राही हो ताकि अनजाने में
लक्ष्य-पहचान में कोई घालमेल न हो। लेकिन यदि ग्राही शृंखला बनाने के लिए VDJ सम्मिश्रण होना है तो जब
प्रत्येक कोशिका में गुणसूत्रों की दो प्रतिलिपियां होती हैं तो प्रत्येक कोशिका
पर दो ग्राही शृंखलाएं क्यों नहीं बन जाती?
इसके दो समाधान हैं। एक तो यह कि पूरी प्रक्रिया बेतरतीबी से चलती है, इसलिए संयोगवश हो सकता कि दो में से एक शृंखला ऐसी बने जो निरर्थक हो। दरअसल, इसकी वजह से ही कई बी- और टी-कोशिकाएं नाकाम रहती हैं और मर जाती हैं। इसका
मतलब है कि इन कोशिकाओं को बनाने की प्रक्रिया में काफी बरबादी निहित है।
एक ही कोशिका पर दो ग्राही नहीं बनने देने का एक तरीका यह है कि दोनों
ग्राहियों को परस्पर होड़ करने दी जाए। जो शृंखला पहले बन जाए वह दूसरी शृंखला के
निर्माण की प्रक्रिया को रोक दे।
अलबत्ता, ये दोनों ही प्रक्रियाएं पूर्ण रूप से कारगर नहीं हैं। ऐसी कई बी- व टी-कोशिकाएं होती हैं जिन पर दो-दो पहचान-ग्राही होते हैं। ये प्रतिरक्षा गफलत की वाहक होती हैं, खासकर यदि किसी कोशिका पर एक ग्राही ऐसा हो जो शरीर के अपने किसी अणु को पहचानता हो। लेकिन इस मसले को तब संभाल लिया जाता है जब उन कोशिकाओं को नष्ट किया जाता है जो शरीर के अपने अणु को प्रतिरक्षा-लक्ष्य के रूप में पहचानती हैं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://2rdnmg1qbg403gumla1v9i2h-wpengine.netdna-ssl.com/wp-content/uploads/sites/3/2016/11/immuneSystem-1190000241-770×553-1-650×428.jpg
भारत में कोविड-19 की दूसरी भयावह लहर ने देश को गंभीर स्थिति
में पहुंचा दिया है। वैज्ञानिक समुदाय यह समझने के प्रयास कर रहा है कि
कोरोनावायरस के कौन-से संस्करण इसके लिए ज़िम्मेदार हैं।
ऐसा बताया जा रहा है कि संस्करण बी.1.617 अधिक संक्रामक और प्रतिरक्षा को चकमा
देने में सक्षम है। जंतुओं पर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि यह संस्करण गंभीर
रूप से बीमार करने में सक्षम हो सकता है। गौरतलब है कि बी.1.617 संस्करण पूरे भारत
में प्रमुख संस्करण के रूप में उभरा है।
कुछ समय पूर्व भारत में कोविड-19 के मामलों में अचानक वृद्धि के पीछे कई
संस्करणों के होने का कारण बताया जा रहा था। जीनोमिक डैटा के आधार पर यूके में
पहचाना गया बी.1.1.7 संस्करण दिल्ली और पंजाब में देखा गया था जबकि पश्चिम बंगाल
में नया संस्करण बी.1.618 और महाराष्ट्र में बी.1.617 संस्करण प्रमुख रूप से पाया
गया है। बी.1.617 संस्करण सबसे प्रमुख संस्करण के रूप में उभरा है जिसके मामले
दिल्ली में काफी तेज़ी से बढ़ रहे हैं। इस सम्बंध में नेशनल सेंटर फॉर डिसीज़ कंट्रोल
के निदेशक सुरजीत सिंह कई राज्यों में उछाल के पीछे बी.1.617 संस्करण को प्रमुख
मान रहे हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बी.1.617 को ‘चिंताजनक संस्करण’ की श्रेणी में रखा
है। इसका मतलब है कि यह संस्करण पूर्व के ज्ञात संस्करणों की तुलना में तेज़ी से
फैलता है,
गंभीर रूप से बीमार करता है या फिर प्रतिरक्षा से बच निकलने
में सक्षम है। हाल ही में यूके सरकार ने बी.1.617.2 उप-प्रकार को भी इसी श्रेणी
में डाला है। कुछ अन्य ‘चिंताजनक संस्करण’ भी उभरे हैं। पी.1 संस्करण ब्राज़ील में
दूसरी लहर का प्रमुख कारण बताया गया है जबकि यूके में बी.1.1.7 संस्करण के कारण
कोविड मामलों में काफी वृद्धि देखी गई।
हालांकि,
बी.1.617 पर डैटा अभी जारी हुआ है लेकिन ऐसा अनुमान है कि
यह भारत में पहले से उपस्थित कई संस्करणों में से उभरा है। सबसे पहले इस संस्करण
का पता अक्टूबर में चला था। इसके बाद से जनवरी के अंत में बढ़ते मामलों को देखते हुए
इस संस्करण पर निगरानी बढ़ा दी गई और महाराष्ट्र में बी.1.617 एक प्रमुख संस्करण के
रूप में पाया गया। तब से इसके कई उपवंश उभरने लगे। बी.1.617 में वैज्ञानिकों ने
वायरस के स्पाइक प्रोटीन में आठ उत्परिवर्तन देखे हैं। इनमें से दो उत्परिवर्तन
ऐसे थे जो इसे अधिक संक्रामक बनाते हैं और तीसरा उत्परिवर्तन वही है जिसने पी.1 को
प्रतिरक्षा को चकमा देने में सक्षम बनाया है।
यह भी पता चला है कि बी.1.617 संस्करण पिछले संस्करणों की तुलना में आंतों और
फेफड़ों की कोशिकाओं में प्रवेश करने में थोड़ा अधिक सक्षम है। हालांकि, इससे अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि यह मामूली-सा बदलाव कैसे संचरण में वृद्धि
करता है। फिर भी जीवों पर किए गए अध्ययन में बी.1.617 संस्करण ने काफी गंभीर रूप
से बीमार किया है।
इस विषय में युनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज के वायरोलॉजिस्ट रविन्द्र गुप्ता के शोध
से पता चला है कि टीकाकृत लोगों की एंटीबॉडीज़ अन्य संस्करणों की तुलना में
बी.1.617 के विरुद्ध कम प्रभावी हैं। टीकाकृत लोगों के सीरम में आम तौर पर
एंटीबॉडी उपस्थित होते हैं जो वायरस को बेअसर करते हुए कोशिकाओं को संक्रमित होने
से बचाते हैं। इसके अलावा शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि दिल्ली में जिन स्वास्थ्य
सेवा कर्मचारियों को कोवीशील्ड का टीका लगाया गया है और जो दोबारा से संक्रमित हुए
हैं उनमें अधिकांश में बी.1.617 संस्करण पाया गया है। लेकिन उनके अनुसार यह टीके
को किसी भी तरह से असरहीन नहीं बनाते हैं।
इसी तरह जर्मनी की टीम ने पूर्व में सार्स-कोव-2 से ग्रसित 15 लोगों के सीरम
का परीक्षण किया और पाया कि उनके एंटीबॉडीज़ पिछले संस्करणों की तुलना में बी.1.617
के विरुद्ध लगभग 50 प्रतिशत कम प्रभावी हैं। फाइज़र टीके की दो खुराक प्राप्त लोगों
के सीरम का परीक्षण करने पर देखा गया कि एंटीबॉडीज़ बी.1.617 के विरुद्ध लगभग 67
प्रतिशत कम प्रभावी हैं। इसके साथ ही भारत बायोटेक द्वारा निर्मित कोवैक्सीन टीका
और कोवीशील्ड पर एक अप्रकाशित अध्ययन टीके को प्रभावी बताते हैं। जबकि वैज्ञानिकों
ने कोवैक्सीन द्वारा उत्पन्न एंटीबॉडीज़ की प्रभाविता में कुछ कमी पाई है।
फिर भी गुप्ता ने चेतावनी दी है कि प्रयोगशाला में किए गए ये सभी अध्ययन छोटे
समूहों पर किए गए हैं जिनमें अन्य ‘चिंताजनक संस्करणों’ की तुलना में एंटीबॉडी
प्रभावशीलता में मामूली कमी देखी गई है। इसके अलावा वैज्ञानिकों ने किसी संस्करण
के टीके की प्रतिरक्षा से बच निकलने की क्षमता का पता लगाने के लिए सीरम परीक्षण
को उचित नहीं बताया है। टीकों से बड़ी संख्या में एंटीबॉडी का उत्पादन होता है
जिसके चलते टीके की क्षमता में मामूली गिरावट महत्वपूर्ण नहीं होती है। इसके अलावा, प्रतिरक्षा प्रणाली के अन्य भाग जैसे टी-कोशिकाओं पर भी कोई प्रभाव नहीं देखा
गया है।
उदाहरण के तौर पर, बी.1.351 संस्करण को एंटीबॉडी को निष्क्रिय करने की क्षमता के रूप में देखा जाता है जबकि मनुष्यों पर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि कई टीके गंभीर बीमारी को रोकने में इस संस्करण के विरुद्ध काफी प्रभावी रहे हैं। इन्हीं कारणों से टीकों को बी.1.617 के विरुद्ध भी काफी प्रभावी माना जा रहा है जो गंभीर रूप से बीमार पड़ने से बचा सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://cdn.the-scientist.com/assets/articleNo/68733/aImg/42077/variants-article-l.jpg