पौधों और कीटों की जुगलबंदी

अपूर्वा आचार्य

ल्पना कीजिए एक ऐसे बगीचे की जिसमें फूल बेरंग हों, चिड़िया की चहचहाहट न हो, भंवरों का गुंजन और रंगीन तितलियां गायब हों; सब फीका-फीका, सूना-सूना सा हो। ऐसा सचमुच हुआ तो जीवनचक्र ही थम जाएगा। प्रकृति की यह छटा कोई चुटकियों में घटी घटना नहीं, बल्कि करोड़ों सालों की बेजोड़ साझेदारी (coordination) का नतीजा है। चिड़िया, मधुमक्खियां, भंवरे, तितलियां, ये छोटे-छोटे जीव केवल सुंदरता नहीं बढ़ाते, बल्कि इनका अनदेखा श्रम हमारी प्रकृति को सहेजे हुए है।

वास्तव में, करोड़ों साल पहले धरती पर जीवन बिल्कुल भी आज जैसा नहीं था, बल्कि यह ऐसा दौर था जब फूल और कीट धरती पर प्रकट ही नहीं हुए थे। किंतु कुछ बैक्टीरिया और शैवाल ने धरती की कायापलट कर दी। ये वे जीव थे जिन्होंने सबसे पहले प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) की प्रक्रिया शुरू की। इसके व्यापक असर हुए, क्योंकि इस प्रक्रिया के एक गौण उत्पाद के तौर पर ऑक्सीजन बनकर वातावरण में फैली। कुछ जीव इस बढ़ी हुई ऑक्सीजन को झेल नहीं पाए और मारे गए, वहीं कुछ जीवों के लिए यह वरदान साबित हुई और वे फैलते गए। उन्हीं प्रकाश संश्लेषी जीवों की बुनियाद पर वर्तमान के पेड़-पौधे विकसित हुए हैं। प्रकृति के इस अनोखे रूप को समझने के लिए इतिहास को टटोलना ज़रूरी है।

युगों पहले, प्राचीन पौधे समंदर के भीतर ही अपना जीवन जीते थे। ऐसे पौधों को ‘गोताखोर’ की संज्ञा दी जा सकती है। जैव विकास की नज़र से देखें, तो लगभग 45-48 करोड़ साल पहले, कीटों का विकास महासागर में रहने वाले क्रस्टेशियन जीवों (crustaceans) से हुआ और लगभग उसी समय पौधे भी पहली बार समंदर से भूमि पर आ बसे। हालांकि शुरुआती कीटों के पंख नहीं थे; वे उड़ नहीं सकते थे। लेकिन समय के साथ विकसित होते-होते वे पृथ्वी पर उड़ने वाले सबसे पहले जीव हुए। वहीं शुरुआती भूमिगत पौधों में बिना फूलवालों का ही दबदबा था; फर्न (टेरिडोफाइटा) (pteridophyta) और अनावृतबीजी (जिम्नोस्पर्म) (gymnosperm) जैसे शंकुधारी वृक्ष, और साइकैड। ऐसे पौधों के विकास के साथ यह पहली बार हुआ कि नर और मादा लिंग अलग-अलग हो गए। इनमें नर की जनन कोशिकाओं के मादा जनन कोशिकाओं से मिलन के बाद ही अगली पीढ़ी की शुरुआत होती थी।

अब एक दिक्कत पेश आई। पेड़-पौधे खुद चलकर आपस में जनन कोशिकाओं का आदान-प्रदान तो कर नहीं सकते; ज़ाहिर है उन्हें इस मिलन को संभव बनाने के लिए किसी बाहरी कर्ता यानी बिचौलिए की ज़रूरत पड़ी। शुरुआती पेड़-पौधे इस ‘सेवा’ के लिए केवल हवा के भरोसे थे। अनावृतबीजी पौधे हज़ारों हल्के-उड़ने वाले पराग कण बनाते थे, करोड़ों में से कोई एक पराग कण संयोगवश मादा तक पहुंच पाता था। मादा भाग तक पहुंचते ही वहां उपस्थित खास चिपचिपा जाल पराग कण (pollen grain) को जल्दी से पकड़ लेता था। इस चरण को परागण (pollination) कहते हैं।

पेड़पौधों की वंशवृद्धि

वैसे तो अधिकांश पौधे अलैंगिक प्रजनन (asexual reproduction) के ज़रिए भी वंश बढ़ा सकते हैं। इसका एक प्रकार है – कायिक प्रजनन (vegetative propagation)। इसमें पौधे के छोटे भाग (तना, पत्ती या जड़) से पूर्ण नवीन पौधे का विकास हो जाता है और नवीन पौधा आनुवंशिक रूप से पहले पौधे के समान (क्लोन) होता है। ग्राफ्टिंग, बडिंग, कटिंग, लेयरिंग, जैसी विधियां इसी के अलग-अलग रूप हैं।

दूसरी ओर, लैंगिक प्रजनन (Sexual reproduction) नर व मादा युग्मकों के मिलन पर निर्भर होता है। लेकिन हमने देखा कि इसके लिए परागण ज़रूरी होता है। परागण के बाद सफल निषेचन (फर्टिलाइज़ेशन) होने पर फल और बीज बनने की प्रक्रिया (Seed) आगे बढ़ती है। ज़ाहिर है, परागण न हो तो बीज नहीं बनेंगे। इस विधि में दो अलग-अलग पौधों के आनुवंशिक पदार्थों के मिलने से आनुवंशिक विविधता में वृद्धि होती है। दूसरी ओर, कुछ नुकसान भी होते हैं; जैसे परिपक्व होने और फलने में लंबा समय लगना, साथ ही पौधों में ज़रूरत से ज़्यादा व अनावश्यक परिवर्तन भी देखने को मिल सकते हैं। सबसे बड़ी समस्या है पराग कणों को वर्तिकाग्र तक पहुंचाना। यह काफी जोखिम भरी प्रक्रिया होती है। फिर भी अधिकांश पेड़-पौधे इसी का सहारा लेते हैं। क्यों?

परागण: कुदरती कूरियर सेवा 

फूल का नर जननांग ‘पुंकेसर’ होता है और उसमें भी जिस हिस्से में पराग कण बनते हैं ‘परागकोश’ कहलाता है। मादा जननांग ‘स्त्रीकेसर’ कहलाता है और उसमें इन पराग कणों को ग्रहण करने वाले हिस्से को ‘वर्तिकाग्र’ कहते हैं। देखा जाए तो फूलों के तीन प्रकार हैं – नर, मादा और द्विलिंगी (एक ही फूल में नर व मादा दोनों जननांग पाए जाते हैं)। वैसे ही पौधे भी दो प्रकार के होते हैं – एकलिंगी पौधे (नर पौधे – केवल नर फूल खिलते हैं; मादा पौधे – केवल मादा फूल खिलते हैं) और द्विलिंगी पौधे (एक ही पौधे पर नर व मादा फूल अलग-अलग खिलते हैं)।

परागण दो प्रकार से होता है – स्व-परागण और पर-परागण। यदि किसी फूल के पराग कण उसी फूल या उसी पौधे के किसी दूसरे फूल के वर्तिकाग्र पर गिरते हैं, तो इसे ‘स्व-परागण’ (self pollination) कहते हैं। दूसरी ओर, जब किसी फूल के पराग कण उसी प्रजाति के किसी दूसरे पौधे के फूल के वर्तिकाग्र पर पहुंचते हैं, उसे ‘पर-परागण’ (cross pollination) कहते हैं।

देखा गया है कि पौधे स्व-परागण से बचते हैं और पर-परागण को प्राथमिकता देते हैं। कारण, अंतःजनन हानि (Inbreeding depression) से बचाव और आनुवंशिक विविधता के फैलाव के लिए। अंतःप्रजनन से कमज़ोर, कम उपजाऊ, और मौसम, कीट व रोगों के प्रति संवेदनशील संतानें पैदा होती हैं। वहीं, पर-परागण से आनुवंशिक जानकारी का फैलाव होता है; पौधों की विविधता बढ़ती है, जिससे अनुकूलन क्षमता विकसित होती है। 

चूंकि पौधे खुद चल नहीं सकते तो पर-परागण कुछ बिचौलियों (medium) के ज़रिए किया जाता है। ये माध्यम अजैविक भी हो सकते हैं और जैविक भी। अजैविक (abiotic) परागण में जल द्वारा एवं हवा द्वारा परागण आते हैं। जबकि जैविक (biotic) के अंतर्गत कीटों, जंतु या पक्षी द्वारा परागण शामिल है। जैविक बिचौलियों को ‘परागणकर्ता’ (pollinators) कहते हैं।

हमने देखा कि शुरुआती वनस्पतियां तो परागण के लिए हवा-पानी पर ही निर्भर थीं। फिर कुछ 28-30 करोड़ साल पहले, छोटे जीवों यानी कीटों का पौधों के जीवन में आगमन हुआ। हालांकि शुरू में कीट पौधों के पास केवल पराग खाने (pollen eaters) आते थे, क्योंकि पराग कीटों के लिए पौष्टिक भोजन था। यानी इस दौर तक पौधों और कीटों के बीच एक रिश्ता बन चुका था, लेकिन एकतरफा। माना जाता है कि आगे चलकर यही कीट एक और काम करने लगे – पौधों के पराग कणों का परिवहन – और जाने-अनजाने में परागण में मददगार हो गए।

जीवाश्म साक्ष्य में कमी के कारण ऐसी शुरुआती कीट प्रजातियों का पता नहीं लगाया जा सका है। फिर भी, कुछ साक्ष्य के मुताबिक वैज्ञानिकों का मानना है कि फूलदार पौधों के विकास से पहले भृंग अनावृतबीजी पौधों के पराग का भोजन करते थे और परागण भी कर देते थे। समय के साथ जब फूलदार पौधे (flowering plants) विकसित हुए तो उन्होंने भी भृंग (beetles) को अपनी पीढ़ी बढ़ाने की योजना में शामिल किया। यहां से पौधों और कीटों के बीच इस खास जुगलबंदी की शुरुआत हुई।

फूलदार पौधे और कीटों का सहविकास

लगभग 14-16 करोड़ साल पहले फूलदार पौधे विकसित हुए। वैकासिक आंकड़ों के अनुसार, बहुत कम समय में फूलदार पौधों की आबादी तेज़ी से बढ़ी। कीटों द्वारा परागण ही इसका खास कारण माना जा सकता है। इस समय तक पौधे और कीट सम्बंध बना ही चुके थे और वे साथ-साथ विकसित भी हो रहे थे। लेकिन शुरुआती फूलदार पौधे के पास कीटों को आकर्षित करने का केवल एक ही तरीका था – पराग। फूलदार पौधे भरपूर मात्रा में पराग बनाते थे, जो कीटों के लिए भोजन और साथ ही पौधों के वंश बढ़ाने का माध्यम था। परिणाम यह हुआ कि पराग-भक्षी कीटों द्वारा परागण के जरिए आनुवंशिक जानकारी (genetic information) दूर-दूर तक फैली। लगता है कीट परागित पौधों को प्राचीन वायु परागित पौधों के मुकाबले अपनी आबादी बढ़ाने में अच्छा-खासा फायदा हुआ।

फिर क्या था परागणकर्ताओं को लुभाने के लिए फूलदार पौधे भी आपसी होड़ में लगे रहे। पौधों और कीटों में ऐसे बदलाव होने लगे कि वे एक-दूसरे के अनुकूल (adopt) हो जाएं। दोनों में ही समय के साथ नए-नए तरीके विकसित होते गए। पौधे कीटों-जंतुओं को आकर्षित (attract) करने की तरकीब लगाने में जुट गए।

इनमें एक प्रमुख तरीका था कीटों के लिए भोजन का उपहार। और यह उपहार सिर्फ पराग के रूप में नहीं बल्कि मकरंद के रूप में भी सामने आया। कीटों को लुभाने के लिए फूलों में चटख रंगों, गंध वगैरह का विकास हुआ। पौधों में ऐसी युक्तियां भी विकसित हुई कि मकरंद (nectar) के इस उपहार तक पहुंचने के लिए कीट को पराग कणों से संपर्क करना पड़े। पौधों में विकसित हुए कुछ खास बदलावों के साथ-साथ परागणकर्ताओं (कीट, पक्षी और अन्य) में भी पुरस्कार पाने के लिए खास बदलाव होते गए। 

पौधों और कीटों के बदलाव

विविध बनावट के फूल: पौधों में फूलों के अलग-अलग आकार विकसित हुए। जैसे, मक्खियों के बैठने के लिए चौड़े-चपटे फूल, हमिंगबर्ड के लिए घंटीनुमा-गहरे फूल आए।

साजसज्जा: परागणकर्ता को आकर्षित करने के लिए पौधों में चटक-चमकीले रंगों वाले फूल विकसित हुए। जैसे, पीले, नीले, बैंगनी (मक्खियों-तितलियों के लिए) और लाल-नारंगी (पक्षियों के लिए)।

मकरंद ग्रंथि व पथदर्शी: मधुर मकरंद का विकास संभवत: पौधों में कीटों को आकर्षित करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण नवाचार था। साथ ही, मीठी-कस्तूरी, फलों जैसी सुगंध, और फूलों की पंखुड़ियों पर पराबैंगनी चिन्हों का विकास। इससे कीटों को मकरंद तक पहुंचने में आसानी हुई।

चिपकू पराग: खास चिपकू पराग कणों का विकास, जो कीटों के शरीर या पंखों पर आसानी से चिपक जाते हैं। जैसे, गुलाब, सूरजमुखी, गुड़हल, खीरा, टमाटर, कद्दू वगैरह के पराग।

कीटों से तालमेल: कुछ पौधों में पराग को नियंत्रित तरीके से खास समय पर छोड़ने का तंत्र विकसित हुआ। यानी वे उसी समय पराग छोड़ने लगे जब परागण करने वाले कीट सक्रिय रहते थे। जैसे, रात-रानी, हरसिंगार या धतूरे के फूल शाम या रात में खिलते हैं जब पतंगे सक्रिय रहते हैं।

परागणकर्ताओं की निरंतरता: कई परागणकर्ता एक ही प्रकार के पौधे के प्रति निष्ठा दर्शाने लगे। समय के साथ वे एक ही प्रजाति के पौधे का परागण करने लगे। जैसे, अंजीर-ततैया (Pleistodontes imperialis) केवल अंजीर के फूलों का परागण करती है, मोनार्क तितली (Danaus plexippus) केवल मिल्कवीड पौधों पर अपना जीवन बिताती है। 

गुंजन परागण : कुछ पौधों के फूल; जैसे टमाटर, बैंगन, कीवी फ्रूट में पराग कण खास संरचनाओं में कैद हो गए। अब पराग पाने के लिए मधुमक्खियां और भौंरे पंखों की मांसपेशियों को कंपन (गुंजन) करके एक खास ‘फ्रीक्वेंसी’ पर थपथपाने लगे, जिससे पराग झड़ कर बाहर निकल आते हैं।

यौन अनुकरण: कुछ ऑर्किड पौधे मादा कीटों की बनावट जैसे फूल विकसित कर नर कीटों को धोखा देते हैं, ताकि वे मादा सदृश फूल की ओर आकर्षित हों और परागण हो जाए।

जैसा कि पता है कई फूल द्विलिंगी (hermaphrodite) होते हैं। यानी उनमें पराग कण भी बनते हैं और स्त्रीकेसर भी होता है। लेकिन प्राय: देखा गया है कि इस हेतु विशेष युक्तियां विकसित हुई हैं कि एक फूल के पराग कण उसी फूल के वर्तिकाग्र पर न पहुंच पाएं और यदि पहुंच जाएं तो निषेचन न हो पाए। समय के साथ पौधों में स्व-परागण से बचने के लिए कई युक्तियां विकसित हुईं। जैसे, स्त्रीकेसर द्वारा अपने ही पराग कण को पहचान लेना और खारिज कर निषेचन की प्रक्रिया न होने देना (स्व-असंगतता)(self-incompatibility); पुंकेसर और स्त्रीकेसर की अलग-अलग जमावट (हर्कोगैमी)(herkogamy); एक पौधे पर केवल नर या केवल मादा फूल का होना; द्विलिंगी पौधों में नर और मादा फूलों का एक साथ परिपक्व न होना (डायकोगैमी)(dichogamy)। इन सभी बदलावों से स्व-परागण असंभव हो जाता है।

क्रमिक विकास को ध्यान में रखते हुए पौधों और कीटों में जीवन को संजोने के लिए बदलाव होते रहे हैं, तो आने वाले समय में और भी खास और अद्भुत बदलाव देखने को मिल सकते हैं।  

हाल में हुए एक अध्ययन में बताया गया है कि बिच्छूमक्खी (Panorpa communis) में शंकुधारी वृक्षों की परागण सेवा के लिए मुखांग (mouthparts) विकसित हुए थे, लेकिन जैसे ही दूसरे परागणकर्ता विकसित होने लगे तो समय के साथ बिच्छूमक्खी की भूमिका समाप्त होती गई।

परागणकर्ताओं में भी प्रमुख मधुमक्खियां (Apis) और उनकी जंगली प्रजातियां हैं – ये परागण और वैश्विक उत्पादन (अन्न, फल-सब्जियां, फूल) में लगभग 80 प्रतिशत हिस्सेदार हैं। लेकिन केवल मधुमक्खियों (bees) की हिस्सेदारी से पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) को मज़बूती नहीं मिलती। जंगली परागणकर्ता भी अहम योगदान देते हैं। इसलिए परागणकर्ताओं की विविधता ज़रूरी है। जंगली कीटों द्वारा परागण होने पर फसलों की आनुवंशिक विविधता बढ़ती है एवं अंतःप्रजनन की समस्या और इससे होने वाले प्रभावों में कमी होती है।

वर्तमान परिस्थिति और चुनौतियां

वर्तमान में, पुष्पीय पौधों की लगभग साढ़े तीन लाख से ज़्यादा प्रजातियां ज्ञात हैं, जिनमें फल, फूल, सब्ज़ियां, वृक्ष-लताएं और अनाज वाले पौधे शामिल हैं। फूलदार पौधों की वंशवृद्धि (reproduction) के लिए कीटों की मौजूदगी ज़रूरी है। लेकिन विकास की होड़ में हम इन छोटे साथियों को भूल गए हैं जिन्होंने करोड़ों सालों से हमारी धरती को रंग-बिरंगा और हरा-भरा बनाए रखा।

बढ़ती आबादी, शहरीकरण और कृषि क्षेत्र में बढ़ोतरी के कारण जंगली फूलों, कीटों और पक्षियों के आवास में कमी होना चिंताजनक है। साथ ही रसायन व मशीन आधारित खेती कीटों की संख्या में कमी का कारण है। कृत्रिम परागण जैसी तकनीक भी इन छोटे जीवों के लिए खतरा है। दूसरी ओर, बड़े पैमाने पर मधुमक्खी पालन (bee keeping) के दौरान ज़्यादा आबादी में मधुमक्खियों का प्रजनन और उनके स्थानांतरण के कारण जंगली एवं पालतू कीटों में घातक रोग फैलने की संभावना रहती है।

परागण व परागणकर्ता हमारी खाद्य सुरक्षा (food security) के साथ पृथ्वी की जैव विविधता (biodiversity) के लिए भी अनिवार्य हैं। ज़्यादा से ज़्यादा फूलों वाले पेड़-पौधे लगाने से न केवल इन छोटे जीवों को घर मिलेगा, हमें आनंद भी मिलेगा।

अंत में एक बात कहना मुनासिब है। यह स्पष्ट है कि कायिक प्रजनन के मुकाबले लैंगिक प्रजनन काफी जोखिम भरा है और लैंगिक प्रजनन में भी स्व-परागण की अपेक्षा पर-परागण में खतरे ज़्यादा है। फिर भी पेड़-पौधों ने कायिक की बजाय लैंगिक और स्व-परागण की बजाय पर-परागण को तरजीह दी। क्यों? वैज्ञानिकों के लिए यह एक गुत्थी है। इनसे मिलने वाले लाभ ज़ाहिर हैं, लेकिन यह अनुत्तरित है कि इन प्रक्रियाओं की शुरुआत क्यों व कैसे हुई। वैज्ञानिकों ने अटकलें लगाई हैं लेकिन सर्वसम्मत उत्तर अभी नहीं मिला है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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वैश्विक महाप्रयोग: वनस्पतियों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

दौलत सिंह तंवर

जकल हम हर दिन जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग (Global warming) के बारे में सुनते हैं। गर्मियां लगातार लंबी और अधिक गर्म होती जा रही हैं, बेमौसम बारिश हो रही है और सर्दियां सिकुड़ रही हैं। जब मौसम अचानक बदलता है, तो मनुष्य तो अपने घरों में एसी या हीटर चालू कर लेते हैं। जानवर और पक्षी ठंडी या गर्म जगहों की ओर पलायन कर जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि उन पेड़-पौधों का क्या होता है, जो अपनी जड़ों से ज़मीन से बंधे होते हैं? उनके पास भागने या छिपने का कोई विकल्प नहीं होता। उन्हें तो उसी जगह पर रहकर बदलते मौसम से लड़ना होता है।

अलबत्ता, किसी भी जीव को नए माहौल में खुद को ढालने में हज़ारों-लाखों साल लगते हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन (climate change) तो बहुत तेज़ी से हो रहा है। तो क्या पौधे इतनी जल्दी खुद को बदल पाएंगे? इसी सवाल का जवाब खोजने के लिए वैज्ञानिकों ने जीव विज्ञान के इतिहास का बहुत बड़ा और अद्भुत प्रयोग एरेबिडॉप्सिस थेलियाना पर किया है।

एरेबिडॉप्सिस थेलियाना

इस कहानी का मुख्य किरदार एक बहुत ही छोटा और आम-सा दिखने वाला पौधा थेल क्रेस है, जिसका वैज्ञानिक नाम एरेबिडॉप्सिस थेलियाना (Arabidopsis thaliana) है। यह सरसों वनस्पति कुल (brassica family) का एक जंगली पौधा है।

आप सोच रहे होंगे कि आम, नीम या गेहूं जैसे बड़े और ज़रूरी पौधों को छोड़कर वैज्ञानिकों ने इस छोटे से खरपतवार (weed) को क्यों चुना? ऐसा इसलिए क्योंकि विज्ञान की दुनिया में यह पौधा एक महत्वपूर्ण मॉडल जीव रहा है। इसका आकार छोटा होता है, इसे उगाना आसान है, इसका जीवनचक्र बहुत छोटा (कुछ ही हफ्तों का) होता है। और, सबसे बड़ी बात, वैज्ञानिकों को इसकी आनुवंशिक सामग्री यानी डीएनए (DNA) की पूरी जानकारी है। इसलिए इसमें होने वाले छोटे से छोटे बदलाव को वैज्ञानिक आसानी से पकड़ सकते हैं।

महा-प्रयोग

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के मोई एक्सपोसिटो-अलोंसो के नेतृत्व में दुनिया भर के कई वैज्ञानिकों की एक टीम ने यह जानने का फैसला किया कि पौधे तेज़ी से बदलते मौसम के प्रति कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। यह प्रयोग वर्ष 2017 से लेकर वर्ष 2022 के बीच 5 वर्षों तक किया गया। इसके नतीजे 26 मार्च 2026 को साइन्स में प्रकाशित किए गए हैं। प्रयोग की योजना अनोखी थी। दुनिया भर से एरेबिडॉप्सिस थेलियाना के 231 अलग-अलग स्ट्रेन्स इकट्ठे किए। ये सभी थे तो एरेबिडॉप्सिस थेलियाना, लेकिन हर एक के डीएनए में थोड़ा-थोड़ा अंतर था, जिसकी वजह से इनके गुणधर्मों (traits) में छोटे-मोटे अंतर थे। उन्होंने सभी 231 स्ट्रेन्स के बराबर-बराबर संख्या में बीजों का एक मिश्रण तैयार किया। बीजों के इस मिश्रण को दुनिया के 30 अलग-अलग स्थानों पर बोया गया। इनमें स्पेन की तेज़ गर्मी, उत्तरी युरोप की कड़ाके की ठंड और मध्य पूर्व (जैसे नेगेव रेगिस्तान) की भयंकर सूखे जैसी परिस्थितियां शामिल थीं। सबसे खास बात यह थी कि बीजों को बोने के बाद वैज्ञानिकों ने उन्हें कोई खाद-पानी या सुरक्षा नहीं दी। उन्हें पूरी तरह से प्रकृति के भरोसे, प्राकृतिक रूप से बढ़ने, फूलने और अपने बीज गिराने के लिए छोड़ दिया। पांच सालों में पौधों की कई पीढ़ियां आई-गईं।

चौंकाने वाले परिणाम

डार्विन के विकासवाद (darwin’s theory of evolution) के अनुसार, विकास एक बहुत धीमी प्रक्रिया है। लेकिन जब पांच साल बाद वैज्ञानिकों ने उन 30 जगहों से पौधों के नए बीजों और डीएनए की जांच की तो नतीजे हैरान करने वाले थे। वैज्ञानिकों ने पाया कि केवल 3 से 5 पीढ़ियों के भीतर ही पौधों में स्थानीय जलवायु के हिसाब से बदलाव हो गए थे। इसे रैपिड इवोल्यूशन (त्वरित विकास) (rapid evolution) कहा जाता है। हर जगह के पौधों में ज़रूरत के हिसाब से अलग-अलग तरीके से अनुकूलन (adaptation) हुआ। जो पौधे गर्म जगहों पर लगाए गए थे, उनके डीएनए में ऐसे बदलाव देखे गए जो उन्हें कम पानी में जीवित रहने और भीषण गर्मी सहने की ताकत देते थे। ठंडी जगहों वाले पौधों में ऐसे जीन विकसित हुए जो पाले (frost) से उनकी रक्षा कर सकें। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव वसंत ऋतु को पहचानने में था। गर्म इलाकों में पौधों ने जल्दी फूल देना शुरू कर दिया ताकि ज़्यादा गर्मी पड़ने से पहले ही वे बीज पैदा कर सकें। पौधों की डीएनए संरचना ही बदल गई थी। सवाल यह उठता है कि क्या ऐसे जीन्स नए सिरे से विकसित हुए थे या कुदरती विविधता में से चुन भर लिए गए थे।

जेनेटिक विविधता का जादू

इस प्रयोग से एक बहुत बड़ा सबक यह मिला कि कोई भी प्रजाति तभी बच सकती है, जब उसके अंदर विविधता हो। इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए आपके पास एक टूलबॉक्स (toolbox) है जिसमें सिर्फ हथौड़े रखे हैं। अगर आपको कोई पेंच कसना हो, तो आप हथौड़े से वह काम नहीं कर सकते। लेकिन अगर आपके टूलबॉक्स में पेंचकस, प्लास और हथौड़ा सब कुछ है, तो आप हर तरह की समस्या सुलझा सकते हैं।

बिल्कुल इसी तरह, वैज्ञानिकों ने जो 231 तरह के बीजों का मिश्रण बनाया था वह एक टूलबॉक्स की तरह था। जब सूखा पड़ा, तो वे पौधे मर गए जिन्हें ज़्यादा पानी चाहिए था, लेकिन उसी मिश्रण में मौजूद वे पौधे बच गए जिनके अंदर सूखे से लड़ने वाले जीन मौजूद थे। इन्हीं बचे हुए पौधों ने आगे चलकर अपनी आबादी बढ़ाई। अर्थ सीधा-सा है, जैव विविधता (biodiversity) प्रकृति का सबसे बड़ा टूलबॉक्स है। अगर हम जंगलों और पौधों की विविधता को नष्ट करेंगे, तो हम उनसे जलवायु परिवर्तन से लड़ने की ताकत भी छीन लेंगे।

अनुकूलन की भी सीमा है

यह प्रयोग जहां एक तरफ उम्मीद जगाता है, वहीं दूसरी तरफ एक बहुत गंभीर चेतावनी भी देता है। क्या पौधे हर तरह के खराब मौसम को झेल सकते हैं? जवाब है, नहीं। वैज्ञानिकों ने देखा कि अत्यधिक विषम परिस्थितियों, जैसे तपते रेगिस्तान या अत्यधिक सूखे, में त्वरित विकास भी पौधों को नहीं बचा सका। तीन साल के भीतर ही इन इलाकों से पौधे पूरी तरह विलुप्त हो गए। उनके डीएनए में अनियमित बदलाव (irregular changes) होने लगे, जो इस बात का संकेत था कि तनाव इतना ज़्यादा हो चुका था कि प्रकृति का सुरक्षा तंत्र टूट गया। यह हमें बताता है कि पौधों में अनुकूलन की अद्भुत क्षमता है, लेकिन जलवायु परिवर्तन की गति और तीव्रता अगर एक सीमा से पार हो गई, तो जंगल-के-जंगल और खेत-के-खेत नष्ट हो सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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साल वनों का संकट और एकीकृत कीट प्रबंधन

सुदर्शन सोलंकी

ध्य प्रदेश के डिंडौरी वन मंडल (dindori forest department) से प्राप्त हालिया रिपोर्टों ने एक बार फिर वन पारिस्थितिकीविदों और कीट वैज्ञानिकों का ध्यान मध्य भारत के मूल्यवान साल (सरई) वनों (sal forests) की ओर आकर्षित किया है। यह संकट साल (Shorea robusta) के वृक्षों पर एक कीट के आक्रमण के चलते पैदा हुआ है। यह कीट है ‘साल बोरर’ या ‘साल का घुन’ जिसे वैज्ञानिक शब्दावली में हॉप्लोसेरामबिक्स स्पिनिकॉर्निस (Hoplocerambyx spinicornis) कहा जाता है। वन विभाग द्वारा स्थानीय समुदायों की मदद से इस कीट को नियंत्रित करने के लिए चलाया जा रहा अभियान, वन पारिस्थितिकी तंत्र (forest ecosystem) को संतुलित करने का एक सुविचारित वानिकी प्रयास है।

प्रकोप के कारक

यह समझना आवश्यक है कि साल बोरर कोई बाहरी या आक्रामक विदेशी प्रजाति नहीं है। यह साल के वनों का एक मूल और प्राकृतिक बाशिंदा है। सामान्य परिस्थितियों में यह एक ‘द्वितीयक कीट’ (secondary pest) की भूमिका निभाता है, अर्थात यह केवल मृत, गिरे हुए या पहले से कमज़ोर पेड़ों पर ही आक्रमण करता है। इस रूप में यह वनों में अपघटन की प्राकृतिक प्रक्रिया को गति देने में सहायक होता है।

परंतु, कुछ विशेष परिस्थितियों में इसकी जनसंख्या अनियंत्रित होकर ‘महामारी’ (epidemic) का रूप ले लेती है, जैसे

आर्द्रता और मानसून: इस कीट का जीवन चक्र पूरी तरह वर्षा ऋतु से संचालित होता है। मानसून की पहली बौछार के साथ ही इसके प्यूपा (pupa) से वयस्क बीटल बाहर आते हैं। यदि जून-जुलाई की अवधि में लगातार उच्च आर्द्रता (>80%) और मध्यम तापमान बना रहे, तो इनके अंडों और लार्वा के जीवित रहने की दर काफी बढ़ जाती है।

दुर्बल वृक्षों की उपलब्धता: चक्रवात, तेज़ आंधी या अन्य कारणों से यदि वनों में क्षतिग्रस्त या कमजोर पेड़ बड़ी संख्या में मौजूद हों, तो इस कीट को प्रजनन के लिए प्रचुर मात्रा में मेज़बान मिल  जाते हैं।

शुद्ध वन और जैवविविधता की कमी: साल के सघन और शुद्ध वन (जहां केवल एक ही प्रजाति के वृक्ष हों) इस कीट के प्रसार को एक निर्बाध गलियारा प्रदान करते हैं।

वृक्षों पर प्रभाव

वयस्क मादा बीटल पेड़ की छाल के नीचे या उसकी दरारों में सैकड़ों अंडे देती है। अंडों से निकलने वाले लार्वा पेड़ के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से कैंबियम और सैपवुड (cambium & sapwood) को अपना भोजन बनाते हैं। सैपवुड वृक्ष की वह संवहनी परत है जो जड़ों से जल और आवश्यक पोषक तत्वों को पत्तियों तक पहुंचाती है।

लार्वा जब तने के भीतर लंबी, टेढ़ी-मेढ़ी सुरंगें बनाते हैं, तो वृक्ष का पोषण तंत्र पूरी तरह अवरुद्ध हो जाता है। पेड़ के तने से रिसने वाला राल और पेड़ के निचला भाग के आसपास एकत्र होने वाला लकड़ी का महीन बुरादा एक संकेत होता है कि वृक्ष का आंतरिक तंत्र पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है और वह सूखने की कगार पर है।

भौगोलिक संवेदनशीलता और ऐतिहासिक संदर्भ

भारत में साल के वन देश के कुल जंगल का एक बड़ा हिस्सा हैं, जो न केवल जैव-विविधता बल्कि जनजातीय अर्थव्यवस्था की भी रीढ़ हैं। साल बोरर (sal borer) का प्रकोप मुख्य रूप से दो बड़े क्षेत्रों में देखा जाता है:

सेंट्रल इंडियन बेल्ट: मध्य प्रदेश (मंडला, डिंडौरी, कान्हा, बांधवगढ़) और छत्तीसगढ़ (बस्तर व सरगुजा)।

सबहिमालयन बेल्ट: उत्तराखंड (तराई क्षेत्र), उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा और झारखंड (सारंडा के घने वन)।

वर्ष 1997-98 में अविभाजित मध्य प्रदेश के जंगलों में इसका अत्यधिक गंभीर प्रकोप देखा गया था, जिसके कारण वन विज्ञानियों के परामर्श पर वन पारिस्थितिकी को बचाने के लिए आधिकारिक तौर पर लगभग 10 लाख से अधिक संक्रमित पेड़ों को काटना पड़ा था।

क्या पूर्ण उन्मूलन सुरक्षित है?

पारिस्थितिकी विज्ञान के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, किसी भी प्राकृतिक कीट का पूरी तरह से उन्मूलन करना वन खाद्य-जाल के संतुलन को बिगाड़ सकता है। साल बोरर वन खाद्य-जाल की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसके लार्वा और वयस्क कीट कई वन्य पक्षियों (जैसे कठफोड़वा), चमगादड़ों और परभक्षी कीटों का प्राथमिक भोजन हैं। अतः, इस कीट के पूर्ण विनाश की नहीं, बल्कि इसकी जनसंख्या को एक निश्चित स्तर से नीचे रखने और इसके वैज्ञानिक प्रबंधन की ज़रूरत है।

एकीकृत कीट प्रबंधन

घने जंगलों में रासायनिक कीटनाशकों का छिड़काव पूरी तरह अव्यावहारिक और पर्यावरण के लिए हानिकारक है। इसके लिए देहरादून स्थित भारतीय वन अनुसंधान संस्थान ‘एकीकृत कीट प्रबंधन’ (integrated-pest management) की सिफारिश करता है।

इस संदर्भ में डिंडौरी में वर्तमान में अपनाई जा रही ‘ट्रैप-ट्री’ (trap-tree) विधि पूरी तरह वैज्ञानिक है। मानसून के दौरान साल के कुछ चुनिंदा गिरे या कटे हुए पेड़ों की छाल को कूटकर ‘ट्रैप’ बनाया जाता है। इस छाल से निकलने वाले वाष्पशील यौगिक (जैसे अल्फा पाइनीन) हवा में फैलते हैं। इनकी गंध से आकर्षित होकर वयस्क बीटल भारी संख्या में वहां एकत्र हो जाते हैं, जिन्हें सुबह के समय सुप्तावस्था (inactive stage) में पकड़कर नष्ट कर दिया जाता है।

एक अन्य तरीका है सिल्विकल्चरल हाइजीन (silvicultural hygiene) जिसमें मानसून से पहले जंगलों में से गिरे हुए और मृत पेड़ों के अवशेषों को हटा दिया जाता है ताकि कीटों को प्रारंभिक प्रजनन स्थल न मिल सके।

जैविक नियंत्रण  भी कारगर हो सकता है। इसमें वनों में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले परभक्षी बीटल्स (जैसे Alaus प्रजाति) और एंटोमोपैथोजेनिक फफूंद (जैसे Beauveria bassiana) को बढ़ावा दिया जाता है, जो साल बोरर की आबादी को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित रखते हैं।

डिंडौरी का वर्तमान संकट हमें यह सीख देता है कि वन प्रबंधन में निरंतर निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का होना कितना अनिवार्य है। साल बोरर का यह प्रकोप वन पारिस्थितिकी तंत्र में आए किसी असंतुलन का संकेतक है। इसका दीर्घकालिक समाधान केवल तात्कालिक तौर पर कीड़ों को पकड़ने में नहीं, बल्कि मिश्रित वनों (mixed forests) को बढ़ावा देने और वन पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने में निहित है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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वनस्पतियों का अदृश्य संवाद

सुदर्शन सोलंकी

बीसवीं सदी के अंत तक, पादप पारिस्थितिकी मुख्य रूप से चार्ल्स डार्विन के ‘प्राकृतिक चयन’ और प्रजातियों के बीच प्रतिस्पर्धा (Interspecific Competition) के सिद्धांतों के इर्द-गिर्द घूमती रही। यह स्थापित धारणा थी कि किसी भी वन पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) में वनस्पति केवल सूर्य के प्रकाश, जल और मृदा के पोषक तत्वों के लिए एक-दूसरे से संघर्ष करते हैं। फिर, 1997 में ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय की पादप विज्ञानी डॉ. सुज़ैन सिमार्ड द्वारा नेचर में प्रकाशित एक ऐतिहासिक शोध पत्र ने इस स्थापित धारणा को पूरी तरह से बदल दिया।

सिमार्ड और उनकी टीम ने कार्बन-14 (कार्बन के रेडियोधर्मी समस्थानिक) और कार्बन-13 (स्थिर समस्थानिक) का उपयोग करके यह प्रमाणित किया कि वनस्पतियां आपस में कवक-तंतुओं के माध्यम से रासायनिक रूप से जुड़ी हुई हैं। इस सहजीवी प्रणाली को माइकोराइज़ल नेटवर्क (mycorrhizal network) कहा गया, जो पादप विज्ञान में पारस्परिक सहयोग की एक नई धारणा के रूप में सामने आई। यह भूमिगत फफूंदों (कवक) और पौधों की जड़ों के बीच समन्वय होता है। एक मायने में यह पादप विज्ञान में पैराडाइम शिफ्ट था।

संरचना और सहजीवन

माइकोराइज़ल नेटवर्क  भूमिगत अंतःसंचार प्रणाली मुख्य रूप से दो प्रकार के कवकों पर आधारित होती है। एक होते हैं एक्टोमाइकोराइज़ा (actomycorrhiza), जो मुख्य रूप से समशीतोष्ण वनों के वृक्षों की जड़ों के चारों ओर एक सुरक्षात्मक आवरण बनाते हैं। दूसरे होते हैं अर्बस्कुलर माइकोराइज़ा (arbuscular mycorrhiza), जो पादप जड़ों की कोशिकाओं के भीतर तक प्रवेश करके घनिष्ठ अंतःसम्बंध स्थापित करते हैं।

यह नेटवर्क एक परिष्कृत जैविक और पारस्परिक सहजीवी विनिमय से संचालित होता है। प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) की प्रक्रिया से पादप कार्बन का स्थिरीकरण करके कार्बोहाइड्रेट का निर्माण करते हैं। वे उसका लगभग 10 प्रतिशत से 30 प्रतिशत हिस्सा इन कवक तंतुओं (मायसेलियम) (mycellium) को स्थानांतरित कर देते हैं। बदले में, ये कवक तंतु (जो अपनी सूक्ष्म संरचना के कारण मिट्टी के अत्यंत बारीक छिद्रों तक पहुंचने में सक्षम होते हैं) पेड़-पौधों को पानी, फॉस्फोरस और नाइट्रोजन जैसे आवश्यक पोषक तत्व प्राप्त करने में मददगार होते हैं। यह जटिल नेटवर्क वनस्पति जड़ों के प्रभावी अवशोषण क्षेत्र को 100 से 1000 गुना तक विस्तृत कर देता है, जिससे पूरे वन क्षेत्र की पोषण क्षमता सुदृढ़ होती है।

संकेतन तंत्र

पादपों में जंतुओं की तरह कोई केंद्रीय तंत्रिका प्रणाली नहीं होती, परंतु वे विशिष्ट जैव-रासायनिक और विद्युतीय संकेतों के माध्यम से इस कवक नेटवर्क (funal network) को एक ‘सिग्नलिंग चैनल’ (signaling channel) की तरह उपयोग करते हैं। इसके माध्यम से वे कई तरह के संकेत (signals) प्रेषित कर पाते हैं। जैसे,

शाकाहारी आक्रमण: जब किसी वन क्षेत्र में शाकाहारी कीटों का हमला होता है, तो प्रभावित पादप तुरंत जैस्मोनिक एसिड (Jasmonic acid) और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (VOCs) का उत्पादन करते हैं। इसे वे अपनी जड़ों के माध्यम से कवक जाल में पहुंचा देते हैं। यह रासायनिक संकेत पड़ोसी पादपों तक पहुंचता है। यह एक उद्दीपन होता है जिससे वे पादप अपनी पत्तियों में टैनिन और फिनोलिक्स जैसे विषाक्त रसायनों का संचय बढ़ा लेते हैं, जिससे पत्तियां कीटों के लिए अभोज्य हो जाती हैं।

जल तनाव: गंभीर जल तनाव या सूखे की स्थिति में पादपों द्वारा उत्सर्जित एब्सिसिक एसिड (ABA) इस नेटवर्क के माध्यम से अन्य वृक्षों को सचेत करता है, जिससे वे अपने पर्णरंध्रों (स्टोमैटा) को आंशिक रूप से बंद कर वाष्पोत्सर्जन की दर घटा लेते हैं।

रोगजनक कवक का आक्रमण: प्रयोगशालाओं में देखे गए साक्ष्यों के अनुसार, रोगजनक कवक (disease causing fungi) के आक्रमण के समय सैलिसिलिक एसिड का प्रवाह पूरे नेटवर्क में सिस्टेमिक एक्वायर्ड रेज़िस्टेंस (systemic accquired resistence) को सक्रिय करता है, जिससे स्वस्थ पादपों में मात्र 6 से 18 घंटे के भीतर रक्षात्मक एंज़ाइम क्रियाशील हो जाते हैं।

‘मदर ट्री’ (Mother tree) और सहोदरों की पहचान: इस नेटवर्क का सबसे विस्मयकारी वैज्ञानिक पहलू तब सामने आता है जब हम वन के सबसे वयोवृद्ध और विशाल वृक्षों का अध्ययन करते हैं। जिन्हें पारिस्थितिकी विज्ञान में ‘मदर ट्री’ या ‘हब ट्री’ (hub tree) कहा जाता है। ये विशाल वृक्ष इस भूमिगत कवक जाल के मुख्य केंद्र या ‘राउटर’ (router) की तरह कार्य करते हैं, जहां से ऊर्जा और संसाधनों का प्रवाह नियंत्रित होता है। कभी-कभी वन के सघन चंदवे या छतरी के कारण छोटे नवजात पौधों तक सूर्य का प्रकाश नहीं पहुंच पाता और वे प्रकाश संश्लेषण करने में असमर्थ हो जाते हैं। ऐसा होने पर ये मदर ट्री इस कवक नेटवर्क के माध्यम से अपने संचित कार्बन और नाइट्रोजन को उन कमज़ोर पौधों की ओर प्रवाहित करते हैं।

कनाडा के वनों में किए गए अध्ययनों से यह भी प्रमाणित हुआ है कि ये वृद्ध वृक्ष सहोदर पहचान (किन्शिप रिकग्निशन) (kinship recognition) की क्षमता रखते हैं। वे रासायनिक संकेतों के माध्यम से यह पहचान लेते हैं कि कौन-सा अंकुरित पौधा उन्हीं के बीजों से विकसित हुआ है, और वे जानबूझकर अपनी प्रजाति के और विशेषकर अपने स्वयं के सहोदर पौधों को अन्य पौधों की तुलना में अधिक मात्रा में पोषण और सुरक्षात्मक रसायन स्थानांतरित करते हैं। और तो और, जब ये मदर ट्री मरणासन्न अवस्था में होते हैं, तो वे अपनी बची हुई अधिकांश कार्बनिक ऊर्जा और रक्षात्मक आनुवंशिक सूचनाएं इस नेटवर्क के ज़रिए युवा पीढ़ी को सौंप देते हैं। यह वनस्पति जगत की एक अदभुत प्राकृतिक वसीयत है।

पारिस्थितिकीय संकट 

यह भूमिगत तंत्र हमें जितना सुदृढ़ दिखाई देता है, आधुनिक मानवीय हस्तक्षेपों के प्रति उतना ही संवेदनशील भी है। वैश्विक स्तर पर हो रही अंधाधुंध कटाई और सघन एकफसली कृषि (moncropping) के कारण यह सदियों पुराना माइकोराइज़ल नेटवर्क खंडित हो रहा है, जिससे वनों की स्वाभाविक रोग प्रतिरोधक क्षमता नष्ट हो रही है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग मिट्टी की इस कवक संरचना को स्थायी रूप से नष्ट कर देता है, जिससे कृत्रिम रूप से उगाए गए पौधे इस प्राकृतिक सुरक्षा कवच से वंचित हो जाते हैं।

यद्यपि समकालीन पादप विज्ञान ने इस ‘अदृश्य संवाद’ की बुनियादी रूपरेखा को समझ लिया है, परंतु विभिन्न पादप प्रजातियों के मध्य होने वाले सूक्ष्म रासायनिक विनिमय के पूर्ण कोड को डिकोड करना आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी चुनौती है। अंततः, यह शोध हमें यह संदेश देता है कि वन केवल वृक्षों का संग्रह नहीं हैं, बल्कि एक एकीकृत, परस्पर निर्भर और सचेत जैव-प्रणाली हैं, जिनका संरक्षण समग्र रूप में ही संभव है। (स्रोत फीचर्स)

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सूखे से मात नहीं खाते ये गगनचुंबी पेड़!

ह मानना स्वाभाविक लगता है कि ऊंचे पेड़, छोटे पेड़ों की तुलना में सूखे के प्रति अधिक संवेदनशील होंगे। क्योंकि सूखे के हालात में लंबे पेड़ जड़ों से एक हद से ऊपर पानी पहुंचाने में नाकामयाब रहेंगे और जल्दी दम तोड़ देंगे। लेकिन हाल के एक अध्ययन ने इस सोच को बदल दिया है। साइंस पत्रिका में प्रकाशित यह अध्ययन मलेशिया के बोर्नियो द्वीप (borneo island) स्थित काबिली सेपिलोक फॉरेस्ट रिज़र्व में कार्डिफ युनिवर्सिटी के वन पारिस्थितिकीविद पाउलो बिटनकोर्ट और उनकी टीम ने डिप्टेरोकार्प जीनस (वंश) के पेड़ों पर किया। डिप्टेरोकार्प (Dypterocarp) दुनिया के सबसे ऊंचे और विशाल पेड़ों में शुमार है, जिनकी ऊंचाई लगभग 45 मीटर से 100 मीटर तक होती है। ये दक्षिण-पूर्व एशिया के उष्णकटिबंधीय वर्षावनों (Tropical rainforests) में ऊंचाई वाले इलाकों में पाए जाते हैं।

शोधकर्ताओं ने डिप्टेरोकार्प की पांच प्रजातियों के 38 अलग-अलग पेड़ों (ऊंचाई 7.1 मीटर से लेकर 71 मीटर) की शाखाओं और तने के भीतरी हिस्से (ट्रंक कोर) (trunk core) के नमूने लिए। अलग-अलग ऊंचाई वाले पेड़ों से लिए गए नमूनों का अध्ययन करके आसानी से पता लगाया जा सका कि ऊंचाई बढ़ने से पेड़ों की जल-प्रणाली (vascular system) पर क्या असर पड़ता है और बदलते पर्यावरण के प्रति ये ऊंचे पेड़ कैसे अनुकूलन करते हैं। 

अध्ययन में पाया गया कि ऊंचे पेड़ों में सूखे के दौरान पानी की आपूर्ति के लिए कुछ अंदरूनी बदलाव हुए थे। लंबे पेड़ों के तनों के निचले हिस्से वाली जल वाहिकाएं (ज़ायलम) (xylem) छोटे पेड़ों की तुलना में दुगनी चौड़ी थीं – चौड़ी वाहिकाएं होने से घर्षण कम हुआ और पानी के ऊपर पहुंचने में रुकावट भी कम हुई।

आम तौर पर सूखे की स्थिति में पेड़ों की जल वाहिकाओं में हवा के बुलबुले (air space) बन जाते हैं, जिससे पानी के स्थानांतरण में रुकावट पैदा होती है। इस प्रक्रिया को ‘एम्बोलिज़्म’ (embolism) कहते हैं। शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने नमूनों वाले ऊतकों में एम्बोलिज़्म के लक्षण कृत्रिम रूप से पैदा करके उनके निर्जलीकरण (dessication) की सीमा का परीक्षण किया। उन्होंने पाया कि छोटे और ऊंचे पेड़ों के ऊतक एम्बोलिज़्म के प्रति एक जैसी ही प्रतिक्रिया दे रहे थे। जिससे यह साबित हुआ कि पेड़ की ऊंचाई और एम्बोलिज़्म जैसी परिस्थिति का इनके सूखे के प्रति संवेदनशीलता से कोई सीधा सम्बंध नहीं हैं। अलबत्ता, छोटे पेड़ों की तरह ही ये बड़े पेड़ भी एम्बोलिज़्म से खुद-ब-खुद निपट रहे थे।

इसके साथ ही यह भी देखा गया कि इन विशाल पेड़ों के ऊपरी भाग की पत्तियां, निचले भाग की पत्तियों के मुकाबले सूखा सहन करने में ज़्यादा सक्षम थीं। ये पत्तियां पानी की भारी कमी होने पर भी मुरझाने की बजाय प्रकाश संश्लेषण (photosyntesis) की प्रक्रिया कर पा रही थीं।

इस निष्कर्ष को और भी गहराई से समझने के लिए वैज्ञानिकों ने एल नीनो (el nino) से प्रभावित हुए 42 अन्य डिप्टेरोकार्प पेड़ों को जांचा। परिणाम चौंकाने वाले थे। सूखे से निपटने के लिए ऊंचे और छोटे पेड़ों की वृद्धि समान रूप से धीमी हुई थी। ऐसे ही एक अन्य अध्ययन में यूएस जियोलॉजिकल सर्वे के पारिस्थितिकीविद एड्रियन दास ने पाया था कि सूखे के हालात में पेड़ों की ऊंचाई की बजाय कीट या बीमारियों के प्रकोप जैसे अन्य बाहरी कारणों का असर ज़्यादा होता है।

पेड़ों में पानी के पहुंचने की प्रक्रिया बहुत ही जटिल और अनोखी है, जिसका सटीक अंदाज़ा सिर्फ पेड़ की ऊंचाई से नहीं लगाया जा सकता। यह प्रक्रिया विशेष ऊतकों (जिन्हें ज़ाइलम कहा जाता है) के माध्यम से होती है। इस प्रक्रिया में एक से अधिक तंत्र शामिल होते हैं, जैसे – परासरण (osmosis) के द्वारा जड़ों द्वारा पानी सोखा जाना, पत्तियों के पर्णरंध्रों (स्टोमैटा) (stomata) से होने वाले वाष्पोत्सर्जन की वजह से उत्पन्न खिंचाव (ट्रांसपिरेशनल पुल), जड़ों द्वारा आरोपित दाब (रूट प्रेशर), और केशिका क्रिया (केपिलरी एक्शन)। ये सब मिलकर पानी को गुरुत्वाकर्षण (gravitational force) के विरुद्ध पेड़ के ऊपरी भाग तक पहुंचाते हैं।

अब तक वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन के चलते विशाल पेड़ों को सूखे के प्रति कमज़ोर मानते आ रहे थे। लेकिन इस अध्ययन ने वैज्ञानिकों को चेताया है कि केवल पेड़ की लंबाई नापकर यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि वह सूखा झेल सकेगा या नहीं। साथ ही, यह भी फिलहाल स्पष्ट नहीं है कि अन्य वंशों के पेड़ भी सूखे से निपटने के लिए ऐसे ही बदलाव अपनाते हैं या नहीं। इसलिए वैज्ञानिकों को वैश्विक स्तर पर वन संरक्षण के मॉडल (forest conservation models) तैयार करते समय नए तरीके अपनाने होंगे। बहरहाल, सूखे में इन विशाल पेड़ों का इस मज़बूती से टिके रहना एक सकारात्मक संकेत है। आखिरकार, ये विशाल पेड़ जंगलों के फेफड़े और रीढ़ हैं। (स्रोत फीचर्स)

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ओक वृक्षों पर बढ़ता संकट: वैश्विक पारिस्थितिक चेतावनी

कुमार सिद्धार्थ

लवायु परिवर्तन और जैव-विविधता संकट की चर्चा जब भी होती है, आम तौर पर गर्माती धरती, ग्लेशियरों के पिघलने, दावानल, सूखे और बाढ़ जैसे विषय प्रमुखता से सामने आते हैं। किंतु प्रकृति में कुछ संकट ऐसे भी होते हैं जो अचानक नहीं आते, बल्कि वर्षों तक धीरे-धीरे विकसित होते हैं और जब तक उनके परिणाम स्पष्ट दिखाई देते हैं, तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है। ओक (बलूत) वृक्षों (Oak trees) के सामने खड़ा संकट ऐसी ही एक धीमी लेकिन गंभीर पर्यावरणीय चुनौती है। हाल ही में ब्रिटेन में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट (एक्शन ओक द्वारा किया गया स्टेट ऑफ दी यूके ओक्स) ने इस संकट को नए सिरे से वैश्विक विमर्श के केंद्र में ला दिया है।

एशिया, युरोप और उत्तरी अमेरिका के कई क्षेत्रों में पाई जाने वाली यह महत्वपूर्ण वृक्ष प्रजाति वहां अलग-अलग प्रकार के दबावों का सामना कर रही है। भारत के हिमालयी क्षेत्रों में भी बलूत वनों का ह्रास पर्यावरणविदों के लिए चिंता का अहम सबब बना हुआ है।

ओक वृक्ष फैगेसी कुल के क्वेरकस वंश (Genus Quercus) के सदस्य हैं। विश्व भर में इनकी 500 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। युरोप, उत्तरी अमेरिका और एशिया के समशीतोष्ण क्षेत्रों (Temperate zones) में इनका व्यापक फैलाव है। भारत में मुख्यतः हिमालयी क्षेत्रों (Himalayan areas) में इनकी अनेक प्रजातियां मिलती हैं, जिनमें बांज (Quercus leucotrichophora), तिलौंज या मोरू (Quercus floribunda) और खरसू (Quercus semecarpifolia) प्रमुख हैं।

ओक वृक्ष अत्यंत दीर्घायु होते हैं। कुछ वृक्ष 300 से 500 वर्ष तक जीवित रह सकते हैं, जबकि कई प्राचीन ओक वृक्षों की आयु इससे भी अधिक दर्ज की गई है। अपनी विशाल छत्राकार संरचना, गहरी जड़ों और लंबे जीवन के कारण इन्हें अनेक पारिस्थितिक तंत्रों की आधारशिला (Foundations of Ecosystem) माना जाता है।

पारिस्थितिक प्रहरी

ओक वृक्षों का महत्व केवल उनकी विशालता या सुंदरता तक सीमित नहीं है। इन्हें जैव विविधता का संरक्षक (Guardians of Biodiversity) माना जाता है। ब्रिटेन में किए गए अध्ययनों के अनुसार, एक ओक वृक्ष प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से 2300 से अधिक जीव प्रजातियों को आश्रय देता है। इनमें पक्षी, कीट, कवक, काई, स्तनधारी समेत कई सूक्ष्मजीव शामिल हैं।

भारत के हिमालयी क्षेत्रों में भी ओक वन पारिस्थितिकी की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इन्हें ‘जल संरक्षक वृक्ष’ (Water conserving trees) कहा जाता है क्योंकि इनकी गहरी जड़ें वर्षा जल को भूमि में संरक्षित करती हैं और झरनों, नालों तथा नदियों के प्रवाह को बनाए रखने में मदद करती हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि जिन क्षेत्रों में ओक वन सुरक्षित हैं, वहां जलस्रोत अपेक्षाकृत अधिक स्थायी बने रहते हैं।

इसके अलावा, ओक वृक्ष कार्बन अवशोषण (carbon sequestration) में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक परिपक्व ओक वृक्ष अपने जीवनकाल में बड़ी मात्रा में कार्बन संग्रहित कर सकता है, जिससे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायता मिलती है।

एशिया में स्थिति

भारत में ओक मुख्यतः उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-काश्मीर, सिक्किम और पूर्वोत्तर राज्यों के पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं। किंतु पिछले कुछ दशकों में इन वनों का क्षेत्रफल और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हुए हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार ओक वनों के क्षरण के पीछे कई कारण हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि और वर्षा चक्र में बदलाव से इनके प्राकृत वास प्रभावित हो रहे हैं। कई क्षेत्रों में ओक वनों की जगह चीड़ (पाइन) के जंगल फैल रहे हैं। चीड़ (Pine trees) अपेक्षाकृत कम जैव विविधता को सहारा देते हैं और जंगल की आग के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।

इसके अतिरिक्त ईंधन, चारे और लकड़ी के लिए अत्यधिक दोहन, अनियंत्रित चराई, सड़क निर्माण और शहरी विस्तार भी ओक वनों पर दबाव बढ़ा रहे हैं। कई अध्ययनों में यह तथ्य सामने आया है कि पुराने वृक्ष तो अभी भी मौजूद हैं, लेकिन नए पौधों का प्राकृतिक पुनर्जनन लगातार घट रहा है। यह स्थिति भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी है।

नेपाल, भूटान और चीन के पर्वतीय क्षेत्रों में भी ओक वनों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव दर्ज किए जा रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि तापमान बढ़ने के कारण कई ओक प्रजातियां ऊंचाई की ओर खिसक रही हैं, जिससे उनकी पारिस्थितिक सीमाएं बदल रही हैं।

ब्रिटेन में ओक वृक्ष केवल प्राकृतिक धरोहर (natural heritage) नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा हैं। इस देश में लगभग 17 करोड़ ओक वृक्ष मौजूद हैं और लगभग 50 हज़ार प्राचीन ओक वृक्षों का रिकॉर्ड है।

शोध रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन के ओक वृक्ष कई खतरों का एक साथ सामना कर रहे हैं। इनमें जलवायु परिवर्तन, सूखा, रोग, कीट आक्रमण, हिरणों द्वारा अत्यधिक चराई, ग्रे गिलहरियों द्वारा छाल को नुकसान पहुंचाना तथा विकास परियोजनाओं के कारण वन क्षेत्रों का विनाश शामिल हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या किसी एक कारण से नहीं है, बल्कि अनेक दबावों के मिले-जुले प्रभाव की है। यही कारण है कि इसे “धीमी गति से बढ़ती पारिस्थितिक आपदा” कहा जा रहा है।

ब्रिटेन में वर्तमान समय का सबसे गंभीर संकट एक्यूट ओक डिक्लाइन (Acute Oak Decline) नामक बीमारी है। यह बैक्टीरिया और एक विशेष बीटल के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न होती है। सूखा और पर्यावरणीय तनाव (Drought and environmental stress) इस बीमारी को और घातक बना देते हैं। इस रोग से प्रभावित वृक्षों की छाल पर दरारें पड़ जाती हैं और उनसे गहरे रंग का तरल पदार्थ रिसने लगता है। चिंताजनक तथ्य यह है कि ऐसा होने पर सैकड़ों वर्षों तक जीवित रहने वाले वृक्ष केवल तीन से छह वर्षों के भीतर नष्ट हो सकते हैं। वर्ष 2023 तक इसके लगभग 394 प्रभावित क्षेत्रों की पहचान की जा चुकी थी।

इसके अलावा ओक पावडरी माइल्ड्यू, ओक प्रोसेशनरी मॉथ, नॉपर गॉल वास्प तथा ओक लेस बग जैसे कीट और रोग भी वृक्षों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। वैश्विक व्यापार (Global trade) और जलवायु परिवर्तन (climate change) के कारण इन खतरों का प्रसार तेज हो रहा है।

संकट केवल वृक्षों का नहीं

यदि ओक वृक्षों की संख्या में गिरावट जारी रही तो इसका प्रभाव केवल वनों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे हज़ारों जीव प्रजातियों का आवास प्रभावित होगा, कार्बन भंडारण क्षमता घटेगी, जल चक्र पर असर पड़ेगा और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो सकता है। एक अनुमान के मुताबिक ब्रिटेन में ओक वृक्ष लगभग 3.1 करोड़ टन कार्बन संग्रहित करते हैं। ऐसे में इनका क्षरण जलवायु संकट को और गंभीर बना सकता है।

एक वैश्विक चेतावनी

ओक का संकट किसी एक देश की समस्या नहीं है। यह पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है कि जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता ह्रास और मानवीय दबाव मिलकर किस प्रकार प्रकृति की सबसे मज़बूत दिखने वाली प्रजातियों को भी कमज़ोर कर सकते हैं।

समय रहते उपयुक्त कदम न उठाए गए, तो ओक के साथ-साथ उनसे जुड़े हज़ारों जीवों और पारिस्थितिक तंत्रों का भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है। यह केवल एक वृक्ष की गाथा नहीं, बल्कि पृथ्वी की पारिस्थितिक सुरक्षा और मानव सभ्यता के भविष्य से जुड़ा प्रश्न भी है।

संरक्षण 

ओक वृक्षों का संरक्षण केवल वन विभागों या वैज्ञानिकों का दायित्व नहीं है। इसके लिए बहुस्तरीय प्रयासों की आवश्यकता है। रोगों और कीटों की निगरानी, वैज्ञानिक शोध, प्राकृतिक पुनर्जनन को बढ़ावा, नियंत्रित चराई और विकास परियोजनाओं में पर्यावरणीय संवेदनशीलता (environmental sensitivity) आवश्यक है।

भारत में सामुदायिक वन प्रबंधन (community forest management) और पारंपरिक संरक्षण प्रणालियां इनके संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी से ओक वनों के संरक्षण के कई उदाहरण सामने आए हैं। इनमें हिमालयी क्षेत्रों में पवित्र वन (sacrad forest) जैसी परंपराएं ओक संरक्षण के लिए एक अच्छा उदाहरण बन सकती हैं। (स्रोत फीचर्स)

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वीनस फ्लाईट्रैप झट से कैसे बंद हो जाता है?

वीनस फ्लाईट्रैप (Dionaea muscipula) उन चुनिंदा पौधों में शुमार है जो कीटों को अपना शिकार बनाते हैं और उनसे अपना कुछ पोषण हासिल करते हैं। वीनस फ्लाईट्रैप (venus flytrap) अमेरीका के उत्तरी और दक्षिणी कैरोलिना के दलदली इलाके में पाया जाता है। चूंकि इन दलदली इलाकों (wetlands) की मिट्टी में कुछ विशेष पोषक तत्व कम होते हैं इसलिए यह पौधा भरपाई लिए कीटों का शिकार करता है। वैसे तो इस मशहूर कीटभक्षी पौधे का अपने शिकार को पकड़ने का तरीका सर्वविदित है। लेकिन यही तरीका वैज्ञानिकों के बीच उत्सुकता बनाए हुए है।

दरअसल, वीनस फ्लाईट्रैप ज़मीन सटकर लगने वाला पौधा है। जिसमें लगभग भूमिगत गांठ-नुमा संरचना (तना) से रोज़ेट जैसी आकृति बनाती 4 से 7 पत्तियां निकली होती हैं, जिनकी अधिकतम लंबाई 10 सेंटीमीटर तक जाती है। इसकी पत्तियां दो खंडों में बंटी होती हैं। पत्ती का निचला भाग सामान्य पत्ती की तरह होता है और प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) करता है। पत्ती के ऊपरी छोर पर शिकंजे (ट्रैप) होते हैं, जो शिकार को पकड़ने का काम करते हैं। जैसे-जैसे पत्ती लंबी और परिपक्व होती जाती है, ये शिकंजे भी परिपक्व होते जाते हैं।

परिपक्व शिकंजे शिकार पकड़ते हैं। शिकंजा हरे-लाल रंग के दो अर्ध-अंडाकार पाटों से बने होते हैं जो एक कब्जे-नुमा संरचना से जुड़े होते हैं। इनके सिरों पर कांटे-नुमा (needle-like) नुकीली संरचनाएं होती हैं, और दो अंदर की सतह पर रोम जैसी संरचनाएं होती हैं। सामान्य स्थिति में ये शिकंजा तने हुए, बाहर को थोड़ा मुड़कर (घुमाव लिए) खुले रहते हैं। किसी कीट के शिकंजा की अंदरुनी सतह पर बैठने का संकेत मिलता है तो दोनों पाट झट से बंद हो जाते हैं और कीट बेचारा फंस जाता है। पत्तियों के बंद होने की गति बहुत तेज़ होती है, कीट के बैठे होने का संकेत मिलने के सेकंड के दसवें हिस्से के भीतर ये बंद हो जाती है। और इसी गति ने वैज्ञानिकों को उलझा रखा है।

वे दशकों से यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर शिकंजा इतनी तेज़ी से बंद कैसे हो जाता है। कुछ अध्ययनों ने बताया था कि जब कीट शिकंजा पर मौजूद रोम-नुमा संरचनाओं को छूते हैं, तो पत्ती में विद्युत संकेत (electric current) संचारित होता है, जिससे वह अपने शिकार को पकड़ने और पचाने के लिए हरकत में आ जाती है। फिर 2005 में, फ्रांस की ऐक्स-मार्सेली युनिवर्सिटी के भौतिक शास्त्री योएल फॉर्टेरे और उनके साथियों ने बताया था कि जब शिकंजा खुली स्थिति में होता है, यानी उसके दोनों पाट बाहर की तरफ मुड़े हुए होते हैं, तो वे तनाव की स्थिति में होते हैं। जब कोई कीट शिकंजा पर बैठता है, तो यह तनाव अचानक खत्म हो जाता है — जिससे दोनों हिस्से अंदर की तरफ मुड़ जाते हैं और कीट की शामत आ जाती है।

हाल ही में उन्होंने रहस्य को सुलझाने में एक कदम और बढ़ाया गया है। उन्होंने पता लगा लिया है कि यह तनाव टूटता कैसे है। दरअसल, इस सम्बंध में वैज्ञानिकों के बीच दो मत थे कि शिकंजा का यह तनाव खत्म कैसे होता है। एक मत के अनुसार, पानी शिकंजा की अंदरूनी सतह से बाहरी सतह की एपिडर्मल कोशिकाओं (epidermal cells) में तेज़ी से जाता है, जिससे सूजन आती है और तनाव खत्म होता है। दूसरे मत के अनुसार बाहरी एपिडर्मल कोशिकाओं की सख्त भित्ति अचानक नरम पड़ जाती हैं, जिससे तनाव खत्म हो जाता है।

फॉर्टेरे और उनकी टीम ने सैकड़ों फ्लाईट्रैप पौधों पर दोनों संभावनाओं को जांचने के लिए अलग-अलग कई प्रयोग किए। पाया कि कोशिकाओं की भित्ति (membrane) नरम पड़ने के कारण तनाव खत्म होता है।

क्या वास्तव में पानी के बहाव के कारण तनाव खत्म होता है? इस संभावना को जांचने के लिए उन्होंने अंदरूनी सतह से एपिडर्मल कोशिकाओं तक पानी के पहुंचने का समय मापा। पाया कि पानी को अंदरुनी सतह से एपिडर्मल कोशिकाओं तक पहुंचने में 30 से 150 सेकंड लगते हैं — यह समय शिकंजा के झटके से बंद होने की गति से कई गुना अधिक है, इसलिए यह वजह तो नहीं लगती।

दूसरी संभावना को जांचने के लिए शोधकर्ताओं ने शिकंजा की एपिडर्मल कोशिकाओं के तनाव को मापा और पाया कि यह तनाव खत्म होने कारण ही शिकंजा बंद होता है। यानी जब कोई कीट शिकंजा पर रेंगता है तो शिकंजा की बाहरी सतह पर मौजूद कोशिकाएं नरम पड़ जाती हैं और शिकंजा बंद हो जाता है।

हालांकि, शोधकर्ता एकदम सटीक जवाब पर अब भी नहीं पहुंचे हैं। यह सवाल अब भी अनुत्तरित है कि शिकंजा की कोशिका भित्ति को क्या चीज़ नरम करती है। लेकिन साइंस जर्नल में उन्होंने इसके कुछ संभावित कारणों की ओर इशारा किया है। इसके अनुसार, पौधों की कोशिका भित्ति नरम जेल जैसे मैट्रिक्स और सख्त रेशों के जाल से बनी होती हैं। जब कोई कीट शिकंजा पर आता है तो कुछ एंज़ाइम्स (enzymes) स्रावित होते हैं, जो रेशों और मैट्रिक्स के बीच के जोड़ों को कमज़ोर कर देते हैं और वे नरम पड़ जाते हैं और तनाव खत्म हो जाता है।

वैसे वैज्ञानिक तो अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए अनसुलझी गुत्थियां सुलझाते रहते हैं। लेकिन जिज्ञासा के साथ-साथ स्वार्थ भी चलता है। ऐसी उम्मीद जगी है कि शिकंजा बंद होने की प्रक्रिया को अच्छी तरह समझकर मनुष्य के लिए काम आने वाले रोबोट को बेहतर और लचीला (flexible) बनाया जा सकेगा: इस कार्यप्रणाली के आधार पर ऐसे रोबोट बनाए जा सकते हैं जो ज़रूरत पड़ने पर सख्त से नरम पड़ जाएं, या नरम से सख्त। (स्रोत फीचर्स)

वीडियो देखें: https://www.youtube.com/watch?v=RlWvfd_cTXQ https://www.youtube.com/watch?v=363u62CLjCU

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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तूफान में दमकते पेड़ों के शिखर

ह एक पुराना विचार रहा है कि कुछ पेड़ों के शिखर तूफान के दौरान चमकते होंगे। हालांकि फिल्म एवेटार Avatar Movie) में पेड़ नीली आभा बिखेरते नज़र आते हैं लेकिन जीव वैज्ञानिकों का मानना रहा है कि यह चमक किसी पारलौकिक शक्ति की वजह से नहीं बल्कि विद्युतीय चिंगारियों (Electric sparks) के कारण पैदा होती होगी। अब तक यह नज़ारा सिर्फ प्रयोगशालाओं में देखा गया था।

अब मौसम वैज्ञानिकों के एक दल ने प्रकृति में इसका लुत्फ उठाया है। हाल ही में उन्होंने जियोफिज़िकल रिसर्च लेटर्स में बताया है कि उन्होंने पत्तियों के सिरों के आसपास पराबैंगनी (यूवी) प्रकाश (Ultra Voilet) की टिमटिमाहट देखी है। इन वैज्ञानिकों को लगता है कि इस अवलोकन के आधार पर यह समझने में मदद मिल सकती है कि तूफान किस तरह से धरती की सतह का विद्युतीकरण करके तड़ित उत्पन्न करते हैं। ये वायुमंडल विज्ञान (Atmospheric science) की प्रमुख गुत्थियां रही हैं।

तूफान के दौरान तूफानी बादल अत्यंत ऋणावेशित होते हैं। इसकी वजह से प्रेरण की प्रक्रिया द्वारा नीचे धरती पर एक धनावेश का सृजन होता है। चूंकि विपरीत आवेश एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं, इसलिए धरती पर मौजूद धनावेश (Positive charge) बादलों के आवेश से दूरी को कम से कम करने की कोशिश करता है। इसी प्रक्रिया में आवेश सुचालक तनों और शाखाओं से होते हुए पत्तियों के सिरों तक पहुंच जाता है। शोधकर्ताओं का मत है कि यहां आवेश संकेंद्रित हो जाते हैं जिसकी वजह से एक शक्तिशाली विद्युतीय क्षेत्र (Electric Field) निर्मित हो जाता है। यह विद्युतीय क्षेत्र आसपास की हवा के अणुओं को उत्तेजित कर देता है। जब ये अणु वापिस सामान्य अवस्था में लौटते हैं तो वे रोशनी छोड़ते हैं।

सामान्य तौर पर कहीं भी पृष्ठभूमि में इतनी रोशनी होती है कि पत्तियों के सिरों की यह निहायत मद्धिम चमक दृश्य प्रकाश में दिखाई ही नहीं पड़ती। तो पेनसिल्वेनिया स्टेट विश्वविद्यालय के पैट्रिक मैकफारलैंड और विलियम ब्रुने ने इसका अवलोकन पराबैंगनी प्रकाश में करने की ठानी। इसके लिए उन्होंने एक उपकरण (Equipment) भी बनाया जिसमें एक दूरबीन, एक पेरिस्कोप और एक उच्च गति वाला यूवी कैमरा जोड़ा गया था। इस उपकरण को एक कार पर लगाकर उन्होंने 2024 की गर्मियों में फ्लोरिडा से लेकर पेनसिल्वेनिया तक तूफानों का पीछा किया।

नॉर्थ कैरोलिना में किस्मत ने उनका साथ दिया। यहां उनका सामना एक लंबे चले (90 मिनट) तूफान से हुआ। इस दौरान उन्होंने दो पेड़ों का अवलोकन किया – एक स्वीटगन (Liquidambar styraciflua) और एक पाइन (लोबलॉली पाइन – Pinus taeda)। यहां उन्होंने एक सामान्य कैमरा और एक यूवी कैमरा से प्राप्त लहराती शाखाओं के सिरों के वीडियो की तुलना की; देखा गया कि टिमटिमाते यूवी बिंदु शाखाओं के सिरों से मेल खा रहे थे।

इस अवलोकन से पेड़ों के सिरों पर उत्पन्न रोशनी की बात की पुष्टि तो हुई ही, साथ में यह भी पता चला कि यह टिमटिमाहट अलग-अलग पेड़ों पर विभिन्न स्थानों पर हो सकती है। इससे पता चलता है कि फुदकना इन रोशनी बिंदुओं का स्वभाव (Nature) है, जो शायद आवेशों द्वारा पेड़ों पर अलग-अलग मार्ग अपनाने का परिणाम है।

शोधकर्ताओं ने इस तरह के जगमगाते बिंदुओं के प्रभावों पर भी चर्चा की है। जैसे इनके प्रभाव से हाड्रॉक्सिल मूलक (Hydroxyl radical) बनेंगे जिन्हें वायुमंडल के डिटर्जेंट भी कहा जाता है क्योंकि ये मीथेन और कार्बन डाईऑक्साइड को नष्ट कर देते हैं। यह शायद वैश्विक स्तर पर कोई असर न डाले लेकिन स्थानीय स्तर पर ज़रूर असर डाल सकता है। इसके अलावा, ये पेड़ों द्वारा उत्सर्जित वाष्पशील कार्बनिक पदार्थों के साथ क्रिया करके धुंध (Haze) भी पैदा कर सकते हैं।

वैसे यह स्पष्ट नहीं है कि स्वयं पेड़ों पर इस आवेश का कितना-क्या असर होता है। प्रयोगशाला अध्ययन तो बताते हैं कि इतने आवेश पर पत्तियों के सिरे झुलस जाते हैं, लेकिन यथार्थ में ऐसा दिखा नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चमकते मशरूम से रोशनी देने वाले पौधे बनाने का सफर

दौलत सिंह तंवर

ल्पना कीजिए, रात के घने अंधेरे में सड़क के किनारे लगे पेड़-पौधे बिना किसी बिजली या तार के एक हल्की, सुकून देने वाली रोशनी बिखेर रहे हों। आधुनिक वनस्पति विज्ञान (botany) और जेनेटिक इंजीनियरिंग (genetic engineering) ने इस कल्पना को हकीकत में बदलना शुरू कर दिया है। यह जानना बेहद दिलचस्प होगा कि कैसे प्रयोगशालाओं में आज ‘बायोलुमिनेसेंट’ (जैव-संदीप्त – bioluminescent plants) पौधे तैयार किए जा रहे हैं, जो भविष्य में हमारी ऊर्जा ज़रूरतों का एक हरा-भरा विकल्प बन सकते हैं।

जैवसंदीप्ति

गर्मियों की रात में चमकते जुगनुओं को हम सभी ने देखा है। गहरे समुद्र में रहने वाली कुछ मछलियां, जेलीफिश या जंगलों में पाए जाने वाले कुछ कवक भी अंधेरे में चमकते हैं। जीवों द्वारा अपने शरीर के भीतर होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं के माध्यम से प्रकाश उत्पन्न करने की इस अद्भुत प्रक्रिया को ‘बायोलुमिनेसेंस’ यानी जैव-संदीप्ति कहा जाता है।

मुख्य रूप से यह चमक दो रसायनों का प्रभाव होती है: ‘ल्यूसिफेरिन’ (luciferin) जो ऑक्सीजन से क्रिया करके प्रकाश उत्पन्न करने वाला अणु है, और ‘ल्यूसिफेरेज़’ (luciferase enzyme)  वह एंज़ाइम है जो इस अभिक्रिया को गति देता है। प्रकृति में यह गुण जीवों के शिकारियों से बचने, साथी को आकर्षित करने या शिकार को लुभाने में मदद करता है। लेकिन वनस्पति जगत में, प्राकृतिक रूप से पौधों में यह गुण नहीं पाया जाता।

पौधों से रोशनी पैदा करवाने का विचार वनस्पति विज्ञानियों के लिए नया नहीं है। 1980 के दशक के अंत में वैज्ञानिकों ने जुगनू का जीन तंबाकू के पौधे में डालकर उसे संदीप्त बनाने का प्रयास किया था। प्रयोग काफी हद तक सफल रहा था, लेकिन इसमें एक बहुत बड़ी व्यावहारिक खामी थी। पौधा लगातार रोशनी दे पाए, उसके लिए बाहर से ल्यूसिफेरिन का छिड़काव करना पड़ता था। वैज्ञानिकों को एक ऐसे तरीके की तलाश थी जिसमें पौधा अपनी चयापचय प्रक्रिया (plant metabolism) के ज़रिए खुद अपना प्रकाश उत्पन्न करे – बिना किसी बाहरी रसायन या मदद के।

मशरूम से मिला समाधान

सफलता हाल ही के वर्षों में मिली, जब वैज्ञानिकों ने जुगनू को छोड़कर प्राकृतिक रूप से चमकने वाले कवक (फफूंद) (glowing fungi) का रुख किया। नियोनोथोपेनस नंबी नामक एक ज़हरीले और चमकने वाले मशरूम (Neonothopanus nambi) का गहराई से अध्ययन किया गया। वैज्ञानिकों ने पाया कि यह कवक एक विशेष चयापचय चक्र का उपयोग करता है जिसे ‘कैफिक एसिड चक्र’ कहते हैं। रोचक बात यह है कि           कैफिक एसिड (caffeic acid) सभी पौधों में प्राकृतिक रूप से मौजूद होता है। पौधे इसका उपयोग लिग्निन बनाने (lignin formation) के लिए करते हैं, जो पौधों की कोशिका भित्ति को मज़बूती और कठोरता प्रदान करता है।

शोधकर्ताओं ने कवक के उन चार प्रमुख जीन्स की पहचान की जो कैफिक एसिड को ल्यूसिफेरिन में बदलते हैं और फिर प्रकाश उत्सर्जित करने के बाद उसे वापस कैफिक एसिड में बदल देते हैं। वनस्पति विज्ञानियों ने जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से इन चार जीन्स को पहले                तंबाकू (Nicotiana tabaccum) और बाद में पिटूनिया (Petunia hybrida) जैसे पौधों के डीएनए में सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किया।

नए जेनेटिक रूप से संशोधित पौधों ने अपने पूरे जीवनचक्र में बीज से लेकर अंकुरण, पत्तियों के विकास और परिपक्वता तक निरंतर हरे रंग की रोशनी उत्सर्जित की। यह प्रकाश पत्तियों, तनों, जड़ों और फूलों, सभी हिस्सों से निकल रहा था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इसके लिए किसी बाहरी रसायन, पराबैंगनी प्रकाश या बिजली की कोई आवश्यकता नहीं थी। पौधे की               अपनी आंतरिक कार्यप्रणाली ही इस रोशनी का स्थायी स्रोत बन गई थी।

भविष्य की संभावनाएं 

रोशनी देने वाले पौधे महज़ प्रयोगशाला का चमत्कार नहीं हैं। इनके कई व्यावहारिक और पर्यावरणीय उपयोग (sustainable innovation) हो सकते हैं:

शून्यकार्बन स्ट्रीट लाइट्स (zero carbon lighting): दुनिया भर में स्ट्रीट लाइट्स और सजावटी रोशनी में भारी मात्रा में जीवाश्म ईंधन और बिजली की खपत होती है। यदि भविष्य में इन जैवसंदीप्त पेड़ों                    की चमक को बढ़ाया जा सके तो ये सड़कों, पार्कों को रोशन करने का एक प्राकृतिक, शून्य-कार्बन विकल्प बन सकते हैं। जो जलवायु परिवर्तन (climate change solution) से लड़ने में अहम होगा।

इनडोर लाइटिंग (indoor lighting plants): घरों के अंदर ये पौधे एक ‘लिविंग लैंप’ (living lamp) की तरह काम कर सकते हैं। रात के समय ये एक मंद, प्राकृतिक रोशनी देंगे जिससे बिजली की बचत होगी। हाल ही में ‘फायरफ्लाई पेटूनिया’ नाम से कुछ पौधे अमेरिकी बाज़ार में आम लोगों के लिए उतारे भी गए हैं।

फसलों की स्वास्थ्य निगरानी (crop monitoring): वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तकनीक का उपयोग करके         पौधों को ऐसा बनाया जा सकता है कि जब वे किसी तनाव (plant stress) में हों (जैसे पानी की कमी, कीटों का हमला, या मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी), तो उनकी चमक का रंग या उसकी तीव्रता बदल जाए।     इससे किसानों को फसल के बीमार होने से बहुत पहले ही संकेत मिल जाएगा।

चुनौतियां और आगे की राह 

हालांकि यह तकनीक बहुत आशाजनक है, लेकिन बड़े पैमाने पर इसके उपयोग से पहले कई वैज्ञानिक और पारिस्थितिक चुनौतियों (scientific challenges) का समाधान करना बाकी है:

रोशनी की तीव्रता (light intensity): वर्तमान में इन पौधों से निकलने वाली रोशनी बहुत तेज़ नहीं है। आप इसकी रोशनी में कोई किताब नहीं पढ़ सकते। वैज्ञानिकों का अगला लक्ष्य जेनेटिक कोड (genetic optimization)  में सुधार करके इस रोशनी को कई गुना तक बढ़ाना है।

पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव (ecosystem impact): प्रकृति में ऐसे चमकीले पेड़-पौधे लगाने से पहले यह समझना बहुत ज़रूरी है कि स्थानीय कीटों, परागण करने वाले जीवों और रात में सक्रिय रहने वाले जंतुओं (nocturnal animals) पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। कहीं यह उनके प्राकृतिक व्यवहार या जीवन चक्र को भ्रमित तो नहीं करेगा?

पौधे की ऊर्जा खपत (energy metabolism): लगातार प्रकाश उत्पन्न करने में पौधे की काफी ऊर्जा खर्च होती है। वनस्पति विज्ञानियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रकाश उत्पन्न करने की यह प्रक्रिया पौधे के सामान्य विकास, उसके फलने-फूलने या उसकी जीवन अवधि पर कोई नकारात्मक प्रभाव न डाले। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मरकर फिर ज़िंदा हो जाने वाले ज़ॉम्बी पौधे!

डॉ. किशोर पंवार

ल ही जीवन है, यह बात शाकीय पौधों के संदर्भ में सौ फीसदी प्रत्यक्ष लागू देखी जा सकती है। धनिया, पालक, मेथी जैसी पत्तेदार सब्ज़ियों के पौधे पानी की ज़रा-सी कमी होने पर तुरंत मुरझा जाते हैं।

अधिकांश पादप प्रजातियां (plant species) उनके अंदर पानी की मात्रा 60 प्रतिशत से कम होने पर संकट में पड़ जाती हैं या मर जाती हैं। वहीं, कुछ मांसल पौधे उनमें पानी की मात्रा 50 या 40 प्रतिशत तक रह जाने पर भी जीवित रह पाते हैं। उनमें पानी को बचाए रखने के कुछ तरीके (water retention mechanism) भी हैं। उनकी मोटी फूली-फूली पत्तियां मोम जैसी परतों से ढंकी होती हैं, जिसके चलते पानी का वाष्पन (transpiration control) कम होता है। इन पौधों में एक और विशेषता पाई जाती है। पानी पत्तियों पर उपस्थित महीन छिद्रों (स्टोमेटा) के रास्ते वाष्पीकृत होता रहता है और उन्हीं छिद्रों के रास्ते प्रकाश संश्लेषण के लिए कार्बन डाईऑक्साइड ग्रहण की जाती है। अत: ऐसे में पानी को बचाने के लिए ये पौधे अपने स्टोमेटा रात में खोलते हैं ताकि पानी का वाष्पीकरण कम हो और उस समय कार्बन डाईऑक्साइड का भंडारण कर सकें। दिन के समय यह प्रकाश संश्लेषण में काम में आती है।

परंतु कुछ पौधे ऐसे भी पाए जाते हैं जो पूरी तरह सूख जाने के बाद भी फिर से पानी मिलने पर पुनर्जीवित (resurrection plants) हो जाते हैं। इनका व्यवहार एकदम विपरीत होता है। जब इनके अंदर पानी की मात्रा कम होने लगती है तो वे अपनी शेष नमी को भी पूरी तरह से त्याग देते हैं (desiccation tolerance)। परिणाम यह होता है कि उनके अंदर जल स्तर घटकर मात्र 5 प्रतिशत रह जाता है और वे मुरझाकर एक भूरी टहनी भर रह जाते हैं। देखकर ऐसा लगता है कि वे मर ही गए हैं, परंतु पानी मिलते ही फिर से जी उठते हैं, हरे-भरे हो जाते हैं।

पुनर्जीवित होने वाले पौधों की बात हो तो हमारे यहां सबसे पहले संजीवनी बूटी (Sanjeevani plant)  का नाम ज़ेहन में आता है। इसे लक्ष्मण बूटी भी कहते हैं।

पुनर्जीवन की क्षमता वाले पौधों पर सर्वाधिक शोध कार्य एक अफ्रीकन वैज्ञानिक जिल फैरेन्ट (Jill Farrant) ने किया है। वे वर्तमान में दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन विश्वविद्यालय में आणविक और कोशिका विज्ञान की प्रोफेसर हैं जिनके खास विषय हैं पुनर्जीवन पौधों की खोज और उनकी कार्य प्रणाली का अध्ययन करना।

उन्होंने 2025 में केप टाउन के एक पुराने स्मारक के पास एक रेतीले रास्ते पर झाड़ियों के पास भूरे रंग की सूखी हुई मुरझाई कुछ टहनियों को उठाया जो देखने में बिल्कुल बेजान-सी लगती थीं। यह वही पौधा था जिसे उन्होंने बरसों पहले बचपन में देखा था।

यह एनीमिया एफ्रोरम (Anemia affrorum) नाम का एक फर्न (fern) था। वे इसकी चमत्कारी शक्ति से प्रभावित थीं। उन्होंने प्रयोगशाला में इसकी कुछ सूखी टहनियों को पानी भरी तश्तरी में रख दिया। कुछ ही घंटों में टहनियों पर छोटे-छोटे हरे पत्ते खुलने लगे। अगली सुबह तक सभी शाखाएं हरी-भरी नज़र आने लगीं, बिलकुल एक नन्ही क्रिसमस ट्री के समान।

दरअसल, एनीमिया एफ्रोरम पुनर्जीवित होने वाला एक फर्न (resurrection fern) है जो महीनों या वर्षों तक भीषण सूखे को सहन करके पानी मिलने पर दो-तीन दिन में ही फिर से जीवित हो जाता है; यह लंबे और इन्तहाई शुष्क मौसम वाले क्षेत्रों में उगने वाले पौधों में पाया जाने वाला एक दुर्लभ अनुकूलन है, जो जैव विकास (evolutionary adaptation) के लंबे दौर में पैदा हुआ है। अक्सर ये पौधे पानी की कमी होने पर अपनी कोशिकाओं को ऊर्जा देने वाले क्लोरोफिल रंजक को नष्ट कर देते हैं और कोशिकाओं में लगभग हर जगह मौजूद पानी की जगह शर्करा और प्रोटीन भर लेते हैं। फैरेन्ट इसे बिना मरे सूख जाना कहती हैं यानी ‘प्लेईंग डेड’ या मरने का स्वांग।

प्रयोगशाला में फैरेन्ट ने जो किया था, वह हमारे यहां सड़कों पर कांच की बोतलों में किया जाता है। ऐसा नज़ारा अक्सर धार्मिक मेलों (traditional plant selling) में देखने को मिल जाता है। सड़कों पर कुछ लोग एक वनस्पति का ढेर लिए बैठे रहते हैं और उसके कुछ पौधों को वे पानी की बोतल में भरकर रखते हैं जो बिल्कुल ताज़ा एवं हरे भरे दिखते हैं जबकि ढेर के पौधे एकदम सूखे और मुड़े-तुड़े होते हैं। इस पौधे को वे संजीवनी बूटी के नाम से बेचते हैं। यह भी एनीमिया एफ्रोरम की तरह एक फर्न है और नाम है सेलेजिनेला ड्रायोप्टेरिस (Selaginella bryopteris)। यह हमारे देश में अरावली और विंध्य पर्वत शृंखला तथा दक्षिण भारत के शुष्क और चट्टानी इलाकों में मिलता है। यह एक लिथोफाइट (शैलोद्भिद) है जो 200 से 8000 मीटर की ऊंचाई पर चट्टानों की दरारों में उगता है।

एक और मशहूर पुनर्जीवन पौधा है मायरोथेम्नस फ्लेबेलीफोलिया (Myrothamnus flabellifolia)। यह मध्य और दक्षिणी अमेरिका में पाया जाने वाला एकमात्र काष्ठीय पुनर्जीवन पौधा है। इसका उपयोग पारंपरिक अफ्रीकी चिकित्सा पद्धति (traditional medicine) में घावों के लिए मरहम बनाने तथा सांस की तकलीफों में धूम्रपान या औषधि चाय के रूप में किया जाता है।

मरने का स्वांग और पुनर्जीवन का विज्ञान

पुनर्जीवित होने वाली प्रजातियों में सूखने पर भी जीवित बने रहने के लिए कई रणनीतियां (survival strategies) विकसित हुई हैं। प्रोफेसर फैरेन्ट ने इस जटिल सुनियोजित परिवर्तन (cellular adaptation) का खुलासा किया है।

इस प्रक्रिया के दौरान होता यह है कि कोशिकाओं के अंदर का पानी सुक्रोज़ और रैफीनोस जैसी शर्कराओं (sugar molecules) और विभिन्न प्रोटीन द्वारा प्रतिस्थापित हो जाता है। इससे एक कांच जैसा पदार्थ (vitrification process) बनता है जो कोशिका झिल्ली को सिकुड़ने से रोकता है। कोशिकाओं में कुछ विशेष प्रोटीन पाए जाते हैं जिन्हें शेपरॉन  प्रोटीन (chaperone proteins) कहते हैं। ये कोशिका में विभिन्न विशाल अणुओं (जैसे डीएनए और आरएनए) की संरचना को बनाए रखने में मदद करते हैं। जैसे-जैसे कोशिका का आयतन कम होता है वैसे-वैसे सैल्यूलोज़ से बनी कोशिका भित्ती (cell wall structure) अंदर की ओर मुड़ने लगती है ताकि वह कोशिका झिल्ली के संपर्क में बनी रह सके। तनाव के दौरान सक्रिय ऑक्सीजन मूलक भी बनने लगते हैं जो डीएनए, प्रोटीन व कोशिका झिल्ली को नुकसान पहुंचा सकते हैं। और इन्हें कई एंटीऑक्सीडेंट अणु (antioxidant defense) तोड़ देते हैं।

प्रकाश संश्लेषण ऐसे सक्रिय ऑक्सीजन मूलकों का एक प्रमुख स्रोत (oxidative stress source) होता है। इन पौधों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया लगभग रुक जाती है। इसके अलावा, कुछ पुनर्जीवन पौधे अपनी पत्तियों को इस तरह मोड़ लेते हैं कि सूर्य की रोशनी क्लोरोफिल तक न पहुंचे (light protection mechanism)। अन्य पौधे प्रकाश संश्लेषण तंत्र को पूरी तरह से नष्ट कर देते हैं और पानी मिलने पर फिर से उसका निर्माण करते हैं।

मरने-जीने की इस जटिल प्रक्रिया के अंतिम चरण में, जब पौधे में पानी 20 प्रतिशत से कम हो जाता है, तब पौधा कई आरएनए और अन्य अणु (gene expression storage) पैदा करके संग्रहित कर लेता है ताकि पुनर्जीवन के लिए ऊर्जा की व्यवस्था की जा सके। इसके बाद सब कुछ थम जाता है।

जीर्णता और पुनर्जीवन पौधे

पादप प्रजनकों (plant breeding) ने ऐसी कई किस्में विकसित की है जो अधिक पानी संग्रहित कर सकती हैं, ये  वाष्पीकरण के ज़रिए पानी कम उड़ाती हैं या पानी सोखने के लिए गहरा जड़ तंत्र विकसित कर लेती हैं ताकि सूखे की स्थिति में भी जीवित रह सकें। लेकिन इनमें जरावस्था आती है और इसकी परिणति को जीर्णता कहते हैं। परंतु पुनर्जीवन पौधों में यह स्थिति नहीं आती। फैरेन्ट की टीम ने दो प्रजातियों में जीर्णता रोकने वाले तंत्रों (anti aging mechanism plants) का पता लगाया है। इनमें एक मक्का है और दूसरी फसल इथियोपिया की टेफ (Eragrostis tef) है। उनका अगला कदम जेनेटिक इंजीनियरिंग (genetic engineering crops) के माध्यम से फसलों में जरावस्था को रोकने वाले तंत्र को शामिल करने का प्रयास है। 

फैरेन्ट का कहना है कि अधिकांश फसल प्रजातियों में पहले से ही वे जीन मौजूद होते हैं जिनकी उन्हें पुनर्जीवन पौधों की नकल करने के लिए ज़रूरत होती है। ये जीन इन पौधों के बीजों (seed dormancy genes) में सक्रिय होते हैं जो वर्षों तक या दशकों तक जीवित रह सकते हैं और सही समय और स्थान पर अंकुरित होते हैं। ऐसा लगता है कि पुनर्जीवन पौधों का विकास (plant evolution) इन जीन्स की अभिव्यक्ति को पौधे के अन्य भागों में विस्तार देकर हुआ है। इस तंत्र को सक्रिय करने वाले जीन्स की खोज फसलों को सूखा प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करने की कुंजी हो सकती है।

वैज्ञानिकों कि इस टीम को उम्मीद है कि जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा की कमी या अनियमितता के चलते खाद्य सुरक्षा (food security) की दृष्टि से ऐसे कुछ तंत्रों को आम फसलों में जोड़ा जा सकता है। हालांकि ऐसे जीन्स को आम फसलों में जोड़ना आसान नहीं होगा।

2017 में फैरेन्ट और एक बीज वैज्ञानिक हेंक हिलहोर्स्ट ने नेचर में एक पुनर्जीवन पौधे ज़ीरोफायटा विस्कोसा (Xerophyta viscosa genome) के जीनोम सम्बंधी एक शोध पत्र प्रकाशित किया था। इस शोध ने इस बात की पुष्टि की थी कि ये प्रजातियां उन जीन्स पर निर्भर होती हैं जो सामान्यत: उनके बीज में सक्रिय रहते हैं।

अलबत्ता, सूखा-सहिष्णु फसलों (drought tolerant crops) के विकास की दृष्टि से अभी दिल्ली दूर है। एक कारण तो यह कि ऐसे शोध के लिए फंडिंग (research funding) का अभाव है।

वैसे, फैरेन्ट की टीम इस बात का भी अध्ययन कर रही है कि पुनर्जीवन पौधों की जड़ों में सूक्ष्मजीवों का कैसा संसार (माइक्रोबायोम) बसता है। यह माइक्रोबायोम (root microbiome) इनकी जड़ों के विकास को बढ़ावा देता है और पोषण के अवशोषण में भी मदद करता है। फसली पौधों में ऐसा माइक्रोबायोम विकसित करके उन्हें सूखा-सहिष्णु बनाया जा सकेगा। यदि ऐसा हो सका तो खाद्य सुरक्षा के लिहाज़ से क्रांतिकारी होगा। (स्रोत फीचर्स)

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नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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