प्रमोद भार्गव

दुनिया जलवायु परिवर्तन (climate change) के चलते आज भीषण सूखे, बाढ़, बारिश, अत्यधिक ठंड एवं गर्मी से जूझ रही है। लेकिन अब जलवायु परिवर्तन के चलते नेपाल के भोटकेशी और त्रिशूली में विनाशकारी बाढ़ से जो तबाही हुई है, उसकी आपूर्ति के लिए नेपाल ने मानवीय मदद और दान लेने की बजाय अंतर्राष्ट्रीय मंचों से ‘जलवायु मुआवजा’ (climate compensation) और न्याय देने की मांग उठाना शुरू कर दी है। नेपाल की यह मांग न्यायसंगत है क्योंकि कुल वैश्विक कार्बन डाईऑक्साइड (जलवायु परिवर्तन का प्रमुख उत्तरदायी) उत्सर्जन में नेपाल की भागीदारी मात्र 0.05 प्रतिशत है। यदि सभी प्रकार की ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को जोड़ लिया जाए, तब भी यह हिस्सेदारी केवल 0.08 प्रतिशत की होती है। अतएव नेपाल का कहना है कि विकसित या विकासशील देशों द्वारा तात्कालिक राहत सामग्री भेजना पर्याप्त नहीं है, इस त्रासदी के लिए ज़िम्मेदार ग्रीनहाउस गैसों के बड़े उत्सर्जक देशों को आर्थिक मुआवज़ा देना होगा। साफ है नेपाल अब जलवायु न्याय और कानूनी मुआवज़े की मांग को प्राथमिकता दे रहा है।
नेपाल का तर्क है कि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन (global carbon emission) में उसकी भागीदारी न्यूनतम है, लेकिन उसे हिमखंड पिघलने के सबसे गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है। नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र के ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ (loss and damage fund) से 5 अरब डॉलर की तत्काल जलवायु राहत देने की मांग की है। संयुक्त राष्ट्र के इस कोश से जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली क्षति की पूर्ति का प्रावधान है। यह एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक बदलाव का संकेत है। नेपाल ने विश्व समुदाय के सामने बेबाकी से यह बात कही है। इस मांग को रखते हुए नेपाल ने दो टूक शब्दों में यह भी कहा है कि औद्योगिक कार्बन उत्सर्जक देशों में चीन, अमेरिका और भारत इस त्रासदी के लिए उत्तरदायी हैं। इन्हीं के उद्योगों से जो कार्बन उत्सर्जन हो रहा है, उसके प्रभाव से हिमालय के हिमखंड (himalyan glaciers) दुनिया के बाकी हिमखंडों की तुलना में तीन गुना तेज़ी से पिघल रहे हैं।
नेपाल ने चीन से इस बात पर भी नाराज़गी जताई है कि उसने 26 अगस्त को तिब्बत में हिमखंड टूटने (glacier break) की जानकारी समय रहते नहीं दी। इस कारण नेपाल को अपने लोगों को बचाने का समय नहीं मिल पाया।
धरती पर रहने वाले जीवन पर करीब तीन दशक से जलवायु परिवर्तन के वर्तमान और भविष्य में होने वाले संकटों की तलवार लटकी हुई है। इस संकट से निपटने के उपाय तलाशने की दृष्टि से प्रतिवर्ष जलवायु सम्मेलन (climate summit) होता है। परिचर्चाओं और वाद-विवाद से निकले निष्कर्ष चेताते रहे हैं कि कोयला, तेल और गैस अर्थात जीवाश्म ईंधन इस संकट के दोषी हैं। अतएव इनका उपयोग धीरे-धीरे खत्म करना होगा। लेकिन सहमति बनती नहीं है। विकासशील देश इस बात को लेकर असहमत रहते हैं कि समझौते में जो शर्तें दर्ज रहती हैं, एक तो वे पूरी तरह स्पष्ट नहीं होती, दूसरे उन्हें अमीर देशों की आर्थिक मदद के बिना पूरा करना आसान नहीं होता। इस सम्मेलन का एक ही प्रमुख लक्ष्य था कि दुनिया उस रास्ते पर लौटे, जिससे वैश्विक तापमान वृद्धि को औद्योगिक विश्व के पहले के तापमान से 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जा सके। 100 से ज़्यादा देश 2030 तक दुनिया की नवीनीकरणीय ऊर्जा को बढ़ाकर तीन गुना करने पर सहमत भी हैं। इसके अंतर्गत अक्षय ऊर्जा के प्रमुख स्रोत सूर्य, पवन और पानी से बिजली बनाने के उपाय सुझाए गए हैं। इस सिलसिले में प्रेरणा के रूप में ऊरुग्वे जैसे देश का उदाहरण दिया जाता है, जो अपनी ज़रूरत की 98 फीसदी ऊर्जा इन्हीं स्रोतों से प्राप्त करता है। लेकिन यह एक अपवाद है; हकीकत यह है कि यूक्रेन और रूस तथा इस्राइल और हमास और अमेरिका व ईरान के बीच चलते भीषण युद्ध के कारण कोयले जैसे जीवाश्म ईंधन से ऊर्जा उत्पादन बढ़ा है और बिजली उत्पादन के जिन कोयला संयंत्रों को बंद कर दिया गया था, उनका उपयोग फिर से शुरू हो गया है।
दुनिया में चीन सबसे ज़्यादा (30-33 प्रतिशत) कार्बन उत्सर्जित करता है। इसके बाद अमेरिका की भागीदारी करीब 11 से 14 प्रतिशत और भारत की हिस्सेदारी 7 से 8 फीसदी है। 2015 में हुए ऐतिहासिक पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते (Paris agreement) को तब बड़ा झटका लगा था, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे खारिज कर दिया था। तब ये आशंकाएं उठी थीं कि वैश्विक समस्याओं पर अब आगे कोई सहमति शायद नहीं बन पाएगी। फिलहाल तो यह कहना भी मुश्किल है कि नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र के ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ से 5 अरब डॉलर की जो मांग की है वह उसे मिल ही जाएगी।
अपने औद्योगिक हितों (industrial profits) की चिंता और अमेरिका प्रथम की अवधारणा वाले डोनाल्ड ट्रंप और उनका अमेरिका मानने लगा है कि जलवायु परिवर्तन और बढ़ता वैश्विक तापमान एक खोखली शंका है। वहां देश की जीडीपी दर और आर्थिक संपन्नता घटने की बात भी कही जा रही है। साफ है कि अमेरिका के लिए स्वहित सर्वोपरि है। लेकिन अमेरिका आगे आकर निजी और संयुक्त राष्ट्र के स्तर पर नेपाल की मदद हेतु कोई पहल करे, तभी अन्य देश नेपाल की मदद के लिए आगे आएंगे। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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