कुमार सिद्धार्थ

प्रकृति में ततैया (wasp) की भूमिका केवल डंक मारने वाले कीट की नहीं है। वह परागण में योगदान देने के साथ-साथ प्राकृतिक शिकारी के रूप में कई दूसरे कीटों की संख्या नियंत्रित करने वाले कीट के रूप में भी महत्वपूर्ण है। हाल ही में ब्रिटेन में हुए एक अध्ययन से पता चला कि वर्ष 2025 में ततैयों की संख्या असामान्य रूप से अधिक रही थी, जबकि 2026 की गर्मियों में कई इलाकों में वे बहुत कम दिखाई दीं। वैज्ञानिकों की चिंता है कि मौसम में बढ़ती अनिश्चितताएं इस प्राकृतिक उतार-चढ़ाव को और तेज़ तथा अप्रत्याशित बना सकती हैं।
सवाल यह है कि अगर बदलते मौसम के कारण ततैयों की संख्या और उनके जीवन-चक्र में बदलाव आ रहा है, तो क्या इसका असर केवल ततैयों पर पड़ेगा या पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) पर?
अपने देश में ततैयों की विविधता काफी बड़ी (diverse) है। वर्ष 2020 में प्रकाशित भारत में Vespidae परिवार की विस्तृत सूची के अनुसार देश में ततैया परिवार की 288 प्रजातियां, 60 वंश और पांच उपकुल दर्ज किए गए थे। ये प्रजातियां देश के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में पाई जाती हैं।
ततैयों की वास्तविक विविधता इससे भी अधिक हो सकती है, क्योंकि देश के कई हिस्सों में इन पर पर्याप्त अध्ययन नहीं हुआ है। वर्ष 2023 में भारतीय उपमहाद्वीप की ततैयों पर प्रकाशित एक समीक्षा में ततैयों की कम से कम 104 प्रजातियां दर्ज की गई थीं। शोधकर्ताओं ने यह भी रेखांकित किया कि इनकी जैविकी और पारिस्थितिकी के बारे में उपलब्ध जानकारी अभी सीमित (limited knowledge) है।
मौसम से जुड़ा जीवन–चक्र
सामाजिक ततैयों (social wasps) की कॉलोनी की शुरुआत आम तौर पर एक रानी से होती है। मौसम अनुकूल होने पर रानी सुरक्षित जगह तलाशती है, घोंसला बनाती है और शुरुआती कामगारों को जन्म देती है। इसके बाद कामगारों की संख्या बढ़ती जाती है और कॉलोनी विकसित होती है।
मौसम में बदलाव का असर शुरुआती चरण पर पड़ सकता है। तापमान, बारिश, नमी और भोजन की उपलब्धता जैसी परिस्थितियां यह तय कर सकती हैं कि कितनी रानियां सफलतापूर्वक कॉलोनी स्थापित (colony establishment) कर पाएंगी।
वसंत, गर्मी और मानसून का चक्र कई क्षेत्रों में अलग-अलग है। हिमालय, पूर्वोत्तर, पश्चिमी घाट, मध्य भारत और शुष्क पश्चिमी भारत में ततैयों के लिए परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। लेकिन इससे एक महत्वपूर्ण शोध प्रश्न जरूर निकलता है क्या भारत में भी मौसम की बढ़ती अनिश्चितता ततैयों के प्राकृतिक जीवन चक्र (natural life cycle) को प्रभावित कर रही है या करेगी?
पूर्वोत्तर से पश्चिमी घाट तक
हाल के शोध इस बात का संकेत देते हैं कि ततैयों की विविधता और उनका पर्यावरण (diversity & environment relation) से सम्बंध कितना व्यापक है। वर्ष 2026 में प्रकाशित तवांग, अरुणाचल प्रदेश के एक अध्ययन में 19 प्रजातियां दर्ज की गईं। इसी अध्ययन में अरुणाचल प्रदेश में Vespidae की 73 प्रजातियों और 27 वंशों की सूची तैयार की गई।
पश्चिमी घाट के गोवा क्षेत्र में किए गए एक अध्ययन में वर्ष 2019 के दौरान 231 ततैया नमूनों की पहचान की गई, जो 19 प्रजातियों, 12 वंशों और Vespidae के चार उपपरिवारों से संबंधित थे। वन क्षेत्र में 19 प्रजातियां मिलीं, जबकि कृषि क्षेत्र में 13 प्रजातियां दर्ज हुईं।
असम में गुवाहाटी विश्वविद्यालय परिसर में वर्ष 2022-23 के दौरान किए गए अध्ययन में ततैया और मधुमक्खियों की 23 प्रजातियां दर्ज की गईं। यहां ततैयों की संख्या में मौसमी बदलाव (weather influence) देखा गया और मानसून के महीनों में उनकी उपस्थिति सर्वाधिक रही।
ये आंकड़े बताते हैं कि ततैयों की आबादी मौसम और आवास के साथ बदलती है और अलग-अलग पारिस्थितिक क्षेत्रों (ecosystem areas) में इनका अध्ययन ज़रूरी है।
ततैया हमारी दुश्मन नहीं
ततैया को आम तौर पर मधुमक्खी के मुकाबले कम पसंद किया जाता है। मधुमक्खी से शहद मिलता है, वह परागण (pollination) करती है और कृषि के लिए उपयोगी मानी जाती है। ततैया को अक्सर केवल उसके डंक और उसके घोंसले से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन यह तस्वीर अधूरी है।
कई ततैया प्रजातियां दूसरे कीटों का शिकार करती हैं। वे मक्खियों, इल्लियों (कैटरपिलर्स) और दूसरे छोटे कीटों को पकड़कर अपनी संतानों को खिलाती हैं। इस तरह वे प्राकृतिक कीट नियंत्रण (biological insect control) में अहम भूमिका निभाती हैं।
कुछ ततैया परागण में भी योगदान देती हैं। हाल के वर्षों में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हुए अध्ययनों ने यह दिखाया है कि गैर-मधुमक्खी परागणकर्ताओं को लंबे समय तक अपेक्षाकृत कम महत्व दिया गया है।
मधुमक्खी से अलग है ततैया
ततैया को अक्सर मधुमक्खी समझ लिया जाता है, जबकि दोनों में महत्वपूर्ण अंतर हैं। मधुमक्खियां मुख्यतः फूलों के रस और पराग पर निर्भर रहती हैं और परागण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसके विपरीत, ततैयों की कई प्रजातियां दूसरे कीटों का शिकार करती हैं (parasitoids)। मधुमक्खियों का शरीर अपेक्षाकृत रोएंदार होता है, जबकि ततैयों का शरीर चिकना और पतला दिखाई देता है। कई ततैया बार-बार डंक मार सकती हैं, जबकि कामगार शहद मधुमक्खी आमतौर पर डंक मारने के बाद मर जाती है।
कीट नियंत्रण
ततैयों की भूमिका को केवल जैव विविधता के नज़रिए से देखना उपयुक्त नहीं है। कृषि में प्राकृतिक कीट नियंत्रण का महत्व तेज़ी से बढ़ रहा है।
अगर कुछ ततैया प्रजातियां खेतों में फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों का शिकार करती हैं, तो उनकी मौजूदगी किसानों के लिए एक प्राकृतिक (इकॉलॉजिकल) सेवा है। दूसरी ओर, अत्यधिक कीटनाशक इस्तेमाल, आवास का नुकसान और बदलता मौसम इनकी संख्या को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए कीट नियंत्रण की ऐसी रणनीति ज़रूरी है जिसमें ‘हानिकारक कीट’ और ‘उपयोगी शिकारी कीट’ के बीच अंतर किया जाए। हर ततैया को नष्ट कर देना कीट नियंत्रण नहीं है। कई बार यह प्राकृतिक नियंत्रण की एक महत्वपूर्ण कड़ी (chains of natural control) को खत्म करना भी साबित हो सकता है।
जलवायु परिवर्तन: असली खतरा
जलवायु परिवर्तन का अर्थ केवल औसत तापमान का बढ़ना नहीं है। मौसम के समय और तीव्रता में बदलाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है। बहुत गर्म दिन, अचानक बारिश, लंबे सूखे, असामान्य ठंड या मानसून के आने-जाने में बदलाव ये सभी उन कीटों के जीवन-चक्र को प्रभावित कर सकते हैं जिनकी गतिविधियां मौसम से गहराई से जुड़ी हैं (weather dependent life-cycle)।
ततैयों के मामले में शुरुआती मौसम विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है। अगर रानियां (queen wasp) ऐसे समय में बाहर निकलती हैं जब भोजन उपलब्ध नहीं है या अत्यधिक गर्मी और बारिश के कारण घोंसला बनाना मुश्किल है, तो उस वर्ष कॉलोनियों की संख्या प्रभावित हो सकती है।
दूसरी ओर, अनुकूल मौसम बड़े पैमाने पर कॉलोनियों के विकास को बढ़ावा दे सकता है।
शोध की कमी चिंता का विषय
भारत में ततैयों की प्रजातियों की सूची तैयार करने का काम हुआ है, लेकिन उनकी आबादी में दीर्घकालीन बदलावों (long term changes) को दर्ज करने वाले व्यवस्थित अध्ययन बहुत कम हैं। इसलिए ततैयों की निगरानी को जैव विविधता की व्यापक निगरानी का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
स्कूलों, विश्वविद्यालयों, कृषि संस्थानों और विज्ञान कार्यक्रमों के माध्यम से भी ऐसे आंकड़े जुटाए जा सकते हैं। लोग अपने आसपास दिखाई देने वाली ततैयों की प्रजातियों, संख्या, मौसम और स्थान की जानकारी दर्ज कर सकते हैं। इस तरह कई वर्षों में तैयार हुआ आंकड़ा (data) महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
सवाल सिर्फ ततैयों का नहीं जलवायु परिवर्तन के दौर में प्रकृति के संकेत (nature’s calamatous signals) अक्सर बहुत सूक्ष्म होते हैं। किसी पक्षी का समय से पहले लौटना, किसी पेड़ का असमय फूलना, तितलियों की संख्या में बदलाव या किसी कीट का अचानक कम दिखाई देना, ये सभी बड़े बदलावों की शुरुआती सूचनाएं हो सकते हैं। ततैया भी ऐसा ही एक संकेत हो सकती है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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