डॉ. अनंत फड़के

भारत के बाज़ार में उपलब्ध लगभग 225 कैंसर-रोधी दवाइयों में से 110 दवाइयों की कीमतों पर अब तक कोई नियंत्रण नहीं था। इन दवाओं की सालाना बिक्री ₹10,000 करोड़ की है। अब इन दवाओं पर दुकानदारों और अस्पतालों को अधिकतम 30 प्रतिशत तक ही व्यापारिक मार्जिन लेने की अनुमति होगी। थोक और खुदरा दवा विक्रेता तथा कुछ अस्पताल अब तक इन दवाओं पर औसतन 170 प्रतिशत और कुछ मामलों में 700 प्रतिशत तक मार्जिन कमाते थे। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे “दिनदहाड़े डकैती” और “जबरन वसूली” कहा, तब जाकर सरकार की नींद खुली!
अब इस व्यापारिक मार्जिन पर सीमा लगाए जाने से इन दवाओं की कीमतों में औसतन 70 प्रतिशत की कमी आएगी और मरीज़ों के लगभग ₹2,500 करोड़ सालाना बचेंगे। व्यापारिक मार्जिन पर यह नियंत्रण निश्चित रूप से स्वागत योग्य है। लेकिन कैंसर की दवाइयां बनाने वाली दवा कंपनियों की मुनाफाखोरी को काफी हद तक खुली छूट दी गई है! यदि मुनाफाखोरी के सभी स्तरों पर नियंत्रण लगाया जाए, तो इन दवाइयों की कीमतें आज की कीमतों की एक-चौथाई से लेकर दसवें हिस्से तक हो सकती हैं। आइए देखें कि ऐसा कैसे संभव है और ऐसा क्यों नहीं किया जा रहा है।
सिर्फ व्यापारिक ‘मार्जिन’ पर नियंत्रण
सरकार को केवल व्यापारियों के मुनाफे पर ही नहीं, बल्कि दवा कंपनियों के मुनाफे पर भी नियंत्रण लगाना चाहिए। बड़ी दवा कंपनियां अपने बेहद महंगे ब्रांडों के बारे में डॉक्टरों को ‘मनाती’ हैं। नतीजा, अनेक डॉक्टर मरीज़ों को ये बेहद महंगे ब्रांड लिखकर देते हैं। इन ब्रांडों से बड़ी कंपनियों को भारी मुनाफा मिलता है, जबकि दुकानदारों को केवल लगभग 16 प्रतिशत मार्जिन मिलता है।
छोटी कंपनियों के पास डॉक्टरों से मिलकर अपने ब्रांड के बारे में उन्हें समझाने और प्रभावित करने के लिए इतना बजट नहीं होता। इसलिए छोटी कंपनियां इसका दूसरा रास्ता निकालती हैं। वे केमिस्ट को ही बहुत अधिक मार्जिन देती हैं, ताकि केमिस्ट छोटी कंपनियों के कम मशहूर ब्रांडों को अधिक मशहूर और महंगे ब्रांडों के मुकाबले बेचने की कोशिश करें। केमिस्ट ग्राहक से पूछते हैं, “क्या आपको सस्ती जेनेरिक दवा दें?” और फिर अपेक्षाकृत कम कीमत वाले छोटी कंपनियों के ब्रांड बेचने की पेशकश करते हैं। इस तरह बड़ी कंपनियों की बजाय छोटी कंपनियां और दुकानदार कुछ कम, लेकिन फिर भी काफी मुनाफा कमाते हैं।
अब सरकार ने व्यापारिक ‘मार्जिन’ पर नियंत्रण लगा दिया है। इससे संभावना है कि केमिस्ट छोटी कंपनियों के ब्रांडों की बजाय बड़ी कंपनियों के ब्रांड ही बेचना पसंद करेंगे!
सिर्फ कुछ ही कैंसर–रोधी दवाएं मूल्य–नियंत्रण के दायरे में
चिकित्सकीय शोध और परीक्षणों से गुज़रने के बाद प्रमाणित लगभग 250–300 कैंसर-रोधी दवाइयों का उल्लेख चिकित्सा ग्रंथों में मिलता है। इनमें से भारत के बाज़ार में लगभग ₹12,500 करोड़ की 225 कैंसर-रोधी दवाएं उपलब्ध हैं। इनमें से केवल 63 दवाइयों पर, जिनकी बिक्री ₹2,250 करोड़ की थी, सरकार ने 2013 में मूल्य-नियंत्रण लागू किया था। वास्तव में, ये सभी 225 दवाएं जीवन बचाने वाली हैं, इसलिए इन सभी पर मूल्य-नियंत्रण होना चाहिए। लेकिन सरकार ने 2013 में केवल उन कैंसर-रोधी दवाइयों पर मूल्य-नियंत्रण लागू किया, जो ‘राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची’ में शामिल थीं।
‘राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची’
इस सूची में ऐसी दवाइयां शामिल की जाती हैं, जो लगभग 90 प्रतिशत मरीज़ों की ज़रूरतें पूरी करती हैं और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के तहत ज़िला अस्पतालों से लेकर सर्वोच्च स्तर के अस्पतालों तक हर जगह प्राथमिकता के आधार पर हमेशा उपलब्ध रहनी चाहिए।
इस सूची से बाहर की, लेकिन चिकित्सा ग्रंथों में शामिल अन्य कैंसर-रोधी दवाइयां भी सम्बंधित मरीज़ों के लिए जीवनरक्षक हो सकती हैं। इसलिए उन पर भी मूल्य-नियंत्रण होना चाहिए। लेकिन सरकार ने 2013 में इनमें से केवल राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची में शामिल 63 चुनिंदा दवाइयों पर ही मूल्य-नियंत्रण लागू किया। शेष 162 कैंसर-रोधी दवाओं को मूल्य-नियंत्रण से पूरी तरह बाहर रखा गया। अब इन 162 दवाइयों में से 110 दवाइयों के मामले में सरकार केवल दुकानदारों के मार्जिन पर नियंत्रण लगा रही है। लेकिन इन दवाइयों पर दवा कंपनिया़ जो मुनाफा कमाती हैं, उस पर सरकार कोई लगाम नहीं लगा रही है।
नियंत्रित कीमत तय करने का गलत तरीका
1995 से मुट्ठी भर दवाओं पर मूल्य-नियंत्रण लागू था। इनकी अधिकतम खुदरा कीमत (एमआरपी) का निर्धारण उत्पादन लागत पर 100 प्रतिशत मुनाफा जोड़कर किया जाता था। इसमें निर्माता और दुकानदार, दोनों का मुनाफा शामिल होता था। ‘ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क’ ने 2003 में सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी कि बाज़ार में मौजूद मुट्ठी भर दवाइयों की बजाय सभी दवाइयों पर मूल्य-नियंत्रण लागू किया जाए। इस मामले में सरकार ने दस साल तक टालमटोल की। अंततः सर्वोच्च न्यायालय की चेतावनी के दबाव में सरकार ने 2013 से ‘राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची’ में शामिल 348 दवाइयों पर मूल्य-नियंत्रण लागू किया। लेकिन ऐसा करते समय नियंत्रित कीमत तय करने के लिए सरकार ने 2013 में एक जटिल और अनुचित ‘बाज़ार-आधारित’ पद्धति लागू कर दी। इसका परिणाम यह हुआ कि मूल्य-नियंत्रण के दायरे में लाई गई 63 कैंसर-रोधी दवाइयों की कीमतों में औसतन केवल लगभग 10 प्रतिशत की ही कमी आई। वास्तव में, उनकी कीमतें 300–400 प्रतिशत तक घटनी चाहिए थी।
सही तरीका क्या हो सकता है?
इस बात को जन-औषधि दुकानों के उदाहरण से भी समझा जा सकता है। सरकार ने दवा कंपनियों से दवाइयां खरीदकर जन-औषधि दुकानों तक पहुंचाने की व्यवस्था बनाई है। इस व्यवस्था में दवा बनाने वाली कंपनियों को उत्पादन लागत पर आधारित उचित मुनाफा मिलता है और दुकानों को 16 प्रतिशत मार्जिन मिलता है। इसके बावजूद, जन-औषधि दुकानों में जेनेरिक नाम से मिलने वाली ये दवाइयां सामान्य बाज़ार में उपलब्ध दवाइयों की कीमतों के मुकाबले चौथाई से लेकर पांचवें हिस्से तक की कीमत पर मिलती हैं! यदि सरकार इसी तरह का मूल्य-नियंत्रण सभी दवा निर्माता कंपनियों और दवा दुकानदारों पर लागू करे, तो आम मरीज़ों को सभी दवाएं उचित कीमतों पर देना संभव होगा। (स्रोत फीचर्स)
Photo credit- https://www.livemint.com/news/india/why-only-cancer-drugs-sc-questions-centre-on-trade-margin-cap-seeks-wider-price-regulation-11791806818920.html